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Full text of "Purana Niyam Ki Bhoomika"

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मसीही आध्यात्मिक शिक्षामाला कर. २१: सामान्य टोका ग्रंथ १ द 
संपादक : पा. डा, सी. डबल्यु, डेविड, एम. ए.ढ, डी. डी. 


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की 





द लेखक द 
पा. डा. सी. स्टेग्ली थोबन, ए. एम., टीएच. डी., डी. डी. 


. प्राचायं, उत्तर भारत धम्मविज्ञान महाविद्यालय, बरेली 
भाषांतर 


पा, डा, सी. डबल्घु. डेविड, एम. ७., डी. डी. 


का प्रकाशक 
मसीही आध्यात्मिक साहित्य समिति 
रे. ० प्राप्ति स्थान... 
एन. आई. सो. ट्रेक्ट एण्ड बुक सोसायटी क्‍ 
१८ बलाइव रोड, इलाहाबाद--१ थक 





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8 पुराना-नियम को भूमिका 
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विषय सूची 




















विषय 
सम्पादक का वक्तव्य द ग्‌ 
प्रथम भाग : पुराना नियम को सामान्य भूमिका १-७३ 
पहला अध्याय--पुराना नियम की परिभाषा द थक 
दूसरा अध्याय--पुराना नियम का दिव्य रचयिता .._ न अल 
तीसरा अध्याय--विस्तुत साहित्यिक संदर्भ में प्रामाणिक धर्मशास्त्र"” हद 
चौथा अध्याम--पुराना नियम का क्रम 


१, इब्रानी बाइबल २. सेपत्वांगिता, सप्तति अनुवाद 
३. वुल्गाता ४. अंग्रेजी बाइबल ५. अध्याय, पद एवं 
अन्य विभाजन ६. व्यक्तिवाचक संज्ञाएं 
पांचवां अध्याय--प्रामाणिक धर्मशास्त्र का विकास एवं निर्धारण “* २१ 
१, मतैक्य के रूप में प्रामाणिक धर्मशास्त्र 
२. प्रधान व्यक्तियों की घोषणाओं के रूप में प्रामाणिक धम्मशास्त्र 
धर्म परिषदों द्वारा प्रामाणिक धर्मंशास्त्र की परिभाषा 








छुठवां अध्याय--पराना नियम की भाषा और लिपि ०५१०० ०० पक 

सातवां अध्याय--प्राना नियम का मूलपाठ.. ४०९०... हेड 

आठवां अध्याय--धर्म गास्त के अध्ययन के उपागम 8 0 के 

द्वितीय साग--पुराना नियम की पुस्तकों की भूमिका ७४-३७४ 

नोवां अध्याय---पंचग्रथ हु ४3 क्‍ 8. 

दसवां अध्याय--उत्पत्ति हे आह 

ग्यारहवां अध्याय--निर्गमेमन...... है ७०३० 7०“: ७ 

बारहवां अध्याय--लैव्यव्यवस्था.. | रः ५ हलक: 2 हू 

तैरह॑वां अंध्यायं->गिनती . - ता अजय पाल छा ३ 

चौदह॒वां अव्याये--व्यवस्था विवरण हाय हाय तय अवछज या आह 

द्रबां अध्याय---पंचग्रंथ की रचना 5 पाए पर 7 छछ 
. सोलहबां अध्याय--ऐतिहासिक पुस्तकें... || | |औ_: दि हा 
. सतरहवां अध्याय--यहोश | लुत्फ 























_(ख) का की डी विषय-सूची द 


अठारहवां अध्याय--न्यायियों 
उन्नीसवां अध्याय--रूत 
 बीसवां अध्याय---१ और २ शमुएल 
इक्कीसर्वां अध्याय--१ और २ राजा 
 बाईसवां अध्याय--१ और २ इतिहास 
तेईसबां अध्याय---एजा-नहेम्याह 
_चौबीसवां अध्याय--एस्तेर 

पच्चीसवां अध्याय--काव्यात्मक और नीति ग्रंथ 
छुब्बीसवां अध्याय---अय्यूब 

सत्ताईसवां अध्याय--भजन संहिता 
अद्ठाईसवबां अध्याथ--नीति वचन 
. उनतीसवां अध्याय--सभोपदेशक 
..._तीसबां अध्याय--श्रेष्ठ गीत 

. इकतीसवां अध्याय--नबूवतात्मक पुस्तकें 

 बत्तीसवां अध्याय--यशायाह द 


...... तैतोसवां अध्याय--यिर्मयाह 
_ चौंतीसववां अध्याथ---विलाप गीत 


 पेंतीसबां अध्याय--यहेजकेल 
- छत्तीसर्वां अध्याय--दा निय्येल 


... सेंतीसवां अध्याय--हो गे 


- . अड़तीसवां अध्याय--योएल 


.._ उनतालीसवां अध्याय--आमोस 
.... चालीसवां अध्याय--ओवचाह - 
..._ इकतालीसवां अध्याय--योतरा 
.... बियालीसवबां अध्याय--मीका 
_... तेतालीसवां अध्याय--नहम 
.... चोबालीसवां अध्याय--हबक्कूक 
.......  पेतालीसवां अध्याय--सपन्याह 
... छियालीसवां अध्याय--हाग्गै 
....... संतालीसवां अध्याय--जकर्याह 
....._ अड़तालीसवां अध्याय--मलाकी 
..... परिशिष्ठ (क) कालानुक्रम सारणी 





.. (ख) पुरातत्व और पुराना नियम 





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संपादक का वक्तव्य 


दर्शन के पश्चात वह सब कुछ जो खिस्त से पू्षे हुआ और बह सब कुछ जो 
उसके पश्चात होता है कुछ फीका सा लगता है । अत: यह भय रहता है कि 
पुराने नियम के गहन अध्ययन को महत्वहीन समा जाए । उस प्रकाशन के 
अदर्शन से जो कुछ उसके पूर्व हुआ वह अपने में पूर्ण और जो कुछ उसके 
पश्चात होता है वह भी भला ही लगता है । अतः यह भय रहता है कि पुराना 
नियम को ही पूर्ण आदर्श मान लिया जाए । ये दोनों अनुभव अपूर्ण हैं। सच 
ती यह है कि यीशु खिसत की जीवन-ज्योति में अतीत भी दीप्तिमान हो उठता 
है और भविष्य भी जगमगाने लगता है । यीशु के प्रकाश में प्राचीन और 
नवीन में जो सत्य है बह झलकने लगता है । जो यीशु से पृथक करके अतीत, 
_ बर्तेमान और भविष्य को देखते हैं, उन्हें बुरा भला सब कुछ सत्य, सुन्दर और 
मंगलकारी लग सकता है। यीश गरशभित दृष्टि पूर्वा ग्रही दृष्टि नहीं, सच्ची पैनी 
दृष्टि है । इसीलिये अतीत के संबंध में सत्य का जितना सच्चा उद्घाटव हुआ. 
है और हो रहा है वह अधिकांशतया उन विद्वानों के द्वारा हुआ और हो रहा. 
है जिन्होंने यह दृष्टि अपनाई है | मान्य धर्मशास्त्रों का इस सत्य दृष्टि से 
अध्ययन सरल कार्य नहीं है, परंतु इसी दृष्टि से ही प्राचीन धर्मंशास्त्रों के 
अध्ययन का कार्य सरल भी होता है। इस पुस्तक के लेखक में बह दृष्टि है । 





इस पुस्तक के पढ़ने से ही मुके इस दृष्टि का आभास हुआ | लेखक में न केवल ५ है 


स पनी दृष्टि की शक्ति है अपितु इसके प्रशिक्षण की क्षमता भी है । 


अनेक अन्य कारणों से भी पुराने नियम का अध्ययन बहुत कठिन कार्य. 


हैं। ३९ पुस्तकों का यह धर्मेशास्त्र एक विशाल सागर है। इसे प्राता नियम 
कौन कहता है और क्यों कहता है ? पुराने नियम में नया नियम निहित है, तो 
दोनों का क्या संबंध है ? ३६ पुस्तकों का क्रम एक ही है अथवा उनके ऋम 

अनेक हैं ? इन पुस्तकों का चयन कैसे हुआ ? इनका रचथिता दिव्य है अथवा 

मानवीय ! इसको प्रामाणिक धर्मशास्त्र कैसे और कब माना गया ? इसमें 
.. कितने प्रकार की रचनाएं हैं ? इसकी भाषा कौन सी है ? लिपि कौन सी है? 
.._ इसके अध्ययन की कौनसी पद्धतियां संभव हैं ? इसकी प्रमुख विचारधाराएं 


... और धर्मे-दशन क्या हैं ? विज्ञान तथा इस ग्रंथ में प्रस्तुत विचारों का सामंजस्य 








क्‍ क्‍ | (घ) 
हो सकता है अथवा नहीं ? ये तथा अन्य जटिल समस्याएं संपूर्ण ग्रंथ की 
. समस्याएं हैं। जब हम प्रत्येक पुस्तक पर विचार करने लगते हैं, तो उसके नाम, 
.. सारतत्व, विषय-सामग्री, रचना, रचयिता, रचना तिथि, निर्वचतन या व्याख्या, 
 समीक्षात्मक प्रश्न, धर्मंशिक्षा, इतिहास एवं कल्पना, शैली और टेकनीक आदि 
त्वपूर्ण प्रश्न हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं । फिर आज पुरातत्व की खोज 
के साथ इस ग्रंथ का समंजन होता है अथवा नहीं यह भी एक गंभीर समस्या 
है ॥ इतिहास, भगोल राजनीति, दर्शन, नीति, धर्मविज्ञान, भाषा आदि शास्त्रों 
के साथ इस विशाल सागर का क्या संबंध हे--यह प्रश्न भी बड़ा महत्वपूर्ण 
है । अतः इस महान ग्रंथ की भूमिका लिखने के लिये उच्च कोटि की बिद्वत्ता 
विस्तृत ज्ञान, अनेक भाषाओं का ज्ञान, इतिहास की भावत्ता, धर्म के प्रति 
आस्था, वैज्ञानिक तथा धर्म विज्ञान की दृष्टि एवं प्रतिभा की आवश्यकता है। 
साथ ही खिस्तीय कलीसिया तथा मानव जाति के कल्याण के निर्मित्त उस 


...... सत्य दृष्टि की भी आवश्यकता है जो खिस्त के प्रेम एवं पवित्नात्मा की सामर्थ 
5... नै प्राप्त होती है । 


... इस पुस्तक 'पुराना नियम की भूमिका के मूल लेखक डा. सी, स्टेनली 


... थोबरन इन गुणों से संपन्न हैं। आप अंग्रेजी, हिन्दी, उदू, युनानी, लतीनी 
.... अरबी, उगरित आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञाता हैं | पुराने नियम के उच्च कोटि 
... के विध्वान और शिक्षक हैं। आप ऐसे मिशनरी परिवार के हैं जिनका नाम _ 
.... उत्तर भारत और पाकिस्तान की मेथोडिस्ट कलीसिया में जादू है। आपने 

55. पलिएतीन का म्रमण किया । उसके इतिहास से मौलिक जानकारी प्राप्त की। 





.... आपने बॉस्टन विश्वविद्यालय से ए. एम. तथा टी. एच. डी. की उपाधियां प्राप्त पे 


.. कीं। १६६३ में सीरामपुर कॉलेज ने आपको डी. डी. की उपाधि से सम्मानित 
....... किया। १६२८ से लगातार इस देश में सेवा कर रहे हैं। १६२८-३० तक 
.... बरेली धर्मविज्ञान महाविद्यालय में, और १६३६-१६६४ तक लेनर्ड थियोलॉ- 
... जिकल कॉलेज, जबलपुर में प्राध्यापक रहे और आपका प्रमुख अध्यापन विषय 
... पुराना नियम ही रहा । पिछले तीन वर्षों से आप उत्तर भारत धर्म॑विज्ञान 
..... महाविद्यालय, बरेली के प्राचार्य हैं। १६३० से १६९३६ तक आप नैनीताल - 
......// / अंग्रेजी कलीसिया के पास्टर रहे | आपकी विद्गत्ता एवं बहुमुखी प्रतिभा के 
... संबंध में जितना भी कहा जाए थोड़ा ही है। आपने नया और पुराना नियम 
....  दोतों के नये हिन्दी अनुवाद में अपूर्व योगदान किया है। दोनों अनुवाद 
.... समितियों के आप अध्यक्ष हैं। भारत में ही आप का जन्म हुआ । कुमाऊं की 











... पहाड़ियों के प्राकृतिक सौंदर्य, भारत की जनता और अपने आराध्य यीशु... 
५ आपके व्यक्तित्व में है, जिसे आप... 
एवं सरलता का अंदुभुत मिश्रण हुआ. 5" 








. परमेश्वर का भय मानते हैं 








इस पस्तक में आपने समस्त सामान्य एवं प्रत्येक पृथक पस्तक संबंधी 
समस्याओं एवं प्रश्नों का गहन विचार किया और उनका संक्षिप्त विवेचन 
किया है। आपने गागर में सागर भर दिया है और प्राने नियम के सागर से 
रत्न राजियां बिखेर दी हैं। मूल पुस्तक अंग्रेजी में लिखी गई । यदि आप से 
ले हिन्दी में लिखने को कहा जाता तो आप हिन्दी में ही लिख देते 
श्द्धेय डा. सी. एस, थोबर्न के लिये दो शब्द लिखने का अभिप्राय यह है कि 
पाठक जाम लें कि उनका कितना बड़ा सौभाग्य है कि इस विद्वांत लेखक की 
प्स्तक उनको पठनार्थ प्राप्त हो रही है का 
मूल पुस्तक का हिन्दी अनुवाद इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज के भूतपूवव प्राचार्य, 
अध्यक्ष हिन्दी विभाग, मसीही आध्यात्मिक ज्षिक्षामाला के वर्तेमान संपादक डा. 
सी. डबल्यु. डेविड ने किया और डा. सी. एस थोबरन ने सहयोग प्रदान किया । 
अपने विषय और डा. थोबने के विषय में क्या कहं ? इतना कहना पर्याप्त होगा 
कि मूल पुस्तक का इससे अच्छा अनुवाद संभव नहीं । मैं इसे प्रभु की अनुकंपा 
मानता हूं कि मुझे अनुवाद करने का सोभाग्य प्राप्त हुआ । 
अनुवाद का प्रत्येक शब्द मैंने और डा, थोबन ने साथ-साथ पढ़ा है । पुस्तक 
के अंत में 'पुरातत्व और पुराना नियम पर एक परिशिष्ट है जो मूल पुस्तक 
में नहीं है । एक दृष्टि से यह पुस्तक मौलिक पुस्तक ही है । 


एल, टीएच. एवं बी. डी. के अध्यापकों एवं छात्रों के अध्यापन अध्ययन 

के लिये यह पुस्तक अनुपम देन है । प्रत्येक पास्तर ओर प्रचारक के लिये इसका 
मनन आवश्यक है। हिन्दी भाषी खिस्तियों के लिये इसका अध्ययन लाभप्रद 
। अखिस्‍्ती बिद्वानों के लिये यह पुस्तक अपने धर्मशास्त्रों के समीक्षात्मक 
अध्ययन में प्रेरणा प्रदान करेगी । इसमें व्यापक विचारधाराओं का--परमेश्वर 
धार्मिक, स्यायी और करुणामय है; उसने वाचा के अन्तर्गत स्वयं को प्रकाशित 
किया है; वाचा के अंतर्गत रहने में मानव का कल्याण है; परमेश्वर इतिहास 





का प्रभु है; दुःख की समस्या के विभिन्न रूप हैं; स्थानापन्न दुःख उठाने की 


.. परिकल्पना कितनी भव्य है, जीवन का आदर्श और अंतिम आशा के चित्र एवं 

- संदेश की रेखाएँ क्‍या हैं--इन विचारधाराओं एवं अनुभतियों का दर्शन प्रत्येक 

पाठक को इस पुस्तक में होगा और वह पुकार उठेगा कि उनके लिये जो 
हें ध 


का 


पर्भ का सूर्य उदय होगा और उसकी किरणों के. 


द्वारा सब चंगे हो जाएँगे । यह धर्म का सूर्य यीशु खिस्त है जिसकी प्रेमल । 


. किरणों से समस्त मानव जाति चंगी होती 


मसीही आध्यात्मिक शिक्षामाला के अंतर्गत सामान्य टीका के आठ ग्रंथ. 


.. प्रकाशित हो रहे हैं, चार पराने नियम पर, 










क्‍ हे नये नियम पर । इन म्रंथों में प रे रा 








(छ) 


अभी तक ग्रंथ संख्या पांच तथा नियम की पृष्ठभूमि” और संख्या छः या 
. तियम की भूमिका प्रकाशित हुए हैं । पुस्तक ग्रंथ संख्या एक है। वलड 
 कौंसिल ऑफ चर्चेज् के वल्डेमिशन एवं इवेंजेलेज्मि विभाग के थियोलॉजिकल 
. एजुकेशन फंड से वित्तीय सहायता तथा उसके पदाधिकारियों, विशेषकर मिस 
डी. टेरी के प्रोत्साहन के लिये हम हादिक कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । हम अनु- 
. वादक और डा. सी, एस. थोबरन के आभारी हैं । विद्वान लेखक, श्रीरामपुर की 
सीनेट और क्रिश्चियन लिटरेचर सोसायटी को हम धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने 
. अनुवाद की अनुमति प्रदान की । हम श्रीमती पल सी. थोबन तथा श्रीमती 
मिरियम सी. डेविड के प्रति आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने लगातार 
प्रोत्साहन दिया और मुझे और डा. थोवर्न को कार्य करने में सब प्रकार की 
सुविधाएँ की और प्रतिदिन प्रार्थना एवं वचन पाठ का संबल उपलब्ध किया । 


सी. डबल्यु. डेविड द 
द संपादक, मसीही आध्यात्मिक शिक्षामाला 
हा . उत्तर भारत धर्मविज्ञान महाविद्यालय: 
...._ ६७ सिविल लाइंस, बरेली 
..... फरवरी १६६८ 










का 3 ! है ( है| र् ए् 4 / ८... प- व कक 


टी ४४“ 




















प्रथम भाग 
पुराना नियम को सामान्य भूमिका 


पहला अध्याय 


पुराना नियम की परिभाषा 


पुराना नियम लेखों के उस सम॒ह को कहा जाता है जो नया नियम की 


साहित्यिक और प्रकाशनात्मक पृष्ठभूमि के रूप में मान्य किया जाता है। 
मानव मन पर धर्म के अधिकार की दृष्टि से ऐसे लेखों को “'धर्मशास्त्र" की 
संज्ञा दी जाती है । धर्मशास्त्र उसे कहते हैं जो किसी मंडली अथवा धर्म-समाज 
द्वारा अपने विश्वास के लिये मूल आधार स्वीकार किया जाता है। पुराना 
नियम इस दृष्टि से धर्मशास्त्र है क्योंकि वह उन लेखों के पूर्ण समूह का एक 
भाग है, जिनको कलीसिया ने आधारभूत अथवा प्रामाणिक माना है। पुराना 
नियम की एक और परिभाषा यह है कि वह अधिकृत शख््रिस्तीय धर्मशास्त्र का 
प्रथम भाग है। अधिकृत शास्त्र के लिये अँग्रेजी में कानोन ((:७70॥ ) शब्द काम 
लिया जाता है । व्युत्पत्ति की दृष्टि से कानोन का अर्थ है. मापने का डंडा । 
यहाँ पर उसका अथ है 'प्रामाणिक लेखों का मानक या मानदंड” । अतः हम 
अधिकतर खि्रस्तीय धर्मशास्त्र के दो भाग करते हैं, अर्थात्‌ पुराने नियम का 
अधिकृत शास्त्र और नए नियम का अधिकृत शास्त्र । 


कक; 


ऐसी सामान्य परिभाषाओं के क्षेत्र से आगे बढ़कर जब हम यह प्रश्न 
उठाते हैं कि कौन से विशेष लेख प्रामाणिक अथवा अधिकृत माने जाते हैं तो 
यह पता चलता है कि विभिन्न मसीही समुदायों में इस संबंध में मतैक्य नहीं 
है । कुछ तो पुराना नियम' के अन्तर्गत अधिक और कुछ कम लेखों को स्थान 
देते हैं । कुछ हैं जो मध्यम दृष्टिकोण अपनाते हैं और प्रामाणिक लेख और 
_ ज्ञानवर्धक लेख ऐसे दो विभाग करते हैं। कम लेखोंवाला धर्मशास्त्र यहुदियों 
के धर्मशास्त्र के अनुरूप है। अधिक लेखोंवाला धर्मशास्त्र वह है जो प्रैरितिक 
काल में पलीश्तीन देश से बाहर रहने वाले खिस्ती लोग काम में लेते थे। 

















मम पुराना नियम की भूमिका 


. जिसे सप्तति-अनुवाद (सेपत्वांगिता) कहते हैं, के रूप में पुराने नियम का 
प्रयोग करते थे । यही कारण है कि नए नियम में जो उद्धरण पुराने नियम से _ 
दिए गए हैं उनमें अधिकांश सेपत्वांगिता पर अवलंबित हैं। अधिक लेखों 
वाला पुराना नियम हेलेनी धर्मशास्त्र कहलाते हैं, क्योंकि वे हेलेनी या यूनानी 
भाषा-भाषी यहदियों द्वारां उपयोग में लाए जाते थे जिनमें से कई खिस्ती हो गए 
 थे। अधिक लेखोंवाला पुराना नियम सिकन्द्रिया का कानोन भी कहलाता 
क्योंकि मिस्र के सिकन्द्रिया निवासी यहूदी उसका प्रयोग करते थे । वहीं 
. इब्रानी धर्मशास्त्र का यूनानी अनुवाद हुआ था । इस संबंध में कानोन शब्द का 
: प्रयोग कुछ भ्रामक है, क्योंकि सिकन्द्रिया में जो लेख सम्मिलित किए गए थे 


... उनका पूर्णतया निर्धारण नहीं किया गया था। साधारण प्रचलन के आधार 


2 पर ही लेखों के समूह को स्वीकार कर लिया गया था जो प्रामाणिक धर्मंशास्त्र 
.. के लगभग ही था । दूसरी ओर, वे यहूदी जो पलीश्तीन में रहते थे कम लेखों 
वाले धर्मशास्त्र को मान्य करते थे। परन्तु इस संबंध में भी कानोन शब्द के 


..... अर्थ को उतने ही संकोच के साथ ग्रहण करना आवश्यक है, जितना सिकन्द्रिया 
के कानोन को, क्योंकि पलीश्तीन . का कानोन भी ई. स. दूसरी शताब्दि के. 
..... मध्य तक पूर्णरूपेण निर्धारित नहीं हो पाया । दीर्धकाल तक कम लेखोंवाला 
... . और अधिक लेखोंवाला दोनों ही धर्मशास्त्र खिस्तीय कलीसिया में सामान्य 
... उपयोग के रुप में प्रचलित रहे। कभी कभी वादविवाद और तकंवितक इस 
.... संबंध में हो जाते थे कि कौन से लेखों को अधिकृत या प्रामाणिक माना जाए 





5०० परन्तु तीसरी शताब्दी के पश्चात्‌ ही कलीसिया की परिषदों ने खिस्तीय कानोत 


... का पूर्ण निर्धारण करना प्रारंभ किया।._ 


यह मानना अनुचित होगा कि खिस्तीय कलीसिया ने यहूदी धर्मशास्त्र 


 । को तद्नरूप ही अपना लिया, क्योंकि स्वयं यहूदियों ने अपने धर्मशास्त्र की 


के प्रामाणिकता को खिस्तीय कलीसिया की स्थापना की दो तीन पीढ़ियों पश्चात 


.... ही अंतिम रूप दिया। इन वर्षों में कलीसिया अपने धममंशास्त्र के प्रचलन की 
.... . स्थापना करती जा रही थी। खिस्‍्तीय मंडली के शास्त्र का प्रचलन एक नये 
....._ विश्वास पर केन्द्रित था। विश्वास यह था कि यीशु मसीह परमेश्वर पूत्र 
.. और संसार का उद्धारकर्त्ता' है। अतः यह स्वाभाविक था कि उसके धर्मशास्त्र _ 
.. का प्रचलन यहृवियों से पृथक्‌ हो, क्योंकि वे यीशु और उसके अनुयायियों के. 
..... दावे को स्वीकार नहीं करते थे। इसलिये यद्यपि खिस्तीय पुराना-नियम 
.... धर्मशास्त्र, विषय सामग्री में यहूदी धर्मशास्त्न के प्रायः समान ही है, तथापि पुराने 







. नियम की यहूदी परिभाषा पर अवलंबित नहीं है, वरन्‌ अपने ही मूलाधार पर ५ 


जीवित त विश्वास पर जो पुराने नियमकी । 5 














पुराना नियम की परिभाषा... तर 


भावना से लगा हुआ है । 'पुराना-नियम' शब्द में ही यह सत्य व्यक्त है, जिसमें 
हमारे प्रभु और उद्धारकर्त्ता यीशु खिसत के 'नया-नियम' में विश्वास निहित 
है । यहुदी लोग अपने धर्मंशास्त्र को कभी-भी पुराना-नियम नहीं कहते हैं; 
क्योंकि उसका अर्थ खिस्तीय धर्म के दावे को स्वीकार करना होगा । वे अपने 


धर्मशास्त्र को व्यवस्था, नवी और लेख' की संज्ञा देते हैं । यहूदियों ने अपना 


कानोन ह्वितीय शताब्दी के मध्य में (लगभग १५० ई. स.) अंतिम रूप में 
निर्धारित किया । इस निर्धारण की ठीक तिथि एवं परिस्थिति की जानकारी 
नहीं मिलती । यह निर्धारण उपरोक्त पलीश्तीन कानोन के निर्धारण के अनुरूप 
ही था । खिस्तीय कलीसिया ने प्रामाणिक धर्मशास्त्र का निर्धारण ई. स. ३९७ 


में काथज की परिषद्‌ में किया, जिसमें ३६५ ई. स. में अथनासियस द्वारा 


प्रामाणिकरण को बहुत महत्त्व दिया गया था। प्रामाणिक धर्मशास्त्र के स्वरूप 
निर्धारण के संबंध में आगे और विवेचन किया जाएगा। यहाँ इतना कहना 
पर्याप्त होगा कि रोमन केथोलिक कलीसिया और प्राच्य कलीसियाएँ१ पुराना- 
नियम को अधिक लेखोंवाले यूनानी धर्मशास्त्र के अर्थ में; प्रोतेस्तंत कलीसियाओं 
में कालविन की परम्परा कम लेखोंवाले पलीश्तीन कानोन के अर्थ में (अर्थात्‌ 
यहुदियों के धर्मशास्त्र के समान); और अन्य, विशेषकर लूथरन और एग्लिकन 
कम लेखोंवाले को (पुराना नियम ) प्रामाणिक, और शेष (अपक्रिफा) को 
ज्ञानवधक शास्त्र के अथ्थ में स्वीकार करते हैं । 


दूसरा अध्याय 
धर्मश्ञास्त्र का दिव्य रचयिता 


उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि विकास की प्रक्रिया से 
ही धर्मशासत्र अपने वर्तमान रूप को प्राप्त हुए हैं। उनका विकास किसी भी. 
अन्य साहित्य के समान है, और किसी प्रकार की चयन-पद्धति के आधार पर. 
कुछ पुस्तकों का चुनाव और अन्य का अस्वीकरण किया गया है। इस प्रकार 
की मानवी प्रक्रिया के कारण यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इन्हीं लेखों को. 
ही क्‍यों परमेश्वर का वचन कहा जाए, और अन्य लेखों को क्यों नहीं ? बाइबल 


90०७00७७७७७॥७७/७७७शएश/श//॥/एशशाश्ाशशशाशााभा भा भला मन अम्नरवकलक 





नि ल खनन पनननगख लत 
नल अ३७+व ३०५४५ +-+७७ ०9९५ ननमजकर 


१. प्राच्य कलीसियाओं में युनानी ऑर्थोदोक्‍्स, रूसी ऑर्थोदोक्‍्स, सिरियन 


आरमीनियन, जाजियन, कोप्तिक, इथियोपिक, जेकोबाइट, खल्दियन रा 


कलीसियाएं सम्मिलित हैं । 

















के 





४... पुराना नियम की भूमिका 


के परे भी विशाल सत्साहित्य मिलता है और उसमें भी पर्याप्त साहित्य 
: प्रेरणाप्रद है और हमारे संकल्पों को भलाई के प्रति सशक्त बनाने वाला है। 
. क्‍या मानव ही इस बात का समीक्षक और निर्णायक नहीं रहा कि कौन से लेख 
धर्मशास्त्र माने जाएं अथवा न माने जाएं ? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता 
है कि यह कलीसिया का विश्वास रहा है--पहले इब्नानी मंडली का, तत्पश्चात्‌ 
. ख्रिस्तीय कलीसिया का--कि कुछ ऐतिहासिक घटनाओं की शूंखला में परमेश्वर 
का हाथ विशेष रूप से प्रकट होता रहा है, और उसी संदर्भ में उसकी वाणी 
कुछ विशिष्ट दिव्यवाणियों में सुताई दी--“उसने मूसा को अपनी गति, और 
इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए ।* अतएवं घटनाओं की इस झांखला के 
आसपास जो साहित्य एकत्रित हुआ, उसमें ईश्वरीय प्रेरणा की छाप मिलती 

यह स्वाभाविक है कि इस सत्य का ग्रहण सदा विश्वास के द्वारा ही होता है, 
क्योंकि परमेश्वर यदि सच्चा परमेश्वर है तो वह पूर्णतया हमारी बुद्धि में समा 
. नहीं सकता । पीढ़ी से पीढ़ी यह विश्वास किया जाता रहा, और उत्तरोत्तर यह 
. अनुभव होता गया कि उसमें एक अखंडता है, एक विशिष्टता है, और मानव से 
: परे जो कुछ है उसकी ओर संकेत है । विश्वास यह था कि परमेश्वर ने इस्राएल 
. को चुना और संपूर्ण सृष्टि की योजना के अंग स्वरूप इस जाति के साथ विशेष 
. रूप से वाचा बांधी । प्रत्येक पीढ़ी में यह विश्वास उत्तरोत्तर सत्य प्रमाणित 
होता रहा, इसलिए नहीं कि वह ओचित्य संबंधी मानवीय धारणाओं के अनुरूप 
. हा, वरन इसलिये कि घटनाओं की यह श्ूंखला संसार की गतिविधियों के 
_. लिये एक पूर्णतया नवीन केद्ध और समस्त मृल्यों के लिये भी एक नवीन केद्ध 
के रूप में अधिकाधिक स्पष्ट रूप से ग्रहण होती रही। अतएवं इन लेखों की 
एक अपनी विशिष्टता यह है कि वे इस विश्वास के साथ लिखे गए कि 
_ परमेश्वर एक निश्चित दिक्‌ और काल में एक विशेष कार्य कर रहा है। 
.. इन धर्म पुस्तकों का केवल एक नायक है। वह है इस्राएल का परमेश्वर । 
. कुलपति, न्‍्यायी, नबी, पुरोहित और राजा ये सब इब्नानियों के इस इतिहास में 
_ गौण पात्न हैं। एक ही सत्य परमेश्वर उन्हें बुलाता है। उनका उपयोग करता है 
अपनी प्रकाशित वाचा के प्रति उत्तके आज्ञापालन के अनुसार उन्हें आशिष 
- अथवा दंड देता परंतु वह सदा एकसा है--सर्वशक्तिमान, धर्मी, विश्वास . 
_ थोग्य, दयावंत, समय पर अपने अनंत अभिप्राय में कार्यरत । मानवीय प्रक्रियाओं 
- से धर्मशास्त्रों का विकास हुआ, इसका यह अर्थ नहीं कि उनका उद्गम मानवीय 
: है। उसका अर्थ केवल यह है कि नई ज्योति के आदी होने के लिये मानव को 





धर्मशास्तर का दिव्य रचयिता........र्श्‌ 


समय की आवश्यकता थी। उसका अर्थ य कि परमेश्वर ने नई ज्योति 
संबंधी इन अभिलेखों के स्वरूपनिर्धारण एवं चयन के लिये व्यक्तियों के साथ- 
साथ समस्त विश्वासी कलीसिया का उपयोग किया। विश्वासियों ने अपने 
विश्वास के और परमेश्वर के उन कार्यों के संबंध में लिखा जिन पर उनका 
विश्वास आधारित था। विश्वासियों ने उन लेखों का उपयोग किया जो उन्हें 
अपने विश्वास के मूल आधारों का स्मरण कराते और उसके प्रति भक्तिनिष्ठ _ 
होने की प्रेरणा उन्हें देते थे। विलोमतः, ये लेख स्वयं उनके विश्वास के लिये 
वास्तविक कसौटी एवं आधार-स्तंभ थे। दोनों प्रक्रियाओं का विश्वासियों के _ 


साथ ही संबंध था। अतः कलीसिया को सशक्त बनाने तथा विविध लेखों में 


स्वास्थ्यप्रद और अस्वास्थ्यप्रद लेखों के बीच अन्तर की पहिचान के लिये 
परमेश्वर का आत्मा क्रियाशील था। इस प्रकार धर्म शास्त्रों का वास्तविक 
. रचयिता पवित्र आत्मा है, यद्यपि कि उसने अनेक मानवीय लेखकों तथा अनेक 
मानवीय समीक्षकों को अपने साधन स्वरूप काम में लिया। धर्म शास्त्रों के देने 
में परमेश्वर ने किसी एक व्यक्ति विशेष का उपयोग नहीं किया, वरन्‌ सम्पूर्ण 
कलीसिया को माध्यम बनाया जिसमें उसने व्यक्तियों की विशेष प्रतिभा का 
तथा साधारण विश्वासी के अनुभवों की कसौटी का भी उपयोग किया । यह 
केबल थोड़े समय के लिये ही नहीं, वरन एक दीघेकाल के लिये, जिससे निश्चय 
के साथ यह पता लग जाय कि कलीसिया ने अपने विश्वास की वास्तविक 
साहित्यिक निधि के रक्षण में कोई भूल नहीं की । 


इस प्रकार यद्यपि एक ऐतिह सिक प्रक्रिया तथा मानवी माध्यमों से इन 


धर्म लेखों का निर्माण हुआ, तथापि वे मनुष्यों में परमेश्वर का एक विशिष्ट _ 
कार्य हैं, और इसलिये परमेश्वर के प्रेरणा-वचन हैं | यह बात स्वयं एक ऐसा... 
सत्य है, जो विश्वास से ग्रहण किया जाता है। वह वस्तुवादी विज्ञान की 


पद्धतियों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि विज्ञान अपनी प्रकृति के... 
अनुसार अतिप्राकृतिक तत्वों के संदर्भ में किसी वस्तु की व्याख्या नहीं करते। 
विश्वास के द्वारा हम अतिप्राकृतिक अर्थात्‌ परमेश्वर को और मानवीय क्षेत्र में... 
उसके कार्यों को देखते हैं । इस प्राक्कल्पना का हम देनिक जीवन के व्यापक 


क्षेत्र में, उद्देश्य, कर्तव्य, बोध, मेल-मिलाप, सहयोग, प्रलोभन, अपराध और _ 


_नैराश्य के अनुभवों में परीक्षण करते हैं। इनके द्वारा उस विश्वास की और 
अधिक पुष्टि होती है और उत्तरोत्तर यह निश्चय बढ़ता जाता है कि यह 


प्राककल्पना सच्ची है, और सत्य का नवीन दर्शन कराती है। धर्म लेखों में इस 
प्रावकल्पना को साकार रूप मिला है। वे परमेश्वर के वचन न । पी 


: पुराना नियम की भूमिका 
तीसरा अध्याय 
बविस्तत साहित्यिक संदर्भ में धमशास्त्र पर हृष्टि 


अधिक लेखोंवले और कम लेखोंवाले पुराने नियम का उल्लेख ऊपर 
किया जा चुका है। कम लेखोंवाले पुराने नियम में, जो विषय सामग्री में 
यहूदी धर्मशास्त्र के अनुरूप है परंतु क्रम में नहीं, निम्नलिखित पुस्तकें 
सम्मिलित हैं ः 

. उत्पत्ति, निर्ममन, लैव्यव्यवस्था, गिनती, व्यवस्थाविवरण, यहोश, न्यायियों 
रूत, शमृएल पहली और दूसरों, राजा पहली और दूसरी, इतिहास 
पहली और दूसरी, एज, नहेम्याह, एस्तेर, अययूब, भजन संहिता, नीतिवचन, 
सभोपदेशक, श्रेष्ठीगीत, यशायाह, यिर्मयाह विलापगीत, यहेजकेल, दानिबेल, 
होशे, आमोस, ओबद्याह, योना, मीका, नहूम, हबकक्‍्कक, सपन्याह, हाग्गे, 


अर _ जकर्याह और मलाकी । सुविधा के लिये हम इन पुस्तकों के समूह को उत्पत्ति- 


रा मलाकी समूह कहेंगे । क्‍ 
..._.__. अधिक लेबोंवाले पुराने नियम में उत्पत्तिमलाकी समूह के अतिरिक्त 


. निम्नांकित पुस्तकें भी हैं : तोबित युदित, शेष एस्तेर, सुलेमान का प्रज्ञा ग्रंथ, 
... सभोपदेशक, यिर्मयाह की पत्नी सहित बारूक, तीन पवित्र बालकों का गीत 


गा सोसचन्न की कहानी, बेल ओर अजगर, मकाबी पहली और दूसरी सुविधा के 
.. लिये हम इसे तोबित-मकाबी समूह कहेंगे । 
.... इन दोनों समूहों के अतिरिक्त इब्नानी अथवा यहूदी धारमिक साहित्य में. 


2 कु कुछ और अधिक लेख हैं। इनके उद्गम स्थान की दृष्टि से साहित्य की विधा 
... के आधार पर ये लेख दो समूहों अथवा तीन समूहों में विभाजित होते हैं । 
... उद्गम स्थान की दृष्टि से उनके पलीश्तीनी अथवा हलीनी अर्थात्‌ यूनानी 
... उद्गम इन दो भागों में विभाजित किए जाते हैं। साहित्य की विधा के आधार 
.. पर वे हलाकी, हग्गादी अथवा अपोकलिप्टिक में विभाजित किए जाते हैं। 
.. हलाकी (इ नी शब्द हलाक से है, जिसका अर्थ है अपना आचरण) का अर्थ 
... गह है कि उन लेखों में यहदी विश्वास के निहित आचार पक्ष अथवा नैतिक 
.. भावनाओं के प्रतिपादन का प्रयास किया गया है। हस्गादी (इब्रानी शब्द हगद 
... से, जिसका अर्थ है विवरण देना) का अर्थ है कि उन लेखों में अतीत की 
.. धामिक कथानकों को सुन्दर कथात्मक रंगों से रंजित करने का प्रयास किया. 
.. गया है। हलाकी और हम्यादी व्यख्या की प्रणालियाँ थीं जिनका विकास 









शास्त्र यों और रब्बियों ने किया था | अपोक गकलि लिप्टिक (यूनानी शब्द अपोकलिप्टिो 


विस्तृत साहित्यिक संदर्भ में धर्मशास्त्र पर दृष्टि ७ 


से, जिसका अर्थ है उदघाटन करना या प्रकाशन करता) का अर्थ है कि उन 
. लेखों में रहस्यवादी दर्शनों एवं प्रतीकों द्वारा भविष्य के रहस्यों का उद्घाटन 
का संकेत किया जाता है। इन लेखों के विभाजन के एक ओर आधार पर_ 
. इनको प्रकाशनात्मक, इतिहासात्मक एवं शिक्षात्मक भागों में बाँटा जाता है । 


इतिहासात्मक तथा शिक्षात्मक समूह के अंतर्गत हलाकी और हग्गादी लेखआ 


सकते हैं । 


प्लीश्तीन उद्गत लेखों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं ; हनोक अथवा 
इथियोपी हनोक (प्रका०), जुबिली (हला०), बारह कुलपतियों की वाचाएं 
(हग्ग०), सुलेमान के भजन (हग्ग०), सादोकी प्रलेख (हल० एवं हग्ग०), 
मूसा का स्वर्गोत्कर्ष (प्रका०), यशायाह का स्वर्गारोहण (हल० ), ४ एस्ट्रस 
(प्रका०), बारूक का सूरियाती अपोकलिस्स (प्रका०) । सुविधा के लिये हम 
इस समूह को हतोक समृह के लेख कहेंगे । 


..._ यूनानी उदगत लेखों में निम्नाँकित सम्मिलित हैं : यहुदी सिबिल (प्रका० ) 
३ मकाबी (हल०), ३एस्द्रस (हल०), मनस्से की प्रार्थनाएँ (हग्ग० ) 
_ ४मकाबी (हम्ग०), सस्‍लाविक हनोक (जिसे हनोक के रहस्य भी कहते हैं) 
.. (प्रका०), तथा कई खंड हैं जिनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं->यिमेयाह का 
इतिहास (हल० ), अय्यूब की वाचा (हल०), सुलेमान की वाचा (हल०), 
इलीशा एवं सपन्‍्याह का प्रकाशन (प्रका०), यहेजकेल की ज्ञानवर्धक पुस्तकें 
(प्रका०) आदम एवं हव्वा की जीवनी (जिसे मूसा का प्रकाशन भी कहते 


. हैं) (हल० ), आदम की वाचा (हल०), अब्राहाम का प्रकाशन (प्रका०), 
द इल० ॥, ः 


. अब्राह्मम की वाचा (प्रका०), और असेनथ की पुस्तक (हग्ग०) सुविधा के . 
.. लिये हम इनको सिबिल समूह के लेख कहेंगे । कप 


द उपरोक्त समूहों को ध्यान में रखते हुए हम पुराने नियम के प्रामाणिक क्‍ गा "५ 
 धर्मशास्त्र की अधिक ठीक रीति से परिभाषा कर सकते हैं । 


-. यहुदियों के लिये उत्पत्ति-मलाकी समूह ही प्रामाणिक धर्मशास्त्र था । अन्तर 

. केवल इतना ही है कि जो क्रम खिस्ती रखते हैं उससे उनका क्रम भिन्न है। 
.. आगे कहीं यहूदी क्रम दिया गया है। यह स्मरण रखना चाहिये कि यद्यपि... 
. इस समूह को वे प्रामाणिक धर्मेशास्त्र मानते हैं परन्तु उसे कभी पुराना 
... नियम नहीं कहते । पुराना नियम संज्ञा खिस्तियों द्वारा दी गई है। वे अपने... 


ला _धर्मशास्त्र को व्यवस्था, नबी और लेख की पुस्तक कहते हैं (सेपेर तोरा 5 


रा हे हे . नवयीम उ-कतुबीम ) हा द | ः रा मा पा 








८... पुराना नियम की भूमिका 


रोमन केथोलिक कलीसिया उस समूह को अपना धर्मंशास्त्र कहती है जो 

३७४ ई०स० में कार्थेज की परिषद में स्वीकृत हुआ था। १५४६ में सक्रो- 
सांक्ता नामक अधिकृत घोषणा से त्रेंतीनों की परिषद में कार्थेज की परिषद 
के निर्णय की पुनः पुष्टि की गई। इस घोषणा के अनुसार प्रामाणिक 
. धर्मशास्त्र में उत्पत्तिमलाकी समृह तथा तोबित-मकाबी समृह सम्मिलित 
हैं। यें दोनों समूह अलग इकाइयों के रूप में नहीं हैं परन्तु संकलन में 

_ मिले जुले हैं। अन्य सब पुस्तकें, अर्थात्‌ हतोक समूह एवं सिविल समूह की 
पुस्तकें अप्रामाणिक अथवा अपक्रिफा के नाम से अभिहित की गई हैं । यहृदियों 

के प्रभाव के कारण उत्पत्तिगमलाकी समृह को सार्वजनिक स्वीकृति तोबित- 

. मकाबी समूह के पूर्व हो चुकी थी अतएवं उत्पत्तिमलाकी समूह प्रथम- 
. प्रामाणिक तथा तोबित-मकाबी द्वितीय-प्रामाणिक धर्मशास्त्र कहे जाते हैं। 
. इस प्रकार रोमन केथोलिक कलीसिया का प्रामाणिक धर्मंशास्त्र प्राचीन 
..... कलीसिया के अधिक धर्म लेखोंवाले यूनानी अर्थात हेलेनी प्रचलन के 


...... अधिकांश प्राच्य कलीसियाएं इसी विस्तृत यूनानी पुराने नियम को 
.... स्वीकार करती हैं। केवल कुछ बातों में थोड़ा बहुत वे भिन्न हं। सूरियानी 
....._ भाषी कलीसियाएं अपने ही क्षेत्र में थोड़ी बहुत भिन्नताएं प्रदर्शित करती हैं । 
.... मोपसुएस्तिया का थियोदोर, यद्यपि वह युतानी विद्वाव था, तथापि नेस्तोरी 
..... संप्रदाय द्वारा शास्त्राधिकारी माना जाता था। उसने समस्त पुस्तकों को 
..... पूर्ण प्रामाणिक, आंशिक प्रामाणिक और अप्रामाणिक, इन वर्गों में पृथक किया । 
...... यह वर्गीकरण लगभग वही है जो ऊपर प्रथम-प्रामाणिक, द्वितीय-प्रामाणिक 
... तथा अ-प्रामाणिक धर्मशास्त्र का वर्गीकरण है। फिर भी मोपसुएस्तिया 
.... के थियोदोर ने तोबित-मकाबी समूह के साथ अय्यूब, एस्तेर, श्रेष्ठगीत 
अल ये .. इतिहास, एजा और नहेम्याह को भी आंशिक प्रामाणिक ग्रन्थों में सम्मिलित 
......... ढकिया। जेकोबाइट वाइबलों में एक पुस्तक है जिसका नाम “स्त्रियों की पुस्तक 
. है | उसमें एस्तेर, यूदित, रूत एवं सुसन्ना सम्मिलित हैं । बार हेब्नाइकस नोमों 
.... कानोन ('ए०शा०८क॥०॥) में पूराने नियम में उत्पत्तिमलाकी समूह, और 
....  तोबित को छोड़कर अधिकांश तोबित-मकाबी समृह सम्मिलित है।बार 
.... सीरख उसमें सम्मिलित नहीं है, परन्तु तरुणों की शिक्षा के लिये 
४:00. प्ररोचित: है. मे हे सा सा 

















् तर बहुत ही कम है । अबीसीनिया का _ 





आरमीनिया का धर्मशास्त लगभग यूनानी श्वमंशास्त्र के अनुरूप है।.. || और 
 धर्मशास्त्र अभी तक अधिकृत रूप ः ० 





विस्तत साहित्यिक संदके में धर्मशास्त्र पर दृष्टि... ह€ः 


से निर्धारित नहीं किया गया है। प्रचलित रूप से उसमें उत्पत्तिमलाकी और 
तोबित-मकाबी समूहों के अतिरिक्त कुछ अन्य लेख भी सम्मलित हैं : असेनथ, 
उज्जियाह, हनोक, २ एस्ट्रस (४) । कोप्तिक ध्मशास्त्र में निम्नलिखित 
सम्मिलित हैं : यूनानी धर्मशासत्र और ३ मकाबी । युनानी ऑरथोदोक्स और 
रूसी ऑरथोदोक्स धर्मशास्त्र, हेलेनी अथवा यूनानी धर्मेशास्त्र के समान हैं 
अर्थात उनमें उत्पत्तिमलाकी और तोबित-मकाबवी समूह हैं। द 


 आग्ल कलीसियाएं उत्पत्ति-मलाकी समृह को पक्‍की रीति से प्रामाणिक 


.. धर्मशास्त्र मानती हैं परन्तु वे तोबित-मकाबी को ज्ञानवर्धक मानती हैं। लूथरव 


. कलीसियाओं की मान्यता भी ऐसी ही है । 


पाश्चात्य प्रोतेस्तंत कलीसियाओं पर काल्विन की परंपरा का प्रभाव पड़ा 
है। अतः वे केवल उत्पत्ति-मलाकी समृह को ही प्रामाणिक धम्मशास्त्र 
मानती हैं। इस विस्तृत वर्ग में प्रेस्बितीर्यंन, रिफॉर्मेड मेथोदिस्त काँग्रि- 
ग्रेशनलिस्त, बपतिस्त एवं अन्य बहत से प्रोतेस्तंत समाज सम्मिलित हैं। ये 
कलीसियाएं बाइबल के प्रकाशन में सर्वाधिक सशक्त रही हैं, अतएव 
सामान्यतया जो बाइबल जनता को उपलब्ध है, उसमें उत्पत्तिममलाकी समूह 


का धर्मंशास्त्र ही सम्मिलित है। तोभी धर्मशास्त्र के प्रयोग करने में सभी 


. कलीसियाएं एकसी नियमबद्ध नहीं हैं। उदाहरणार्थ, अमरीकी मेथोदिस्त 


. कलीसिया यद्यपि उत्पत्ति-मलाकी समूह को ही पुराने नियम के रूप में स्वीकार 
करती हैं, तथापि अपने अधिकृत उत्तरदायी पाठों में तोबित-मकाबी समूह के 
अंशों का भी प्रयोग करती हैं । ह का 


प्रामाणिक धर्मशास्त्रेतर पुस्तकों के निर्देशन के लिये अपक्रिफ़ा शब्द का प्रयोग... 


किया जाता है। च्‌ कि भिन्न-भिन्न खिज््तीय संगठनों द्वारा पुराना-नियम धर्म- 


शास्त्र की परिभाषा भिन्‍त भिन्‍न रूप में की गई है, इसलिए अपक्रिफा शब्द का 
. अर्थ भी संदर्भ पर अवलंबित है और इस प्रकार अपने में द्विअर्थी है। रोमन 
_ कंथोलिक कली सिया के लिये अपक्रिफा का अर्थ है--हनोक और सिविल समूहों... 
के लेख । प्राच्य कलीसियाओं के लिये भी उस शब्द का यही अर्थ होगा। 
प्रोतेस्तंत के लिये, जिनमें आंग्ल एवं लूथरन कलीसियाएं भी सम्मिलित हैं 
. अपक्रिफा का अर्थ है-तोबित-मकावी समूह और साथ ही १ एवं २ एस्ट्रस ।$ 
(जिन्हें २ और ३ एस्द्रस भी कहा जाता है) और मनस्से की प्रार्थनाएं। . 
. इस कारण हनोक और सिविल समूहों को एक दूसरा ही ताम दिया है। हे. 


हा सूडे-एपिग्रफा (75०एव॑टंड्ा/ब०78 ) अर्थात अप्रामाणिक लेख कहा 











८... पुराना नियम की भूमिका 


रोमन केथो लिक कलीसिया उस समूह को अपना धर्मशास्त्र कहती है जो 
. ३७४ ई०स०» में कार्थेज की परिषद में स्वीकृत हुआ था। १५४६ में सक्रो- 
. सांक्ता नामक अधिकृत घोषणा से त्रेंतीनों की परिषद में कार्थज की परिषद 
के निर्णय की पुन: पुष्टि की गई। इस घोषणा के अनुसार प्रामाणिक 
धर्मशास्त्र में उत्पत्तिमलाकी समूह तथा तोबित-मकाबी समूह सम्मिलित 
हैं। यें दोनों समूह अलग इकाइयों के रूप में नहीं हैं परन्तु संकलन में 
मिले जुले हैं। अन्य सब पुस्तकें, अर्थात्‌ हनोंक समूह एवं सिविल समूह की 
पुस्तकें अप्रामाणिक अथवा अपक्रिफा के नाम से अभिहित की गई हैं । यहूदियों 
के प्रभाव के कारण उत्पत्ति-मलाकी समृह की सार्वजनिक स्वीकृति तोबित- 


.. मकाबी समूह के पूर्व हो चुकी थी अतएव उत्पत्ति-मलाकी समूह प्रथम- 


प्रामाणिक तथा तोबित-मकाबी द्वितोय-प्रामाणिक धर्मंशास्त्र कहे जाते हैं । 
इस प्रकार रोमन केथोलिक कलीसिया का प्रामाणिक धर्मंशास्त्र प्राचीन 
.. कलीसिया के अधिक धर्म लेखोंवाले यूतानी अर्थात हेलेनी प्रचलन के 
.. अनुरूप है। 


अधिकांश प्राच्य कलीसियाएं इसी विस्तृत यूतानी पुराने नियम को 


..॑. स्वीकार करती हैं। केवल कुछ बातों में थोड़ा बहुत वे भिन्न हैं। सूरियानी 
... भाषी कलीसियाएं अपने ही क्षेत्र में थोड़ी बहुत भिन्नताएं :प्रदशित करती हैं । 





. मोपसुएस्तिया का थियोदोर, यद्यपि वह यूनानी विद्वान था, तथापि नेस्तोरी 
संप्रदाय द्वारा शास्त्राधिकारी माना जाता था। उसने समस्त प्स्तकों को 


... पूर्ण प्रामाणिक, आंशिक प्रामाणिक और अप्रामाणिक, इन वर्गों में पृथक किया । 

.. यह वर्गीकरण लगभग वही है जो ऊपर प्रथम-प्रामाणिक, द्वितीय-प्रामाणिक 

..... तथा अ-प्रामाणिक थर्मशास्त्र का वर्गकरण है। फिर भी मोपसुएस्तिया 
... के थियोदोर ने तोबित-मकाबी समूह के साथ अय्यूब, एस्तेर, श्रेष्ठगीत, 
.... इतिहास, एजा और नहेम्याह को भी आंशिक प्रामाणिक ग्रन्थों में सम्मिलित 
ता _किया। जेकोबाइट वाइबलों में एक पुस्तक है जिसका नाम स्त्रियों की पुस्तक 


. है। उसमें एस्तेर, यूदित, रूत एवं सुसन्ना सम्मिलित हैं । बार हेब्राइकस नोमो 
. कानोन (?२०४7०८७४०॥ ) में पुराने नियम में उत्पत्ति-मलाकी समूह, और 


...._ तोबित को छोड़कर अधिकांश तोबित-मकाबी समूह सम्मिलित है। बार 
....  सीरख उसमें सम्मिलित नहीं है, परन्तु तरुणों की शिक्षा के लिये 


: प्ररोचित है । 










आरमीनिया का धर्मंशास्त्र लगभग यूनानी धर्मशास्त्र के अनुरूप है। 


हा  अ अन्तर बहुत ही कम है । अबीसीनिया का धर्मशास्त्र अभी तक अधिकृत रूप... 








विस्तृत साहित्यिक संदर्भ में धर्मशास्त्र पर दृष्टि तह 


से निर्धारित नहीं किया गया है । प्रचलित रूप से उसमें उत्पत्तिमलाकी और 
तोबित-मकाबी समूहों के अतिरिक्त कुछ अन्य लेख भी सम्मलित हैं : असेनथ 
उज्जियाह, हनोक, २ एस्ट्रस (४) । कोप्तिक धर्मशास्त्र में निम्नलिखित 
म्मिलित हैं : युनानी धर्मशासत्र और ३ मकाबी । यूनानी ऑरथोदोक्स और 
रूसी ऑरथोदोक्स धर्मशास्त्र, हेलेनी अथवा यूनानी धर्मशास्त्र के समान हैं. 
्थात्‌ उनमें उत्पत्तिमलाकी और तोबित-मकावी समृह हैं । 


आंग्ल कलीसियाएं उत्पत्ति-मलाकी समूह को पक्‍की रीति से प्रामाणिक 
धर्मशास्त्र मानती हैं परन्तु वे तोबित-मकाबी को ज्ञानवर्धक मानती हैं। लूथरवः 


कलीसियाओं की मान्यता भी ऐसी ही है । 


पाश्चात्य प्रोतेस्तंत कलीसियाओं पर काल्विन की परंपरा का प्रभाव पड़ा 
है। अतः वे केवल उत्पत्ति-मलाकी समूह को ही प्रामाणिक धर्मंशास्त्र 
मानती हैं। इस विस्तृत वर्ग में प्रेस्बितीय॑ंन, रिफॉर्मंड मेथोदिस्त काँग्रि- 
ग्रेशनलिस्त, वपतिस्त एवं अन्य बहुत से प्रोतेस्तंत समाज सम्मिलित हैं । 
कलीसियाएं बाइबल के प्रकाशन में सर्वाधिक सशक्त रही हैं, अतएब 
सामान्यतया जो बाइवल जनता को उपलब्ध है, उसमें उत्पत्तिमलाकी समूह 
का धर्मशास्त्र ही सम्मिलित है। तोभी धर्मशास्त्र के प्रयोग करने में सभी 
कलीसियाएं एकसी नियमबद्ध नहीं हैं। उदाहरणार्थ, अमरीकी मेथोदिस्त 
कली सिया यद्यपि उत्पत्ति-मलाकी समृह को ही पुराने तियम के रूप में स्वीकार 
करती हैं, तथापि अपने अधिक्ृत उत्तरदायी पाठों में तोबित-मकाबी समूह के 
अंशों का भी प्रयोग करती हैं । हे 

प्रामाणिक धर्मशास्त्रेतर पुस्तकों के निर्देशन के लिये अपक्रिफ़ा शब्द का प्रयोग... 
किया जाता है। च कि भिन्न-भिन्न खिस्तीय संगठनों द्वारा पुराना-नियम धर्म- 
शास्त्र की परिभाषा भिन्‍न भिन्‍न रूप में की गई है, इसलिए अपक्रिफा शब्द का क्‍ 


अर्थ भी संदर्भ पर अवलंबित है और इस प्रकार अपने में द्विअर्थी है। रोमन 


कैथोलिक कली सिया के लिये अपक्रिफा का अर्थ है--हनोक और सिविल समूहों 
के लेख । प्राच्य कलीसियाओं के लिये भी उस शब्द का यही अर्थ होगा 
प्रोतेस्तंत के लिये, जिनमें आंग्ल एवं लूुथरन कलीसियाएं भी सम्मिलित हैं 


अपक्रिफा का अर्थ है-तोबित-मकावी समह और साथ ही १ एवं २ एस्ट्रस 


(जिन्हें २ और ३ एस्ट्रस भी कहा जाता है) और मनस्से की प्रार्थनाएं ।. 
इस कारण हनोक और सिविल समूहों को एक दूसरा ही ताम दिया है। 


.. उन्हें सुूडे-एपिग्रफा (8८एरव॑शुअंशा४)9 ) अर्थात अप्रामाणिक लेख कहा 
- जाता है। 











व्‌. ....... पुराना नियम की भूमिका 


.... पुराने नियम के अध्ययन के संबंध में कभी कभी कुछ अन्य लेखों की ओर 
. भी संकेत किया जाता है । इनका यहाँ उल्लेख केवल एक उद्देश्य से किया जा 
.. रहा है कि पूराने नियम के व्यापक साहित्यिक क्षेत्र का संपूर्ण चित्र हमारे समक्ष 
उपस्थित हो जाए । ई० पू्व प्रथम सदी के अंत में जब इब्रानी भाषा बोलचाल 


... की भाषा न रही, तब आराधनाघरों में इब्नानी धर्मशास्त्र के पढ़े जाने के साथ 
. उस युग की बोलचाल की भाषा में भी शब्दानुवाद अथवा भावानुवाद किया 


5 में कैट 





जाता था। यह भाषा अरामी भाषा थी । इन शब्द अथवा भावानुवादों से एक 

नवीन साहित्य का निर्माण हुआ जिसे तरगुम कहते हैं (तुलना कीजिए उदू 
. भाषा का शब्द तरजुमा जो उसी मूल से है) । इब्रानी मूलपाठ के अनुवाद के 
. रूप में इत तरगुम से इस बात पर प्रकाश पड़ता है कि ई० पू० पहली और 
दूसरी सदी के लोग इब्नानी मूल पाठ से क्‍या समझते थे। सर्वाधिक प्रचलित 
तरगम निम्नलिखित हैं द द 
(१) आंकेलास (अर्थात, अक्विला) का तरगुम | इसे बाबुल का तरगुम 
भी कहा जाता है क्योंकि यह विशेषकर बाबुल के यहूदियों द्वारा काम में लिया 
जाता था । आंकेलास द्वितीय शताब्दी ई० स० में हुआ। यद्यपि यह बाबूल 


ः 


का तरगुम कहलाता है, तथापि पंचग्रंथ पर यह तरगुम पलीश्तीन की बोली 


. (२) पंचग्रंथ पर योतातान का तरगुम । इसे पंचग्रंथ पर पलिश्तीन का 


.. का तरगम भी कहते हैं । 





.... (३) नबियों पर बाबुल का तरगुम । उज्जिएल के पुत्र योनातान को 
. इसका लेखक माना जाता है । यद्यपि यह बाबुल का कहलाता है, तथापि इसका 


5. उद्गम स्थान पलिश्तीन है।.. 
.... (४) नबियों पर पलिश्तीन का तरगुम । 


.. इस प्रकार ये तरगुम पलिश्तीन और बाबुल से संबंधित हैं जो रब्बियों के 


..... दो प्रधान ज्ञान-केन्द्र थे, और उनका संकलन इब्नानी धर्मशास्त्र की इकाइयों, 
....... अर्थात्‌ व्यवस्था (पंचग्रंथ), नबी और लेखों, के संदर्भ में किया गया है| लेखों 
.... पर तरगुम का उल्लेख नहीं किया गया है क्‍योंकि पुराने नियमों के अध्ययन के... 
...... लिये उतका महत्व नगष्य है। व्यवस्था और नबियों पर जो अनुवाद उपलब्ध हैं... 
..... उनसे कहीं अधिक स्वतंत्रता लेखों के तरगुमों में ली गई है। द 








ई० सं» प्रथम शताब्दी के फरीसियों ने लिखित व्यवस्था अथवा पंचग्रंथ 


.... के अतिरिक्त धामिक शिक्षा की एक परंपरा को भी प्रश्नय दे रखा था। .... 
जसे 'था। यह प्राचीनों की परंपरा थी जिका 





से “मौखिक व्यवस्था” कहा जात 











पुराता नियम का क्रम पक का 28.2 अप 


सुसमाचार में भी उल्लेख है (मरकुस ७:३) । ये मौखिक परंपराएं भी 

लेखनी पर उतारी गई और ई० स० २०० के लगभग इस साहित्य के एक 
विशाल संकलन का निर्माण हुआ, जिसे मिशना (इब्नानी 'पुनरावृत्ति' अर्थात्‌ 
पुनरावृत्ति द्वारा मौखिक शिक्षा) कहते हैं। इसके बाद विद्वानों ने इस मिशना 
के हासिये पर टिप्पणियाँ एवं स्पष्टीकरण किये हैं । मूल पाठ के आसपास काफी 
हाशिया छटा हुआ है जिसमें ये टिप्पणियाँ लिखी गई हैं । सीधी पंक्तियों 
में लिखे हुये मूल पाठ तिरछी लिखी हुई पंक्तियों के चौखटे में जड़े हुए से 

प्रतीत होते हैं। ये टिप्पणियाँ प्रचुर मात्रा में हैं। सीधी पंक्तियों में लिखे _ 
हुए मूल पाठ को मिशना कहते हैं और इन टिप्पणियों को गेमारा (यह शब्द 
आरामी भाषा का है जिसका अर्थ 'पूर्ण करना' अथवा टीका' है) | मिशना और 
गेमारा दोनों मिलकर तालमुद कहलाते हैं। तालमुद आरामी भाषा का शब्द 
है जिसका अर्थ शिक्षा अथवा सिद्धान्तत है। तालमुद का भी एक पलिश्तीनी 
और एक बाबुली संपादन किया गया है। 


चोथा अध्याथ 
पुराता नियम का क्रम 


पुराना-नियम धर्मशास्त्र की विषय-सूची के उपरोक्त विवरण के आधार 

पर यह स्पष्ट है कि उसके अंतर्गत पुस्तकों या लेखों का क्रम एक-रूप नहीं हो 

सकता | चार प्रकार के क्रम महत्वपूर्ण माने जाते हैं और उन पर यहाँ विचार 

किया जाएगा । ये इब्नानी धर्मशास्त्र, सेपत्वांगिता, बल्गाता और अँग्रेजी 

(प्रोतेस्तंत) बाइबल के क्रम हैं। उन सब बाइबलों के लिये, जिनका संसार 

की विभिन्न भाषाओं में बाइबल सोसायटी के तत्वाधान में अनुवाद किया गया... 
है, अँग्रेजी अनवाद का क्रम स्वीकृत है। इसमें भारत की बाइबल सोसायटी के 


१ 


प्रकाशन भी सम्मिलित हैं । 
१, इनब्नानी धर्मशास्त्र 


यहूदी धमंशास्त्र के कानोन का इब्रानी नाम उसके प्रमुख विभागों का 

साररूप है। वह तोरा नबीयम उ-कतुबीम (व्यवस्था, वजी और लेख) कहलाता 

है। इन तीनों विभागों के यूनानी नाम भी साधारणतया प्रचलित हैं : पेंटाट्यूक, 
: प्रोफेद्स, एवं हेगिओ ग्रफा ('पवित्न लेख') । इन विभागों के अंतर्गत पुस्तकों के . 
विषय एवं क्रम निम्नानुसार हैं । जिस रूप में पुस्तकें आराधनाघर के कुण्डल- 


.. पत्र (०००5) को निर्दिष्ठ की गई हैं उनका भी संकेत यहाँ किया गया है।... 











पर 


हे तोरा (व्यवस्था) _ 
बरेशीत (उत्पत्ति ) 


















हा । हि सफन्‍्याह हा ४ - ( 
0 हारग 8 








पुराना नियम की भूमिका 


बएल्‍ले शमोत या शमोत (निर्गमन) 


_बयिक्रा; (लैव्यव्यवस्था ) 
. वमिदबार (गिनती) 
... दवारीम (व्यवस्था विवरण) 


तबीईम (प्रोफेट्स) नबी 


. नवीईम रिशोनीम (पूर्व नबी ) 


यहोशू. (यहोशू) 
शोपटीम ; (न्यायियों ) 
शमृूएल (१ शमृएल) 

५ (२ शमृएल ) 


(१ राजा) 
(२ राजा 


मलाकीम 


..._ नबवीईम अहरोनीम (उत्तरकालीन नबी) _ 
.. यशायाह द 
:. - यिर्मयाह 
..  यहेजकेल 
होगे. 
८7 > 7 मोएल 
अमल 0, 
.. ओबचद्याह . 
 व्योना: 
कि 
हि ० वह । हा 
.. हब्बकूक (हबककूक) 
( 


यशायाह ) रा 
(यिमंयाह).... 
(यहेजकेल ) 
(होशे) _ 
(योएल ) 
_(आमोस ) 
ओवबचद्याह ) 


पे . सलाकी ( सलाक हक 





जज 
हे 


१ 
न 
333यकपम 
रा 


पांच कुण्डल-पत्र 


७ #छ # जी 0 


हा 


आठ कण्डल-पतल्र 


चार कुण्डल-पत्र 


है छपे इब्रानी धर्मशास्त्र 

$ में ये.दो पुस्तकें हैं, परंत 
आराधनाश्वर कृण्डल- 
पत्र में एक ही है 

९ १ छपे इब्नानी धर्मशास्त्र में 

६ ॥ ये दो पुस्तकें हैं, परंतु 
आराधनाधर कुण्डल 
पत्न में एक ही है । 


चार कुण्डल पत्र 
१० 
हे 


दर 
ह 
०] 
द्‌ 


- १२ 


आराधनाघर कुण्डल- 
पत्र में एक कृण्डलपत 
है और सामूहिक रूप. 
में बारह की पस्तक 
कहलाती 











पुराना नियम का क्रम क्‍ : ०: बंइ 


कतुबीम (लेख... ग्यारह कुण्डल-पत्न 

तहिल्‍्लीम (भजन) पर १४ द 

मिशले शलोमो (नीतिवचन ) १५ 

इययोब. (अय्यब ) १६ 

शीर हशीरीम (श्रेष्ठ गीत ) . १७ ये पाँच मेगिलोथ अथवा 
खत (रूत ) १८ | छोटे कुण्डलपत् हैं जो. 
एका (विलापगीत ) १९ +पाँच प्रमुख पर्वों पर 
कोहलत (सभोपदेशक ) .. २० | पढ़े जाते थे । 

एस्तेर (एस्तेर) 

दानिय्येल (दानिय्येल) २२ 

एज्ा (एज) .. २३ ? छपे इब्नानी धर्मशास्त्र 
नहेम्याह (नहेम्याह) २३ । में दो पुस्तकें हैं, परंतु 


आराधनाघर कुष्डलपत्न 
में एक पुस्तक है 
दिल्ने हैयोमीम (१ इतिहास ) र्डं | 
/ ->» “(र इतिहास) र४ 


नए 


इस तालिका से दृष्टिगोचर होता है कि इब्रानी धर्मशास्त्र चोबीस कुण्डल- 
पत्नों में है--पाँच व्यवस्था के, आठ नबियों के और ग्यारह लेखों के । २ एस्ट्रस 
(४) १४ : ४४-४५ में इस चोबीस की संख्या का उल्लेख किया गया है जहाँ 
एज्ा को धर्मशास्त्र की पुस्तकों को लेखबद्ध करने का आदेश दिया गया है । 
कहा जाता है कि ६४ पुस्तकें लिखी गई, जिनमें से ७० तो विद्वानों के लिये 
थीं और चौबीस खले रूप से प्रकाशित होनी चाहिये थीं। योसेपस 


केवल बाईस पुस्तकों का उल्लेख करता है । यह संख्या इब्नानी वर्णमाला की 


है । रूत और न्यायियों तथा विलापगीत और यिर्मयाह को मिला देने से बाईस 
संख्या आ जाती हु 


२. सप्तति-अनुवाद (सेपत्वांगिता, संकेत चिह्न 7» ) 


पुराने नियम का प्रारंभिक यूनानी अनुवाद सेपत्वांगिता कहलाता है। 


. उसका पूरा शीषंक है 'सत्तर प्राचीनों की व्याख्या'। यह शब्द 'सेपत्वांगिता' 
: सत्तर के लिये लतीनी शब्द है। प्रारम्भ में सेपत्वांगिता से पंचग्रंथ के अनुवाद 
का ही संकेत होता था परंतु अब समग्र पुराना-नियम के लिए होता है | परंपरा 


कि पंचग्रंथ का यूनानी में अनुवाद ७२ प्राचीनों ने किया था । इस्राएएल के... 


.. प्रत्येक कुल से छः इनमें थे। सेपत्वांगिता की पुस्तकें निम्नानुसार < 








दिए 






























१४ 


गनेसिस (उत्पत्ति ) 
. एक्सुदूस. (निर्गन) 
.._ ल्यइतिकुन (लैव्य-व्यवस्था ) 
.. अरिथमु्‌इ. (गिनती ) 
ः इयुतुरुनुम्युन 
सु: 
रू... 
१ बसिलेयोन अर्थात्‌ राजा 
. २ बसिलेयोन. ,.. 
हल |... १; 
है गैर हक 
.. १ परलेपोमनन 
रद कह 
000 0 ० एड्स 
2 ० एस्तेर 
...... इकऊदिथ, युदित 
557 “तोबित- 
5 पं मर्कवी 
7 5 ओंदुई 
० 5 पेरुयमंय 
....... इक्कलेसिअस्तेस 
०7००5: इओंब॑ 





.....  प्सल्मुइ सलोमुनुस 


5 आह (तोबित ) 
... . (१ मकाबी ) 
 [र ऋ) 
(३ ४ ) 
जुडे आफ. 
07 चिजन) 2. 
पे । ( गौरव गीति ) 
“7 «५ " नीतिवंचत) - 
.. (सभोपदेशक) 
ला ला हे जा  अ्य 5 हर 
205 सुफीओ सलोगूनुस ०. भा .. (सुलमान की ज़ज्ञा) 
....... सूफीआ सिरक, आमुख सहित | कक 





पुराना नियम की भूमिका 


(व्यवस्था विवरण ) 


के 
(यहोशू ) 
( 
( 


न्‍्यायी ) 
रूत, 

(१ शमूएल) 
(२ शमूएल ) 
(१ राजा ) 
(२ राजा ) 
(१ इतिहास) 
(२ इतिहास ) 
(एज ) 

( ड ) 
( 

( 


_(एस्तेर) 


यूदित ) 


सिरक की प्रज्ञा) 























पुराना नियम का क्र... १४ 


मिकेअस . (मीकी) || 
इखोउल द द (योएल ) 

अबद्यू (ओबचद्याह ) 
इओचन्‍्तुस द (योना 

नऊम द . (नहूम ) 

अम्बकुम ः (हब्बकक ) 
सफनीअस क्‍ (सपन्याह 
जकरीअस (जकयहि ) 
मलकीआस द (मलाकी ) 

एसईआस (यशायाह 
इअरमीयास (यिमेयाह ) 

बारूक (बारूक 

भ्रंतुय (विलापगीत ) 
अपिस्तुले इअरमीआस (यिर्मयाह की पत्नी) 
इअजकीएल (यहेजकेल ) 

सूसन्ना (सूसन्ना ) 

दानिएल (जिसमें तीन पवित्र 

युवकों का गीत है दानिय्येल ) 

बेल के द्रकुन (बेल और अजगर ) 


सेपत्वांगिता का सामान्य क्रम चार समूहों में विभाजित होता है : विधाना- 
त्मक (व्यवस्था की पांच पुस्तकें जो प्रंचग्रंथ कहलाती हैं), इतिहासात्मक 
(यहोशू्‌ से ४ मकाबी तक), काव्यात्मक तथा प्राज्ञिक (नीति) (भजन से सुलेमान 
के भजन तक), और नबूवतात्मक (होशे से अंत तक ) । 


३. चुल्गाता (शशाष्र॥०) या लातीनी प्रचलित अनुवाद 

ई० स० चौथी शताब्दी के अंत में पोप दमास्कुस के अधिकार से येरोम 
ने बाइबल का एक मानक लतीनी अनुवाद प्रस्तुत किया। अनुवाद का कार्य 
संपन्न करने के लिये वह बेतलहम गया । वहाँ यीशु के जन्म स्थान के निकट 
वह एक गुफा में रहा । उसने पुराता-नियम का अनुवाद सीधे इंब्रानी से किया 
परन्तु उसने यूनानी अनुवाद का भी उपयोग किया। येरोम का अनुवाद वलगत 
एदितिओ' (५पा8०८ ४०0०). (साधारण संस्करण) अथवा वुल्गाता 
_कहलाया । यूरोप में कोई १००० वर्ष तक यह अकेली ही एकछत्न प्रामाणिक 
बाइबल रही | वुल्गाता में निम्नलिखित पुस्तकें हैं 




































न्‍ 0 पुराना नियम की भूमिका 


(जट्छ्ट्झड 
प्रडठतंचड 
[6णंपंटप 
शाप 
[)टप्राटः0ठा0्रशाप्रात 
- वृठ्पट 
ुप्वा८25 
रिफा] 
 रिट॒छपा/ 
ह श्र जैर 


रिए3॥[007९707 

एि708]907९007 
000 0 
8079८ 

0798 


हैक] 


ज-याकफ 


... ऋल' 
- 6 


5 कमर ह सिक्का. 


- जठफ्रलातव.. 


पा 20 िएटादडंकडाटड3 2, 
(2870 0फ (एकशएंटठप्रय 


पा ज209०7098 


5. -अठ्टांटडंडगाटाह5 


जा 
... जुलट98 


मा जजभ्ायदाद्र076 वंचाला ह ह 


(उत्पत्ति ) 
(निर्गमेमन ) 
(लव्यव्यवस्था ) 
(गिनती ) 
(व्यवस्था विवरण ) 
( 

( 

( 


- (यहोश ) 


यियों) 

) 
(१ शमूएल ) 
(२ शमृएल ) 
(१ राजा ) 
(२ राजा) 
(१ इतिहास ) 
(२ इतिहास) 
(एज ) 
(नहेम्याह) 
(तोबित ) 
( 


_ [श्रेष्ठगीत ) 


सुलमान के प्रज्ञागंथ) 


आओ, 
. (सीरख) 
-/ यशायाह) * 
हि 
( 


मिमंयाह ) 


.. [(विलापगीत ) 


१. प्रथम और हितीय एस्ट्रे (एस्द्रस) और अंग्रेजी अपक्रिफा की इसी. 


7 .. . नाम की पुस्तकों में अन्तर 





मित्र -है। पा 


| : दोनों की. विषय सामग्री " हि 








... पुराना नियम का क्र 7 7 पूछ 
ड्राफ्ट बारूक 
अज्टट्टाहू. द यहेजकेल ) 
॥2477९! जिसमें तीन पवित्र बालकों का 
द गीत, सुसन्ना तथा बेल एवं अजगर 
सम्मिलित हैं द 
(25४८८ (होशे 
०्ठा ( योएल ) 
205 (आमोस 
433085 (ओवबचद्याह ) 
[0795 * (योना 
४॥07288 (सीका 
िन्कोग पा (नहम ) 
॥602800ए८ ([ हबक्कक 
900फ्रां 85 । ( सपन्याह 
23982 ८प5 हाग्गे ) । 
7८द्वाप॑ 85 (जकयहि 
७४(७७८795 (मलाकी 
]. ४टो।ब99८ (१ मकाबी 
2. ५०७८४ ००८ २ मकाबी 


४. अंग्रेजी बाइबल (प्रोतेस्तंत) 


बाइबल का किंग जेन्स' का अथवा अधिकृत अभनवाद (#पााकशल्ते 
एटाअंठ)) सर्वाधिक प्रचलित अनुवाद है । यह इंगलेंड के राजा जेम्स प्रथम 
द्वारा नियुक्त ५४ विद्वानों ने तैयार किया था। इसमें सात वर्ष लगे और 
ई० स० १६११ में पूर्ण हुआ । १८५८१-१८८४ में उसका संशोधन हुआ और 
१६४६-५२ में एक और अभिनव संशोधन हुआ जिसे संशोधिक मातक अनुवाद 


हैं 


कहते हैं। अंग्रेजी बाइबल में निम्नांकित पुस्तकें हैं : 


उत्पत्ति... २ इतिहास... दान्य्यिल 

निम्न 8 5 जा 0 ० होश 
09 लव्यव्यवस्था 5 नहेम्याह 5 7 योएल डे ०. 
० हा .. गिनती... जा एस्तेर: 77 0555“ आऑमोस 5. पा 






































न .. पुराना नियम की भूमिका 


व्यवस्था विवरण .. अय्यूब ओबद्याह 
यहो श्‌ ... भजन योना 
_ न्यायियों ... ..... नीतिवचत मीका _ 
खत 5 बा 5 7 . सभोपदेशक नहूम 
. १ शमएल.../.... श्रेष्ठगीत . ... हबक्कूक 
२ शमृएल द यशायाह ... सपन्याह 
१ राजा यिर्मयाह .. हाग्गे 
२ राजा .... विलापगीत जकंयाह 
इतिहास .. यहेजकेल मलाकी 


ः पुराने नियम के साथ संबद्ध और कुछ बाइबलों में अपक्रिफा भी छपाया 
जाता है। इसमें निम्नलिखित पुस्तकें हैं । 


१ एस्ट्रस (जिसे यूनानी एस्ट्रस कहते हैं । यह वही है जो सेपत्वांगिता में 

१ एस्द्रस है और ब॒ल्गाता में ३ एस्द्रस है। सेपत्वांगिता के लुकियन _ 

पाठ में इसे २ एस्द्रस कहते हैं।) 

.. २ एस्ट्रस (जिसे लतीनी में ४ एस्द्रस कहते हैं) 
““- तोबित 
... यदित 


कर. 





.. वुल्गाता में यह एस्तेर के अंत में संलग्न है) । 
... सुलैमान के प्रज्ञाग्रंथ 
0 सीरखे 
....._» बारूक, यिर्मयाह की पत्नी के साथ 
.. “तीनपविद्न यंवकों का गीत सिपत्वांगिता और वल्गाता में यह दानिय्येल 
... की पुस्तक में सम्मिलित है) 
....._ बेल और अजगर (पसेपत्वांगिता और वुल्गाता दोनों में ही यह दानिय्येल 
.. की पुस्तक के अन्त में दी गई है) है 
: मनश्शे कीं प्रार्थना. 
० १ मंकाबी 
०४ २-मकाबी मा 
.... यह द्रष्टव्य है कि अंग्रेजी बाइबल ( 
. जो क्रम है वह व॒ल्गाता के क्रमानसा 




















.._ शेष एस्तेर (सेपत्वांगिता में यह प्रामाणिक एस्तेर में सम्मिलित है; 


थति प्रोतेस्त॑त अंग्रेजी बाइबिल) में पा 
हैजो इब्रानी धर्मशासत्र के बजाय... 





पुराना-नियम का क्र... ६ 


सेपत्वांगिता के अधिक अनुरूप है। यह भी द्रष्ठव्य है कि अंग्रेजी प्रोस्तेतंत 
बाइबल की विषय सामग्री इब्रानी धर्मशास्त्र के अनुरूप है। दोए अनुवाद (१६१०) 
था रोनाल्‍ड नोक्स (१६४८) अनुवाद जैसे रोमन केथोलिक अंग्रेजी अनुवाद 


लगाता के क्रम एवं नामावली का अनुसरण करते हैं । 


५. अध्याय और पद और अन्य विभाजन द 
मरकुस के बारहवें अध्याय में सदुकियों ने यीशु से एक प्रश्व किया। 
यीशु ने उत्तर देते हुए एक संदर्भ दिया क्या तुमने मूसा की पुस्तक में 'भाड़ी 
की कथा' में नहीं पढ़ा | धर्मशास्त्र के उस अंश का संकेत अध्याय और पद 
द्वारा नहीं किया गया, वरन्‌ एक कथांश द्वारा जिसका शीर्षक 'भाड़ी की कथा 
दिया । अत: यह जानना रुचिकर होगा कि बाइबल में अध्याय और पढों में 
जो विभाजन विद्यमान है वह कहाँ से आया । 
पुराने नियम के इब्रानी पाठ में दो प्रकार के विभाग थे। एक तो मूलपाठ 
के विषय अनुसार और दूसरा विधियों का अंश । पंहले प्रकार के भाग को 
पेराशाह कहते थे जिसके दो रूप थे---खुला भाग) और बंद भाग । खुला 
भाग वे हैं जिनमें एक नई पंक्ति से अनुच्छेद (7थथ्ट्टथ०0 ) आरंभ होता 
है। बंद भाग पंक्तियों के बीच में ही आरंभ होते हैं। पंचग्रंथ में २९० खुले 
भाग और ३७६ बंद भाग हैं । 
विधियों का अंश आराधना घर में सबृत के दिन पठन करने की सुविधा 
के अनुसार रखा गया है। पहले तो आराधना घर में पढ़े जाने वाले पाठ केवल 
पंचग्रंथ से ही लिए जाते थे, पश्चात वे नवियों में से भी लिए जाने लगे । 
व्यवस्था (पंचग्रंथ) से लिए जाने वाले पाठ 'सेदेर' कहलाते थे और नबियों से 


लिये जाने वाले “हपतारा' कहलाते थे । गलिश्तीन में इन पाठों के द्वारा पूरा मा 
पंचग्रंथ तीन वर्ष में पढ़ लिया जाता था। इस प्रकार उसमें १५४ सेदेर या... 
साप्ताहिक पाठ होते थे। बाबुल में एक वर्ष में ही पूरा पंचग्रंथ पढ़ा जाता... 
. था, अतः वहाँ ५४ सेदेर होते थे। ये अंश केवल इब्रानी धर्मशास्त्र में ही 


 दृष्टिगोचर होते हैं | पुराने नियम के अनुवादों में इनका संकेत नहीं मिलता । द 


का इब्नानी वाइबल और पुराने नियम के यूनानी, लतीनी, अंग्रेजी अथवा... - 

.. किसी भाषा में किए गए अनुवादों में अध्यायों एवं पदों में विभाजन मिलता... 
है । पुराने नियम में अध्यायों की अपेक्षा पदों में विभाजन अधिक प्राचीन है। 
नये नियम में इसके विपरीत हुआ । पुराने नियम में पद का विभाजव 


..._ कदाचित आराधना घर में आराधना पद्धति के कारण उत्पन्न हुआ | इब्रानी.... 
.... धमशास्त्र का एक छोटा अंश पढ़ा जाता था और तब व्याख्याता समाज के... 














पे दम पुराना नियम की भूमिका 


निमित्त उसका अरामी भाषा में अनुवाद करता था। अनुवाद के लिये इस 
प्रकार विराम धीरे-धीरे मान्यता प्राप्त करते गए और पद-विभागों के रूप में 
निर्धारित हो गए । तरगम में इनको लिखित रूप प्राप्त हुआ (ई. स. ५००) । 
.. पलिश्तीन और बाबुल में प्रचलन के अनुसार पद-विभाग में विभिन्नता रही 
परंतु अंत में बेन अशेर ने जो सबसे महान मसोरीत है, वर्तमान रूप में पद- 
... विभागों का संशोधन किया और मानक रूप प्रदान किया (६००-९६४५० 
ई.स.) [हे द 
इब्नानी पाठ में वर्तमान अध्याय-विभागों का दर्शन लगभग १३३० ई. स 
में होता है। इससे कोई एक शताब्दी पूर्व लतीनी बाइबल में अध्याय-विभागों 
का सब प्रथम प्रयोग किया गया। यह बाइबल केंटरबरी के आच्चेबिशप, 


.. स्टीफन लेंगठन ने प्रकाशित की । 





द इब्नानी बाइबल और सेपत्वांगिता में अध्याय एवं पद-विभाजन समान 
. नहीं हैं। प्रोतेस्तंत अंग्रेजी अनुवाद में भी, जो कम पुस्तक वालेयहुदी 
. धम्मशास्त्र के अनुरूप है, इब्रानी बाइबल से पदों को संख्या देने में कहीं-कहीं 


......  भिन्नता है। उदाहरणाथे, सेपत्वांगिता एवं बुल्गाता में भजन २२ है, वह 
..॑. इब्नानी और अंग्रेजी बाइबल में भजन २३ है; प्रोतेस्तेंत अंग्रेजी बाइबल में 
...... यशायाह ६: १ है, वह इब्नानी बाइबल में यशा ८: २३ है। 






9.7: ५ ६. ताम 


सेपत्वांगिता में पुस्तकों के नामों को देखने से पता चलता है कि बाइबल ! 


..... के नामों की वर्तनी नामों की सुपरिचित वतेनी से भिन्न है। सेपत्वांगिता- 
... वुल्गाता परंपरा के अंतगत बाइबल के जो अंग्रेजी अनुवाद हुए हैं उनमें 
.. वुल्गाता में उपलब्ध वर्तनी का प्रयोग किया गया है। बुल्गाता की वतेनी 
...... . इज्ानी बाइबल से नहीं वरन्‌ यूनानी से ली गई है। प्रोतेस्तंत अंग्रेजी बाइबल 
... में नामों की वर्तनी मूल इब्रानी के अनुरूप है, तो भी यूनानी और लतीनी का 
..... प्रभाव भी यक्ष-तत्र परिलक्षित होता है, जसे 'इज़िकिएल' में 'ह ध्वनि का 
...... अथवा जाज़ेयाह में य ध्वनि का लोप | पुराने नियम के भारतीय अनुवादों 
..... में इब्रानी से ही नामों को अनुलिखित किया गया है। उद अनुवाद में अरबी 
... से उत्पन्न कई शब्दों के उपयोग के कारण अन्य भाषाओं की अपेक्षा इब्नानी 
हम ० के नामों से कहीं अधिक साम्य है, क्‍योंकि इब्रानी का अरबी से गहन संबंध है । 























प्रामाणिक धर्मशास्त्र या कानोन का विकास एवं निर्धारण... २१ 
पांचवां अध्याय 


प्रामाणिक धर्मशासत्र या कानोच का विकास एवं निर्धारण 


हमारे सामने यह प्रश्न है कि विभिन्न लेख किन चरणों से प्रामाणिक 
धर्मशास्त्र के रूप में आ गए ?” इस प्रश्न का उत्तर देते समय हमें यह ध्यान 
रखना चाहिये कि धर्मशास्त्र के लेख ईश्वरीय रचयिता का काम हैं तथा उन 
मनुष्यों का भो जिन्होंने उन्हें विभिन्न समयों में लिखा और उनका उपयोग 
किया। मनुष्यों के लेख होने की दृष्टि से वे उन सब विकास त्रणालियों के 
अधीन रहे जिनके अधीन मानवी सभ्यता के अन्य पक्ष रहते हैं । इस प्रणाली के 
विभिन्न चरणों का यहाँ संक्षिप्त अध्ययन किया जाएगा । 


प्रामाणिक धर्मशास्त्र के विकास एवं निर्धारण के तीन पक्ष प्रस्तुत 


१. एक प्रणाली तो वह है जिसके द्वारा विश्वासी लोगों में मतेक्य हुआ 
कि कौनसी पुस्तकों को धर्मशास्त्र माना जाए और कौनसी नहीं । 


२. कलीसियाई विद्वानों अथवा नेताओं की लेखों की विषय-सामग्री 
के संबंध में घोषणाएं हैं । इत घोषणाओं को साधारणतया मान्यता दी गई है, 
यद्यपि कि उन्हें विधिवत्‌ रूप से स्वीकार नहीं किया गया है । 


३. विभिन्न वैधानिक कलीसियाई परिषदों अथवा अन्य अधिकारियों 
द्वारा प्रामाणिक धर्मशास्त्र का विधिवत निर्धारण है। सभी कलीसियाओं ने 
अपने धर्मंशास्त्र को इस तीसरी प्रणाली से निर्धारित नहीं किया है, परंतु कम 
से कम दसरी पद्धति तक की प्रामाणिकता उन्हें प्राप्त है । बे 


१ मतकक्‍य से प्रामाणिक धर्मगास्त्र 


(१) सीने पर्वत पर वाचा की पुस्तक : साहित्यिक संग्रह के रूप में पुराने 
नियम का इब्रानी इतिहास के अंतर्गत अस्तित्व हुआ, अतएवं हमारा अध्ययन 
दी धर्मशास्त्र के विकास से प्रारंभ होता है। परमेशवर और इसच्नाएल के 
बीच संबंध के लिखित अभिलेख का सर्वप्रथम उल्लेख निर्ग, र४ :४ में है, 
जहाँ यह कहा गया है कि मृसा ने प्रभु के सब वचन लिख दिए । जो कुछ 
उसने लिखा उसे वाचा की पुस्तक' कहा गया है (२४: ७) । यह गंभीर 
अनुष्ठान के समय लोगों के सम्मुख पढ़ा गया और उसी में बलि के लोह से उस 
.. वाच्ा पर छाप दी गई। वाचा की पुस्तक की ठीक विषय सामग्री की 
. जानकारी प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है। फिर भी वह शास्त्र का प्रारंभ मा 














रस कक पुराना नियम की भूमिका 


. है, क्योंकि वाचा की पुस्तक धामिक रूप से प्रामाणिक मानी जाती थी । 
 यहोश २४ : २५, २६ में वाचा की पुस्तक का फिर से उल्लेख किया गया है। 
यहोश ने लोगों के साथ वाचा बंधाई और उनके लिये विधि और नियम 
-. ठहराएं, जिसका व॒त्तांत उसने परमेश्वर की' व्यवस्था की पुस्तक में लिख 
.. दियां। क्‍या यह वही पुस्तक थी जिसका सूसा ने उपयोग किया अथवा नई 
.. पुस्तक थी ? यदि यह वही थी तो मूसा के उत्तराधिकारी के रूप में उसके 
लिए यह उचित माना गया कि वह उसमें कुछ जोड़ दे | यदि वह नई पुस्तक थी, 
तो हम यह मान सकते हैं कि विधि एवं नियम को लेखबद्ध करना भविष्य के 
. लिये एक अभिलेख नहीं, वरन वाचा बंधाने की विधि का एक अंग मात्र था । 
_ जब शसृएल ने शाऊल को राजा बनाने के लिये चुना तो शमृएल ने लोगों से 
राजनीति का वर्णन किया, और उसे पुस्तक में (अथवा 'उस पुस्तक में) 
लिखकर प्रभ के सामने रख दिया' (१ शम्‌. १०: २५)। दाउद वाचा बाँध्ने 
.. के और अभिषिक्त होने के द्वारा इस्राएलत का राजा हुआ (२ श्र. ५:३)। 
..... हमें यह नहीं बताया जाता है कि वाचा लेखबद्ध हुई अथवा नहीं, परंतु यह 
.... अनुमान किया जाता है कि जैसे शाऊल के समय वैसे दाऊद के समय भी 
..... लिखी गई। इन सब वाचाओं और मूसा की मूल वाचा में एक तारतम्य है, 
... कि ये सब धामिक दायित्व के प्रतीक स्वरूप प्रभु के सामने रखी गई । परंतु 
.... वे धर्म और न्याय विधियों के लिये संदर्भ पुस्तकें नहीं बती । धर्म और नागरिक 
... विधि (0 7.6७) दोनों मौखिक परंपरा और प्रथित व्यवहार की बात थी । 



























...._ (२) योशिव्याह की व्यवस्था की पुस्तक 


..... योशिय्याह के समय में एक पुस्तक निकली जो धम्मशास्त्र के समान थी।. 
० रा _ जब मंदिर सुधारा जा रहा था, तो हिल्किय्याह महायाजक को “प्रभु के भवन 
.. में व्यवस्था की पुस्तक मिली (२राजा २२: ८) । शापान मंत्री ने राजा को 


। ..._ जलजलाहद हम पर इस कारण भड़की है, कि हमारे पुरखाओं ने इस पुस्तक 
..... की वातें न मानीं, कि जो कुछ हमारे लिये लिखा है, उसके अनुसार करते' 


..._ किया जाए ।'* “और सब प्रजा वाचा में सम्भागी हुई! (२ राजा २३:३) 





... वह पुस्तक पढ़कर सुनाई। राजा ने अपने वस्त्र फाड़े, क्योंकि प्रभु की बड़ी... 


.. (२ राजा २२: १३) । सब लोग एकत्र हुए कि उनके सामने पुस्तक का पाठ. 


....._ एक बड़ा सुधार जनता में आया, जिसमें मूर्ति पूजा, अशुद्धता, बालकों की बलि 


2  चढ़ाना और ऊँचे स्थानों में पूजा को नष्ट किया गया और उसके पश्चात्‌ फहह....... 











.. का पर्व बड़े समारोह के साथ मनाया गया। 





“ऐसा लगता है कि व्यवस्था की 5 
परमेश्वर का वचन मानी जाती 


प्रामाणिक धर्मशास्त्र या कानोन का विकास एवं निर्धारण. रहे | 


थी, और मनुष्यों से आज्ञा पालन और सुधार की माँग करती थी ? चौथी 
शताब्दी ईस्वी में जेरोम ने यह सुझाव प्रस्तुत किया कि यह कदाचित्‌ व्यवस्था 
विवरण की पुस्तक थी और आधुनिक युग के विद्वानों ने इस विचार को लेकर 
उस पर शोध की । यदि यह अनुमान ठीक है, तो हम व्यवस्था विवरण की _ 
पुस्तक अथवा उसके प्राचीनतम रूप को इस्राएल के धर्मशास्त्र को प्रथम 
निश्चित पुस्तक, अर्थात प्रथम ऐसा लेख जो प्रामाणिक धर्मशात्र होने के योग्य 
है, मानते हैं । द 


(३) मूसा की व्यवस्था जो एजा के पास थी 


.. जब एज्ा बाबुल से यरूशलेम को आया तो वह मूसा की व्यवस्था साथ 
लाया (एजा ७ : १४) । मूसा की व्यवस्था' व्यवस्था विवरण से अधिक थी 
क्योंकि उसके कुछ आदेश लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में पाये जाते हैं (नहे ८ : १४) । 
व्यवस्था विवरण के पठन में जितना समय लगता, उससे अधिक समय इसके 
पढ़ने में लगा (नहे. ६ : ३) | यह अनुमान किया जाता है कि उसमें वर्तमान 
पृंचग्रंथ के कुछ अंश भी होंगे । चाहे जितनी विषय सामग्री उसमें रही हो, 
यह निश्चित है कि मसा की व्यवस्था जो एज्रा यरूशलेम को लाया, अधिकृत 
धर्मशासत्र था और उसमें व्यवस्था विवरण की सामग्री से अधिक सामग्री थी । 


(४) पंचग्रंथ. और नबी 


इसके पश्चात्‌ इब्नानी धर्मशास्त्र का जो अंश है वह पंचग्रंथ है, यह उस रूप में... 
है जिससे हम आज परिचित हैं। ये लेख लगभग उस काल के मध्य प्रामाणिक 


माने गये जिसकी सीमाएँ सामरी समाज के यहदियों से पथक हो जाने 


_(नहे. १३: २८, साधारणतया इसकी तिथि ई० पू० ४३२ मानी जाती है, अन्य 
इसे सिकन्दर महान्‌ के काल में ३३२ ई० पृ० में मानते हैं) और ई० पू० १८० . है 
(जब यीशु बेन सीरख की सीरख' नामक पुस्तक लिखी गई) । सामरी लोग केवल 

पंचग्रंथ को ही धर्मशास्त्र स्वीकार करते हैं और उनका पंचग्रंथ कुछ छोटी बातों 

में इब्नानी पंचग्रंथ से भिन्‍न है। अतः यह अनुमान किया जाता है कि पंचग्रंथ 


का मूल पाठ यहूदी सामरी संबंध-विच्छेद के समय अंतिम रूप से मानकृतहो 
. गया था । इसके विपरीत यीशु बेन सीरख के पोता, जिसने अपने दादा के ग्रंथों... 
का अनुवाद किया, अपने दादा के संबंध में यह लिखता है,“वह विशेषरूप-्से 


व्यवस्था, नबी और पूर्वजों की अन्य पुस्तकों के पठन में लगा रहता था 


.._ इससे यह व्यंजित होता है कि शास्त्र के ये दोनों भाग उसके पूर्व सामान्य स्वीकृति ; रा 
. आ्ाप्त कर चुके थे। इन दोनों में से व्यवस्था (पंचग्रंथ) को पहले मान्यता दी 














« रड क्‍ पुराने नियम की भूमिका 

गई होगी, क्योंकि सामरी के पास केवल पंचग्रंथ ही था, और इसलिये भी कि 
. सेपत्वांगिता में भी इसी रूप एवं क्रम में पंचग्रंथ' विद्यमान है। इसकी तिथि 
58 ई० पू० २५० है । | | 
... ए४)लेख : 


.... ६० पू० ७५ तक यहुदी धर्मशास्त्र का तीसरा भाग (लेख) भी प्रामाणिक 
धर्मशास्त्र मान लिया गया, क्योंकि तालमुद के अनुसार शिमोन बेन शेतेक 
(७५ ई० पृ०) ने इन शब्दों का प्रयोग कर यह लिखा है" और धमशास्त्र 
कहता है' सभोपदेशक ७ : १० और नीति वचन २३ : २५ को उद्धृत किया 

_ है।ई० स० ४० में हम यह पाते हैं कि फीलो यूदियस उत्पत्ति-मलाकी समृह 
. की पुस्तकों से (यहेजकेल, दानिय्येल, रूत, एस्तेर, विलापगीत और सभोपदेशक 


..... की पुस्तकों को छोड़ अन्य सब से) उद्धरण देता है । इसका यह अर्थ है कि उस 


समय तक अधिकांश लेख प्रामाणिक माने जा चुके थे । इस समय बढ़ती हुई 
. खिस्तीय कलीसिया में यहुदी धर्मशास्त्र को प्रचलल का एक और केन्द्र प्राप्त 
हो गया । पलिश्तीन के बाहर खिस्ती लोग अपने यहुदी पड़ोसियों की उस 
प्रथा का अनुसरण करने लगे जिसमें अधिक पुस्तकोंवाला धर्मेशात्र का चलन 


जा परंतु अभी तक न तो यहूदियों ने और न खिस्तियों ने यह विचार किया... 
... कि प्रामाणिक धर्मशास्त्र का विधिवत निर्धारण किया जाय । 


२, व्यक्तिगत रुप में नेताओं द्वारा प्रामाणिक धर्मशास्त्र की घोषणा... 
धमशास्त्र के प्रचलन में सामान्य मतेक्य के चरण से व्यक्तियों अथवा परि- 


.. पदों द्वारा घोषणा के चरण तक विकास के मूल में दो तत्व हैं। एक कलीसिया 
.......॑._ के बाहर और दूसरा कलीसिया के भीतर कार्यशील रहा । पहला तत्व यह है कि 
..... यहुदियों ने लगभग १५० ई० स०» में अपने प्रामाणिक धर्मशास्त्र का निर्धारण... 
... कर लिया था। इस बात की जानकारी नहीं मिलती कि अंत में यह कैसे हुआ 
..... लगभग ई० स० ९० में जामनिया की महासभा में एक निश्चित प्रयत्न इस 
। ... दिशा में किया गया था । यह महासभा फरीसिय की विद्वतसभा थी जिसमें 
रा ' . इस बाल का विवेचन किया गया कि असुक अमुक पुस्तक से “हाथ तो मैले नहीं 





अर्थात किसी पुस्तक विशेष को स्पर्श करने के पश्चात हाथ धोने की 


" । है ... आवश्यकता तो नहीं पड़ती । उस महासभा ने उत्पत्ति-मलाकी समह को प्रामा- 
....... णिक ध्मशास्त्र निर्धारित किया, और उसमें तोबित-मकाबी, हनोक एवं सिबिल 












; रा था समृहों को सम्मिलित नहीं किया | संदूकियों ने फरीसियों के इस धर्मशास्त्र क्‍ रा रा 
निर्धारण को स्वीकार त दशक यह वादविवाद चलता रहा। परंतु 
निर्धारण आवश्यक हो गया । एक ग. 3 2 











प्रामाणिक धर्मशास्त्र या कानोन का विकास एवं निर्धारण... २५ 


प्रभाव तो खिस्तीय कलीसिया का था जो इस सत्य के समर्थन के लिये यहूदी 
धर्मशास्त्र का प्रयोग कर रही थी कि यीौशु मसीह अथवा खिस्त है, दूसरा _ 
प्रभाव था उस प्रकाशनात्मक साहित्य की वद्धि, जिससे विश्वास के ऐतिहासिक मूल 

आधारों के अधिकार का महत्व कम हो रहा था । लगभग १५४० ई० स॒० तक 


प्रामाणिक धर्मशास्त्र संबंधी वादानवाद चलता रहा और तब बंद हो गया । ऐसा 


प्रतीत होता है कि धर्मशास्त्र को अंतिम रूप दे दिया गया था। उत्पत्ति-मलाकी 


समह के रूप में जैसा आज यहदी धर्मशास्त्र है, वह निर्धारित हो गया । 


पुराना-नियम के संबंध में जो प्रश्न खिस्तियों के बीच उठाये जाते थे 
उनसे यह परिलक्षित होता है कि यहुदियों के प्रामाणिक धर्मशास्त्र का निर्धारण 
हो गया था । ई. स. १७० में सरदीस के बिशप मेलितों ने इस प्रकरण पर 
सच्ची जानकारी प्राप्त करने के हेतु पूर्वी प्रदेश की यात्रा की । पुराने नियम 
के धर्मशासत्र की एक सूची उसने प्रस्तुत की। उसे सामान्यता मेलितों का 
धर्मशास्त्र कहते हैं। उसने जो पुस्तक-क्रम बतलाया है, इब्रानी तथा 
सेपत्वांगिता दोनों से भिन्न है, परंतु सेपत्वांगिता से उसका साम्य अधिक है । 
उसमें एस्तेर नहीं है। ओरिगेन (१८०५-२५४ ई. स.) यहूदियों द्वारा मान्य 
धर्मशास्त्र की एक सूची प्रस्तुत करता है। उसमें उसके कथानुसार २२ पुस्तकें 


हैं, परंतु हैं केवल २१। अथनासियस ई. स. ३६५ के अपने उत्सव-पत्नों 


(7८४४७] ४,957०) में पुराने नियम की प्रामाणिक पुस्तकों की सूची देता है । 


ह सूची यूनानी धर्मशास्त्र के ऋ्रमानुसार है परंतु सामग्री में वह यहूदी 
प्रामाणिक धर्मशास्त्र के अनुरूप है, अर्थात उसमें उत्पत्ति-ममलाकी समूह 


सम्मिलित है । अथनासियस यिर्मयाह के साथ बारूक सम्मिलित करता है और 


स्तेर की पुस्तक को नहीं । वह उन पुस्तकों का भी उल्लेख करता है जो. 


कुछ कक मात्रा में प्रामाणिक ह। इनमे सुलमान का ज़न्नाश्नथ, सीरख, एस्तेर हक पा 
यूदित और तोबित सम्मिलित हैं 


जेरोम (ई. स. ३२९-४२०) एक महान अनुवादक और धमशास्त्र का 
निष्णात था । उसने प्रोलोगूस गलीतुस में पुराने नियम की पुस्तकों की सूची 


: प्रस्तुत की | यह सूची उत्पत्ति-मलाकी समुह है, और यद्यपि जेरोम यह कहता... 

है कि उसका क्रम यहूदी धर्मशास्त्र के अनुरूप है, तथापि वास्तव में वह यूनानी 

. धर्मशास्त्र के क्रम अनुसार तोबित-मकाबी समूह की पुस्तकों का उल्लेख 

. करते हुए उन्हें प्रामाणिक धर्मशास्त्र में सम्मिलित नहीं करता । धर्मशास्त्र के... 
.. अनुवाद में (वुल्गाता) उसने यूनानी पुराने नियम से तोवित-मकाबी समृह को... 
..._ पृथक किया और उसे एक अलग इकाई के रूप में उत्पत्तिमलाकी समूह के... 











२६... पूराना नियम की भूमिका 


.. पश्चात्‌ स्थान दिया । इस प्रकार 'एस्तेर' और दानिय्येल की यूनानी पुस्तक 
. का कुछ अंश (तीन पवित्न युवकों का गीत, सुसन्ना का इतिहास तथा बेल और 
अजगर ) पृथक रूप में प्रस्तुत हुए । 
... औगुस्तीन (मु. ई. स. ४३०) ने यूनानी प्रचलन के अनुसार पुराना- 
. नियम धर्मशास्त्र की सूची बनाई, अर्थात्‌ उसमें उत्पत्ति-मलाकी समुह और 
तोबित-मकाबी समूह दोनों सम्मिलित हैं। उसके प्रभाव के कारण उसके अधिकार- 

.. क्षेत्र के अंतर्गत ३६३ ई. स. में हिप्पो की परिषद में प्रामाणिक धर्मशास्त्र क 
. प्रथम विधिवत्‌ कलीसियाई निर्धारण किया गया । परंतु सार्वभौम परिषदों के 
लिये यद्त कार्य शेष रहा कि विस्तत खिस्तीय संसार की स्वीकृति उसे प्राप्त हो | 


.. चौथी शताब्दी में मर्व के इशोदाद को यहूदी धर्मशास्त्र की जानकारी थी । 
. अफ्रह्त (ई. स. ३५०) और एप्रेम (ई.स. ३७५) को उत्पत्ति-मलाकी 
.. समृह तथा अन्य पुस्तकों की जानकारी थी । मोपसुएस्तिया के थियोदोर ने 
... .. सब लेखों को तीन भागों में, अर्थात्‌ पूर्ण प्रामाणिक, अंशतः प्रामाणिक तथा 
... अप्रामाणिक, विभाजित किया। अंशतः प्रामाणिक पुस्तकों में अय्यूब, तोबित, 
...__१ एस्द्रस, यूदित, श्रेष्ठगीत, इतिहास और एजा-नहेम्याह सम्मिलित हैं । 
.... १३वीं शताब्दी में बार-हेब्नाइस का नोमोकानोन पुराने नियम की 
.... पुस्तक-सूची के संबंध में प्रेरितों के प्रामाणिक धर्मशास्त्रों से निम्नलिखित 
.. उद्धरण देता हज पर 
...... "भूसाकी पाँच पुस्तकें, यहोशू, न्यायियों, रत, यूदित, राजाओं को चार 
... पुस्तक, इतिहास की दो पुस्तकें, एज्ा की दो, एस्तेर, अय्युव, दाविद, सुलैमान 
.... की पाँच और सोलह नबी । इससे परे पुस्तकें सीरख हैं जो बालकों की शिक्षा 
... के निमित्त हैं।”१ द 
..../...... इस प्रकार बारूहेक्राइस की सूची में तोबित-मकाबी समृह की कुछ 
... पुस्तकें प्रामाणिक मानी गई हैं--अर्थात्‌ यूदित और सुलेमान की पांच पुस्तकें । 























में 
पे 


..._ (१) हिप्पी एवं कार्थेज को परिषदे रे 


रा मंडली परिषद द्वारा प्रामाणिक धर्मशास्त्र का सर्वप्रथम निर्धारण हिप्पो..... 
..... के बिशप संत ओऔगुस्तीन के अधिकार क्षेत्र में हुआ । बिशप बनने के बाद ही... 


प्‌ दी केनन 





आथर जेफरी 


ओल्ड टेस्टामेंट,' इन्टरप्रेटर बाइबल में . ||... 





प्रामाणिक धर्मशासत्र या कानोन का विकास एवं निर्धारण. २७ 


संत औगस्तीन ने दोनाती वादविवाद के समाधान द्वाराअपने लोगों में एकता 
लाने की चेष्टा की । इसके लिये उसने ई. स. ३६३ में हिप्पो की परिषद बुलाई । 
इस परिषद में प्रामाणिक धर्मशारत्न का निर्धारण हुआ और उसमें उत्पत्ति- 
मलाकी समृह तथा तोबित-मकाबी समृह सम्मिलित किए गए। दूसरे शब्दों में 
यह निर्धारण यूनानी प्रचलन के अनुरूप हुआ। ३६७ ई. स. और ४१६ ई. स. 
में कार्थेज की परिषदों में इस निर्णय की पुष्टि हुई। हिप्पो की परिषद की 
अपेक्षा इन दोनों परिषदों का प्रभाव अधिक व्यापक था। अतः यह मानना 
अधिक सुविधापूर्ण है कि ३९७ ई. स. की कार्थेज-परिषद का प्रामाणिक धर्म- 
शास्त्र के निर्धारण में विशेष महत्वपूर्ण स्थान है । 


(२) त्रेंतीनो की परिषद, ई. स. १५४६ 


.. फिर कम से कम १००० वर्ष तक लेखों की प्रामाणिकता वाद विवाद 
का विषय न रहा । परंतु जब प्रोतेस्तंत संप्रदाय का उदय हुआ तो कलीसिया 
की परंपरा के अनेक पक्षों का पुनः परीक्षण किया गया जिसमें एक पक्ष 
प्रामाणिक धर्मशास्त्र भी था । स्वीकृत धर्मशास्त्र के अंतर्गत पुस्तकों के महत्व 
में वेभिन्‍्य के संबंध में लथर की अपनी मान्यता थी। परंतु उसने प्रामाणिक 
 धर्मशासत्र की सूची को एक आवश्यक समस्या का रूप नहीं दिया । ई. स. 
१५३० में ऑग्सवर्ग विश्वासवचन स्वीकृत हुआ, जो प्रोतेस्त॑त संप्रदाय का 
सर्वश्रेष्ठ घोषणा पत्र एवं साहित्यिक स्मारक' कहलाता है। उसमें प्रामाणिक 
धर्मशास्त्र की विषय सूची के संबंध में कुछ नहीं कहा गया है। इसके विपरीत 
सुद्र पश्चिम के प्रोतेस्तंत सम्प्रदाय ने, जिसमें ज्विग्ली और कालविन सम्मिलित 
हैं, उन लेखों को ही पुराना नियम माना जिनको यहूद्ियों ने प्रामाणिक माना 
था--अर्थाते उत्पत्ति-मलाकी समूह को । इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ 


"3६: 


कि दीघकाल से जो परंपरा प्रचलित थी उसके साथ संघर्ष उत्पन्न हुआ, रा. ट 
क्योंकि कलीसियाई विधियों में कई पाठ तोबित-मलाकी समृह से लिये गए थे। 


इस क्रांति पर विचार करने के लिये रोमन केथो लिक कलीसिया ने (१५४५-६३) 
लेंतीनो की परिषद का आयोजन किया। इस परिषद का उद्देश्य यह था कि 
कलीसिया के धर्म सिद्धांतों का पुतकंथन करने और दोषों का निवारण करने के _ 


ढ्वारा उसके जीवन में सुधार किया जाए। सन्‌ १५४६ में इस परिषद के... 
अधिवेशनों में हिप्पो एवं कार्थेज की परिषदों द्वारा प्रामाणिक धर्मशास्त्र ... 
निर्धारण की पुष्टि की, अर्थात; उसमें उस पुराने नियम को प्रामाणिक धर्मशास्त्र 


: निर्धारित किया जिसमें प्रथम-प्रामाणिक पुस्तकें (उत्पत्ति-मलाकी समूह) और 
: द्वितीय-प्रामाणिक पुस्तकें (तोबित-मकाबी समूह) सम्मिलित हैं। पुराने नियम 














(72077 :.... कोड कस गए दम महक 


तल लक पुराना नियम की भूमिका 


के प्रामाणिक धर्मशास्त्र का यह निर्धारण आज तक रोमन केथोलिक कलीसिया 
का अधिकृत निर्धारण माना जाता है।. 


(३) उनचालीस विश्वाससूत्र (ई० स० १५६३) 


... रानी एलिजाबेथ के शासन काल में १५६३ ई० स० में आग्ल धर्माध्यक्ष- 
: तंत्र की स्थापना हुई। उसके कुछ काल पश्चात ही १५६३ में इद्धलंड की 
कलीसिया के मूल सिद्धांतों का उनचालीस विश्वास-सूत्रों में निर्धारण हुआ। 
. छठवें सूत्र में दो पुस्तक-सूची प्रस्तुत हैं। पहली सूची को जिसमें उत्पत्ति- 
.. मलाकी समूह है, प्रामाणिक पुराना नियम निर्धारित किया गया है। दूसरी सूची 
. में तोबित-मकाबी समूह और १ और २ एस्ट्रस* और मनश्शे की प्रार्थना हैं । 
. इसके संबंध में यह कहा गया है कि “वह जीवन के नमने तथा आचरण के 

शिक्षण” के लिये है, सिद्धांत की स्थापना” के लिये नहीं । दूसरी सूची को 
_अपक्रिफा ताम दिया गया है। उनचालीस विश्वास सूत्र में पुराने नियम के संबंध 
में बही मान्यता है जो अथनासियस की थी 


(४) बेस्टसिस्टर विश्वासवचन (ई० स० १६४७) 


इंग्लैंड के राजा चाल्से प्रथम ने अपने राज्य में धामिक एकरूपता लाने का _ 
: प्रयास किया । परिणामस्वरूप उसके प्रेस्बितीयन विरोधियों के हाथ विजय 


....  पताका आई। लौंग पालमेंट ने, जिसमें प्रेस्बितीयेन प्यूरिटनों का बहुमत था, 
... १२१ पादरियों और ३० साधारण खिस्तीजन की एक महासभा बुलाने का 
..... आदेश दिया कि वेस्टमिस्टर अबे में उसकी बैठक हो और वह घामिक बातों 

... पर परामश दे । इस महासभा ने वेस्टमिस्टर विश्वास वचन तैयार किया, जो 


.. १६४७ ई० में स्कॉटलैंड की महा धर्मंसभा में स्वीकृत किया गया । इस विश्वास 


.... वचन को ब्रिटिश और अमरीकी प्रेस्बितीर्यन संप्रदाय. का विश्वासबचन माना... 


......_ जाता है। इस विश्वासवचन में पुराने नियम धर्मशास्त्र को उत्पत्ति-मलाकी 
...... समह के रूप में निर्धारित किया गया है। तोबित-मकाबी समह के विषय में यह . 


... कहा गया कि वह धर्मशास्त्र का भाग नहीं है, अत: परमेश्वर की कलीसिया में... 


एप ह . उनका कोई अधिकार नहीं, तथा अन्य मानवीय लेखों के अतिरिक्त उनको को 
... और मान्यता नहीं दी जाए और न उनका प्रयोग किया जाए.। इस प्रकार 


..... वेस्टमिस्टर विश्वासवचन में, कलीसिया द्वारा विधिवत प्रयोग के. लिये तोबित- ” ४: 


...... मकाबी समूह को प्रामाणिक धर्मशास्त्र में निश्चित रूप से सम्मिलित नहीं... 
7० किया गया । ५, द क्‍ क्‍ 












कं अनसार है 





.. खे हैं। 





प्रामाणिक धर्मशास्त्र या कानोन का विकास एवं निर्धारण. २६ 


(५) पुराना-नियम के प्रामाणिक धर्म शास्त्र (कानोन ) का अन्य प्रोतेस्त॑त 
संप्रदाय द्वारा निर्धारण 


पुराने नियम की विषय सूची के संबंध में अधिकांश प्रोतेस्तंत समाज 
वेस्टमिस्टर विश्वास वचन की मान्यता स्वीकार करते हैं।ई० स० १६५८ की 
सेवोय घोषणा, जो इंग्लैंड के काँगग्रिगेशनलियों के लिये प्रामाणिक है, वेस्ट- 
मिस्टर विश्वासबचन का ही पुरनलेखन है | अंतर केवल इतना ही है कि सेवोय 
घोषणा में काँगग्रिगेशनल कलीसिया शासन के हितार्थ कुछ संशोधन किए गए. 

ई. स. १६६८ का फिलादेलफिया विश्वासवचन भी जो बपतिस्त कलीसिया 
की वाणी है, वेस्टमिस्टर विश्वासवचन पर अवलंबित है। मेथोदिस्त एपिस्को- 
पल चर्च के धमंसूत्र में उनचालीस धर्मसूत्रों का सरलीकरण किया गया है। 
परंतु कानोन या प्रामाणिक धर्मंशास्त्न के संबंध में मेधोदिस्त कलीसिया वेस्ट- 
मिस्टर विश्वास वचन का अनुसरण करती है और ध्मंशास्त्र में केवल उत्पत्ति 
मलाकी समूह को सम्मिलित मानती है | तोबित-मकाबी समृह के विषय में कुछ 
नहीं कहा गया है | तोबित-मकाबी समूह का सम्मिलित न किया जाता धर्म- 
विज्ञान की कोई समस्या नहीं मानी गई है, क्‍योंकि मेथोदिस्त कलीसिया के 
उत्तरवादी पाठों में तोबित-मकाबी समूह से दो पाठ संकलित हैं । 


(६) प्राच्य कलीसियाएँ 


. प्रोतेस्त॑त सम्प्रदाय के उद्भव का प्राच्य कलीसियाओं पर तुरन्त प्र भाव नहीं 
पड़ा । अत: उनको अपने विश्वास एवं प्रामाणिक धर्मशास्त्र के विधिवत्‌ . 
निर्धारण की आवश्यकता नहीं हुई । वे प्रारम्भिक शताब्दियों से प्रचलित 
: न्यूनाधिक यूनानी पुराने नियम का प्रयोग करते रहे । प्राचीन सुविख्यात 
धर्म-बैज्ञानिकों का प्रामाणिक-धर्मंशास्त्र संबंधी मत कलीसिया के जीवन के _ 
लिये पर्याप्त माना गया । विशेष रूप से एप्रैम, मोपसुएस्तिया के थियोदोर तथा... 
बार-हेब्राइवस के घोषणा पत्र, जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, व्यावहारिक 
. उपयोग के लिये प्रामाणिक माने गए । 


..._ वे खिस्तीय समाज, जो कम पुस्तकवाले पुराने नियम को अर्थात उत्तत्ति- 
मलाकी समह को मानते हैं इस बात से संतोष प्राप्त करते' हैं कि यह समह 

. यहुदियों के लिये बहुत विवादग्रस्त नहीं रहा और अधिकांश खिस्तियों द्वारा. 

. सदा मान्य रहा है | इसके विपरीत जो अधिक पुस्तक वाले पुराने नियम 





... (उत्पत्तिमलाकी और तोबित-मकाबी समूहों) को मानते हैं इस बात से संतोष _ ५ द द क्‍ 
.. प्राप्त करते हैं कि वे प्रारंस्भिक कलीसिया की यूनाती परंपरा को बनाए 














पुराना नियम की भूमिका 


छठवां अध्याय... 
पुराना-नियम की भाषा और लिपि 


....._ अधिकांश पुराने नियम की मूल भाषा इब्रानी है। दानिय्येल, एज्था और 
_नहेम्याह की पुस्तकों के कुछ अनुच्छेद अरामी भाषा में हैं। पुराने नियम में 
_ सर्वेत्षएक ही लिपि का प्रयोग किया गया है। तोवित-मकाबी समूह की 
पुस्तकों का ज्ञान हमें यूनानी सेपत्वांगिता के माध्यम से हुआ, परल्तु उसके 
अधिकांश की भी मूल भाषा इंब्राती रही होगी । यूतानी एस्द्रस (१ एस्ट्रस 
एवं २ एस्द्रस) कदाचित यूनानी में लिखी गई। यह कोई आश्चय की बात 
नहीं कि इन पुस्तकों का ज्ञान हमें इब्रानी के बजाय यूनानी भाषा के माध्यम 
से हुआ क्योंकि एक बार ये पुस्तकें यहुदी प्रामाणिक धर्मंशास्त्र से अलग की गई 
कि यहदियों की इनमें कुछ अभिरुचि नहीं रह गईं। द 
इब्रानी और अरामी दोनों शामी परिवार की भाषाएं हैं। शामी 
भाषाओं की विशिष्टता यह है कि उनके शब्दों में तीन व्यंजनात्मक मूल 
क्षर होते हैं। स्वर या तो लिखे ही नहीं जाते अथवा छोटे पुरक चिन्हों अथवा 


... बिन्दओं द्वारा अंकित किये जाते हैं। जब तक इब्रानी बोलचाल की भाषा रही, 
..... तब तक स्वरों को इंगित करने की आवश्यकता नहीं हुई । परन्तु जब 
... वह बोलचाल की भाषा न रही तो भावी पीढ़ियों के हितार्थ मूल उच्चारण 

... की रक्षा के लिग्रे स्व॒र चिन्हों की एक निश्चित प्रणाली का निर्माण किया _ 
.....  गया।इत सहायक चिन्हों को मसोरा ()४७४०7७) कहा गया। जिन 
... विद्वानों ने इन चिन्हों तथा अन्य संकेतों का निर्माण किया वे मसोरेती 
.... कहलाते हैं। वह इब्नानी मूल पाठ जो इन विद्वानों द्वारा सुरक्षित एवं भावी 
...... पीढ़ी को दिया गया मसोरेतिक पाठ कहलाता है । अंग्रेजी में उसका 

...._ संक्षिप्त रूप एम० टी० (५.१) है | पाठ या तो चिन्ह रहित होते थे, 
.... जैसे आराधनालयों के कुण्डल पत्र ; अथवा चिन्ह सहित होते थे जैसे म॒द्रित 
ल्‍ .... इब्रानी धर्मशास्त्र । 


पुराने नियम की मूल लिपि आज की इब्रानी बाइबल की लिपि से भिन्‍न रा 


... थी। निर्वासन-झपूर्व काल में (५६७ ई. पृ. के पहले) लिपि फिनीकी लिपि के. 
...... समान थी । यिर्मयाह के समय में मठकों के टुकड़ों पर लिखे हुए कुछ अक्षर 

.... प्राप्त हुए हैं। ये लाकीश अक्षर लाकीश ऑस्ट्रका कहलाते हैं | ऑस्ट्रका का 
..... अर्थ है मठके का टुकड़ा जिस पर कुछ लिखा हो । इब्रानी राज्य की स्थापना 







रा रा. के पूर्व. (१००० ई. पू. के पहले) इस बात का कोई पता नहीं चलता कि । 
। यह निश्चित है कि लेखनकला कुछ... 





.. कौनसी लिपि का प्रयोग किया जाता थ् 

















पुराना नियम की भाषा और लिपि... ३१ 


गी व्यक्तियों की विशिष्टता थी (दे. नया. ५ : १४) । हमें बताया जाता है कि 
मूसा फिरौन की पुत्री के पुत्र स्वरूप पाला पोसा गया (नि. २: १०); अतः 
उसका शिक्षण उच्चकोटि का हुआ होगा । परंतु उसने जब सीने पर्वेत पर 

परमेश्वर के बचनों को लिखा तब कौनसी लिपि का प्रयोग किया, यह हम नहीं 
जानते । क्या वह मिस्री लिपि थी अथवा प्रोटो-सीनैतिक लिपि के समान थी ? * 
वर्णलिपि (७9॥49८४८) का प्राचीनतम रूप प्रोटो-सीनैतिक है। मिस्र और 
बाब॒ल की अधिक प्राचीन लिपि वर्णमालात्मक नहीं, वरन्‌ चित्रात्मक (३0९०- 

87'8]07८ ) और शब्दात्मक ($५!७०८) होती थी ।र द 





२. सेराविट एलखादेय में श्र मकांत की खुदाई में मिली और इसकी तिथि 
१४००४ पर 
३. चित्रात्मक लेखन स॒न्दर चित्रों के द्वारा लेखन है। मान लीजिए एक भाव 
है, जसे घर । घर को घर का चित्र बनाकर लिखेंगे, घर ध्वनि के संकेत 
चिन्हों द्वारा नहीं । अगले पष्ठ पर प्रोटो-सीनेतिक के अन्तर्गत दाहिने हाथ 
से गिनकर ११ वां चिन्ह एक वर्ग है । यह पहले घर का चित्र था । इसी 
प्रकार बेल का सिर, मनुष्य का सिर, सर्प, आँख और खड़ा हुआ मनुष्य 
आदि पहचाने जा सकते हैं । प्राचीन चीनी चित्रात्मक लिपि है। चित्रा- 
त्मक लिपि का प्रयोग करने वाली भाषाओं -ें सैकड़ों चित्र होते हैं, और 
इसके कारण पठन और लेखन अत्यन्त कठिन हो जाता अगले पृष्ठ 
प्र जो चित्र या चित्र रूप दिए गए हैं उन्हें घर ओर बेल-सिर आदि से विलग 
कर दिया गया है और घर आदि की प्रथम ध्वनि का चिन्ह बना दिया 
है। उदाहरणाथथ, वर्ग घर का चिन्ह था । अब वह अंग्रेजी के बी. (8) ध्वनि 
से संबद्ध हो गया है क्योंकि बी (8) अक्षर बेट (8टा) शब्द में प्रथम 
ध्वनि हैं। प्राचीन शामी भाषाओं में बेट का अर्थ घर है । इस प्रकार . 
.. वर्णमाला का अस्तित्व हआ। न 
. _शब्दात्मक लिपि में स्वर और व्यंजन के प्रत्येक मेल के लिये एक 
पृथक चिन्ह है। उदाहरणार्थ यदि अंग्रेजी भांषा शब्दात्मक लिपि का 
प्रयोग करने लगे तो उसमें १०५ चिन्ह (8जण70) होंगें (५ स्वर >< 





२१ व्यंजन) । इसमें पढ़ना लिखना पांच गृणा अधिक हो जाएगा। 


... १०५४ संकेत-चिन्हों की सूची वर्णमाला (2/79०८४) के बदले शब्दमाला- 
. [(8ए]9 0279) कहंलाएगी । । 


वर्णमाला लिपि में मूल ध्वनियों के लिये पृथक चिन्ह हैं अर्थात _ 


ह स्वर और व्यंजन के लिये प्थक चिन्ह । इसका अथ यह ते कि भाषा में ० 2 हर 


: सभी कुछ लिखने के लिए बहुत कम चिन्हों की आवश्यकता पड़ती है। 
. मानवीय इतिहास में वर्णमाला की खोज एक अभूतपूर्व उपलब्धि है | यह - 


.. संभव है कि, जैसा प्रोटो-सीनैतिक शिलालेखों में प्रदशित है, वर्णमाला का... हा 
.. प्रारंभ सीने प्रायद्वीप में हुआ हो । वहाँ से यह नवीन विचार अन्य देश 


2 में फैल गया, भले ही इसका रूप विभिन्‍न देशों में विभिन्‍न रहा हो । 

















आम प्राना नियम की भूमिका 


राज्य काल की प्राचीन इब्रानी की लिपि का रूप मोआबी शिला की लिपि 
. (ल. ई. पू. 5८५० ), प्राचीन गेजेर केलेंडर (१०वीं सदी ई. पू. का उत्तराद्ध) 
और सिलोम (शिलोह) शिलालेख में मिलता है (ल. ७०१ ई. पू.) । इस 


लिपि में ऐतिहासिक अभिलेख लिखे जाते थे और उस युग के नबियों के लेख 
लिखे गए। लाकीश अक्षरों में उसी प्राचीन इब्रानी का प्रवाही (८पाशंएट) 
रूप 
निर्वासन के पश्चात्‌ (५६७ ई. पु.) यहूदियों पर पड़ोसी अरामी भाषा 
का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है । अरामी भाषा बाइबल देशों 
. की प्राचीन अन्तर्राष्ट्रीय भाषा थी । ज्यों-ज्यों यहूदी राज्य का राजनीतिक महत्व 
कम होता गया, त्यों-त्यों बोलचाल की इश्नानी भाषा अधिक प्रचलित अरामी को 
स्थान देती गई। इब्नानी यहदियों की धर्मविधियों एवं धर्मभावना की भाषा 


.. बनी रही । अपने इस सीमित रूप में भी इब्रानी अरामी भाषा की लिपि से 





प्रभावित हुई । अरामी की चौकोर लिपि (5त००/८ ४८४०८) इब्नानी लेखों की 
मानक लिपि बन गई। विचित्र बात यह है कि यह सन्दर चौकोर लिपि 


.... अब इब्रानी लिपि कहलाती है, और भरामी ने दूसरी लिपि अर्थात्‌ सूरियाई 
...._ अपना ली है। १४७७ ई. स. में प्रथम मुद्रित पुराने नियम में इसी चौकोर 
..... लिपि का प्रयोग किया गया | आराधनाघर के कुंडलपत्र आज भी इसी लिपि क्‍ 







में हाथ से लिखे जाते और चिन्ह रहित होते हैं । 
नीचे एक उदाहरण दिया जाता है। उससे यह ज्ञात होगा कि पुराने नियम 


..... के लेखन एवं संचारण में कौनसी विभिन्न लिपियों ने योग दिया है | अन्तिम 

.... लिपि को छोड़कर अन्य सब सामी लिपियाँ हैं। अन्तिम लिपि कोदेक्स- 

.. _. वतिकानुस की यूतानवी लिपि है, जो सेपत्वांगिता के लिये प्रमुख अधिकृत 
7 हस्तलिपि है। ४. पा हु 


तुलना के उद्देश्य से यहाँ प्रत्येक लिपि में धर्मशास्त्र के कुछ शब्द लिखे 


.... गए हैं। शब्दों का अर्थ है 'उसने मुस्ता से कहा, तुम इसी पहाड़ पर परमेश्वर 
/...... की उपासना करोगे । यद्यपि समस्त वर्णमाला इसमें नहीं है, परंतु बर्णमाला का _ 
........ अधिकांश भाग इसमें आ गया है। द 


। ! - प्राचीन सीनाई लिपि (ई. पूल. १५००) इन अक्षरों में कुछ... 
कल्पित हैं) हे 
























पुराना नियम की भाषा और लिपि... रे३ 


२. प्राचीन इब्रानी लिपि (ई. पू, १०००-४०० 


37 3१5%03 २३७5)%)43 ०४३७४७ फव३* 





. लाकीश आस्ट्रका लिपि (ई. पृ. ५८८) (मठकों के टुकड़ों पर लिखी) 


0+ए०पछ७८४०2१9७/-ए००१/972770७2 ८-95 


४, कुमरान यशायाह-कुंडल-पत्न लिपि (ई. पूृ. लग. १००) “वर्ग लिपि 


॥॥ ५] 2 ॥8 ॥09»7 7७4 २९१४ 


५. मसोरेती वर्ग लिपि, अनुकीली १००० ई. स. से आज तक) 


द | गा) ४ हा 0५7४7 ७ 370 7१४७/३7% 0७ क्‍ 


हु,  भसोरेती वर्ग लिपि, नुकीली (२००० ई. स. से आज तक) 


| कै 


गणगएश एक एाउशा|एए के 7 


७. - कोदेक्स वाह्किानुस ( सेपत्वांगिता ) का यूनानों लिपि (४थी. । 
५ ही शताब्दी ई. स. द द क्‍ द शक 
हा6१4६५७८६)+ार्श ८६0 











३४... पुराना नियम की भूमिका. 
सातवां अध्याय 
: पुराना नियम का सूलपाठ 


.. मुद्रण कला के अन्वेषण के पूर्व की शताब्दियों में पुस्तकें बड़े परिश्रम एवं 
. पमृल्य से लिखी जाती थीं | बाइबल के देशों में लेखन सामग्री एक पुराने प्रकार 
का कागज था जिसे पटेरपत्न (287ए7"0) कहते थे । नील नदी के किनारे 

पर उगनेवाले ऊँचे सरकंडे से बनता था। उन सरकंडों को पटेरा कहते हैं । ये 

पटेर पत्र उसी समय दीर्घकाल तक सुरक्षित रखे जा सकते थे जब रक्षा के 
साधन अच्छे हों | उदाहरणार्थ, वे किसी मकबरे में बन्द रखे जाएं अथवा मिस्र 

: जैसे देश की रेत में दबे रहें । यह आश्चर्य की बात नहीं, क्‍योंकि आज का 
कागज भी. तो गल जाता है और टूटने लगता है । अतः यह आवश्यक था कि 


...  पठेर-पत्र पर लिखी गई पुस्तकें पीढ़ी पीढ़ी में फिर से लिखी जाएँ । लेखन की 





अधिक स्थायी सामग्री शिलाएँ, मिट्टी की पटियां, मठके के टुकड़े और ताड़पत्र 
थे। शिलाओं पर लेख राजा महाराजाओं के स्मारक के लिये उपयुक्त थे । 


.... उन पर फिरौन जैसे राजाओं की विजयों का आलेखन किया जा सकता था । 
परच्तु साधारण पुस्तकों और जनसाधारण के लिये यह साधन उपयुक्त न था । 







_मिट॒टी की पटियों का प्रयोग बाबुल, असूर और उत्तरी पलिस्तीन में होता 


..... था। धातु अथवा लकड़ी की कलम से अच्छी कमाई हुई नरम मिट्टी की 
......_  पटियों पर चिन्ह बनाए जाते थे, और जब लेखन पूर्ण हो जाता था तब पटियों 
.... को पका लिया जाता था। यह उतनी ही स्थायी रहती थीं जितनी पत्थर की 
..... शिलाएँ । इस रूप के लेखन को कील-लिपि ((ए/९४६००४०) कहते हैं । बाबुल 
5 नीनवे और उगरित के प्राचीन पुस्तकालय ऐसी ही कील लिपि से सुरक्षित रखे 
... गए हैं। सठके के टुकड़ों का प्रयोग टिप्पणियों और पन्नों के लिये किया जाता... 
... था, कदाचित इसलिए कि ये सस्ते थे । ये इतने स्थायी नहीं थे जितने शिलालेख 


१३. 


..... अथवा मिट्टी की पटियाँ, फिर भी पुरातत्ववेत्ता इस बात के लिये आभारी हैं... 
७ किये भीष्याप्तस्थायी रहे।.. .. हे की! 






पलिश्तीन में जिस स्थायी लेखन-सामग्री का उपयोग किया जाता था वह द 


। :चंमपत्र (?००८४४ा८०) था। यह भेड़ों की खाल से बने हुए अच्छे चमडे का _ 
.. .. होता था। भेड़ की खाल के आंतरिक भाग के तंतुओं से जो बढ़िया चमें बनाया 
.. जाता था उसे वेलम (फपतथाफ्श) कहते हैं। पार्चमेंट की अपेक्षा वेलम कहीं 








.._ अधिक महंगा था । इसलिये उसका उपयोग श्रेष्ठ पुस्तकों के लिये किया जाता... 
 था। चौथी शताब्दी में कोदेक्स वेतिकानुस नामक हस्तलेख वेलम पर लिखे गए 











पुराना नियम का मूलपाठ......... ३५. 


हैं। १९४७ में वादी कुमरान में जो यशायाह कुंडल-पत्न मिला है, वह १०० ई 
पू, का है और वह चमड़ा घटिया पार्चमेंट है। आज तक वह इसलिए विद्यमात _ 
रहा कि वह मिट॒टी के पात्न में बंद था और वह पात्र अल्पवर्षा के क्षेत्र में किसी 
गुफा में रखा था । पार्चमेंट बहुत महंगा था। पुराने नियम की प्रथम पाँच 
पुस्तकों को लिखने के लिये ही कम से कम ३० भेड़ों को खाल की आवश्यकता 
है । यह बात अच्छी थी कि इब्रानी लोगों के पास भेड़ों की खाल सरलता से 
मिल सकती थी, क्योंकि सदियों तक वे पशु-चारण जीवन व्यतीत करते रहे । 
पार्चमेंट के प्रयोग से कई वर्षों के बजाए कई पीढ़ियों तक पुस्तकें बनी रहीं। 
परत पा्चनेमेंट भी अनिश्चित काल तक चल नहीं सकता। अतएवं इस लेखन 
सामग्री के लेखों का भी पुनलेखन करना पड़ता था। 


हस्तलिखित पुस्तकों के लेखन की सर्वाधिक सक्षम पद्धति शिक्षणकक्ष की. 
सहकारी पद्धति थी। एक व्यक्ति पढ़ता जाता था और एक दर्जन व्यक्ति लिखते 
थे । यह स्वाभाविक है कि जो प्रतिलिपियाँ बनती थीं उनमें कुछ अन्तर हो 
जाए । सक्षमता और लिखावट की भिन्‍नताओं के अतिरिक्त, लेखकों की बोली 
और शिक्षण के विभिन्‍न वातावरण से भी छोटी मोटी विभिन्‍नता आना स्वाभा- 
विक हैं। बोलनेवाला भी अपनी ओर से मूलपाठ में शैलीगत सुधार कर देता 
था । अथवा वह हाशिया पर लिखी टिप्पणी को मूललेख के साथ पढ़ सकता था 
जिससे टिप्पणी घूललेख का भाग बन सकती थी। जांच करने के पश्चात 
भी छोटी मोटी भिन्‍नताएँ छोड़ दी जाती थीं । 


... हस्तलिपियों की प्रतिलिपि बनाने की एक और पद्धति यह थी कि एक 
व्यक्ति सीधे मूललेख से ही प्रतिलिपि बनाए । इस स्थिति में प्रतिलिपिक स्वयं. 

संतोष प्राप्त कर लेता था कि उसके मानदंड से लेख परिशुद्ध है अथवा नहीं। 
इस प्रकार यह संभव था कि उसकी प्रतिलिपि अन्य प्रतियों से कुछ भिन्न हो _ 


_जाए। दूसरे प्रकार की ल्टियाँ भी आ सकती हैं। आँखें थक जाएँ। अतः कोई 


अक्षर छुट जाए, अथवा कोई अक्षर दोबारा लिख जाए, अथवा कोई पंक्ति ही (८ हे 
छूट जाए । फिर किन्‍्हीं दो व्यक्तियों की लिखावट एक सी नहीं होती । इसके 


अतिरिक्त, जेसे कुछ लोगों में परस्पर अधिक समानता रहती है और वे परिव । द ः का 
अथवा जाति अथवा वंश में एकत्रित रहते हैं, उसी प्रकर हस्तलिखित लेखों का... 
सूक्ष्म अध्ययन करने पर उनको हम परिवार अथवा परस्पर संबंध की मात्रा ४. 
के आधार पर विभाजित कर सकते हैं । इस पद्धति से लेखों में समानता भी थी... 


और कुछ विभिग्तता भी । 

















4 आओ .... पुराना नियम की भूमिका 


हस्तलिखित पांडलिपियों के सम्बन्ध में ऊपर निर्देशित समस्याओं के 
अध्ययन का एक शास्त्र बन गया है। उसे मुलपाठ आलोचनाशास्त्र [$टुंल्ाव्ट | 
है व्टापकां ट्लंप्रंटांआए) कहते हैं। उसे निम्न (0७०/) आलोचना भी कहते हैं, 
क्योंकि वह उच्च (!7872०) आलोचना का आधार है । उसका उद्देश्य यह है कि 

. उपरोक्त निर्देशित पद्धतियों द्वारा जहाँ तक संभव हो सके मुललेखों के पाठ का 
निर्धारण करे । समय के आघात से मूललेख तो कब के नष्ट हो गये होंगे । 
उनका ज्ञान केवल उनकी वंशज प्रतिलिपियों की पांडलिपियों से हो सकता है । 
मूलपाठ आलोचक का कार्य मानों यह है कि वर्तमान यहूुदियों की मुखाक्ृतियों 
की विशेषताओं के आधार उनके आदि पूर्वज याकूब का चित्र बनाएं। इस 
अध्ययन क्रम से यह पता चल सकता है कि समग्र वर्तमान यहूदियों की साधारण 
समानता के भीतर कुछ छोटे समूहों में परस्पर साम्य अधिक है। ये याकूब के 
वंशजों के अनुरूप हो सकते हैं। याकूब के ये प्रावकल्पित वंशज याकूब का चित 
उपलब्ध करने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करेंगे । सहख्रों यहुदियों की जाँच का 
कार्य अनन्त होगा । परन्तु कुछ प्रमुख वंशजों को प्रतिरूप स्वरूप लिया जाए तो 

. याकूब के चित्न का कार्य कुछ सरल होगा । घृलपाठ समालोचक कुछ ऐसी ही 
. पद्धति का प्रयोग करता है। सैकड़ों पांडलिपियों की लेखन शैली एवं अन्य 


... विशेषताओं का अध्ययन करते हुए यह समालोचक वर्तमान हस्तलिपियों को, 
... जहाँ तक सम्भव है, परिवारों में विभाजित करता है। जितनी दूर तक बह 






_भूतकाल में जा संकता है उतनी दूर तक वह उन 'प्रावकल्पित मूलपाठों' की 


... पुनर्चना करता है जो प्राचीनकाल में प्रचलित थे। इस प्रकार के अध्ययन के. 

.... आधार पर खिस्तीय विद्वान नये नियम के मुलपाठ-समालोचतना क्षेत्र में पाश्चात्य 
..... (५७८००) बुलपाठ' “बीजंतियन-पूर्व (?7०-8ए४०४४४७०) मुलपाठः और 
....... तटस्थ (7८०००) सूलपाठ' स्वीकार करते है। तटस्थ मूलपाठ में मुख्यत 
का . 'कोदेक्स वेनिकानुस' और “कोदेक्स सीनतिकुस' हैं। 


पुराने नियम के घुलपाठ-समालोचना क्षेत्र में विद्वान इतने सौभाग्यशाली 


|... नहीं रहे, क्योंकि समस्त इब्नानी पांडुलिपियां एक ही प्रकार के परिवार या. 
..... भूलपाठ को प्रदर्शित करती हैं, जिसे मसोरेतिक मूलपाठ कहते हैं। इनमें प्राचीन- 
...  तम तिथि लगभग € वीं शताब्दी ई. स, है, अर्थात मूल लेखों के लगभग १००० 





.. वर्ष बाद । यहूदी प्रामाणिक धर्मशास्त्र (299०४) एवं मूलपाठ के मानककरण के... 


। * । पूर्व जो मूलपाठ रहे वे अनुवादों में ही केवल शेष रहे हैं। इसलिए १९४७ में 






.... सृत्युसागर कुंडलपत्र ([062व ४86६ 50708) की प्राप्ति का पुराने नियम के... रे 
-.... आलोचनात्मक अध्ययन में विशेष महत्व का स्थान है। इन कुंडलपतों में श(मूएल...... 
की पुस्तक की पांड्लिपियों में तीत विभिन्न मूलपाठ-परम्पराएँ, और पंचग्रंथ की... . 














पुराने तियम की मूलपाठ........|_ ३७ 


पांडलिपियों में कम से कम तीन विभिन्‍न परम्पराएं दृष्टिगोचर होती हैं। 
अन्य पुस्तकों के लिये भी कुछ सीमा तक यही कहा जा सकता है। डेड सी 
स्क्रोल के अनुसंधान के परिणाम स्वरूप अब सेपत्वांगिता को पहले से अधिक 
महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि मसोरेतिक मूलपाठ से उसमें जो भिन्‍नताएँ हैं, 
: उन्हें अब साधारण अनुवाद और दूषित संचरण नहीं माना जाता, वरन्‌ उतना 
ही प्राचीन इब्रानी मूलपाठ माना जाता है जितना मसोरेतिक पाठ को | इसी 
प्रकार सामरी पंचग्रंथ का भी अब अधिक आदर होने लगा है क्योंकि उसे भी 
इब्रानी मुलपाठ की परंपरा माना जाने लगा है। संशोधित मानक अनुवाद 
(१९५२) (7२,8.०.) ने डेड सी स्क्रोल में प्राप्त यशायाह से कुछ पाठों को 
सम्मिलित किया है। उदाहरणार्थ, यशा. १५ : € में मसोरेतिक सूल पाठ में 
दीमोन के स्थान पर दिबोन रखा गया है । 
जब बाइबल के विद्वान विभिन्न प्राचीन मूल पाठों की, मूल लेखों की मूल 
पांडलिपि की प्राप्ति की समस्याओं की चर्चा करते हैं--जब वे टिप्पणियों, 
त्रुटियों तथा संपादकीय टिप्पणियों की चर्चा करते हैं तो सामान्य पाठक के मन 
में यह विचार उत्पन्न हो सकता है कि बाइबल का मूलपाठ, जैसा हमारे हाथों 
में है, विश्वसनीय नहीं है, और इसलिये मसीही विश्वास भी शंकास्पद है । 
इससे बड़ा भ्रम और कोई नहीं हो सकता । सच बात यह है कि पुराना नियम 
एवं नया नियम दोनों के, और विशेषकर नया नियम के मूलपाठ के संबंध में 
पांडलिपियों का जितना समर्थन मिलता है उतना किसी भी प्राचीन पुस्तक का 
नहीं। उदाहरणार्थ, यूनानी नाटककार एसकीलस के चाठकों की केवल ५० 
पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं। वे भी पूर्ण नहीं हैं। मूल लेख से ये पांडुलिपियाँ 
१४०० वर्ष बाद की हैं। इसके विपरीत नये नियम की १४०० से अधिक 
पांडुलिपियाँ मूल यूनानी में हैं और ६००० अनुवादों में हैं। इसके साथ ही 
ये नियम की प्राचीन पांडलिपियाँ, जो पा्चेमेंट अथवा वेललम की बनी हैं, मूल 
लेखों के केवल २५०-३०० वर्ष बाद की हैं। पार्चमेंट के खंड तो इस काल से 
भी पहले के पाए जाते हैं। नये नियम के पटेर पत्र हमें इस तिथि से १०० वर्ष 
पुराने मिलते हैं। पुराने नियम की बात कहें, तो जिस बारीकी और सावधानी 


के साथ ससोरेतिक मूल पाठ की पीढ़ी-पीढ़ी प्रतिलिपि की गई है वह मानव । 


जाति के साहित्य के इतिहास में अभूतपूर्व है और अद्वितीय है। डेड सी स्क्रोल्स 
की खोज ने विद्वानों को पहले से कहीं अधिक आश्चरय की भावना से इस बात 

.. के प्रति भर दिया है कि मानक मूल पाठ की रक्षा के लिये मसोरेतिक विद्वानों 

.. ने कितना अथक प्रयास और विश्वस्तता प्रदर्शित की है। परंतु वे इस बात में 


ओह. 











कक, पुराता नियम की भूमिका 


भी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि पाठ के मानकक॒त होने के पूर्व लेखों के विभिन्न 
रूपों को देख सकते हैं। ् 

... धर्मशास्त्र के मुल पाठ के विषय में विभिन्न लोगों की भिन्न भावनाएँ हैं । 

. कुछ लोग केवल एक ही मूल पाठ की मान्यता द्वारा अपने पक्के विश्वास की 
चेष्टा करते हैं । मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान के संबंध में यह भावना विद्यमान 

.. है। उनका विचार है कि पाठ के प्राचीन वैभिह्य के संबंध में जोध करता धम 
की नींव को ही हिला देना है। यह द्रष्टव्य है कि वर्तमान काल में कुरान के 
मूलपाठ का केवल एक ही रूप उपलब्ध है, क्योंकि ओथमान खलीफ़ा ने उन 

सब विभिन्न पांडुलिपियों को, जो मानक रूप से भिन्न थीं, लेकर नष्ट कर 
दिया। विद्वान की दृष्टि से मूलपाठ के विभिन्‍य रूपों का नष्ट किया जाना 
बड़ी क्षति की बात हुई। खिस्तीय विद्वानों ने, जिन्हें अपने विश्वास के मूल 
आधारों के संबंध में कोई भय नहीं था, पांड्लिपियों के विषय में जो भी तथ्य 
उपलब्ध हो सकते हैं उन्हें बड़े परिश्रम के साथ एकत्रित किया है । उनकी आशा 
- हैकि ऐसा करने से उन्हें मृलपाठ और भावी पीढ़ियों को उसके संचरण के 
...._ संबंध में अधिक ज्ञान प्राप्त होगा। समस्त सत्य के कर्ता परमेश्वर को, मानव _ 
: द्वारा किसी भी क्षेत्र में सत्य की खोज से कोई भय नहीं द 






























यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि मूलपाठ की भाषा सदा ही शास्त्रीय 
.._ रहेगी। जब वह “भ्रष्ट पाठ (८००ण७०४ ९४४) की बात करता है तो उसका - 
.. अर्थ यह है कि वह पाठ विशेष मूललेख से बहुत अधिक भिन्न हो गया है। 
.. परत, यवि ये भिन्नताएं जीवित समाज के धामिक प्रचलन द्वारा आई हैं तो 
.. वे भ्रष्टताएं भ्रष्टताएं न होकर जीवित विश्वास के लिये परिष्कृत रूप माने... 
..... जाएंगे, क्योंकि धर्मलेखों का. इसलिये आदर किया जाता था कि वे जीवित 
..... विश्वास को बनाए रखते थे। इसके अतिरिक्त, इस बात को भी ध्यान में रखता 
... चाहिये कि मूलपाठ की दृष्टि से नये नियम का ७/८ अंश शंका से परे है और 
... केवल १/८वाँ अंश ही मूलपाठात्मक आलोचना का विषय है। इस १/०वें अंश 
.... में भी आधा भाग ऐसा है जिसमें केवल शैली को विभिन्नता है, और दूसरा 
.. आधा भाग ऐसा है जिसमें शब्दों में वेभिह््य है। ये दोनों विभिन्नताएं हल्की 
...... और महत्वहीन हैं। कोई १/१००० अंश ही ऐसा है जिसमें विषय सामग्री 

..... -.. संबंधित भिन्नताएं हैं । बा रा हू 
...... कोई भी खिस्तीय सिद्धांत शंकास्पद पाठ पर आधारित नहीं है। यह बात 
... पुराने नियम के लिये भी सत्य है 


०्५+ जे 


अष्टताओं की बात कहता 

















जब मूलपाठ समालोचक 'टिप्पणियों' और. 
यह ऐसी शास्त्रीय शब्दावली है जैसे वेज्ञानिक 
































पुराने नियम का मूल-पाठ | रे६ 
अपने विज्ञान की शब्दावली काम में लाता है | इन पारिभाषिक शब्दों को अपने 
संदर्भ से पृथक नहीं करना चाहिए अन्यथा अर्थ का घोर अनर्थ हो सकता है। 


खिस्तीय धर्मशास्त्र उन कार्यों एवं बचनों का आलेख हैं जो परमेश्वर से निकले । 
ही उसका सीधा सरल अभिप्राय है। खिस्तीय विश्वास इस अक्िप्राय पर 





हज 


इतना आधारित है कि उस पर आक्रमण असंभव है । 


आहल्वां अध्याय 
धर्मशास्त्र के अध्ययत्त के उपागम (#फ्ा०बलार5 


सामान्यतः बाइबल के अध्ययन के तीन प्रकार के उपागम हैं 
।. वैज्ञानिक २. दाश्शनिक, ३, धर्म वेज्ञानिक 
_१. वैज्ञानिक उपागस में वे सब मल धारणाएँ और पद्धतियाँ सम्मिलित 
हैं जो वर्तमान यूग के किसी भी विज्ञान की विशेषताएं हैँ। मूल धारणाएं 
$) निम्नानुसार हैं: द 
१) उन तथ्यों से ही जितका वस्तुवादी रूप से अवलोकन तथा मापन 
किया जा सकता है समस्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है । अज इ 
(२) समस्त परिवतेन की व्याख्या उन प्राकृतिक नियमों के आधार पर 





[908पर७९ 


छः 


की जा सकती है, जिनका ज्ञान हमें है अथवा जिनको खोज होने वाली है । 


विज्ञान की पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं 
क) अवेक्षण ओर प्रयोग द्वारा आँकड़ों का संकलन, 
'ख) आंकड़ों की व्याख्या के लिये अस्थायी अनमान (#7ए77०घा८डं5) 
ग) अनमानों की जांच | हा 
ऐसे अनुमान जो जांच में बहुत कुछ ठीक उतरते हैं 'सिद्धांत' (पल्णण) 
बन जाते हैं, वे 'नियम' (.8७ ) माने जाते कर 
विज्ञान की भावना का वर्णन इस प्रकार किया गया है: “विज्ञान की 


हू 
धन 


भावना तथ्यों के लिए धन है (जिसमें एक उच्च कोटि की परिशद्धता तथा 
अपने! इच्छा से विलगता निहित है); परिणाम तक पहुँचने में एक सतके 
. पूर्णता है (जिसमें लगातार संशय तथा अपनी निजी धारण ाओं का परित्याग 
निहित है); स्पष्टता का गण है (जिसमें अस्पष्टता, द्विविधता तथा बिखरे 


























४०... पुराना नियम की भूमिका 


तारों को दूर रखना निहित है--अर्थात जिसे वैज्ञानिक फेराडे (78089) 
.. संशयात्मक ज्ञान कहलाता है उसे दूर रखना); और पदार्थों के अंतर-संबंध 
का बोध है, जिससे अस्थाई रूप से यह भाव होता है कि पृथक घटनाएँ किसी 
-. एक प्रणाली या संगठन के विभिन्न अंग हैं । द हक 


बाइबल विशेषकर पुराने नियम के अध्ययन के प्रति वैज्ञानिक उपागम के 

.. अनेक रूप हैं । मलपाठात्मक अथवा निम्न समालोचना एक वैज्ञानिक उपागम 
. जिसमें मलपाठ की खोज का प्रयत्न किया जाता है। साहित्यिक एवं ऐतिहासिक 
. समालोचना, जिसे उच्च समालोचना भी कहते हैं दूसरा वैज्ञानिक उपागम है 
जिसमें किसी पुस्तक की रचता और रचयिता संबंधी समस्याओं का अध्ययन 


... किया जाता हैं । इस्राएल जाति के धर्म का अध्ययन धर्म के प्रति एक वज्ञानिक 





. उपागम है | इसका मूल स्रोत बाइबल है । इस्राएत का इतिहास इब्रानी लोगों 
संबंधी घटनाओं, उनके कारण एवं परिणामों के प्रति एक वैज्ञानिक उपागम है। 
ये घटनाएं बाइबल में प्रस्तुत हैं। बाइबल के अध्ययन के प्रति इन वैज्ञानिक 
उपागमों में विज्ञान की मल धारणाएं, पद्धतियों और भावनाओं का उपयोग 


.... किया गया है। 






जब हम कहते हैं कि वैज्ञानिक धारणाओं का उपयोग किया गया है तो 


'...... इसका अर्थ यह हुआ कि बाइबल का अध्ययन विज्ञान की मूल धारणाओं के 

..... कारण सीमित होना चाहिये । यह कहा जा सकता है कि ऊपर विज्ञान कौजो 

..... पहली मल धारणा दी गई है, उसके आधार पर आत्मा, परमेश्वर, स्वगंदूत 
... आदि जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखाई देते अध्ययन के क्षेत्र के बाहर की बातें हैं 





_ हमारा कहना यह है कि आत्मा का विचार परमेश्वर का विचार, स्वरगेंदतों का 


«...... विचार का वस्तुवादी रूप से अध्ययन किया जा सकता है, और उपरोक्त अध्य- 
....... यमनों में इसी दृष्टि से उनको देखा गया है । विज्ञान की दूसरी मूल धारणा के 
..._.. आधार पर, जिसका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है, यहु तके किया जा सकता 
... है कि वैज्ञानिक उपागम के अंतर्गत, किसी भी घटना की व्याख्या के लिये अति- 
.._ प्राकृतिक तत्वों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए । उदाहरण के रूप में, इस _ 
....... प्रकार के कथन वैज्ञानिक रूप से असफल होंगे--परमेश्वर ने अज्नाहम को कस- 
« ....  दियों के ऊर नगर से बुलाया, अथवा परमेश्वर ने इस्राएल को मिस्त्रे की बंधु- 
..... वाई से छूड़ाया', परमेश्वर ने लाल समुद्र के दो भाग किये कि इस्राएल मिस्र 
... से बच निकले'। यह कहना सत्य होगा--कसदियों के ऊर को अब्राहम छोड़ 









रा कर चला' मसा ते मित्र से इचस्राएलियों को छुड़ाया, अथवा “ इज्ाएल को छुड़ाने द < हा क्‍ ; 





... में अपनी सफलता का श्रेय मूसा ने अपने मिद्यानी देवता याहवे को दिया 


समुद्र का उथला जल ठीक उसी... 











धर्मशास्त्र के अध्ययन के उपागम..........|/| ४१ 


समय जबकि इस्राएल मिस से भागने का प्रयत्त कर रहे थे एक तूफान से एक 
और बह गया' । दूसरे शब्दों में यों कहें कि वैज्ञानिक उपागम वह है जिसमें हम 
अपने मन पर एक ऐसा नियंत्रण लाद लेते हैं जिससे हम यह निर्णय करते हैं कि 
सब घटनाओं की केवल प्राकृतिक व्याख्याएँ ही हो सकती हैं। इस तकंणा के उत्तर: 
में हमारा कहना यह है कि इस प्रकार के नियंत्रण का वास्तव में अस्थाई उपा- 
गम के रूप में महत्व इस बात में है कि हमारी विचार-प्रक्रियाओं का विशिष्टि- 
करण हो जाता है । परंतु यदि हम इसी उपागम को इतना प्रबल बना दें कि 
हम उसके आदी और वशीभत हो जाएं, तो वह धारमिक विश्वास के लिये. 
विनाशक होगा । बाइबल के अध्ययन में तो हम सम्पूर्ण पुस्तक के मूल सत्य को 
खो बेठेंगे, क्योंकि बाइबल अपने इतिहास, व्यवस्था अथवा नबी संबंधी अंशों में 
इस एक मल धारणा पर संचालित है कि एक, जो अतिप्राकृतिक है और जो 
प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं है, इस्राएल के इतिहास की घटनाओं का मूल 
कारण है । 


वैज्ञानिक पद्धति मनष्य को परमेश्वर की एक महान देन है और उसके 
हारा जो अद्भुत उपलब्धियाँ हुई हैं उनको हम स्वीकार करते हैं। परच्तु 
दान जितना महान हो उतना ही उसके उचित उपयोग का उत्तरदायित्व तथा 
दाता को. स्मरण करना महान है । अतएवं बाइबल का सच्चा अध्ययन 
कभी भी वैज्ञानिक उपागम की मूलधारणाओं में सीमित नहीं किया जा 
सकता। मानव को परमेश्वर के प्रकाशन में निहित वस्तुवादी तथ्यों एवं 
सानवीय उपादानों को जानने के लिए वैज्ञानिक उपागम उत्तम है, परन्तु 
जो कुछ जाना जा सकता है जब हम उसे जान जाएं, तो हमें एक और 
उपागम स्वीकार करना चाहिये। यह उपागम बाइबल की प्रकृति के समान _ 





ही है। उसे धर्म वैज्ञानिक उपागम कहते हैं। दार्शनिक उपागम पर विचार... 


करने के पश्चात धर्म वैज्ञानिक उपागम पर विचार किया जायेगा 


२. दाशनिक उपागम अपने दर्शन पर निर्भर है। अतः दार्शनिक उपागम 
अनेक प्रकार का हो सकता है। बाइबल के प्रति एक साधारण दाशंनिक उपागम 
में निम्नांकित मूल धारणाएं हैं कि हक हे 

(१) एक आत्मिक अस्तित्व हैं जो मानव के साधारण अवेक्षण से 
परे है, परन्तु जो चितन एवं नियंत्रण से आँशिक रूप में जाना जा 
सकता हे 


... (२) सब धर्म मूल रूप में समान हैं, अर्थात परमेश्वर अथवा सत्य की 
. खोज करते हैं । 

















. ४२... पुराना नियम की भूमिका _ 
. (३) कि (ख) के कारण परमेश्वर का अधिकतम ज्ञान सब धर्मों के 
सत्य के संकलन से प्राप्त हो सकता है। 
.. ऐसे दार्शनिक उपागस की पद्धति बुद्धिसंगत, निग्रहात्मक अथवा रहस्यवादी 
. हो सकती है। परन्तु वह मानव शक्तियों का ही अभ्यास होगा । बाइबल 
के अध्ययन में यह उपागम वैज्ञानिक उपागम से अच्छा होगा क्योंकि 
उसमें सत्‌ के अस्तित्व को स्थान दिया जाता है जो अ्वेक्षण से 
परे है। परन्तु इस उपागम की दूसरी और तीसरी मूल धारणाएं बाइवल 
के मूल दावों के विपरीत हैं। यदि इस उपागम को मान्यता दें तो कहना 
. होगा, परमेश्वर का कसदियों के अर से अक्नाहम को बुलाता मूलरूप से 
. ऐसा ही है जैसे परमेश्वर का प्लतोन (79800) को 'रिफ्ब्लिक' लिखने 
अथवा हमुराबी को अपनी विधियों को लिखने के लिये बुलाना'। इसका अर्थ 
यह होगा कि इस उपागम में इस्राएल को विशेष प्रकाशत की स्वीकृति 
.. नहीं है। तब बाइबल संसार की अनेक धारमिक प्रस्तकों में से एक हो 
.  जायगी | द 


कक * 


.. ३. धर्म वैज्ञानिक (76००४ ८०) उपागम बाइबल के लेखकों के 
.. प्रमुख दावे के प्रति सहानुभूति की भावना, अथवा यों कहें कि स्वीकृति के 
.. विचार से प्रारम्भ होता है। इस उपागम की मूल धारणाएं निम्नां- 


ही 


मत कित हैं 


.. ... (क) परमेश्वर का अस्तित्व है। वह मानव की समस्त अवेक्षण 

.... शक्ति, मापन एवं समझ से परे है। वह मानव की तियति का 
० शासक हैं। कप हक द 

(ख) परमेश्वर ने एक विशेष लोगों को अर्थात्‌ इस्राएल को स्वयं को. 
विशेष रूप से प्रकाशित किया है। यह विशेष प्रकाशन यीश, खिस्त 

. के व्यक्ति (?८5०४) रूप में पूर्ण और सिद्ध हुआ । 


धर्म वैज्ञानिक उपागम की पद्धति है विश्वास'। यह विज्ञान एवं दर्शन 


.. की बोढ्धिक पद्धतियों के विरुद्ध नहीं है, परन तु मूल तथ्यां के नये संकलन के 


सबंध में बुद्धि का उपयोग करती है। ये तथ्य हैं--इस्राएल एवं खिस्त के 


... संबंध में परमेश्वर के ऐतिहासिक कार्य । यदि इस उपागम को स्वीकार करें . 
.... तो हम कहेंगे, परमेश्वर ने कसदियों के ऊर से अन्नाहम को बुलाया--यही 







.... नहीं वरन्‌ यह भी कि उसी परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु खिस्त को जगत का... 
.. उद्धारकर्ता होने के लिये दे दिया, और 


और वहीं परमेश्वर इस समय मेरे मन में 





। कहता हटा है 2 रे *. 





























धर्मशास्त्र के अध्ययन के उपागम...... ४ 


र् 


इबल के प्रति मौलिक उपागम धर्म विज्ञानात्मक ही हो सकता है । 


+ 


हसरे शब्दों में यों कहें कि बाइबल का सच्चा अथ वे लोग ही जान सकते हैं. 


जो उस विश्वास में, जो बाइवल का मूल आधार प्रवेश करने के लिये 
तैयार हैं। उसकी रचना और प्रामाणिक धर्मशास्त्र के पूर्ण हप म बाइबल का 


संबंध एक जीवित विश्वास के साथ रहा है। इस विश्वास की एक हूँ 
धारणा यह है कि सनातन परमेश्वर स्वयं को मानव पर प्रकाशित करने के 
लिये मानव-इतिहास के प्रवाह में विशेष रूप से प्रविष्ट हुआ । जैसे किसी 
भी लौकिक लेखक की रचनाओं के आस्वादन के लिये यह आवश्यक है कि 
सहानभति की भावना से उसके मन अथवा दृष्टिकोण में प्रवेश किया जाए 
उसी प्रकार बाइबल के विभिन्न लेखों के आस्वादन के लिये भी आवश्यक हैं 
कि उसके दिव्य रचयिता के मन में प्रवेश करने का अयास किया जाए 
क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन्‌ परमेश्वर की गृढ़ बातें भी जांचता है (१कुरि० 
२: १०) । खिस्तीय धर्मशास्त्र को समझने के लिये पवित्वात्मा की सहायता 


की आवश्यकता है। वही उचित दृष्टिकोण, उचित चेष्टाएं और महत्वपूण तथा 
त्वहीन बातों को पहचानने की उचित शक्ति प्रदान करता हूँ, जब हमे 


नम्रतापूर्वक यीशु खिस्त पर विश्वास करते हैँ। बाइबल को समझन के लिये 


इब्रानी अथवा यनानी भाषा अथवा बाइबल-देशों के अभिनवतम पुरातत्वात्मक 
अनसंधानों के ज्ञान से कहीं अधिक पवित्नात्मा की सहायता का आवश्यकता 


3९ 


। टीकाएं अत्यन्त मूल्यवान साधन हैं, परन्तु पवित्न आत्मा ही शिक्षक हैँ जो 


९. 


जीवित विश्वास में उसी प्रकार मार्गदर्शन करता है जैसे वह जीवित कलीसिया 


में रहता है । 


के 


बाइबल का वह ज्ञान जो परमेश्वर पवित्रात्मा का दान हैं, बाइबल के 


४2 बा , पी 


उस ज्ञान से जो केवल मानव बुद्धि से संपादित है, श्रेयस्‍्कर है | पौलुस की 


कक, 


साक्षी है कि क्रस की कथा (परमेश्वर का ज्ञान) मनुष्यों के लिये मू्खेता है 
और उसी तथाकथित मूर्खता को परमेश्वर ने जगत के उद्धार का साध्यम 


8] 


बनाया है । 











किक 4 








क्‍ द्वितीय भाग 
पुराने नियमों की पुस्तकों की भूमिका 
नोवां अध्याय 


पंचग्रंथ (एशाशशा कं) 


... पुराने नियम की पहिली पाँच पुस्तकों को इब्नानी में तोरा (व्यवस्था) 
भ्रौर सप्तति अनुवाद में पेंतात्यूकोस (पाँच कुंडलपत्न) कहते हैं। वुल्गाता में 


... यूनानी का अनुसरण कर उन्हें पेंतात्युकुस कहा गया है । इनसे अंग्रेजी शब्द 





पेंतात्यूक बना है । 'तोरा' शब्द का अर्थ है निदेश अथवा आदेश । पहिले 


.. कदाचित्‌ इसका संबंध दिव्यवाणी के आदेशों से हो, जो किसी पवित्र-स्थान 
.._ अथवा नबी से प्राप्त हों । परंतु बाद में यह शब्द इन आदेशों के संग्रह के लिये 
.. प्रयुक्त होने लगा जो इस्राएल जाति के आचरण के आधार बन गए। त्यूकोस 
...... ((८ए०॥०७) शब्द का मूल अर्थ है पात्न या डब्बा जिसमें कुंडलपत्र या पांडलिपि 
..... रखी जाती थी । तब उसका प्रयोग कुंडलपत्न अथवा पांडलिपि के अर्थ में ही 







- किया जाने लगा। हिन्दी में उसका अनुवाद “ग्रंथ! किया गया | पेंतात्यूक (पंच 
. प्रंथ) शब्द का प्रयोग पहिली बार ई० स० दूसरी शताब्दी में हुआ । परंतु पांच 


.. भागों में व्यवस्था के विभाजन का संकेत कम से कम फीलो (मृत्यु लगभग 
.... सं० ५०) तक मिलता है, जो उत्पत्ति की पुस्तक को पांच पुस्तकों में पहिली 
मा पु पुस्तक कहता है । हल आ 


के यह ज्ञात नहीं है कि तोरा को पाँच भागों में विभ्वाजित करने के क्या 
कारण थे। एक कारण यह हो सकता है कि उसकी सामग्री को लिखने 


.... के लिये साधारण आकार के कदाचित्‌ पाँच कुंडलपत् लगे हों । 


पंचग्रंथ की पस्तकों के शीर्षकों के प्रयोग में अंग्रेजी बाइबलों में इब्रानी 


...._ सेपत्वागिता और बुल्गाता की परंपरा का नहीं, वरव्‌ 'मुसा' से संबंधित परंपरा 
... : का अनुसरण किया गया है । अंग्रेजी के अधिकृत अनुवाद में पंचग्रंथ की पुस्तकों... 
...- के शीर्षक हैं : मुसा की पहिली पृस्तक जो उत्पत्ति कहलाती है, दूसरी पस्तक 







..' जो निर्मेमन कहलाती है, आदि अंग्रे 









संबंध में कुछ सतके रहे हैं और उन्होंने “साधारणत: 





अंग्रेजी अनुवाद-संशोधनक्ता इस परपरा के रा हि | | ः । । द 




















पुराने नियमों पुस्तकों की भूमिका... न 8 


इस प्रकार शीर्षक दिए हैं : मूसा की पहिली पुस्तक, जो साधारणतः उत्पत्ति 
कहलाती है, इत्यादि । भारतीय भाषाओं के अनुवादों में इब्नानी, सेपत्वांगिता 
एवं वुल्गाता की प्रथा अनुसार केवल शीर्षक ही दिए गए हैं और मूसा के नाम 
का उल्लेख नहीं किया गया है । ह द 


पंचग्रंथ की रचना और रचयिता का विचार एक पृथक लेख में व्यवस्था 
विवरण पुस्तक की ध्रूमिका के पश्चात्‌ किया जाएगा । 


हम 

















५20४2 

















दसचाँ अध्याय 


उत्पत्ति नाम पुस्तक. 


2 रा जि इस पस्तक का इब्रानी नाम वरेशीत' (806४7) है। इब्नानी धर्मशास्त्र 


में यह पहिला शब्द है। इसका अर्थ है आदि में । सप्तति-अनुवाद में 'गेनेसिस 
 ((शा८5ं5) शब्द का प्रयोग हुआ है. जिसका अर्थ है, आरंभ, जन्म अथवा 
. मुलख्रोत' । वुल्गाता में युनानी का शीर्षक लिया गया। अंग्रेजी अनुवादों में 
. बुल्गाता के अनुरूप प्रयोग किया गया है। हिन्दी में इस यूनानी शब्द का 
..... अनुवाद उत्पत्ति! किया गया है। 
...._२. विषय-सामग्री का सारांश 



























..... उत्पत्ति की पुस्तक में जगत, मानव जाति और मनोनीत जाति के आरंभ 

7.४ का वर्णन है । 

(३) पृष्ठ ४० ५ 
... आदि में परमेश्वर ने सृष्टि की रचना केसे की (१:१-२:४) 
(२) मानवजाति का उद्गम (२:४-११:३२) 

... (क) मनुष्य का रचा जाना और पतन (२:४-४:२६ ) 
.... अदन की बारी में आदम और ह॒व्वा (२:४-२५) 
.. उनका आज्ञाउल्लंघन और निष्कासन (३) द 
. उनका पृत्र काइन, हृत्यारा और एक सभ्यता का निर्माता (४) 

० (ख) शेत से आदम के वंशन (५) ॥ 

2 . . (ग) दानव और मनुष्य की बुराई (६:१--८) 
(घ) जलप्रलय में नुह का बचाया जाना (६:६--९:२६ ) 

(चं) नृहकेंबंशंज- (१०). ० 

(छ) बाबुल में भाषा का गड़बड़फाला (११:१--६) 

(ज) शेम की शेवंशावली, तेरह के प्रवास तक (११:१०-३२) 


(३) कुलपतियों का इतिहास 





















उत्पत्ति नाम पुस्तक... ४७ 


(क) अब्नाम का वर्णन (१२-२५:११) 


([ ग ) याकब और उसके पत्रों का वर्णन ( के पलक का ३ 
बेचा जाना (३७); यहूदा के पृत्र (३८); यूसुफ बंदीगह 


अब्नाम का बुलाया जाना और कनानत जाना (१२); लुत से 
अलग होना (१३); राजाओं से युद्ध और मेल्कीसेदेक को 
दशमांश देना (१४); बलिदान द्वारा परमेश्वर के साथ 
वाचा (१५); हाजिरा का निकाला जाता (१६); खतना 


की वाचा (१७); सदोम और अमोरा का विनाश (१८-- 


१६); गरार में अब्राम (२०); इसहाक का जन्म (२१) 
इसहाक का बलिदान (२२); मकपेला कब्रस्ताव की भूमि 
(२३); इसहाक और रिबका की सगाई (२४); अब्नाम 
की मृत्यु (२५: १--११); परिशिष्ट : इश्माएल की 
बंशावली (२५: १२-१८ 


इसहाक और उसके पुत्रों का वर्णन (२५:१६--३५:३६ ) 

एसाव और याकूब का जन्म (२५:१६--२६); एसाव का 
अपना उतराधिकार बेचना (२५:२७-३४) ; गरार में अबी- 
मेलेक के साथ इसहाक की वाचा (२६); याकूब इसहाक का 
आशीर्वाद प्राप्त करता है (२७); याकूब का भाग जाता 
ओर स्वप्न (२८); पहनराम में याकूब का परिवार 
(२६-३१); याकूब का कनान को लौटता, स्वर्गद्त से 
मल्‍्लयुद्ध (३२); एसाव से पूनंसिलन (३३); दीना के 
भ्रष्ट किए जाने का बदला (३४); परमेश्वर याकूब को 
आशिष देता है, ३४ (१:१५); राहेल की मृत्यु (३५:१६ 


_--२७) ; इसहाक की मृत्यु (३५:२८--२६) ; परिशिष्ट 


एसाब की वंशावली (३६:१--४३ ) । 


में (३६--४० ); यूसुफ, फिरोन राजा का प्रधानमंत्री 


(४१) ; यूसुफ के भाइयों और पिता का मिश्र आना (४२- 


४७); याकूब का यूसुफ के पुत्रों को. आशिष देना (४८); 


याकूब का अपने सब पूत्रों को आशीर्वाद (४६) मकपेला 
मेंयाकूब की मिट्टी (६०)। 


४० रचना, रचयिता, तिथि 




































व... पुराना नियम की भूमिका 


. मृसा के साथ इसका संबंध साधारणतया इस रूप में समझा जाता है कि मूसा 

. इसका रचयिता था परन्तु यह संभव है कि मूसा की वाचा के संदर्भ में विधि- 
 बत्‌ धर्मसंबंधी अधिकार से उसका मूल संबंध रहा हो । जिस प्रकार का भी 
..._ संबंध सूसा से इस पस्तक का रहा हो, यह बात निश्चित है कि इस पुस्तक के 
..._ लेखक संबंधी समस्या उतनी सरल नहीं है जितनी साधारणतया दिखाई देती 
.. है। उतः २३ : १६ में लेखक इस तथ्य के स्पष्टीकरण को आवश्यक समभता 

है कि मम्रे उस काल में हेब्नोत कहलाता था । उसी प्रकार उत. ३५:६ में लृज 
नगर उस काल में बेतेल कहलाता था । उत्पत्ति २१:३४ में यह बताया जाता 

है कि अब्नाम पलिश्तियों के देश में बहुत दिनों तक परदेशी होकर रहा । इति- 

हास से यह पता चलता है कि पलिशती लोग मूसा के युग के बाद ही वहाँ 

. आए। इन संदर्भों का यह अर्थ है कि इनका लेखक कदाचित्‌ पलिश्तीन में 
.. निवास करता है और सुदूर अतीत की घटनाओं का वर्णन कर रहा है । 


यह कहना संभव है कि उपरोक्त संदर्भ किसी आगामी युग की छोटी छोटी 


... संपादकीय टिप्पणियाँ हों परन्तु समस्त पुस्तक फिर भी मूसा की है और कि 


पुस्तक बाद में लिखी गई हो। रचना, रचयिता और तिथि की समस्या के 


... संबंध में यहाँ उल्लेख मात्र कर दिया गया है, परन्तु यह समस्या समूचे पंचग्रंथ 
.. - की है और इसका विवेचन आगे पृथक स्थल पर किया जाएगा । 


._ ४. विशेष समस्याएं 


(१) सुष्ठि का बाइबलगत तथा वेज्ञानिक विवरण 
जब कोई वज्ञानिक उत्पत्ति के पहले अध्याय में सष्टि का वर्णन पढ़ता है 


.. . तो उसे यह प्रतीत होता है कि विभिन्न जातियों में जो सृष्टि की रचना संबंधी 
.... कहानियाँ हैं उससे इस वर्णन का बहुत साम्य है। इन कहानियों में जगत के 
.... अनेक भागों और जीव की विभिन्न कोटियों की सृष्टि दिव्यसत्ता द्वारा की गई. 
..... है। ये कहानियाँ जगत और जीव के उद्भव के संबंध में आदिम लोगों के मन- 
.... गढ़ंत सिद्धान्त प्रतीत होते हैं। उदाहरणाथे, यूनानी यह कहते हैं कि नुक्स अर्थात 
... रात्रि नामक पक्षी ने अंडा दिया, जिसमें से एरोस देवता अर्थात कामदेव उत्पन्न 
... हुए। उस अंडे के दो भाग आकाश और पृथ्वी बच गए, और इन दोनों ने पुरुष... 
.....  एवंस्‍्त्री के रूप में देवताओं की जाति को उत्पन्न किया | अंडे से नए जीव... 
..... की उत्तत्ति प्रत्येक युग में एक सुपरिचित घटना है। अत: आदिम मानव 
...... मस्तिष्क ने इस जगत के पदार्थों की अज्ञात सुष्टि को अंडे से बच्चे निकलने के... 
का रे रूप में देखा और इसी रूप में उसका वर्णन किया । इस संदंभ में यह जानना 
ः में कहा गया कि परमेश्वर की आत्मा का जल... 
बद उसी रूप में प्रयुक्तहोता है... 





....निक प्रमाणित करता है कि इस सृष्टि के निर्माण 


उत्पत्ति नाम पुस्तक. ... ४8 


जिस रूप में वह किसी पक्षी के अंडे सेने के लिग्रे प्रयुक्त होता है। 
वैज्ञानिक को बाइबल में प्रस्तुत सृष्टि-वर्णन भी ऐसी ही एक कथा-कहानी 
लगता है | उसे लगता है कि यह वर्णन अवैज्ञानिक, सृष्टि के उत्पत्ति के संबंध 
में सरल मन की मनगढ़ंत बात है और इसके लिये वास्तविक घटना का कोई 
पर्याप्त आधार नहीं है। साधारणतया यह माना जाता है कि बाइबल में सृष्टि 
का वर्णन बाबुल के सृष्टि-कथानक के सद॒श है । 

ऐसी कथा-कहानियों के विपरीत आधुनिक वेज्ञानिक सुष्टि संबंधी जो चित्र _ 
प्रस्तुत करता है, वह उन विश्वसनीय वैज्ञानिक पद्धतियों का परिणाम हैजो 
मानव-जीवन के विभिन्न पक्षों की खोज में खरी उतरी है। उदाहरणार्थ, वैज्ञा- 
निक चट्टानों की बनावट में विभिन्न परतों का मापन करना है । सदियों से 
जल-प्रवाह के द्वारा अपक्षरण के कारण चट्टानें जमती जाती रही हैं। साधारण 
जलवायु की स्थिति में सामान्य अपक्षरण कितना होगा, इसके आधार पर 
वैज्ञानिक यह गणना करने का प्रयास करता है कि पहाड़ों और मैदानों के बनने 
में कितना समय लगा होगा | इन्हीं चट्टानों की बनावट में जीवों के अवशेष 
उसे मिलते हैं। उनके आधार पर यह परिणाम वह निकालता है कि लाखों वर्ष 
पूर्व साधारण अथवा निचली श्रेणी के जीव-जन्तुओं का अस्तित्व था । उनके 
पश्चात्‌ निश्चित अनुक्रम से ही उच्च श्रेणी के जीबों का विकास हुआ जो 
आज तक चलता आ रहा है। इस जीव जन्‍्तुओं में कई आज विद्यमान नहीं 
हैं। उदाहरण के लिये. दीनासौर (भीम सरठ, एक दीघेकाय जीव ) किसी युग में 
थे जैसा उनके शिलाभूत रूप (70595) से ज्ञात होता है। आज वे. 
विद्यमान नहीं हैं । रा 

एक दूसरा उदाहरण लीजिए । धरती की बनावट पर संबंधित आँकड़े एकल 
किए गए हैं । धरती के तापक्रम, विभिन्न पदार्थों के ठंडे होने का वेग, सूर्य में... 
विभिन्न पदार्थों के संबंध में बर्ण-क्रम वीक्षण यंत्र (9900०0050098 ) द्वारा जानकारी 


था गति एवं गुरुत्वाकर्षण संबंधी प्रमाणित ज्ञान के आँकड़ों को वैज्ञानिक एक- 
ब्वित करता है। इस प्रकार के आंकड़ों को संकलित कर वैज्ञानिक एक सिद्धान्त... 
का निर्माण करता है कि सूर्य की घूृर्णा की समयावधि के अन्तर्गत पृथ्वी और .... 


अन्य ग्रहों का कैसे अस्तित्व हुआ । वैज्ञानिक के सिद्धान्तों की पर्याप्त परिमाण 


में जाँच और पुष्टि भी हो चुकी है। आज मानव ने जो उपग्रह छोड़े हैं उनसे रे 


इन सिद्धान्तों की पुष्टि होती है । बाइबल में सृष्टि संबंधी सिद्धांत की मान्य- 


.. ताओं का संसार भिन्न है। वहाँ छः दिन में सारी सृष्टि की रचना हुई । (दिन... 
. के संबंध में भी २४ घंटे का दिन ही मान्य किया गया प्रतीत होता है) । वैज्ञान... 





हा . बल के वर्णन में “बीजवाले छोटे-छोटे पेड़ और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज हे 





7 में लाखों वर्ष लगे । बाइ- 











श्रूछ |] ... पुराना नियम की भूमिका 


उन्हीं में एक एक जाति के अनुसार होते हैं --इन पेड़ों की सृष्टि न केवल 
.. मछलियों के पहले परन्तु सूर्य और चन्द्र के भी पहले हुई। यह वैज्ञानिक 
.. सिद्धान्तों के मूल सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। इसलिये यह कोई आश्चर्य की बात 

नहीं कि भूगभंशास्त्र अथवा जीवशास्त्र या प्राणीशास्त्र संबंधी किसी भी 


.. पुस्तक में बाइबल के वर्णन का मूल-सत्रोत के रूप में प्रयोग नहीं किया गया है। 
.. वैज्ञानिक बाइबल के वर्णन को कविता के अनुरूप मानता है। इस वर्णन से ऐसा 








लगता है कि वह कोई आदिम जाति की सृष्टि के कारण और उद्भव संबंधी कपोल 
कल्पना है, अत: उन्हें वह पौराणिक कथा (7एष॥) की कोटि में स्थान देता है । 

सृष्टि संबंधी वैज्ञानिक मान्यताओं के मूल्यांकन के लिये हमें वैज्ञानिक 
उपागम के स्वरूप को ध्यान में रखना पड़ेगा । वैज्ञानिक संकल्पना में हम यह 
कह ही नहीं सकते कि सृष्टि का कोई दिव्य रचयिता है। सच पूछा जाय तो 
विज्ञान की दृष्टि से सृष्टि का उद्भव है ही नहीं । वर्तमान में तथ्यों के आधार 
पर अतीत के लिये कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। जितना अधिक हम तथ्यों 
का संकलन करेंगे उतना ही अतीत में हम पीछे जा सकते हैं | पृथ्वी के उद्भव 
के संबंध में अध्ययन करने के उपरांत, वज्ञानिक सौर-मंडल के उद्भव के लिये 
सिद्धान्त बनाने के लिये प्रचुर तथ्यों का संकलन करता है । इसी प्रकार वह हमारे 


... कथित विश्व के अध्ययन की ओर चलता है जो विस्तृत जगत में केवल एक. 
...... द्वीप के समान है। वहाँ से वह अन्य द्वीप-विश्व के अध्ययन की ओर बढ़ेगा । इस 
... प्रकार हमारे ज्ञान के क्षितिज का विस्तार होता जाएगा । परन्तु यह संभावना 
....... सदा बनी रहेगी कि हमारे ज्ञान की वृद्धि हो और हमारे सिद्धांतों का संशोधन 
..... हो, ज्ञान की उत्तरोत्तर वृद्धि और सिद्धांतों के उत्तरोत्तर परिष्कार के पश्चात्‌ 
... भी हम परमेश्वर को नहीं पा सकते । इस पद्धति से परमेश्वर को पाना 
..... असंभव है, क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति के प्रारंभ में ही हमने उसे छोड़ दिया है। 

«... सच बात यह है कि अतिप्राकृतिक कारण की स्वीकृति को छोड़ काल्पनिक कथा _ 

..... वाला आदिम मानव और आधुनिक वैज्ञानिक के बीच यह गहरी आत्मीयता है 
..... कि दोनों ही वर्तमान तथ्यों अथवा ज्ञात अनुभवों से अज्ञात उद्भव की तकंणा... 

.... कर रहे हैं। दोनों के बीच वास्तविक अंतर यह है कि आदि मानव के पास 
... सीमित अनुभव और कम तथ्य हैं जब कि वैज्ञानिक के पास तथ्यों की ए 





_..... विशाल राशि है और और भी अधिक तथ्य संकलन की उत्तम पद्धतियाँ भी हैं।.. 








सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में धर्म वैज्ञानिक मान्यता वैज्ञानिक मान्यता से... 





ह . बहुत भिन्न है क्योंकि अनुभव एवं ज्ञान के प्रति धर्मवज्ञानिक उपागम बिलकुल । रा 


उत्पत्ति नाम पुस्तक... || यऑ्श्वः 


अपने आप को प्रकाशित किया है और कि इस घटना विधान की चरमसीमा जो 
ठे हुए और महिमान्वित यीश खिस्त में है । जो इस अनुमान को स्वीकार 
करता है वह सीधे सरल शब्दों में कहें तो (विश्वासी कहलाता है। किसी भी 
ज्ञान-पिपासु के समान विश्वासीः भी वर्तमान ज्ञात तथ्यों अथवा ज्ञात ऐतिहासिक 
कालों के आधार पर अज्ञात उत्पत्ति एवं उद्भवों के संबंध में निष्कर्ष निकालता 
है । यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि निष्कर्ष निकालने के लिये उसके पास 
भिन्न प्रकार के तथ्य हैं। उसके पास जो तथ्य विशेष रूप से विद्यमान हैं वे यीश 
के पुनरुत्थात तथा महिमान्वित होने की घटनाओं के रूप में परमेश्वर के कार्य हैं। 
इन तथ्यों की जानकारी के आधार पर उसे निश्चय है कि परमेश्वर है और कि 
परमेश्वर सब उत्पत्ति और सब अन्त से महान है और कि सारी वस्तुएँ उसकी 
सामर्थ एवं अभिप्राय के अधीन हैं । सृष्टि की उत्पत्ति में, वह उत्पत्ति चाहे जो 
हो, यह सामर्थ ही विश्वासी के लिये 'सृष्टि संबंधी सिद्धांतः है। अतएव वैज्ञा- 
निक के प्रतिकूल, विश्वासी इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आदि में परमेश्वर 
था और कि अन्य सब कुछ का अस्तित्व इसलिये हुआ कि यह उसका इच्छा 
थी, अर्थात्‌, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की” (उत्त० 
6 पे) 
इसके अतिरिक्त, यीशु का यह स्पष्ट अभिप्राय था कि जो उसमें विश्वास 
करें वे अनंतकाल के लिये परमेश्वर के वरदानों में संभागी हों | इससे यह 
तकंपूर्ण परिणाम निकाला जाता है कि अनंत परमेश्वर का यह अभिप्राय आदि. 
से है। दूसरे शब्दों में यों कहा जाए कि परमेश्वर ने जगत को विशेषकर मनुष्य 
के लिए बनाया और मनष्य को इसलिये बनाया कि वह उसके साथ अनंत संगति 





में रहे । यीशु सदेह रूप में मृतकों से जी उठा, अतएवं अनंत जीवन में देह और... 


आत्मा दोनों का स्थान है। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि आदि से ही 


परमेश्वर ने यह योजना की कि देह और आत्मा सहित मनुष्य अनंत संगति के... 


लिये बनाया गया और कि चाहे साधारण अथवा वैज्ञानिक मनुष्य की दृष्टिसे 


मृत्यु कितनी ही स्वाभाविक जान पड़े, परंतु परमेश्वर की मानव संबंधी मूल योजना... 


यु का कोई स्थान नहीं था। फिर यह आवश्यक हुआ कि संसार के पापों 


के लिये खिस्त मरे-यह भी धर्मवैज्ञानिक अनुमान का एक अंग है--अतः हमारा । 
यह उचित निष्कर्ष है कि सारी मानव जाति परमेश्वर से विलगता की दशा 


में है, अर्थात्‌ वह पाप की दशा में है, और कि यह दशा पीढ़ी से पीढ़ी 


. अतीत में रही है, और इस प्रकार समस्त मानव जाति को उद्धार की _ । | पा 
. आवश्यकता है, यहाँ तक कि यह आवश्यकता मानव जाति के आरंभ अर्थात्‌. 











प्रथम मनुष्य से ही है। यदि परमेश्वर ने मनुष्य की अपनी अनंत संग्ति के 





.. लिये सृष्टि की तो उसने मनुष्य को निष्पाप बनाया होगा । परंतु यदि 














ह "4 पुराना नियम की भूमिका 


सारी मानव जाति को उद्धार की आवश्यकता है, तो उसकी सृष्टि के 


.. पश्चात्‌ शीघ्र ही मानव का पतन हुआ होगा। सृष्टि और मानव जाति की 


पत्ति हमारे वस्तुबादी अवेक्षण से परे की बात है, क्योंकि उस समय 
परमेश्वर के अतिरिक्त और कोई उपस्थित नथा। परन्तु उस उत्पत्ति 
के प्रमुख लक्षणों के संबंध में ठीक निष्कर्ष इसी तथ्य के आधार 
पर निकाले जा सकते हैं कि परमेश्वर ने अपने अभिप्राय एवं योजना का क्‍या 
और कैसा प्रकाशन किया है। इस प्रकार यदि हम सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध 
में धर्मवैज्ञानिक उपागम का सहारा लें, तो हम तत्संबंधी एक ऐसे सिद्धांत 
. पर पहुँचते हैं जिसके लिये हमारे पास अन्य अल्प तथ्यों पर आधारित 
सिद्धांतों की अपेक्षा अधिक स्थायी आधार विद्यमान हैं । हम सृष्टि की 
 उत्पत्ति-मनुष्य की प्रारंभिक पाप विहीनता, परमेश्वर की योजना के अन्तर्गत 
. मानव जाति की एकता, और पाप की ओर मनुष्य का पतन और परिणाम 


... स्वरूप म॒त्यु संबंधी सिद्धांतों पर पहुँचते हैं । 


उत्पत्ति के संबंध में धर्म वैज्ञानिक उपागम स्वीकार करने में हमने 


..... खिस्त से संबंधित तथ्यों का उपयोग किया है क्योंकि खिस्तीय की दृष्टि से इन 
.. तथ्यों में पूर्णता और प्रसामान्यता है | परन्तु उस पद्धति का जिसके द्वारा स्थायी. 
.... एवं सत्य सिद्धांतों के संबंध में परमेश्वर के स्वयं प्रकाशन से निष्कर्ष निकाले 
... जाते हैं, केवल ख्िस्त के काल के तथ्यों के लिये ही नहीं वरन्‌ पुराने नियम के 
...... काल के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है । यद्यपि उत्पत्ति के पहिले अध्याय 
......_ का लेखक समय की दृष्टि से स्थिस्त से पहले हुआ, तथापि उसे पुराने नियम 
...... में परमेश्वर का प्रकाशन प्राप्त हुआ, जिसके द्वारा वह मूलतः उन्हीं सिद्धांतों . 
... की अनुभूति कर सका जो नये नियम में स्पष्टतया देखे जा सकते हैं। इन 
... / बड़ बड़े सिद्धांतों के ढाँचे में उत्पत्ति के लेखक को अपने युग की विचार एवं... 
.... भाषा सारणी का प्रयोग करना पड़ा। सब लेखकों को ऐसा करना पड़ता है।. 
..... . उसने सृष्टि को वैज्ञानिक की दृष्टि से नहीं, परंतु सब युगों के सामान्य मानव 
... की दृष्टि से देखा, जो सृष्टि को यथार्थवादी दृष्टि से देखता है और उसे 
..... स्थिर तथा चपटी अनुभव करता है तथा उसकी विविधता के दर्शन में आनंद 
.... .. प्राप्त करता है। पर यह बात सच है कि अन्य लोगों की अपेक्षा उसकी दृष्टि 
...... सच्ची थी, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा या वाचा के परमेश्वर के ज्ञान से दीप्त नेत्रों 


.._ से उसे देखा । 


















रे देखा कि आदिम पौराणिक कथाकार, 
तथ्यों के आधार पर अज्ञात 0 
हैं।परंतु ज्ञात बातों की विषय... 








उत्पत्ति नाम पृस्तक | प्र 


सामग्री प्रत्येक के लिये भिन्न है। कथाकार अपने अनुभव में आने वाली किसी 
भी घटना से अपने निष्कर्ष निकालता है, और मनुष्यों तथा पशुओं में भी जो 
 दर्बलताएँ अथवा विशिष्टताएं उसे दिखाई देती हैं उतका कारण ईश्वर को ही. 
मानता है। वैज्ञानिक वस्तुवादी अथवा ईश्वर-निरपेक्ष वस्तुओं के समूह के 
आधार पर अपने निष्कर्ष निकालता है। धर्म वेज्ञानिक विश्वासी इतिहास में 
प्रमेश्वर द्वारा स्वयं के प्रकाशन के आधार पर निष्कर्ष निकालता है । यदि 
वैज्ञानिक विश्वासी भी हो, अथवा विश्वासी वेज्ञानिक भी हो, तो उचित 
परिपेक्ष्य में उत्पत्ति की पस्तक के प्रारंभिक अध्यायों का चिरंतन महत्व जाना 
जा सकेगा | बाइबल के लेखक ने जो कुछ परमेश्वर और मनुष्य के संबंध के 
विषय में कहा है वह आज भी उतना ही सत्य जान पड़ेगा जेसा पहले था 
और सदा वैसा ही सत्य जान पड़ेगा । जगत के विषय में हमारे ज्ञान का जितना 
भी विस्तार विज्ञान करता है उससे हमें सृष्टिकर्ता एवं उद्धारकर्ता परमेश्वर 
की नम्नतापूर्वक सराहना करने का अधिकाधिक विस्तुत आधार प्राप्त 
होता है द 


(२) उत्पत्ति के वर्णनों की ऐतिहासिकता 


ऊपर बहुत सामान्य रूप में जगत और मनुष्य की सृष्टि संबंधी वर्णनों का 
विवेचन किया गया है। उन पर और अधिक विचार करते हुए हमें यह पता 
चलता है कि मानव जाति के प्रारंभिक काल के संबंध में उत्पत्ति की पुस्तक 
में अनेक वर्णन हैं। उसमें कनानी सभ्यता, वंशजों की सूचियाँ, जलप्रलय, 
भाषाओं की गड़बड़ी और अंत में कुलपतियों के वर्णन भी सम्मिलित हैं । इन _ 
सब वर्णनों में अनेक स्थानों पर तारतम्य का अभाव है। उदाहरणार्थ, इस 
बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि कैन की पत्नी कहाँ की थी (उ.- 
४: १७:) अथवा भनुष्य की विकृति के वर्णन में 'दानव' का प्रादुर्भाव कहाँ से हुआ. 


(उ. ६: ४) । सप्तति अनुवाद और सामरी पंचग्रंथ की तुलना में मसोरेतिक | रा 


पाठ में शेत के वंशजों की आयु भिन्‍न है। जलप्रलय के वर्णन में विभिन्न 
परंपरा से आए तंतु दिखाई देते हैं, जैसे नुह की नौका में शद्ध पशुओं की संख्या 


 (उत. ७:२, ६) । कुछ वंशावलियों के वर्णनों से ऐसा लगता है मानों वि 
जातियों का भौगोलिक विभाजन हों (उत. १०: २२, २३; २४:२) | ऐसी 
. ऐसी विशिष्टताओं के कारण यह मान्यता की जाती है कि उत्पत्ति के वर्णन... 
.. और अन्य अभिलेख कतिपय प्राचीनता परंपराओं से संकलित हैं जो लेखबद्ध 
: होने से पूर्व मौखिक रूप से पीढ़ी पीढ़ी में चलती आ रही थीं । उत्पत्ति ६:४ 


में जिस प्रकार की मौखिक परंपरा का 





संकेत है उस प्रकार की परंपराएं दंत... 


.._ कथाओं के समान मानी जाती हैं, और आज के वैज्ञानिक ऐतिहासिक अध्ययनों... 











भू . पुराना नियम की भूमिका 


में बड़ी सत्ता से ही उनका उपयोग किया जाता है । दूसरे शब्दों में यों कहें 
कि ऐतिहासिक उद्देश्यों की दृष्टि से मौखिक परंपराओं का मूल्य समकालीन 


अथवा निकट समकालीन लेखों की उपेक्षा बहुत न्यून है । इसका कारण यह है 


 क्रथाओं के मौखिक वर्णन में कथाकार अपनी ओर से रंग भरकर 


.. ही कथा कहता है। उपरोक्त तकों के आधार पर उत्पत्ति के वर्णनों 
के प्रति विशेषकर पहले ग्यारह अध्यायों के वर्णन के प्रति शंकाएं व्यक्त 


गे गई हैं। कुलपतियों के व्यक्तित्व (अध्याय बारह और क्रमिक अध्याय) 
के प्रति भी शंका व्यक्त की गई है क्योंकि हम यह जानते हैं कि प्राचीन 
युग के लोग किसी कल्पित पूर्वज का नाम लेकर अपनी ख्यात एकता का स्पष्टी 


... करण किया करते थे । उदाहरणार्थ, यूनानी या हेलनी लोग तीन समूहों में अपने 





. अस्तित्व के स्पष्टीकरण में यह मान्यता प्रस्तुत करते हैं कि वे किसी कल्पित पू्वज 
हेल्लन के तीन पुत्र एओलस, दोरस और अखेयस के वंशज हैं। मिजराम 
(मिस्र) के वंश में लुदी, अनामी, लहाबी, नप्तूही जातियां बताई गई हैं (3० 


५० .. १० : १३) | इसी के अनुरूप यह कहा जाता है कि उत्पत्ति की पुस्तक में 
..... वर्णित कुलपति, जिनमें याकूब के पृत्र भी सम्मिलित हैं, ऐतिहासिक पुरुष नहीं 
... थे, वरन्‌ कल्पित पूर्वज थे । । 







ऐतिहासिकता की समस्या के विषय में इतना कहना आवश्यक है कि उन 


.._ लोगों की अपेक्षा जिनके पास लिखित अभिलेख हैं उन लोगों की स्मरणशक्ति 
.... अधिक सशक्त एवं यत्नशील रही है जिनके पास लिखित अभिलेख नहीं रहे हैं । 
.. . फलस्वरूप इसे विचार को प्रश्नय दिया गया है कि प्राचीन परंपरा के लिये 
..... ऐतिहासिक आधार अवश्य विद्यमान है । इसके अतिरिक्त इस्राएल जाति संबंधी 
.... दो प्राचीनतम मूल स्रोत (जिनका विवेचन आगे किया जाएगा) में बहुत 
.... अधिक अंशों में मत साम्य है। कुलपतियों के वर्णनों में 'कथन एवं अभिव्यक्ति... 
... में बड़ी संयमशीलता है। बाइबलेतर कथाओं में जिस प्रकार का चमत्कारिक 

... तत्व विद्यमान है और जिससे उनकी ऐतिहासिकता में संदेह की भावना: 


त्पन्न हो जाती है, वसा तत्व कुलपति संबंधी वर्णनों में नहीं है । चमत्कार का 


। रे - अंश केवल उन घटनाओं में है जिनमें परमेश्वर इन कुलपतियों पर अपने आप 
... . को प्रकट करते हैं, परंतु कुलपतियों के क्रिया-कलापों तथा विभिन्न स्थानों को 


। आने जाने में उनमें एक स्पष्ट यथार्थ व्यक्तित्व दृष्टिगोचर होता है। अतः 


यद्यपि वंशावलियों के कुछ वण्णनों में ( उदा. उत. २५: १-४) वास्तविक वैय-.._ 
... . क्तिकता के विषय शंका की जा सकती है, तथापि यह साधारणतया स्वीकार _ 








किया जाता है कि कुलपति ऐतिहासिक व्यक्ति थे । 





खत 
हा गण है जल 

















उत्पत्ति नाम पुस्तक........//|/|/॥ #३ 


प्रलय का वर्णन जिसका बाबुल की लोक-कथाओं से बहुत साम्य है, इतनी 
विस्तृत रेखाओं में अंकित है कि वैज्ञानिक दृष्टि से वह शब्दशः मान्य नहीं 
किया जा सकता । फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह केवल कपोल- 
_कल्पित बात है । कारण यह है कि बाबुल के ऊर और कीश त्ामक स्थानों 
में खदाई से यह पता चला है कि वहाँ जलप्रवाह के द्वारा बालु और चट्टानों 
का ऐसा जमाव पाया जाता है जिससे सभ्यता के विभिन्न चरणों का संकेत 
मिलता है। वहाँ जलप्रलय-पू्वें दस राजाओं की परंपराओं के अभिलेख भी 
प्राप्त हैं, जो संख्या की दृष्टि से उत्पत्ति ५ में प्रस्तुत दस पीढ़ियों के अनु 
रूप हैं । अब्राम के युग में जातियों का प्रवास प्राचीन इतिहास की प्रमाणित 
घटना स्वीकृत हो गई है। पुरातत्वविद्या की खोज में कुलपतियों के नामों 
की भी लगभग पृष्टि होती है । अब यह पता चला है कि हारान (उत. ११: 
३४; १२: ४) अब्राम के युग में एक अमूरी केन्द्र था | अब्राम नाम का भी 
अमूरी नाम अबमराम से और याकब का याकूबएल से साम्य है, और विन्या- 
मीनियों को उत्पात करने वाली जाति कहा गया है।मारी (2४७४) की 
कीललिपि शिलाओं में नखर, तिलतुराखी, सरुगी ओर फलिग जेसे नाम 
पाए जाते हैं जिनका अनब्नाम के कुट्म्बियों के नामों से--नाहोर, तेरह, सरूग 
पेलेग-अपूर्व साम्य है। अतः पुरातत्व विद्या के साक्ष्य के आधार पर भी 
प्रमाणों का पलड़ा इसी पक्ष में भारी है कि उत्पत्ति की पुस्तकों की परंपराएँ 
ऐतिहासिक आधारों पर विद्यमान हैं । 


६. उत्पत्ति की पुस्तक की धर्मेशिक्षा द 
उत्पत्ति की पुस्तक का आंरभ सृष्टि के सिद्धांत से होता है-“आदि में 
परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की ।” यह अत्यंत उचित है। बाबुली 
जाति तथा अन्य जातियों में देवताओं के संघर्ष से सष्टि की उत्पत्ति की घारणाएँ 
मिलती हैं । “उत्पत्ति की पुस्तक में एक परमेश्वर की परम सत्ता और अधिकार 
के संबंध में कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया है । साथ ही बह एक परमेश्वर 
मानव के चितन की उपज नहीं है वरन वह है जिसने अपने आपको इस्राएल 
जाति के इतिहास में और अंत में खिस्त में प्रकाशित किया है। ः 


यह सिद्धांत कि परमेश्वर ने अपने आप संगति के हेतु और अपने स्वरूप 
के अनुसार मनुष्य को उत्पन्न किया उपरोक्त सिद्धांत से ही निसृत है (उत्त. १६... 
२७; २: 5) | इसमें यह तथ्य निहित है कि जिस रूप में परमेश्वर ने मनुष्य. 
की रचना की उसमें वह निष्पाप था । इसके पश्चात्‌ मनुष्य के पाप में पतित 
होने तथा उसके फलस्वरूप परमेश्वर की संगति 




















मे पृथक होने का सिडात है ५ क्‍ 

















| ५६... पुराता नियम की भूमिका 


समक्ष आशा की एक किरण अथवा बराई की शक्ति पर अंतिम विजय का 
सुझाव प्रस्तुत किया जाता है (उत. ३: १५) 


... जलप्रलय और नूह के बचाए जाने में (उत. ६-६), तथा सदोम और 
अमोरा के विनाश और अक्नाम द्वारा लूत के बचाए जाने में भी परमेश्वर 


... न्याय और दया का दर्शन होता है (उत. १८-१९) । 


अब्रहाम ( इब्राहीम ) की बुलाहट (उत. १२: १; १५: ७) निर्वाचन- 
सिद्धांत का उदाहरण है । परमेश्वर अपने अभिप्राय के लिये जिसका वह चाहे 
_ उसका स्वतंत्न रूप से निर्वाचन करता है और उसे बुलाता है। अब्रहाम के. 
. साथ वाचा और प्रतिज्ञा से यह प्रदर्शित होता है (उत. १५: १८; १७:२ ) 
कि मनुष्य के साथ नियंद्ित संबंध के द्वारा परमेश्वर ने कैसे मनुष्य के उद्धार 
की योजना का प्रांरस किया । कुलपतियों की जीवनियों और मिस्र में प्रवास 
के द्वारा परमेश्वर के अभिप्राय एवं योजना का विकास प्रतीत होता है। 


.... परमेश्वर के मूल गुण धामिकता' की व्यंजना भी अन्नहाम के महान शब्दों में 





होती है, “क्या सारी पृथ्वी का न्‍्यायी न्याय न करे ?” (उत. १८: २५) । 











ग्यारह॒वाँ अध्याय 
निगसन 


१. शीर्षक हा करि 
इस पुस्तक का इब्रानी नाम वएलल्‍्ले शमोत अथवा केवल शमोत है। 
इब्नानी पुस्तक में प्रारंभिक वाक्य के प्रमुख शब्द हैं। इनका अर्थ है “ये नाम 
हैं” अथवा केवल नाम । सप्तति अनुवाद में शीर्षक 'एक्सोदॉस' है | यह युनानी 
का शब्द है जिसका अर्थ निर्मम मार्ग! अथवा “निर्गमन' है। वुल्गाता में यूनानी 
शीर्षक कुछ बदलकर एक्सोदु्स किया गया है और अंग्रेजी अनुवादों ने वुल्गाता 
का अनुसरण किया है | भारतीय अनुवादों में यूनानी शीषंक का अनुवाद किया 


गया है । हिन्दी में “'निर्ममनः' है 


२० विषय सामग्री का सारांश 
'निर्गममन' ताम पुस्तक में पमेश्वर के महाकाय॑ अर्थात इस्राएलियों के छट- 
कारे तथा उस जाति एवं परमेश्वर के बीच वाचा के द्वारा इस्राएल राष्ट्र के 


जन्म का वर्णन है। परमेश्वर ने वाचा के द्वारा इस्राएल को अपनी ओर 


किया । 


३. रूपरेखा 


निर्गममन : परमेश्वर ने इस्राएल जाति को कैसे वाचा के द्व 7रा अपनाया हु 
१) मिस्र में इस्राएली लोग (१-११ 


इस्राएलियों के साथ कठोर व्यवहार (१-२); इस्राएलियों 

का बढ़ना (१:१-७) ; नया फिरोन राजा और दमन नीति 
१:८--२२) ; मूसा का पालन-पोषण (२:१-१०); मूसा 

का एक मिस्री को घात करना और मिद्याव को भाग जाना 


(२:११-२३ ) ; दासत्व में ऋ्रदेत ( २:२३-२४५ 


ख) जलती भाड़ी के पास मूसा की बुलाहट (३--४); भाड़ी, 
आदेश, नया नाम याह वे (३); बहाने और आश्वासन (४: 




















 भ्र८.. पुराना नियम की भूमिका 


(ग) विपत्तियाँ (१-११); फिरौन द्वारा दमन में अधिक कठोरता 
और परमेश्वर का अपनी प्रतिज्ञा का पुनंकधत (५- 
१३); मूसा और हारून के पूर्वज (६:१४-२७ ) 
और हारून का फिरोन के पास जाता, और फिरौन के मन 
की कठोरता (६:२८५--७:१३ ); मूसा के कहने पर परमे- 
श्र मिस्र पर नौ विपत्तियाँ भेजता है 
जाना, मेंढक, कुटकियाँ, डांस, भारी मरी, फोड़े, ओले, 
'टिड्डी, अंधकार --साथ ही दसवीं विपत्ति की धमकी (७: 
१87१5489 


(२) परमेश्वर इस्राएल को मिश्र की बंधुवाई से छड़ाता है ( 
. ++-१८ ) । | 
(क) फसह का पर्व और मिस्र से भागता (१२-१३); फसह 

के लिये निदेश (१२:१-२०); दसवीं विपत्ति (पहिलौठों 
का मारा जाना) और मिस्र से निकलना (१२:२९-४२), 
फंसह की विधि और पहिलौठे (१२:४३-१३:१६) ; 
बादल के खंभे और आग के खंभे की अग॒वाई (१३:१७- 
२२). । 

. (ख) लाल समुद्र पर परमेश्वर द्वारा छूटकारे का महाकार्य (१४- 

हे १५:२१); गद्यात्मक वर्णन (१४); मूसा और मरियम का 
गीत (१५:१-२१) 


गम (ग) सीने को यात्रा (१५:२२-१८:२७) : एलीम को आता. 

























हा 


(१७:१-७); अमालेकियों से लड़ाई (१७:८-१६); मसा 
ला, को यित्रो का पराम्श (१८) । 5 3 
..._ (३) सीने पर परमेश्वर का दर्शन और वाचा (१६-४०) रे 
... (क) परमेश्वर भयावहु और पवित्न है, पर्वत के पास आने की 

शत (१६:१-२०:२१) ; अगम पर्वत (१६:१-१६), मध्यस्थ 


रा लोगों में भव (२०:१८-२१)। हा 
2005 हे । द (ख) वाचा का विधान अथवा वाचा की पुस्तक (२०:२२-२३ 


है--जल का लोह बन... 


(१५:२२-२७) ; बढेरें और मन्‍ना (१६); चट्टान से जल. हि 


के रूप में मूसा (१६:२०-२५) ; दस आज्ञाएँ(२०:१-१७) | . 


वा 

















ह। 





निर्गमन * ५. कर जन मा | ६ 

२१:१-२२:१७) ; नैतिक एवं नीति विधान (२२:१८- द 

२८; २३:१-६) । द द 
परमेश्वर की प्रतिज्ञा कि एक दूत प्रतिज्ञा के देश में अगुवाई 


रेगा (२३:२०-३ ३) । 


बाबा का बाँधा जाता (२४:१-११): वादा की पुस्तक 
और लोह (२४:१-८) ; परमेश्वर का दशेन और पवित्न भोज 


(२४:६-११) 
मसा को पर्वत पर साक्षी की पटियाएं और आज्ञाएं दी जाती 
है (२४:१२-३१:१८): परमेश्वर छ दिन के पश्चात तेजोमय 
भेघ में से बात करता है (२४:१२-१८); वाचा के संदूक, 
प्लेट की रोटियों के लिये मेज, दीवट, परदे, चौखटे बीचवाला 
पर्दा, तंबू के परदे, वेदी, आंगन और दीपक के लिये निदश 
२५-२७) ; परोहित, हारून ओर उसके पत्नों-एपोद और 
सीनाबन्द, एपोद का वस्त्न, जामा, परोहित का टोप, हारून 
के पत्नों के लिये अंगरखे के लिये निर्देश (२८५); उनके 
समर्पण एवं कतेव्यों के संबंध में निदेश (२६); है की 
वेदी (३०:१-१०); गिनती करना प्रायश्चित का मोल 
(३०:११-१६); होदी, तेल और धूप (३०:१७-३८ ) 
बसलेल और ओहोलीआब कारीगरों की नियक्ति (३१:१ 
११); सबत पालन (३१:१२-१७ ); साक्षी की पदियाएं 
(३१:१८) । 
इस्राएलियों का विश्वासबात (३२-३३); सोने का बछूड़ा 
(३२:१-६); परमेश्वर एवं मूसा का क्रोध--पटियाओं का _ 


तोड़ा जाना (३२:७-२४); लोगों को दंड (३२:२२५-२६ 


मसा लोगों के लिये निवेदन करता है और परमेश्वर अपनी हु 
उपस्थिति की प्रतिज्ञा करता है (३२:३०-३३:२३)॥ 


बाचा का पनः किया जाना और पटियाओं पर पुन लेखन. 
३४): नई पटियां (३४:१-६) ; वाचा के वचन--जै-दस 


आज्ञाएं अथवा 'उपासनात्मक दस आज्ञाएं (३४:१०-२६) 


पर्वत पर ४० दिन रहने के पश्चात्‌; मूसा के मुख की दीप्ति 
३४:२७-३४५ | 














हा इं० प्राता नियम की भमिका 


के निदेशों का पालन (३६:८-३६:४३ ) ; मिलाप वाले तम्ब 
की प्रतिष्ठा और उस निवास स्थान पर यहोबा का तेज 
क्‍ (४०) | 

४. रचना, रचयिता, रचना-तिथि 


. परंपरा के अनुसार निर्ममत नाम पुस्तक सूसा की दूसरी पुस्तक कहलाती 
है । इस शीर्षक से लेखक का संकेत होता है । इस शीर्षक में कदाचित्‌ मूल अभि- 
प्राय केवल धामिक अधिकार का ही रहा हो । इस पुस्तक के सूक्ष्म अध्ययन 
से यह परिलक्षित होता है कि पूर्ण निश्चय के साथ यह नहीं कहा जा सकता 
कि मूसा ही इस पुस्तक का रचयिता है। यह तो स्पष्ट है कि सूसा ने एक 
पुस्तक लिखी (नि० २४:७) परंतु इस संबंध में कथन ऐसा नहीं है 'मैं ने लिखा! । 
यदि सूसा लिखता तो हम यह अपेक्षा अवश्य करते कि वह यह कहते 'मैं ने 
. लिखा” ! वास्तविकता यह है कि मूसा के संबंध में ऐसा लिखा गया है मानो 
कोई अन्य व्यक्ति इस पुस्तक को लिख रहा हो । इसके अतिरिक्त जैसे उत्पत्ति 


.. की पुस्तक में वैसे ही इस में भी लेखक इस बात का उल्लेख करता है, “जब 
..... फिरौन ने लोगों को जाने की आज्ञा दे दी, तब यद्यपि पलिश्तियों के देश होकर 
.. जो मार्ग जाता है वह छोटा है” (१६:१७), जिससे यह प्रतीत होता है कि. 
....  पलिश्ती लोग मानो उससे पूर्व कनान में थे। इतिहास से हमें यह ज्ञात होता है 
.... कि पलिश्ती लोग वहाँ मूसा के पश्चात आए, अतः १३:१७ के शब्दों के आधार पर 
.... यह कहा जा सकता है कि वे ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखे गए जो मृसा के परवर्ती 
.. काल में पतिश्तीन में था | यहाँ इतना संकेत मात्र किया गया है। रचयिता 
के संबंध में पंचग्रंथ' के विवेचन में पुनः विचार किया जायेगा । 
हा ५० विशिष्ट समस्याएं. 






(कक) निर्गेभनन की तिथि 


.... .  सिस्र से निर्गमन की तिथि के संबंध में विभिन्न मान्यताएं सप्रमाण प्रस्तुत... 
... की गई हैं। दो मान्यताएं साधारणतया स्वीकार की जाती हैं। एक, कि 
.. ई० पू० १५ वीं सदी में निर्गम हुआ | दो, कि १३ वीं सदी में हुआ । सुप्रसिद्ध 
.. .. पुूरातत्ववेत्ता डबल्यू, एफ० औलब्रोइट ई. पू. १३ वीं. के प्रारंभ में निर्गंण की 
.. तिथि सानते हैं। है 


... (६) १५ वीं सदी संबंधी प्रमाण:--१ राजा ६:१ में यह कहा गया. “ 
० 5 है कि सुलेमान राजा ने अपने राज्य के चौथे वर्ष में मंदिर क्‍ 


का निर्माण आरंभ किया और कि यह इस्राएलियों के मिल... हा था, 





वर्ष पश्चात था । यदि सुलेमान के राज्य गा ः 
थिईपू० ९५६मानी जाय (इसतिथि...... 























निगंममा....... ४० हक 


पर मत वैभिनन्‍्य १० वर्ष इधर उधर है), तो निगर्मम ई० 


पुृ० १४३६ में अर्थात अमेनहोतप फिरौन अथवा अमेनोफिस 
द्वितीय के राज्य में (१४३६-१४२३ ) हुआ होगा। इससे 
पिछला अर्थात थुतमोसिस तृतीय फिरोन (ई० पु० १२४६ ०- 


१४३६) वह फिरौन था जिसके राज्य में दमन हुआ. 


(नि० १:८५; २:२३) । थुतमोसिस तृतीय मिस्री विजेताओं 


में सबसे महान विजेता हुआ है। उसने भवन-निर्माण कार्य 


भी बहुत किया और इसमें उसने अपने प्रधान मंत्री रेख- 
माइर की अधीक्षण-योग्यता की सहायता ली। रेखमाइर 
के स्मारक पर ईंट बनाना चित्रित है। यदि ये घटनाएं 
स्वीकार की जाएं तो फिरौन की पुत्री (नि० २:५--१० ) 
थुतमोसिस प्रथम (ई० पू० १५२५--१४६५) की विख्यात 
पत्री हतशेपसुत हो सकती है जो लगभग एक पीढ़ी तक मिस्र 
की व्यवहारिक रूप में शासिका थी । 

तैरहवीं सदी संबंधी प्रमाण-इस्राएलियों ने “दमन करने वाले 
फिरोन के लिये पितोम और रामसेस नाम भंडार गहों 
को बनाया (नि १:११) । इनको रामसेस द्वितीय (ई० पू० 


१३०१--१२३४) और कदाचित्‌ उनके पितः सेती प्रथम 


(ई० पू० १३१६- १३९१) के भवन-निर्माण कार्यक्रम के 
अन्तर्गत प्रायः पूर्ण निश्चय के साथ माना गया है। फिरौन 
राजाओं में रामसेस द्वितीय को सर्वश्रेष्ठ भवन निर्माता 
माना गया है। अपने पूर्वजों के विपरीत उसने नील नदी 
को मुख-भूमि (6०॥8) में भवन निर्माण प्रायोजनाएं कीं ॥ 
गोशेन में रहनेवाली इस्राएल जाति से वहाँ बड़ी सरलता 
से बेगार ली जा सकती थी । इस प्रकार रामसेस द्वितीय 
दमन करने वाले 'फिरौन' के चौखटे में ठीक बैठता है । इस 
दृष्टि से उसके पुत्र मरनेप्ताह (ई० पृु० १२३४-१२२२) के 
शासन काल में निर्गमन हुआ होगा । यहाँ एक कठिनाई 
उत्पन्न होती है। मरनेप्ताह के एक स्मारक स्तंभ अभिलेख 


में इस्राएलियों पर उसकी विजय की तिथि ई० पूृ० १२२६ 


! गईं है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस्राएलियों को मिस्र 


से निकलकर पलिश्तीन पहुँचने के लिये केवल चार वर्ष ही 




















पराना नियम की भूमिका ._ 


 इस्राएली थे जो कदाचित कभी मित्र कोन आए और इस 
प्रकार मिस्र से निर्गंम करते वाले इस्रालियों में न थे, अथवा 

द यह मानता पड़ता है कि उक्त स्तंम की प्रमाणिकता और 
.... निर्वंचन का और गहन समीक्षात्मक अध्ययन आवश्यक है । 


(7) तेरहवीं सदी के प्रारंभ संबंधी प्रमाण-इस मान्यता के अनु- 
सार दमन करने वाला फिरौन सेती प्रथम (ई० पृ० १२१६ 

. “१३०१) था जिसे पितोम ओर रामसेस का भन्‍्डार गहों का 
आरंभ करने वाला माना जा सकता है। तब रामसेस द्वितीय 

के समय (ई० पू० १३०१--१२३४) में निर्मम हुआ 
होगा । इस मान्यता के आधार पर यह संभव हो जाता है 

कि इस्राएली लगभग ४० वर्ष पश्चात्‌ पलिश्तीन पहुँच गए 

और कि अगले फिरौन अर्थात मरनेप्ताह (ई० पू० १२३४- 
१२२२) ने ई० पू० १२२६ में इस्राएलियों पर आक्रपण 

.. किया। इस संबंध में यह भी द्र॒ष्टव्य है कि मरनेप्ताह के स्तंभ 
.. में इस्राएल शब्द का जिस रूप में प्रयोग किया गया है उससे 
. प्रदेश के बदले जाति का बोध होता है, और साथ ही यह 
.. इंगित होता है कि वे अभी तक पूर्णतया स्थापित जाति नहीं 
हों पाए थे 0 जा हल 

























कै. प्रातत्वविद्या की खोज से पता चलता है किई. पृ. 
.. १३वीं सदी के उत्तराड्ध में पलिश्तीन के नगरों का व्यापक 
... विनाश हुआ | इन खोजों से भी निर्ममन संबंधी इस मान्यता 
. की पुष्टि होती है। बेतेल, लाकीश, एग्लोन दबीर और 
-..  हजोर में जो खुदाई हुई है उनसे इस प्रकार के प्रमाण... 
.... उपलब्ध हुए है। बेतेल और हजोर का विनाश सबसे अधिक 
... हुआ । यहोश के नेतृत्व में इस्राएलियों द्वारा पलिश्तीन पर 
.... आक्रमण के आधार पर पुरातत्वविद्या के इन प्रमाणों का 
.. स्पष्टीकरण सरलता से किया जा सकता है। निर्गम के 
.... संबंध में दूसरी अर्थात्‌  तेरहवीं सदी की मान्यता की 
.. इपौपृष्टि में भी इन प्रमाणों का प्रयोग किया गया है । 







निर्गेमन की. तिथि 





जभी बाइबल के अध्येताओं के... 
हैं। इसपुस्तक का लेखक ई. ४. 
अधिक संभाव्य तिथि मानता है। ... 














242 ५८ कक पक 


निगेममन........|| इ्ुहे 


(ख) सोने अथवा होरेब पहाड़ कहाँ है 


परंपरागत मान्यता यह है कि सीने पहाड़ सीनाई प्रायःद्वीप के दक्षिणी 


भाग में एत-तूर पर्वतश्रेणी का एक पहाड़ है। इस पर्वत-श्रेणी की प्रमुख चोटियाँ 


येबेल केथरिन (5,५५१ फूट), येबेल मूसा (७,५१६ फुट), रास एस-सफसफेह 
(६, ६३७ फूट), और येबेल सरबल (६,७५६ फुट) हैं । येबेल सरबल अन्य 


तीन से २० मील दूर है। रास एस-सफसफेह को येबेल मूसा का ही भाग 
माना जाता है क्योंकि वह येबेल मूसा की उतर पश्चिम ओर लगी हुईसी 
लगती है। रास एस-सफसफेह, अर--रहाह की समतल भूमि पर एकदम ऊंची 


उठी हुई लगती है । यह समतल भूमि उसके उत्तर पश्चिम में है । यह समतल 


भूमि इस्राएलियों की छावनी के लिये उपयुक्त स्थान रहा होगा । यह सीधी 
ऊँचाईवाला गौरवशाली पहाड़, अपनी खड़ी विशाल बहुरंगी चट्टानों सहित 
बाइबल के वर्णन के उपयुक्त प्रतीत होता है । निकट ही घाटी में संत केथरीन 
का कॉनवेंट है जहाँ कोदेक्स साइनातिकूस मिला | गेबेल मूसा की चोटी के पास 
ही इलीशा का छोटा गिर्जाघर है । 


कलीसिसाई इतिहासकार युसेव (२६४--३४० ई. सं.) से एक और 
प्रंपरा चली आई है, जिसमें बाइबल के सीने या होरेब पहाड़ और येबेल 
सरबल को एक माना गया है। येबेल सरबल के पास वादी फीरान नामक 
शाहइलभूमि है जिसे रपीदीम (१७:८) का स्थान माना गया है ,परन्तु यहाँ 
इतना बड़ा मैदान नहीं है, जितना रास एस-सफसफेह के पास अर-रहाह है 
जो इस्राएलियों के छावनी के लिये उपयुक्त होता । 


इनसे भिन्न एक और मान्यता है जिसमें सीने या होरेब पहाड़ को उत्तर ॥ 


पश्चिम अरब में स्थित माना है । यह साधारणतया मिद्यानियों का देश है 


(नि० २:१५; ३:१, १२) । अकाबा की खाड़ी के पूर्व की ओर जो पहाड़. 


हैं, उनमें कुछ पहाड़ पहले ज्वालामुखी थे । इस मान्यता से बाइबल के 
सीने पर्वत के उस वर्णन की पुष्टि होती है जिसमें सीने पहाड़ सेआग और 


 धुआ निकलता है (नि० १८:१५) । इसके अतिरिक्त न्यायियों ५:४,४ में यह 
निहित है कि सीने पहाड़ सीअर के प्रदेश में था । यह एदोमी देश था, जिसके 

उत्तर में मिद्यान दश लगा हुआ था । इस मान्यता के अनुसार लाल समुद्र का... 
पार किया जाना अकाबा की खाड़ी के उत्तरी भाग में हुआ होगा, स्वेज की... 


_ खाड़ी के उत्तर में नहीं जसे कि साधारणतया माता जाता है। 








. क्षे क्षेत्र में उसका स्थान, वादी अरिश (मिस 





सीने की स्थिति के संबंध में अन्य माच्यताएँ भी हैं जिनमें कादेश-बनिया । 























द्दड का .. पराता नियम की भमिका 


. ८:६५) के ऊपरी भागों में हलाक पहाड़ को, और एदोम में सिअर को माना 
जाता है। हू 

परंपरागत मान्यता कि येबेल मूसा, (मूसा का पहाड़) जिसकी उत्तर 

पूर्वी शिखर रास एस-सफसफेह है, सीने पहाड़ है सर्वाधिक संभाव्य स्थान 
स्वीकार किया जाता है।. द 


. ६. निर्ममन की धर्मशिक्षा 
निर्गमत की पुस्तक का केन्द्र बह वाचा है जो सीने पर्वत पर परमेश्वर ने 
इस्राएल से की। हमें यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर ने अपनी अवर्ण- 


... नीय पवित्रता से मनुष्य तक पाप की खाई पर एक संबंध-साधन निर्माण किया । 


पंरमेश्वर इसमें छटकारा देने वाले परमेश्वर के रूप में आता है । विमोचन की 
उसकी योजना में तैयारी की एक लंबी अवधि है जिसमें मूसा का ऐसी परि- 


... स्थितियों में पालन हुआ कि वह॒ अपने काये के लिये सक्षम बनाया गया । 


परमेश्वर की योजना में मूसा के लिये एक देश-निकाला भी है जो जंगल में 


... उसके लोगों की अगुवाई के लिये एक प्रशिक्षण सिद्ध हुआ । उसमें एक निश्चित 
.. बुलाहट और आदेश तथा एक नया दिव्य नाम भी सम्मिलित है जो मनुष्यों के 
.... साथ परमेश्वर के व्यवहार के एक नये चरण के लिये उपयुक्त है। विपत्तियों से 
५... हमें यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर अपने लोगों की चिन्ता करता है और 
/.. कि वह उनको दंड देता है जो उसकी इच्छा का विरोध करते हैं । 


फसह का विधान यह सिखाता है कि परमेश्वर का रक्षण और विमोचन 


.... उसकी ही शर्तों पर संभव है । मेष के खंभ और अग्नि के खंभ के द्वारा उसके . 
..._... नेतृत्व से यह सीख मिलती है कि जो परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते 
...॑. हैं उन्हें उसका सफल संचालन प्राप्त होता है। लाल समुद्र पर इस्राएलियों का 

... छुटकारा परमेश्वर का एक ऐसा महाकाय॑ है जिसकी गुणात्मक दृष्टि से तुलना 


.... रिस्त की मृत्यु से की जा सकती है, जो मनुष्य के उद्धार के लिये परमेश्वर का... 


.... महानतम काये है। सीने के पहाड़ पर हम परमेश्वर की गौरवपूर्ण पवित्नता की 
.... और इस तथ्य की भी शिक्षा प्राप्त करंते हैं कि उसके पास पहुँचना मानवीय 
... योग्यता की बात नहीं वरन्‌ पूर्णतया अनुग्रह की बात है | परमेश्वर की 
... आज्ञाओं में जो वाचा में निर्धारित हैं हमें एक ऐसे ठोस जीवन-मार्ग का आशवा- 







... सन प्राप्त होता है जो उसे स्वीकाय है। अतएवं वाचा के सीमाक्षेत्र के अंतर्गत... ४. 
.. ही परमेश्वर वास्तविक रूप में ज्ञातव्य है चाहे उस सीमा के परे वह कितना. || || 

. ही अज्ञात क्‍यों । बलिदान द्वारा वाचा पर छाप लगाने में हमसीखते हैं 

ही संभव है । इस्राएल के विश ४.० 























निर्मम... 37 


वासघात पर परमेश्वर के क्रोध (नि. ३२-३३) से हमें पाप की अतिशय 
भयंकरता की शिक्षा मिलती है। मिलाप के तंबू के नियम हमें सच्ची आरा- 
बना के सिद्धांत सिखाते हैं , क्‍योंकि तंबू के क्षेत्र के दो केन्द्र बिन्दु हैं, अर्थात्‌ 
वाचा का संदूक जिसका अभिप्राय है परमेश्वर की प्रकाशित इच्छा (दस- 
आज्ञाएँ) जो अत्यंत पवित्र है, और बलि की बेदी जिसका अभिप्राय है पूर्ण 
समपंण जो परमेश्वर मनुष्य से चाहता है । द 




















_ बारह॒वां अध्याय 


आर लेव्यव्यवस्था 
. १. शीर्षक हु 
इस पुस्तक का इब्नानी ताम “वैयिक्रा' है, जिसका अर्थ और उसने 
बुलाया है। इब्नानी पाठ में ये ही प्रारंभिक शब्द हैं। सप्तति अनुवाद में इस 
पुस्तक का नाम लेवितिकोन है, जो लेविति शब्द का विशेषण है । इसे यह नाम 
इसलिये दिया गया क्योंकि इसकी विषय-सामग्री लेवी के याजकीय समाज के 
... दायित्व तथा कार्यों से संबंधित है । सप्तति अनुवाद के रूप लेवितिकोन और 
.. चुल्गाता में लातीनी रूप लेवितिकुस से अंग्रेजी रूप आया । हिन्दी में लेवी से... 


...._ लेव्य विशेषण बनाया गया और लेबी संबंधी नियमादि उसकी विषय-सामग्री 
..... होने के कारण उसे व्यवस्था कहा गया। इस प्रकार लव्यव्यवस्था शब्द हिन्दी 
0 में'बता । 


.. २. विषय-सामग्री का सारांश 


इंस्राएली लोगों के अनुष्ठानों तथा पुरोहित संबंधी नियमों का और इनके 


| रा साथ ही विधि एवं निषेधों का विस्तृत वर्णन लेव्यव्यवस्था की विषय 
.. सामग्री है। 


। 2 ३. रूपरेखा. 
० . लैव्यव्यवस्था-पवित्र जाति के लिये विधियाँ 





(१) बलि विधियाँ (१-७) आप 
(क) विभिन्न प्रकार की बलि (१: १-६:७): होम बलि (१:१- 

१७); अन्न बलि (२:१-१६); मेल बलि (३:१-१७); 
पाप बलि (४:१-५:१२); दोष बलि (५:१३-६:७)। 
(ख) बलि के संबंध में पुरोहितों के कतेव्य एवं अधिकार 
(६:८-७:३८) । ५ 
(२) अनुष्ठान काप्रारम्भ 


(क) 





हारून एः वं उसके पुत्रों का पुरोहितों के रूप में अभि- रे | गा 








ख) 


गे 


लैव्यव्यवस्था.......... ६७ 


नये अभिषिक्त पुरोहित बलि चढ़ाते हैं (£)। 


नादाब और अबीह की अवैध आग के कारण परमेश्वर का 
उन्हें दंड देना; बलि चढ़ाए अंशों के लिये पुरोहित का 
आचरण (१७ 


३) शुद्ध और अशुद्ध वस्तुओं के संबंध में विधियाँ 


(क) 


शुद्ध ओर अशुद्ध पशु (११) । 


(ख) प्रसृता की शुद्धि (१२) । 


(ग 


घ्‌ 


कोढ़ संबंधी नियम ( मनुष्य, वस्त्न, अथवा घर ) 
(१३-१४) । 
यौन विषयक नियम (१५) । 


४) प्रायश्चित के वाषिक दिवस की विधि (१६) : पापबलि के लिये 
एक बछुड़ा और दो बकरे, एक पापबलि के लिये और दसरा अजा 


जेल के लिये। 
५) पवित्नता नियमावली (१७-२६ 


क) 


(ख 


ग 











पशुओं के वध और भक्षण के नियम (१७) : मिलाप वाले 
तम्बू के पास ही वध हो । लोह न खाया जाए, न लोथ या 
फाड़े पशु का मांस । द 
विवाह और घिनौने कामों के विषय (१८) : निषिद्ध 
विवाह । लि द 
धर्म एवं नीति संबंधी नियम (१६) : पड़ौसी धर्म, भतप्रेत 
आदि । 
१८वें और १९वें अध्यायों के नियमों को उल्लंघन करने का 
दंड (२०)। | 2 
पुरोहित और बलि चढ़ाने के संबंध में नियम (२१-२२ 
वर्ष भर के त्योहारों और पर्वों की नियमावली (२३); 
त, फसह, अखमीरी रोटी और प्रथम फल, सप्ताहों का 


पव (पेन्तेकुस्त ), तुरहियों का पर्व (नागरिक नया वर्ष) 


प्रायश्चित का दिन, भोपडियों का पव्व॑ । 


विविध उपनियम (२४): पवित्न स्थान के दीप, रोटी, निन्‍दा ; 
किसी को घात करना | 




















६८... पुराना नियम की भूमिका 


(रे) सातवाँ वर्ष और जुबली अर्थात पचासवाँ वर्ष (२५) । 
(ट) उपसंहार : उपरोक्त नियमों के पालन की आशिष तथा 
उल्लंघन का दंड (२६) । 
परिशिष्ट (२७) : संकल्प और दशमांश । 


४. रचना, रचयिता और रचना-तिथि 

. यद्यपि लव्यव्यवस्था की पुस्तक परंपरागत रूप से 'मूसा की तीसरी पुस्तक! 
मानी जाती है, तथापि मूसा के कथनों से ऐसा लगता है जैसे कोई अन्य व्यक्ति 
वर्णन कर रहा हो । उनमें तृतीय वचन का प्रयोग हुआ है। बार-बार इसी उप- 
वाक्य का प्रयोग किया गया है, “और परमेश्वर ने मूसा से कहा” (४:१, ६:१, 
१६; ८:१ आदि)। लैव्यव्यवस्था २०:२३ में ये शब्द पाए जाते हैं, और जिस 
जाति के लोगों को मैं तुम्हारे आगे से निकालता हैँ उनकी रीति रस्म पर न 
चलना; क्योंकि उन लोगों ने जो ये सब कुकर्म किए हैं, इसी कारण मुझे उनसे 


..... घृणा हो गई है।” इस वाक्य के अंतिम अंश से ऐसा प्रतीत होता है मानों 
... लेखक को कनान के निवासियों पर इब्रानी लोगों की विजय की जानकारी 
... है। इसी प्रकार, ले. व्य., २६:४३ में लेखक बतलाता है कि परमेश्वर अपने 
... लोगों को दंड देगा, “कारण कि उन्होंने मेरी आज्ञाओं का उल्लंघन किया, और 
... उनकी आत्माओं को मेरी विधियों से घृणा थी ।” ये शब्द उस व्यक्ति के 
... मह से ठीक लगेंगे जिसने यरूलेलम का विनाश देखा हो और जब कि बंघुवाई 
.. से पाठ सीखा जा चुका हो | इन कारणों से ऐसा प्रतीत होता है कि मसा से 
......  ल्यव्यवस्था की पुस्तक के संबंध को रचयिता और रचना के रूप में समझने 
... की अपेक्षा मूसा की वाचा के अंतर्गत उसके अधिकृत स्थान के रूप में समभना 
.. अच्छा होगा। लैव्यव्यवस्था की रचना एवं रचयिता के संबंध में आगे पंचग्रंथ.... 


.. की रचना के विवेचन के साथ भी विवेचन किया जाएगा. ५... 


....._ ५. रोचक आलोचनात्मक बातें 


निकटवर्ती प्राच्य जातियों के जीवन संबंधी बढ़ती हुई जानकारी से यह 


हे _ विदित होता है कि रीतियों, उपासना विधियों और प्रथाओं में प्राचीन इस्राएल 
.... तथा पड़ोसी जातियों में बहुत साम्य है । उत्तरी सुरिया में उगरित नामक 
... स्थान में मिट्टी की कुछ पटियाएँ पाई गई हैं । उनसे पता चलता है कि उत्तरी 






... कनानी लोगों द्वारा प्रयुक्त अनुष्ठान शब्दावली और इखस्राएली लोगों द्वारा. 
.. प्रयुक्त शब्दावली में बहुत साम्य है । इन खोजों से यह बात सरलता से समझी... 
.. जा सकती है कि उन व्यवहारिक उद्देश्यों की पूत्ति के लिये, जो इब्राएत जाति... 

के पड़ोसी पूर्ण किया स्रालियों के समक्ष बालिम पूजा की प्रथाओं के हु जज 


















लेव्यव्यवस्था.... नम 


पालन करने के लिये कितने आकर्षक प्रलोभन थे । इस्राएल तथा उनकी पड़ोसी 
जातियों के बीच धर्म की अभिव्यक्ति में प्रथाओं और उपासना पद्धतियों की दृष्टि 
से कुछ अधिक भेद नहीं था। भेद था केवल उपासना पद्धतियों के और कार्यों के अर्थ 
में । दूसरे शब्दों में यों कहें कि उतके बीच भेद केवल उस परमेश्वर की परि- 
कल्पना में था जिसकी वे आराधना करते थे। व्य, विवरण २६ : १--१४ में पा 
वर्णित इस्राएली पूजा-विधि में अर्थ-भेद के कुछ संकेत मिलते हैं। इस संदर्भ 
में आराधक को आदेश दिया जाता है कि वह भूमि की पहिली उपज की बलि 
के समय इस प्रकार कहे, “मेरा मूलपुरुष एक अरामी मनुष्य था जो मरने पर 
था और वह अपने छोटे से परिवार समेत मिस्र को गया, और वहाँ परदेशी 
होकर रहा; और वहाँ उससे एक बड़ी, और सामर्थी, और बहुत मनुष्यों से 
भरी हुई जाति उत्पन्न हुई। और मिस्रियों ने हम लोगों से बुरा बर्ताव किया, 
और हमें दुःख दिया, और हमसे कठिन सेवा ली । परंतु हमने अपने पूर्वजों के 
परमेश्वर यहोवा की दोहाई दी, और यहोवा ने हमारी सुनकर हमारे दुःख, 
श्रम और अंधेर पर दृष्टि की; और प्रभु ने बलवंत हाथ और बढ़ाई हुई भूजा 
से अति भयानक चिन्ह और चमत्कार दिखलाकर हमको मिस्र से निकाल लाया 
और हमें इस स्थान पर पहुँचाकर यह देश जिसमें दूध और मधु की धाराएं 
बहती हैं हमें दे दिया है ।* 


इस बलि-विधि का ऐसा प्रयोग किया गया है जिसमें इस्राएल के प्रति परमेश्वर 
. के अद्वितीय प्रकाशन पर इस्राएल जाति के विश्वास की रक्षा की जाए और उसे 
दृढ़ किया जाए। हो सकता है कि दूसरी जातियों में पहली उपज की बलि का 


अर्थ जादू से देवताओं को भोग देना अथवा देवताओं पर अपने सहारे को स्वी- 
कार करना हो । परंतु इस्राएल जाति में ऐसी विधि का अर्थ उसके अपने निजी 


विश्वास के आधार पर किया जाता था| इस्राएल लोग इस मूल भेद से अवगत 

थे । इस बात की पृष्टि भजन-लेखक के शब्दों से होती है, “प्रभु का भय पवित्र 
है, वह अनंत काल तक स्थिर रहता है,” (भ. १९ : ६) अथवा” जो पराए 
देवता के पीछे भागते हैं उनका दुःख बढ़ जाएगा; मैं उनके लोह वाले तपावन 
नहीं तपाऊंगा और उनका नाम अपने होठों पर नहीं लूँगा । प्रभु मेरा भाग 
और मेरे कटोरे का हिस्सा है” (भ. १६ : ३-४) ः 


लेव्यव्यवस्था की पुस्तक को भली भाँति समझने के लिये यह जान लेता क्‍ 


आवश्यक है कि उसमें दिए हुए अनुष्ठान संबंधी निर्देश, आराधना की अर्थपूर्ण.. 
.. कम-माला की रूपरेखा मात्र है। आराधना के ये कर्म प्राथेनाओं, पापाँगीकार 


.. अथवा धन्यवाद से संबंधित होंगे, जैसा कि ऊपर निर्देश किया गया है कि पहिली 








बन हक प्राना नियम की भमिका _ 


. खिस्तीय विद्वान इस बात की खोज कर रहे हैं कि भजनसंहिता तथा बाइबल 
. के अन्य गीति-अंशों में वे गीत कौन से हो सकते हैं जो विशिष्ट उपासना-कर्मों 
से संबंधित होंगे । इस प्रकार लेव्यव्यवस्था की पुस्तक के, जो बहुत कम पढी 
जाती है, घनिष्ट संबंध का अध्ययन किया जा रहा है । लव्यव्यवस्था हमें इस्रा- 
एलियों की उपासना के बाह्य अंगों का परिचय कराती है, भजन संहिता उसकी 
आंतरिक भावनाओं का । उदाहरणाथं, यह विचार किया जाता है कि ६७वाँ 
भजन का 'सप्ताहों के पव के समय उपयोग किया जाता था, धवां भजन उस 
. समय काम में लिया जाता था जब कोई रोगी या पाप के बोछ से दबा व्यक्ति 
क्षमा और शुद्धि के लिये पवित्न स्थान के पास जाता था । संभव है कि तुरहियों 
के पर्व या नुतन वर्ष के समय प्रभु परमेश्वर के सिहासन पर विराजमान होने 
के उत्सव पर ४७वें भजन का प्रयोग।किया जाता हो । यह माना जाता है कि 
. सीरख ५० : ५-२१ में प्रायश्चित के दिन उपासना कर्म के समय महापुरोहित 
का विशद चित्रण किया गया है : द 


..... वह परम पवित्र स्थान से बाहर आया, 
.... और जब लोग उसके चहुँ ओर एकत्रित हुए तो बह कितना तेजोमय था । 
. बह मेघों के मध्य भोर के तारे के समान, द 
... वह रात्ति में राका-शशि के समान; 
.._ बह सर्वोच्च के मंदिर पर उदित सूर्य के समान, 
.. और गौरवशाली मेधों में इन्द्र धनुष के समान था 
...... जब उसने अपना भव्य वस्त्र धारण किया 
.... और अपनी पूर्ण सज्जा के साथ । द 
....... वह पवित्र वेदी के पास गया, तो पवित्न स्थान का आंगन दीप्तिमान हो 
दा 



















... उसने अपना हाथ बढ़ाकर कठोरा लिया और दाख के रक्तिम रस का 
। तक तपेण किया है द 
.. उसने उसे वेदी के निम्नतम भाग पर उंडेल दिया 


हा । हारून के पृत्रों ने जयघोष किया, उन्होंने सुन्दर गढ़ी हुई तुरहियाँ बजाई । 






... इस प्रकार उपासना और कर्मकांड के 











उसकी सुगंध सर्वोच्च, राजाओं के राजा के लिये ग्राह्म दी -गई। तब: -. 
उन्होंने सर्वोच्च के सामने उच्च स्वर से जयघोष किया जो सदा के लिये , 


यदि इस्राएल की संपूर्ण उपासना ः ४5 








लैव्यव्यवस्था . ० ७9१ 


के संदर्भ में इस पस्तक का अध्ययन किया जाए तो इस्राएल जाति के जीवन 
और विश्वास के बोध में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। द 


६. धर्मशिक्षा 

खिस्ती लोग मूसा की व्यवस्था से बँघे नहीं हैं। विशेषकर लव्यव्यवस्था 
पाए जाने वाले विधि-नियमों से तो बिलकुल बंधे नहीं हैं। (गल-२:१६३ 
रो, ३:२८, मर ७:१४-२३) । फिर भी खिस्ती धर्मशास्त्र में इन नियम उप- 
नियमों को स्थान है क्‍योंकि वे खिस्‍्त में परमेश्वर के पूर्ण अभिप्राय की पूव 
सूचनाएँ हैं। वे इस बात के सूचक हैं कि परमेश्वर यीशु खिस्त के द्वारा क्या 
करना चाहता था और इस बात की ओर संकेत करते है कि खिस्त हमारे लिये 
क्या है। पशुओं के लोह की बलि के माध्यम से अब हम परमेश्वर की आरा- 
धना नहीं करते । यह केवल इसीलिये संभव हुआ कि परमेश्वर ने एक पूण 
बलिदान की अर्थात कस पर खिस्‍त के बलिदान की योजना की (इब्र ० ६:११ 
--१४) | परमेश्वर ने स्थिस्त में इब्रानी महायाजकत्व और मिलाप के तंबू 
की व्यवस्था की । अब हमारा महान एवं सिद्ध महायाजक है जिससे परमेश्वर 
की उपस्थिति रूपी अनंत तंबू में हमारे लिये अनंत छुटकारा प्राप्त किया (इब्र० 
६:११) | लैव्यव्यवस्था की विधियाँ एवं उपविधियाँ आराधना एवं पवित्र 
जीवन व्यतीत करने के लिये परमेश्वर की ओर से प्राथमिक पाठ हैं | खिस्त 
में उनके पूर्ण हो जाने के कारण यद्यपि इनके बंधन की आवश्यकता अब नहीं 
रह गई, तथापि वे परमेश्वर के अभिप्राय का एक चित्र प्रस्तुत करते हैं और 
इस रूप में इसका महत्व सदा बना रहेगा। 


लैव्यव्यवस्था की शिक्षा का सार दो आज्ञाओं में दिया जा सकता है... 


$ 


“तुम पवित्र बने रहो; क्‍योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर प्रभु पवित्र हे, और “एक । 


रे से अपने समान ही प्रेम रखना” (लै० व्य० १६:१८; दे मत्ती १६:१६) ।॥ 


बलि की विधियों से यह्‌ शिक्षा मिलती कि । परमेश्वर से मिलाप उतना । ; हे | रह 


ही मंहगा है जितना प्राण । विभिन्न प्रकार की बलि से यह इंगित होता है कि _ क्‍ 


परमेश्वर के पास आना पूर्ण | समंपंण के साथ होना चाहिये (होम बलि ) कि हे 5० ० 
ह संगति के लिये होना चाहिये (मेल बलि), पापों की क्षमा के लिये होना... 


चाहिये (पाप-बलि), परमेश्वर के साथ और मनुष्य के साथ मिलाप के लिये 
होना चाहिये (दोष बलि), और कि वह हमारी आशिपषों के प्रति भंडारीपन 
_ की भावना से होना चाहिये (अन्न बलि) । पवित्र स्थान के सेवकों के लिये... 
. उपविधियों से यह संकेत मिलता है कि खिस्त के सेवकों के लिये संयम और सम- 


.. पंण की आवश्यकता है । पवित्र एवं सामान्य के बीच भेद से इस बात की ओर... 











छः ... पुराना नियम की भूमिका 


संकेत होता है कि खिस्त संबंधी बातों के विषय, अर्थात संस्कारों तथा नैतिक 
. एवं मानवीय मुल्यों के प्रयोग में हम नम्नता और आदर की भावना रखें। 
_ लव्यव्यवस्था में धार्मिक पर्वों से यह इंगित होता है कि हमारा समय और गति- 
.. विधि का विधान इस प्रकार से किया जाय कि हम परमेश्वर और उसकी 
करुणा का सदा स्मरण किया करें जिसके फलस्वरूप हमारे संपूर्ण जीवन में 
. परमेश्वर को योग्य स्थान प्राप्त हो । 

















कक एस 


तेरह॒वां अध्याय 
गिनती 


१. शीर्षक 


इस पस्तक का इब्रानी शीर्षक बमिदबार' है, जिसका अर्थ जंगल में है। 
यह शब्द इब्नानी पुस्तक में पहला शब्द न होते हुए भी इस पुस्तक का विशिष्ट 
शब्द है। सप्तति अनुवाद में 'अरिथिमुइ” शीर्षक दिया गया जिसका अर्थ “गिनती 
। इस शीर्षक से पस्तक के प्रथम भाग की सामग्री का वर्णन हो जाता है । 
वुल्गाता में 'न्यूमेरी' शीर्षक है जो यूनानी शीर्षक का अनुवाद है। अंग्रेजी का 
शीर्षक यूनानी के शीर्षक अनुरूप है । भारतीय अनुवादों में यूनानी शीषेक का 
अनुवाद किया गया है। हिन्दी में भी यूनानी शीर्षक का अनुवाद है और 
इसलिये यह “गिनती' की पुस्तक कहलाती है । 


२५ साशाश 


गिनती की पुस्तक में सीने पर्वत से मोआब के मैदानों तक इस्राएलियों के 
भ्रमण का वर्णन है, जिसमें ३८ वर्ष तक जंगल में भ्रमण का वर्णन सम्मिलित है।_ 


३. रूपरेखा 

गिनती---जंगल-म्रमण सें अनुशासन 
१) सीने में छावती (१:१-१०: १०) । कम 
(क) गिनती और छावनी का क्रम (१-२) : इस्राएलियों की क्‍ हि 
गिनती (१); छावनी के उठने और आगे बढ़ने का क्रम _ 
२)- यहदा, रूबेन, एप्रैेम और दान की छावनियाँ । । 
ख) पवित्नस्थान की सेवा के लिये सहायक के रूप में पहिलौठों 
के स्थान पर लेवियों का परमेश्वर द्वारा ग्रहण किया जाना. 
३-४) : कहाती, गेशोती और मरारी । || 
ग) विविधि विधियाँ एवं उपविधियाँ (१-६) : अशुद्ध लोगों का _ 
बाहर किया जाना (५: पुन: जाति में मिलाना 























पा >छड. 


5. [ग) 


(घ) 


(च) 





पराना नियम की भमिका 


(५: ११-३१); नाजीरों की व्यवस्था (६:१-२१) 
याजकों के आशीर्वाद देने की रीति (६:२१-२७) 
मिलाप-तंबू के समर्पण (७-६:१४) : प्रधानों का भेंट लाना 
(७:१-८३); वेदी का अभिषेक, दीवट (७:८४-८:४ ) 
लेवियों का शुद्धिवरण (5:४-२६); फसह की उपविधियाँ 
(६:१-१४ ) । द हर 
यात्रा की रीति (६:१५-१०:१०) : बादल, चाँदी की 


 तुरहियाँ । 


(२) भ्रमण (१०:११-२२:१) 


(क) 


(ख) 


सीने से कादेश बनिया तक(१०:११-१४) : होबाब के 
निदर्शन में यात्रा (१०); तबेरा एवं किब्रोथत्तावा में कुड़- 
कुड़ाना और दंड, तथा ७० पुरनियों की नियुक्ति (११) 
मरियम का कोढ़ी होना (११); कनान सें भेदियों का भेजा 
जाना और उनका वर्णन (१३); परमेश्वर का कोध, सूसा 
का निवेदत और कनान पर असफल आक्रमण (१४) । 

अ्मण का समय (१५-१६): विविध नियम--बलि, सबूत 
उलंघन, वस्त्रों के कोर पर फालर (१६); कोरह, दातान 


और अबीराम का विद्रोह (१६); हारून की छड़ी में... 


. कलियाँ फूटना (१७) ; याजकीय दाय (१८); लाल निर्दोष 


बछिया की राख से छुड़ोती का जल (१६) ।.. 


कदिश से मोश्राब की तराई तक (२०-२१): मरियम को 


... मृत्यु (२०:१); मरीबा में जल (२०:२-१३); एदोम की 
... अस्वीकृति (२०:१४-२१); हारूत को मृत्यु (२०:२२-२६); 
.. होर्मा स्थान पर विजय (२१:१-३); पीतल का सांप 


... (२१:४-६); मोआब की ओर यात्रा, दो प्रातन गीत 
.. (२:१०-२० ) ; सीहोन और ओग नामक राजाओं पर विजय. 


“5 (रब९एप१०२श१).4. 7८ 


(क) 







(३) मोआब के मंदानों में (२२:२-३६) 


बिलाम की गृढ़ बात (२२-२४): बालांक विलाम को रा 


बुलाता है (२२) बिलाम की. चार भविष्यवाणियां . न जा, 











गिनती पा 


(ग) विविध नियम (२६-३१): दूसरी बार गिनती (२६)३ 
सलोफाद की पुत्रियों की विनती (२७:१-११); बहोशू की 
मूसा के स्थान पर नियुक्ति (२७:१२-२३); उपासना 
उपविधियाँ--निरंतर बलिदान, सबृत, महीने के आरंभ, 
फसह, सप्ताहों और तुरहियों का पे, प्रायश्चित का दिन 
(२८-३० ) ; मिद्यानियों के विरुद्ध युद्ध और लूट का वितरण 
(३१) 2 

(घ) खरूबेन, गाद और मनश्शे के आधे गोत्र को यदेन के पूर्वी 
देशों की भूमि का दान (३२) । 

(च) मिस्र से मोआब तक के पड़ावों की नामावली (३३) । 


(छ) कनान में प्रवेश करने के पूर्व अंतिम अनुदेश (३४-३६ ): 
यर्दत के पश्चिमी देशों की भूमि का दान (३४); लेवीय 
नगर (३५४:१-८); शरण नगर और हत्या के दंड से बचने 
के नियम; संपत्ति वाली स्त्रियों का विवाह (३६) । 


४, रचना और रचयिता 
गिनती ३३:२ में लिखा है, “मूसा ने प्रभु से आज्ञा पाकर उनके कूच उनके 


पड़ावों के अनुसार लिख दिए । पहले महीने के पंद्रहवें दित को उन्होंने राम- 
सेस से कृच किया” इत्यादि । इन शब्दों से यह सूचित होता है कि यद्यपि मूसा 
ने इस्राएलियों की यात्राओं का अभिलेख किया, तथापि इस उद्धरण का वर्णन 
और किसी व्यक्ति ने लिखा है, जो मूसा के लेखों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप. 
से निर्भर था। इसी प्रकार इस पुस्तक में जब मूसा का उल्लेख किया गया 
है उसमें तृतीय पुरुष का प्रयोग किया गया है और ऐसा प्रतीत होता है कि 
मुसा नहीं वरन अन्य कोई घटनाओं को लिख रहा हो। अतः माना कि यह प॒स्तक 
मूसा से संबद्ध मानी जाती है और परंपरागत रूप से मूसा की चौथी 
पुस्तक कही जाती है परंतु ऐसा लगता है कि वह किसी अन्य व्यक्ति 
द्वारा लिखी गईं अथवा संपादित हुई। वह लेखक कौन था, कहाँ का था, कब 
था, इसका कोई उल्लेख नहीं है । पंचग्रंथ की रचना पर लेख में आगे लेखक 
. का पुनः विचार किया जाएगा । | 


- ५. रोचक आलोचनात्मक समस्याएं 
(१) गिनती की पुस्तक में गितती की सबस्या.......... 
गिनती की पुस्तक में दो जनगणना का वर्णन है (१:३ क्र. और २६) 
। 3५ 











. ७६... पुराना नियम की भूमिका 


५५० पुरुष हैं, और दूसरी में ६०१, ७३० पुरुष और वे सब कम से कम २० 
वर्ष की आयु के हैं । यदि स्त्रियों और बच्चों की गिनती भी की जाती तो सब 
मिलाकर २० लाख से अधिक होते (एक परिवार में चार मानकर जो बहुत 
कम हैं) | ४० वर्ष तक इतने लोग जंगल में रहें और दूसरे स्थानों से उन्हें 
. खाद्यान्न न मिले और जल की कोई अच्छी व्यवस्था न हो, यह विश्वास करना 
अत्यंत कठिन जान पड़ता है। इन बड़ी संख्याओं की समस्या कुछ वैसी ही है जैसी 
उत्पत्ति में पितरों की आयु की समस्या । नृह के पूर्व पितरों की औसतन आयु 
८२७.५ वर्ष होती है। हनोक की आयु सब से कम है, ३६४ वर्ष (यह द्रष्टव्य है कि 
वर्ष में ३६५ दिन हैं) । सबसे दीर्घ आयु मतुशेलह की है जो ६६९ वर्ष जीवित 
रहा। नृह के पश्चात अरपक्षद ४३८ वर्ष और शेलह ४३३ वर्ष की आयु तक रहे । 
इन संख्याओं को मानने में यह कठिनाई उपस्थित होती है कि विज्ञान से प्रमाणित 
होता है कि प्राचीन युगों में लोगों की आयु लगभग उतनी होती थी जितनी 
.. आजकल इसी प्रकार मंदिर के निर्माणों में भी संख्या की अतिशयता है 


ता . (१ इति० २२:१४; २६:४ ७) 


इन बड़ी संख्याओं का कोई संतोषप्रद स्पष्टीकरण नहीं हो पाया है। कुछ 


। विद्वान कहते हैं कि पाठ भ्रष्ट होंगे । यह द्रष्टव्य है कि नृह के पूर्व पितरों की 


। आयु सामरी पंचग्रंथ एवं सप्तति अनुवाद में इब्रानी के मसोरेतिक पाठ से भिन्न 
'.  है। कुछ विद्वान दृष्टिकूट की पद्धति के अनुरूप अंकों का निर्वेचन करते ह्‌ः 
४... अर्थात अंकों के स्थान पर अक्षरों को रखते हैं, परन्तु इससे भी कोई संतोष- 


.... प्रद परिणाम नहीं मिल सके हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि पराने नियम 
हा ० - में लगभग संख्या देने का प्रयास किया गया है । उदाहरणार्थ, ४० वर्ष की संख्या 
..._ एक पीढ़ी के बराबर मानी गई है (न्या० ३:११; 5:२८; १३:१) 


इस्राएल का इतिहास लिखने में धर्मग्रंथ लेखक ने उस सब मूल सामग्री 


......_ का उपयोग किया जो उसे उपलब्ध हो सकी। अतएव, हमें यह समभना चाहिये 

...._ छि परमेश्वर के स्वरूप, गुण, और कार्य के प्रकाशन के लिये धर्मशास्त्र की क्‍ 
... विश्वसनीयता में संख्याओं की संभाव्यता के कारण कोई बाधा उपस्थित नहीं 
... होती। इन संख्याओं के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त अन्य कोई अर्थ लगाने के 


। _ कारण परमेश्वर के स्वरूप एवं कार्य में कोई अंतर नहीं पड़ता और इसलिए 2) 


' 2 २. वहनीय मिलाप का तंब 














आज भी विद्यमान हैं। रूवलला...... 
जड़ी हुआ इश्माएल का संदुका 5 जा 














गितती 2 08 च आ कल 


है, जिसे वे अपने साथ प्रवास में ले जाते हैं । यह इश्माएल का संदूकः उन्होंने 
१७६३ में एक प्रतिद्वन्दी जाति से छीना था। जब यह सूरयानी जाति एक स्थान ._ 
से दूसरे को जाती है तो एक ऊंटनी पर यह संदूक आगे आगे चलता है।.. 
अतीत में जब यह जाति युद्ध करने जाती थी तो यह संदुक और उसके साथ 
ऊंटनी पर सबसे सुदंर स्त्री वह स्थान बन जाता था जिससे पीछे योद्धा हट 
नहीं सकते थे । यह॒संदृक बबूल की लकड़ी और शुतुरमुर्ग के पंखों से बना है 
और पड़ाव के समय बकरे के वालों से बने हुए तंब्‌ के सामने रखा जाता है।' 
यह अनुमान है कि इस्लाम धर्म के प्रादुर्भाव के पूर्व अरब देश की खानाबदोश _ 
जातियों में प्रत्येक के पास ऐसी वहनीय दरगाहें थीं जिस पर जाति के इृष्ट 
देवता का चिन्ह भी होता था। मक्का में जो काबा है वह भी संदूक के आकार 
का है और उस पर चादर है जो प्रतिवर्ष बदली जाती है। उसके भीतर एक 
काला पाक पत्थर है । यह माना जाना है कि यह भी एक वहनीय दरगाह थी 
जो अंत में एक स्थान पर स्थित की गई। इब्रानियों का वाचा का संदृक जिसमें 
पत्थर की पटियाएं थीं, उसी प्रकार एक पवित्नस्थान था जो अन्त में कनान 
में, पहले शिलोह और तब यरूशलेम में स्थित हो गया । 

६. धर्मशिक्षा 

इस पस्तक के पहले भाग से यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर के मनो- 
नीत लोग परमेश्वर को इच्छा पूर्ण करने और उसकी अगुवाई में चलने के 
लिये कसे संगठित किए गए । दूसरे शब्दों में यों कहा जाए कि “जंगल में कली- 
सिया (प्रे. ७:३८,) परमेश्वर की सेवा करने के लिये सेना के समान संगठित 
हुई । प्रत्येक युग में परमेश्वर की कली सिया के लिये ऐसा आदर्श उपयुक्त प्रतीत 
होता है, जैसा गीत में कहा गया है 'ईश्वर की कलीसिया युद्ध में शामिल है ।' 
इस्राएलियों की चार छावनियों की, अर्थात्‌ यहुदा, रूबेन, एप्रेम और दान (गि. व्‌ _ 
-२) के झंडों का वर्णन नहीं है, परंतु यहूदी परंपरा में उन्हें यहेजकेल के दर्शन _ 
यहे १:४५, १०) के चार मुखों से एकात्म किया गया है। प्रकाशित वाक्य 
नाम पुस्तक में भी इसी प्रकार का प्रतीक-विधान मिलता है (प्र. वा. ४:८5) 
जहाँ चार प्राणी परमेश्वर के सिंहासन के चारों ओर हैं। इन संदर्भों में सामान्य. 


_ विचार यह है कि परमेश्वर अपने लोगों के बीच सिंहासनारूढ़ है। चार गंदे 


. उदाहरणाथ, यहुदा का ध्वजा चिन्ह सिंह है (दे.उ० ४९:९६), रूबेन का चिह्न हे 
. मनुष्य का मुख, एप्रैस का बैल (व्य. वि. ३३:१७) और दान का उकाब है। 


नेशनल ज्योगरफिक मेगजीन, १९२---६, दिसंबर १६५७, पृ० ८६४ 











 छ८झ....... पुराना नियम की भूमिका 


प्रारंभिक कलीसिया के पितृगण ने इस प्रतीक-विधान को और आगे बढ़ाकर 
यह विचार किया कि सुसमाचार चार सुसमाचार-लेखकों द्वारा प्रस्तुत किए 
. गए हैं, और कि मत्ती का चिह्न मनुष्य का मुख, मरकुस का सिंह, लुका का 


.. वृषभ, और यूहनना का उकाब है । 


प्रतिज्ञा के देश का भेद लेना और उसके बाद उसे जीत लेने में असफलता 

से परमेश्वर पर विश्वास में निहित व्यवहारिक अभिप्राय के संबंध में शिक्षा 

. मिलती है (१३) । उससे हम यह सीखते हैं कि परमेश्वर के बिना सफलता 
प्राप्त करने का प्रयास व्यर्थ है (१४) 


जंगल में चालीस वर्ष तक भ्रमण यह सिखाता है कि परमेश्वर ने विभिन्न 
उपायों से अपने लोगों को अनुशासनबद्ध बनाया कि बे प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश 
करने के योग्य हो सकें । इस कठिन काल में मूसा का धैर्य॑ प्रशंसनीय है । जीने 
. की कला की, जिसका उदाहरण पीतल के सर्प की घटना में है (२१:४-६) 
ओर जिसका प्रभु ने भी यूहन्ना ३:१४ में उल्लेख किया है, शिक्षा में हम 


.... परमेश्वर के न्याय की सच्चाई और उसकी करुणा का अपूर्व मिश्रण पाते हैं । 
..... बिलाम की गूढ़ बातें यह बताती हैं कि जो परमेश्वर के लोग हैं और उस पर 
... भरोसा करते हैं उनके लिये सब बातों में परमेश्वर भलाई ही का कार्य करता 
.. हैं। संपूर्ण पुस्तक में परमेश्वर के धामिक न्याय, रक्षण और संचालन के प्रमाण 





व है मिलते हैं। 











चोदह॒वां अध्याय 
व्यवस्था विवरण 


१. शीर्षक 


इस पुस्तक का इब्रानी शीर्षक उसके प्रारंभिक शब्द एल्ले हृददवारीम' से 
लिया गया है । इन शब्दों का अर्थ “ये वे वचन हैं है। उनका संक्षिप्त रूप 
'दवारिम' अर्थात 'वचन' है । सप्तति अनुवाद में शीर्षक है 'दयुतरोनोमिऑन' 
जिसका अर्थ है द्वितीय व्यवस्था' अथवा “व्यवस्था की पुनरावृत्ति' 
कदाचित १७वें अध्याय के १८वें पद के यूनानी अनुवाद से यह शीषषेक लिया 
गया जिसमें कहा गया है कि 'वह"''इसी व्यवस्था की पुस्तक की एक नकल 
अपने लिये कर ले। वल्गाता में युनानी शीर्षक का लातीनी रूप दुयुतरोनोभि- 
यम शीर्षक दिया गया है। अंग्रेजी शीर्षक वुल्गाता से लिया गया है। भारतीय 
अनुवादों में युनानी शीर्षक का अनुवाद किया गया है। हिन्दी में व्यवस्था 
विवरण शीर्षक है । 


२० विषय-सामग्री का सारांश 


सीने पर्वत पर प्रकाशित ईश्वरीय वाचा की व्यवस्था जिस रूप में मूसा 
द्वारा प्रस्तुत की गई उस वाचा का विशेष कर तीन प्रवचनों में संस्मरण के 
रूप में इस पुस्तक में विवरण किया गया है और साथ ही इस्राएल जातिको- 
प्रबोधन किया गया है कि परमेश्वर की भलाई के कारण वह परमेश्वर से प्रेम 
करे और उसके प्रति विश्वस्त रहे । 


३. रूपरेखा 
.. व्यवस्था विवरणं--प्रेम और भक्ति के करत हे 
१) प्रथम प्रवचन--प्रभु के महाकार्य (१:१--४२:४३ का 
(क) ऐतिहासिक भूसिका (१:१-५): अराबा में मूसा के संभाषण 

. कासमय और स्थान। . .. 

(ख) मूसा होरेब से लेकर मोआब की 
घटनाओं का विवरण देता 

































. ८०... पुराना नियम की भूमिका 


5 (ग) मूसा इस्राएलियों को उद्बोधन देता है कि होरेब पर प्रकाशित 
महान्‌ सत्यों को न भूलना (४:१-४०) । 
(घ) यद॑न के पूर्व में बसने वालों वंशों के लिये मूसा बेसेर, गिलाद 
का रामोत, और बाशान के गोलान को शरणनगर निर्धारित 
करता है (४:४१-०४३ ) । | 


क्‍ (२) द्वितीय प्रवचन--परमेश्वर की व्यवस्था (४:४४-२ ८:६८) 


 (क) ऐतिहासिक भूमिका (४:४४-४६): बेतपोर के सामने की _ 
तराई में दिया गया संभाषण । द 


(ख) मूसा वाचा के विश्वास की पुनरावृत्ति करता है (४-११): 

.. जलते हुए पहाड़ पर परमेश्वर ने दस आज्ञाएँ दीं (५)॥ 

शेमा-अर्थात्‌ सारी शक्ति से परमेश्वर को प्रेम करता, और 

उसके प्रति विश्वस्त रहने का आदेश (६) । पवित्न जाति 

_ के रूप में इस्राएल से आचरण की अपेक्षा (७) | संपन्न 

अवस्था के प्रलोभनों के कारण जंगल में परमेश्वर के रक्षण 

को न भूलता (८) । आत्म-धार्मिकता में परमेश्वर के रक्षण 

को न भूलना (६:१-५)। जंगल में इस्राएलियों के विद्रोह 

से शिक्षाएँ-परमेश्वर का क्रोध बड़ी कठिनाई से ठाला गया 

और बड़ी विनम्र विनती के पश्चात्‌ वाचा का पुनर्दान (६: 

६-१०:११) । प्रभु परमेश्वर क्‍या चाहता है, संक्षेप में 

. विवरण (१०:१२-२२): उसका भय मात्तो । उससे प्रेम 

... करो और मन से उसकी सेवा करो । उसके भलाई के कार्यों _ 

... के कारण उसकी,आज्ञाएँ मानो, व्यवस्था से प्रेम करो जिससे 

...  इस्राएल समर्थ होगी (११) । गरीज्जीम और एबाल पहाड़ों 
..... पर से आशिष एवं शाप (११:२६-३२) | 

. (ग) विधि संहिता (व्यवस्था संहिता) (१२--२६) जिसमें 

.. सम्मिलित हैं : धामिक विधियां; विशेषकर बलिदानों का 

.. केन्द्रीकरण (२२) । मानव भलाई की विधियां--परदेशी 

























... २३:१५) । नागरिक विविधां, जैसे संपत्ति (१६:१४), 







व न्यायालय के रूप में, और राज्य 


.... "रेस का स्थान सर्ो्च 
साई है (१७:८-२०) । 


करने की प्रणाली 


..... विधवा, अनाथ, दास और पशु के संबंध में (उदा; २२:८5; 


स्थानीय च्यायी (१६:१ ८-२०) । राज्य व्यवस्था--जिसमें , 








व्यवस्था विवरण... ८54 
(घ) प्रतिज्ञा के देश में व्यवस्था का उद्घाटन (२७): एबाल 
पहाड़ पर पत्थर खड़ा करता और चूना से पोतना और 
उस पर व्यवस्था के वचनों को लिखना, गिरिज्जीम पहाड़ 
से आशीर्वाद और एबाल से शाप सुनाना (२७:१४- 
२६९) । 
च्‌) 8 के पालन के लिये आशिष और उल्लंघन के लिये शाप 
(२८) । द 
३) तृतीय प्रवचन--परमेश्वर के साथ वाचा (२६-३० ) 
के) मोआब में परमेश्वर और इस्राएल के बीच नयी वाचा 
(२६) । क्‍ 
(ख) पश्चाताप करने पर क्षमा और आशिष (३०:१-१०) 
(ग) परमेश्वर का वचन दूर नहीं, निकट है-इस्राएल को चुवाव 
की चुनौती-जीवन या मृत्यु को चुन ले (३०:११-२०) 
(४) परिशिष्ट (३१-३४) 
(क) मूसा की विदाई, यहोश्‌ की नियुक्ति और उसे आदेश, लेवियों 
को व्यवस्था की पुस्तक सौंपी गई (३१:१-१३) । 
(ख) ऐतिहासिक संदर्भ सहित मूसा का गीत (११:१४-- 
३२:४७ ) 
(ग) नबो पहाड़ पर से मूसा प्रतिज्ञा के देश को देखता है 
. (३२:४८-०५२) कक ० 
(घ) मृसा का इस्राएलियों को आशीर्वाद देना, गोत्र के अनुसार 
(३३ )। द 
च) मूसा की मृत्यु (३४) ।॥ 
४. रचना, रचथिता, तिथि 
इस पुस्तक के प्रबोधनात्मक अंशों में उत्तम पुरुष वाचक स्वनाम "मैं? का 
प्रयोग किया गया है मानों मूसा स्वयं बोल रहा हो | साथ ही ऐतिहासिक 
व्याख्या भी हैं जिसमें मुसा के लिये अन्य पृरुषवाचक सर्वेनाम वह” का प्रयोग 
किया गया है, मानो कोई और बोल रहा हो । ऐसा प्रतीत होता है कि जो- 


व्यक्ति ऐतिहासिक भूमिकाएं लिख रहा हो वह यर्दन नदी के पश्चिमी भाग 
का रहने वाला हो, क्‍योंकि वह मूसा के अंतिम उपदेश और मृत्यु के स्थान के 

















८छए.......... पुराना नियम की भूमिका 


का अंतिम भाग भी लिखा, तो वह उस समय रहा होगा जब से बरसों पहले क्‍ 
 इब्नानी लोग पलिश्तीन देश में आ बसे होंगे, क्योंकि वह कहता है, “और मसूसा 


.. के तुल्य इस्राएल में ऐसा कोई नबी नहीं उठा, जिससे यहोवा ने आमने- 


. सामने बातें कीं (३४:१०) । २:१२ में (अगले दिलों में ), ३:१४ में (और 
... वही नाम आज तक बना हुआ है) और ३३:४ (मूसा ने हमें व्यवस्था दी, 
और याकूब की मंडली का निज भाग ठहरी ) ऐतिहासिक दृष्टि से भी यही 

. प्रतीत होता है कि लेखक उस समय लिख रहा है जब बरसों पहले इस्राएली 
पल्िश्तीन में बस चुके थे । १७:१४-२० में राजा के लिये जो निर्देश दिए गए 
हैं उनके आधार पर कुछ विद्वानों का यह अनुमाव है कि यह शमूएल द्वारा 
. राजा की नियुक्ति के समय को सूचित करते हैं, और कुछ विद्वाव तो उसमें 
सुलेमान अथवा अन्य परवर्ती राजाओं की झलक देखते हैं । यदि हम ऐसे संदर्भों 
. को जिनमें परवर्ती काल की भलक जैसी प्रतीत होती है छोड़ भी देंतो भी 


.. पुस्तक के अधिकांश भाग के रचयिता के विषय में हम क्‍या कहें ? क्‍या मूसा स्वयं 


.. लिख रहा है अथवा वह कोई अन्य व्यक्ति है जो बड़ी स्वतंत्र शैली में मूसा के 


..._ अंतिम प्रवचन की परंपरा का विवरण प्रस्तुत कर रहा है ? यह निश्चित है कि. 
..  मूसा ने कुछ अंश लिखे, जैसे बाइबल में संकेत मिलते हैं (नि. १७:१४; २४:४, 


. ७; ३४:२७; गि. ३३:२; व्य. ३१:६,२६) । परन्तु इसके साथ ही हम यह. 
देखते हैं कि व्यवस्था विवरण की शैली पंचग्रंथ की अन्य पस्तकों की शली से 


५"... इतनी भिन्न है कि कई विद्वानों के लिये यह मान्यता सरल हो जाती है कि 
:..... व्यवस्था विवरण की पुस्तक एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखी गई जिसने अपने 
... युग की जैली में मूसा के संदेश और व्यवस्था प्रस्तुत की, और उसने विषय 

... के अनुरूप प्रथम पुरुष अथवा "मैं! की साहित्यिक शैली का उपयोग किया। 
:..... इसी दृष्टिकोण के आधार पर हम राजा संबंधी अंशों (व्य. १७:१४-२०) 
...... जैसे प्रकरणों के सम्मिलित किए जाने का स्पष्टीकरण कर सकते हैं, जिसमें 
... लेखक के मानस में सुलेमान जैसे राजा का उदाहरण विद्यमान हो । 


रूपरेखा से स्पष्ट है कि पुस्तक की सामग्री सुसंगठित है। द्वितीय प्रवचन 


... अपने आप में पूर्ण है और यह भी प्रतीत होता है कि मुसा की कहानी को पूर्ण... 


पा करने के लिये परिशिष्ट जोड़ा गया है । 












सुधार से सामान्यतया संबंधित की जाती है (२ रा. २२-२३) ।ईस्वी सनू. 
३7: बी चौथी शताब्दी में ही येरोम ने यह सुझाव प्रस्तुत किया कि मन्दिर मेंपाईगई 

व ' पुस्तक प),जिसके आधार पर योशिय्याह ने... 
थी । इस मान्यता का आधार ः | 








व्यवस्था विवरण... ८३ 


यह है कि जो सुधार किए गए वे व्यवस्था विवरण के नियमों के अनुरूप हैं। 
आकाश के ज्योतिषिंडों की पूजा में (२ रा. २३:४,११ और व्य, १७:३३): 
अन्य मूर्तिपुजा की प्रथाओं में (२ रा. २३:६, १३,१४ और व्य. १२:२,३) 
यरूशलेम में आराधना को केन्द्रित करने में (२ रा. २३:८५, २१-२३ और व्य 
१२:४-२५; १६:५-७) ; देवदासी प्रथा के नष्ठ करने में (२ रा, २३:७ और 
व्य, २३:१७-१५); ओसझे भूत सिद्धि वाले, देवता, मुरतें और घिनौनी वस्तुओं 
के नाश करने में (२ रा. २३:२४ और व्य, १८:१०-११) में यह अनुरूपता 
दिखाई देती है | योशिय्याहु के सुधार के आरंभ के वर्णन (२ रा. २३:१,२) 
की और व्यवस्था विवरण पुस्तक की शैली में भी बहुत साम्य है । ० थ 


यदि यह मान लिया जाए कि ई, पू. ६२२ में योशिय्याह के राज्यकाल में 
मंदिर में जो पुस्तक मिली वह व्यवस्था विवरण की पुस्तक थी अथवा उसका 
अधिकांश था (व्य, ५:२६-२८), तब भी यह समस्या बनी रहती है कि 
पुस्तक कब लिखी गई । एक मान्यता यह है कि वह मनश्शे के राज्यकाल के 
सुधार के कुछ समय पुर्वे लिखी गई (ई., पू, ६८७-६४२), जब इस्राएल के 
परंपरागत विश्वास पर कुठाराघात हुआ । यह सुझाव प्रस्तुत किया जाता है 
कि पिछले राजा अर्थात हिजकिय्याह ने जो सुधार प्रारंभ किए उनको चालू 
रखने के लिये एक दल विशेष किसी सुअवसर की खोज में था। उस दल ने 
कदाचित यह पुस्तक प्रस्तुत की । 


दूसरी मान्यता यह है कि व्यवस्थाविवरण की पुस्तक नबियों और प्रो- 
हितों की परंपराओं के बीच की कड़ी अथवा समन्वय है। इस संदर्भ में यिर्म- 
याह की गद्यशली की इस पुस्तक की शैली से समानता के आधार पर तिथि 
निर्धारण के प्रश्त पर विचार किया जाता है। साथ ही इस तथ्य के आधार पर 


भी कि पिमंयाहु किसी वाचा के वचन का उल्लेख करता है जिसका उसने 
यहूदा के नगरों में प्रचार किया था (थि०११:१--६ ) 


तीसरी मान्यता यह है कि यह पुस्तक उत्तर में बसे हुए इस्राएल के लेवियों 
की परंपरा का अवशेष है, और कदाचित शेकेम का पवित्रस्थान इसका केन्द्र 
रहा हो (११:२६,३०३ २७:११-२६) । होशे की पुस्तक के साथ साम्य से 
'इस मान्यता की पृष्टि की जाती है । इसके आधार पर यह पृसतक उत्तरी 
राज्य के पतन के पश्चात (ई० पृ०७२१) यहूदा में लाई गई। यहुदा के नवीन 
वातावरण के लिये कदाचित्‌ इसे उपयुक्त बनाया गया इसलिये उसमें एक सुंसं- 


व्क $ 











अप धो, पुराना नियम की भूमिका 


कि यद्यपि ई० पृ० सातवीं सदी में इस पुस्तक का वर्तमान रूप प्रस्तुत किया 
.. गया तथापि उसकी मूल सामग्री मूसा की शिक्षा और विधि विधानसे ली 

“नई कै। 
व्यवस्थाविवरण के १२:४-२८; १६:५-७ में बलिदान-सेवा के लिये 
. जो एक केन्द्रीय पवित्र स्थान निर्दिष्ठ किया गया है, वह यरूशलेम की ओर 
.. संकेत करता है। परन्तु पुस्तक में कहीं भी ऐसा नहीं कहा गया है। एक पवित्र 
स्थान से उस स्थान का संकेत हो सकता है जो सब गोत़ों के लिये एक केन्द्रीय 
स्थान स्वीकार किया गया था, विशेषकर वह स्थान जहाँ वर्ष में तीन बार 
जम . सब परुषों को परमेश्वर के सामने एकत्रित होना पड़ता था (नि० ३४:२३) । 
....... यरूशलेम से भिन्न केन्द्रीय स्थान स्वीकार करने में निर्गेमन २०:२४ में दिए हुए 
5... आश्वासन “जहाँ जहाँ मैं अपने नाम का स्मरण कराऊें वहाँ वहाँ मैं आकर 
तुम्हें आशिष दूगा,” के साथ किसी प्रकार का विरोध उपस्थित नहीं होता। 


व्यवस्था विवरण के वर्तमान रूप का उद्गम चाहे जो रहा हो, इतना 
निश्चित है कि मूसा का व्यक्तित्व उसमें प्रधान है और इस परंपरा की पृष्टि _ 
.. करता है कि इस पुस्तक के अधिकार और सामग्री का मूलखोत मूसा ही है । 
.. इस पुस्तक को हम सूसा की मृत्यु के पूर्व उसके प्रवचन होने की सच्ची परंपरा 
/0 .. के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। 





धम शिक्षा 


व्यवस्था विवरण की पुस्तक की प्रमुख शिक्षा छुटकारे संबंधी परमेश्वर के. क्‍ 
...... महान कार्यों और उनके प्रति मनुष्यों के प्रेम और भक्ति की अनुक्रिया से संबंध 


















. । .. एक है और केवल उसी की उपासना परमेश्वर के रूप में की जानी चाहिये 
.... _६:४) आकाश ओर पृथ्वी और समस्त राष्ट्र उसके शासनाधीन हैं (४:१९), 


पे ... हो जाने के बराबर है (५:२४-२५)। उस परमेश्वर ने अपनी अपार करुणा 
..  सेइस्राएल जाति को अपनी निज प्रजा के लिये चुन लिया और मिस्र की _ 
... दासत्व से उनको छुटकारा किया (७:६-८) । छुटकारे का यह महान कार्य 


... हुआ (७:७,८) | इस छुटकारे के पश्चात्‌ परमेश्वर ने उनके साथ एक वाचा 
.... बाँधी (७:१२) । तब हमें यह बताया 





हज रखती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक नये नियम के बहुत निकट है | परमेश्वर हे 


कर _ उसका तेज और महिमा इतती महान है कि उससे उसके सामने पहुँचना भस्म पा 


... इल्रोएल की योग्यता के कारण नहीं परन्तु परमेश्वर के महान प्रेम के कारण... 


जाता है कि परमेश्वर उसवाचा के प्रति... ः 
ही परमेश्वर है, वह विश्वासयोग्य........ 
उसकी आज्ञाएं मानते हैं, उनके साथ... 
पर करुणा करता रहता है” 








व्यवस्था विवरण मय 5 पथ 


(७:६९) । इस वाचा के साथ परमेश्वर अपने लोगों, वाचा के लोगों को एक 
देश देने की भी प्रतिज्ञा करता है (१:८;७:१,६:५४)। परल्तु इस वाचा में 
इस्राएल जाति के कर्तव्य भी निहित हैं:-- हर 
इस्राएल सावधान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि अपने परमेश्वर प्रभु को 
भूलकर उसकी आज्ञा, नियम और विधि को मानना छोड़ दे (5:११) । परमेश्वर 
की आज्ञाओं, विधियों और नियमों को मानना जीवित रहना है, उनको न 
मानना मृत्यु है (३०:१५,१६)। अन्य देवताओं की भक्ति करना घोर पाप है 
(६:१४,१५), क्‍योंकि "तुम्हारा परमेश्वर यहोवा भस्म करने वाली आग है; 
वह जल उठने वाला ईश्वर है! (४:२४) कठिन समयों में इस्राएल कुडकुड़ाने 
की परीक्षा में न पड़े (६:१६; ८5५) । धन संपत्ति की अवस्था में परमेश्वर को 
न भूल जाए (5:१२,१७,१८) अन्य देवताओं की पूजा के साथ समभोता न 
करे (१२:२) । अपने पूर्ण व्यक्तित्व के साथ एक ही परमेश्वर की उपासना 
पर बड़ा बल दिया गया है और उसे प्रधान कर्तेव्य माना गया है (१२:४५, 
१३,१४) । परमेश्वर ने इस्राएल को चुना, बचाया और उसके साथ वाचा 
बाँधी । इसलिये इस्राएल को सदा धन्यवाद तथा आतनंदपूर्ण विनम्र आज्ञा- 
पालन की भावना से भरे रहना चाहिये (5:१०; ६:५)-- तू अपने परमेश्वर 
यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और शक्ति के साथ प्रेम रखना। _ 


इस अनुग्रहकारी परमेश्वर के प्रति प्रेम और शक्ति के फलस्वरूप उसी 
भावना से मनुष्यों के प्रति भी बाचा के नियमों का पालन करता इस्राएल 
का कतेंव्य है । दासों के साथ उचित दया-व्यवहार करता चाहिये क्योंकि पर- 





मेश्वर की दया के कारण इस्राएली दासता से छड़ाए गए थे (५:१५) । दीनों.._ 


और कंगालों के प्रति दया का व्यवहार हो (२४:१५) । परदेशियों से प्रेम... 
भाव रखना (१००:१६) । परदेशी, अनाथ, बालक और विधवाओं के प्रति न्याय 
का व्यवहार करना (२४:१७,१८) पशुओं के साथ भी दया का व्यवहार किया... 
जाए (२५:४) । वाचा यह भी माँग करती है कि अपने व्यक्तिगत चरित्र में 


पूर्ण शुद्धता हो। व्यभिचार, वेश्यागमन, पुरुष गमन (२३:१७,१८), पशु 


से कुकर्म, बहिन आदि से कुकर्म (२७:२०,२१) इंस्राएल में न सुने जाएं । 


परमेश्वर की आज्ञाएं उनके मन में बनी रहें और इस्राएन का यह भी 2 
. कतव्य है कि वह अपने बालबच्चों को समंफाकर सिखाए (६:६,७,२०-२४) । 


.. वाचा को भंग करने और उसकी आज्नञाओं का उलंघन करने पर परमेश्वर: ा ह; 
.._ होगा और उन्हें जीवन प्राप्त होगा (३०:१५,१६) । 'सो आज से जान ले, 











. 5६... पुराना तियम की भूमिका 


और अपने मन में सोच रख कि ऊपर आकाश में और नीचे पृथ्वी पर यहोवा 
ही परमेश्वर है; और कोई दूसरा नहीं । और त उसकी विधियों और आज्ञाओं 
को जो मैं आज तुझे सुताता हूँ मानना, इसलिये कि तेरा और तेरे पीछ तेरे 
वंश का भी भला हो, और जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुके देता है, उसमें 


.. तेरे दिन बहुत वरन सदा के लिये हों! (४:३६,४०) । 























पनद्रह॒वां भ्रष्याय 


पंचग्रंथ की संरचना 


पंचग्रंथ की पस्तकों के संबंध में निम्नलिखित तथ्य द्रष्टव्य हैं। पहला 
जिसका पिछले पृष्ठों में उल्लेख किया जा चुका है कि इन पुस्तकों में ऐसे 
अनुच्छेद हैं जिनसे यह अनुमान किया जाता है कि लेखक मूसा के युग के 
परवर्ती युग | होगा (उदा., उ. २१:३४; नि. १३:१७; लें. २०:२३; 
व्यू, १:४५), और कि यद्यपि परंपरागतरूप से मूसा इनका लेखक माना जाता है 
तथापि कई संद्भों में मूसा का उल्लेख ऐसा किया गया है मानो कोई और व्यक्ति 
उनको लिख रहा हो । दूसरा, परमेश्वर को कभी-कभी परमेश्वर (इचब्रानी में 
एलोहीम) कहा गया है जैसे उत्पत्ति पहले अध्याय में, और कभी-कभी प्रभु 
(इब्रानी में शानए/प्न जिसे याहवे या यहोवा लिखा गया है), जैसे उत्पत्ति चोथे 
अध्याय में । तीसरा, कि कहीं-कहीं कुछ असंगतियाँ भी दिखाई देती हैं, जैसे 
उत्पत्ति १२:१५ में अब्नाम की पत्नी सारे इतनी सुन्दर युवा नारी है कि फिरोन 
उसकी प्रशंसा करे और अपने घर में रखे, परंतु उत: १२:४ और १७:१७ में 
वह उस समय कम से कम ६५ वर्ष की थी । तृह ने पशुओं को अपनी नाव 


में रखा। उनकी संख्या में भी असंगति है (उत. ६:२० और ७:२) । पंचग्रंथ 


में इन तथ्यों तथा अन्य. अनेक ऐसे तथ्यों के उचित स्पष्टीकरण के निमित्त 
उसकी साहित्यिक संरचना के संबंध में आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है । 


पंचग्रंथ की समालोचना कोई नया विषय नहीं है । चौथी शताब्दी में ही 
येरोम (३४०-४२० ई. स.) ने व्यवस्था विवरण की पुस्तक को और व्यवस्था 
की उस पस्तक को एक ही माना जो योशिव्याह राजा के शासन काल में 


(२ रा. २२:८) में मंदिर में हिल्किय्याह को मिली थी। परंतु आधुनिक, वैज्ञा- 


निक अर्थ में समालोचना का उदय १८वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में हुआ, और 
१९वीं शताब्दी में बह समालोचना समृद्ध हुई । पंचग्रंथ के मूल ख्रोतों के संबंध 
में विभिन्न मान्यताएँ अथवा प्रावकल्पनाएँ प्रस्तुत की गईं, जिनको वेलहॉसन 
प्राक्कल्पना में स्पष्ट रूप दिया गया। इस प्राक्कल्पना का पूरा नाम ग्रेफ-वेलहॉसन 
प्रावकल्पना है। इस प्राककल्पना के अनुसार माता जाता है कि पंचग्रंथ के 

















... छ८घ........... पुराना नियम की भूमिका... 


याहवेआत्मक (संक्षिप्त रूप) जे) (अंग्रेजी 32७॥098 ) 
एलोहीआत्मक (संक्षिप्त रूप 8 ई) (,, ४0०!॥7& ) 
व्यवस्था विवरणात्मक (,, ,, 2 डी) (,, 2०7/४०॥०7॥४५) 
..  पुरोहितात्मक (,, » 7 पी) (+ शिल्णाए) 
_ प्रलेख कहते हैं । ऐप 
इनकी तिथियाँ क्रमश: लगभग ई. पृ. नवीं, आठवीं, सातवीं और पांचवीं 
सदी निर्धारित की गई हैं । ये सब मूसा के बहुत काल पश्चात्‌ की तिथियाँ हैं, 
क्योंकि मसा कदाचित्‌ ई. पृ. १४ वीं सदी के उत्तराद्ध अथवा १३वीं सदी के 
..... ...  पूर्वाद्ध में हुआ था। यद्यपि इस प्राक्कल्पना की सामान्य रूपरेखा साधारणतया 
»... मान्य की जाती है तथापि अभी भी उसमें गौण संशोधन होते रहते हैं। 
... वेलहॉसन के कुछ अनुमान उन लोगों को मान्य नहीं हो सकते जो बाइबल को 
प्रेरणात्मक बचन मानते हैं, क्योंकि बेलहॉसन ने, वेज्ञानिक पद्धति के अनुरूप, 
अपनी अध्ययन प्रणाली में अति प्राकृतिक तत्व को स्थान नहीं दिया । उसकी 




















... 5चसे व्याख्या की जा सकती है, अर्थात वह धर्म प्रेतात्मवाद (कगगाशांशआ) से 

.. प्रारंभ होकर बहुदेववाद एवं इृष्टदेववाद से बढ़ता हुआ एकेश्वरवाद तक 
... पहुँचा, और कि विरोध एवं समन्वय के सिद्धान्तों के आधार पर इस प्रगति का 
| का : उद्घादन किया जाना चाहिये । धर्म के पूर्वनबृवतकालीन रूप का नबियों के 


._ (79०४-७०) कोटि के धर्म में हुआ । उनकी यह भी पूर्वमान्यता रही कि 


। .. की व्यवस्था निर्वासनोत्तर पुरोहितों की नवीन उद्भावना मात्र हो गई । 


.... निर्वासनोत्तर काल तक अलग ही रहती थी।. 
होता जा रहा है कि आदि काल 








.. पूर्व मान्यता यह रही कि इस्राएल के धर्म की प्रगति की विकासात्मक पद्धति 


. धर्म ने विरोध किया, जिसके फलस्वरूप एक समझौता या समन्वय निर्वाननोत्तर 


। .. पूराने नियम में इतिहास की रेखाएँ विश्वसनीय नहीं हैं, क्योंकि आगामी 
...... युग़ों की भावनाओ्रों एवं विचारों को आदिम अतीत में प्रक्षेपण किया गया है । 
... इस प्रकार महान्‌ व्यवस्था देनेवाला एक नगण्य बिंदु बल गया और वेलहाँसन 


...... पौराणिक कथा मात्र-रह गया । नबी लोग इल्रानियों के नैतिक धर्म तथा 
..  एकेश्वरवाद को प्रतिपादित करने वाले अग्रगामी मात्र रह गए, और मृसा 





....  बाइबलगत देशों की प्राचीन सभ्यताओं की उत्तरोतर बढ़ती हुई जानकारी... 
..... के कारण बेलहॉसन प्राककल्पना में विस्तृत संशोधन किए गए हैं। वेलहॉसन ने 

.. अपने विचारों का प्रतिपादन इस दृष्टिकोण से किया थामानो इस्राएएत जाति... 
“ थी। परंतु अब यह उत्तरोतर स्पष्ठ..... | ० 
| स्राएव जाति पर बाह्मप्रभाव पड़ते... 
हैं। उदारहणार्थ, यह सिद्ध हो चुका है कि मूसा के युग में वर्णगाला लेखन... 








पंचग्रंथ की संरचना हा 


प्रणाली ज्ञात थी, और कि इस्राएल के प्रारंभिक वातावरण में भी अच्छे 
विकसित धामिक उपासता-पंथ थे और एकेश्वरवादी विचारधारा भी 
विद्यमान थी । इन संशोधनों के उपरांत भी साहित्यिक विश्लेषण में वेलहासन 
प्रावककल्पना का इतना बड़ा महत्व है कि उसका यहाँ और अधिक विवेचन 


आवश्यक प्रतीत होता है । 


पंचग्रंथ के मलस्रोतों का पथककरण 


पंथग्रंथ के मुलस्रोतों के उद्घाटन की कुंजी निर्गमेमनन ६:२-३ में पाई 
जाती है, “और परमेश्वर ने मूसा से कहा कि मैं यहोवा हूं । मैं सर्वशक्तिमान 
ईश्वर (8] $॥400%7) के नाम से इब्राहीम, इसहाक, और याकूब को दर्शन 
देता था, परन्तु यहोवा (५०७॥फण०॥) के नाम से ही उन पर प्रगठ न हुआ ।” 


धर्मशासत्र के इस अनुच्छेद का लेखक यह मानता है कि 'यहोवा' नाम से 
अब्राम परिचित नहीं था क्योंकि मूसा के काल तक परमेश्वर ने यह नाम 
प्रकट नहीं किया था। इसलिये मूसा के पूर्व अनब्नाम और अन्य पितरों का 
वर्णन करते समय इन पदों के लेखक से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह परमेश्वर 
के स्थान पर 'याहवे' शब्द का प्रयोग न करे, जो उन यगों की दिव्य प्रेरणा के 
नुरूप नहीं है । इस सिद्धांत को ध्यान में रखा जाए तो निम्नलिखित अनुच्छेद 
उस लेखक के माने जा सकते हैं जिसने निर्मेमन ६:२-३ लिखा 


त्पत्ति १७:१--२, जहाँ परमेश्वर अब्राम से कहता हैं मैं स्वशक्ति 
मान ईश्वर हूँ (एल शद्दाय); मेरी उपस्थिति में चल, और सिद्ध होता जा । 
और मैं तेरे साथ वाचा बांधूगा (इबन्नानी : वाचा दूंगा) और तेरे वंश को 
अत्यंत ही बढ़ाऊँगा । ५ 


त्पत्ति २५:११, जहाँ परमेश्वर ने याकूब को दर्शन देकर कहा, “मैं 
स्वशक्तिमान ईश्वर हैँ (एल शद्दाय) : तू फूले-फले और बढ़े; और तुम से 
एक जाति वरन्‌ जातियों की एक बड़ी मंडली भी उत्पन्त होगी''और जो देश 
मैंने इबाहीम और इसहाक को दिया है, वही देश तुझे देता हैँ, और तेरे पीछे 
तेरे वंश को भी दंगा”... द न 





इसी तक के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन वर्णनोंमें जो 


मूसा को याहवे नाम के प्रकट होने के पूर्व के हैं, यदि याहवे चाम आया ठ 
है तो उनका मूलख्रोत निर्गं. ६: २-३ के स्रोत से भिन्न होना चाहिये । 


एक स्रोत और दूसरे स्रोत की सामग्री के पृथककरण के प्रयास में स्रोत 








की शैली का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपरोक्त अनुच्छेदों में कया हम 














& 022 8. हे पुराना नियम की भूमिका 


शैली की कुछ विशिष्टताएँ देख सकते हैं ? उनमें एक शब्द वाचा है। उस 
शब्द का जैसा प्रयोग इत अनुच्छेदों में हुआ है वह अन्य कई अनुच्छेदों, जेंसे उत 
१५:१८, के प्रयोग से भिन्न है, जिनमें इब्नानी मुहाविरा है वाचा काटना' । 
.. फू्‌लने फलने और बढने का विचार भी उपरोक्त अनुच्छेदों में सामान्य रूप से 
पाया जाता है, और उत., १७:२० में फिर आता है । सवशक्तिमान ईश्वर 
(एल शहाय, उत. १७:१) के में नये नाम का साम्य भी इस बात से है कि 
. अब्राम को भी एक नया नाम इब्राहीम दिया गया (उत. १७:४५), और सारे 
को भी नया नाम दिया गया (उत. १७:१५), और याकूब का नाम भी बदलकर 
इस्राएल किया गया (उत. ३५:१०) । कदाचित उत्पत्ति का पूरा १७वाँ 
अध्याय एक ही लेखक की लेखनी से प्रस्तुत है क्योंकि उत. १७:४५ के बाद 
लगातार अन्नाम के बदले इब्राहीम नाम प्रयोग किया गया है और खतने को 
वाचा का वर्णन बड़े व्यौरे के साथ किया गया है। यह भी द्रष्टव्य है कि पहले 
.. पद को छोड़, संपूर्ण अध्याय में पूज्य के लिये 'परमेश्वर' (एलोहीम ) का प्रयोग 
... किया गया है, और यह प्रयोग उत्पत्ति के चौथे अध्याय सदृश पंचग्रंथ के अन्य 
.._. अंशों में भिन्न है, जहाँ याहवे या यहोवा शब्द का प्रयोग किया गया है । यदि 
. हम उत. १७:१ को, जिसमें यहोवा शब्द का प्रयोग किया गया है, संपादकीय 
*.... समंजन मानकर छोड़ दें, तो उत्पत्ति का १७ वां अध्याय उसी लेखक का लिखा 
/8४॥ ../.. हुआ है जिसने मानक अनुच्छेद नि्गेमन ६:२-३ लिखा है। २७ पदों वाला 
.. उत्पत्ति का १७ वां अध्याय साहित्यिक शैली संबंधी तथा अन्य रोचक विचारों 
.. .. के विश्लेषण के लिए पर्याप्त है। ऐसे विश्लेषण में हम ठीक तिथियों में एक अभि- 
...... रुचि देखते हैं। (१७:१, १२, १७, २१, २३, २४, २५,), और ठीक निर्धा- 
रण में प्रायः वैधानिक रुचि देखते हैं (१७:१२-१४, २५, २६) । हमें ऐसे 
. प्रयोग मिलते हैं, जैसे जातियों के समूह का मूल पिता' (१७:४, दे. ३५:११), 

















.. पश्चात पीढ़ी पीढ़ी तक तेरे वंश के साथ भी (१७:६, ९,१९६), “अपनी अपनी 


ला प्रवृत्ति के भी दर्शन होते हैं कि जब किसी आज्ञा का पालन होता है तो सब 





. । . अत्यंत ही फुलाअऊ-फलाऊँगा' (१७:६), “अत्यंत ही बढ़ाऊगा' १७:२, २०), 
.. तैरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे। (१७:६, १६, दे. २०); तेरे साथ और तेरे 


"5० पीढ़ी (१७:७,१,१२) और 'युग युग की वाचा' (१७:७,१३,१६) । हमें इस हर 


... निर्देशों की पुनरावृत्ति की जाती है (१७:१२,१३ और १७: २३२७) | जो. 
.. इब्रानी भाषा पढ़ सकते हैं वे देखते हैं कि १७:१ में मैं शब्द का छोटा इब्रानी 


रूप (अनि) प्रयोग किया गया है, जब कि अनेक अन्य पदों में बड़ारूप 











। .. (अनोकी ) का प्रयोग किया गया है (उदा. उत.,१५:१ में ) 
वश्लेषण के इन परिणामों के कार' 


स्तुत हो जाते हैं। उपरोक्त प्रक 







हम और भी अधिक अनुसंधान के लिये. 
शैलीगत विशेषताओं को तथा अन्य विशे हर मा! 








पंचग्रंथ की संरचना .. ६९६१ 


पताओं को भी जो हमारे अध्ययन के समय उपस्थित होती जाएं, ध्यान में रख 
कर पंचग्रंथ का पाठ करें, तो हमें ऐसे बहुत से अनुच्छेद मिलेंगे जो नमूने के 
अनच्छेद अर्थात उत्पत्ति १७ के अन॒रूप होंगे । इसके आधार पर यह मानना द 
यृक्तिसंगत होगा कि इन सब अनुच्छेदों का मूल स्रोत एक ही है । उत्पत्ति के. 
पहले अध्याय में हम देखते हैं कि परमेश्वर (एलोहीम ) शब्द का प्रयोग किया. 
गया है; और ऐसे शब्द कि “उन्हें आशिष दी” फलो फलो ओर बढ़; 
जाओ उत्पत्ति १७:२० का स्मरण कराते हैं, और कि जब एक आदेश काय- 
रूप में पूरा हो जाए तो उसके सारे अंशों की पुनरावृत्ति की प्रवृत्ति भी पाई . 
जाती है (उत, १, ११, १२, २४, २५, २६, २८); और “नर और नारी” 
जो उत्पत्ति १:२७ में है वह कदाचित उसी लेखक की शैली है जिसने १७:१० 
में 'पुरुष' शब्द का प्रयोग किया । 

उत्पत्ति ५:१-३ भी उत्पत्ति १:२७ के समान है और एक दूसरा अनु- 
च्छेद है जिसमें 'परमेश्वर' (एलोहीम ) शब्द का प्रयोग किया गया है | अध्याय 
५ के शेषांश में वंशावली में ठीक अंकों के प्रयोग से भी हम इस परिणाम पर 
पहुँचते हैं कि उत्पत्ति १ और १७ में एक ही लेखती काय॑ कर रही है । उत्पत्ति 
५:१,२ में दूसरा नाम देने की बात भी द्रष्टव्य है (दे” उत० १७:५) । हम 
यह अनुमान करते हैं कि उत्पत्ति ५:१ में जो शब्द आए हैं “बंशावली यह है 
ये शब्द भी एक दूसरा विशिष्ट वाक्य खंड है, और हम यह विचार करने लगते 
हैं कि पंचग्रंथ में जितनी तिथियाँ दी हैं, वे भी कदाचित उसी स्रोत से हैं। लेखक 
द्वारा प्रस्तुत तिथि-क्रम के अनुसरण से हम कुछ विचित्र बातों का स्पष्टीकरण 
कर सकते हैं । उदाहणार्थ, एक विचित्र बात यह है कि इसहाक को मरने में 
८० वर्ष लगे (उत. २७:२: २५:२६; २६:३४; ३५:२८) । द 


यदि हम निर्गमन ६:२ और क्रमिक पदों को फिर से पढ़ें तो हम यह देखेंगे 
कि इस अध्याय के क्रमिक पदों में ठीक प्नरावत्ति की प्रवृत्ति (नि. ६:६,७, 
३,२६), और वंशावली देने में ठीक संख्याएँ देने की प्रवृत्ति भी पाई जाती 
. है (नि. ६:२०) | हम कुछ नई व्यंजनाएँ भी देखते हैं, उदाहरणार्थ खतना 
.. रहित ओंठवाले' (नि. ६:१२,३०), इस्राएल जाति को तिकाल ले आना । 





(पद १३,२६,२७) । हम यह भी देखते हैं कि लेवी की वंशावली, मूसा और 


 हारून की वंशावली, का वर्णन भी विस्तृत व्यौरे के साथ किया गया है। इस्रा- 
. एल जाति को मिस्र से तिकाल ले आने की आज्ञा में हारूत मूसा के साथ संबद्ध 
. किया गया है (६:२६) |. 


.... निर्गमन १२ में मुसा और हारून को फसह के पे के निर्धारण में संबद्ध | ना 
.._ किया गया है । किसी आज्ञा को प्रस्तुत करने में उसी प्रकार के व्यौरेवार वर्णन... 




















आह पुराना नियम की भूमिका 


है (पद ४ ऋ०), संख्याओं में वही रुचि है (पद ३, १८), और उसी प्रकार 
का पद विन्यास है तुम्हारी पीढ़ी भर! (१२:१४, १७; दे उत० १७:६) । मैं' 
के लिये इब्रानी का छोटा रूप भी (१२:१२) प्रयुक्त है। 


... निर्ममन की पृस्तक के उत्तरा के अध्ययन से पता चलेगा कि अध्याय 
२५-३१ अंश की सब बातों की (तंबू, संदूक एवं साथ की सामग्री) ३५-४० 
अध्यायों में पुनरावृत्ति हुईं है । अध्याय २५-३१ में आदेश दिया गया है और 
३५-४० में उसकी पूर्ति की गई है। ये बड़े-बड़े अंश भी उसी स्रोत से लिये 
गये प्रतीत होते हैं जिसका विवेचतल हम ऊपर कर आए हैं । इसके साथ ही निर्ग- 
पा मन की पुस्तक के उत्तराद्ध का अनुक्रम लव्यव्यवस्था की पुस्तक में है, क्योंकि 
५... < दोनों में ही लेखक की मूल रुचि धामिक उपासना, अर्थात विधि, बलि और 
हा हारून के प्रोहितत्व में है । 


जिस स्रोत को हम उपरोक्त विवेचन द्वारा पृथक करते आ रहे हैं, वह 
एक प्राक्कल्पित व्यक्ति है, जिसे हम केवल उसके लेखों के माध्यम से ही जानते 
















हे .. चाहते हैं, अतः यह प्रथा पड़ गई है कि उसे 'पुरोहितीय लेखक कहें, क्योंकि 
... उसकी मुख्य रुचि पुरोहितों'और उनके कार्यो से संबंधित है । संक्षिप्त रूप में 
... उसे 'पी' की संज्ञा दी गई है और उसकी लिखित सामग्री को 'पी-प्रलेख' कहा 

- जाता है। 


..... प'पु्रोहितीय लेखक' की मुख्य विशेषताओं के निर्धारण के पश्चात्‌ हम इस 
..... आशय से समग्र पंचग्रंथ का अध्ययत कर सकते हैं कि समस्त 'पी” सामग्री को 
... यूथक किया जाय । कुछ भागों में तो यह कार्य सरल है परन्तु कुछ में अत्यन्त 
...... कठित हैं। सरल अंशों के आधार पर साहित्यिक कसौटी के पूर्णतया निर्धारण के... 
..... पश्चात्‌ ही यह संभव हो सकेगा कि उत्पति ६ से ८ अध्यायों में जलप्रलय के _ 
... वर्णन जैसे जटिल भाग के विश्लेषण का प्रयास किया जाए। .. है 


... . जब समस्त 'पी सामग्री का प्रायः पूर्ण निर्धारण हो जाएं, तब उसका 

..... अध्ययन एक पूर्ण इकाई के रूप में किया जाए। चाहे तो एक नोटबुक में पंचग्रंथ .._ 
... के अंशों को चिपका लिया जाए अथवा शुद्ध पी सामग्री को लिख लिखा जाए 

.... इस प्रकार के अध्ययन से लेखक की सामान्य योजना और अभिप्राय का पता... 


हैं। उसका कोई नाम नहीं है और हम उसके संकेत के लिये कोई नाम अवश्य... 


. लग जाता है, जिसमें मनुष्यों को परमेश्वर को प्रकाशन के कईस्तर सम्मिलित... 


.... दिखाई देते हैं । इनमें पहला है, सृष्टि की रचना के समय सबूत का निदिष्ट 










पर मनुष्य के अधिकार का अधिनियम 









परचातू नूह के साथवाचां बांघना | 











पंचग्रंथ की संरचना... 820 न, 


और उसका चिन्ह 'इन्द्रधनुष” है, जिसके अनुसार मनुष्य को माँस खाने कीअनु- 
मति दी गई है इस शर्ते पर कि लोह न खाया जाए ; साथ ही मनुष्य के मांस 
खाने का निषेध किया गया है ।इस वाचा में परमेश्वर यह प्रतिज्ञा करता है. 
_ कि मानवजाति को वह जलप्रलय से फिर नष्ट न करेगा। अन्नाम के साथ वाचा _ 
में नया नाम एल शहाय' प्रकट किया गया है और उस वाचा का चिन्ह खतता 
है, और उसकी प्रतिज्ञा कनान देश है । अंत में मूसा के साथ वबाचा में परमेवर 
से अफ्ता परम पवित्र नाम यहोवा प्रकट किया और उस वाचा का चिन्ह मिस्र _ 
के दासत्व से छूटकारा हुआ व्यवस्था और पुरोहितीय उपासना की प्रतिष्ठा 
हुई, और उसकी प्रतिज्ञा यह है कि इस्राएल जाति उसके निज लोग हैं। 


पी सामग्री को पंचग्रंथ से पृथक करने के पश्चात्‌ शेष सामग्री की समीक्षा 
के लिये हम तैयार हो जाते हैं। हमें फिर यह दिखाई देता है कि विभिन्न 
वर्णनों में परमेश्वर के नाम की भिन्नता मूसा से पहले के वर्णनों में फिर भी 
विद्यमान है । यह दिखाई देता है कि कुछ अंशों में एलोहीम और कुछ में यहोवा 
का प्रयोग किया गया है। अतः दूसरा चरण यह है कि हम उस सामग्री को 
जिसमें एलोहीम का प्रयोग किया जाता है उसी रीति से पृथक करें जिस 
रीति से हमने पी सामग्री पृथक की । सूक्ष्म अध्ययन से विशिष्ट साहित्यिक 
विभिन्‍नताएँ दृष्टिगोचर होती हैं । उदाहरणार्थ, यहोवा सामंग्रियों में जिसे 
याहवेआत्मक अथवा 'जे' सामग्री कहा जाता है, उस पहाड़ के लिये जहाँ मूसा 
को व्यवस्था दी गई, सीन पहाड़ कहा गया है । परंतु एलोहीआत्मक सामआ्री में 
जिसे *ई कहा जाता है, उसी पहाड़ के लिये होरेब शब्द काम में आता है 
(नि. १९:१८-जै; नि. १७:६--ई) । जे सामग्री में पलिश्तीव के आदि- 
वासियों को कनानी कहा गया है, परंतु ई सामग्री में उन्हें अमोरी कहा गया 
है (उत. १२:६-जे; उत. १५:१६-ई) । जे में मूसा के ससुर का नाम रूएल 
है (गि. १०:२६), परंतु ई में उसका नाम यित्रो है (नि. १८:१) । विशिष्ट पद. 
विन्यास के भी दर्शन होते हैं । जे में 'देश जिसमें दूध और मंधु की धारा बहती... 
है (नि. ३:८; गि. १३:२७), और “यहोवा हमें मिस्र देश में से निकाल लाया 
(नि. ३:१७) जेसे पद हैं; परंतु ई में इस्राएल को मिस्र देश में से निकाल 
. लाया' पद है (नि. ३:१७)। ई का संबंध नबियों के दर्शन से जान पड़ता है, 


_ क्योंकि इब्राहीस का वर्णन नबी के रूप में किया गया है (उत. २०:७), और े 


.. मुसा का भी काये नबी जैसा कार्य है (नि. ३:१-१२) । 


... अब मान लीजिए कि पुराने नियम के विद्वानों की सर्वाधिक सहमति के हे < । हे 
अनुसार जे सामग्री और ई सामग्री का पृथककरण कर लिया गया । इसके पश्चातूु 


.... जैसे पी सामग्री को हमने पृथक लिख लिया या संजो लिया वैसे ही इनको भी... 











९४... पुराना नियम की भूमिका 


संजोया, तब भी यह पता चलेगा कि पंचग्रंथ का एक बहुत बड़ा अंश अध्ययन 

. करने के लिये बचा रहेगा | यह शेषांश व्यवस्थाविवरण की पुस्तक रहता है 
. जो अपनी अलंकारिक तथा प्रवचनात्मक शैली में अन्य प्रकार की शैली से पृथक 
.. जान पड़ता है | इसके विशिष्ट पद-प्रयोग ये हैं । 'जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा 
तुफे देता है उसमें तेरे दिन बहुत हों (व्य. ४:४०; ५:३३), वबलवन्त हाथ 
और बढ़ाई हुई भुजा' (व्य. ५:१५; ११:२), परदेशी, अनाथ और विधवाएँ 
(व्य. १४:२६; २७:१६), इस बात को स्मरणरखना कि तू भी मिस्र देश में 
दास था' (व्य. ५:१५; १५:१५), अपने सारे मन और अपने सारे प्राण” 

. (व्य, ४:२६; ६:४५; २६:१६) ।ई के समान इसमें उस पर्वत को जिस पर 
मूसा को व्यवस्था दी गई थी होरेब' कहा गया है (व्य. १:६) । ऐसे अंश को 

डी' स्नोत कहा गया है। 


हर इस विश्लेषण के आधार पर समस्त पंचग्रंथ की प्राय: सब सामग्री का 
स्पष्टीकरण हो जाता है । केवल लूत के पकड़े जाने और रक्षा का वर्णन (उत. 
..... १४) साहित्यिक सामग्री के इन चारों भागों में कहीं स्थान नहीं पाता । अतः 
... उत्पत्ति १४ वें अध्याय को बेचारा अनाथ' कह देते हैं और उसके संबंध में और 
.... अधिक खोज की जा रही है। 


... इस प्रकार की साहित्यिक समालोचना का प्रयोग पंचग्रंथ के बाहर पुराने 
.... नियम की अन्य पुस्तकों पर भी किया गया है, और यह ज्ञात हुआ कि यहोशू 
... की पुस्तक में भी जे; ई, डी और पी प्रकार की साहित्यिक सामग्री मिलती है । 
.... अंतएव समालोचना की दृष्टि से पुराने नियम कीं पहली छः पुस्तकें षष्ठग्रंथ 
..... कहलाती हैं, परन्तु बाइबल के परंपरागत पुस्तक विन्यास में इस प्रकार की... 
_..... .- कोई इकाई नहीं है । द हे प 

... ख्रोतों की तिथि व ह। 
.. पंचग्रंथ (अथवा षष्ठग्रंथ) के विभिन्न साहित्यिक मूल स्रोतों के पृथवकरण 


5 के पश्चात्‌ अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इब्नानी इतिहास के समय और 
.. स्थान की दृष्टि से इनका पारस्परिक संबंध क्या है ? अनेक संभावनाएं प्रस्तुत 

















० ः ः .. की जाती हैं। जैसे कि सब मूल खोत एक ही युग के अथवा विभिन्न युगों के... 2 द 22 द 
... हों और कि एक संपादक के अथवा एक से अधिक संपादकों के द्वारा इनको 


....._ वर्तमान पंचम्रंथ में संयोजित किया गया । हो सकता है कि पंचग्रंथ का मुसा के... 
.._ साथ परंपरागत संबंध के अनुरूप यह संयोजन मूसा के युग में हुआ हो, बथवा... 










चग्रंथ के कुछ अनुच्छेदों के अनुरूप 





गेजन पलिश्तीन में परवर्ती युग में... 











पंचग्रंथ की संचता...... ७६५ 


इस समस्या के सुलभाने की दिशा में उस समय तक कोई प्रगति नहीं हुईं, 
जब तक कि पंचग्रंथ की विविध विधियों के अध्ययन का माध्यम न अपनाया 
गया । कई विधियों की एक बार आवृत्ति हुई है और कई की दो बार, क्योंकि 
प्रयेक मूल स्रोत में कुछ विधियाँ विद्यमान हैं। इन अंशों के तुलनात्मक 
अध्ययन से रोचक परिणाम प्राप्त हुए हैं। उदाहरणार्थ, हत्या संबंधी नियम को 
लीजिए । वह निर्ग. २१:१-१४ में पाया जाता है (जिसमें जे और ई सामग्री मिली 
जली है), गिनती ३५:९-३४ में (पी सामग्री ) और व्यवस्था विवरण १६:१-- 
३(डी सामग्री ) में पाया जाता है। इन तीनों की तुलना करने पर हमें पता 
चलता है कि इनमें से पहला संक्षिप्ततम है, दूसरा विस्तृततम है, और तीसरा 
मध्यम विस्तार का है। व्यवस्था विवरणात्मक वर्णन में एक मनुष्य के कुल्हाड़ी 
से घात किए जाने का वर्णन है और ऐसा प्रतीत होता है मानों वह किसी 
घटना विशेष की ओर संकेत कर रहा हो | गिनती के वर्णन में हत्या के अनेक 
साधन हैं-लोहा, पत्थर या काठ, और उसमें बदला लेने वाले के कतंव्य, तथा 
हत्यारे के शरण-नगर में रहने की अवधि के संबंध में निर्देश दिए गए हैं । 
.. यह अनुमान किया जाता है कि एक विस्तृत विधि-निर्देश यह संकेत करता है 
. कि हुत्या संबंधी साधारण नियम के व्यवहार में अधिक अनुभव हो गया है। 
. इसलिये उपरोक्त उदाहरण में, हत्या संबंधी “जे ई विधि सबसे प्राचीन मानी 
गई, डी विधि उससे कुछ काल पश्चात की और पी विधि उसके और परवर्ती 
काल की, क्योंकि वह सबसे अधिक व्यौरेवार है । इसी पद्धति के आधार पर 
अन्य विधियों का भी अध्ययन किया जा सकता है, और इसी प्रकार के परिणाम 
भी प्राप्त होते हैं। अत: इन मूल स्रोतों का सापेक्षित काल क्रम यह है कि 
पहला जे ई है, दूसरा डी' है, और तीसरा (पी है। 
व्यवस्था विवरण की रचना एवं तिथि का विवेचन करते हुए ऊपर यह 
हा गया था कि अनुमान किया जाता है यह पुस्तक सातवीं शताब्दी ई. पृ. में 
लिखी गईं, और कदाचित मनश्शे के राज्यकाल में, लगभग ई. पू. ६४० में 





लिखी गईं | यदि इसको प्रायः ठीक मानकर चलें तो जो कुछ ऊपर कहा गया... 


है उसके आधार पर 'जे' और ई' ६५० ई. पृ. से पहले के मूल स्रोत होंगे, और 
री! उसके बाद का । ई! में नबी के पद का संकेत होता है अतः यह विचार 


किया जाता है कि यह प्रारंभिक नवियों के काल का, अर्थात आमोस और होगे... 


काल का होगा। इस प्रकार 'ई' की तिथि ई. पू. ७५० मानी जाएगी । विचार 
किया जाता है कि जे ई' से पहले का है, क्योंकि उसमें इस्राएल जाति के _ 


.. एक निज लोग के रूप में अलग किए जाने की चेतना उतनी नहीं है जितनी ० । 
.. ई' में । साथ ही जे की शैली “ई' की शैली से हे सरल भी है। अतः इब्रानियों में. , 











है 6. डिव पुराना नियम की भूमिका 


काल से जे! को संबंधित किया जाता है । परन्तु जे भी कुछ जटिल है और 
: उसमें पूर्वकाल तथा उत्तरकाल दोनों की सामग्री मिश्रित है।अतः जे की 
: तिथि लगभग ई. पृ. १०००-८५० के बीच मानी जाती है। 


पी! की तिथि व्यवस्था विवरण के पश्चात्‌ मानी जानी चाहिये। यहे 


. जकेल के साथ इस पस्तक की समानताएं द्रृष्टव्य हैं। यहेजकेल पुनेवासित. 


. जाति और पुननिर्मित भवन के वैसे ही व्यौरेवार वर्णन करता है जेसा “पी 
में मिलाप के तंबू और उसकी सामग्री का है (यहे. ४०-४८; लि. २५-३१) 
ठीक तिथिक्रम और व्योरेबार वर्णन में बड़ी रुचि प्रदशित की गई है। प्‌ रोहि- 
तीय प्रकरणों, सबृत, खतना एवं व्यवस्था को उतना ही महत्व दिया गया है 
जितना निर्वासित और निर्वासिनोत्तर समाज में महत्व था। इस कारण पी 
. की तिथि ई. पृ. ५००--४४५० निर्धारित की जाती है । 


पंचग्रंथ का विकास 
हमने पंचग्रंथ के मूलखोतों और उनकी संभाव्य तिथियों के संबंध में 
प्रावकल्पना का निर्माण कर लिया । इसके पश्चात्‌ हमारे समक्ष यह समस्या 
उत्पन्न होती है कि उस प्रणाली की खोज करें जिससे ये स्रोत वर्तमाव रूप में 


».. संयोजित हुए। इसके लिए और अधिक गहन साहित्यिक विश्लेषण की 
 ., .. आवश्यकता है | उदाहरण लीजिए। यह देखा गया है कि निर्गमन १-४ में जो _ 
५. पी! सामग्री है वह जे 'ई! सामग्री के एक कऋ्रमिक वर्णन के संबंध में सम्पाद- 
| + ... कीय पूरक के रूप में दे । परंतु जहाँ नि्गंमन ६ के समान “पी” सामग्री का अंश 
..... अधिक है, वहाँ पर जि! “ई! सामग्री के कोई संपादकीय पूरक नहीं हैं। अतः 
..... यह विचार किया जाता है कि जब “'पी' लिखा जा रहा था, तो उस समय जेई 
...... का अस्तित्व था। इस प्रणाली के आधार पर पंचग्रंथ या यों कहें कि षष्ठग्रंथ _ 
. .. .ौडृस्‍के विकास के संबंध में पुराने नियम के विद्वानों ने कुछ सामान्य निष्कर्ष निकाले... 
....  हैं। विकास की प्रक्निया में पहला चरण यह था कि जे का ई के साथ संयोजन... 
... हुआ | वह प्रावकल्पित व्यक्ति जिसने यह संयोजन किया, जे और ई का प्राचीन 
.... संपादक (7२6680६07) कहलाता है और इसका संकेत 7२7४8 से किया जाता. 








..... है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसने अपना कार्य व्यवस्था विवरण के... 


5 . लिखे जाने के कुछ काल पूब्, अर्थात ई: पू. ६५० में किया । व्यवस्था विवरण... 
.... . को स्थापना के पश्चात्‌ कभी व्यवस्था विवरण और 'जेई का संयोजन हुआ । 







। इस कारय को करने वाले संपादक (8९१४०७ए ) का दृष्ठिकोण व्यवस्था... 
_ विवरण का दृष्टिकोण है, इसलिये इसे व्यवस्था विवरणात्मक संपादक कहते | 








.. राजधानी बनाने का निश्चय किया, तब 











पंचग्रंथ की संरचना बा के कह 0 


का उदय निर्वासन काल में हुआ । निर्वासन या बंधुवाई के उपरांत कभी पी 

तैर पिछले संग्रह का संयोजन किया गया । उस संपादक का दृष्टिकोण 
. पुरोहितीय था और उसे पुरोहितीय संपादक कहते हैं। उसका संकेत चिन्ह 
क्ग्है। 


प्रलेखात्मक प्रावकल्पना में संशोधन 


विज्ञान के सिद्धांत और प्राककल्पनाओं का कोई अंतिम रूप नहीं होता । 
इसी प्रकार यद्यपि उपरोक्त प्रावकल्पना की मूलधारणाएँ सामान्यतया स्वीकृति 
हैं, तथापि उसे अंतिम या सिद्ध नहीं माना जा सकता । कुछ छोटी मोटी बातें 
अभी विवादास्पद हैं। उदाहरण के लिये, यह साधारणतया माना जाता है कि 
जे' में दो सूत्र हैं, एक प्रारंभिक और दूसरा उससे बाद का। प्रारंभिक सूत्र 
को जे) और बाद वाले को जे* कहा जाता है। आइसफेल्द ([258/०0॥) वामक 
विद्वान ने यह मान्यता प्रस्तुत की कि जे' एक सामान्य स्रोत है जिसमें सृष्टि की 
उत्पत्ति से लेकर दाऊद की मृत्यु तक का वर्णन है। इस मूलस्रोत को वह एल (१.) 
की संज्ञा देता है ([.8५ स्रोत) । इस प्रकार पंचग्रंथ में वह चार के स्थान पर पाँच 
मूल स्रोत मानता है । इसके विपरीत फाइफर (#क्रक्षिश्टि) नामक विद्वान 
 आइसफेल्द की मान्यता को उत्पत्ति की पुस्तक के आगे सामग्री के संबंध में 
अमान्य करता है और उत्पत्ति में जे” सामग्री के लिये दूसरा ही सिद्धांत 
प्रतिपादित करता है। उसका विचार है कि पी को निकालकर उत्पत्ति १-११ 
और उत्पत्ति १४-३५, ३६, ३८ का मूलख्रोत दक्षिण पलिश्तीन तथा यर्देन 
पार का कोई अ-इस्राएली स्रोत है। वह उसे दक्षिण अथवा सीअर (एदोम का 


तगर) खरोत कहता है और उसे प्रतीक 'एस” (8) से इंगित करता है। इसके... 


जल 


अन्तर्गत भी वह दो भाग करता है --एस' जो पहला स्रोत है और एस" जो 


बाद में जोड़ा गया । मार्दिन नॉथनामक विद्वान की भी एकमान्यताहै। 


इस मान्यता में 'षष्ठग्रंथ की साहित्यिक समस्या में से व्यवस्था विवरण 
और यहोश की प॒स्तकों को वह अलग करता है और उन्हें व्यवस्था विवरणा- 


_त्मक इतिहास में रखता है, जिसमें व्यवस्था विवरण, यहोशू, न्‍्यायियों, शम्‌एल * 8 


. और राजाओं की पुस्तकें सम्मिलित की जाती हैं । 


.. इन्रानी इतिहास की घटनाओं के साथ षष्ठग्रंथ के विकास का संबंध भी 
. खोज की एक दिशा स्वीकार की जाती है। सिपसन नामक विद्वान के अनुसार 
_ जै में ई. पू. ११वीं और १२वीं सदियों की परिस्थितियों की कलक मिलती 


... है, जब कि प्राचीन गौरवगरिमा की रक्षा के लिये प्राचीन परंपराओं को लेख- हा 
.._ बद्ध किया गया। उसका कथन है कि जब दाऊद ने यरूशलेस को अपनी रा .. ा ५ 









यह भय हुआ कि हैब्रोन का... ० 








हद. .... प्राना नियम की भूमिका 


. गौरव नष्ट हो जायेगा, इसलिए हेब्नोन के प्रति भक्ति जे; में दिखाई देती 
है और जे! की रचना कदाचित उस समय हुई। जे" में उत्तर तथा 


.. दक्षिण दोनों राज्यों की परंपराएँ संकलित हैं और उसकी रचना इस 


 उहेश्य से की गई होगी कि सुलेमान की मृत्यु के पश्चात्‌ दुःखांत पतन के 
समय इब्रानियों की आत्मिक एकता की रक्षा हो सके। विचार किया जाता 
है कि जे? का उद्गम स्थान यरूशलेम था। अनुमान है कि ई' में इस्राएल की 
. उन परंपराओं की अभिव्यक्ति है जो शेकेम के लोगों की स्मृति में थी और 
. उन्होंने संकलित की । “ई! को कदाचित्‌ इसलिये लेखबद्ध किया गया कि ई 
पृ. ७२१ में शोमरोन के विनाश के पश्चात्‌ जब सब कुछ नष्ट हुआ सा प्रतीत 
हुआ, उस समय इब्नानियों की प्रिय परंपराओं की रक्षा की जा सके । सिंपसन 
. का विचार है कि व्यवस्थाविवरण का मूल रूप उत्तर राज्य में इस समय इस 
.. उद्देश्य से आरंभ किया गया कि एक आत्मिक जागृति और सुधार संभव हो । 
. ई. पू, ६२२ में योशिय्याह का सुधार यहुदा में इसी प्रकार का आंदोलन था, 


का .._ परन्तु वह व्यवस्था विवरण की पुस्तक पर प्रत्यक्ष रूप से आधारित नहीं था । 
.... उसका विचार है कि जे ई डी का एकीकरण ईं. पृ. ५६८-५३८ की बंधुवाई 


.._ के समय पलिश्तीन में बचे यहदी समाज का अधिकृत राष्ट्रीय इतिहास था, और _ 


. . उसका प्रमुख केन्द्र शेकेम था; और कि पी अर्थात पुरोहितीय प्रलेख उत्त 





.._ लोगों का अधिकृत इतिहास था जो बंधुवाई के अंत में बाबुल से लौट आए 


पा वर्तमान षष्ठग्रंथ में जे ई डी और पी का संयोजन किया गया जिसमें एकता की _ 
| - .. अंतिम भावना की अभिव्यक्ति होती है | ० मी 


हा । ' ः पञच्र॒ग्नथ. स मसा का स्थान 


प्रलेखात्मक प्रावकल्पता के कारण यह प्रश्न उपस्थित होता है कि पंचग्रंथ 


:...... की विषय-सामग्री से मूसा का कितना संबंध है ? कुछ लोगों का विचार है. 
...... कि उस सामग्री से मूसा का कोई संबंध नहीं। पी प्रलेख (निर्गम, २५-३१). 
...... में पाए जाने वाले तंबू और हारून के पुरोहितत्व संबंधी निर्देश मूसा के दिए 
...।. /- हुए प्रस्तुत हैं। उन विद्वानों का कहना है कि यह बंघुवाई अथवा बंधुवाई के 
...... उत्तरकालीन पुरोहितों का एक 'पवित्र छल' मात्र है। इस प्रकार का विचार 
.... न केवल यहुृदियों ओर खस्रिस्तियों के विश्वास की मूल मान्यताओं से असंगत है, 









..... वरव्‌ ऐतिहाहिक संभावनाओं के विपरीत भी है। किसी भी परंपरा का सामान्य... 
...॑._ स्पष्टीकरण उस ऐतिहासिक घटना में सिलता है जिससे परंपरा का जन्म. 
.. होता है। मिस्र के दासत्व से छुटकारे तथा सीने पहाड़ पर वाचा की सुदृढ़ 
परंपरा के लिये मूसा जैसे मनु व्यक्तित्व की आवश्यकता थी ।मूसाके .... 
खों की. द्वारा स्थापित उपासना विधियों के... 







लेखों की मौखिक परंपरा के और 



































पंचग्रंथ की संरचना... 8६ 


माध्यम से आने वाली पीढ़ियों में मृसा की स्मृति रहेगी | इन कार्यों से अगामी 
पीढ़ियों में साहित्यिक प्रयासों के लिये एक आधार उपलब्ध होगा। परन्तु 
निश्चित रूप से निर्धारित नियम-संहिता की अपेक्षा जीवित विश्वास के केन्द्र 
स्वरूप मूसा की स्मृति अधिक सुरक्षित रही । यह भी स्वाभाविक है कि परमे- 
श्वर की ओर से बोलने और वाचा का अर्थ बताने का उसका अधिकार उसके 
उत्तराधिकारी को सौंपा गया (दे. यहो. २४:२५-२७) । इस प्रकार मूसा को 
व्यवस्था में एक प्रवाहशीलता और समंजनशीलता थी और इस महान व्यवस्था 
देनेवाले के युग के बहुत समय पश्चात उसकी परंपराएं एवं उपासना विधान 
लेखबद्ध किए गए। प्रलेखात्मक प्राक्कल्पना इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि 
वह जीवित परंपरा कैसे लेखबद्ध की गई; परन्तु उस परंपरा के उद्गम पर 
प्रकाश नहीं डालती | उसके उदगम का सर्वश्रेष्ठ स्पष्टीकरण उसकी ऐतिहा- 
सिक घटना में ही है। मूसा ने बड़ी सच्चाई से परमेश्वर के महान कार्यों को 
प्रस्तुत किया है । इस सच्चाई पर ही पुराने नियम का विश्वास आधारित है । 
बह विश्वास उन महान कार्यों को लेखबद्ध करने की प्रक्रिया पर आधारित 
नहीं है। . 
एक प्रकार से इस प्रलेखात्मक प्रावकल्पना से इब्नानी विश्वास की सप्राणता 
को समभने में हमें सहायता प्राप्त होती है। यदि इब्नानी विश्वास सप्राण न 
होता तो परंपरा के विभिन्न मूल स्रोतों को संयोजित करने की इतनी दीरे 
प्रक्रि की, तथा लगातार संपादन तथा संशोधन की क्या आवश्यकता थी ? 
अन्य किसी भी जाति के साहित्य में इस प्रकार की प्रक्रिया का साम्य मिलना 
दुर्लभ है । इसका वास्तविक कारण यही है, कि संकलित लेखों की इब्रानी लोगों 
के जीवित विश्वास के मान से लगातार जाँच और पुन-जाँच की जाती थी 
क्योंकि यही जीवित विश्वास का वह साधन था जिसके माध्यम से परमेश्वर 
ने अपने महान अभिप्रायों की पूर्ति की । 6 आम 























.. सोलह॒वां अध्याय 


ऐतिहासिक पुस्तक 


. पंचग्रंथ की पाँच पस्तकों के पश्चात प्राने नत्ियम की अन्य पुस्तकों का 
विभाजन एवं क्रम विभिन्न बाइबलों में भिन्न है। इब्नावी बाइबल में व्यवस्था 
या पंचग्रंथ के पश्चात्‌ दो भाग हैं, अर्थात नबी और लेख । इब्नानी बाइबल में 
नत्रियों के अन्तर्गत यशायाह, यिर्मयाहु आदि नबियों की प॒स्तकों के अतिरिक्त 
ऐतिहासिक पुस्तकें भी सम्मिलित हैं यथा यहोशू, न्‍्यायियों, शमृएल और 

_ राजाओं को पस्तकें । 


.ै....  सप्तति अनुवाद में पंचग्रंथ के पश्चात्‌ तीन कोटि की पुस्तकें हैं अर्थात 
.... ऐतिहासिक पुस्तकें, काव्यात्मक एवं नीति की पुस्तकें और वबियों की पुस्तकें । _ 
.. यह विभाजन वुल्गाता में स्वीकृत हुआ और वहाँ से अँग्रेजी और भारतीय 
.. भाषाओं के अनुवादों में आया। सप्तति अनुवाद में ऐतिहासिक पुस्तकों की 
... संख्या अठारह है, जिनमें गुनानी एस्द्रस', यूदित, तोबित और मकाबी की चार 
.. पुस्तकें सम्मिलित हैं। वुल्गाता में ऐतिहासिक पुस्तकों की सूची के अंतर्गत 
<.. चौदह पुस्तकों हैं। उसमें १ और २ मकाबी भी हैं । उनको मिलाकर वुल्गाता 
..... में सोलह ऐतिहासिक पुस्तकें हैं। बुल्गाता में यूदित, तोबित ओर मकाबी की. 
| दो पुस्तकें हैं, परन्तु 'युनानी एस्द्रस' नहीं है। ० 
..../।  प्रोतेस्त॑त अंग्रेजी बाइबलों में निम्नलिखित ऐतिहासिक पुस्तकें हैं; यहोशू, 
..... .. न्यायियों, रूत, १ और २ शमृएल, १ और २ राजा, १ और २ इतिहास, एजा, 
.......  नहेम्याहू, और एस्तेर--कुल बारह । इनका क्रम तो वुल्गाता के माध्यम से 
.. .. सप्तति अनुवाद से लिया गया, परन्तु विषय सूची इब्नाती बाइबल के अनु 
.. .... बाइबल की ऐतिहासिक पुस्तकें इस भावना से नहीं लिखी गईं कि घटनाओं 
..... के अभिलेख किए जाएँ अथवा महावीरों की गाथाएँ याई जाएँ, न ही वे आघधु- 
.... - निक इतिहासकारों के प्रमाण एवं निवेचन के नियमों के आधार पर लिखी गई 















मा ः हैं। उनका अपना विशिष्ट दृष्टिकोण है जिससे वे समय और परिवर्तन को ध 














. परमेश्वर की वाचा के संदर्भ 


। उनकी इस बात में अधिक रुचि है कि कोई राजा इख्राएल के साथ. 
मिक एवं भक्तिपूर्ण भाचरण करता हैं अथवा... 








द ऐतिहासिक पुस्तक -० 0 जल 





नहीं । राजा के सैनिक शौरकर्म अथवा नागरिक कार्यों में इतनी रुचि नहीं है। 
उसकी भावना परसेश्वर-केन्द्रित थी, क्योंकि वे ऐतिहासिक घटनाओं का कारण 
आर्थिक, राजनीतिक अथवा सामाजिक कारणों जैसे गोण कारणों को नहीं, 
बरन्‌ आदि कारण” परमेश्वर को मानते थे। अतएवं ये पुस्तकें इस्राएल के 
इतिहास की इतनी नहीं जितनी वे अपने लोगों के बीच परमेश्वर की वाचा के 
कामों की हैं। वे वाचा का इतिहास हैं। यद्यपि उन्तके लेखकों के नाम हमें ज्ञात 
नहीं, परन्तु इतना निश्चित है कि वें उसी आत्मा से प्रेरित हुए जिसने नबियों 
को प्रेरणा प्रदान की। उन्होंने मानवीय इतिहास के कथानक में परमेश्वर के 
कार्यों का वर्णन किया और इस रूप में उन्होंने परमेश्वर की ओर से कहा। 
उस प्रकार वे वास्तव में नबी थे अर्थात परमेश्वर की ओर से बोलने वाले, 
और इसलिये इब्नानी बाइबल में उनको जो “पूर्व नबी' के विभाग में रखा गया 
है वह उचित ही है । 






























































सञ्नहवां अध्याय 


_यहोशु 
: १, शीर्षक 


इस पुस्तक का नाम यहोश पर रखा गया है | यह मूसा का उत्तराधिकारी 

था। पुस्तक की अधिकांश सामग्री यहोशू द्वारा इस्राएल के नेतृत्व से संबंधित 

है। इब्रानी बाइबल में यह पुस्तक 'पू्वे नबी विभाग में पहिली पुस्तक है, 

जिससे यह संकेत मिलता है कि यहूदियों के मन में यह पुस्तक "नबी को पुस्तक' 

क इस अर्थ में मानी जाती है कि इसमें परमेश्वर की ओर से संदेश दिया गया 

है। सप्तति अनुवाद, वुल्गाता और अंग्रेजी तथा हिन्दी बाइबल में यह पुस्तक 

ऐतिहासिक पृस्तकों के विभाग में है। इब्नानी में यहोशू नाम आया है, 

सेपत्वांगिता में एसूस! (जो युतानी में यीशू है), और वुल्गाता में यहोशू 
आया है| द 

२६८ विषय-सामग्री का सारांश 


.... यहोशू की पुस्तक में यहोश के नेतृत्व में प्रतिज्ञा के देश कनान की विजय, ः 
. गोतों में विभाजन और कनान में बस जाने का वर्णन है| 


7 है. छपरेखा क्‍ 
रा यहोश : प्रतिज्ञा के देश पर अधिकार 
पा ह १ ) तेयारी की घटनाएँ... 
प्रतिज्ञा के देश प्र अधिकार करने के हेतु इस्राएल का नेतृत्व करने 
के लिये परमेश्वर यहोशू को बुलाता है। ५; 
(क) परमेश्वर का यहोश को दायित्व सौंपना (१:१-६ ) 
(ख) यदेन को पार करने की तैयारी (१:१०-२:२४): यर्देत के. | 
पूर्व के अढ़ाई गोत्रों का सहयोग के लिए वचन (१:१२- 
१८); यरीहो में भेदियों का भेजा जाना (२:१--२४)। 


न पार उतरना ( ३-५:१ ) : गंभीर निर्देश ( ३:१-१३) 
के पानी का थम जाना (३:१४-१७); यर्दन से 

























बारह पत्थर स्मारक स्वरूप उठाकर पड़ाव में रखना (४: 
१-४:१) । 
२) कनान पर विजय (६--१२ 
क) यरीहो का ले लिया जाना (६) 


ख) ऐ नामक स्थान में इस्राएलियों की पराजय। कारण 
आकान का पाप, आकोर की तराई में आकान का पत्थर 
किया जाना (७) । 


ग) ऐ का ले लिया जाना (८:१-२६) 


घ) एबाल पहाड़ पर वेदी का बनाया जाना और व्यवस्था का 
पढ़ा जाना (८5:३०-३४५ 


च) गिबोनियों का छल से यहोशू के साथ वाचा बांधना (६) । 


| छ) लम्बे दिन के युद्ध में यहोश्‌ अदोनीसेदेक को पराजित 
हा करता है और दक्षिणी भाग को जीतता है (१०)॥ 


5 ः क्‍ द क्‍ . (ज) मेरोन युद्ध में उत्तरी कनान पर विजय (१ १: १-१५ 








झ) यहोशू की विजयों का सारांश ११:१६-१२:२४) । 
३) कमान देश का गोत़ों में बँटवारा (१३-२२ 


(क) मूसा ने जो बटवारा आरंभ किया था, यहोशू को उसे पूर्ण 
करने की आज्ञा (१३:१-१४) । 


रा ..... ... (खत) यर्दन के पूर्वी भाग में तीन गोत़ों का भाग (१३:१५- 
बा कि आप .. ३३) । (रूबेन, गाद और आधा मनश्शे)॥ 


या .... (ग) गिलगाल में यहोशू द्वारा कनान का अन्य गोज़ों में बटवारा 
कक “डे ५  -. - (१४-१७):  कालेब, थ एप्रेम, आधा मनश्श, 
2 पटक . सलोफाद की बेटियाँ। शीलो में बटवारा (१८-२०): 
बिन्‍्यामीन, शिमौन, जबूलुन, इस्साकार, आशेर, नप्ताली, 
दान, यहोशू, शरण नगरों का ठहराया जाना । 


लेबियों के नगर (२पे) 3 0 ०0 ० न जल: 0 2 । 
यरदन के उस पार और उस पार के गोत्ों के संबंध का. 













































१०४... पुराना नियम की भूमिका _ 
(४) यहोश्‌ के अंतिम कार्य (२३-२४) 


(क) विश्वस्त रहने के लिये इस्राएल को यहोशू का उपदेश 
(२३) 


(ख) शकेम में बिदाई का उपदेश और वाचा का पुर्नावृत्ति ( 
-२८५) । 


(ग) यहोश की मृत्यु और मिट॒टी, यूसुफ की हड्डियों का गाड़ा 
जाना (२४:२६-३३ ) 


रचना और रचगिता 


यहोशू की पुस्तक के रचयिता और रचना की समस्याओं का घनिष्ट संबंध 
है । यहोशू १५:६३ में लिखा है, “यरूशलेम के निवासी यबूसियों को यहूदी न 
निकाल सके; इसलिये आज के दिन तक यबूसी यहूदियों के संग यरूशलेम में 
रहते हैं।” जिस किसी ने यह लिखा वह अवश्य दाऊद के यरूशलेम को जीत 
लेने के बाद अर्थात्‌ लगभग ई. पू. ६९५ में रहा होगा। यह घटना यहोश के 
कनान में प्रवेश करने के कम से कम दो सौ वर्ष पश्चात्‌ घटी होगी | यहोश 
. १०: १३ में लेखक एक मूल स्रोत का अर्थात याशार नाम पुस्तक का उल्लेख 
.. करता है, जिसमें गिबोन और अय्यालोन में यहोश्‌ की चमत्कारिक विजय का 
हु ..  काव्यात्मक अभिलेख है । इसका अर्थ यह है कि वह इन घटनाओं के बहुत समय 
! ७... बाद रहा होगा जिससे यह संभव हुआ कि वह एक अन्य पुस्तक का उपयोग 
१५... कर सके, जिसकी रचना में कुछ तो समय लगा होगा। १८:६९ में जिस पुस्तक 
...._. का उल्लेख किया गया है उससे अध्याय १३ से २१ में प्रस्तुत गोत्रों के बटवारे 
.... की जानकारी लेखक को मिली होगी । यहोश्‌ १५:१३-१६ के साथ न्यायियों 
..... १:१०-१५, २०; यहोशू १५:६३ के साथ त्यायियों १:११; यहोशू १७:११-१३ 
... के साथ व्यायियों १:२७-२८; और यहोशू १६:१० के साथ न्‍यायियों १:२९ 
... के साम्य से भी यह व्यंजित होता है कि दोनों पुस्तकों के लेखकों ते एक मूल... 
... स्रोत का उपयोग किया । इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि यहोशू की पुस्तक 
...._ कुछ रूप में संयोजित पुस्तक है । यहोशू की पृस्तक के संबंध में हम धार्मिक 
..... लेखक की अपेक्षा धार्मिक संपादक की बात कहें तो अधिक उपयुक्त होगा । 


..._ इस पुस्तक का संयोजन भी पंच कर की पुस्तकों के अनुरूप माना जाए, अर्थात 


शक मल कक 0 0000002000000000 20000 70677 7//000/ ३०.5 
जम मम मम मन मनन 20 025 80५४ 7 720 00200 0000 





यहोशू की संरचना के विषय में दो मान्यताएँ हैं। एक मान्यता यह हैकि.... 


.. कि उसके मूलखस्रोत जे, ई, डी और पी हैं। इस मान्यता के प्रतिपादनकर्ता _ रा 










. बाइबल की पहली छ: पुस्तकों को एक भाग में रखते हैं और पंचग्रंथ के . 


हैं। पंचग्रंथ की रचना के संबंध मेंजो 

















विवेचन ऊपर किया गया है उसमें इस मान्यता की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण 
किया गया है। इस मान्यता के अनुसार यह पुस्तक विशेष रूप से व्यवस्था 
विवरणात्मक संपादकों का संकलन था, जिनका संकेत चिन्ह आर/डी (7२/०0) 
है । इन्हों ने अपना कार्य बंधुवाई के पूर्व और बंधुवाई के समय संपन्न किया । 
यह बात निश्चित थी कि उन्होंने इस काल से पूर्व के खोत, 'जे' और “ई' का 
उपयोग किया। द ः 
दूसरी मान्यता नॉथ (!४०॥) की है। वह यह मानता है कि यहोश्‌ की 
पुस्तक, इस्राएल के इतिहास का दूसरा भाग है, जो नवृवतात्मक एंव व्यवस्था- 
 विवरणात्मक दृष्टिकोण से लिखा गया । इस मान्यता के अनुसार पहला भाग 
व्यवस्था विवरण की पुस्तक ही है, और अन्य भागों में न्‍्यायियों, शमएल और 
राजाओं की पृस्तकें हैं । दूसरे शब्दों में यों कहें कि इन सब पुस्तकों में मूसा से 
लगाकर यरूशलेम के विनाश तक एक सूत्रबद्ध इतिहास है। लेखक ने अपना 
लेखन कार्य बंधवाई के समय किया । लेखक ने इन मल स्रोतों का प्रयोग किया : 
(१) ई. पृ. ६०० के लगभग गोत्रीय महावीरों की गाथाओं के संकलन की 
पस्तक, (२) गोत्न-सीमाओं की सूचियाँ, जो ई. पृ. दसवीं सदी में राजतंत्र के 
उदय होने के पूर्व विद्यमान थीं, और (३) ई. पू. सातवों सदी में योशिय्याह 
राजा के काल से चली आती हुई नगरों की सूचियाँ। (२) और (३) के मूल 
स्रोतों से १३-२१ अध्याय लिये गए हैं । द 


जो विद्वात जिईडीपी' मान्यता को स्वीकार करते हैं, वे १ न्यांथियों 
की तुलना में यहोश्‌ की पुस्तक के ऐतिहासिक मूल्य को कम करते हैं।१ 
न्यायियों में कबात पर विजय सीमित रूप से और धीरे-धीरे प्राप्त की ग द 
यहोशू की पुस्तक में यह बताया गया है कि दो चार आक्रमण किए गए और 


कनान की विजय एक नाटकीय तीत्र घटना के समान पूर्ण हो गई | इसके साथ... 


जेईडीपी मान्यता के अनुसार १३-२१ अध्याय और सूचियाँ अधिकतर 
पी से ली गई हैं । इसके विपरीत नॉथ की मान्यता के अनुसार इन अध्यायों की 5 
सामग्री और सूचियाँ भी अधिक प्राचीन हैं । 


म यह मान सकते हैं कि यह पुस्तक किसी धामिक संपादक का कार्य 


है जिसका दृष्टिकोण व्यवस्था विवरणात्मक था और उसने प्रारंभिक राजाओं के... 


काल के लिखित मूल स्रोतों का प्रयोग किया ? इन मलख्रोतों में और अधिक 
प्रातन परपराएं समाविष्ट थीं । 


. ४. कुछ भौगौलिक समस्याएं 


.... ऐ--ऐ शब्द का अर्थ खंडहर है। खोज से पता चलता है कि ई० पू० शा, हे 
.. २००० से १२०० तक यह स्थान बसा हुआ नहीं था । १२००-१०५०ई० 
























१०६... पुराना नियम की भूमिका 


. पृ० के बीच थोड़ा बहुत बस गया था । इस प्रमाण से यहोशू द्वारा ऐ के जीते 

_ जाने (यहो. ७,८) की घटना के संबंध में कठिवाई उपस्थित होती है । बाइबल 

में कहा गया है कि इस नगर की चहारदीवारी थी, फाटक थे और काफी बड़ी 
जनसंख्या थी। इस कठिनाई के फलस्वरूप यह सुझाव प्रस्तुत किया गया है 

.. कि युद्ध को चलाने के लिये इस्रालियों को यहुदा के पठार पर एक स्थान की 

. आवश्यकता थी । उन्होंने अपने लिये ऐ के खंडहर को ऐसा स्थान बना लिया। 

उनके एसा करने से पूर्व कनानी लोगों ने वहाँ पर उनको रोकने के लिये पड़ोसी 
 नगरों से एक संनन्‍्य-टुकड़ी एकल्नित कर ली थी। ऐ का राजा (यहो ८:२३) 

.. इस टुकड़ी का संचालक होगा । जब स्थान का वर्णन किया गया तो 'ऐ' शब्द 

का प्रयोग किया होगा और जब सैन्य-टुकड़ी का वर्णन तो 'नगर' शब्द का प्रयोग 

किया गया होगा । इसका दूसरा स्पष्टीकरण यह है कि इब्नानियों ने पड़ौसी तगर 

बेतेल का विध्वंस किया और भूल से वह ऐ के खंडहरों के साथ परंपरा में संबद्ध 

हो गया । 

यदेन को पार करना--लाल समुद्र के समान यदेव को पार करना भी 

ऐसी चमत्कारिक घटना है जिसमें इस्राएल जाति को परमेश्वर के विशेष संर- 

. क्षण का निश्चय होता है । यह रोचक बात है कि यदंन का पानी आदाम नगर 

के पास सारतान के निकट रुककर एक ढेर सा हो गया (यहो. ३:१६)। 
आदाम को यदत के पूर्व में एद-दमिए नामक स्थान मानता जाता है। उस स्थान 
पर ऊची चट॒टानों के पास पानी के कारण ऊपर से धरती सरक कर ढेर हो जाती 
है। अरब के इतिहासकार नबेरी ने यह लिखा है कि ११५६७ ई० स०» में इस 


हा . प्रकार की धरती सरकने के कारण १६ घंटे तक यदंन का पानी रुका रहा । 
... १६२७ ई० स० में एक और ऐसा वर्णन है। धरती सरकने और भूचाल के 
...... कारण लगभ्नग इक्कीस घंटे यर्देव का पानी रुका रहा । संभव है कि यहोशू द्वारा 
..... यर्दन का पार किया जाना एक प्राकृतिक घटना रही हो। परन्तु इसका यह. 
.......॑ अर्थ नहीं है कि उनके इस विश्वास को अमान्य किया जाय कि उस घटना में... 
..... इस्रालियों ने परमेश्वर की सामर्थ और संरक्षण को देखा। २ 










यरीहो पर विजय--खुदाई से पता चला है कि यरीहो पाँच एकड़ भूमि _ 


_ पर बसा हुआ था| उसके चहुँ ओर दो चहार दीवारी थी । भीतरी दीवार १२. 
... फूट चौड़ी और बाहरी छः फूट । कुछ घर दीवार से लगे हुए बने थे, जैसे राहाब॒ 






4 - काघर (यहो ० २:१५) । १२ फटी दीवार कहीं कहीं टूट गई थी । ६ फूटी 


.. दीवार भी कहीं कहीं पहाड़ी पर बिखर गई थी । दीवारों की दरारों से यह प्रतीत. - 
.... होता है कि यरीहो के विनाश का एक कारण भूकम्प रहा होगा । | अप 








जब यहोशू ते गिबोन में अमोरियों की बड़ी सेना को... 





उस दिन आकाश के पिंडों के साथ भी आश्चर्य- न । 

















यहोशू.. 3 33553 ते लोड 


जनक बात घटी (यहो० १०:६-१४) । सूे और चन्द्रमा थम गए। खगोल- 
वेत्ता कहेंगे कि यह संभव नहीं है । एक स्पष्टीकरण यह है कि थम गया शब्द 
का अर्थ 'चुप हो गया” भी हो सकता है, अर्थात कि मेघों के कारण गर्मी कम 
हो गई और यहोश्‌ अपनी विजय पूर्ण कर सका। परन्तु इससे चंद्र के थम 
जाने का स्पष्टीकरण नहीं होता । संभवत: इस संबंध में यह कहना अच्छा होगा _ 
कि यह धामिक लेखक खगोल विद्या के अवेक्षण का वर्णन नहीं कर रहा वरन्‌ 
परमेश्वर के आश्चर्यजनक संरक्षण का वर्णन कर रहा है। उस युग के सामान्य 
विश्वास की शेली में वह वर्णन करता है । लोग यह विश्वास करते थे कि सूर्य 
आकाश में गतिशील है और दिन के बढ़ जाने का अर्थ सूर्य का थम जाता माना 
गया है। परवर्ती काल में परमेश्वर के आश्चर्यकर्म को किसी दूसरे रूप में व्यक्त 
किया जाता । इस बात को ध्यान में रखते हुए , हमें यह बात बड़ी रोचक जान 
पड़ती है कि इस महान विजय से एक वीर काव्य की रचना 'याशार' की पस्तक 
को प्रेरणा प्राप्त हुई (१०:१२,१३) । काव्य इस प्रकार की घटना की तीब्रता 
की अभिव्यक्ति कर घटना की पृष्टि भी करता है। इसके अतिरिक्त घटना का 
व्यौरा भी रोचक है | यहोशू गिलगाल से निकला । रात्रि भर (१०:८६) चलकर 
आ्रात:काल गिबोन पहुँचा । ऐसा प्रतीत होता है कि यहोशू ने पहला आक्रमण 
गिबोन के पश्चिम की ओर से किया। वह पूर्ण चन्द्र का दिन होगा अन्यथा 'अय्या- 
लोन की तराई में' चन्द्र न होता जबकि सूर्य गिबोन में था। अय्यालोन की 
तराई में पश्चिम की ओर शत्रु की सेवा भगाई जा रही थी जिससे 

सूर्य और चन्द्र दोनों ही दिखाई देते होंगे। इस आश्चर्यजचक घटना का चाहे. 
जैसा स्पष्टीकरण किया जाए, इतना निश्चित है कि वहु स्मृति पर इतनी छा 
गई थी कि इब्रानी काव्य के प्रारंभिक संकलन में उसे परमेश्वर के अद्भुत संक्ष- 
रण कार्य के रूप में स्थान दिया गया । 


६. धर्मशिक्षा 0 
.. यहोशू की पस्तक से यह शिक्षा मिलती है कि अपने लोगों को प्रतिज्ञा के 





। ढ देश पर अधिकार देने की प्रतिज्ञा के प्रति परमेएवर सच्चा है | यहोश को नेतत्व ः | ५ न्‍ रा 
के कार्य के लिये निर्देश दिए जाते हैं और उसे सहायता का आश्वासन प्राप्त... 


. होता है (यहो. १:९६) । परन्तु परमेश्वर की सहायता की शर्ते आज्ञापालन है। 


_यहोशू को मूसा द्वारा दी गई व्यवस्था का पालन करना है (१:७,८) और 

उसका नेतृत्व परमेश्वर की सेना के अध्यक्ष के अधीन है. (५:१४,१५) जिसके... 

... सामने वह नतमस्तक होता है। परमेश्वर ने नेतृत्व के कार्य के लिये बुलाया... 
. और उसके लिये योग्य तैयारी की जाती है (अ० १-५) । सब स्थानों में... 






विजय का आश्वासन दिया जाता है, 





रन्तु वहाँ नहीं जहाँ पाप ः हो 














. पृठछ्द... पुराना तियम की भूमिका 


(७:११), और पाप का दंड मिलता ही है (७.१ ५) । आकान- के दंड से यह 
इंगित होता है कि धामिक बातों का मुल्य सर्वोपरि है (७:२५-२६) 

.. परमेश्वर के द्वारा चुने हुए नेता के रूप में यहोशु में स्वाभाविक साहस 
और समपंण की भावना से संबंधित समस्त सद्गुण है। प्रतिज्ञा के देश में अपने 
लोगों को लाने का महान कार्य यीश्‌ मसीह के महानतर कार्य के अनरूप है, जो 

अधिक साहस और अधिक समर्पण की नई वाचा के लोगों के उद्धार का नेता 

और जो अनंत मीरास में उन्हें ले आया (इन्न० ४:८5-१०) ' अतः यह 
उचित ही है कि यहोशू और यीशु नाम मूलतः एक ही हों। यहोश्‌ का मूल 

नाम होशे (उद्धार) था। मृसरा ने उसे यहोश॒आ में बदला (गि० १३:१६) 

जिसका अर्थ है याहवे उद्धार है । बाद में उसका रूप येशुआ (नहें० ८:१७) 

हुआ जो यीसुस या यीशु का युनानी-लतीनी रूप है 
































अठारह॒वां अध्याय 


न्याथियों 


१. शीर्षक 


हे 
$ 


इस पुस्तक में जिस युग का वर्णव किया गया उस युग के इब्रानी नेतृत्व 
प्रणाली के आधार पर पुस्तक का नामकरण किया गया है। इब्नानी में पस्तक का 
शीर्षक 'शोपटीम' है जिसका अर्थ न्‍्यायी है। शोपर या न्यायी वह था जो मिश - 
पद या न्याय करता था। इवाती न्‍्यायी शासक से भिन्न होता था। वह नबी के 
समान परमेश्वर की ओर से बुलाया जाता था। उसकी बुलाहट राष्ट्रीय संक्रांति 
का समय होता था । उस संक्रांति काल के संदर्भ में वह मुक्ति या उद्धार करने 
वाला होता था। वह साधारण न्याय भी करता था। उसका नेतत्व स्वाभाविक 


रूप से उसके पुत्र को नहीं प्राप्त होता था । शिमशोन के समय में पलिश्ती लोग 
शासक थे, परन्तु इस्रालियों में न्‍्यायी थे (न्या० १४:४) । 


सप्तति अनुवाद में इब्नानी शीर्षक का युनानी पर्याय क्नितय ((ता93) 
_ सयायी) का प्रयोग किया गया है, और इसी प्रकार वुल्गाता में ज्यूदिसेस है 
और अंग्रेजी में जजेस अर्थात न्यायी है । हिन्दी में इसका नाम ्यायी” है 


२. विषय सामग्री का सारांश 


न्यायियों की पुस्तक में यहोश की मृत्यु से लेकर शमृएल के जन्म तक 
इस्राएलियों का इतिहास दिया गया है। उसमें यह बताया गया है कि बारबार 
इस्राएल जाति पाप में पड़ी और उसे दंड दिया गया। साथ ही यह बताया. 
गया है कि जब लोगों ने पश्चात्ताप किया तब-तब परमेश्वर ने मुक्त करनेवाले 


अथवा न्यायियों को उत्पन्न किया | है आम 
न्यायियों---विश्वासघात, दंड, दया आम 
(१) यहोश्‌ की मृत्यु के उपरान्त परिस्थितियों का सिहावलोकन (१-२) 
द (क) इस्राएल जाति की सीमित विजय हा 
(ख) यहोश के समय 
























































हक 


११७ 





प्रावता नियम की भभमिका 


(ग) न्यायियों के काल का सामान्य वर्णन (२:६-३:६) . 
इस्राएलियों का विश्वासधात; यहोवा का क्रोध उन पर 
भड़केगा और शत्त उन्हें नष्ट करेंगे; जब वे यहोवा की 
दुह्ई दें तो वह उनके लिये न्‍्यायी ठहराता है। कनान में 
अन्य जातियाँ इसलिये विद्यमान हैं कि इस्राएली की विश्वस्ता 
का परीक्षण हो । 


| (२) न्यायियों के विवरण (३:७-अध्याय १२) 


क) यहूदा का ओतनीएल, इस्राएलियों को कृशत्रिशातेम से बचाता 
है (३:७-११) । 
(ख) बिन्यामीन का एहुद, मोआब के राजा एलोन को मारकर 
इस्राएलियों की रक्षा करता है (३:१२-३०) । 
(ग) शमगर, इस्राएलियों को पलिश्तियों से छुड़ाता है (३:३१) । 


 (घ) दबोरा और बाराक, सीसरा को हराते हैं, जो कनान के क्‍ 


राजा याबीन का सेनापति था (४-४) | दबोरा का गीत 

(५) । व 

(च) पश्चिमी मनश्शेका गिदोन, मिद्यानियों और अमालेकियों को _ 
 हराता है (६-८) । | 

(छ) गिदौन का पुत्न अबीमेलेक अपने भाइयों को घात कर शकेम 

. का राजा बन गया (6) । एक स्थानीय आपसी युद्ध हुआ, 

जिसमें योताम वक्षों की कहानी बताता है (६£:७-२१) ।॥ 


. (ज) इस्सकार का तोला न्‍्यायी बनता है (१०:१-२)। 


रा (झ) गिलाद का याईर न्यायी बनता है (१०:३-५) 


.. (१०:६-१२:७ ): दमन (१०:६-१८); यिप्तह की बुलाहट | 


... और नेतृत्व ग्रहण करना (११:१-२८); उसकी विजय. 
... और विचित्र शपथ (११:२९-४० ); गोत्रीय लड़ाई शिब्बो- 
...... लत पर केच्द्रित होती है (१२:१-७) 0 

....... (5) बेतलेहेम का निवासी इबसान न्यायी बनता है (१२:८- 











न्यायियों .. ऐड १] ११ 


(त) दानियों के कुल के शिमशोन का पलिश्तियों के विरुद्ध वीरकर्म 
ओर वह इस्राएलियों का न्‍्यायी बनता है (१३-१६): 
शिमशोन का जन्म (१३); उसके ब्याह का भोज (१४) ; 
पलिश्तियों के विरुद्ध वीरकर्म (१५) दलीला का विश्वास- 
घांत और शिमशोन की मृत्यु (१६) ।. 


(२) ऐतिहासिक परिशिष्ट (१७-२१ ) क्‍ 

(क) दानियों का दक्षिण से उत्तर की ओर जाकर लैश को जीत 
कर वहाँ बसना (१७-१८): मीका द्वारा ढाली हुई मूरत 
और याजक (१७); मूरत का चुराया जाना और लैश का 
जीता जाना (१८) । द क्‍ 

(ख) बिन्यामीनियों से युद्ध (१६-२१ ) गिबा में कुकर्म, उसका 
कारण (१६); परिणाम स्वरूप जो युद्ध हुआ उसमें विन्या- 
मीनी प्राय: नष्ट हो गए (२०); कुल के रूप में बिन्यामी- 
तियों के बने रहने का उपाय (२१) । 


४. संरचना, रचयिता, रचना-तिथि . द 

न्यायियों की पुस्तक ऐसे समय लिखी गई जब लेखक यह कह सकता था 
“उन दिनों में इस्राएलियों का कोई राजा न था; जिसको जो ठीक पृक पड़ता 
था वही वह करता था” (२१:२५) । विषय सामग्री की समीक्षा करने से यह 
इंग्रित होता है कि यह पुस्तक एक लेखक की न होकर प्रेरणापूर्ण संपादक का. 
कार्य है। उदाहरणाथ, नया. २:६, पस्तक की श्रथम आवृत्ति की भूमिका हो 





सकता है, और उससे पहले के पद बाद में भूमिका को पूर्ण करने के लिये लिखें 
गए हों । अध्याय १७-२१ एक अलग भाग बन जाते हैं जिसमें लेखक का मुख्य 
विचार यह है कि इस्राएल में उस समय तक बड़ी अव्यवस्था और निरकुंशता 
रही जब तक राजतंत्न की स्थापना ने हो गई (दे, १८:१;१९:१) पक 
.. पस्तक के प्रमुख भाग में कुलों के नेताओं (व्यायियों) का वर्ण है, जो 
एक निश्चित ढांचे में है। इस ढांचे में इस्राएल का विश्वासघात, उनका दूसरी ._ 
जातियों द्वारा पराजित होना, पश्चाताप और छूटकारा मिलना है । उदाहरणार्थ, 
जीगों ने वह किया जो प्रभु की दृष्टि में बुरा है (३:७,१:२; ४:१; ६:१; आदि). 
पी ध ने उन्हें उनके शत्रुओं के हाथ में करविया (३६,१२;४:२:७& 
._); लोगों ने प्रभु की दुह्ई दी और प्रभु ने उनको एक छड़ानेवाला भेजा रे 
.. (३:६,१५: ६:८); श्र दवाया गया बौर देश में कुछ वर्षों के लिये शान्ति रही... 
... ($:१०-११,३०; ४:२३; ५:३१; 57२५) । ऐसा माना जाता है कि यह ढांचा... 























































उबर: ... पुराना नियम की भूमिका 


किसी संपादक के हाथ का है, जिसका दृष्टिकोण व्यवस्था विवरणात्मक था 


(विशेष दे. २:६-३:६) । अप्रधान न्यायियों के संबंध में यह ढांचा नहीं 


मिलता अर्थात तोला, याईर, बोजान, एलोन, अब्दोन के संबंध में, और न अबी- 
 मेलेक के वर्णन में (5:३३-६:५७) । अतः यह अनुमान किया जाता है कि 


इस पुस्तक का एक पुराना रूप था जिसे 'न्यायियों की व्यवस्था विवरणात्मक 


_ पुस्तक कह सकते हैं। उसमें पाँच बड़े न्यायियों के वर्णन रहे होंगे (एहद 


दबोरा-बाराक, गिदोन, यिप्तह, ओर शिमशोन ) । इस पुस्तक का मूलस्रोत वे 


ह गाथाएं रही होंगी जो विभिन्न गोब्ों के पास सुरक्षित होंगी । कदाचित वे 


गाथाएं हों जो जे और ई प्रलेखों में हों, और दबोरा का गीत हो (५) 'जो कदा- 
चित बवणित घटना के समकालीन हो । किसी परवर्ती संपादक ने सामान्य 
भूमिका जोड़ दी हो (१:१-७:४५) । एक और संपादक ने कदाचित अध्याय 
१७-२१ में वर्णित परंपरा जोड़ दी हो | यह विचार किया जाता है कि 
न्यायियों की व्यवस्था विवरणात्मक पृस्तक संभवतः ई. पूृ., ७वीं सदी में 
योशिय्याह के सुधार (ई, पू. ६९२२) के बाद लिखी गई क्योंकि वह सुधार 


भावषात्मक दृष्टि से प्रधानतया व्यवस्था विवरणात्मक सुधार था। अन्य अंश 
बंधुवाई के समय या बाद में जोड़े गए होंगे । 


कुछ अनुच्छेदों में यहोश की पुस्तक से साम्य है। इनका स्पष्टीकरण यह ॥ 


किया जाता है कि इन अनुच्छेदों का मूल-स्ोत एक ही था। 


पा ४. स्थायियों की पुस्तक में तिथिक्रम 


न्यायियों की पृस्तक में प्रस्तुत न्‍्यायियों की कालावधि, पराजय के वर्षों को _ 


....... (कुल १११) महान न्यायियों के समय में शान्ति के वर्षों को (कुल२२६), पाँच: 
.....॑.. छोटे न्यायियों के वर्षों को (कुल ७०) और अबी मेलेक के ३ वर्षों को जोड़ने से . 
.. ... प्राप्त हो सकती है। कुल अवधि ४१० वर्ष होती है। यह द्रष्टव्य है कि शान्ति _ 
.... के वर्ष ४० वर्ष की एक पीढ़ी के अनुरूप हैं, अथवा ४० के अंश हैं, अथवा गणे 
..... हैं। केवल एक ही प्रकरण में ऐसा नहीं है। इससे यह प्रतीत होता है कि 

.... तिथिक्रम केवल संभाव्य है।.... 


.... जब ये ४१० वर्ष अन्यत्र दिए हुए वर्षो में जोड़े जाते हैं तो एक ऐतिहा- 
..... सिक समस्या खड़ी हो जाती है । व्यवस्था विवरण १:३ में ४० वर्ष; व्य,२:१४ 


.. और यहोशू १४:१० में ७ वर्ष; १शमरू, ४:१८ में ४० वर्ष; १ शम्रू, ७:२ में... 








और १रा. ६:१ में ३ वर्ष । इन सब को जोड़ने... । ० 





या २० वर्ष रहा (तप्रे. १३:२१, योसेपस ४८, 


के चौथे वर्ष तक कूल ६०० या ५८० वर्ष से 





स्यायियों 4११३ 


होते है। परन्तु यह संख्या १ राजा ६:१ में दी हुईं संख्या, अर्थात्‌ ४८० वर्ष से 
भिन्न है । अत: यह सुझाव दिया जाता है कि न्यायियों के काल को ४१० 
वर्ष से कुछ कम करना चाहिये, और वह इस श्रकार हो सकता है कि कुछ 
न्यायियों को अनुक्रमिक न मानकर समकालीन मानना चाहिये । निम्नलिखित 
तिथियाँ कदाचित सच्ची तिथियाँ मानी जा सकती हैं! अत 


कुश-त्रिशातेम का आक्रमण ई. पृ. १२०० (ओतनीएल न्‍्यायी ) 


दा  शमगर ५8 जय 708, पी कल 
. मगिद्दों का युद्ध » ११२५ (दबोरा और बाराक) 
. शिमशान 5 8.20 06 दर 

दानियों का प्रवास . 7 ११०० 

गिदौन . ११०० 

अबीमेलेक . 7? १०७५ 

यिप्तह . 7 १०४० 

अबनजर का युद्ध 7 १०४० 

शमूएल .. . १०५०-१०२० 

शाऊल . 7 0१७ २०-१० ०७ 





६. धर्म शिक्षा पक क्‍ 
कल ऊपर बताया गया है कि न्यायियों की पुस्तक की रचना एक ढांचे में... 
....  ढली हुई है। इस उस्तक की धामिक शिक्षा उसीढांचे के अनुरूप है। उसमें 
. इतिहास का एक धर्मवैज्ञानिक अर्थ अस्तुत होता है। इतिहास की घटनाएं 
..... प्राकृतिक और मानवीय कारणों के नहीं, वरन्‌ परमेश्वर के लोगों के संबंध में 
कु उसकी क्रियाशीलता से घटित होती हैं। इस्राएल के पापों का दंड देने के लिये. 

परमेश्वर पड़ोसी जातियों को साधन स्वरूप प्रयोग करता है । परमेश्वर का 
स्वभाव पवित्र, धार्मिक और बुद्धिमान होना है । अंतः यह॒दंड देना उसके. 
स्वभाव के अनुरूप है। परंतु परमेश्वर दयालु और क्षमाशील भी है। वह 
इज़ाएल के पश्चात्ताप की दुहाई सुनता है। उसकी भलाई और सर्वशक्तिमान 

होना इस बात में दिखाई देता है कि बह बार बार उनका छुटकारा करता है । 

यद्यपि वह न्यायियों के द्वारा इस्राएलियों का छुटकारा कराता है, तथापि मूलतः: 

*. जेकब एम. मायसं, दी इन्टरप्रीटस बाइबल, व इधर... आय मा. 
* पुस्तक के अंत में तियि-करम सारणी में जो तिथि दी गई है उसते यह कुछ... 
.. मिन्नहै। तेखक की माल्यता है कि सारणी में दी हुई तिधि को मान्य करना. 

















. ११४... पुराना नियम की भूमिका. 


छुटकारा देने वाला बही है। छटकारा देना मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का काय 
है| न्‍्यायी लोग उस कार्य को पूरा करते हैं जिसके लिये वे बुलाए गए, केवल 
इसीलिये कि परमेश्वर उन्हें प्रेरणा देता है। परमेश्वर ही प्राकृतिक शक्तियों 


... को संगठित करता है कि दबोरा और बाराक विजय प्राप्त हो । अत: सच्चा 





.. विजयी तो परमेश्वर स्वयं है। गिदोन को आज्ञा दी गई कि वह अपनी सेना कम 
. करे, जिससे यह स्पष्ट हो जाए कि विजय परमेश्वर की ओर से है । 


न्‍्यायियों की पुस्तक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर इतिहास 
का शासक है; कि संकट बहुधा उसकी ओर से दण्ड है, तथा छुटकारा उसकी 
दया का काम है; और इस प्रकार जीवन अनुशासन की एक पाठशाला है 
जिसमें हमें किसी न किसी प्रकार यह सिखाया जाता है कि परमेश्वर की 
आज्ञाओं का पालन करता और उसकी इच्छा की पूर्ति करना जीवन में सर्वाधिक 
महत्वपूर्ण बात है । इस प्रकार हमें यह सिखाया जाता है कि हम पहले परमेश्वर 
के राज्य की खोज करें और सबसे अ्रधिक उससे प्रेम करें। 











































उन्तीसवा। अध्याय 
ख्त्त 


१. शीर्षक और प्रामाणिक धर्मश्ञास्त्र में स्थान 


इस पुस्तक का नामकरण उसके प्रमुख पात्र, रूत के नाम पर है। वह मौआबी 
स्‍त्री थी। सब प्राचीन अनुवादों में यही नाम पाया जाता है। 'रूत' नाम 
कदाचित रेउत का छोटा रूप है, जिसका अर्थ 'रूप' या 'सौन्दय' है अथवा वह 
रीउत का छोटा रूप है, जिसका अर्थ 'सखी' है । पेशित्ता* (?८5४४४४०७) में रीउत 
नाम आया है। द 
इब्रानी बाइबल में रूत की पुस्तक 'लिख-भाग' में सम्मिलित की गई है। 
पांच पर्व-कुंडलों में से यह पहला या दूसरा है। ये पर्व-कुंडल ()५८४7॥०४) 
यहुदी पर्वों पर अनुष्ठान पद्धति के लिये काम में लाए जाते थे । श्रेष्ठगीत 
फसह पर, रूत पेन्तेकुस्त पर, विलापगीत विलाप दिवस पर, सभोपदेशक तंबू के 
पर्व पर और एस्तेर पुरीम पर्व पर। अनुष्ठान पद्धति में उपयोग के कारण 
कदाचित रूत इब्रानी बाइबल में लेख-भाग में सम्मिलित है । योसेपस और अन्य 
लेखक यह इंगित करते हैं कि इस पुस्तक को प्रारंभ में व्यायियों के पश्चात्‌ ही 
थान दिया गया था। सप्तति अनुवाद और बुल्गाता में उसका यही स्थान है। 


२. विधय सामग्री का सारांश 


रूत की पुस्तक में एक मोआबी विधवा रूत की कथा है, कि वह कैसे 
प्रथानुसार दायित्व से कहीं अधिक अपनी सास नाओमी के प्रति भक्त रही, और 
कि केसे उसने स्वयं को इब्रानी लोगों के जीवन से एक किया और उसका 
विश्वास स्वीकार किया, और कि कैसे उसका एक संपन्न विवाह हुआ और 
वह दाऊद की पूर्वज हुई । । 


रूत: विश्वस्तता और भक्ति की कथा... 
(१) मोआब में रूत की विश्वस्तता (१: १-१८) 













































११६ | पुराना तियम की भूमिका 


(क) परिस्थितियों की पृष्ठभूमि (१: १-५) : एलीमेलेक और 
नाओमी का बेतलेहेम में अकाल के कारण मोआब जाना ; उनके 
पुत्र महलोन और किल्योन का मोआबी स्त्रियों से विवाह; 
परिवार के पुरुषों की मृत्यु; नाओमी बेतलेहेम को लौठना 
चाहती । द 

(ख) रूत का महत्वपूर्ण निर्णय : (१:१६-१८) : सास से कहती है 
जहाँ तू जाए, उधर मैं भी जाऊगी. , .तैरा परमेश्वर मेरा 

परमेश्वर होगा । द 
२. रूत की भक्ति और परिश्रम से बोअज़ आकर्षित होता है (१:१६९- 

२:२३) द 

(क) नाओमी और रूत बेतलेहेम को कटनी के समय लौटती हैं 
(१:१६९-२२) । 

(ख) रूत बोअज़ के खेत में सीला बीनती है (२: १-७) । 

(ग) बोअज उसके प्रति दया भाव दिखाता है (२: ८-१६) 

(घ) इस समाचार से ताओमी हर्षित होती है (२:१७-२३) । 

.. ३. रूत का बोअज़ से विवाह (३-४) । 

(क) नाओमी की योजना (३ : १-५) 

(ख) नाओमी की आज्ञा का पालन कर रूत बोअज को भमि 
छड़ानेवाले कुटुम्बी के रूप में पाने का प्रयत्न करती है 
(३ : ६-१८) 

 (ग) नगर के फाठक पर (जो न्यायालय समझा जाता था ) निकठ-... 
तम छुड़ानेवाला कुटुम्बी अपना अधिकार बोअज के पक्ष में 
' छोड़ देता है (४: १-१२) है रे 
..._(घ) बोअज रूत से विवाह करता है । ओबेद की उत्पत्ति | ओबेद 
सा मा .. दाऊद का दादा है (४: १३-२२) न 
.... ४, संरचना, रचयिता, और रचना-तिथि द पड 
...... जर्मन नाट्यकार गेठे ने रूत की पुस्तक के सम्बन्ध में यह कहा कि वह... 
......_  भहाकाव्य एवं चित्नात्मक कथाकाव्य की सुन्दरतम कृति है ।' यह पुस्तक एक... 
.... पूर्ण इकाई है।। इसका एक ही लेखक होना चाहिये, यद्यपि संभवतः 


5 कदाबित परवती संपादक ने जोड़ा हो । इस पुस्तक का लेखक हमें ज्ञात नहीं । । 


.... तालमुद की परंपरा है कि इसका लेखक शमूएल था, परंतु इसे स्वीकार करना 
.. संभव नहीं, क्योंकि कथा की चरम सीमा पर दाऊद का उल्लेख है । 





१८-२२ में पाई जाने वाली वंशावली, और ४ : ७ का स्पष्टीकरण 














लेखन तिथि के संबंध में भी मत-वैभिन्‍न है | क्‍या लेखक बंधुताई के पूर्व 

था अथवा पश्चात्‌ ? जो यह मानते हैं कि यह बंधुवाई के पश्चात्‌ लिखी गई 
बे इस बात का सहारा लेते हैं कि यह पुस्तक इब्रानी बाइबल में लेखों (:८८पॉआ7४ ) 
के साथ सम्मिलित है, जो प्रामाणिक धर्म शास्त्र के अंत में सम्मिलित किए गए 
और कि ४: ७ में एक ऐसी प्रथा का उल्लेख है जो व्य, रेड : १-१० 
(जते निकालने के द्वारा साक्षी) और जो उस समय प्रचलित नहीं थी 

परंतु ई. पू. ६२२ में अर्थात योशिग्याह के व्यवर । विवरणात्मक सुधार के समय 
प्रचलित थी । साथ ही, पुस्तक के अंत में दिए हुए तिथि-क्रम (४: १८-२२) 
का साम्य १ इति. २: ६-१६ से है, जो कदाचित बंधुवाई' के पश्चात का है। 
लेखन तिथि के संम्बन्ध में दूसरी मान्यता यह है कि यह पुस्तक बंधुवाई के 

पूर्व लिखी गई । इसमें भाषा की ओर ध्यान आक्ृृष्ट करते हैं। इसकी भाषा 
सुन्दरतम प्राचीन गद्य है और उसमें कुछ प्रचलित वाक्य रचना है। अंत में दी 
हुई वंशावली वाद में जोड़ी गई होगी जूते खोलने से साक्षी की प्रथा भी बाद में 
जोड़ी गई होगी क्योंकि कथा में उसका कोई महत्व नहीं है। यह भी स्पष्ट 
है कि लेखक इसे एक प्रथा मानता है, नियम नहीं। यदि यह पुस्तक बंधुवाई 
के पश्चात लिखी गई होगी तो ऐसी साक्षी प्रथा न होकर विधि बन जाती. 
क्योंकि बंधुवाई के पश्चात लेखकों की प्रवृत्ति विधि प्रधान हो गई थी। सब 
बातों का विचार कर यह उपयुक्त प्रतीत होता है कि इसकी शैली की प्राचीन 
विशुद्धता के कारण यह माना जाए कि इसका लेखक राजतंत्न के प्रारंभिक काल 
में रहा होगा, जब कि इब्रानी साहित्य में (८७४४८७!) रीतिकालीन साहित्य की. 
अन्य पुस्तकें लिखी गई । 


..._ क्या रूत की कथा यथार्थ है अथवा कल्पित ? प्राचीन युग के जीवन और दाऊद 
जैसे ऐतिहासिक व्यक्ति से इस कथा के सूत्र ऐसे संबंधित हैं कि यह कुछ विचित्र 
जान पड़ता है कि इसकी यथार्थता के संबंध में शंका की जाए । परंतु इस प्रएन के 





विषय भी मत वेभिश््य है । कुछ विद्वानों की मान्यता है कि यह कथा एक दष्टांत ः हे 


मात्र है जो किसी उदारमना यहूदी ने एज्ला और नहेम्याह के समय 
मिश्चित विवाहों के निषध की संकीर्ण भावना के विरोधमें लिखा । यदि यह माना. 
जाए तो नाओमी बंधुवाई से लौटने वालों का प्रतीक है, जो विदेशियों 


को केवल काम के लिये ही स्वीकार करते थे; रूत उस विदेशी का 


प्रतीक है जो निर्वाचित लोगों में सम्मिलित किए जाने के योग्य है 


हि बोअजु उस देसी इब्रानियों का प्रतीक है जो बंधुवाईं में नहीं गए और विदे- हु ह । का 
... शियों के प्रति जिनकी भावना सहृदयत पूर्ण है। दूसरी मान्यता यह है कि प्राचीन. ८ । . | 
. युग में बेतलेहेम में उत्पादन पंथ था (&परधाए-८्पा+ ), अत: रूत की कथा में | 






























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ज्वक्द .. पराना नियम की भूमिका 


पश्चिमी आसिया की ताम्मुज दंतकथा का रूपांतर मात्र है। इस मान्यता के 
अनसार मनभावनी नाओमी (नाओमी का अर्थ मन भावनी है) उस बालिका 


द्वारा सांत्वना प्राप्त करती है जो उसके मृत पुत्र का स्थान लेती है। ऐसी 


. मान्यताओं में सुकुमार कल्पना कूट-कूट कर भरी रहती है। इन से तो यह कहीं 


अच्छा है कि कथा को सीधी यथार्थ कथा माना जाए--एक यथार्थ कथा जिसमें 


दाऊद के एक पूर्वज का वर्णन है। इसे यथार्थ मानने से बाद भी इसके दुष्टांत- 
.. छूप में प्रयोग में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । 


. 9. धर्म शिक्षा 


रूत की पुस्तकों में दैन्य वतावरण में उच्च सद्‌गुणों का चित्रण किया गया 


 है। उसमें विश्वास के एक साहसिक कार्य और उस विश्वास के पुरस्कार का 


वर्णन है। अपनी सास के प्रति रूत की भक्ति मानवी संबंधों में उदात्त भावना 
है । नाओमी के साथ सदा रहने के लिये रूत का अपने लोगों को छोड़ना 
विश्वास का साहसिक कार्य है, विशेषकर उस स्थिति में जब इस कार्य में स्व- 
धर्म को छोड़ना निहित है। इस प्रकार रूत सच्चे विश्वास के प्रति धर्म परि- 


वर्तेन करने का प्रतिरूप है | वह ऐसा व्यक्तित्व है जो एक बार ही सदा के लिये... 
अपने आप को परमेश्वर को सौंप देता है, 'तेरे लोग मेरे लोग होंगे और तेरा... 
परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा . . . . . यदि मृत्यु छोड़ किसी कारण मैं तुझसे 
.. अलग होऊ।; तो प्रभु मुझ से वेसा ही वरन्‌ उससे भी अधिक करे” । रूत आज्ञा- 
.. पालन, नम्नता, परिश्रम और संतोष के मल सदगणों का आदर्श है, और बोअज 
.. के चरित्र में दया और उदारता का चित्रण किया गया है । इस पुस्तक से यह 
.... शिक्षा भी मिलती है कि विश्वास का अपना पुरस्कार है, क्योंकि रूत न केवल _ 
..... पारिवारिक प्रेम की पूर्णता का अनुभव करती है, वरन परमेश्वर की योजना में. 
......॑ वह संसार के सर्वश्रेष्ठ वंश में प्रवेश करती है, अर्थात दाऊद का वंश और परि- 
. ..... णाम स्वरूप दाऊद के पत्र के वंश में । हा कद 28 
































बीसवां अध्याय 
१ और २ शमृएल 
१, शीषक 


तालम॒द, ओरिगेन, यूसेब और येरोम के उल्लेखों से पता चलता है कि. 
पहले ये दोनों पुस्तकें एक ही थीं। इस बात से इसकी पुष्टि होती है कि मसो- 
रेतिक पाठ में २ शमृएल के अंत में पाद टिप्पणी है जिसमें कहा गया है, 
'शमृएल की पुस्तकों की पद संख्या १५०६ है .. .... उसका मध्य. बिन्दु वहाँ 
आता है जहाँ लिखा है, “स्त्री के घर में तेयार किया हुआ बछड़ा था'। यह 
उद्धरण १ शम्रू. २८: २४ से है। यह उसी समय मध्य बिन्दु हो सकता है जब 
दोनों पुस्तकें एक हों । द 

सप्तति अनुवाद के समय ये दो भागों में थी। संभवत: यह इसलिये था कि 
कदाचित युनानी अनुवाद के लिये दो कुंडलपत्रों की आवश्यकता हुई । इब्नानी में 
स्वर लुप्त रहते हैं इसलिये वह यूनानी की अपेक्षा कम स्थान लेती है। सप्तति _ 
अन॒वाद में विभाजित पुस्तक को १ और २ राज्य कहा गया है। उसके पश्चात 
ही राजाओं की पुस्तक भी विभाजित थी और वह ३ और ४ राज्य कहा गया . 
है। वुल्गाता में सप्तति अनुवाद के विभाजनों को स्वीकार किया गया. परंतु 
शीषकों को राज्यों के बदले “राजा नाम दिया गया। १५१६ में वेनिस नगर 
में प्रकाशित बाम्बेरी की रब्बूती बाइबल में इस विभाजन को स्थान मिला, 
परंतु साथ ही इब्नानी का शीर्षक शमृएल भी रखा गया | इस छपी हुईं इब्ानी 


बाइबल में १ और २ शमृएल दो पुस्तकें हैं। उनका नामकरण इन पुस्तकों के. 
भिक वर्णनों के प्रमुख पात्र शमुएल के नाम पर किया गया है के 
२. विषय सामग्री का सारांश हा अर  क मा 
१ शमूएल में इस कथा का वर्णन है कि नबी और न्यायी शमृएल के 
माध्यम से इस्राएल में राजतंत्र स्थापित हुआ, और कि पहला राजा शाऊल का 


दाऊद के पक्ष में परित्याग किया गया क्योंकि उसने शमृएल के मार्गदर्शन का... 
उल्लंघन किया । 


3] 


हर कि 





| 
३ जय 


..... १ शमृएल में दाऊद राजा का वर्णन ः 
मम 
































मई] ९ ४५०7३ “७:०७ पु 3 7740५ 4727 की शल. ४ 7 अलवर «५ हक ५ त5७ हमला 
पे १ १३३५ 20%. ४+#७०७ फकशकः 7. ५ पे 7 पा का अछि के हपए 75 ५ 7), 0 पक बी 9 83 / 2 है दी 2 8४५ कल आफ 5 वि है 2:4५ 7 
कलाम गिल, "अप दा बीबी कम अकदिक 2 0 की 3, ४०: 7 कह कप इज 857 मि/, बके! मी कक मर ०6२१ ६६% ४! 





प्र. डा पुराना नियम की भूमिका 
३, रूपरेखा 


१ शमृएल--राजतंत्र की स्थापना 
१. अंतिम न्‍्यायी--एली और शम्ृएल (१-७) 

(क) शमृएल का जन्म और बुलाहट (१-३): प्रार्थना से मिला 
बालक शमृएल (१); उसके जन्म के कारण हन्ना का गीत 
(२:१-११); एली के घराने के पाप के कारण दंड की 
भविष्यवाणी (२:१२-३१६); बालक शमृएल को परमेश्वर 
बुलाता है (३) । 

(ख) पवित्न संदूक की बंधुवाई (४-६) : पलिश्ती लोग संदूक को 
छीन कर अपने नगरों में ले जाते हैं, जहाँ से उसे कियत्यारीम 
ले जाया गया । 

(ग) एवबेनेज़ेर में शमुएल की विजय और उसका नन्‍्यायी 
काल (७) । 





२. राजतंत्न की स्थापना--शमृएल और शाऊल (८5-१२) 
(क) इस्राएली शमृएल से राजा की मांग करते हैं (८) 
(ख) शाऊल का अभिषेक और राजा चुना जाता (६-११) 
. शाऊल का अभिषेक और भविष्यवाणी के साथ उसका पकड़ा 
जाना (६:१०; १६); मिस्पा में चिट्ठियां डालकर शाऊल का 
. चुना जाना और स्वागत (१०:१७-२७); शाऊल अस्मोवियों... 
.. से गिलाद के जावेश को छीनता है और गिलगाल में शाऊल...... 
.... का राजा के रूप में समर्थन (११)। द ह 
(ग) शमृएल का उपदेश तथा न्‍्यायी पद का त्याग (१२) 
.._ ३. शाऊल का राज्य-दाऊद का निष्कासन (१३-३१) 
...... (क) पलिश्तियों के विरुद्ध शाउऊल का युद्ध (१३-१४) : शाऊल 
| ...... को पहले विजय (१३: १-४); उसका अनियमित होमबलि 
.. चढ़ाना (१३ : ५-१५) इस्राएलियों की कठिन परिस्थिति... 
.... (१३:१५-२३); मिकमाश की घाटी में योनातान की 
5 विजय नि ता. 
..... (ख) अमालेकियों के विरुद्ध शाऊल का युद्ध, आज्ञाउलंघन के कारण... 
..... शमूएल साऊल का परित्याग करता है (१४) | 








(ग) 


(घ) 









१और २ शभूएल........्् १२१ 


दाऊद का उदय (१६) : शम्ृएल बेतलेहेम में दाऊद को 
चुनता और उसका अभिषेक करता है (१६:१-१३) ; शाऊल के 
सामने बीन बजाने के लिये दाऊद का चनाव (१६: १४-२३) । 
एला की घाटी में दाऊद की गोलियत पर विजय (१७) 


(च) दाऊद पर शाऊल की कोपदृष्टि (१८-२०) : दाऊद की योता- 


तन से मित्रता, शाऊल की ईर्ष्या (१८- १-१ ६ ); दाऊद का 
शाऊल की पुत्री मीकल से विवाह, फिर भी दाऊद को मार 
डालने की चेष्टा, शाऊल की भविष्यवाणी (१८:१७-१६:२४) 
एक दूसरे से वियोग के पूर्व दाऊद और योनातन की 
प्रतिज्ञा (२०) 

दाऊद का भागते फिरना (२९-२७) : नोब के याजक दाऊद 
की सहायता करते हैं (२१:१- ९); गत के राजा के सामने 
पागलपन (२१:१०-१५); अदुल्लाम की गफा मोआब और 
हेरेत के वन में भागना (२१:१६-२२:४ )। शाऊल ने नोब 
के याजकों का घात किया, परंतु अब्यातार दाऊद के पास 
निकल जाता है (२२: ६-२३); दाऊद कीला नगर को 
बचाता है, तब जीप, माओन, एनगदी के वनों में भागना 
(२३); एनगदी में शाऊल को न मारना (२४ ); शमृएल 
की मृत्यु (२५:१); कर्मेल के दुष्ट नावाल की मृत्यु, उसकी 
विधवा, अवीगेल के साथ दाऊद का विवाह (२५:२-४४) 
जीप में दाऊद शाऊल की हत्या नहीं करता (२६); गत के 
आकीश की शरण जाकर दाऊद सिकलग में रहता है (२७) 


शाऊल का अंतिम युद्ध (२८-३१) : पलिश्तियों के डर के _ 
मारे एन्दोर की एक भूत सिद्धि करने वाली के माध्यम से 
शामएल के प्रेत को बुलवाया (२८); द ऊद को लड़ाई में 


नहीं जाने दिया गया, परंतु वह अमालेकियों के 2] 
आक्रमण कां बिफल करता है (२६-३०); गिलबोआ 


पहाड़ पर शाऊद और उसके पुत्रों का मारा जाना (३१ गा 
२ शमृएल--दाऊद का राज्य | द 


दाऊद, यहुदा का राजा (१- ) 


५) हम निकला की लड़ाई: के विषय सुनता है और शाऊल पे 


तथा योनातन के लिये शोक गीत की रचना करता है (१) 











मे 356, मै; मटका 2 >नन्‍कु 7: >ण्यकत' “व मम पी अप मम कि मम 8 मल ७ ४ “आकुशाप 8 बे पड कफ "कीफे 
८ 2 , ५5, “५0४ ७७७०४७,०७ हक अत १० 5 6 + 0 हक 0) हे ५ 
॥] ४४4४० सओ कप: ; २.5 ५. 20... ५० ....ु0606ु.. ० जन >ह भी | ४ हद । ० अभिन्न 7 ५.70. ०७ के. ४०... ० २०० : अभी, 5 कक पाप ४ 2३ 


१ 


पुराना नियम की भूमिका 


(ख) हेब्रोन में दाऊद का यहूदा के राजा के पद पर अभिषक, और 


अब्नेर द्वारा शाऊल का पुत्र ईशबोशेत इस्राएल का राजा 


बनाया जाता है (२:१-११) । 


(ग) दाऊद और ईशबोशेत के दलों में युद्ध (२:१२-३:१) । ईश- 
. बोशेत ने अब्नेर पर दोष लंगाया, इसलिये अब्नेर दाऊद के 


पास जाकर ईशबोशेत के विरुद्ध विद्रोह की योजना करता 
है, परंतु योआब द्वारा मार डाला जाता है--दाऊद का 
विलाप (३:२-३६ ) । 


ईशबोशेत के घात किए जाने पर दाउद घातकों को मार 
डालता है (४) 


(२) इस्राएल और यहूदा का राजा दाऊद (५-२४) 


(क) वाचा के द्वारा दाऊद इस्राएल का राजा बनाया जाता 


है (५: १-५) 


(ख) दाऊद राष्ट्रीय एकता और विशाल राज्य की स्थापना 


करता है (५: ६-१० : १६) : वह यरूशलेम पर विजय 


प्राप्त करता है ओर उसे अपनी राजधानी बनाता है 
(५: ६-१०); सोर के राजा हीराम से भेंट, और 


पत्नियां, पलिश्तियों पर विजय (५४: ११-२५); पवित्र 

सन्‍्दूक का यरूशलेम लाया जाना (६); मंदिर बनाने की _ 
उसकी इच्छा नातान नबी के द्वारा स्थागित, फिर भी प्रभ 
यह प्रतिज्ञा करते हैं कि दाऊद की राजगदी का अन्त न होगा 


.. (८); पलिश्ती, मोआब, सोवा, हमात, और एदोम राज्यों पर 
... विजय, दाऊद के कर्मचारी (८); योनातन के लंगड़े पुत्र 
.... मपीबोशेत पर क्ृपादृष्टि (६); अम्मोनियों की अभक्ति 
.... के कारण अम्मोनियों और उनके साथी सूरियानी की 
आह 5  पराजय (१०) १. हज, 22०80 कह 
..... (ग) दाऊद का पाप और पश्चाताप (११-१२ : २५) : बतशेबा 
... के साथ व्यभिचार और ऊरिय्याहु को मरवा डालना (११); 
.. नातान कादृष्टान्त के द्वारा दाऊद को दोषी ठहराना; दाऊद ८. 
... का पश्चाताप परंतु बच्चे का मरना (१२: १-२३); बतशेवा... 






































१और २शमूएल........| ३१३ 


(च) दाऊद के पुत्रों के कुकर्म (१३) : अम्मोन का अपनी बहिन 
के साथ कुकर्म और अबशालोम का अम्मोन को घात करना 
और गश्र भाग जाना | 


(छ) अबशालोम का राजद्रोह (१४-१६) : अनिच्छा से दाऊद 
अबशालोम के लौटने की अनुमति देता है (१४); अब- 
शालोम की लोकप्रियता और हेब्नोन में राजा बन जाता; 
दाऊद का यरूशलेम से भागता (१५-१६ : १४) अब- 
शालोम हुशे का परामश्श मानता है, अहीतोपेल का नहीं 
और गिलाद में पराजित होकर मारा जाता है-दाऊद का 
विलाप (१६ : १५-१६ : ८) । 


(ज) दाऊद का यरूशलेम लौटना और शांति स्थापित करना 
.. (१६ ; ६-२० : २६) : शिमी और मपीबोशेत के साथ 
समझौता, बर्जिल्ले की दया (१९६: ४-३६); राजा के 
लौटने से यहूदा के लोगों का रूठना (१६ : ४०-४३) 
शेबा का राजद्रोह दबाया जाता है (२० : १-२२); 
दाऊद के पदाधिकारियों का उल्लेख (२०: २३-२६) । 
(३) दाऊद के शासन काल की विविध बातें (२१-२४) 
(क) गिबोनियों का पलटा लिया जाना (२१ : १-१४) 


आल 


(ख) पलिश्तीन के साथ युद्ध में दाऊद के सेवकों की बीरता 
(२१ :१५-२२) 
(ग) धन्यवाद का भजन (२२), (देखिये भजन १८) 
(घ) दाऊद के अंतिम वचन (२३ : १-७) । 
(च) दाऊद के वीर पुरुष (२३: ८5-३६) जि 
(छ) प्रजा की गिनती करना और बेदी बनाना (२४) : प्रजा की. 
... गणना के पश्चात्‌ विपत्तियां, अरोता नामक यबूसी की 
लिहान के पास मरी का रोका जाना। दाऊंद उस 
 क खलिहान को वेदी के लिए मोल लेता 
४. संरचना, रचयिता, रचना-तिथि 


शमूएल की पुस्तक के लेखक ते अवश्य मूलस्नोतों का प्रयोग किया, क्योंकि 
२ शम्‌. १: १८ में याशार नाम पुस्तक का उल्लेख है । लेखक इस बात के प्रति. 
.. जागरूक है कि जिन घटनाओं का वह वर्णत कर रहा है, वे कुछ समय पूर्व 
. घटित हो चुकी हैं, क्योंकि वह कुछ बातों के “आज तक बने रहने” का उल्लेख 



























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. १२४... पराने नियम की भमिका 


करता है (१ शम्‌.२७ ३० : २५;२ शम्‌ू, ६: ८) । आलोचनात्मक 
.. विश्लेषण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विषय सामग्री भिन्‍न- 
. भिन्‍न मूलस्रोतों से ली गई है और कि लेखक पूर्ण समन्वय नहीं कर पाया है । 
. उदाहरणाथथ, १ शम्‌, १६: १४-२३ में दाऊद शाऊल का वीणावादक और 


.._ हथियार ढोनेवाला बनाया गया, परंतु अगले अध्याय में (१७ : ५५) में दाऊद 


शाऊल तथा उसके सेनापति अब्नेर के लिये अपरिचित व्यक्ति था। राजतंत्र के 
आरंभ होने के भी दो वर्णन हैं। एक में शमृएल राजा बनाने की बात के पक्ष 
में है (१ शम्‌. ६), और दूसरा जिसमें बड़ी अनिच्छा से राजा बनाने के लिये 
.. सहमत होता है (१ शम्‌, ८5) । शाऊल को दो बार राजा बनाने के लिये 
अस्वीकार किया जाता है (१ शम्म, १३: १४ और १५ : २६) । 

पंचग्रंथ में जिस रीति से मूलसत्रोतों का विश्लेषण किया गया है, उस 
प्रकार का प्रयास इन पुस्तकों के संबंध में सफल नहीं हुआ । फिर भी यह 
सामान्यतया माना जाता है कि १ शम्तू, 5-१२ में एक पूर्व मुलस्रोत' है और 





एक “उत्तर मूलस्रोत' । आइसफेल्द (5060) नामक विद्वान तीन मूलखोत 


- मानते हैं : एल (.), जे (]) और ई (४) । बुडडे (87006) दो मानते है, 


जे और ई। बुड्डे की यह मान्यता, कि इस पुस्तक के जे और ई मूलस्रोत _ ध 


पंचग्रंथ के जे और ई के तारतम्य में हैं, सामान्यतया स्वीकृत नहीं है। यह 


अलबत्ता स्वीकार किया जाता है कि पूवे मुलस्रोत' और उत्तर मुलखसत्रोत का... 


. जे! और ई से कूछ साम्य अवश्य है । शेफर्स (8८॥%(०४) दो मूलस्रोतों का _ 


मा) _विदर्शन इस प्रकार करता है कि एक सूलखोत एम (मिस्पा) जिसमें १ शम्‌. 
.. ८ और १० : १७-२७ हैं, और दूसरा घुलख्रोत जो (गिलगाल) है जिसमें 
5 १ शम, ६ आर १० : १-१६ हैं। 


यद्यपि मूलख्रोतों के विश्लेषण के संबंध में सहमति नहीं है, परंतु यह 


....._ साधारणतः माना जाता है कि इन पुस्तकों में निम्वांकित परंपराओं का समन्वय 
.... (१) वह परंपरा जिसमें शमूएल प्रधान पात्र है (यह “उत्तर मूलस्रोत' 


का आधार है) । 


 , हे (२) । . वह परंपरा जिसमें शाऊल नायक (यह 8 क्‍ 


20070: 5 आधार है) द 
० ३) वह परंपरा जिसमें दाऊद तायक है। 


हा । ) पवित्न संदूक के इतिहास और चमत्कारिक शक्ति की परंपरा । सी । 
... (४) दाऊद के परिवार और दरबारी जीवन संबंधी तत्कालीन प्रलेख। 





(६) याशार की पुस्तक और अन्य काव्य ग्रन्थ 























१और २शमूएल......... १२५ 


१ और २ शमृएल की अधिकांश सामग्री के संकलनकर्ता लेखक की तिथि हे 
उन घटनाओं के पश्चात होता चाहिए जिनका वर्णन बह पुस्तक में कर 
रहा है । कितने काल पश्चात्‌ वह लिख रहा है यही मुख्य प्रश्न है। १ शर्म. 
२७ : हे में लिखा है 'इस कारण से सिकलग आज के दिन तक यहूदा के 
राजाओं का बना हुआ है ।' इससे यह इंगित होता है कि लेखक ई... पृ. ६२२ 
में जो राज्यों के विभाजन की घटना हुई उसके पश्चात रहा होगा । २ शम. 
१३: १८ में लिखा है, वह तो रंगबिरंगी कर्ती पहिने थी; क्योंकि 


जो राजकृमारियां कुवारी रहती थीं वे ऐसे ही वस्त्र पहिनती थीं । इससे 


यह श्रतीत होता है कि लेखक कई पीढ़ियों पश्चात्‌ लिख रहा है। फिर भी 
व्यवस्था विवरणात्मक झलक बहुत कम है (दे, १ शस्‌, १४ : ४७-५१: 
5 शह़ू, 5; २०: २३-२६) अतः इन पुस्तकों की तिथि व्यवस्थाविवरण काल 
के पूर्व, कदाचित्‌ ई. पृ. सातवीं सदी के प्रारंभ में मानी जाती है (लगभग 
ई. पृ, ६७५) । 

५. धर्म शिक्षा ओह 

लेखक यह शिक्षा देना चाहता है कि इस्राएल के इतिहास की समस्त 
घटताओं में परमेश्वर का हाथ है। परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा और वाचा के 
अनुरूप इस्राएल का जीवन निर्माण करता है । पात्रों का यथार्थवादी चित्रण 
किया गयो है और वे पात्र उन सब सद्गुण और अवगणों को व्यक्त करते हैं, 
जो श्रत्येक युग में मानव प्रकृति में विद्यमान रहते हैं । परंतु इन पुस्तकों में 
इन गुण-अवगुणों को परमेश्वर की प्रकाशित इच्छा और स्वरूप के परिपेक्ष 


में प्रस्तुत किया गया है। परमेश्वर मनुष्यों को बुलाता है, और उनके कामों के . 2 
लिए उन्हें सबल बनाता है, उनके प्रयत्नों को सफलता के मुकुट से सुशोभित 


करता है परंतु यह सब कुछ उसकी इच्छा और व्यवस्था का पालत करने से 


होता है। इन पुस्तकों में वर्णित दृश्य में अधिकार-प्रदान, न्याय और दया । 
का अपूर्व समन्वय है| कुछ उदाहरण लीजिए | एली को देखिए, वह परमेश्वर . 


ग इंपापात्ञ था, परतु वह परमेश्वर के व्यायाधीन हुआ और सिर झुकाकर 
उसने उस न्याय को स्वीकार किया (१ शमू, ३: १२, १८) । फिर शम्ृएल 


को देखिए, शसूएल इल्लाएल में नवी बनाया गया (१ श्र. ३ : २०, २१), 


ओर उसके द्वारा परमेश्वर आश्चयेकर्म करता है (१ शमूः ७: १०), और 


अपने लोगों का मार्गदर्शन करता तथा राजतंत्र का रूप स्थापित करता है. ० ० 
कर भी जब शसूएल ने अपने अयोग्य पुत्रों को उत्तरदायित्व का काम सौंपा... 

._ तो उसकी प्रशंसा नहीं की गई (१ शमृ. ८: १-४) । बीर कर्म के नेता के रूप 

.. में शाऊल को देखिए । राजा के काये में वह इल्राएलियों के लिये गवे का विषय . 











लोक कप, २-० /पाम्पआहर ” यह: ५३१, ुकआ8-7 ०, पर के कई । कम िक ॥ रह आग 08% ३ ३ 7 भी खा पर लक टिक 





रह बज -:- पराना नियमं-की भमिकां 


था (१ शमु, १० : २४) । परंतु उसने आज्ञा का पालन न किया, और उसका 
.. पतन हुआ (१ शम््‌, १५: २२, २३) | दाऊद को ही देखिए । वह इस्राएल 
. जाति के गले का हार था, परमेश्वर के लिए उत्साही था। परंतु जब उसने 
बुरा काम किया तो वह अपनी प्रजा के निम्नतम व्यक्ति से भी बड़ा पापी 
माना गया (२ शम्‌, १२ : ७) । इन पुस्तकों में लेखबद्ध घटनाओं का मापदंड 
.. एक ही है अर्थात परमेश्वर का न्याय और सत्य । 
.._ राज़तंत्न की स्थापना इस रीति से की गई है कि हमें यह शिक्षा मिलती' है 
कि अन्य मानवी तंत्न के सदृश्य राज सत्ता भी परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन 
है। अन्य लोगों के राजाओं के समान शाऊल का अधिकार एकछल्न या पूर्ण 
नहीं है। वह परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है | दाऊद वाचा बांधने के द्वारा 
ही राजा बनता है और वह अपने पद पर उसी शर्ते पर बना रहता है कि वह 
न्याय करे और नबी तथा पुरोहितों के द्वारा परमेश्वर का वचन सुने और उसका 
पालन करे । इन तथ्यों में सीमित राजसत्ता के, वैधानिक शासनों के, साधारण 
मनुष्य के अधिकारों की धारणाओं के बीज हैं, क्योंकि इन सब में मानव की 
इच्छा के परे विधान के अस्तित्व की स्वीकृति है । हे 
... इस्राएल की राजसत्ता में परमेश्वर का एक अभिप्राय निहित है जो समय 
की घटनाओं से परे हैं। दाऊद की राजसत्ता वह ढांचा था जिसमें भविष्य की... 
... आशा ढाली गईं, क्योंकि परमेश्वर का शाशवत अभिप्राय दाऊद के वंश से पूरा... 
.. होना था (२ शम्‌, ७: १६) । खिस्त दाऊद का पत्र था । 



































इक्कीसवां अध्याय 


राजाओं की पहली और दूसरी पुस्तक 

१. शीर्षक 

शमूएल की पुस्तकों का अध्ययन करते हुए हम लिख चुके हैं कि वे दो 
पुस्तकें न थीं, एक थी। राजाओं की पुस्तकें भी एक ही पुस्तक थी । सेपत्वा- 
गिता में पहली बार दो पुस्तकों में विभाजन दिखाई पड़ता है । उसमें शीर्षक 
है--३ और ४ राज्य । बुल्गाता में ३ और ४ राजा है। शमृएल की पुस्तकों के 
अनुरूप राजाओं की पुस्तक का विभाजन भी १५१६ की बॉम्बेरी (807970८7ए) 
की इब्रानी बाइबल में प्रस्तुत किया गया है । इब्नानी शीर्षक मेलकिम (अर्थात 
राजा) है। हिन्दी में भी इसी शीर्षक को अपनाया गया है। 


२. विषय सामग्री का सारांद 


१ राजा में सुलेमान के वैभवशाली शासन का वर्णन है। इसमें मंदिर का 
निर्माण, राज्य का विभाजन और आहाब तथा एलिय्याह के समय तक दोनों 
. राज्यों के उत्थान-पतन का वर्णन सम्मिलित है । कल 

. २ राजा में एलिय्याह और एलीशा के इतिहास से आरम्भ होता है। तब. 
यह के विद्रोह, उत्तरी राज्य के विध्वंस और योशिय्याह के महान सुधार का. 
वर्णन कर यहूदा की बंधुवाई और यरूशलेम के विनाश तक का वर्णन है।. 


३. खुपरेखा द द आह 
१. राजा: सुलेमान के वैभव से आहाब के विश्वासधात या विधर्म तक 
(१) सुलेमान का सिहासनासीन होता और राज्यशासन (१-११) ४ 

... (क) सुलेमान का राजा बनाया जाना (१-३: २) : अदोनिय्याह 
... का सिहासन हथियाने के प्रयास की विफलता और 


. युलैमान का राज्याभिषेक (१) ; दाउद के अंतिम बादेश, 











..._ (९: १-११); सुलैमान का अदोनिय्याह, एव्यातार, योआब 











0 ज)- 


के माध्यम से सुलैमान को दंड (११): सुलमान की ह 


५... पक्का काका 7 अत 2०.. 20 एड पता | दान न 


ह जनक ५ 0 य० किक 5 कफ हु, का उहागसकगत &9307:8070:0 00 
कक कि 5. 020) आ खिला... 7० पा पुका को 322 कै: 2 ला 00000 


.._ पुराना नियम की भूमिका 


और शिमी को दंड देना (३: १२-४६ ) ; फिरौन की 


पुत्री के साथ विवाह (३: १-२) । 


(ख) गिबोन में सुलैमान की प्रार्थना, और फलस्वरूप परमेश्वर 


(घ) 


उसे बुद्धि का दान देता है (३: ३-२७) । बालक के संबंध 
में द। स्तियों के बीच न्याय करने में बद्धि का प्रदर्शन है। 


 (ग) सुलमान का शासन (४) : हाकिम, शासन-प्रदेश, व्यय, 
और सवार | कक द 


मंदिर और महलों का निर्माण (५-८) : सोर के राजा 
हीराम से मित्रता (५); मंदिर सात वर्ष में बनाया गया 
(६); महलों का निर्माण--लबानीनी वन नामक महल, 
खस्भेवाला ओसारा, सिहासन का ओसारा, फिरौन की 
बेटी का महल, और आंगन बनवाए (७: १-१२); सोर 
का कारांगर पीतल की सजावट करता है (७: १३-५१) 


वाचा का सल्दूक मंदिर में लाया जाता है और सुलैमान 
समपंण का आराधना करता है (८) का हे 


(च) परमेश्वर सुलमान को उसके धामिक दायित्व की याद दिलाता 


है (६: १-६) 


(छ) सुलैमान का व्यापार, धन-संपत्ति और जग-कीति (& : १०- 


१० : २६९) : सोर के राजा हीराम को बीस नगरों का 
दान, काम में लोगों से बेगारी, शहरों को सुरक्षित करना, 
उसके जहाज (& : १०-२८); शीबा की रानी का आता 


(१० : १-१३); हाथीदांत का सिंहासन, व्यापार एवं... 


धनसंपत्ति ( १४-२६ ) 


पराए देवताओं की भक्ति करना, परिणामस्वरूप शत्तओं 


... रानियाँ पराए देवताओं की ओर उसका भन फेरती हैं, 
.. अतः परमेश्वर का क्रोध (११: १-१३); एदोमी हृदद 


सा _ उसका शत्रु हो जाता है (११: १४-२२); एल्यादा का 
_.. पुत्र रजीन भी शत्रु हो जाता है (११:२३-२५) 


रा. ... नबात का पुत्र यारोबाम भी विरुद्ध हो जाता है, जिसे 





. यारोबाम ने इस्राएल के दस गोत् प्रतीकात्मक रूप से दे दिए; 


मृत्यु (११ : ४१-४३) । 


























राजाओं की पहली और दूसरी पुस्तक द १२६ 


(२) विभाजित राज्य--यहूदा और इस्राएल (2) 


(क) 


राज्य का दो भाग हो जाना (१२: १-२४) : सुलैमान का 
उत्र रहबियाम जनता के बोझ को हल्का करने से इन्कार 


करता है; यारोबाम का विद्रोह और शमायाह सवी राज्य- 
विभाजन की पृष्टि करता है। द 


(ब) 


इजाएल एवं यहूदा राज्यों के बीच युद्धकाल (१२: २५४- 
१६ : १४) : यारोबाम प्रथम बेतेल और दान में बछड़ा- 
वजा की प्रतिष्ठा करता है, और उसे एक नबी द्वारा 
चेतावनी दी जाती है (१२: २५-१४ : २० ); रहबियाम 
का राज्य (१४: १६-३१); यहुदा में अब्बियाम और 
आसा का राज्य (१५ : १-२४ )/ ; इस्राएल में नादाब, 
बाशा, एला, जिम्री, ओम्री और अहाब का राज्य (१५: 
२५--१६ : ३४) । 


(ग) एल्लियाह और एलीशा का वृततात (१ रा० १७--२ रा. ८) 


अनावृष्टि की नबृवत, एल्लियाह को करीत नामक नाले पर 
कौवों द्वारा रोटी का प्रबंध, सारपत की विधवा के यहाँ 
जाना, ओबद्याह और अहाब से भेंट (१७: १-१८ : १६९ 32 
कर्मल पहाड़ पर प्रतिद्वन्द्द और अनावृष्टि का अन्त 
(१८: २०-४६); एल्लियाह का होरेब पव्व॑त को भाग 
जाना, फिर लौट कर एलीशा को अपना उत्तराधिकार_ 
सोंपना (१६); अहाब के साथ बेन्द्दद की लड़ाइयाँ जिसमें 
नबी भाग लेते हैं (२० ); एल्लियाह नाबोत की बारी लेने 
के लिये अहाब को शाप देता है (२१); मीकायाह की 
नदूबत के अनुसार अहाब का युद्ध में मारा जाना, यहोशापात 


_ युद्ध में उसका साथी था (२२) । 


[२ राजा 


: नियों के विद्रोह से लेकर बंधुवाई तक; रूपरेखा १ 


राजा से क्रमश : ] 


एल्लियाह की नबूबत के अनुसार अहज्याह की मृत्यु (२ रा. १) 
| एल्लियाह का आकाश में उठाया जाना और एलीशा का शक्ति-प्रदर्शन. | ( २ ) गा 

._ ऐलीशा की सलाह से यहोराम को मोआब के विरुद्ध सहायता प्राप्त होती हैं. 

|... के पुत्त को जिलाना; और अन्‍य आश्चयेंकर्म (४) : अरामी नामान कोढ़ी को. 


का 


आश्चयेकर्म : विधवा की हांड़ी का तेल बढ़ाना, शूनेमी सनी. 





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गा 30७0७७४७००७०७४४७७०७४७४ ०४६. का 7०० 820 78 कर, 





| १३० द 





पराना नियम की भमिका 


.. एलीश शुद्ध करता है (५); कुल्हाड़ी को निकालने का चमत्कार (६ : १-७); 
. एलीशा का अरामी दल से बचना, शोमरोन में अकाल दूर होने की भविष्य- 
. वाणी, चार कोढ़ी नबूबत की पूर्ति देखते हैं (६ : ८-७ : २०); शनेमी स्त्री 
.. को उसकी भूमि दिलाना, हजाएल को बताना कि वह अराम का राजा होगा 
. (८: १-१५); यहोराम और अहज्याह का यहूदा पर राज (5: १६-२६ ) । 


(व) 


येह का राजद्रोह--अहाब के घराने का विनाश (६-११) : एलीशा 
के दूत द्वारा येहू का अभिषेक, यि््ज ल का वेग पूर्वक रथ पर जाना 
और इस्राएल के राजा योराम, यहूदा के राजा अहज्याहु और 
इजेबेल को घात करना (६); दोनों राजाओं के बेटों, पोतों, 
प्रधान पुरुषों, मित्रों तथा बाल के उपासकों को घात करता 
(१० : १-२७); येहू का अधर्म, अराम के हजाएल का आक्रमण, 
येहू की मृत्यु (१० : २८-२६); अहाब की पुत्री अतल्याह का 
पूरे राजवंश को नष्ट कर यहूदा की राजगद्दी हथियाना, योआश 

का बचना, अतल्याह का मारा जाना, योआश को यहूदा का राजा. 
बनाना (११) 


इस्राएल राज्य का पतन और ध्वंस (१२-१७): यहुदा का राजा. 


योआश भवन को सुधारता है (१२); यहूदा में यहोआहाज तथा... 


इस्राएल में योआश का राज्य, योआश को एलीशा का अंतिम 
संदेश (१३); यहूदा का अमस्याह योआश से युद्ध करता है, 
अमस्याह के बाद अजर्याह, यारोबाम द्वितीय, जकर्याहु, शल्लम, 


सनहेंम, पकह्माह और पेकह इस्राएल पर राज्य करते हैं, योताम 


यहूदा पर राज्य करता है (१४-१५); यहूदा के आहाज का _ क्‍ 
राज्य, अराम और इस्राएल के राजाओं से युद्ध, अश्शर के राजा 


 तिग्लेत-पेलेसर की अधीनता स्वीकार करता है (१६); होशे 
इस्राएल का राजा, उसी काल में अश्श्री शोमरोन को जीत लेते 
: हैं, बहुतों को बंदी बनाते और विदेशी लोगों को नगरों में बसा _ 
बेल हैं (१७) 7 0 हे 
) केवल यहूदा का राज्य (१८-२५) आम 
) हिजकिय्याह का अच्छा शासन (१८-२० ) : सन्हेरीब का आक्रमण, 


.... परंतु यशायाह के वचनानुसार यरूशलेम शहर की चमत्कारिक 


7 रक्षा (६-१६): 
पा रा समक्ष बुद्धिहीनता का कार्य (२०) । 





 हिजकिय्याह की बीमारी, बाबेल के दूतों के 




















राजाओं की पहली और दूसरी पुस्तक _ ह १३१ 


(ख) मनश्शें और आमोन के शासन में नैतिक पतन (२१) 
(ग) योशिग्याह का धर्म-सुधार (२२-२३) : हिलकिय्याह को व्यवस्था 
की पुस्तक मिलती है (२२); योशिय्याह परमेश्वर से बाचा 
बांधता है, और धर्मसुधार करता है (२३ : १-२७) मगिद्दो में 
फिरौन-निको द्वारा योशिय्याह की मृत्यु, यहोआहाज का अभिषेक 
(२३ : २८-३० ) 
(धघ) यहूदा राज्य का अंत (२३ : ३१-१५ : ३०); फिरौन-निको 
यहोआहाज को गही से उतार कर यहोयाकीम को राजा बनाता 
(२३: ३१-३७ ); यहोयाकीम नबकदनेस्सर के अधीन होता 
है और उसके विरुद्ध विद्रोह भी करता है (२४ : १-७ ) 
यहोयाकीम के राज्य का प्रारंभ, नवृकदनेस्सर का यरूशलेम पर 
अधिकार और १०००० लोगों को बंधवाई में ले जाना 
सिदकिय्याह को राजा बनाना (२४ : 5--२०) सिदकिय्याह का 
विद्रोह, यरूशलेम का विनाश, गदल्याह का अधिकारी बनाया 
जाना (२५: १-२६); सैंतीस वर्ष के बाद बाबेल का राजा 
एवील-मरोदक का यहोयाकीन के प्रति दया का व्यवहार 
(२५ : २७--३० ) | 
४ रचना, रचयिता, तिथि 

.. बाइबल की अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों के समान, राजाओं की पस्तकें भी 
पुरानी स्नोत-सामग्री के आधार पर ही लिखी गई हैं। इनमें से कुछ का 
उल्लेख किया गया है। परंतु ऐसी औरं भी सामग्री हो सकती है जिसका 
उल्लेख नहीं किया गया है । जिन मूल-सोतों का उल्लेख हुआ है बे हैं: 
सुलैमान के कामों का वर्णन (१ रा. ११: ४१), इस्राएत के राजाओं के 


इतिहास की पुस्तक (१ रा. १४ : १९ आदि) । यहोराम और होशे के... 


अतिरिक्त इस्राएल के सब राजाओं के संबंध में 'इस्राएल के राजाओं के इतिहास 

. की पुस्तक का उल्लेख किया गया है । कूल मिलाकर यह उल्लेख १७ बार का 
हैआ हैं। उसी पअकार यहुदा के राजाओं में से पाँच के अतिरिक्त अन्य सब के... 
संबंध में यहुदा के राजाओं के इतिहास की पुस्तक' का उल्लेख हुआ है। ये. 
पुस्तकें कदाचित शासकीय राज्य-इतिहास नहीं थे जैसे कि इतिहास लेखक 
.. (२. शम््‌ ८: १६) हारा श्रत्येक राजा के संबंध में आलेख होते थे | ये उन रा 
. पर आधारित क्रमबद्ध इतिहास की पुस्तकें थीं। इतिहास की पस्तक' नाम से... 


. ही यह व्यंजित होता है कि वह प्रत्येक राजा के कामों के संकलन के बजाय _ । 


रा । एक पुस्तक के रूप में थी । 








0५, . 77 णाशआइकजवा आकार | 7 पक एक तय ला नी ५७/00/0008 0 /0007777/770 0 शा ख उकक। रा मम 
ज् / 7 जमाक| 3:79 ७७४/9७७७५४४52:93,090000/9053555::2225:798555 50 00202 न कक कक 0 200 शक को, 2 2ल+ ०05 2] 225 का 





१३२... पुराता नियम की भूमिका 


इन स्रोतों के अतिरिक्त कुछ ऐसे स्रोत संभव हैं जिनका उल्लेख इन राजाओं 
की पुस्तकों में नहीं है। उदाहरणार्थ, संभव है कि एलिय्याह के कामों की 
. कोई पुस्तक हो। उसी प्रकार एलीशा के कामों की कोई पुस्तक हो, या 
 अरामी युद्धों की पुस्तक हो (१ रा. २०, २२) । संभव है कि मंदिर के संबंध में 
कुछ वर्णन हों (२ रा.१२: ४-६;१६ : १०-८५); और यशायाह नबी 
का इतिहास हो (रा. १८: १७-२० : १६; देखिए यश. ३६ : १-३६ : ८) 
इन सब मूुलख्रोंतों से जो सामग्री ली गई उसे एक ऐसे ाँचे' में संगठित 
किया गया जैसे न्यायियों की पुस्तक के रचयिता ने काम में लिया है । इस्राएल 
के राजाओं के संबंध में प्रस्तावना सूत्र इस प्रकार है : यहुदा के राजा (नाम) 
“--->-----कें दसवें वर्ष (नाम )--------का पुत्र, (नाम )->------ 
इस्राएल पर राज्य करने लगा। (नाम )--+----+++ का पुत्र शोमरोन में 
इस्राएल पर दस वर्ष राज्य करता रहा । (१ रा. १६ : २६९ आदि ) । राज्यकाल 
का वर्णन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, वैसे ही राजा के प्रति लेखक अपना विचार- 
निर्णय भी देता है । उसका सूत्र इस प्रकार है: और (नाम )--++++>के 
पुत्र (नाम )--------ने वह किया जो यहोवा की दृष्टि में बुरा था (१रा, 
१६ : ३० आदि। प्रत्येक राजा के इतिहास के अंत का सूत्र इस प्रकार है 
(नाम )------->के और काम जो उसने किए, क्‍या वे सब इस्राएल के 
राजाओं के इतिहास की पुस्तक में नहीं लिखे हैं? और (नाम )---+++- 
अपने प्रखाओं के साथ सो गया और उसे उसके प्रखाओं के साथ (शोमरोन) 
में मिद॒टी दी गई, और उसका पृत्र (नाम ])--------उसके स्थान पर राज्य 
.... करने लगा (१ रा. १६: ५) । प्रत्येक राजा के संबंध के उसकी परिस्थिति 
.. अनुरूप इस सूत्र में थोड़ा बहुत अंतर कर लिया जाता है।. द 
5... यहूदा के राजाओं के संबंध में भी इश्ी प्रकार के सूत्र का प्रयोग किया _ 
........ गया है। उनके संबंध में उस ससय के इस्राएल राजा का उल्लेख किया गया है। 
... यहुदा के राजाओं के संबंध में प्रस्तावना सूत्र में कभी-कभी माता के ताम का भी 
.. उल्लेख किया गया है (१२रा १५: २) । आठ राजाओं के संबंध में विचार- 
.... निर्णय अच्छा है--और (ताम)--------ने वह किया जो यहोवा की 
.. दृष्टि में ठीक है ( २रा. १२:२)” ; परंतु यह प्रशंसा भी अपवाद के साथ है, 
... तो भी ऊँचे स्थानन गिराए गए; प्रजा के लोग तब भी ऊँचे स्थान पर... 
..... बलि चढ़ाते और धूप जलाते रहे” (२रा-. १२:३ )। हिजकिय्याह 
... . (२रा. १८५: ३) और योशिय्याह (२ रा. २२:२) ही ऐसे राजा हैं जिन्होंने... 
.. “जैसे उनके मृलपुरुष दाऊद ने किया था जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है वैसा... 
कया और उनकी में कोई अपवाद नहीं है । उनका विशेष सद्गुण 




















राजाओं की पहली और दूसरी पुस्तक |: पर 


था कि उन्होंने ऊँचे स्थान गिरा दिए, लाठों को तोड़ दिया, जिसके फलस्वरूप 

रूशलेम के मंदिर में यहोवा के लिए बलि चढ़ाई जा सकी। सब से अधिक 
भर्स्सना एवं दंड यारोबाम के लिए रखा गया है, “नबात के पुत्र यारोबाम जिसने 
इस्राएल से पाप कराया उसके पापों के अनुसार वह करता रहा, और उनसे वह 
अलग न हुआ (२ रा० १४: २४) , क्योंकि “यारोबाम ने दो बछड़े बनवाए 
और लोगों से कहा, यरूशलेम को जाना तुम्हारी शक्ति से बाहर है, इसलिए है 
इस्राएल अपने देवताओं को देखो जो तुम्हें मित्र देश से तिकाल लाए हैं। 
उसने एक बछड़े को बेतेल और दूसरे को दान में स्थापित किया'“'उसने ऊँचे 
स्थानों के भवत और सब प्रकार के लोगों से जो लेवीवंशी न थे, याजकः 
ठहराए । फिर यरोबाम ने आठवें महीने के पंद्रहवें दिन यहदा के पर्व के समान 
एक पर्व ठहरा दिया और बेदी पर बलि चढ़ाने लगा” (१रा. १२:२८-३३) 
व्यवस्था विवरण में इसकी मनाही की गई है (व्य, ४: १५क., ६:८-२१, १८: 
१क्र, १२:२-१८) । इससे यह भी पता चलता है कि राजाओं की पुस्तकों के 
लेखक का दृष्टिकोण व्यवस्था विवरण की पुस्तक का दृष्टिकोण था । इसीलिए 
उसे व्यवस्था विवरणात्मक संग्रहकर्ता या संपादक माना जाता है । 


राजाओं की पुस्तकों का ढांचा २राजा के २४वें अध्याय पर समाप्त हो 
जाता है, जहाँ ५९८६० पृ० में हुई बंधुवाई का आलेख हुआ है । वह ढांचा २५ 
वें अध्याय में नहीं है जिसमें ई० पू० ५८७ में यरूशलेम के विनाश का वर्णन है। 
इसके आधार पर यह माना जाता है कि व्यवस्था विवरण भक्त संपादक ने इन 
दोनों तिथियों के बीच की अवधि में अपना कार्य किया ओर राजाओं की दोनों 
पुस्तकें लिखीं | राजा का अंतिम अध्याय और ५६२ ई० पु० में सहोयाकीन 
पर कृपा-दृष्टि का वर्णन यरूशलेम के विनाश के पश्चात बंधवाई के काल में 
जोड़ा गया होगा । संभव है कि सुलेमान की प्रार्थना (१रा०,८) भी मूल लेख में. 
जोड़ी गई । यह भी संभव है कि बंधुवाई के बाद भी कुछ संपादकीय संशोधन 
किया गया हो । यह हम 

तालमुद (बाब बथरा १५) में कहा गया है कि राजाओं को पस्तकों का 
रचयिता यिर्मयाह था । यह ब्रष्टव्य है कि इन पुस्तकों में कहीं भी यिंयाह 


का उल्लेख नहीं है यद्यपि यरूशलेम विनाश के पूर्व कुछ वर्ष उसने अत्यंत महत्व- हा 
_पृण कार्य किया । इन पुस्तकों का लेखक यिमंयाह है- इस संबंध में निश्चित 


. प्रमाण कुछ नहीं हैं । इन पुस्तकों का रचयिता अज्ञात है। 
. 9. धर्म शिक्षा 


हा पुस्तकों के ढांचे तथा लेखक के व्यवस्थाविवरणात्मक दृष्टिकोण से हमें रे “ । | - 
.._ रचथिता के उद्देश्य का पता चलता है । वह इस्राएल और यहुदा के इतिहास, - । 











हि १३४ या कह ५ ध ' क्‍ पुराना नियम की भूमिका 



























. का वर्णन इसलिये नहीं करता कि उसे राजनीतिक घटनाओं के विवरण देने 
. की चाह है, परस्तु इसलिए कि राष्ट्र और प्रत्येक राजा के लिये एक बात 
. अनिवार्य है कि वे उस वाचा के प्रति जो परमेश्वर ने इस्राएल से बांधी है 

. निष्ठावान रहें । वाचा के प्रति भक्ति और निष्ठा ही, जिसमें न्यायपूर्ण एवं 
धर्ममय आचरण भी सम्मिलित है, वह कसौटी है जिससे सब शासक परखे 

जाते हैं । वाचा के प्रति भक्ति के द्वारा परमेश्वर से अनुमोदन एवं आशिष 
प्राप्त होती है। उसके प्रति विश्वासघात से परमेश्वर का क्रोध, राष्ट्र पर 
आपत्ति एवं दंड आते हैं | सुलैमान ने अपनी प्रजा के न्याय करने के निमित्त 
समझ और बुद्धि के लिये नम्नता से प्रार्थना की, और उसे बड़ी बुद्धि और 
समृद्धि मिली (१ रा. ३ : €) । परंतु जब उसने धर्म का त्याग किया और 
विश्वासघात किया तो उसे दंड दिया गया । परमेश्वर को मानना मनुष्य का 
सबसे बड़ा अधिकार और कतंव्य है। इतना होते हुए भी सच्चा परमेश्वर 
अधिकतम भव्य भवन से भी कहीं अधिक महान है (१ २रा २७) । 


इन पुस्तकों में हमें यह शिक्षा भी मिलती है कि राष्ट्र का राजनीतिक... 
संगठन उसके नैतिक एवं आत्मिक संगठन के सामने बिल्कुल गौण है। यह 
उस घठना से प्रमाणित होता है कि जब रहबियाम ने प्रजा के जए को हल्का 


बलवा किया (१ रा. ११: ३०-३३; १२ : ३-१५, २९) । इसी प्रकार 

_.. नाबोत पर किए गए अत्याचार के लिये परमेश्वर ने अपने नवी एलिय्याह द्वारा... 
....._ राजा को दंड दिया (१ रा. २१) । जब राज्य-शासन वाचा के स्पष्ट विरोध 

.... में चलाया गया, तो येह के भयंकर विद्रोह जैसे विद्रोह से उस राज्य का ध्वंस 

... किया गया, और नबियों का भी उसे आरंभ करने में किसी न किसी प्रकार 

...... हाथ रहा (२ रा. € : ६) । राष्ट्र का राजनीतिक संगठन भंग हुआ, परंत्‌ 
.. विश्वास और धर्म बच रहा | पा द 

..... कर्मेल पहाड़ पर एक संघर्ष है। उसमें किसी भी मनुष्य या राष्ट्र के 

.._ जीवन में सर्वश्रेष्ठ चुनाव करने की अभिव्यक्ति है। आज चुन लो । “एलिय्याह _ 

. सब लोगों के पास आकर कहने लगा, तुम कब तक दो विचारों में लटके रहोगे 


। _ पीछे हो लो” (१ रा. १८: २१) । एकेश्वरवाद चुनाव और पूणं समपंण 
-... की मांग करता है। पा कह 


इन पुस्तकों की पे ब | में पाठक के समक्ष राजाओं का रामीक्षात्मक चित्र... 





परन्तु अन्त में उसके कार्य की कसौटी एक एक. 





करना अस्वीकार किया, तो यारोबाम ने यहोवा के नबियों की स्वीकृति से 


..._ यदि यहोवा परमेश्वर है तो उसके पीछे हो लो; और यदि बाल हो, तो उसके... | 


क में प्रत्येक अपनी भूमिका अदा करता है, 
































राजाओं की पहली और दूसरी पुस्तक _ प्र 


उच्च कसोटी है। वह है कि उसने जो काम किए वे परमेश्वर की दृष्टि में 
ठीक हैं या बुरे हैं । इस प्रकार मनुष्यों के क्रियाकलाप इस सनातन कसौटी 
से आच्छादित हो जाते हैं, और चाहे मनुष्यों की सहायता हो या उनका 
विरोध हो, परमेश्वर अपनी योजना को कार्यान्वित करता रहता है। उसके 
प्रेम और उसकी सच्चाई पर पूर्ण भरोसा किया जा सकता है। उसकी दया 
और सच्चाई के कारण यशायाह नबी के कथन अनुसार अश्श्री सन्हेरीब के 
अपार सेन्यबल से यरूशलेम की बड़ी चमत्कारिक मुक्ति होती है (२ रा. 
१६ : २०-२८) | फिर भी उसका न्याय इतना पूर्ण और कठोर है कि 
उसके कारण मंदिर, हाँ वह मंदिर भी, जहाँ उसने अपने नाम की प्रतिष्ठा की, 
विनाश से नहीं बचता । 

इस प्रकार राजाओं की पुस्तकें परमेश्वर के साथ जीवन के पाठ हमें 
पढ़ाती हैं। लेखक ओम्री एवं यारोबाम द्वितीय जैसे राजाओं के विषय में बहुत 
कम कहता है जो सांसारिक मानदंडों की दृष्टि से महान माने जा सकते हैं, 
परन्तु वह योशिय्याह एवं हिजकिय्याह जैसे राजाओं के विषय में बहुत कुछ 
कहता है, जो अपने सारे मन से परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हैं । 
































. बाईसवाँ अध्याय 
.._१ और २ इतिहास 
.. १, ज्ीर्षक और प्रामाणिक धर्मशास्त्र में स्थान 


शम्ृएल और राजाओं की पुस्तकों के सम्बन्ध में हमने देखा कि प्रत्येक 
की मूलतः दोनों पुस्तकें एक ही थीं। इतिहास की दोनों पुस्तकें भी एक ही 
थीं। दूसरे इतिहास के अन्त में जो मसोरेती टिप्पणी है, वह उसी समय सार्थक 
लगती है जब इतिहास की दोनों पुस्तकों को एक माना जाए। इनका इब्नानी 





शीर्षक द्विबे हयामीम है। उसका अर्थ है दिनों की घटनाएं ।' इसका अर्थ... 


कदाचित 4वषे-वृत्तांत अथवा अभिलेख हैं। सेपत्वांगिता में इसका शीर्षक है 
बिबलॉस ताॉँन पेरालिपोमिनान | इसका अर्थ है वे घटनाएं जिनका वर्णन नहीं 


किया गया है या जो छोड़ दी गई थीं । प्राचीन काल से इसका अर्थ यह माना... 


जाता रहा है कि इतिहास के रचयिता ने उन बातों का अभिलेख किया है जिनको 
.. राजाओं के लेखक ने छोड़ दिया था । परंतु इन दोनों के बीच संबंध का यह 
.. उचित कथत नहीं जान पड़ता क्‍योंकि रचयिता ने ऐसी बहत सी बातों को 


.... छोड़ दिया जिनका वर्णन राजाओं की पुस्तकों के रचयिता ने किया है । दोनों 
.. ही लेखकों ने अपने अभिप्राय के अनुरूप सामग्री का चयन किया | वुल्गाता के 


.... शीर्षक लायबर पेरालिपोमोनॉन में सेपत्वांगिता का अनुसरण किया गया है... 


_ अंग्रेजी का शीर्षक है क्रॉनिकल्स (7672८) । येरोम ने इन पुस्तकों का 


विवरण "सम्पूर्ण धामिक इतिहास का क्ॉनिकल' शब्दों में किया है। येरोम 
..... के शब्दों के आधार पर अंग्रेजी नाम क्रॉनिकल रखा गया हिन्दी में 
.... इनका शीर्षक इतिहास है। 


... इब्रानी धर्मशास्त्र के वर्तमाल क्रम में इतिहास की पुस्तकें केतुबीम (लेखों) 


के समूह के अंत में रखी गई हैं | हमें इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि पहले 5 





ह । . उनका स्थान अन्यत्र था, क्योंकि वास्तव में वे एज्वा और नहेम्याह की पुस्तकों... 


पूंत्रकी हैं । कं 
२. विषय सामग्री का सारांश 





























१ और २ इतिहास .. १३७ 


दाऊद के वंश का चुनाव किया और स्थापना की तथा उसे ईश्वरीय प्रतिज्ञाओं 
का प्राप्तिकर्ता बनाया । 


३. खरूपरखा 


१ और २ इतिहास--परमेश्वर का चुना हुआ, दाऊद का वंश 
(१) आदम से दाऊद तक वंशावली (१ इ. १-६) 
(क) आदम से याकूब और एसाव तक (१) ह 
(ख) इस्राएल के बारह गोत्र (२-६ )-यहूदा की ओर विशेष लक्ष्य 
देते हुए (२-४), दाउद के बंशजों को सम्मिलित करते 
हुए (३); लेवी (६); और बिन्यामीन (८), जिसमें 
शाऊल की वंशावली भी सम्मिलित है। 
(२) दाऊद का राज्य (१३. १०-१६) 


(क) दाऊद का राजा बनाया जाना (१० : १-११ : ६) शाऊल 
की मृत्यु (१०); सब इस्राएलियों पर राजा होने के लिये 
दाऊद का अभिषेक (११ : १-३); दाऊद का यरूशलेम 
पर अधिकार (११-४ : ६) 


(ख) दाऊद के श्रवीर, मित्र और दलवाले (११:१०-१ २ 
४०७ ) | द । 

(ग) वाचा के संदूक का यरूशलेम में पहुंचाया जाना (१३-१६); 

कियत्यारीम से पवित्न संदक का लाया जाता, परंत उज्जा 

की मृत्यु के कारण संदूक का ओबेद-एदोम के यहाँ रखा 

जाना (१३); दाऊद पल्िश्तियों को हराता है (१४); 

लेबी पवित्र संदक को यरूशलेम लाते हैं (१५); उपासना 

के लिये दाऊद गायकों को नियुक्त करता है (१६)॥ 

(घ) नातान का वचन और दाऊद की प्रार्थना (१७) नातान 

. तबी का कथन कि दाऊद का पत्र परमेश्वर का घर 
बनाएगा और उसका वंश सदा बना रहेगा । हि 

(च) दाऊद की विजय (१८-२०) : उत्तर में विजय (१८); 

... अम्मोनियों और अरामियों पर विजय (१६ : १-२० :३);.. 

पलिश्तियों से युद्ध (२० : ४-5)-राक्षस। 

(छ) दाऊद भावी मंदिर की तैयारी करता है (२१-२२): 

... जनगणना, उसका दंड, यहोवा का दूत ओर्नान के खलिहान 























८ कत ४ चर 4: कह 6 67 हो अाक, "व पा ए। हक पाए का गाता 
का, 5 एकता ५ पाप 5 7 5 कि या व कर किक लद मी 
की पु, 2टव्ट 2 हि उदन्द (कट ३ डक रू 457 अप 70 ० 28३७४: ४४ पता हब ताजा 2 पिन सिमी 5 घय लीए ५ इसी का के १ "परी पर डी 





१३८ 5 .. पराना नियम की भमिका 


पर दिखाई देकर मंदिर का स्थान दर्शाता है (२१:१-१७) 
दाऊद खलिहान मोल लेता है और वेदी बनाता है (२१: 
१८-२२ :१); मंदिर बनाने के लिये सामग्री एकत्रित करता 
और सुल॑मान को भवनत बनाने का आदेश देता है 

(२२ :२-१९) 

(ज) दाऊद धामिक प्रबंध एवं देश के प्रशासन का प्रबंध करता है 
(२३-२७); लेवियों के दल और कार्य (२३); लेबियों के 
२४ दल (२४ : १-६); लेबी वंशों के प्रधान (२४ : २०- 
३१); वादकों के २४ दल (२५); द्वारपालों और अन्य लेबीय 
कार्यों के दल (२६); सेना और गोत़ों के, सहस्त्रपतियों 
और शतपतियों और सरदारों तथा भंडारों के अधिकारियों 
और मंत्रियों की नियुक्ति (२७) । द 

(झ) दाऊद की अंतिम सभा (२८-२६ : २५) : दाऊद का कथन 
सुलेमान को आदेश देता है, और मंदिर का नमूना सौंपता 
है (२८); समर्पण, प्रार्थना एवं बलिदान के पश्चात्‌ . 
सुलेमान राजा बनाया जाता है (२६: १-२५) । 





(ट) दाऊद की मृत्यु (२६ : २६-३० )। 
(३) सुलैमान का राज्य (२ इति० १-६) 


(क) गिबोन में सुलेमानत की प्रार्थना, सुलेमान की धन- 
००६६५ ४7० ५ संपत्ति (१) ह इक 
.. (ख) मंदिर का निर्माण (२: १-७ : २२) : सोर के राजा 
... हराम की सहायता (२); मंदिर के माप, तवकाशी और 
.... विभिन्न अंग (३-४) ; पवित्नसंदूक मंदिर में लाया जाता _ 
... है, मंदिर की प्रतिष्ठा (५); सुलैमान का संबोधन और _ 
.. समर्पण की प्रार्थता (६); परमेश्वर आग और तेज के 
._ बादल के द्वारा मंदिर की प्रतिष्ठा ग्रहण करता है, उसके... 
..... पश्चात्‌ बलिदान और समर्पण का पर्व (७) | हर 
.. (ग) सुलैसान के क्रिया-कलाप (८-६) : उसके कारीगर (८) 
..... शौीबा की रानी का सुलेमान के दर्शनार्थ आना (६ : 
: सुलैमान की संपत्ति, शक्ति और वाणिज्य-व्यापार 












१ और २ इतिहास 33 3७ पक 


(४) रहुबियाम से कुत्र तक (२ इति० १०-३६) 
(क) इस्राएल राज्य के दो भाग और लगातार लड़ाई (१०-१३) 


: यारोबाम का विद्रोह (१०); रहबियाम को इस्राएल से 


युद्ध करने को मना किया जाता है, रहवियाम नगरों को 


दृढ़ करता है (११ : 4-१२) ; यारोबाम की अधर्मी नीति 
के कारण लेवीय लोग यरूशलेम आते हैं (११: १३-१७); 
रहवियाम का राज्य सुदृढ़ हो जाने के पश्चात्‌ वह परमेश्वर 
को त्याग देता है, मिस्र के राजा शीशक के माध्यम से उसे. 
दंड (११: १८-१२ : १६) ; अबिय्याह और यारोबाम के 
बीच यद्ध (१३) । द 


(ख) आसा का राज्य (१४-१६) : परमेश्वर की उपासना करता 


है और जेरह नामक कशी पर विजय प्राप्त करता है. 
(१४); अजर्याह की प्रेरणा से आसा धामिक सुधार करता 
है (१५); हनानी दर्शी, अराम के राजा पर भरोसा रखने 
के लिये उसकी निदा करता है (१६) 

यहोशापात का राज्य (१७-२० ) : उसके धर्ममय शासन के 
कारण उसके वैभव और ऐश्वर्य की वृद्धि (१७) ; यद्यपि 
मीकायाह नबी उसे चेतावनी देता है, तो भी वह अहाब के 
साथ मिलकर आराम के राजा से युद्ध करता है 

का पुत्र येह यहोशापात को डांटता है (१८ : १-१६ : ३); 
वह न्यायियों की नियुक्ति करता है (१६ : ४-११); वह 


प्रार्थना करता है और वह मोआब तथा अम्मोन पर विजयी 5 है | | ... 
ः होता है, परन्तु दुर्भाग्यवश | बह इस्राएल करे दुष्ट राजा ः ४ 


अहज्याह से संधि करता है (२०) । 


(घ) अनेक राजा(२१-२८): यहोराम दुष्ट कृत्य करता है, एलिय्याह 


के पत्र द्वारा चेतावनी पाने के पश्चात उसे हानि उठानी 


_को घात करता है, अतल्याह सारे राजवंश को नष्ट करती है... 
और छः वर्ष राज्य करती है (२२); महापुरोहित यबहोयादा...... 
 अतल्याह को मरवा डालता है और यहोराम के पत्र योआस हा । 


. को राजा बनाता है (२३); योआश मंदिर की मरम्मत 
_ करता है (२४); अमस्याह का राज्य, जब वह परसेश्वर के... 














है, हनानी दर्शी 











.._ १४० 








५ कम कि: 3 झुक, पा हि तु: कु टू पल मय शि रा 7002 


: पुराना नियम की भूमिका 


एक भक्त की बात मानता है तो एदोम के विरुद्ध सफलता 


: प्राप्त करता है, परन्तु जब वह सूततिपुजा करने लगता है, तो 


उज्जियाह का राज्य, वह नह नगरों को दृढ़ करता और 


योआश राजा से हार जाता है और मारा जाता है (२५); 


कृषि करता है, जंब तक वह परमेश्वर की खोज करता है 


तब तक भाग्यशाली रहता है ,परन्तु जब घमण्ड के कारण वह 


 पफ्रोहित का काम करने लगता है तब उसे दन्‍्ड दिया जाता है 


वह कोढ़ी हो जाता है (२६); योताम का राज्य, योताम ने 
बह किया जो परमेश्वर की दृष्टि में ठीक है और बह सामर्थी 
हुआ (२७); आहाज विधियों की सूर्तिपुजा के घिनौने 
काम शरू करता है और अरामियों के आक्रमण द्वारा दंड 
पाता है, वह अश्शर के राजा तिलगतपिलनेसेर से व्यर्थ की 
संधि करता है (२८) 


(च) हिज़किय्याह का राज्य (२६-३२); धर्मसुधार से ही अपना 


राज्य आरंभ करता है। उसने भवन को पवित्र कराया और 
सच्ची उपासना की स्थापना की (२६); उसने एक महान 
फसह-पर्व मनाया ,अपनी प्रजा हारा मूतिपूजा का अंत कराया, 


. और दशमांश तथा भेंटों के नियमों का पालन कराया (३०- 


३१); सन्हेरीब की चढ़ाई के समय उसने यहोबा से प्रार्थवा 
की, परन्तु बीमारी की अवस्था में उसने यहोवा के सामने 
दीनता प्रकट न की (३२) द 


..._ [छ) मनश्शे और अम्मोन के राज्यों में सुधार के विरुद्ध प्रतिक्रिया . 


(३३); मनश्झे की मृतिपूजा-तीति। अश्श्रियों के माध्यम 


से उसे दण्ड और वह बंधुवा बनाक र वाबुल को ले जाया गया।. 
.. वहाँ उसने पश्चाताप किया और तब वह यरूशलेम वापिस. 
. लाया गया और उसे राज्य फिर मिला (३३:१-२० ) 

... अम्मोत के कुकर्म और उसका अपने ही भवन में मार 

55 जाना (३६: २१०२५) का हज 

.... ([ज) योशिय्याहु का राज्य (३४-३५); आरंभ से ही वह परमेश्वर 

_ .... की उपासना करता है और यहुदा में मूतिपूजा का अंत करता... 
... है (३४:१-७) ; परमेश्र के भवन की मरम्मत के समय जब _ गा, 

. हिल्किय्याह को व्यवस्था की पुस्तक मिलती है, तो वह यहूदा..... 

ऐ बाचा बंधाता है कि वे परमेश्वर कीआज्ञा 


















१ भीर २ इतिहास ..... कृरव्‌ 


का पालन करेंगे (३४: ८-३३ ); वह फसह का पर्व माता 
है (२५:१-१९६); फिरौन नको के द्वारा उसकी मृत्यु. 
(३४:२०-२७)। बे मम कक 

(झ) पतन अवस्था के राजा (३६ : १-२१ ) : यहोआहाज, 
यहोयाकीम, यहोयाकीन और सिदकिय्याह राजाओं को 
मित्र और बाबुल की ओर से दबाव के द्वारा चेतावनी, 
फिर भी वे परमेश्वर को रिस दिलाते रहे । उन्होंने ग्रिमेयाह 
नबी के बचनों पर ध्यान न दिया। परिणामस्वरूप अंत 
में कसदियों के आक्रमण द्वारा नगर का विनाश कराया 
गया और लोग बंधुआई में ले जाए गए। 3. 

(2) फारस के राजा कुस्रू ने यिर्मयाह के वचन के अनुसार 
घोषणा की कि जो चाहे वह यहोवा के नगर यरूशलेम को 
लोट जाए (३६: २२-२३) । (यह अंश एजा १ : १-३ 
के अनुरूप है। ) 


४. रचना, रचयिता, रचना-तिथि 


पुराने नियम की अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों के समान इतिहास की पुस्तकें 
भी एक ईश्वरीय प्रेरणा-स्फूर्त संपादक का कार्य है, जिसने अनेक मूलखोतों का... 
उपयोग किया है | इनमें से अनेक के नामों का उल्लेख किया गया है। सच - 
तो यह है कि पुराने नियम की किसी भी पुस्तक में इतने सूलस््रोतों के उल्लेख । 
नहीं हैं जितने इतिहास की पुस्तकों में । मूलखोतों का एक समृह है--दोनों 
इब्रानी राज्यों के इतिहास। इस समूह में निम्नलिखित का समावेश है : 








(१) इस्राएल और यहूदा के राजाओं की पुस्तक (२६३.२७:७; ३६:६८, 


कदाचित १ इ. € : १- भी); (२) यहुदां और इस्राएल के राजाओं की 
अस्तक (२६३. २५: २६; ३२: ३२); (३) इस्राएल के राजाओं की पुस्तक 
(२ इ. २० : ३४, और कदाचित १ इ. € : १ ); (४) इस्राएल के राजाओं 
के इतिहास (२ इ. ३३: १५); और (५) राजाओं के वृत्तान्त की पुस्तक 
कम पी 


0 विोतों का दूसरा दमूह नवियों और दशियों की पुरे हैं। इसमें... 


निम्नलिखित सम्मिलित हैं: (६) शमएल दर्शी (इब्नानी रोएह 7०व्ण) की... 


_इस्तक (१३. २६ : २६); (७) नातान नबी की पुस्तक (१६. २६ : २६; 


.._ (१६- २६: २६); (६) शीलोवासी अहिस्थाह की नबूबतों की पुस्तक (२३... 









| २ ह. £ : २९); (८) गाद द्शों की पुस्तक (इबानी होगे श्ण्प्वा) 



























१४२ पुराना नियम की भूमिका 


... £: २६); (१०) इहो दर्शी (इ. होशे) के दर्शन की पुस्तक (नवात के पृत्र 
.. यारोबाम के विषय) (२ ३. ६ : २६); (११) शमायाह नबी और इझ्ो 
-.  दर्शी की पुस्तकें (२ इ. १२ : १५); (१२) इटद्दों नबी की कथा 
... (२३० १३:२२, क्‍या यह और संख्या ५ का मूलसत्रोत एक ही हैं ? ) 
(१३) हनानी के पुत्र येह के विषय के वे वृत्तांत, जो इस्राएल के राजाओं के वृत्तांत 
में पाए जाते हैं (२६३० २० : ३४); (१४) हिजकिय्याह के विषय, आमोस 
के पुत्र यशायाह नबी के दर्शन नाम पुस्तक (२३० ३२: ३२); (१६) दर्शियों 
द (० होशे !026) ) के बचन ( २इ० ३२:१ ६) द द 


मूलस्रोतों का तीसरा समृह ऐसा है जिनका उल्लेख बिना पुस्तकों के 
शीर्षक दिए किया गया है। इनमें निम्नलिखित सम्मलित हैं; (१७) गाद गोत्र 
की वंशावली का आलेख (१३० ५: १७); (१८) राजा दाऊद का इतिहास 
(१३० २७: २४); (१६) भवन योजना संबंधी लेख जो यहोवा की अगुवाई 
से मिला (१३० २८ : १६); दाऊद और उसके पुत्र सुलैमान, दोनों की लिखी 
हुई विधियां (२ ३० ३५ :४); और (२१) योशिग्याह के लिये यिर्मयाह और 
अन्य गायक और गायिकाओं के विलाप गीत (२३० ३५: २५) द 
....... . यह बहुत संभव है कि उपरोक्त मूलस्रोतों के अतिरिक्त उत्पत्ति से लेकर 
... २ राजा तक की प्रामाणिक पुस्तक का भी मूलख्रोत के रूप में उपयोग किया 
..._ गया होगा। १ इतिहास १-९ में जो वंशावलियों की सूची है वह उत्पत्ति से 
'..... २ राजा तक की पुस्तकों का संक्षेप है । १० वें अध्याय के बाद जो सामग्री है 
वह शमृएल और राजाओं की पुस्तकों की सामग्री के बहुत ही अनुरूप है। 
.... २ इतिहास के अंत में (३६ : २२-२३) की सामग्री शब्दशः वही है जो 
| । ४  एज्रा की पुस्तक के आरंभ (१: १-३) में मिलती है। इस समानता के कारण 
... यह मान्यता प्रस्तुत की जाती है कि इतिहास की पुस्तकों का लेखक या संपादक... 
... ओर एज़ा की पुस्तक का लेखक और नहेम्याह की पुस्तक का लेखक एक ही _ 
... व्यक्ति है। इसकी पुष्टि में यह भी कहा जाता है कि इतिहास की पुस्तकों तथा... 
... ...  एज्ञा की पुस्तक में याजकीय बातों में जो रुचि पाई जाती है, और जिस शैली का. 
... प्रयोग किया गया है, वे समान ही हैं । इसके विपरीत यह ध्यान रखना चाहिये 
.... कि एज्ा-नहेम्याह में मसीह संबंधी आशा का कोई संकेत नहीं है, परन्तु इतिहास _ 
। रा में वह कुछ अंश में व्यक्त है (२३० १३: ४५; २१:७)।.. 


् 





वास्तव में इतिहास की पुस्तकों का लेखक अज्ञात है । इन पुस्तकों में भवन... 
विधियों को प्रधानता दी गई है, उससे यह अनुमान लगाया जाता... 
ती था और कदाचित गत | मंदिर के गायकमंडल का सदस्य था । रा: 

















१और २ इतिहास क्‍ हक के - ज्वूडरे. 


तिथि-इतिहास की पस्तकों की तिथि निम्नलिखित प्रमाणों के आधार पर 
निर्धारित की जाती है : २ इति. ३६ : २२ में कुत्रू की ई. पू. ५३८ में प्रसारित 
आज्ञा का उल्लेख है । अतः ये पुस्तकें बंधुवाई के पश्चात रची गई। १६ 
३ : १६ क्र में छः (मे. पा 0४7) या ग्यारह (सेप. 7.&»% बुल्गाता अरामी ) 
जरुब्बाबेल के पश्चात छः दाउदवंशी पीढ़ियों का वर्णन है, जो ई. पू. ५३७ में 


बाबल से पलिश्तीन को लौटीं (एजा २: २) । यदि हम प्रत्येक पीढ़ी के लिये _ हर 


तीस वर्ष का समय मानें, और यह. मानें कि अंतिम पीढ़ियों के बाद ही इन 
पस्तकों की रचना हुई, तो उत्तर फारसी काल में (लगभग ई. पू. ३५० ) में 
अथवा हेलेनी काल में (लगभग ई. पू. २५०) में इतकी रचना तिथि को रख 
सकते हैं । १ इति, २६ : ७ में 'दकनान' का उल्लेख हैं। यह काल दोष है ।. 
इससे फारसी काल की ओर संकेत होता है। इन प्रमाणों के आधार पर 
इनकी तिथि ई. प. ३५० और २५० के बीच मानी जाती है। अललिब्नाइट 
नामक विद्वान इसकी तिथि ई. पृ. ४००-३५० के बीच मानते हैं । 

५, शमएल और राजाओं की पुस्तकों से इतिहास की पुस्तकों का संबंध 


इतिहास की पुस्तकों का रचयिता पुराने नियम की प्रारंभिक पुस्तकों से 
अवश्य परिचित रहा होगा । ऊपर कहा गया है कि उसने उन पुस्तकों का 
प्रयोग मूलसत्रोतों के रूप में किया । अतः यह रुचिकर विषय होगा कि हम 
उसकी रचनाओं की तुलना शमूएल तथा राजाओं की पुस्तकों में प्रस्तुत एक 
से वर्णनों से करें । इतिहास का रचयिता अपने घृलख्रोतों का उपयोग स्वतंत्र 
रूप से अपने अभिप्राय के अनुकूल करता है। कभी कभी वह लम्बे-लम्बे 











वर्णनों को संक्षिप्त कर देता है, जैसे १ इ. १-६ में । १३. १० से रहे, हेई 


तक का अधिकांश शमरृएल और राजाओं की पुस्तकों के वर्णनों के अनुरूप है । । 
-उदाहरणांर्थ, १ इ. १:१० में शाऊल की मृत्यु -का वर्णन शब्द १ श, 


- ३१ : १-१३ के समान है। परंतु इतिहास का लेखक अंत में शाऊल की 


मृत्यु के नैतिक कारण के संबंध में एक टिप्पणी जोड़ देता है-यों शाउल उस हे 


. अम्मति ली थी। उसने यहोवा से न पूछा था” (१३. १०: 4३ बृ४) । 


.. इसी प्रकार अन्य घटताओं के धामिक प्रभावों को जोड़ा गया है: मनश्शे के 

.. पदचाताप से उसे राज्य लौटाया गया (२-३० ३४३ ४ ११-१३ मगिद्दों में... 

. योशिय्याह की मृत्यु यहोवा की चेतावनी न मानने के कारण होती है (२ इ. 5. 5. 
३५: २१ क्र ); शमायाह की चेतावनी के फलस्वरूप ही शीशक द्वारा । 


5... आक्रमण होता है (२ इ. १२: ५-5५); उचित पश्चाताप के कारण दण्ड कम... 
.. हो जाता है (दे. २३. १४: १-१९ 4६८ 9ल्‍प०) 057 ला 























| पृथ्ड....... पुराना नियम की भूमिका 
इन भिन्‍नताओं के अध्ययन से हमें इतिहास की पुस्तकों के रचयिता की 


.. विशेष रुचि का पता चलता है | वह इस्राएल के इतिहास में इस दृष्टि से रुचि 
.._ रखता है कि वह इस बात का प्रमाण हो कि परमेश्वर अपनी ही चुनी हुई एक 


.. ऐसी जाति. का तिर्माण करता है, जिसे यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह सच्चाई 


. से उसी की उपासना करे, और उसी परमेश्वर के द्वारा बताए हुए पवित्र स्थान, 
बलि, याजकत्व एवं नैतिक नियम के अनुसार उपासना करे। नबियों का स्वर 
भी ऐसा ही था जैसा इतिहास के लेखक का था । उत्तरी राज्य के संबंध में हम 
यह देखते हैं कि धीरे-धीरे परमेश्वर की योजना से वह गिरता गया और 
परमेश्वर के न्याय दण्ड के कारण वह पहिले ही समाप्त हो गया। अतः 
इतिहास का लेखक उत्तरी राज्य के समूचे इतिहास का वर्णन नहीं करता । 
उसकी दृष्टि में यहूदा ही सच्ची इस्राएल जाति है, जिसके माध्यम से परमेश्वर 
का अभिप्राय क्रियाशील है । इसलिए इतिहास की पुस्तकें वास्तब में “मंडली 
का इतिहास हैं, जिनका मूल विषय है--परमेश्वर का उसकी उपासक जाति 
- से संबंध । इक 
६. इतिहास की पुस्तकों का ऐतिहासिक मूल्य 0 
_ बड़ी-बड़ी संख्या की ओर इतिहास की पुस्तकों का विशेष झुकाव लगता 


. है। अबिय्याह के पास ४० ०,००० छठे योद्धा थे । उन्हें यारोबाम के 
-_द0०0००००. श्रवीरों से लड़ना पड़ा। यारोबाम के २००,००० श्रवीर मारे 


'.. गए। (२६. १३: ३, १७)। २ इ. १७ : १४-१८ में यहोशापात के पांच 
.।... सेतानायकों का उल्लेख है। यदि उनके सैनिकों की संख्या का जोड़ लगाया 


. जाय तो १,१६०,००० होता है। १ इ. ५ : २१ में रूबेनियों, गांदियों और 


के ५ मनश्शे के आधे गोत्, अर्थात्‌ अढ़ाई गोत़ों ने | हग्नियों के 49 0,0:6 9 आदमी, 
दा ४०,००० ऊंट, २२५०,००० भेड़-बकरी और २०० ०. गधे ले लिए । 0 ह 


...._ १३: २३-२६ में जो लोग दाऊद को राजा बनाने आए और जिन्होंते हेत्रोन में... 


.....__तीन दिन तक खाया पीया उनकी कुल संख्या २४०,८२२ पुरुष होती है। इस 
... दृष्टि से शम्रूएल की पुस्तकों से असाम्य की ओर ध्यान आकषित होता है । 
..... रश. 5: ४ और १०: १८ में दाऊद ने १,७०० सवार छीन लिये और 
७०० रथियों को मार डाला, परंतु १ ६. १८: ४ ओर १६ : १८ के उसी सदृश 





..._ नर्णत में दाऊद ७,००० सवार छीन लेता है और ७००० रथियों को मारता... 


हर श २४२४ में दाकद ते अरोना के बलिहान ओर बैसों को बादी. 





..._ के ५० शकेल में मोल लिया, परंतु १६. २१ : २५ में उसने सोने के ०० | 
. शेकेल में मोल लिया। आम मम 














१ और २इतिहास....... है हे की 


इन विशाल संख्याओं और अतीत के गौरव को अतिरंजित करने के 

कारण, इतिहास की पस्तकों के ऐतिहासिक मृल्य को संदेह की दृष्टि से देखा 
गया है । फिर भी यह सच है कि इतिहास से शमएल में प्रस्तुत जानकारी की _ 
कभी-कभी ऐसी पति होती है जिससे यह पता चलता है कि लेखक स्वतंत्र 
और विश्वसनीय मल स्रोतों का उपयोग कर रहा है (उदा० सिय्योवगढ़ को 
ले लेना, २श. ५: ६-१० और १ इ. ११: ४-६) । अतएवं यदि हम इस 
बात की संभाव्यता को मान्य करें कि बड़ी-बड़ी संख्याएँ देता एक प्रकार की 
साहित्यिक परिपाटी थी, तो कुछ विवेकपूर्ण विचार के साथ इतिहास की 
पुस्तकों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता को स्वीकार किया जा सकता है। हमें 
इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि इतिहास का रचयिता भक्त पहले था, 
इतिहास लेखक बाद में । उसने अपने युग में प्रचलित परंपरा एवं इतिहास की 
शैली स्वीकार की और उसके माध्यम से उसने परमेश्वर का वचन प्रकट 
किया । 


७. धर्म शिक्षा 


इतिहास की पुस्तकों से यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर सर्व उपस्थित 
है (२६. २: ६); कि परमेश्वर सर्वेज्ञानी है (२६. १६:६) और 


सर्वेसामर्थी है (१ इ. २६९ : १२;२ इ. २० : ६); कि सब वस्तुएं परमेश्वर 


.. की हैं और मनुष्य केवल वही उसे भेंट चढ़ा सकता है जो उसने परमेश्वर से 





प्राप्त किया है (१३. २६ : ११-१४) । इस संसार में परमेश्वर क्रियाशील 
.. है। वह स्वर्ग में है और जाति-जाति के सब राज्यों के ऊपर प्रभुता करता है 
.. (१६३. २६ : ११:२३. २०:६) | जो घटनाएँ होती हैं उनमें उसकी 
. इच्छा प्रबल है (२३. २५:८५) | यह दृष्टव्य है कि इन पुस्तकों में परमेश्वर 








की सर्वसामर्थोी इच्छा (998०घ६८ शी]) और अनुनज्नात्मक (कुट्फांडाए८ट) 
. इच्छा में कोई अंतर नहीं किया गया हैं | उदाहरणार्थ, जब रहृबियाम ने अपनी... 
. प्रजा की विनती स्वीकार न की, और राज़्य का विभाजन कर दिया, तो उसके... 


. इस दुष्कर्म को परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना गया और यह कहा गया 
. कि इसका कारण यह है, कि जो वचन यहोवा ने शीलोवासी अहिसय्याह के. 
द्वारा कहा था, उसको पूरा करने के लिये परमेश्वर ने ऐसा ही ठहराया था 


(२३.१०: १४६ दे. २ ई. २२: ७, ४: २०) । इतिहास का लेखक यह रा 
_ स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर बुराई के लिये दण्ड और भलाई 


. के लिये प्रस्कार देने के द्वारा अपनी नैतिक व्यवस्था को बनाए रखता है 





लेखक केवल इसी संसार की गतिविधियों तक परमेश्वर के इस नैतिक नियम रा 











क्‍ बल . पराना नियम की भूमिका 


हि को सीमित करता है । मृत्योपरांत जीवन भी परमेश्वर की इस नेतिक व्यवस्था 
के अंतर्गत है और उद्बार की एक और बड़ी ईश्वरीय योजना है--इन तथ्यों 


... को प्रस्तुत करने का काम अधिक पूर्ण प्रकाशन के लिये शेष रह गया । 






.... इतिहास की पुस्तकों से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर ने 
. इस्राएल जाति को विशेष रूप से चना कि वह परमेश्वर की निज प्रजा हो 
(१३० ११: २) | इब्राहीम के साथ जो वाचा परमेश्वर ने बाँधी, वह सदा की 
 वाचा थी (१३० १६ : १६ ऋ०) । अपनी योजना के अंतर्गत परमेश्वर ने दाऊद 
को चुना (१३० ११: २, ३), और तब सुलेमान को चुना (१३० १७ : ११, 
.. १२), और आशिष दी कि दाऊद का घराना सदेव बना रहे (१ इ. १७: २७) 
. कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि यह आशिष इस्राएल की विश्वस्तता पर 
निभर है (२ इ. ६: १६), जिसके अभाव के कारण राज्य की राजनीतिक सत्ता 
का ह्वास हुआ (२ ६३. २६: १३-१७) । कभी कंभी यह आशिष किसी शर्ते 
पर निर्भर नहीं है, वरत केवल परमेश्वर के अनंत अभिप्राय के अन्तर्गत है 
(२३. १३ : ५४), जिस अथ में वह दाऊद के पुत्र, खिस्त में पूर्ण होती दिखाई 
देती है (लू. १: ३७) । परमेश्वर ने अपनी वाचा की महत्ता एवं प्रतिज्ञाओं 


को पु रखने के लिये अपने लोगों के सागदशन चितौनी एवं ताड़ना के... हि 
..._ निर्मित्त शमूएल, नातान और गाद से लेकर यिमेयाह तक कम से नबियों..... 
_ को भेजा । 


यद्यपि परमेश्वर ने इस्राएल जाति के साथ वाचा बाँधी, परंतु परमेश्वर 


० रा । ० क्‍ की आशिष एवं सावेलौकिक योजना के अंतर्गत सभी जातियाँ और राष्ट्र हैं । 
..._ सोर का राजा हूराम और शीबा की रानी परमेश्वर की बड़ाई करते हैं 
. . (२६, २: ११-१२, £ : 5)। सुलेसान ने जिस मंदिर की प्रतिष्ठा की 





... वह समस्त जातियों के लिये आराधना का भंवन ठहराया गया (२ इ, 
६ : ३२-३३) द 


























तेईसवां अध्याय 
एजा--नहेम्याह 
१, शीर्षक और प्रामाणिक धर्मशास्त्र में स्थान है द 
नहेम्याह के अन्त में जो मसोरेती टिप्पणी है, उससे यह इंगित होता है 
कि एज और नहेम्याह दोनों एक ही पुस्तक थी । उस टिप्पणी में कहा गया 
है कि एज्जा की पुस्तक का मध्य पद वह है जो वर्तमान नहेम्याह का ३:३२ पद 
है । यूनानी अनुवाद में पुस्तक के दो भाग हैं--इस बात की पुष्टि आरिगेन ने 
तीसरी शताब्दी के आरम्भ में की। परन्तु किसी भी इब्रानी पॉड्लिपि में 
. १४४८ ई० स० के पहले यह विभाजन देखने में नहीं आता । उन सब इब्रानी 
. बाइबलों में जो हमें अभी मिलती हैं एजा और नहेम्याह दो पस्तकें हैं । 
अंग्रेजी बाइबलों में इन नामों को माना गया है। हिन्दी में दो पुस्तकों को 
अलग-अलग रखा गया है। 
.. . सैपत्वागिता में दोनों पुस्तकों की विषय-सामग्री (कुल २३ अध्याय) एक 
ही पुस्तक में है । उसका शीष॑क है २ एस्द्रस । एस्द्रस इब्रानी एजा का यूनानी 
.. रूप है। १ एस्द्रस (या एस्द्रस अ) भी एक पुस्तक है। वह केवल यूनानी में. 





(अर्थात, सेपत्वागिता ) पाई जाती है। इसलिए उसे “यूनानी एस्ट्रस” कहा जाता... 


. है। विषय सामग्री की दृष्टि से “यूनानी एस्द्रस” की सामग्री वही है जो एज्ना 

_नहेम्याह में पाई जाती है, परंतु उसमें दारा राजा के तीन अंगरक्षकों के बीच में 

. होनेबाली एक बौद्धिक प्रतियोगिता भी है और उस प्रतियोगिता में तीनों में से ५ 

है एक जोरोबाबेल (जरुब्बाबेल ) विजयी होता है। यह बात स्पष्ट नहीं है कि... 
यह जोरोबाबेल और एज्या २:२ का जरुब्बाबेल दोनों एक ही व्यक्ति है।.. 


बुल्गाता में एज्ना की पुस्तक (१० अध्याय) को १ एस्द्रस नाम दिया गया 


है, और नहेम्याह की पुस्तक को '“नहेम्याह की पुस्तक जो २ एस्द्रस भी कहलाती 


.._ है, कहा गया है । वुल्गाता के कलेमेंती संस्करण में प्रामाणिक धर्मशास्त्र के अंतगत....... 


. नहीं, वरन्‌ परिशिष्ट में ३ और ४ एस्ट्रस पुस्तकें हैं। ३ एस्ट्रस वही पुस्तक है. 
.. जो सेपत्वागिता में यूनानी एस्ट्रसः है जिसका उलल्‍्लेखऊपर किया जा चुका है... 


और 





। (वह सेपत्वागिता में १ एस्द्रस कहलाती है) : 








व एसांत, एकबोर ही | 



























पूंड 7 | हा । क्‍ पुराने नियम की भूमिका 


ग्रंथ) में वुल्गाता की ४ एस्द्रस को “२ एस्द्रस' कहा गया है। उसमें एज्ा के सात 
. दशनों का अभिलेख है, जो निर्वासन के समय उसने बाबुल में देखे थे। वह एक 


हे २, १५ और १६ वें अध्याय खिस्तियों द्वारा जोड़े गए हैं । 


.... ...  बइन्रानी बाइबल में एज्ा और नहेम्याह केतुबीम (लेखों) के अन्तर्गत रखे 
.... गए हैं, और १ और २ इतिहास के पहले रखे गए हैं। सप्तति अन॒वाद, वल्गाता 
.... और अंग्रेजी बाइबलों में एजा और नहेम्याह को ऐतिहासिक पस्तकें माना है 

.. और १ और २ इतिहास के बाद स्थान दिया गया है। यही क्रम हिन्दी 

...._ बाइबल में भी रखा गया है। 


_.._... २, विषय-सामग्री का सारांश 


 एजा आया और उसने सुधार किए 
_ नहेम्याह की पुस्तक में यह बताया गया है कि अर्तक्षत्र राजा का पियाऊ 


.. ध्मसुधारों में सक्रिय भाग लिया । 


मम _ एज्आा--परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार प्नरुद्धार 
(१) निर्वासन के पश्चात्‌ पहिला प्रत्यागमन (१-६) ई 8 
... (क) कुसू की घोषणा से लौटने की अनुमति (१: १-४) । 


का लोटता (१: ५-११) 


(२); लौटने वालों का वर्णन वंशों के अनुसार 


. पुस्तक है जो सेपत्वागिता में सम्मिलित नहीं है । प्रोतेस्तंत अपक्रिफा (ज्ञानवर्धक 


व संकलित ग्रंथ माना जाता है: ३ से १४ अध्याय मूल यहूदी 0000 


..._ एज्ा की पुस्तक में यह बतलाया गया है कि निर्वासित यहूदी शेशबस्सर 
..._ (जरूब्बाबेल) के समय बाबुल से लौटे और उन्होंने यरूशलेम में अपने... दाद 
.. परमेश्वर की उपासना पुनः स्थापित की । उसमें यह भी बताया गया है कि... 


. नहेम्याह यरूशलेम आया, यरूशलेम की शहरपनाह को फिर से बनवाया, और 


५ ४ (ख) शेशबस्सर (जरूब्बाबेल ?) की प्रधानता में प्रथम समूह ह 


क्‍ (ग) लौटे हुए यहूदियों की गिनती, चाहे फिर वे जरुब्बाबेल है क्‍ 
आदि के साथ आए हों, अथवा नहेम्याह आदि के साथ 


(२ :२-१६) स्थानों के अनुसार (२ २०-३५), और न 
धारमिक दायित्व के अनुसार अर्थात्‌ याजक, लेवी, नतीन , हा 














एजा--नहेम्याह... +पुडह:.. 


(घ) साधारण उपासना की पुनर्सथापना (३-६) : येश्‌ और 
..._ जखूब्बाबेल के नेतृत्व में वेदी का बनाया जाना (३ : १-७) ; 
मन्दिर की नींव का डाला जाना (३ : ८5-१३); 
[ विरोध का वर्णन (४) : क्रसू राजा के समय से दारा 
राजा के समय तक (४: १-५); क्षयर्ष राजा के काल में 
(४: ६); अतैक्षत्र राजा के काल में (४: ७-२३); 
इस प्रकार काम बंद हो गया (४: २४); | 
हाग्गे और जकर्याह नबियों की नबूबतों से कार्य पुन: 
आरंभ होता हैं और तत्तन्नै अधिपति द्वारा प्रश्न (५); 
दारा राजा को क्रुस की आज्ञा या घोषणा पुस्तकालय में 
मिलती है और वह मंदिर के पुन्ननिर्माण की आज्ञा देता है 
और मंदिर फिर से बनाया जाता है (६: १-१८) , फसह 
का मनाया जाना (६: १६-२२) 


(२) एजा के साथ निर्वासितों का लौटना (७-१०) ई. पृ. ४५८५. 

(क) एज्ना का यरूशलेम को आना (७: १-१० ) क्‍ 

(ख) अतंक्षत्र राजा का पत्न जिसमें एजा को लौटने की अनुमति 
दी गई थी (७: ११-२६) ! द 

(ग) एज्या की यात्रा के संस्मरण (७: २७-८० : ३६ ): एज्ञा 
की कृतज्ञता (७: २७-२८); एज्या के साथियों के नाम 
(८: १-१४); अहवा से यरूशलेम की यात्रा की योजना 
(5:१४--३६)। > 

(घ) अन्य जाति की स्त्रियों के साथ विवाह का त्याग (६-१०): .. 
इस पाप के संबंध में संकट और खले अंगीकार के 
संबंध में एजा के संस्मरण (६); लोगों का विवेक जागृत 
होता है और इस पाप को छोड़ते हैं (६ : १-१० :१७); 





अपराधियों की सूची (१० : १८-४४) 
नहेमायाहु--यरूशलेस का पुनर्तिर्मा ० 
(१) राज्यपाल नहेमायाह का कार्यकाल (१-७)ई० पू० डं४डए../रडः 
..._ (क) यरुशलेम के समाचार पर नहेमायाह का विलाप (१)... 
(ख ) राज्यपाल नियुक्त होकर नहेमायाह यरुशलेम आता है (२) रा ८० ५ 
नहेमायाह अतैक्षत्र राजा का पियाऊ था। नहेमायाह की... 
प्रार्थना स्वीकार की जाती है (२:१-८); यरूशलेम पहुँचने 










































प्राने नियम की भमिका 


पर वह रात-रात को यरूशलेम की शहरपनाह का निरीक्षण 
करता है (२:६-२०) 


. (ग) शहरपनाह बनाने वालों की सूची (३) दायित्व के विभिन्न 
विभागों के अनुसार सूची 


(धर) विरोध और कठिनाइयों के उपरांत भी शहरपनाह बन जाती 


(९3 ऐपा 


४ (कक) 


हैं: ( ४:९-७:४) 


आसपास के पड़ोसी ठट्ठा करते और धमकी 


हैं, और बनाने वाले इसके लिए सतर्क रहते हैं ( ) 
नहेमायाह आंतरिक सामाजिक बुराइयों के प्रति कदम उठाता द 
है, व्याज लेना बन्द कराता है (५); सम्बल्लत, तोबियाह 
ओर गेशेम के षड़यंत्र (६:१-१४) ; शहरपनाह का पूरा बन 
जाना, ओर रात को द्वारों का बन्द रहता (६:१५-७:४ )। 
लोटने वाले निर्वासितों की सूची (७: ५-७३ ) । यह 
सूची एज्ा में दी गई सूची के समान ही है (एज्आा० 


और नहेमायाह के 


अन्य महान कार्य 


धार्मिक सुधार पूरा किया गया (८-१०); एज्ा लोगों को 


व्यवस्था सुनाता 


मनाया जाता है ( 
दिवस (६ : १-३७) ; व्यवस्था पालन, अन्य जातियों के साथ. 
विवाह के त्याग, सबतपालन, सातवें वर्ष का पालन और भवन 
की उपासना के लिये नियमित दान के संबंध में जिन्होंने _ 


 (दे० १३० & 


है (८5: १-१२); क्ोपड़ियों का पर्व 


१३-१८ ); प्रार्थना सहित पश्चाताप 


. नीचा बांधी उनेकी सूची (६ : ३८-१० : ३६) के 
) चिट्ठियाँ डालकर यरूशलेम में लोगों का बसाया जाना थे 

. (११: १-२) : दस में से एक यरूशलेम में बसे । 

॥ लोगों की विभिन्न प्रकार की सूची ६ २०२३ ५२६३) ४ 
.. अरूशलम के निवासियों की सूची ( 3730 208 जो 
२-१७); यहूदा के गांवों में रहनेवालों 


7 की ( ५-३६); उन याजकों और लेवियों की सूची... 


रा रा ५ जरुब्बावेल के साथ लौटे थे यश (यहोश ) से यह | 
रा रे तक सहायाजक और 

















एजा--नहेम्याह हा 0 आऋ दर 


(३) नहेमायाह की यरूशलेम को दूसरी यात्रा (१३) ई० पू०४३३ 
(क) व्यवस्था के अनुसार अम्मोनी और मोजआबी परमेश्वर की 
भा में न आने फाएं (१३ : १-३) । 
(ख) दूसरी यात्रा के संबंध में नहेमायाह के संस्मरण (१३ : ४-३१) 
मंदिर की कोठरी में से तोबिय्याह का निकाला जाना 
(१३ : ४-६) ; लेवियों के भाग के लिए दान लिया जाना 
(१३: १०-१४); सबत के दिन काम बंद कराना 
(१३ : १५-२२); अन्य जातियों के साथ विवाह करने 
वालों को डांदना (१३ : २३-२७); सम्बल्लत के दामाद 
को भगाना (१३ : २८-३१) । 
४. रचना, रचयिता, रंचना-तिथि 
एज्रा-नहेमायाह की पुस्तकों के पठन से यह स्पष्ट होता है कि लेखक ने 
अनेक मूल-स्लोतों का उपयोग किया । एज्ा ४ : ११, १७ में यह कहा गया है 
कि चिट॒ठी की नकलें बनाई गई हैं । यदि ७ : २८ की तुलना ७: १० से कौ 
जाए तो मूल स्रोत में अंतर जान पड़ता है | वैसे ही यदि नहेमायाह ७ : १ और 
८: ६ की तुलना की जाए तो वहाँ भी मूल स्रोत में अंतर जान पड़ता है । 
हमें निम्मांकित तीन मूलस्रोत जान पड़ते हैं 
(१) एजा के संस्मरण (एज्रा. ७: २७-६ : १५) 
(२) नहेमायाह के संस्मरण (नहे. १: १-७ : ७३; १२ : २७-१३ : 
.. २३१ । 
(३) बरामी प्रलेख (एज्ा ४: ७६-६ : २८; ७: १२-२६) | पुस्तक _ 


के ये अंश अरामी भाषा में लिखे हैं। अन्य अंश इब्नानी में हैं। इन अरामी अंशों.._ 


में यरूशलेम की शहरपनाह बनाने के संबंध में रहम के राजा अतेक्षत्र के समक्ष 


विरोध (एज. ४: ८-१६), अतंक्षत्ष का उत्तर (४: १७-२२), दारा राजा हा 


.._ को लिखा गया तत्तेनै का पत्र (५: ७-१७), दारा का उत्तर (६ : १-१२) 
. और मंदिर के समर्पण का वर्णन सम्मिलित हैं (६ : १३-१८) । 
द (४) बइब्रानी प्रलेख, जिसमें कुत्रू की घोषणा (१ ); लौटनेवाले 


निर्वासितों की सूची (एजा २: १-७० और नहे. ७ : ६-७२, एंज्जा ८: १- ५ 


. १४); अन्यजाति स्त्रियों से विवाह करने वालों की सूची (१० : १८-४४) 





शहरपनाह बनाने वालों की सूची (नहे. १९: ३-३६); और जरूब्बाबेल के... । 


साथ लौटनेवाले याजक और लेबियों की सूची सम्मिलित है । 


सामान्य मान्यता यह है कि एज्आा-नहेरायाह और १और २ इतिहास का... 








लेखक एक ही व्यक्ति था। वह अज्ञात है । अतः वह “इतिहास लेखक' कहलाता : हा ला 











प्र हल पुराता नियम की भूमिका 


है । इस मान्यता के प्रमाण में यह तथ्य प्रस्तुत किया जाता है कि २ इतिहास 


.._ का अंतिम परिच्छद (२ इति. ३६ : २२-२३) और एज्जा का पहला परिच्छेद 


. (एज. १: १-३) दोनों एक ही हैं। इब्रानी बाइबल में एजा-नहेमायाह का 


स्थान इतिहास की प्रस्तक के पहले है। अतः यह माना जाता है कि ये पद, जो 





 ऋमबद्ध विवरण में थे, एजरा-नहेमायाह की भूमिका तथा २ इतिहास के उपसंहार 
दोनों के लिए आवश्यक हुए। इस मान्यता का दूसरा प्रमाण पुस्तकों की शैली 
और विषयों के प्रति रुचि के साम्य में हैं । दोनों पस्तकों में सांख्यिकीय 
और आनंबंशिकी सूचियों को महत्व दिया गया है। दोनों में उपासना-विधि 
की बातों के प्रति रुचि प्रदर्शित की गई है। दोनों में इब्नानी से सरलतापूर्वक 
अरामी भाषा का उपयोग किया गया है। इन दोनों तरकों को पूर्ण पुष्ट प्रमाण 
नहीं माना जा सकता और इस मान्यता के संबंध में कोई परंपरा नहीं है। 
फिर भी इसके विरुद्ध अन्य कोई मान्यता भी नहीं है । 


तिथि का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है : नहेमायाह १२: ११, २२ 


.. में महायाजकों की सूची यहू से अंत होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह , 





महायाजक फारसी राजा दारा का समकालीन था (नहे, १२: २२) । योसेपस 


.... के अनुसार (एन्टीक्विटीज ११, ७, २;5८, २ क्र०) यह दारा राजा, दारा तृतीय 
.... कोदोमनुस था (ई०पू० ३३६-३३१) । लेखक कहता है कि एज्ा और 
.... .. नहेमायाह का समय बहुत पहले था (नहे० १२: २६, ४७), और फारस के 
88"...  राजा' शब्दों के प्रयोग (एज० १:१,८, इत्यादि) से यह संकेत होता है कि फारसी 
... राज्य समाप्त हो चुका था। इसलिए लेखक की तिथि यूनानी काल (अर्थात 





. ई० पु० ३३१) में निर्धारित की जाती है । कदावित ई० पू० ३०० में लेखक ने. 


.... इसकी रचना को। 


मा ' द ४, आलोचतलात्मक समस्याएं 


एजा-नहेमायाह में कई आलोचनात्मक समस्याएं हैं : 
(१) क्या शेशबस्सर (एज्ज०१:८ और जरूव्बाबेल (एञ०२:२) दोनों एक. 


.. ही व्यक्ति हैं? इन दोनों को एक मानने के पक्ष में ये तथ्य हैं :दोनों के संबंध में... 
.... बताया गया है कि उन्होंने मन्दिर की नींव डाली (३:८ जरुब्बाबेल; ५:१६ 
.. “शेशबस्सर ) । शेशबस्सर को प्रधात कहा गया है (१:८), और जरूब्वाबेल भी 







०» प्रधान इब्रोनी नासी' (79४8) या इसीलिए कि वह यहूदा के राजवंश से था (१६४०... 5 
.. ३:१९) । दोनों को प्रधान” (इब्रानी पेहा 





शेशबस्सर, हारगे १:१-जरु 





. 9८|8॥7 ) गया है ( ए०ज् | ० हा “ ' 8 ई 





इन दोनों को एक मानने के विपक्ष में ये तक॑ हैं : एक ही यहूदी नेता को 
दो बाबुली नाम देना विचित्र जान पड़ता है । शेशबस्सर और जरुब्बाबेल दोनों 
नाम बाबली नाम हैं | एजा० ५:२.१४,१४५ में जरुब्बाबेल और येश मंदिर बनाने 
का काम जिस समय करते हैं, उस समय से सिन्न समय शेशबस्सर की गति 
विधियों का हैं । इस प्रकार शेशबस्सर और जरुब्बाबेल दोनों भिन्न व्यक्ति होने 
चाहिए | यह बड़ा सबल तक है। संभव है कि शेशबस्सर एक फारसी अधिकारी 
हो जो जरुब्बाबेल से पहले उस क्षेत्र का अधिपति हो और उसने जरूब्बाबेल 
को अपना कार्यभार सौंपा हो। कुछ लोग शेशबस्सर और १६० ३:१८ में. 
जरूब्बाबेल के चाचा शेशबस्सर को एक मानते हैं । 


(२) जो लोग यरूशलेम को लौटे उनकी सूची दो स्थानों पर थोड़े परिवर्तन 
साथ क्‍यों दी गयी है (एज्ज० २:१-७० और नहे ० ७:६ -७३) ? इसके साथ ही 
कुछ परिवतंनों के साथ यही सूची सप्तति अनुवाद की पुस्तक ३ एस्द्रस (प्रोतेस्तंत 
_ ज्ञानवड्क ग्रंथ में (१ एस्द्रस ५:७-४५) में भी दी गई है। नहेमायाह ७ में यह 
.._ सूची नहेमायाह के संस्मरण के अन्तर्गत है। क्या यही उसका मूल स्थान था ? 

. क्या एजा २ में दी हुई सूची लेखक ने पुरालेखों (&70)79४८५) से ली, और 
फिर भी नहेमायाह के संस्मरण में दूसरी सूची को बने रहने दिया ? 


.. (३) मंदिर की नींव कब डाली गई ? क्‍या लौटने के पश्चात दूसरे वर्ष में 
जब कुख्र्‌ राजा था (एज्रा ३: ८५) अथवा दारा राजा के दूसरे वर्ष में (एज. 
२ और हाग्गे १: १) ? साधारणतया यह माना जाता है कि निर्वासन से 
लौटने के पश्चात ही कार्य आरंभ कर दिया गया था, परन्तु विरोध के कारण 
- काम बंद करना पड़ा और तब दारा राजा के काल में फिर से शुरू करना पड़ा । 


(४) तिथिक्रम की दृष्टि से एजा ४ : ७-२३ असंगत है । ४ : १-५ का _ 
संबंध कुत्र के (६० पृ० ५३९-५३० ) और दारा प्रथम (ई० पूृ० ५२ए-४८६) 
. के राज्यकाल से है; ४: ६ का संबंध अहासुरस (क्षयर्ष प्रथम ई० पू० ४प६- 
४८५) से है; और ४ : ७-२३ का संबंध अतंक्षत्र प्रथम लॉगीमनुस (ई०पू० 


_ ४६५-४२४) के राज्य काल से है। इसके बाद ४ : २४ में दारा प्रथम के. 
काल में पाठक ले जाया. जाता है तत्पश्चात अध्याय ५ में उस घटना का 


5 वणुन जो ई७ घू० प्र०७ में हु (एज्रा फू १, ) । १६ में 


_ यरूशलेम की शहरपनाह को बनाने का वर्णन है, परंतु यह अध्याय ४ में... 


. वणित मंदिर-निर्माण के ७० वर्ष पश्चात ही हुआ था । इस क्रमभंग के संबंध में. 


५, ०. हक स्पष्टीकरण यह दिया जाता है कि लेखक चौथे अध्याय के आरंभ में शत्रओं 
























बडी 5 पुराने नियम की भमिका 


.._ के विरोध का वर्णन करने लगा और विरोध के शेष अभिलेखन के वर्णन की 
... और बहके गया। दूसरा स्पष्टीकरण यह दिया जाता है कि संभाव्यत यरूशलेम 


... का आंशिक ध्वंस ई० पू० ४५५ में एदोमी एवं अन्य लोगों द्वारा किया गया 
- तब वह फिर से बनाया गया। 


(५) नहेमायाह ८-१० में एज्ा के व्यवस्था-वाचन और उसके फलस्वरूप 

.. पुनर्समर्पण का वर्णन है । यह अंश विवरण के क्रम को भंग करता है, क्योंकि 

इसके पहले का विवरण और बाद का विवरण दोनों यरूशलेम में लोगों 
बसाये जाने से संबंधित है। इसके अतिरिक्त इस अंश का ए जा में अभाव 

 खटकता हू। एज्रा की पुस्तक में जो एजा की कथा है उत्तकी यह अंश अच्छी 
पूर्ति करता है। यह प्रयास किया गया है कि नहेमायाहु ८-१० के कुछ भाग 
की एज्रा ७ के बाद और कछ को एज्जा १० के बाद रखा जाए अथवा एजरा 
८ के बाद; अथवा एज्रा १० के बाद रखा जाए । अन्य लोगों का विचार 
कि यह अंश अपनी जगह, नहेमायाह के संस्मरण के अंतगत ठीक है। 


(६) वह अरतैक्षत्र राजा कौनसा था जिसके राज्य के सातवें वर्ष में एज्रा 








अडशलेम आया (एजा. ७: ७) ? सामान्य मान्यता यह है कि वह अरतैक्षत् 


.. प्रथम लोंगीमनस था (ई० पूृ० ४६५-४२४) । अतः एजा ई० पृ० ४४८ में 
_ यरूशलेस आया । अन्य विद्वानों की मान्यता हु है कि वह अर्तक्षत्र हितीय 


४००४ समेमोत था (*-३- ४०४-२५८) । इस स्थिति में एजा लगभग ई०पू० ३६८ 
.... में आया होगा, अर्थात नहेमायाह के आने के बाद । नहेमायाह के आने की तिथि 
..... ई० पृ० ४४५४ है और बह बहत प्रामाणिक हैं । इस सामान्य मान्यता से कि 
._ एज्रा ई० पूृ० ४५८ में आया और नहेमायाह ई० पू० ४४४५ में यह सुविधा 
.. होती है कि यह मान्यता परंपरा से और एजा एवं नहेमायाह की पस्तकों के. 


थ 


..... वंमान क्रम से सुसंगत है। 


... इंतिहास लेखक की दृष्टि में तो एजा और नहेमायाह की पुस्तकें बहत 


। _ अपूण हैं क्योंकि घटना-क्रम के संबंध में कई समस्याएं हैं और कुछ काल ऐसे हैं... 
....._ जिनके सम्बंध में कोई अभिलेख नहीं है । परन्तु इन पुस्तकों में भी बाइबल की 





... अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों के समान लेखक की रुचि घटनाओं के तथिकक्रम में... 


का] इतनी नहीं जितनी परमेश्वर के लोगों के बीच उसकी इच्छा और अभिप्नाय के _ 






..._ उद्घाटन करने में है। लेखक का उद्देश्य यह वर्णन करना है कि देधांश 0 कल 
आ; पूव॑जों को जो देश प्रतिज्ञा में दिया गा. 5 











*९॥॥॥97 ) का पुनर्वास कैसे हुअ 

















एजा--नहेम्याह _ कक कद .. १५४४ 


गया था उसमें वाचागत सभ्यता का पुनसंगठन कैसे हुआ । इस उद्देश्य के संदर्भ 
में ही हमें इन पुस्तकों की धार्मिक शिक्षा मिलती है । 


. हमें यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा के प्रति सच्चा है और 
उसने इतिहास का प्रवाह ऐसा वनाया जिससे उसके लोगों का निर्वासन से 
लौटना सम्भव हो । फारस के राजा की आज्ञा से निर्वासितों के लौटने और 
मंदिर के पुननिमाण के लिये मार्ग खुल जाता है (एज १: ३) । कुछ लोग 
थे जो विश्वास में पक्के बने हुए थे और वे लौटने के लिये तैयार हो जाते 
हैं । एजा के लौटने के वर्णन में परमेश्वर का पूर्व प्रबन्ध विशेष रूप से दिखाई 
देता है। एज्ा परमेश्वर पर पूर्णतया भरोसा करता है और विनम्र भरोसे 
की भावना में कहता है, “हमारा परमेश्वर अपने सब खोजियों पर, भलाई 
के लिये क्षपादृष्टि रखता है” (एज्य., ८: २२) | नहेमायाह के वर्णन में 
भी हम देखते हैं कि उसकी मौन प्रार्थना राजा द्वारा इसलिये ग्रहण की गई 
कि 'मेरे परमेश्वर की क्रपादृष्टि मुझ पर थी (नहें. २: 5५) । 

इन पुस्तकों से यह शिक्षा मिलती है कि हम पहले परमेश्वर के राज्य 

और उसकी धामिकता की खोज करें (मत्त. ६: ३३) । पहला काम जो 

_निर्वासितों ने लौठकर किया वह था होमबलि के लिये वेदी बनाना (एज... 
३ : २), जिससे नियमित उपासना की स्थापना की जा सके । इसके पश्चात 

मंदिर बनाने का बड़ा और कठिन काम हाथ में लिया गया । नहेमायाह द्वारा 
शहरपनाह बनाने का काम भी उस यग में परमेश्वर की योजना के अनुसार 








था । यह उस समय में प्रमेश्वर के राज्य और उसकी धाभिकता की खोज . 


थी (नहे. १२:४०, ४२, ४५) । समाज की पनरंचना में भी परमेश्वर 
ही को केन्द्रीय स्थान था । 


इन पस्तकों में विश्वास की शद्धता पर जोर दिया गया है। परमेश्वर की 
व्यवस्था मानने में बड़ी तत्परता लोगों ने दिखाई । एंज्रा के व्यवस्था-पाठ के 
पश्चात्‌ ही झोंपड़ियों का पर्व मनाया गया, पाप का सामूहिक अंगीकार किया. 
_ गया, और वाचा पर छाप दी गई, (नहे- 5-१०) । उस समय अन्य जातियों 
की स्त्रियों से विवाह करता सच्चे ईश्वर विहीन वातावरण से मानों समझौता 


करना था, इसलिये एज्रा और नहेमायाह के सुधारों के अन्तर्गत इस प्रथा को. का 


. एक नैतिक समस्या माना गया (नहे. १३: २३-२७; एज्ा १० : रे द 





..  प्रेमया भक्त से सर्वोपरि है ः 

















चौबीसवां अध्याय 
पक, 5३ हलर 
१. शीर्षक और प्रामाणिक धर्मशास्त्न में स्थान आप 
.... इस पुस्तक का नाम उसके प्रधान चरित्र के नाम पर रखा गया है। प्रधान 


चरित्र एस्तेर ब्रानी, सप्तति अनुवाद, वल्गाता और समस्त आधनिक 
 अनवादों में यही नाम है । हिन्दी में भी यही नाम है । 


... इब्रानी बाइबल में एस्तेर की पुस्तक को पाँच पवे-खरों (मेगिल्लोत) में 
से एक माना जाता था। पूरीम के पर्व पर यह काम में लिया जाता था। 


..._ यह पर्व अदार महीने की पूर्णिमा (फरवरी-मार्च की पूणिमा) को होता था । 





यह पुस्तक दो रूपों में उपलब्ध है । एक इब्नानी का और दूसरा सेपत्वागिता 


.... का रूप। सेपत्वागिता का रूप कुछ लम्बा है। चतुर्थ शताब्दी ई० में जब येरोम ने 
.... लतीनी में धर्मेशास्त्र का अनुवाद किया (वुल्गाता), तो उसने इन दोनों रूपों में जो 






सामग्री एक सी थी उसे लिखा । तत्पश्चात उसने उस सामग्री को, जो 


.... सेपत्वांगिता या यूनानी अनुवाद में अतिरिक्त सामग्री थी, परिशिष्ट में रख 
...... दिया। उसने इब्रावी रूप की अतिरिक्त सामग्री को परिशिष्ट में नहीं रखा। 
हे ॥ ..... इस प्रकार हमारे समक्ष अध्याय १: १ से १० : ३ तक ४एस्तेर की पुस्तक 


। और १० : ४ से १६ : २४ तक शेष एस्तेर' है। शेष एस्तेर' तोबित- 


...._ मकाबी समूह की पुस्तक है, और इसे अन्य धर्मशास्त्रीय अथवा अपक्रिफा या 
..... ज्ञानवद्धक ग्रंथ में सम्मिलित किया जाता है। यह सम्मिलित करना इस पर 
..... आधारित है कि इस पुस्तक को प्रमाणित माना जाए या न माना जाए। 


जब यहूदी लोग विभिन्न लेखों को प्रामाणिक धर्मशास्त्र मानने के संबंध 


, है है मन विचार विमश कर रह थे तो एस्तेर की पुस्तक के सबद् जा 
...._थीं। इसका कारण यह था कि इस पुस्तक के इब्रानी रूप में धाभिक दृष्टि- 
...... बिन्दर का अभाव था। तो भी ई० स० ७० में जामनिया में फ्रांसीसियों की जो 







...... अकादमी हुई उसमें इसे प्रामाणिक धर्मशास्त्र माना गया । खिस्‍्तियों में एस्तेरे | 
की पुस्तक को सदा ही प्रामाणिक घर्मशास्त्र के अंतर्गत स्वीकार किया गया है। |... 5 
.. यहुदी धर्मशास्त्र को अंतिम रूप दिए जाने के पश्चात शेष एस्तेर का स्थान... 


- सदा ही शंकास्पद रहा 




















५35 बी जम ब्रज... 


२९, विषय-सामग्री का सारांश 


फारस के राजा क्षयर्ष के दरबार में एस्तेर पटरानी चनी जाती है।. 
क्षयर्ष के प्रधान पदाधिकारी हामान ने यहुदियों को नष्ट करने की योजना 
की । परन्तु परमेश्वर की योजना के अंतर्गत एस्तेर अपने लोगों के छुटकारे का _ 
साधन बनती है । प्रीम पर्व में इस महान छुटकारे को आनंद से मनाया गया। 


३. रूपरेखा 


एस्तेर--अपने लोगों के छुटकारे के निमित्त एस्तेर एक माध्यम बनी 
(नीचे दी हुई रूपरेखा में यूनानी अनुवाद सेपत्वागिता के क्रम का अनुसरण 
किया गया है, परन्तु उन्हीं भागों को ऋरमबद्ध संख्याएँ दी गई हैं जो इब्नानी 
बाइबल में हैं। बाइबल सोसायटी के प्रकाशनों में अध्यायों का जो क्रम है, 
चाहे वह बाइबल संबंधी हो या अपक्रिफा संबंधी, उसी क्रम का अनुसरण 
किया गया है । कोष्टकों [ ] के अंतर्गत जो अंश दिए गए हैं वे सेपत्वाणिता 
में ही मिलते हैं) द 

(१) यहूदियों के विनाश की जोखिम (१-४) 


.._ [मोदेक॑ स्वप्न में दो अजगर देखता है और यह भी देखता है कि परमेश्वर 
एक छोटे जल स्थत्रोत के द्वारा धामिक जाति का छुटकारा करता है। 
(११: २-१२) 


.. गबथा और थर्रा (विनाश और तेरेश) नामक दो खोजों के षडयंत्र का 
मोदेक ने भंडाफोड़ किया था (१२: १-६) | 


(क) राजा क्षयर्ष का अपनी पठरानी वशती को पद से उतारना (१) 
(ख) एस्तेर पटरानी के लिये चनी जाती है। मोदके उसे राजा के 


विरुद्ध षड़यंत्र की सूचना देता है और एस्तेर राजा को सूचित रे 


द करती हैं (२. १-२३)। 7 लक मा 
(ग) आसमान यहूदियों के सत्यानाश के लिए राजाज्ञा निकलवाता है 
(३: १-१५) 


[यहूदियों के विरुद्ध राजाज्ञा की नकल ( १३ : १-७ ) ३:१३ से क्‍ । ः ह द न 


आगे सम्मिलित की गई] 


० (घ) मोदेके एस्तेर से विनती करता है कि अपने लोगों को बचाए रे 


(४: १७): 


[मोर्दक परमेश्वर से सहायता के लिये प्रार्थना करता है (१५: १ 














-१३)-यह अंश ४: ८ के आगे 









' सम्मिलित किया गया ) । मोदंक रा 








2, शप न्‍ 


























स्रोत थी | 


7०945] 


| इस अंश में यह प्रस्तुत 





पुराना नियम की भूमिका 


की प्रार्थना (१३ : ४-८) और एस्तेर की प्राथना (१४ : १-१६ 


_. -४: १७ के आगे (सम्मिलित । | 
। यहूदियों का छुटकारा (५-१०) 
) राजा के क्रोध की जोखिम उठाकर एस्तेर राजा के सामने जाती 


है । राजा प्रसन्न होकर उसका स्वागत करता है (५: १-८) 
[राजा के सामने एस्तेर मृछित हो जाती है. (१५: ४-१६ )- 
-५ : २ से आगे सम्मिलित | 

(ख) मोद॑क की फांसी के लिये हामान फांसी का खंभा बनवाता 
है (५: ६-१४) 


के 


| मोदेक की फांसी के लिये हामान को राजा आज्ञा देता है 


(६: १-१४) 
हामान अपने ही बनवाए हुए फांसी-खम्भ पर लटकाया जाता है 
(७) । ः 


मोरदक का प्रधांन पदाधिकारी बनाया जाना। एस्तेर की बिनती 


पर यहुद्यों के विरुद्ध राजाज्ञा का निरस्त किया जाता (5) |. 
(राजा की नई आज्ञा (१६: १-२४)-5 : १२ के आगे... 
_ सम्मिलित | 


दी अपने शत्रुओं को नष्ट करते हैं ओर पूरीम का पर्व निर्धारित _ 


_ किया जाता है (६) । | 
_ फारसी राज्य में मोदंक का माहात्म्य । यहूदी उसे बहुत बड़ा 
 भानते थे (१०: १-३ ) । द आम 
[मोदक मानता है कि उसका स्वप्न पूरा हुआ | एस्तेर बह छोटा जल 


वह और हामान दो अजगर थे। इसत्राइल धार्मिक जाति थी । 


रा । .. परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिये अदार महीने की चौदहवीं और पंद्रहवीं को . 
-... पर्व सदा के लिए नियुक्त किया गया (१०: ४: १३); अनुवादक की टिप्पणी _ 


.... . [टिप्पणी : शेष एस्तेर में मोदंक का नाम मार्दोकियुस है।| 

४5 ८ ४, रचना, रचयिता, रचना तिथि पा ४ 

पे /“ शस्तेर को पुस्तक दो रूपों में मिलती है । इब्नानी बाइबल में एक रूप है द हा मा 

पा और सेपत्वागिता में दूसरा । आगामी अंश में दोनों के बीच संबंध की समीक्षा । 5 मम 
जाएगी स्तुत है कि पुस्तक का इब्रावी रूप सामान्‍्यता आय । तय 
























एक पूर्ण साहित्यिक रचना माना जाता है और उसका एक ही लेखक माना 

जाना चाहिये । यदि इस रूप में से किसी अंश के संबंध में शंका की जाती है तो 

वह € : २० से १० : ३ का अंश है। इस अंश के लिये यह कहा जाता है कि _ 

. प्रीम के संबंध में जो सामग्री इससे पहिले आई है उससे यह सुसंगत नहीं है । 
इसके विपरीत अन्य विद्वान यह मानते हैं कि यह अंश कथा की स्वाभाविक 
पूति है और उससे पर्व अभी तक मनाने के संबंध में स्पष्टीकरण मिल 
जाता है द 

सेपत्वागिता में जो उसका विस्तृत रूप मिलता है, वह भी अपनी ही दृष्टि 
से एक पूर्ण साहित्यिक रचना है। लेखक को किस प्रकार अतिरिक्त सामग्री प्राप्त 
हुई, यह वास्तव में मूल स्रोत और मूल लेखों की समस्या है। इस समस्या का. 
हल चाहे जो हो, यह निश्चित है कि सेपत्वागिता में जो रूप मिलता है उसमें 
विषय और रचना की अखंडता और पूर्णता दृष्टिगोचर होती है। उसमें 
एस्तेर की कथा को मोदेंक के स्वप्न की पूति स्वरूप वर्णित किया गया है 
और उस पूर्ति के स्मरणार्थ प्रीम का पर्व परमेश्वर के प्रति धन्यवाद व्यक्त 
करता है। 

इसका लेखक अज्ञात है । एस. ६: २० और € : ३० में मोद्दक ने पत्र 
|. ' लिखे और भेजे हैं । इसके आधार पर यह विचार व्यक्त किया जाता है कि इस. 

.  पस्तक के लिखने में मोदेके का हाथ था। वर्णन करने में प्रथम परुषवाचक 
 सर्वनाम का प्रयोग नहीं किया गया है । यदि मोदक इसे लिखता तो यह अपेक्षा: 
की जाती कि वह प्रथम प्रुषवाचक सर्वनाम का उपयोग करेगा । अधिक से अधिक. 

.. यही कहा जा सकता है कि मोरद्दके के संस्मरणों का उपयोग किया गया होगा। 

.. यह स्पष्ट है कि लेखक फ़ारसी रीति रिवाजों से भली भाँति परिचित था और 


.._ यह साधारणतया माना जाता है कि लेखक कोई यहूदी व्यक्ति था जो फ़ारसी _ 
.. वातावरण में रहा था। 


अंतर्साक्ष्य के आधार पर पुस्तक की तिथि निर्धारित की जाती है । बहि- । 


... सक्षय नहीं मिलता । कोई भी खिस्त-पूर्व लेखक इस पुस्तक का उल्लेख नहीं... 
. करता । नये नियम में इस पुस्तक से कहीं भी उद्धरण नहीं है। लेखक 
_ इस प्रकार लिखता है मानो वह जिन घटनाओं का वर्णन करता है 


.. उनके घटित हो जाने के बाद लिख रहा है (१:१; १० :२)। लिखने मा 


क्‍ | सेऐसा लगता है कि यहूदियों का बिखरना बहुत फ्ह्ले हो चका है ( ३८: ध 
. ६:२०) । साथ ही कि फारसी प्रथाएँ अभी तक सुपरिचित हैं। इन तथ्यों के 





.._ आधार पर फ़ारसी काल (ई. पू. ५३८-३३३) का समय इस पुस्तक का गे हा ५ 











0 ..... प्राना निय्रम की भूमिका 


.. तिथि-निर्धारण एक और आधार पर किया जाता है। इस पस्तक में 
 अयहूृदियों के विरुद्ध एक बड़ी तीत्र भावना व्यक्त है। उसके लिये ऐतिहासिक 


... बातावरण के युग की खोज के आधार पर तिथि-निर्धारण किया जा सकता 


है। अंतिओकस एपीफनेस और अनुक्रमिक मकाब युद्ध (ई, पू. १६७-१६४ ) 


... के हेलनी सताव में इस प्रकार का वातावरण मिलता है । अतः योहन हिर्कान 
. प्रथम (ई. पृ. १३४-१०४) के शासन काल के पश्चात्‌ अर्थात्‌ लगभग ई. पृ 








१२४ में इस पुस्तक का लेखन-काल माना जाता है । यह द्रष्टव्य है कि इस 
पुस्तक में जो विवरण है उसका मकाबी काल से साम्य नहीं जुड़ता । कारण 
यह है कि पुस्तक के विवरण में यहुदी यह आशा करते हैं कि शासनकर्त्ता की 
क्रपादृष्टि वे प्राप्त कर लेंगे, परंतु मकाबी काल में वे स्वतंत्रता तथा अपने 
निजी जीवन-पथ को अपनाने की आशा करते हैं । 
फारसी के उद्धुत शब्दों के प्रयोग तथा फारसी प्रथाओं संबंधी लेखक की 
जानकारी से यह व्यंजित होता है कि मकाबी काल में नहीं, वरन्‌ फारसी अथवा 
प्रारम्भिक हेलनी काल में यह पुस्तक लिखी गई । खिस्त-पूर्व लेखकों में इस 
पुस्तक के उल्लेख का अभाव,विशेषकर बेन सीरख के प्रज्ञाग्रंथ (ल. ई. पू. १८०) 
में अभाव (त्रज्ञाग्रंथ में विश्वासी वीरों के क्रियाकलापों का वर्णन है, परंतु 
उसमें एस्तेर का उल्लेख नहीं है) का स्पष्टीकरण इस बात से किया जा सकता 
कि इस पुस्तक का उद्गम पूर्वी बिखराव (१७80८ए.०४) में है। इस आधार 


आओ] . पर फारसी काल (ल, ई. पू, ३५०) के उत्तरार्द्ध अथवा हेलनी काल (ल, ई. 
... पू, ३००) के पूर्वाद्धि में इस पुस्तक की रचना तिथि मानती जाती है।.. 


.. प्र, समीक्षात्मक समस्याएं 














(१) एस्तेर की कथा के इब्रानी रूप और सेपत्वागिता में क्या संबंध 
इस प्रश्न के उत्तर निम्न तकनसार प्रस्तुत किए गए हैं 


(क) कथा का इब्नानी रूप मूलरूप है, अतः सेपत्वागिता रूप में 





जो अतिरिक्त सामग्री है वह बाद में जोड़ी हुई है।इस 


.. मान्यता की पृष्टि में यह कहा जाता है कि कथा के 


223 सेपत्वागिता रूप में कुछ पुनरावृत्ति है : जैसे २: ५-६ और हे ला 
११:२-४ में मोदंके की वंशावली; २:२१-२३ और... 


... १२: १-३ में राजा के विरुद्ध षड़यंत्र; ३: १२-१३, 
.. १३ : १-७, और ८५: १-१२; और १६ : १-२४ में दोनों 





... ...  राजाज्ञाओं के अंश जो सारांश में और तब पूर्णरूप में दिए रा. 


मा . गए हैं । इस मान्यता के अनुसार सेपत्वागिता रूप में सामग्री... 















7 पक का आज आह + ० 


जोड़ने का कारण यह है कि अतिरिक्त सामग्री से धामिक 
तत्व पर बल दिया जाता है जिसका अभाव इल्नानी रूप में 
दिखाई देता है। इब्नानी में जो रूप है उससे तो यह पुस्तक 
लौकिक पस्तक जैसी लगती है, क्योंकि परमेश्वर का नाम 
उसमें एक बार भी नहीं आया है और उसकी भावना धार्मिक 
ने की अपेक्षा राष्ट्रीय अधिक है । इसके विपरीत 
झेपत्वाशिता में परमेश्वर से प्राथनाएँ सम्मिलित हैं । साथ 
गे उसमें घटनाओं को ऐसा प्रस्तुत किया गया है कि उनमें 
मोदक को परमेश्वर द्वारा दिए गए दर्शन की पूर्ति होती है । 
जो विद्वान यह विचार करते हैं कि कथा का इब्नानी रूप 
मकाबी काल की राष्ट्रीय भावना का प्रतिबिंब है, उनकी 
मान्यता यह है कि इसकी अतिरिक्त सामग्री किसी धर्मात्मा 
यहूदी ने जोड़ी है, और कि वह पलिश्तीन से बाहर रहता 
था। कदाचित वह मि्र में रहता हो, जहाँ यूनानी अनुवाद 
(सेपत्वागिता ) किया गया था । 


.. (ख) सेपत्वागिता रूप ही कथा का मलरूप है । 


दा 


5 इस मोन्यता की पट गे 707 0 की टिप्पणी है, जिससे 
. ऐसा प्रतीत होता है कि मूल अंश इब्रावी में रहा हींगा। मोर्दक के स्वप्न के 
अर्थ के बाद ही यह टिप्पणी आती है । अतः उसमें “पूरीम (फ््राई) के पत्र 
. के उल्लेख में यह निहित है कि पुस्तक में मोर्दके का स्वप्न सम्मिलित था-- 
. अर्थात्‌ पुस्तक का मूल रूप वहीं था जा सेपत्वागिता में है। कथा का 
 सैपत्वागिता रूप मूल रूप है--इस मान्यता के आधार पर यह विचार किया. 


. जाता है कि इब्रानी रूप कथा का संक्षिप्त रूप है, और कि यह संक्षिप्त तर ह 


इसलिये किया गया कि परमेश्वर के नाम को तिरादर और अपमान से बचाया 2 
जाय । यहूदी लोग पूरीम का पर्व अपने राष्ट्रीय दिवस के रूप में बड़े लौकिक _ 
_ रूप में मनाते थे । कथा में से परमेश्वर का नाम और प्रार्थनाओं को. हटा देने 








.. के द्वारा पर्व समारोह के प्रचलित रूप को छूट मिल गई । लोग पाप और ईश- 7 7०75. 


. निंदा की जोखिम से मुक्त होकर पवे को मना सकते ये । 


सेपत्वागिता में जो पनरावत्तियां हैं उनका स्पष्टीकरण इस अनुमान केद्वारा 


किया जाता है कि कथा के दोनों रूपों के बीच संगति और सामंजस्य करने... 


.. का प्रयास किया गया है। सेपत्वागिता की मौलिकता के पक्ष में इब्नानी में 

















। राजसभा में वशती पटरानी के पद से उतारी जार्त 





7 का शा पुराना नियम की भूमिका 
अंतिम अध्याय (१०) की असंगत संक्षिप्तता को भी तक्कंस्वरूप प्रस्तुत किया. 


१६४४७ में मृत्यमागर खरों (0680 86०8 5८708) की खोज के पश्चात 
पत्वागिता के पक्ष में इस मान्यता को अधिकाधिक बल मिल रहा है कि 
 प्ेपत्वागिता का इब्रानी मूल पाठ उतना ही पुराना है जितना बह पाठ जो मानक 
माना गया और जिसे मसोरेती पाठ कहा जाता है। इस मान्यता से एस्लेर 
की पृस्तक की व्याख्या पर अवश्य प्रभाव पड़ता है । द 


(२) एस्तेर की पुस्तक में जो पात्र आए हैं उनकी ऐतिहासिक पहचान 
इस पस्तक में निम्नलिखित पात्र हैं : एस्तेर, मोदंक, हामान, क्षयर्ष और 
बशती । क्षयर्ष को साधारणतया क्षयर्स प्रथम (>८%८४) (ई० पू० ४८६ 
४६५) माना जाता है। अहासुरस (/४१४5प८"ए४) इस नांम का इव्ानी रूप 
है। सेपत्वागिता में अल्क्षत्र है, फारसी में क्षयर्ष है। परन्तु यूनानी रूप क्षयर्ष 


४] 


१7 «,च्कि 


 [फटऋटड) अधिक प्रचलित है। कुछ विद्वान अहासुरस को अंक्षत्र ट्वितीय 


. (६० पू० ४०४-३५८) और वशती को उसकी रानी स्ततीरा ($छालाछ) 
मानते हैं । इतिहास लेखक हेरोदोतस के अनुसार क्षयर्ष प्रथम ने अपने शासन... 
के तीसरे वर्ष (ई० पू० ४८३) में सूसा (शूशन) में अपने सरदारों को एकत्र 
.. किया कि वे युनान से युद्ध करें । अपने शासन के छठवें वर्ष (ई० पृ० ४८०) में 
... उसने यूतान पर आक्रमण किया परन्तु असफल हुआ । यह विचार किया जाता 
.. है कि सरदारों को एकत्रित करता बाइवल की कथा से संगत प्रतीत होता है 
जहां एस्तेर १: ३ में हाकिमों और कर्मचारियों, फारस और मादे के सेनापति 
गैर प्रांत प्रांत के प्रधान और हाकिम का एकत्रित होना वर्णित है और जिस 


... विच्वार किया जाता है कि राजसभा की घटना और क्षयर्ष के अपने असफल 


.... आक्रमण से लौटने के बीच का जो समय है वह वशती 
....  एस्तेर का पटरानी चुने जाने के बीच का समय है। 


कक 


के उतारे जाने तथा 


हेरोदोतस बताता है कि राजा क्षयर्ष प्रथम की रानी का नाम अमेसत्रिस 


.... था। वह फारस के सेनापति की पत्नी थी। हेरोदोतस न वशती का और न एस्तेर . 
.... का उल्लेख करता है। एस्तेर और अमेसत्रिस को एक मानना कठिन है । हमें 








रा. यह अनुमान करना पड़ता है कि वशती और :एस्तेर हरम में रानियाँ थीं। । 





साथ ही यह भी 


बल के अतिरिक्त और कहीं उनका उल्लेख नहीं मिलता | ०, का 











हैः भर 


एस्तेर. १६३ 


सं० १९४० में बोरसिप्पा में कील-लिपि का पाठ मिला है । उस पर कोई 
तिथि अंकित नहीं है | उसमें क्षयर्ष प्रथम के राज्यकाल में सूसा के दरबार के 
एक उच्च पदाधिकारी मोर्दकी (मर्दूका) का उल्लेख हुआ है। एस्तेर ११: ३ 
(सेपत्वागिता ) के अनरूप इस मौदंक को क्षयर्ष के तीसरे वर्ष के पूर्व और 
कदाचित पूर्ववर्ती राजा दारा प्रथम (ई० पृ० ५२२-४८६) के राज्यकाल में 
उच्च पद प्राप्त था । बोरसिप्पा का यह पाठ मोर्दक संबंधी बाइबली कथा के 
अनुरूप एक मात्र उल्लेख हें। 

बाइबिल से बाहर के मुलख्रोतों में बाइबली कहानी के हामान का कोई 


. 


यह पर्व मूसा की व्यवस्था में नहीं पाया जाता । एस्तेर की पुस्तक में 
बताया गया है कि उसका आरंभ फारसी काल में हआ और कि बह एक महा 
छटकारे की स्मृति में आरंभ हुआ । संभव है कि पूरीम पहले कोई अयहुदी 
त्यौहार हो । पूरीम शब्द का उद्गम बाबुल देश से है । चिट्‌टी डालने या पासा 
के अर्थ में उसका प्रयोग होता था (पुरुअम और बाद में पुरु शब्द) । सूसा की 
खुदाई में चौकोर गोटियां मिली हैं जिन पर अंक भी खुदे हैं, मानो वे पासा 
फेंकने के काम में आती थीं । इन तथ्यों से एस्तेर ३: ७ “एक दिन और एक 
ग्ैने के लिये “पुर अर्थात्‌ चिठठी अपने सामने डलवाई पर प्रकाश पड़ता 
 है। क्‍या यह एक धर्माचार था ? यह प्रयास किया गया है कि इसे बाबुल में 
मनाए जाने वाले नूतन वर्षोत्सत अथवा फारस में मनाए जाने वाले भाद्ध 
दिवस के रूप में समझा जाए । मूल रूप इस पर्व का चाहे जो रहा हो, यह 
निश्चित है कि यहूदियों के लिये यह छुटकारे का स्मृति-पर्व बन गया । यह भी 





. स्पष्ट है कि यहूदियों द्वारा इसे मनाने में जो समारोह और लौकिकता के तत्व... 


इसमें थे उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस पवे का पूर्व वातावरण 

अयहदी था। द ३५ थक न 
(४) क्या एस्तेर की कथा ऐतिहासिक है। क्‍ बे 

.. परंपरागत मत यह है कि यह कथा ऐतिहासिक है। आधुनिक आलोचक 

इसमें शंका करते हैं । शंका का एक कारण यह है कि इसमें अतिशयोक्ति है । 


... उदाहरणार्थ, ७५ या ८५ फूट ऊँचा फांसी खंभ (५:१४), छः महीने तक उत्सव... 
.. [१:४), कन्याओं के लिए एक वर्ष तक सौंदय-उपचार (२:१२), दसहजार 
. किक्कार चांदी का दान (३:६९) । अन्य कारण ये हैं कि फारसी इतिहास में एस्तेर 











गैर बशती जैसे पात्नों का कहीं उल्लेख नहीं है, कि यहुदियों के व्यापक सताब हे हा 


.... के लिये कोई ऐतिहासिक संकेत नहीं हैं और कि यूनान के विरुद्ध क्षयर्प राजा... 
















१६४...€$#प्राना नियम की भूमिका 


.. के आक्रमण का कोई ऐतिहासिक उल्लेख नहीं है । कुछ विद्धान एस्तेर की कथा 
.. को एक पौराणिक कथा मानते हैं जिसमें बाबुली देवता (मादुंक और इश्तार- 
. मोर्दक और एस्तेर) का एलामी देवता हुम्मन-हामान और एक देवी-बशती ) 
.. क्े साथ संघर्ष हआ है। इस संबंध में फाइफर (?िल्िं्ि००) की मान्यता अत्यंत 
उग्र है । उसकी मान्यता है कि इस पुस्तक का लेखक मकाबी काल का एक उम्र 
देशभक्त था और उसने इस पर्व की कल्पता की और उसकी पुष्टि के लिए 
एस्तैर की कथा गढ़ी । इस चमत्कारिक 'कल्पना' की सफलता इसलिए हुईं कि 
क्‍ उन हिर्कान प्रथम (ई०पू० १३४-१०४) के शासन काल में यह॒दियों में 
हृदियों के विरुद्ध बड़ी तीत्र भावता विद्यमान थी। 
कथा की ऐतिहासिकता के पक्ष में निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत हैं: लेखक _ 
सूसा के भवन और फारसी राजप्रथाओं के संबंध में गहरी जानकारी रखता है। 
ईस्वी पूर्व दूसरी सदी में पूरीम पर्व का अस्तित्व था। (२ मक० १४:३७ ) और 
ऐसा प्रतीत होता है कि वह इससे पहले से प्रचलित था, बोरसिप्पा का कीलाक्षर _ 
लेख क्षयर्ष प्रथम के राज्य में किसी प्रधान पदाधिकारी मोदंक का उल्लेख करता 








। सूसा में की गई खुदाई से चिट्टियां डालने का प्रमाण (अर्थात पूर) का... 
: जमा मिलता ( ३२:७ ) । यह साना जा सकता कि लेखक ने अपनी विवरण गा ज 


-केला के कारण अथवा उसे प्राप्त घटनाओं के सुन्दर संचारण के लिए भले ही 
कथा में कुछ साज सज्जा और अतिशयोक्ति का प्रयोग किया है, परन्तु उपरोक्त 
तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वे एस्तेर की कथा की ऐतिहा- 


क्‍ _. सकता को मान्य करते के लिए पर्याप्त हैं । 
... ६. धर्म शिक्षा 


यह मानते हुए कि एस्तेर की पुस्तक के सेपत्वागिता रूप के लिए प्रामाणिक 


... आधार है और कि बाइबली संदर्भ में पुस्तक के इब्नानी रूप को उसी प्रकाश... 
.. में देखा जा सकता है, हम इस कथा में ईश्वरीय योजना का एक अदुभूत 
..... उदाहरण पाते हैं। पुस्तक से यह शिक्षा मिलती है कि संक्रातिकाल में परमेश्वर 
... ने अपने लोगों की रक्षा की । जब उसके ऊपर भारी विपत्ति के बादल थे, . 
.... तब परमेश्वर ने उनकी सुध लेने के लिये एस्तेर को उठाया । परमेश्वर की 
..... .. यह पद्धति है कि वह अपनी योजना की पूर्ति के लिये मनुष्यों का उपयोग 
.... करता है, और परमेश्वर इस कथा में इस पद्धति को काम में लिया गया है। 










हा . दा .. एस्तेर ने परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने की चेष्टा की और परमेश्वर ने रा 
.. उसे मार्ग दिखाया। बिना बुलाए राजा के मी 








दंड मृत्य था | एस्तेर बिना 








एस्तेर | 88 2 कद हित, 


सच्चाई की जानकारी देने में उसकी सतर्क योजना सफल हुंई इसी प्रकार 
मोर्दक को यह अवसर मिला कि अपनी राजभक्ति का प्रमाण राज़ा के सामने 
प्रस्तुत करे और न्याय के पक्ष में राजा का हपा-पात्र हो । जिसको दंड मिलना 
चाहिये था उसे मिला और परमेश्वर के लोग अपने जीवन-मार्ग का अनुसरण 
करने तथा परमेश्वर की भक्ति करने पाए। सेपत्वागिता १० : ४ में लिखा है 
कि “ये बातें परमेश्वर की ओर से हैं" । सेपत्वागिता १० : १९ में लिखा 
क कि “परमेश्वर ने अपनी प्रजा को स्मरण किया और उनका न्याय 


है. 


ै 
चुकाया  । 

एस्तेर के चरित्र में हम परमेश्वर-भक्ति, अपने लोगों के प्रति प्रेम, आत्म- 
त्याग और बुद्धि के साथ कृपा-भाव के गुण देखते हैं । उसने अपनी सुन्दरता 
और बुद्धि परमेश्वर को उसके अभिप्राय के निमित्त समर्पित की । उस अकि- 
प्राय की पूर्ति के लिये, अर्थात्‌ अपने लोगों को बचाने के लिये वह, आवश्यकता 
पड़ने पर, मरने को भी तैयार थी । इसी प्रकार मोदंक भी अपने विश्वास में 
पक्का है और अपने लोगों की चिता करता है। उसकी सच्चाई और योग्यता के 
कारण उसके शत्रु उससे जलते हैं, परंतु जब सच बात श्रकट होती है तो इन्हीं 
_शुणों को मान्यता मिलती है। सेपत्वागिता की कथा में मोदंके तथा एस्तेर की 
प्राथनाओं में सच्ची भक्ति प्रकट होती है । मनुष्य की बड़ाई की अपेक्षा परमेश्वर 
की बड़ाई को मोर्दक ऊँचा स्थान देता है (१३ : १४), और प्रभु परमेश्वर में 
आनन्द के सामने एस्तेर को राजभवन का वेभव वुच्छ प्रतीत होता हैं 
(१४ : १८ ) 


र 

















पच्चीसवां अध्याय... 
काव्य और नीति ग्रंथ 


: पुराने नियम की काव्य एवं नीति पुस्तकों को एक समूह में रखा गया है । 
इसका कारण यह है कि इनमें से कुछ पुस्तकों को हम काव्य और नीति दोनों 

सकते हैं, और कुछ को काव्य अथवा नीति के अन्तगंत ही स्थान दे सकते 
हैं। यदि किसी पुस्तक के सम्बन्ध में कहा जाए कि वह काव्य है, तो हमारे कथन 
से विषय सामग्री का नहीं वरन साहित्यिक रूप का बोध होता है । यदि यह 
कहा जाए कि अमुक पुस्तक नीति-पुस्तक है तो उससे विषय सामग्री का बोध 
होता है । नीति पुस्तकों को शिक्षात्मक या 'सीख' पुस्तकें भी कहते हैं। कभी 
तो 'शिक्षात्मक पुस्तकें शीर्षक का प्रयोग समस्त काव्य एवं नीति पुस्तकों के 


लिये किया जाता है, और कभी-कभी उनके लिये “काव्यात्मक पुस्तकें” शीर्षक... 


का प्रयोग किया जाता 


.. एतिहासिक तथा नबियों की पुस्तकों में भी काव्यात्मक अंश हैं। परन्तु 
जब हम “काव्य पस्तकें” शीर्षक का प्रयोग करते हैं तो उनसे उन प्रस्तकों का 
बोध होता है जो प्रायः पद्यबद्ध रूप में लिखी गई हैं । इनमें सीमित धमेशास्त्र 


.... के अन्तर्गत अय्यूब, भजन, नीति वचन, श्रेष्ठीीत और सभोपदेशक सम्मिलित 
... विस्तृत हेलनी धर्मशास्त्र में इनके अतिरिक्त सीरख और सुलैमान का प्रज्ञाग्रंथ 
प्री है। विलापगीत भी पद्म में लिखा गया है, पर न्तु परम्परा से वह यिर्मयाह 

.. की पुस्तक से संलग्न है इसलिये उसे नवियों की पुस्तकों में सम्मिलित किया. 


गया है । इब्रानी, अंग्रेजी और हिन्दी बाइबलों में सभोपदेशक की पुस्तक पद्म 


.. की अपेक्षा गद्य में अधिक दृष्टिगोचर होती है, परन्तु सेपत्वागिता एवं वुल्गाता 


. में आदि से अन्त तक उसका विन्यास पद्च में है। अतः उसे काव्य पुस्तकों में 


.. . स्थान दिया गया है 





...... नीतिग्रंथों में नीतिवचन, अय्यूब और सभोपदेशक की पुस्तकों को सीमित... 
.. धमशास्त्र के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। विस्तत धर्मशास्त्र के अन्तर्गत _ 


7 नीति ग्रंथों में उपरोक्त तीन पुस्तकों के अतिरिक्त सीरख और सुलैमान का _ ः 5 











है 


काव्य और नीति ग्रंथ... १६७ 


. काव्य के रूप की दृष्टि से इन पुस्तकों का वर्णन निम्नानुसार किया जा 
सकता है | अय्यूब की पुस्तक एक शिक्षात्मक काव्य है जो नाटकीय सम्बाद में 
लिखित है; भजन संहिता भक्त प्रवण गीतिकाव्य है; सभोपदेशक काव्य की 

ष्टिसे चिन्तनात्मक गीतिकाब्य है; श्रेष्ठगीत सम्बादात्मक कविता हैं; 


सीरख शिक्षात्मक गीतिकाव्य है सलमान का प्रज्ञाग्रंथ, चिन्‍्तनात्मक गीतिंकाद 
है; और विलापगीत शोकगीति या बिलाप गीतों का संकलन है । 


इब्बॉनी कविता 


इब्रानी कविता की प्रमुख विशधता समांतरता (थाथवीटंडा0) है, अर्थात 
एक विचार का समान विचार के साथ सब्तुलन | कोई भी विचार वाक्य के 
द्वारा व्यक्त होता है। अतः इब्नानी कविता के रूप का आधार वाक्य है और 


बहुधा एक पंवित में व्यक्त होता है। उसे हम एक चरण कहते हैं। दूसरी 


मे ू 
पंक्ति में एक और विचार की अभिव्यक्ति होती है। दोनों मिलकर दो पंक्तियाँ, 
दो चरण बन जाते हैं। हिन्दी में जैसे दोहा होता है कुछ उसी रूप की कविता 
.. इब्रानी कविता होती है। कभी-कभी दो के बदले तीन या अधिक पंक्तियां भी 
. होती हैं | साधारण दो चरणों की इब्ानी कविता में पहले चरण के साथ दूस 

चरण के सम्बन्ध में समांतरता रहती है । यदि दूसरे चरण में प्रथम चरण 
के भाव की कुछ ही भिन्‍न रूप में ध्वनि होती है, तो समांतरता को समभावी 
_ (9ज़ाणाज्ा055) समांतरता कहते है। यदि दूसरे चरण में पहले चरण के 
भाव से विरोध है तो समांतरता को विभावी (व्ा॑/८ा८) कहते हैं। यदि 
दूसरे चरण में पहले चरण के भाव का विकास और पूति हो तो समांतरता 
को समन्वित (४७7४टांट) समान्‍्तरता कहते हैं। उदाहरण देखिए 


समभावी समांतरता 


। 9 2.8 2 (०, ४. 
बह जो स्वर्ग में विराजमान है, हंसेगा; 


प्रभ उनको ठठठों में उड़ाएगा । भ. २: 
विभावी समांतरता: | 


| 
परमेश्वर की महिमा गृप्त रहने में है; 


चक 











परन्तु राजाओं की महिमा गुप्त बात के पता लगाने से होती है । रा ा 








१६८... पुराना नियम की भूमिका 
समन्वित समांतरता : 
हक कक 5 | 

में लेटकर सो गया; 


फिर जाग उठा, क्योंकि यहोवा मझे संभालता है । 


कुछ विद्वान समन्वित समांतरता के तीन भेद करते कुन्तलाकार 
द (न्य, पर ०) ( 8]077'8/ ) प्रगतिशील (भ. १:८३ ) ([077087८8»0८), और 
 चरमसीमांतक (भ. १२१ : ३, ४) [०।7३8००८) । 


समांतरता की विशेषता यह है कि जिन शब्दों के अर्थ स्पष्ट या सुपरिचित 
नहीं है उनको समभने में सहायता मिले। उदाहरणार्थ, भ. ३३ : ६ में उसके 
मुह की श्वास' शब्दों को यहोवा के वचन' शब्दों के पर्याय समझना चाहिए । 
ये दोनों शब्द समृह समान्‍्तर हैं। द 
इब्रानी कविता में लय है । अर्थात्‌ नियमित क्रम से पंक्तियों में सबल और 
अबल पदांश (59)90]८) हैं। सामान्यतया एक चरण में तीन या चार बलाघात 


(57८४४) होते हैं। परन्तु यह कोई कठोर नियम नहीं है। बल-स्थान इब्रानी.... 
शब्दों के साधारण स्वराघात (४०८८०४) के अनुरूप होते हैं। वे अंग्रेजी और 


जन कविता के अनुरूप होते हैं। युनानी, लतीनी, संस्कृत या भारतीय भाषाओं 
की कविता के अनुरूप नहीं । भारतीय भाषाओं में पदांश के आधार पर नहीं 
. वरन्‌ मात्रा या गण के आधार पर कविता के चरणों में लम्बाई गिनी जाती है। 


इब्रानी कविता प्रायः अतुकांत होती है । तुक का अर्थ है-चरणों के अन्त 


.. में ध्वनि साम्य । इब्रानी कविता अतुकांत पद्य होती है । इसलिये अन्य भाषाओं 
... में उसका अनुवाद प्रभावोत्यादकता के साथ किया जा सकता है। वह तुक की 
... विशेषता पर निर्भर नहीं रहती इसलिए अनवाद करने में भाव-प्रवणता की उतनी 








.. कमी नहीं होती जितनी तुकांत कविता के अनुवाद में | समांतरता और स्वराघात 
. की विशेषताओं की दृष्टि से उत्तरी कनानी भाषा (उगरिती) की कविता इब्रानी _ 
.. कविता के बहुत समान है और कुछ अंश में बाबुली कविता भी इब्रानी कविता 
... के समान है. । द कक ह 
..__ इब्रानी कविता की लय को ४-४, ३-३, ४-३ या ३-२ अंकों के द्वारा. 


"- . इंगित किया जाता है। ये अंक दोनों चरणों में बलाघात की संख्या का संकेत क्‍ मा ा। 
... करते हैं। समांतरता के जो उदाहरण ऊपर दिए गये हैं उनमें बलाघात दर्शाने ..... 





.. का प्रयत्न किया गया है । भजन २:४ में ३-२ को लय है, नीतिवचन रध:र जल 







.. में ४-४ की, और भजन ३:५४ 





“३की लय है। यहव्र॒ष्टव्य है कि आघात- 








काव्य और नीति ग्रंथ... १६६ 


विहीन अक्षरों की संख्या से लय का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह पर्याप्त है कि 
स्व॒राघातों का क्रमिक विधान हो । 


शोकगीति के लिए सामान्यतया ३-२ की लय काम में ली जाती हैं । परंतु 

-२ का हिपद केवल शोकगीति के लिए ही काम में नहीं आता | विलाप या 

शोक के लिये इब्नानी में किनाह ( (४४8४ ) शब्द है। इसलिए ३-२ की लय 

को किनाह लय कहते हैं | विलाप गीत पुस्तक में विशेषता: इसी का उपयोग 
किया गया है, उदाहरणार्थ ः 


कं 


हा ढँ 
“रात को वह फूट-फूट कर रोती है, 


उसके आँसू गालों पर ढलकते हैं। ( वि० १: २)। 


| 


.. कभी कभी इब्रानी कविता में कई बड़ी बड़ी इकाइयां या छन्‍्द (87००७॥०). 
. होते हैं जिन्हें टेक के द्वारा इंगित किया जाता है, जैसे भजन ४२:५, ११ और 
.. ४३: ५, भ० ४६: ७ और ११॥। कुछ कविताएं इब्नानी वर्णमाला के बाइस अक्षरों 
... के आधार पर नियोजित होती हैं (म० ३४, ११९६, नी० ३१: १०-३१, वि० 
१) । इसी कारण उनको वर्णमालात्मक या सूत्रात्मक (+००४४८) * कविता 
कहते हैं । कुछ विद्वानों को पदों के अन्तर्गत पाई जाने वाली समांतरता छन्दों में 
भी मिलती है । इस प्रकार समभावी छंदात्मक समांतरता (भ० २२: २-२२, 
२३-३२), विभावी छंदात्मक समांतरता (यश० १४: ४ 3०-5८, ६--११) 
और समन्वित छंदात्मक समांतरता (भ० १०४) होती है । 


इब्नानी कविता रूपक एवं भावात्मकता में समद्ध है। यह नबूबत के वचनों 
_ तथा आनन्दमय स्तृति की तीब्रता के अनुरूप है। सौभाग्य की बात है, यायों 
. कहें कि परमेश्वर के अभिप्राय की विशेषता है, कि इब्रानी कविता को प्रमुख 

विशेषता 'समांतरता' है, जो अन्य भाषाओं में अनवाद में वष्ट नहीं होती । इसी 


.. कारण यह संभव हो सका है कि भजन संहिता जैसी भक्ति-कविता उन सभी 





.. देशों में, जहां बाइवल का प्रसार हुआ है, अत्यन्त लोक-प्रिय हुई और लोगों के 
-. अंतरतम भावों की निधि बन गई है । 











. १. सृत्रात्मक कविता उसे कहते हैं जिसमें चरणों के प्रथम शब्दों में कोई सार्थक 4 


.. योजना रहती है । सार्थक योजना चाहे शब्द की हो, अथवा पद्मांश की 
.... अथवा वर्णमाला के अक्षरों की । यदि वर्णमाला के अक्षरों की हो तो उस _ 
... कविता को वर्णमालात्मक कविता कहते हैं। 











. १७० ........ पुराता नियम की भूमिका. 


.. इब्रानी नीति साहित्य 
... बूब्नानी नीति साहित्य की यह विशेषता है कि उसमें जीवन को विवेकशील 


.... या बौद्धिक दृष्टिकोण से देखा जाता है । धर्म के दावों को धर्म के मूल्यों के मान 







से व्यंजित किया जाता है । विशेषकर धर्म के व्यावहारिक मल्य को व्यंजित किया 
जाता है, और मानव कत्तंव्य को इस रूप में व्यक्त किया जाता है मानो वह उसके 
.. अधिकतम कल्याण का तथ्य है । जीवन की समस्याओं के विवेकपूर्ण भावन को 
मानव के सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के योग्य माना जाता है । - द 
 नीतिवचन का प्रारंभिक रूप कहावत या लोकोक्ति है। लोकोक्ति में सत्य 
का बहुत छोटा तीक्षण कथन होता है। वह अनेक स्थितियों में बड़ा उपयक्त 
होता है और याद भी जल्दी हो जाता है। लोकोक्तियों के रचियता का बहुधा 
पता नहीं होता | कारण यह है कि वह सब की जबान पर रहती है और किसी _ 
भी समाज की सामान्य समझ की बात होती है। इस प्रकार वह लोकबुद्धि 
सर्वसाधारण रूप है । लोकोक्तियों में लोकबुद्धि या लोकनीति के कुछ उदाहरण 
देखिए : जैसी मां, वेसी पुत्री' (यहे. १६:४४); दुष्टता दुष्टों से होती है... 
(१ श. २४ : १३); निम्नोद के समान बहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकारी 
(उ, १० + 8) ] पे | 
. लोक बुद्धि की कहावतों के अतिरिक्त विवेकी मनुष्यों की रचनाएं हैं जो 
कहावतों या लोकोक्तियों में की गई हैं। गिमेयाह के समय में इस्राएलियों के 


.._ बीच ज्ञानी मनुष्य थे (थि. १८ : १८) । अय्यूब की पुस्तक में उनके विषय का 


. उल्लेख हुआ है (अय, १५: १८) । एदोम ज्ञानी मनष्यों के लिये प्रसिद्ध था 


2 (ओ १: ) साएल के ज्ञानी मनष्य अन्य जातियों और देशों के ज्ञानियों 


से इस बात में भिन्न थ कि वे ईश्वरीय प्रकाशन को मानवी अनुभवों में नि 


.... अर्थों की खोज का आधार मानते थ्े-'परमेश्वर का भय मानना बुद्धि का मूल 


(नी, १: ७) । इस्राएलियों में दाऊद को स्वोत्नकाव्य का पिता माना _ 


.... जाता है। उसी प्रकार सुलैमान को नीति साहित्य या प्रज्ञा साहित्य कापिता 
.. माना जाता है। है 


परवर्ती इब्रानी प्रज्ञा साहित्य की एक विशेषता यह है कि उसमें बुद्धि का... 


.._ सृष्टि की रचना तथा प्रकाशन में परमेश्वर की कार्यशक्ति के रूप में मानवीकरण 
... किया गया है (नी, 5: २२-११; ६€ : १) | इससे वचन के सिद्धांत के लिये 


. मार्ग तैयार हुआ, जो यूहन्ना १:१,२ में है आदि में वचन था और वचन 





.... परमेश्वर के साथ था,-यही आदि में परमेश्वर के साथ था । अंत में इसी के ५ 0 जक गा 
































काव्य और नीति ग्रंथ... कक 


. बाबुली और मिस्री लोगों में, विशेषकर मिद्ियों में प्रज्ञा साहित्य मिलता 
है। कुछ विद्वानों का तो यह विचार है कि नीतिवचन के एक अंश (२२ : १७- 
२४ : २२) का आमेन-एम-ओपेत (ई. पृ. १०००-६०० ) के निर्देशों के साथ 
साहित्यिक साम्य है। एदोमियों का भी प्रज्ञा साहित्य अवश्य होगा परंतु दुर्भाग्य 


ह क्‍ 
है कि वह हमारे युग तक बच नहीं पाया । 


[ढ। 




















छब्बीसवां अध्याय 
अथ्यूब की पुस्तक 


१. शीर्षक और प्रासाणिक धर्सशास्त्र में स्थान 
। इस पुस्तक का नाम उसके प्रमुख पात्र के नाम पर रखा गया है। इच्नानी में 
: पुस्तक का नाम इययोव (79००) है कदाचित इसका अर्थ 'सताया हुआ है । 
सप्तति अनुवाद में इस नाम का रूप योबव (00) है, जो बुल्गाता से लिया गया 
है । अंग्रेजी में योब नाम लिया गया है परंतु 'य' के स्थान पर “ज रखा गया 
और 'ोब' हो गया है | भारतीय अनुवादों मे नाम का अरबी रूप “अय्यूब 
उपयोग में लिया गया है । 

नी बाइबल में अय्यूब की पुस्तक कतृवीम या लेखों में सम्मिलित 


और नीति वचन के बाद इसे स्थान दिया गया है । सप्तति अनुवाद में इसे 
श्रेष्ठ गीत के बाद और भजन की पुस्तक से कहीं दूर स्थान दिया गया है। 


.. भजन की पुस्तक का सप्तति अनुवाद में कतृवीम के अन्तर्गत प्रथम स्थान है । 
...... .. वुल्गाता में भजन संहिता से पहले स्थान दिया गया है। अंग्रेजी अनुवाद में 
|... बुल्गाता का अनुसरण किया गया है। भारतीय भाषाओं में भी यही स्थान है । 


विषय सामग्री का सारांश द 
अय्यूब सबत्र धर्माचरण का आदश माना जाता था। वह परमेश्वर का आदर्श 


... .. दास था। परमेश्वर ने उसे बहुत आशिष दी थी। एक दिन स्वर्ग-सभा के. 
..  प्रीक्षक का अनजाने ही अय्यूब शिकार हो जाता है। यह परीक्षक यह सिद्ध 


रच 


... करना चाहता है कि अय्युव की धा्िकता दिखावे की है। अय्यूब की संपत्ति और 

रा 'सतान नष्ट हो जाती है और इसके पश्चात्‌ वह एक घणित बीमारी का शिकार _ 

... हो जाता है। बड़े कष्ट में अय्यूब राख पर बैठ जाता है। उसके तीन मित्र 
... एलीपज, बिलदद और सोपर उसे सांत्वना देने आते हैं । अय्युब के साथ उनके 


. वार्तालाप के तीन दौर होते हैं जिनमें वे परंपरागत तक॑ पर बल देते हैं। अव्यूब... 


..... के कष्ठों के कारण उसका पाप है, जबकि अय्यूब यह कहता है कि उसे निरापराध 





। ही दंड भोगना पड़ रहा है । इसके पश्चात एलीह ताम का एक जवान अपने ः पा । “ 
विचार व्यक्त करता है। अंत में यहोवा ने अय्युब को आंधी में से उत्तरदिया.... 











अय्यूब की पुस्तक... .... वूछरे 


जिससे अय्यूब को दीन बताया परतु उसके. धर्माचार की पुष्टि की । यहोवा ने 
तीनों मित्रों को भी डांठा और अय्युव का पहले से भी अधिक संपन्न किया । 
३. रूपरेखा 
अय्युब--धामिक परमेश्वर के अधीन निर्दोष व्यक्ति के कष्ट सहने की 
समस्या 
(१) प्रस्तावना (गद्य में) अय्यूव की परीक्षा और दृढ़ता (१-२) 
(क) अय्यूब का धर्माचरण (१: 'ै“* ) : अय्युब खरा और सीधा था। 
परमेश्वर ने उसके काम पर बहुत आशिष दी । 
(ख) पहली परीक्षा (१: ई-१२ ) 
(+) परीक्षक (शैतान) की शंका के कारण स्वगंसभा में यह 
निर्णय किया गया कि अय्यूब के धर्माचरण की परीक्षा को 
जाएं: (१ ३ ६४२) 
(४) चार दुर्घटनाओं में अय्यूब की संपत्ति और संतान वष्ट हो 
ः जाती है (१: १३-३२) 
(ग) दूसरी परीक्षा (२: १-१० ) 
(3) स्वर्ग-सभा में अभी भी परीक्षक शंका करता है। इसलिए उसे 


अनुमति दी जाती है कि अय्यूब की वह पीड़ित करे परंतु . 

.. उसके प्राण की छोड़ दे (२: १-६) ।! 
(#) अग्यूब घृुणित बीमारी से पीडित होकर राख में बैठता है । रु 
 : पत्नींका ने तिक बल उसे नहीं मिलता । फिर भी वह प्रमेश्वर 

के प्रति निष्ठावान बना रहता है (२: ७-१०) | 





.._(थ) अय्यूब के मिंब उसे सांत्वना देने आते हैं : दे तेमानी एलीपज 
द बुद्धिमान शूही बिलदद और भ्रचण्ड नामाती सोपर अपने 
कपड़े फाड़कर उसका दुःख बहुत बड़ा जानकर सात दिन-रात 

उसके संग भूमि पर बेठे रहे।... 


. (२) अय्यूब और उसके तीन मित्रों का वार्तालाप | ) (कविता में) ० 
_(क) अय्यूब का विलाप (३) : अय्यूब अपने जन्मदिन को धिक्कारता है... 

(३: १-१० ) अपने चाल जीवन को भी (३: ११-१६) । 2 

मत्य चाहता है (३: २ रद आल, 














१ छड 


..... प्रयोग न करे तो अय्यूब 





पुराना नियम की भमिका 


(ख) वार्तालाप का पहिला दौर (४-१४) 


0) 


(४) परमेश्वर के न्याय के प्रति शंका करने के लिये विलदद अय्यूब 


द (4४) 


एलीपज उसे स्मरण कराता है कि कोई निर्दोष कभी नाश नहीं 
हुआ । सपने में उसे ज्ञात हुआ कि कोई मनुष्य पवित्न नहीं; 


पर कि अय्यूब को जो ताड़ना दी जा रही है वह उसके भले 


के लिये है (४-५) । क्‍ 
अय्यूब का उत्तर कि उसके कष्ट में भी वह निर्दोष ठहरा है 


और कि उसकी आशा मत्य में अपने मित्रों के व्यवहार 
से निराश होता है और परमेश्वर से परिवाद करता है कि 


वह उसके लिये ताकनेवाला और सतानेबाला बन गया है 


(६-७ ) । 


(८) । द द 

अपने मन की कड़वाहट में अय्यब उत्तर देता है कि परमेश्वर 
से मनष्य का मकहमा लड़ता व्यर्थ है । यदि उसके परमेश्वर 
के बीच कोई विचवई होता, तो वह निडर होकर बोलता और 
मांग करता कि उसे बताया जाए कि परमेश्वर की ओर से 
जो व्यवहार मिल रहा है उसका क्या कारण है। यदि परमेश्वर 


ने अपने मन में मेरे विरुद्ध कुछ ठान रखा हे-मझे मत्य की 


शांति क्‍यों नहीं मिलती ? (६-१० ) 
सोपर अय्यव को उसके बकवाद के लिये डांटता है और 


_ परमेश्वर की अतिप्राकृतिक सिद्ध ता को प्रस्तुत करता है । 
.. साथ ही अय्यूब से आग्रह करता है कि वह अपने अपराध के 
लिये क्षमा मांगे और परमेश्वर उस पर कृपा दृष्टि करेगा 
20, क्‍ क्‍ रे 
प) अय्यूव का उत्तर कि अय्यूब परमेश्वर की सिद्धता को जानता 
है । वह कहता है कि परमेश्वर की बुद्धि से भी परमेश्वर 


हा . की शक्ति सीमित नहीं है। वह कहता है कि उसके मित्र 


.. परमेश्वर का पक्षपात कर रहे हैं। अय्यूब का कष्ट उसके 


.. अपराध का प्रमाण नहीं है। चाहे जो कुछ हो अय्यूब परमेश्वर 


._ के सामने बहस कर सकेगा | यदि परमेश्वर अपनी शक्तिका ल 
उसके साव मुकदमा लड़ने को अस्तुत 7 

















अय्यूब की पुस्तक... . बृ७५ द 


मनष्य कितना असहाय प्राणी है ? काश कि अधोलोक के 
पश्चात जीवन होता, तो अय्यूब अपना दुर्भाग्य सहन कर लेला _ 
 छ। 
(ग) वार्तालाप का दूसरा दौर (१४-२१) 

(3) एलीपज का तक है कि अय्यूब का अज्ञानता भरा और अशुद्ध 
कथन ही उसके अपराध एवं घमंड का प्रमाण है-परमेश्वर 
दुष्ट जन को दंड देता है (१५) । 

(9) अय्यूब अपने शांति देने वालों के प्रति निराश होता हैं 
यद्यपि अय्यूब निर्दोष था तथापि परमेश्वर ने उसे अपन तीरों 
का निशाना बनाया है| अय्यूब का न्याय होना आवश्यक है 
और वह कहता है “अब भी स्वर्ग में मेरा साक्षी है और मेरा 
गवाह ऊपर है ।” काश कि परमेश्वर के, जो मेरा सताने- 
वाला है, विरुद्ध मुकहमा के लिये कोई न्यायालय होता ! 
परंतु अब तो अधोलोक ही मेरी आशा है (१६-१७) 


(४) बिलदद का वचन है कि इस वात में अय्यूब का दम दिखाई 
देता है कि वह चाहता है कि संसार उसकी धारणाओं के 
अनुकूल हो | परंतु अय्यूब को इसके विपरीत यह मानना 

हिये कि सब दुष्टों का दीपक बुझ जाएगा (१८) । 
ए) अय्यूब का उत्तर है कि उसके मित्रों को यह जानना चाहिये - 
. कि अय्यूब के कष्ट का कारण उसका अपराध नहीं, परमस्वर गे 
की अपनी इच्छा है । अय्यूब के मित्र उसकी निंदा न करें बरन्‌ _ 


उस पर दया करें । यदि उसका मुकदमा स्थायी रूप से लिखा... 


निश्चय है कि मेरा परमेश्वर मेरा छड़ानेवाला जीवितहे 

. और वह अंत में पृथ्वी पर खड़ा होगा और अय्यूब देखेगा कि 
... परमेश्वर उसकी ओर है (१६) । है 
(४) सोपर का कथन है कि अय्यूब निरादर के शब्द काम में ले रहा. है 
है और दृष्ट के घर की बढ़ती क्षणिक होती है (२०)। 


7 (५) अय्यूब का उत्तर कि उसकी बात सुती जानी चाहिये क्योंकि 


उसकी दोहाई मनष्य के प्रति नहीं, परमेश्वर के प्रति 














पृछ३ ... पुराना नियम की भूमिका 


बात यह है कि दुष्ट लोग कदाचित्‌ ही दण्ड पाते हैं और उनके 
बच्चों को जो दंड मिलता है वह दंड उन्हें नहीं मिला 
गा (२१) 
(घ) वार्तालाप का तीसरा दौर | ः 
(+) एलीपज का वचन है कि परमेश्वर भला कार्य करने के लिये 
किसी को दंड नहीं देता, इसलिये अय्युब का अपराध बहुत 
. बड़ा होता चाहिये | यदि अय्यूब केवल दीनतापुर्वेक पश्चाताप 
करे, परमेश्वर उसकी सुनेगा, और उसे सौभाग्यशाली करेगा 
(२२) । हि 
(॥) अय्यूब का उत्तर है कि यदि अय्युब परमेश्वर को पा लेता तो 
उसके सामने अपना मुकदमा पेश करता । परन्तु ऐसा लगता 
है कि परमेश्वर कदाचित्‌ दुष्टों की विजय एवं निर्दोषों की 
पुकार के प्रति उदासीन है (२३-२४) । द 
(४४) बिलदद का तक है कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और 


गा की क्या गिनती जो कीडे और कंचए के समान है क्‍ ह हे । । रे 


(२५) । 


(7ए) अय्यूब अपने शांति देने वालों को उलाहना देता है (२६:१-४) 
(परमेश्वर की सामर्थ जगत में सर्वत्र है और उसके संब्रंध में 


. मनुष्य का ज्ञान फूसफ्साहट मात्र है--बिलदद ? ) 


अय्युब अपनी अंतिम सांस तक अपनी निर्दोषिता मानता रहेगा (२७: १-६, 
.... १२) । (परमेश्वर अधर्मी की प्रार्थना न सुनेगा; अधर्मी का अंत बुरा होगा... 
८ (२७:७-११, १३-२३)--सोपर £ ) । 
..... केवल परमेश्वर ही बुद्धि का मूल जानता है; मनुष्य की बुद्धि यह है कि 
..... परमेश्वर की भक्ति करे (२८) । ० 


अय्यूब अपनी बीती हुई सुखावस्था का, और वर्तमान दुःखावस्था का और 


.... और अपनी निदोंषिता का स्मरण करता है. (२६-३१) । (अध्याय ३१ में 

.... अय्यूब का नकारात्मक अंगीकार है) कल 
(३) बृजी एलीहू के वचन (३२-३७) (कविता में) पा 
(क) भूमिका : एलीहू अभी तक चुप सुत रहा था और वह बोलने के... 

225 लिये भड़क उठा, क्योंकि सर्वेशक्तिमान का आत्मा जवान... 












(३२ : १-१०) । 


लक वलरल सरल पिया वीक कह लिपिक किलिकिकीललल 2 


रा 
ही 
हे 
रा 
| 
है 
 ई 
| 











अस्यूब की पुस्तक... व 


हि 


(ख) पहिला वचन : परमेश्वर कष्ट के द्वारा मनुष्य को शिक्षा 
देता है (३२ : ११-३३ : ३३) । 


(ग) दूसरा वचन : जब अय्यूब परमेश्वर के स्याय और योजना के 
विरुद्ध बोलता है तो अय्यूब भूल करता है (३४) । 


(घ) तीसरा वचन : माना कि मनुष्य के कार्यों से परमेश्वर प्रभावित 
नहीं होता, परंतु परमेश्वर मनुष्य की चाल-चलन के प्रति | 
उदासीन नहीं रहता । वह उनकी प्रार्थना सुनता है जो उसकी 

सहभागिता चाहते हैं (३५) द द 


(च) चौथा वचन : परमेश्वर सर्वेशक्तिमान, दयालु और न्यायी है 
अय्यूब नम्नतापूर्वक मान ले कि वह परभश्वर के भेद क 
समझ नहीं सकता (३६-३७) । 


(४) परमेश्वर आंधी में से अय्यूब से वार्तालाप करता है (रे८: पै- 


४२ : ६) (कविता) 


(क) पहला वचन : समस्त सृष्टि, प्राकृतिक चमत्कारों और विचित्र 
जानवरों सहित परमेश्वर की सामर्थ की घोषणा करती है 
और मनृष्य उसको समझ नहीं सकता । अय्यूब अपनी बुद्धि- 
हीनता स्वीकार करता है (३८: १-४० : ५) । 


(ख) दूसरा वचन : उलाहना के रूप में अय्यूब को कहता है कि 
... विश्व के शासक के रूप में परमेश्वर के स्थान पर वह जाए । 
_जलगज और लिव्यातान दो भयंकर जलजन्तु परमेश्वर की 
_ सामर्थ और मनुष्य की दुर्बलता के उदाहरण हैं । अय्यूब माव_ 
लेता है कि उसने अज्ञानता की बातें कीं और राख और 
_... मिट्टी में बैठकर पश्चाताप करता है (४०: इ-४२: ६) । 
 उपसंहार (गद्य में) 
परमेश्वर अय्यूब के तीनों मित्रों की भर्त्सना करता हूँ । अस्दूब की 
संपत्ति लौटाता है। उसे और भी समूद्ध करता हैं। सात उल्न तीन... 
. सुन्दर पुत्रियाँ, चिरायू, चार पीढ़ी तक अपना वंश देखन की आशिष 
देता है (४२: ७-१७) हे 


४. रचना, रचथिता, रचना तिथि आम मा 
(१) रचना--अय्यूब की पुस्तक प्रमुख पात्न की गद्यात्मक कथा से आरंभ. 





होती है और अंत भी (१-२; ४२: ७-१७) । इन दोनों गद्यांशों के बीच _ रा ॥ 























पृछद...........$ पुराना नियम की भूमिका 


रचना का मूल भाग उच्चकोटि की कविता है और बड़े तकंपूर्ण क्रम में प्रस्तुत 


.. है। इसमें वार्तालाप के तीन दौर हैं । इन तीनों में अय्यूब के मित्र एक क्रम के 


अनुसार अपनी वात कहते हैं । उसके पश्चात्‌ एलीह का वार्तालाप है और अंत 
. में आंध्री में से परमेश्वर के वचन । एलीहू जहां बोलता है उस अंश को छोड़ 
एलीड का उल्लेख अन्यत्न नहीं है । इसलिए यह प्रश्न उपस्थित किया जाता है 


कि क्या एलीहू का अंश मूल पुस्तक का भाग है अथवा नहीं । वास्तव में कुछ 


. विद्वान तो परमेश्वर के वार्तालाप अंश के संबंध में भी यही प्रश्न उठाते 

इसका कारण यह है कि वार्तालाप के तीन दौर अपने में पूरी रचना प्रतीत होते 
। अध्याय २८ में बुद्धि की प्रशंसा है और वह मौलिक विचार है। यदि व 

अध्याय निकाल भी दिया जाए तो विचारधारा में किसी प्रकार की बाधा नहीं 
 आती। इस अध्याय के संबंध में भी उपरोक्त प्रश्न किया जाता है। यह संभव 
हैं कि मुल कविता सुननेवालों को इतनी सुन्दर और विचारोत्पादक लगी कि 
.. उसे विस्तुत रूप में या आज की भाषा में कहें तो उसका संशोधित संस्करण 
.. प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया । और वह भी मूल लेखक को ही करना पड़ा | 
. एलीहू का वार्तालाप मूल कविता में जोड़ दिया गया होगा। प्रभु यहोवा के 


5... वचन कदाचित मूल कविता का ही अंश 


द यह प्रश्न भी किया गया है कि क्‍या गद्यात्मक प्रस्तावना और उपसंहार का 
. लेखक वही है जो कविता का रचयिता है ? क्‍या कविता की रचना पहले हुई 


...... और बाद में गद्यांशों को जोड़ दिया गया ? अथवा क्या गद्यात्मक अंश पहले 
5 से कहानी के रूप में प्रचलित था और कवि ने दार्शनिक कविता की रचना में 
... उसका उपयोग किया ? यह अनमान उचित ही है कि एक ही लेखक ने गद्य 


. और पद्च अंश लिखें, क्योंकि गद्य अंशों में पद्मांशों की आवश्यक पृष्ठभूमि 


.... ऐसा लगता है कि अय्यूब की, अर्थात कष्ट उठानेवाले धार्मिक मनुष्य की 


.. प्रचलित कथा में कल्पना के रंग भरकर इस उद्देश्य से उसकी पुनर्रचना की कि. 


.. सुन्दर पृष्ठ-भूमि के साथ निर्दोष के कष्ठ सहने की समस्या को प्रस्तुत किया _ 
.. जाए । उसने दाशनिक बाततालाप के अचल नाठक' के साहित्यिक रूप को. .. 


.. अपनोाया। - 


..... ऐसा प्रतीत होता हैं कि वार्तालाप के तीसरे दौर में कथोपकथन में क्रम हक 
... भंग हो गया है । बिलदद का कथन (अ. २५) बहुत ही छोठा है और सोपर का 





..._ कथन है ही नहीं । इसका स्पष्टीकरण यों किया जा सकता है कि वार्तालाप में.“ 
.......  अय्यूब उत्तरोत्तर अपने मित्रों पर हावी होता गया, जिससे बिलदद कुछ अधिक 
....... . न कह सका और सोपर को चुप 


हो जाना पड़ा, और अय्यूब अधिक बोलता 







। फिर भी यह द्रष्टव्य 





अय्यूब का लम्बा उत्तर कहीं-कहीं असंगत 








अय्यूब की पस्तक ... वपृजछ | 


दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि वह उसके विरोधियों के तक दे रहा है 
जैसे २६: ५-१४ और २६: ७-११, १३-२३ । इस कारण यह अनुमान 
किया जाता है कि पाठ में क्रमभंग हो गया है । मूल क्रम की पुनरंचना का प्रयास 


किया जाए तो बिलदद का कथन लम्बा हो जाएगा जिसमें २५ २६ : ५-१४ 


"७ 


सम्मिलित हो जाएगा और सोपर को तीसरे दौर में स्थान मिल जाएगा। सोपर 
के कथन २७ : ७-११, १३-२३ होंगे। ऊपर जो रूपरेखा दी गयी है उसमें इस 
प्रकार की सम्भावना का संकेत किया गया है | इसका विकल्प यह है कि हम मानें 
कि अय्यूव व्यंग्यात्मक ढंग से अपने विरोधी मित्रों की बातों को दहरा रहा है । 
(२) रचग्रिता-लेखक अज्ञात है परंतु इतना निश्चय है कि वह उच्च कोटि 
का कलाकार होगा । क्विलर कच अंग्रेजी साहित्य का एक माना हुआ आलोचक 
है। उसका कथन है कि अंग्रेजी महाकवि मिल्टन और शैली दोनों ने अय्यूब की 
. कथा को अपनी काव्य-रचना का विषय चुना परंतु उन्होंने इस प्रयास को इसलिए 
ड़ दिया कि इस उच्च कोटि की रचना को और अधिक सुन्दर और उदात्त 
. बनाने में उन्होंने अपने आप को असमर्थ अनुभव किया । इस रचना में कलाकार 
. न केवल मानव जीवतल की एक गहनतम समस्या पर ही यथार्थवादी रूप से 
.. अभिव्यक्ति करता है, परन्तु वह उच्चतम कोटि की बुद्धि एवं भाव की गहराई 
. एवं तीब्रता की भी अभिव्यक्ति करता है। इस कविता में विभिन्न क्षेत्रों से 
रूपकों की योजना की गई है। प्रकृति से रूपक जुटाए गए हैं, जैसे लोप होते 
हाए बादल, सूखी धारवाले नाले (७: ६; ६:१५); रूपक प्राणी जीवन से 


लिए गये हैं जैसे झपटते हुए उकाब, मकड़ी का जाला, अहेरी पशु (६:२६; 


. ८:१४; १६ : ६); कृषक जीवन से लिये गए हैं, जैसे बोना, जोतना, 
लबना, गिरती हुई दाखलताएं, मुरझाते हुए फूल (४:८5, २४:२४, १५:३३) 


.. मानवी श्रम और गाहर्स्थ जीवन से, जैसे मजदूर का सांझ की अभिलाषा करता, 
गड़े हुए धन की खोज करना, जुलाहे की धड़की, छाप लगाता, धोना, पीना _ 


:(७:२, ३:२१, ७:६, ३०:१४. ६ : ३०. १ १६), यात्रा के क्षेत्र से लिये गये हैं 


जैसे हरकारा, वेग से चलने वाली नाव, कारवां (६:२५;६:२६; ६:१८, १६)। 
.. कुछ वर्णन अत्यंत चित्रात्मक हैं | समुद्र नवजात शिशु के समाव और बादल. 
उसके वस्त्र के समान हैं (१८ : ६); उषा एक सुकुमारी है जो भोर की पलकों 
. से क्षितिज से झांकती है (३:९६); अंधकार उस डेरे के समान है जिसकी 
डोरियाँ शीघत्र कट जाती र्हः ( ४:२१ ) कु पशुओं के चित्र भी बड़े स्पष्ट हे 


जसे गधा, शुतु रमुर्ग, घोड़ा, जलगज, मगर (३६-४० ) 


अय्युब की पुस्तक में कई अरबीपन हैं । केवल एक का ही उल्लेख किया रत 
जाती के बगल कहुएा 


जा जाए । परमेश्वर का एकवचन रूप ही इसमें प्रयक्त 




















 बृ८०........ प्राता नियम की भूमिका 


.. चष रूप नहीं । अर्थात एलोहीम के बदले एलोआह (॥/,०७)॥ ) (दे. अरबी इला 
.. अलइलाह या अल्लाह) का प्रयोग हुआ है। कुछ रूपक ऐसे हैं जो खानाबदोश 
._ समाज के लिये सार्थक हैं। इससे यह अनुमान किया जा सक्रता है कि लेखक यर- 
.. दन नदी के पूर्व के क्षेत्र का रहनेवाला था जहां अरबी बोलनेवाले लोग रहते 
हैं । कुछ विद्वानों की मान्यता है कि लेखक एदोमी था और कि उसने मूल रचना 
अरबी में की और इब्नाती रचना अरबी का अनुवाद है। इस संबंध में यह द्रष्टव्य 
है कि अय्यूब का प्रमुख मित्र एलीपज तेमान तगर का था| तेमान नगर एदोम 
में था । परंतु यह कल्पता करना अत्यंत कठित है कि किसी एदोमी पुस्तक को 
. इब्रानी प्रामाणिक धर्मशास्त्र में स्थान दिया जाए और कि एदोमी पुस्तक में 
शद्भ एकेश्वरवादी दर्शन प्रस्तुत किया जाए जसे कि अय्यूब की पुस्तक में है 
अतएव इसका रचयिता इब्रानी व्यक्ति ही होना चाहिये । 
(३) तिथि--रचना तिथि भी अज्ञात है। अत्यंत विभिन्न मत इस संबंध में 
व्यक्त किए गए हैं। मूसा और पूर्व-मुसा काल से लगातार मकाबी काल के 
सम्पूर्ण इब्रानी इतिहास के किसी भी काल में विद्वानों रा इसकी रचना तिथि... 






























परवर्ती काल में लिखी गई जब बोलचाल की भाषा अरामी भाषा में बदल रही 





.. सकता है कि लेखक अरब देश की भाषीय सीमा पर रहता था । 


_ पुस्तक के तिथि-निर्धारण में एक महत्वपूर्ण आधार यह है कि बाइबल के 
8 ् उन अंशों के साथ साम्य देखा जाय जिनकी तिथि की जानकारी हमें है । इस 
..... आधार पर यह माना जाता है कि अय्यूब का स्वगत कथन (३:३-२६) की 


5 के समान यिर्मयाह भी अपने जन्म दिन को धिक्कारता है । अय्यब २१:७--१६ 
.. का उल्लेख है । इसके विपरीत शब्द भंडार के अध्ययन से पता चलता है कि 


..... यशायाहू ४०-६६ अय्यूब की पुस्तक पर आधारित हो सकता है। थूक, मकड़ी 
... और आकाशमंडल जंसे असामान्य शब्द दोनों में मिलते हैं (७:१६; 5: १४; 


का अनुमान किया गया है। भाषा की विशेषताओं से यह पता चलता है कियह.... 





थी । इसके विपरीत, भाषां की विशेषताओं का यह भी स्पष्टीकरण दियाजा 


..... प्रेरणा यिर्मयाह के अंगीकार से मिली होगी (यि.२०: १४-१८) क्योंकि अय्युव रा 


यिर्मयाह १२: १-३ पर आधारित हो सकता है। दोनों में दृष्टों के संपन्न होने... 


5 5 र९: १४; दे. यश- ५०: ६; ५६: ५: ४०:२२) । अय्यूब यशायाहू ४०-६६ ४ 
_..../ £से पहले की रचना है-यह इस बात से व्यंजित होता है कि दुःख की समस्या का. 


:.... एक कारण स्थानापन्न (५८७700७) दुःख उठाना हो सकता है-यह विचार... 







विचार है परंतु अय्यूब में यह विचार नहीं मिलता । हे 
पुस्तक की रचना तिथि यिर्मयाह और । 

















अय्यूब की पुस्तक... 0 


यशायाह ४०-६६ के रचना काल के मध्य मानी जाती है-अर्थात लगभग ई. पृ. 
५६० । अय्यूब १२:१८-२१ में राजाओं और पुरोहितों की बंधुवाई को अंतकथा 

निहित है । अतएवं यह पुस्तक कम से कम ई. पृ. ७२१ के बाद लिखी गई होगी. 
जब शोमरोन का विनाश हुआ । बंधुवाई की कथा पाठकों या श्रोताओं के लिये 

उसी समय सार्थक हो सकती है जब कि उन्हें अपने इतिहास क्रम में या तो 
इस्राएल राज्य या यहदा राज्य की बंधवाई की जानकारी हो। इसलिये यह 

पस्तक बंधवाई के बाद ही लिखी गई । द 


प, समीक्षात्मक रोचक समस्याएं 


(१) साहित्यिक साम्य--निर्दोष का दुःख सहना' मानव जीवन का एक सुपरि- 
चित अनुभव है | अतएवं यह आश्चर्य की वात नहीं है कि यह विषय विभिन्न 
जातियों के साहित्य में चितन का विषय हो । उदाहरणार्थ, भारतीय साहित्य 
में सत्य हरिश्चन्द्र की कथा है जिनके सत्य की परीक्षा देवताओं की. शर्तें के 
कारण हुई । अय्यूब की कथा में मिस्र और बाबुल के “निराशावादी साहित्य की 
. झलक अधिक है। मिस्र के साहित्य में मध्य राज्य के समय से (ई. पू. २० नीं- 
१८ वीं सदी) 'वाक्‍्पदु किसान की शिकायत' एक रचना है। उसमें कुछ कुछ 
. काव्यरूप में नौ वार्तालाप हैं जिनकी प्रस्तावना और उपसंहार गद्य में हैं। ई. 
: पूबे १८ वीं सदी की रचना 'नेफेर-रोहू की नबृब॒त' नामक रचना के आरंभ 
और अंत में भी विवरणात्मक अंश हैं। अपने जीवन से थके मनुष्य का अपनी 





आत्मा से संवाद' रचना में एक मनुष्य मरना चाहता है परंतु वार्तालाप में उसकी... 


 आत्माविरोध करती 


... बाबुली साहित्य में धार्मिक दुःख उठानेवाले की कविता' लामक रचना है... 
. जिसे बाबुली अय्यूब भी कहा जाता है ('मैं बुद्धि के परमेश्वर की सराहना _ 


5 


अ 


रूगा!) । इस रचना में वक्‍ता बड़े कष्ट में है। वह अपनी निर्दोषिता की दुहाई 2 


देता है, अपनी भक्ति का वर्णन करता है, अपने देवता पर उदासीन होने का ._ 
. अभियोग लगाता है और मनुष्य के ज्ञान ओर भाग्य के संबंध में निराशावाद 
_ व्यक्त करता है, ईशशास्त्र पर सूत्रात्मक कथोपकथन' नामक रचना भी है, 
_ मानवी दुदंशा पर संवाद! अथवा बाबुली सभोपदेशक' भी है जिनमें ईश्वरीय... 
न्याय और मनुष्य जीवन के अभिप्राय का विवेचत किया गया है। वह इस अर्थ 


। में सूत्रात्मक है कि उसकी पंक्तियां किसी मंत्रकार के नाम के आधार पर नियो- रे हे हु 
.. जित हैं। स्वामी और सेवक के बीच एक निराशावादी संवाद! नामक रचना... 
ः भी है जिसमें मानवी जीवन के अनेक पक्षों की प्रशंसा की गई है और तत्यश्चात्‌ तू रा 








..  अ्यर्थता की चरम सीमा में उन्हें निकृष्ट ठहराया गया है । 




































बृह३९  ..  ौ: पुराना-नियम की भूमिका 


का निराशावादी साहित्य के ये उदाहरण हमारे समक्ष इब्रानी साहित्य में 
... निराशाबादी तत्वों की प्रबद्ध पष्ठभमि प्रस्तुत करते हैं। इससे हमें पता चलता 
है कि इस्राएल के एकेश्वरवादी विश्वास को मानवी अनुभवों के गहन 

.. निराशाबादी पक्षों का सामना करना पड़ा। परन्तु इन पुस्तकों के आधार पर 
यह अनमान नहीं लगाया जा सकता कि अथ्यूब की पुस्तक इन पुस्तकों पर 

पर विचारधाराओं पर आधारित द 


(२) अय्यूब की ऐतिहासिकता द 
 अय्यूब की ऐतिहासिकता पर शंका की जाती है और अय्यूब की कथा की 
ऐतिहासिकता पर और भी अधिक शंका की जाती है। उसकी पश-संपत्ति 
और उसके परिवार के आदश अंक से इतिहासकार की शद्धता के बजाय 
कहानीकार की कला की व्यंजना होती है। स्वर्ग सभा के दृश्य, जिनमें परीक्षक 


प्रमाणों के बाहर की बातें हैं । दूघटना के आयात ऐसे हैं, जिनमें केवल एक ही 


इनसे यह व्यंजित होता है कि यह रचना इतिहासज्ञ की नहीं, महाकवि की है। 





... चसंख्या में एकदम दुगुती और संतान उतनी जितनी पहले थी। तीन पुत्रियाँ 
.._. बहुत सुन्दर और नाम भी बड़े प्यारे-कपोती, संहिजती, नयनवरंजिनी। ये सब 
.. कथाकार की तूलिका के रंग हैं । क्‍ 7 
.....- इसके विपरीत, यहेजकेल १४:१४,२० में एक अय्यूब का उल्लेख हुड 

. है। इनमें उसे भक्ति और धर्माचरण का सुप्रसिद्ध आदर्श कहा गया है। इससे 
संकेत मिलता है कि अय्यूब ऐतिहासिक व्यक्ति था | अत: हम यह मान सकते 

कि अय्यूब एक ऐतिहासिक मनुष्य था जिसका नाम धर्माचरण, भक्ति और 


लूँ 
नव 


बा हु अभिप्राय के अनुक्‌ल कथा में रंग भर कर उच्च कोटि की रचना प्रस्तुत की | 


(३) शैतान--शैतान' अय्यूब की पुस्तक में परमेश्वर के पुत्रों में 
(१:६; २:१, आदि 


दर्भ में 'परीक्षक' है। अंः 









को अग्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति दी जाती है, स्वभावतया ही ऐतिहासिक 


व्यक्ति वर्णन करने के लिए बच जाता है, कि उनसे कल्पनाप्राण रचना का... 
आभास मिलता है। लम्बे लम्बे संवादों में उच्चकोटि _ की काव्यात्मकता हैं। 


... निर्दोष होते हुए दुःख उठाने में धैर्यवान का प्रतीक बन गया। परवर्ती काल 

... में जब इस पुस्तक के लेखक को, जो गहत विचारक और उच्चकोटि का कवि _ 

... था, निदोष के दुःख उठाने की समस्या से उलझता पड़ा, तो उसने अपने हि पं 
.. विचारों की पुष्ठभूमि के लिए अय्यूब की परंपरा को लिया और अपने... 











.._ अंत में अय्युब की संपत्ति और संतान उसे पुनः प्राप्त होती है। पशु संपत्ति... 


में शब्द का अर्थ 'विरोधी' है । बतेमान | 
शब्द के साथ उपपद 'दी' जुड़ा हुआ... 





अय्यूब की पुस्तक... .. (७३ 


है। इससे पता चलता है कि वह सामान्य संज्ञा है व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं । 
अय्यूब की पुस्तक में वह स्वगंदूत-सभा का एक सदस्य है जिसका कार्य यह 
कि आदर्श धर्माचरण संबंधी मानवी दावों के प्रति शंका और परीक्षण करने 
के माध्यम से स्वग सभा के नैतिक आदर्शों को सुरक्षित रखे। रोमी कथोलिक 
कलीसिया में धन्य-घोषणा (#्वंधगीट8४०४) की प्रक्रिया के निमित्त एक 
विश्वास का प्रोत्साहुक (2०्ग्रछाण गिवेल) होता है जिसे बोलचाल में 
शैतान का अभिभाषक (वकील ) कहते हैं। अय्यूब की कथा में शैतान का 
काम इसी वकील जैसा है। रोमी कलीसिया में इस वकील का काम यह है कि 
जिस व्यक्ति के लिए धन्य-घोषणा की अपेक्षा की जाती है उसके धर्माचरण के 
पक्ष में प्रस्तुत प्रमाणों में त्रुटि की खोज करे । इसी प्रकार अय्युब की पुस्तक में 
शैतान या परीक्षक अय्यूब के धर्माचरण का परीक्षण करता है। नये नियम 
और खिस्तीय ध्र्मविज्ञान में जिसे यह नाम शैतान दिया गया है अर्थात्‌ दृष्ट' 
उसके साथ इस शैतान को मिलाना उचित नहीं है। तये नियम का दुष्ट 
. परमेश्वर का महा-विरोधी है और परमेश्वर की सभाओं में उसका कोई स्थान 
संभव नहीं । अय्युव की पुस्तक में शेतान की कल्पना बुराई के सरदार के रूप 
. में शैतान के समान है, और इस बात में समान है कि बुराई और कष्ट के 
. अपने कटु अनुभवों में मानव दोनों से परिचित होता है। यह ध्यान देने को 
बात है कि ज्यों ज्यों इब्रानी लोगों को परमेश्वर का प्रकाशन अधिकाधिक पूर्ण 
मिलता गया, त्यों त्यों वे इन कटु अनुभवों के विभिन्न कारणों को पहचानने 


कक 


लगे, कि वे परमेश्वर के भेद के कारण हैं अथवा दुष्ट के कारण हैं । 
६. धर्म शिक्षा द 
... प्रस्तावता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अय्युव आदर्श धर्माचरणवाला 
- व्यक्ति था जिसने बड़े धयें के साथ विपत्ति और दुःख सहा। “अय्यूब का 
. धीरज” (या. ५:११) लोक प्रसिद्ध हो गया और इस प्रकार “दुःख में धीरज' 
.. इस पुस्तक की शिक्षा है| परंतु इस पुस्तक के लेखक के मन 'धीरज के नमूने 
को प्रस्तुत करने के अतिरिक्त और भी कुछ है। उसका मन इस समस्या से 
.. उलझ रहा था कि यदि परमेश्वर भला है, सर्व शक्तिमान है, तो वह क्यों 
 दृष्टों को पनपने देता और धर्माचरण करने वालों को दुःख सहने देता है। यह ... 
.. समस्या बाइबल में अन्य स्थानों पर भी उठाई गईं है जैसे भ० २७, ४०, ४८, 
... ७४ में और यिमंयाह १२:१-४ में । अश्युव की पुस्तक का लेखक इस समस्या... 
.._ का कोई स्पष्ट हल नहीं प्रस्तुत करता, परन्तु वह उस समाधात की नींव... 
. रखता है जो बाद में खिस्तीय प्रकाशन में होनेवाला था ।अय्यूब के मित्रों 
.. द्वारा इस समस्या की परंपरागत मान्यता को प्रस्तुत किया गया है, अर्थात्‌ । 















बूबोड..... का पुराना नियम की भूमिका _ 


.. कि परमेश्वर भलों को आशिष देता और बुरों को दंड । दूसरे शब्दों में यों 
... कहें कि पाप का दंड दुःख है इसलिये दुःख पाप का प्रमाण है। यह विचार 
. भी इसमें पाया जाता है कि दुःख एक सीख देने वाला तत्व है (५:१७; 


. ३३:३०) । परन्तु अय्यूब को इन मान्यताओं से कोई सांत्वना नहीं मिलती, हा 


क्योंकि वह अपने अनुभव से जान रहा है कि निर्दोष का दुःख उठाना एक 
सच्चाई है, और वह यह भी जानता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर, केवल 
. परमेश्वर पर ही इस दुःख का और उससे उत्पन्न अन्याय का दायित्व है। यदि 
लेखक ने कोई समाधान प्रस्तुत किया है, तो वह प्रभु परमेश्वर के उन बचनों 
में है जो आंधी के माध्यम से कहे गये। जो कुछ परमेश्वर ने कहा उससे 
नहीं बरन्‌ उसकी प्रभावशाली उपस्थिति से अय्यूब अपने दुःखों को भलता है 
. ईश-दर्शन से अय्यूब अपनी परिस्थिति से ऊँचा उठता है और उस दशा में 
पहुँचता है जहाँ वह जानने मात्र से संतुष्ट न क्योंकि उसने नवीन दर्शन 
और दृष्टि प्राप्त कर ली है। | 


इस प्रकार अय्यूब की पुस्तक से यह शिक्षा मिलती है कि यद्यपि मनुष्य के 


अधिकांश कष्ट उसके पाप के कारण हैं तथापि सब कष्ट उसके पाप के कारण... 
नहीं हैं । यह एक सच्चाई है कि कभी कभी धर्मपरायण व्यक्ति दुःख भोगता है. 


.. जैसे अय्यूब ने भोगा। जब हमें इस प्रश्त का उत्तर देने चलते हैं कि दुःख क्यों... 
मनुष्य को होता है, और उत्तर में यह कहते हैं कि दुःख पाप के दंड स्वरूप या... 
मानव के शिक्षार्थ आता है, तो हमें इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिये कि 


..... धर्माचारी और तिदोष भी दुःख उठाता है जिसका कारण परमेश्वर के अगाध भेद 


. .._ की परिधि में रहता है। अय्यूब की पुस्तक के अध्ययन से इस भेद के समक्ष साहस 


. से खड़े रहने के लिये आशा की कुछ किरणें दिखाई देती हैं। पहली, कि भविष्य में. 


... जीवन है जिसमें इस संसार के अन्याय को दूर किया जाएगा और न्याय की स्थापना. 


.. होगी (१४: १४) । दूसरी, यदि कोई व्यक्ति इस संसार में ईश-शाप के कारण 


के दुःख भोगता है तो उसकी निर्दोषिता के लिये 'स्वर्ग में (उसका) साक्षी है, और 


०3858 । (उसका ) गवाह ऊपर है । तीसरी, कि दुखी जन को परमेश्वर चाड़े जितना 


.._ कठोर जान पड़े, पर वही सत्य की रक्षा करेगा और निर्दोष दुःख उठानेवाले के. 


... लिये वही छुड़ानेवाला होगा (१९: २५) आल 
2 । क्‍ । निर्दोष के दःख भोग की समस्या के संबंध में जो कुछ भी समाधान इस पुस्तक का 
-. .. में प्रस्तुत है, वह ताकिक न होकर व्यावहारिक है। परमेश्वर के महा पराक्रम और _ 








.....  सामर्थ को अय्यूब देखता है-और फिर वह इस बात की चिता नहीं करता कि वह... 
.. .. अपने दुःख का कारण जाने । वह परमेश्वर के एक नये प्रकाशन का दर्शन करता... 
है और नये अनुभव है। यह समाधान इस समस्या के खि्रिस्तीय.... 


















अय्यूब की पुस्तक... १5८४ 


समाधान की ओर इशारा करता है। सुसमाचार में हमें यह नहीं बताया गया कि 
निर्दोष क्‍यों दुःख उठाता है, परंतु हमें परमेश्वर के पुत्र यीशु खिस्‍्त में परमेश्वर 
का एक नया प्रकाशन मिलता है। यीशु खिस्त निष्पाप था और उसने जगत के 
त्रण के लिये दुःख का मार्ग चुना । खिस्त में इस नये प्रकाशन के सामने हम 
ला अपने दुःखों के संबंध में चिता करता भूल जाते हैं । इसके विपरीत हम दुःख में 
...... घमंड करते हैं क्योंकि हम खिस्त के अधिक पास आते हैं (फिल. ३: ८-१० ) । 
क्रस का भेद दुःख के भेद को आत्मसात कर लैता है-क्योंकि क्रुस का भेद परमे- 
श्वर के उद्घारक और स्थानापन्न प्रेम का भेद है। हे 


अय्यूब की पुस्तक में इस मूल शिक्षा के अतिरिक्त कुछ अन्य शिक्षाएं भी 
हैं । इस संसार पर परमेश्वर की सामर्थ और पूर्ण आधिपत्य का बड़ा स्पष्ट 
चित्रण है (५: ६-१४; ४०:१०-४१: २५; ४२:२) । परमेश्वर की बुद्धि की 
तुलना में मनुष्य का समस्त ज्ञान अज्ञान है (३८-३६ ) । अय्यूब के नकारात्मक 
अंगीकरण' (३१) में मनुष्य के नैतिक दायित्व श्रस्तुत हैं। इसमें दु्बलों और 
अनाथों के प्रति दयाभाव, और इच्छा के पापों को मान लेना विशेष द्रष्टव्य हैं 


(३१: १ )। 































सत्ताइसवां अध्याय 
भजन संहिता 
१. शीर्षक और प्रासाणिक धर्मशास्त्र में स्थान 
द इब्रानी में यह पुस्तक तहिल्लीम (स्तुति-गीत) कही जाती है, यद्यपि 
पुस्तक के भीतर उसकी विषय सामग्री को दर्शाने के लिए तपिलल्‍लीम 
(प्रार्थनाएँ) शब्द काम में लिया गया है। सेपत्वागिता में प्सल्मुइ (एक 
. बचन प्सल्मोस ) है। यह प्सललो से निकला है, जिसका अर्थ उंगली से 
तारवाले वाद्य को बजाना है। अतएवं प्सल्मोस ऐसा गीत होता था जो... 
तारवाले बाजे के साथ गाया जाता था.। सेपत्वागिता का अनुसरण कर 
. बुल्गाता में पुस्तक का नाम प्साल्मी दे ओर अंग्रेजी में वुल्गाता का अनुसरण 
किया गया है । भारतीय अनुवादों में या तो अरबी का अनुसरण कर जबूर 
यथा मजमूर या समिजामीर कहा गया है या फिर शब्द का अनुवाद 


..._ किया गया है। हिन्दी में इसका अनुवाद पहले स्तोत्र संहिता किया गया था 
..._ फिर भजन संहिता किया गया। भजन संहिता (5०७7) शब्द का प्रयोग 


भजन की पस्तक के लिये किया गया है, और विशेषकर उस समय जब उसका 


... उपयोग उपासना पद्धति के लिए किया जाता है 


इत्रानी बाइबल में लेखों (कतुबीम) के अंतर्गत भजन संहिता पहिली 


757 अपुस्तक सेपत्वागिता, बुल्गाता, अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं की 


५ ह ' सके 


रा जा बाद स्थान दिया गया है। 





विषय सामग्री का सारांश 


४ .. भजन संहिता एक सौ पचास भक्ति गीतों का संग्रह है, जिनमें परमेश्वर 
_ के संबंध में मनुष्य के विभिन्न भावों की अभिव्यक्ति है। इन भावों में निवेदन 


। 2 धन्यवाद, आनंद, अंगीकार और स्तुति जैसे भावों की तीब्र अनुभूति और 

















भजन संहिता... बदछ 


(१) पहिला भाग (१-४१) 
सामान्यतया इस भाग में व्यक्तिगत प्रार्थना एवं धन्यवाद के भजन हैं। 
इन्हें विशेषतया दाऊद के भजन कहा गया है । 
(२) दूसरा भाग (४२-७२) 
इस भाग में सामान्यतया राष्ट्रीय संदर्भ में प्राथना और धन्यवाद के भजन 
3 । दसरे भाग में निम्नलिखित उपविभाग हूँ 
(क) कोरह वंशियों के भजन (४२-४६; ८४,८५,८७ ) ; 
(ख़) दाऊद के भजन (५१-७० में से अधिकांश भजन ) । 
(३) तीसरा भाग (७३-८६) 
दसरे भाग के समान इस भाग में भी सामान्यतया राष्ट्रीय सद्भ में 
प्रार्थना और धन्यवाद के भजन हैं । इसमें एक विशेष इकाई है : आसाप के 
भजन (७३-८२, ५० भी) 
(४) चौथा भाग (६०-१०६) 
... इस भाग के भजन साधारणतया उपासना विधि संबंधी हैं। इतम मंदिर 
से सम्बन्धित स्तुति और धन्यवाद हैं । सामान्यतया इनके लेखक अज्ञात हैं ऑर 
संगीत के चिन्ह इनमें बहुत कम हें । 
क्‍ (५) पांचवा भाग (१०७-१५० ) 
चौथे भाग के समान इस भाग के भजन भी साधारणतया उपासना विधि 
संबंधी हैं, और लेखक सामान्यतया अज्ञात हैं तथा संगीत के चिह्न भी बहु 
कम हैं। इस पुस्तक में विशेष उपविभाग निम्नलिखित हैँ ले हम 
(क) यात्रा के गीत (१२०-१३४) | (ख) दाऊद के भजन (१३८८ 
१४५) हु हम 
_. (गं) स्तुति या -हल्लिलुयाह, के भजन (१०४-१०७: वैपवैवछ2 . 
१३५--१३६; १४६-१५० ) । अधिकांश पांचवे भाग में हैं परन्तु चार चोथे 
भाग में हैं । पांचवें भाग को छोड़कर अन्य सब भागों के अंत में प्रशंसागान 
है (४१:१३; ७२:१८-२०; ८९:५२; १०६:४८) । पाँचवे भाग के अंतिम 
भजन, १५० वें भजन को प्रशंसागान माना जा सकता है ॥ हा 
११३-११८ भजनों को हल्लेल (स्तुति) या सामान्य हल्लेल कहते हैं। 


. महान पर्वों पर गाए जाते थे। फसह के पर्व पर भी इनका गान होताथा 
(दे, मत्त.२६:३०) । ६ वां भजनों या १२०-१३६ भजतनों को महान 


बलल कहा जाता ह 













 धृददथ,..... पुराता नियम की भूमिका 


४ भजनों का वर्गीकरण 
विषय सामग्री के आधार पर अनेक भजनों का वर्गीकरण निम्नानुसार 


: “किया: जाता है 










चिन्तनात्मक या प्रवोधनात्मक--इनमें भजन लेखक परमेश्वर के संबंध 
में अपने अनुभवों पर विचार करता है और इस प्रकार जीवन के लिए शिक्षा 
ग्रहण करता है । भजन १, 5, १५, १९, ३३, ३४, ३७, ४६, ५०, ६०, १११, 
११९२, ११६९, १३६ ऐसे भजन हैं । 


ऐतिहासिक भजन--इ नमें इस्राएल के इतिहास में परमेश्वर के कार्यों का 


.. प्राधान्य है। १८, ७८, ८६, १०५, १०६, १३२, १३५, १३६ ऐसे भजन हैं । 












और भी देखिए, ४६, ४८, ७६, ८३, ४४, ७४, ७९, १३७ 


प्रकति भजन--इनमें प्राकृतिक घटनाओं के अन्तर्गत परमेश्वर के कार्यों 
का वर्णन है १८, १९, ७४, १०४ ऐसे भज न हैं । 


मसीह संबंधी भजन : इन्हें राजोचित भजन भी कहते हैं। इनमें दाऊद 


..... का राजा या अभिषिकक्‍त के रूप में उल्लेख हुआ है। २, १८, २०, २१, ४५, ल्ज। 
हा | ६१, ६३, ७२, 5९, ११०, १३२ भजन ऐसे हैं | 


उपासना-विधि संबंधी भजन : इनमें मंदिर में आराधना संचालन का भाव 


] रा, _ विद्यमान है । ६७, 5४, १०७, ११८ और हल्लिलुयाहु भजन इनमें सम्मिलित 








.. हैं (रूपरेखा देखिए ) 
_.... पश्चाताप के भजन : इनमें भजन-लेखक अपने पाप का अंगीकार करता 


.... हैया परमेश्वर संबंधी अपनी आवश्यकता को व्यक्त करता है। ६, ३२, ३८5, 


. #१, १०२, १३०, १४३ भजन 0 हे ' 






शापवाचक भजन : इनमें शत्त॒भों या दृष्टों को शाप दिया गया है, जैसे ३५, 


5... एघ, १०६ भजन । 





ये वर्ग न तो पूर्ण हैं और न अमिश्रित हैं । यह वर्गीकरण केवल अध्ययन 


। रा और भावन के लिये सुभाया गया है। 






आधुनिक विद्वानों की रुचि इस बात में है कि जहाँ तक संभव हो उपासना क्‍ 


... पद्धति के संदर्भ में इन भजनों की मूल पृष्ठभूमि के संबंध में जानकारी प्राप्त . 









(गुनकेल (0072) का वर्गीकरण) । 





पा 
शी 

ु 

] 











भजन संहिता ऐप 5 . पृदह8 


राष्टीय विपत्ति के संदर्भ में प्रयोग होने वाले समाज के विलाप भजन-४ ४ 


७४, ७६ । 


'राजोचित भजन, ई. पृ. ५८६ के पूर्व शासन करने वाले राजा से संबंधित 
२, १८, २० । द द 
व्यक्तिगत विलाप, जिनमें कठिन परिस्थितियों में सहायता की पुकार है- 
है; है ६३७ 8 ॥ 


* है 


धन्यवाद के व्यक्तिगत भजन, जिनका प्रयोग मंदिर की उपासना विधि में 


भी किया जाता होगा---३०, ३२, ३२४ । 


.. सिंहासन पर आसीन होने के भजन : सिंहासन पर आसीन होने के वाषि- 
कोत्सव के भजन--४७, ६३ 


भरोसे के भजन--४, ११, १६, २३ 
प्रज्ञा कविता--१, ३२७, ४६ 
उपासना विधि --5, ४२-४३, ४६ 


नबूबत की उपासना विधि : जिनमें उपासना के अंतर्गत नबी के पद को 


. स्थान दिया गया है--१२, ७५ 


भजन संहिता की आलोचनात्मक रोचक विशेषताए 
(१) भजनों को अंक देना-- भजनों को संख्या या अंक देने की दो 


_परंपराएं हैं (क) इब्राती अंक पद्धति, जिसका अनुसरण श्रॉतैस्तत अंग्रेजी 
बाइबलों और प्रोतेस्तंत परंपरा के अनुवादों में किया गया है । (ख) सेपत्व गिता .. 
पद्धति, जिसका अनुसरण वुल्गाता में और उस की परंपरा के अनुवादों में किया 


गया है। इब्रानी अंक पद्धति अधिकांशत सेपत्वागिता पद्धति से एक अक 


अधिक है। यह नहीं कहा जा सकता कि एक परंपरा दूसरी से अधिक मौलिक मे 
२ क्योंकि भजन £ और १० इब्रानी में भी पहले एक ही भजन थे जैसे कि < ' 
सेपत्वागिता में हैं, और भजन ११४ और ११५४ इब्नानी में दो भजन हैं जबकि... 
भेपत्वागिता में एक ही हैं (११३) । सेपत्वागिता में (परंतु वल्गाता में नहीं) ही 
...._ एक भजन और है (१५१) जिसमें गोलियात के साथ दाऊद की लड़ाई का. 
... वर्णन है | का 


दोनों परंपराओं की अंक-पद्धतियों का संबंध निम्नानुसार है 




















१६०... पूराता नियम की भूमिका 


इब्रानी (मसोरेती पाठ). सेपत्वागिता, बुल्गाता और कथोलित 
और प्रोतेस्तंत बाइबल अनुवाद 
द पूनम... द .. (६-5 

११-११३ अर वर 

गम ल३ कक ११३ 

११६ हे ... ११४-११५ 

१९७-१४६ द ' आपु६+] ४9 

१४७ १४६-१४७ 

१४८--१४ ० हे १४६८-१४ ० 


(२) भजनों के शीषंक--३४ भजनों को छोड़कर अन्य सब को शीर्षक 
दिए गए हैं | उदाहरणार्थ भजन ४ का शीर्षक यह है : प्रधान बजाने वाले के 
लिये । तारवाले बाजों के साथ | दाऊद का भजन ।' इब्नानी में यह भजन का 
पहला पद है और इससे यह संकेत होता है कि यह इब्नानी पाठ का अंश है। 
इस शीर्षक को और वर्तमान अनुवादक जो शींषक देते हैं, जैसे 'परमेश्वर या 
भरोसे के लिए सायंकाल की प्रार्थना' (ए. एस. बी) दोनों को एक ही नहीं 


समभना चाहिये | अनवादक द्वारा दिया हआ शीर्षक इबद्बानी पाठ में नहीं पाया _ 
जाता। आलाचना के अभिप्राय की दृष्टि से 'भजनों के शीर्षक से केवल उन्हीं 


. शीषकों का संकेत होगा जो इब्रानी पाठ के अंश हैं। 
.._ इब्रानी शीर्षक बहुत प्राचीन हैं। वे मसोरेती पाठ के अंश है । वास्तव में बे 


.. इतने प्राचीन हैं कि उसके मूल अर्थ का अब पता नहीं । फलस्वरूप इनके अनृवाद 
... करने में अनुमान का सहारा लेना पड़ता है। यद्यपि गे जीर्षक बहत प्राचीन हैं 


मम प्रस्तु ऐसा प्रमाणित होता है कि भजनों के मूल भाग नहीं हैं, क्योंकि कई 


. भजनों के संबंध्र में सेपत्वागिता में पाए जाने वाले शीर्षक मसोरेती पाठ के _ 


... शीर्षक से भिन्‍न हैं (उदा, ३३, ४३, &३, &६ आदि ) । कुछ शीर्षक या शीर्षकों 
.... के अंश संगीत निर्देश जैसे प्रतीत होते हैं। उदाहरणार्थ, ४६वें भजन में “अमा- 
.... लोत की राग पर (यह कदाचित वॉयलिन का पंचम या सप्तम स्वर जैसा हो) 


४ थे भजन में 'नगीनोत' जिसका अनुवाद 'तारवाले वाजों के साथ” किया गया. 


वालों की मौनी कबूतरी ), 


.... है; «वें भजन में 'नहीलोत' जिसका अर्थ कदाचित्‌ 'श्वास से बजने वाले बाजों पा 
ब ५. _ के साथ हो सकता है; €वें भजन में शेमीनित' जो कदाचित आठ तारखाले ..... 
.... वाजों के नीचे सप्तक' के अर्थ में प्रयुक्त है। कुछ शीर्षकों से रागों के नाम का... 

. 0 संकेत मिलता है, जसे ५ ६ वें भजन में 'योनते-एलेम-र होकी मे अर्थात दर: देश. .ः का ः 
ः भजन में 'मिक्ताम सूशनेदूत (अर्थात... 


0 व + जी 




















भजन संहिता... १९१ न्‍ 


साक्षी के सोसन) । कुछ शीषंकों में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत है * से ५७ वें 
भजन में 'अल तशहेत' जिसमें दाऊद शाऊल से भागकर गुफा से छिप गया था, 
अथवा ६० वें भजन में जिसमें दाऊद लोन की तराई में एद्मियों पर विजयी 
आ था। कई भजनों में इश्नाती इतिहास के किसी प्रमुख व्यक्ति का नास है 
और साथ ही लेखक या मूलख्रोत का भी; अन्य मे एस नाग हैं जो प्रसिद्ध नहीं 
अथवा अज्ञात हैं। शीर्षकों में निम्नलिखित नाम आए हैं: मूसा, एक भजत 
(६०); दाऊद, तिहत्तर भजन (पहिले भाग में ३७, दूसरे भाग में १5, तीसरे 
में १, चौथे में २, और पांचवें में १५) ; सुलेमान, दो भजन (७२ और १२७) 
आसाप, बारह भजन (७३-८३ ); एजाहवशी हेमान एक भजन (८८), 
एज्राहवबंशी एतान एक भजन (८९) कोरहवंशी, ग्यारह भजन (४२-४६, ८४ 
८५, ८७) । चौंतीस भजन बेचारे अनाथ है, अर्थात उनके कोई शीर्षक 
नहीं हैं। क्‍ 
विभिन्न अंग्रेजी अन॒वादों में भजनों के शीर्षक की तुलना रोचक हूँ। ४ थे 
भजन का उदाहरण लीजिए। ए. वी. (४. ५.) में नगीनोत पर श्रधान 
बजाने वाले के लिये | दाऊद का भजन ।, ए. एस. वी. (है ) में प्रधान 
बजाने वाले के लिये; तार वाले बाजों पर | दाऊद का भजन । आर. एस 
वी. 7२, 8. ५.) में गायकमंडल के प्रधान के लिये : तार वाले बाजों के साथ । 


.. दाऊद का भजन ।'. बुल्गाता और सेपत्वागिता के अनुछूप नोक्स (६४०5 











अनुवाद में गीतों में अंत तक : दाऊद का भजब | डुठ विद्वानों का विचार 
दे कि उस शंकास्पद शब्द का अनुवाद प्रधान बजाने वाला या अंत तक' किया 
गया है 'विजय' या विजयी भी हो सकता ट्ठै। 


यह आवश्यक प्रतीत होता है. कि यहां एक विशेष श अर्थात 'सेला' का 


ज्षी उल्लेख किया जाय । यह शब्द शीर्षकों में तो नहीं परन्तु पुस्तक में ७१ बार 
: प्रयुक्त हुआ है (उ. भजन ४: २ और ४) । इसका मूल अर्थ है उठाना । वत्ड 


बह स्पष्ट नहीं है कि किस वस्तु को उठाना है. या ऊँचा करना है ।. क्या स्व॒रों 5 7 हा 


_ को ऊँचा करना है अथवा बाजों की ध्वनियों को, अथवा उपासनात्मक गदर हा 
जैसे आमीन' या 'हल्लिलुबाह का । पा 

कुछ आधुनिक विद्वानों का मत है कि कई भजनों से भजनों की मूल उपा- 
सना-गत पृष्ठ भूमि पर प्रकाश पड़ता हैं। 5 





( ) भजनों में परमेश्वर के नाम का पध्योग-पचग्रथ के विश्लेषण से यह ला 2 | 


रा 4 ज्ञात हुआ कि धर्मग्रंथ लेखक किन्‍्ही अंशों में एलोहीम (परमेश्वर) शब्द का और 7 


... अन्य अंशों में याहवे (यहोवा, प्रभु) का प्रयोग करता भजनों के संबंध में 
_.. भी यही बात सत्य है 








। भजना का विश्लेषण करने पर बड़ी रोचक बालें सामने 8 





पल ः के रूप में दाऊद की परंपरा ( 


० १६२ सा * 5 . प्‌ राना नियम की भूमिका 


. आती हैं : पहले भाग में याहवे का प्रयोग २७२ बार हुआ है और एलोहीम 


. शब्द का १५ बार ; दूसरे भाग में याहवे का ३० बार और एलोहीम का १६४ 


... बार प्रयोग हुआ है ; तीसरे भाग के प्रथम उपविभाग में (७३-८३) याहवे 
... का १३ बार और एलोहीम का ७ बार ; हितीय उपविभाग (८४-८९) 


. याहवे का ३१ बार और एलोहीम का ७ बार प्रयोग हुआ है ; चौथे और 


.. पांचवे भागों में याहवे का ही प्रायः प्रयोग किया गया है (१०८ और १०९:६ 


को छोड़कर ) । यह बात भी रोचक है कि १४ वें और ४० वें भजनों की, जिनमें 
याहवे का प्रयोग हुआ है, ५३ वें और ७० वें भजन में पुनरावृत्ति हुई है और 
उनमें एलोहीम का प्रयोग हुआ है । इन तथ्यों से इस पुस्तक की रचना के स्वमूप 
पर प्रकाश पड़ता है। आगे के अंश में हम इस विषय का विवेचन करेंगे । 


६. रचना, तिथि ओर रचयिता 


(१) “भजनों का रचयिता दाऊद' के प्रश्त पर विचार--यह एक बड़ी 


. समस्या है कि क्या दाऊद ने उन सब भजनों की रचना की जिनसे उसका नाम 


संबंधित किया गया है । ७३ भजन उसके नाम के हैं। परतु “दाऊद का भजन 


शब्दों से कितनी सीमा तक यह समझना चाहिये कि वे भजन दाऊद द्वारा रचे गए 


हैं, अथवा उससे यह समझा जाय कि किस सिद्धांत पर भजनों को उनके शीर्षक. 
. दिए गए हैं? भजनों की विषय सामग्री का कई बार शीषंकों से मेल नहीं... 
.. बैठता, जैसे भजन ३४ । इस भजन का शीर्षक है 'दाऊद का भजन जब वह अबी- 
... मैलेक के सामने बौरहा बना, और अबीमेलेक ने उसे निकाल दिया और वह 
.. चला गया ।' दाऊद अबीमेलेक के सामने नहीं गत के राजा आकीश के सामने 
...... निकाला गया था (१श. २१: १३) । परंतु भजन को पढ़ने से यह नहीं लगता... 
....... कि उस घटना से भजन की सामग्री का कोई संबंध है। ५१वें भजन में भी कुछ... 
.... न कुछ संशोधन अवश्य हुआ होगा, तभी तो उसमें यरूशलेम की चहारदीवारी 
... बनाने की प्रार्थना सम्मिलित है (५१:१५) । इसलिये भजनों के शीर्षक का _ 
... उपयोग करने में हमें सत्ता से काम लेना चाहिये । हमें यह ध्यान रखना चाहिये 
... कि उस युग में सर्वाधिकार सुरक्षित जैसी कोई बात नहीं थी और लोग दूसरे . 
....... की रचना को अपनी बनाकर उसमें संशोधन भी कर लेते थे। यह संभव है 
...... कि ऐसे समय आते रहते थे जब धर्माचरण का यह एक साधारण चिन्ह मावा.... 
.... जाताथा कि एक व्यक्ति अपनी प्रार्थना और स्तुति के लिये दाऊद या धर्ममय 
.. जीवन के अन्य संरक्षक की भावनाओं के साथ अपनी भावना को एकात्म कर... 
. लेताथा | इसके साथ यह भी निश्चित है कि 'इस्राएल के मधुर भजन गायक... 
२श. २३: १) का आधार इस तथ्य में रहा होगा... 
का महान प्रवंतकेथा।। 5 








कि इस्राएल जाति में दाऊद भः 






































ही 5 
2 
; रा 
300 
पर, 
हा 
५5 











भजन संहिता कक गे १६३ 


(२) भजन संहिता की रचना--भजन की पुस्तक एक संकलित रचना 
औै इस मान्यता के अनेक कारण हैं : (क) ऊपर जो संरचना श्रस्तुत की गई है 
उससे अनेक इकाइयों के विद्यमान होने के प्रमाण मिलते हैं । (ख) कुछ भज नों 
की पनरावत्ति हुई है, जैसे भजन १४ और ५३ में परमेश्वर के लिये भिन्न शब्द . 
के प्रयोग के अतिरिक्त सब पंक्तियां एकसी हैं। भजन ४०:१३-१७ और भजन 
७० एक से हैं, १०८ और ५७: ७-११ -+-६०:४-१२ एक से है । (ग) भजनों 
के लेखकों के अनेक नाम दिए गए हैं, जैसे दाऊद, मूसा, सुलेमान, आताव, कोरह 
आदि । (घ) परमेश्वर का नाम एलोहीम या याहवे विभिन्न भागों के अनुसार 
भिन्न है जिससे यह इंगित होता कि किसी समय ये विभिन्न भाग अलग अलग 

काई थे । 

(३) भजन संहिता का साहित्यिक विकास और रचना तिथि --यदि भजन 
संहिता एक संग्रह है तो यह निश्चित है कि विभिन्न भागा की रचना-तिथि मिन्न 
गेगी और किसी तिथि के उल्लेख से यह संकेत होगा कि पुस्तक का अंतिम रूप कब 

मिला, अथवा अघुक अमुक भजन कब लिखें गए । यदि विभिन्न भजनों के लिग्रे 
तिथि दी जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि कई तिथियां श्रस्तुत होंगी। भजन 
: संहिता के कुछ भाग तो बहुत प्राचीन काल से प्रचलित होंगे, अर्थात दाऊद के 
काल से जैसे भजन २३ या उससे पहले के । कुछ निर्वासन के समय (उदा.१३७) 
अथवा निर्वासन के पश्चात (उदा. १४७:२) जोड़े गए होंगे। इस प्रकार भजनों 


... की तिथि का निर्धारण इब्रानी इतिहास के किसी भी काल में ई. पू. १००० से 


. ई. पृ. १५० तक किया जा सकता है। खिस्तीय कलीसिया की अधिकृत गीत 
की किताब या पस्तक में कई युगों के गीत संकलित उसी प्रकार भजन संहिता 


.. को, जिसे दूसरे मंदिर अर्थात जरूव्वाबेल के मंदिर की गीत-पुस्तक भी कभी कभी 





कहा जाता है, इब्रानी भक्ति-गीतों की पूरी परंपरा का संकलन मानता जाना हा 


हिये | इसके अतिरिक्त जिस प्रकार खिस्तीय कलीसिया की गीत-पुस्तक के... 


गीतों का इस दृष्टि से संगोधन होता रहा है कि उनसे विश्वास की वृद्धि में 
अधिकतम सहायता प्राप्त हो, उसी प्रकार यह संभव है कि बदलती हुई 


न आवश्यकताओं के संदभ में मूल गीतों में परिवतेनत और संशोधन किया गया हो. हा ४ | | | । | 
. इसके पूर्व कि उन्हें वह रूप प्राप्त हो जिस रूप में वे आज विद्यमान हैं।विद्वानों 


. ने भजन संहिता के साहित्यिक विकास के च रणों का विश्लेषण किया है । 


ऊपर हम शीर्षक और परमेश्वर के नामों का प्रयोग जैसी साहित्यिक. 


हा . विशेषताओं का उल्लेख कर आए हूं। साथ ही हमने कुछ भजनों की विषय __ रा 
... सामग्री पर भी दो शब्द कहे इनके आधार पर यह अनुमान किया जाता... 
.. हैं कि दाऊद का भजन या आसाप का ' 








शीर्षक वाले भजन, इससे... |] 








. दाऊद की द्वितीय भजनन्संहिता (५१-७२ ) 








१९४ पुराने नियम की मूलपाठ 





ले कि वे वतंमान भजन संहिता में संकलित हों, संकलन रूप में विद्यमान 


दाऊद की प्रथम भजन-संहिता (३-४१) -|१ और २"पहिला भाग ) 
ह | 
| 


द एलोहीम ] दूसरा | - 
. आसाप की भजन-संहिता (५०,७३-८३) # क्षजन-संहिता | और | ४ 
कोरह की भजन-संहिता (४२-४६ ) ट/ द | तीसरा | 7 
. यात्रा की भजन-संहिता (१२०-१३४) --हल्लिलूयाह भजन, |) भाग ५ 
| इत्यादि चोथा | ् 
(६०-११९; १३५-. | | प्‌ 
॥ भाग | 


भजन संहिता का पांच भागों में विभाजन कदाचित्‌ विकास का अंतिम 
चरण रहा होगा, क्योंकि यह द्रष्टव्य है कि चौथे और पांचवें भागों में विभाजन 
ल्लिलयाह भजनों की मल इकाई के अंतर्गत प्रतीत होता 
७. भजतों की मल पृष्ठ भमि 


पुराना नियम संबंधी अधुनातन विद्वानों की रुचि इस ओर है कि उन भूल 
उपासना या आराधनागत परिस्थितियों की खोज करें जिनमें ये भजन उपयोग 


.. में आते थे । कुछ भजन तो निश्चित रूप से विशिष्ट उपासना पद्धतियों से 






: संबंधित हैं । उदाहरणर्थ, हल्लिलयाह भजन हैं । वे जैसे पहले फसह के पर्व. 


.... पर उपयोग में लाये जाते थे, बैसे आज भी लिये जाते हैं। जब यीशु और 
..... उसके शिष्यों ने अंतिम भोज के समय भजन गाया (मर' १४:२६), तो बह 
... अवश्य हल्लिलयाह भजमनों में से एक रहा होगा । परन्तु अन्य भजनों की मूल 






हा | ० | पष्ठ प्रमि मानव-स्मति में नहीं रह गरह, विशेषक ञ््‌ यदि | इस्राएल का निर्वासत के 
... पूर्व उपासना पद्धति से संबंधित थी। आधुनिक काल में पश्चिमी एशिया के 
... संबंध में जो कुछ जानकारी खोज द्वारा प्राप्त हुई है उसके आधार पर आज 






मा के विद्वाल भजनों की मूल पृष्ठभूमि को जानने की चेष्टा कर रहे हैं । 





कुछ खिस्तीय गीत किसी विशेष परिस्थिति के संदर्भ में लिए गए और 


..... बाद में अन्य परिस्थितियों के संबंध में भी उत्तका उप्रयोग किया गया । संभव... च्ट 
-.. है ऐसी बात कई भजनों के संबंध में घटी हो । संभव है कि दाऊद या राजाओं 


मा 2! के प्रारंभिक काल में उपासना के लिए किसी भजन की रचना हुई हो, जिसमें रा 








ना में राजा को प्रमुख स्थान दिया गया । हर रा 














भजन संहिता. रद 


यही भजन निर्वासनोतर काल में साधारण सामूहिक गान के लिए उपयोग में 
आया हो । द का! क्‍ 
यह बात अब पूर्णतया स्वीकार की जाती है कि पश्चिमी एशिया के देशों 
के लोग अपने राजाओं को ईश्वरीय कृपा के विशेष माध्यम माना करते थे। 
वास्तव में वे उन्हें अपने राष्ट्रीय देवताओं के दृश्य प्रतिनिधि स्वीकार करते _ 
नुतन वर्ष' के आरंभ में विशेष धर्मानुष्ठान होते थे जिनके आधार पर 
पूर्ण वर्ष के भाग्य या प्रवाह का निर्धारण होता था । बाबुल में एक अनुष्ठान 
होता था । उसे अकितु (3|ध7०) कहते थे । उसके अंतर्गत एक विधि यह 
होती थी कि राष्ट्रीय देवता को किसी अस्थायी स्थान पर ले जाया जाता था, 
राजा को कुछ समय के लिए गद्टी से उत्तारझर उसका सानमर्देत किया जाता 
था, एक दिखावटी युद्ध होता था जिसमें राजा के समस्त शत्रुओं को पूर्णतया 
पराजित किया जाता था -- जैसे अंधकार की शक्ति का विनाश कर मादुंक ने 
व्यवस्था या प्रकाश जगत में स्थापित किया था--और राजा का राज्य पूर्णतया 
स्थापित किया जाता था, राजा को पुनः: सिंहासन पर बैठाया जाता था और 
देवता की मूति को अपने स्थान में ले जाया जाता था। तत्पश्चात्‌ वर्षे भर के 
लिये घोषणाओं द्वारा भाग्य का निर्धारण किया जाता था और राजा का 
पावन विवाह होता था, जिसके द्वारा राष्ट्र की उवरता और समृद्धि का निश्चय 
ताथा।! 

.. क्या राजाओं के काल में इस्राएलियों में कोई इस प्रकार का अनुष्ठान 
था ? यदि था तो यह बड़ा विचित्र जान पड़ता है कि उसका कोई प्रमाण न 
मिले । संभव है कि २रा भजन राजा की राजगद्दी-जयंती के लिये काम में 
आता हो, २४वीं भजन उस चल-समारोह के लिए जिसमें वाचा के संदूक की 
मंदिर में पुनप्नंतिष्ठा होती हो और ४७ वां भजन उस पुनप्रतिष्ठा के अवसर 





के लिए काम में लिया जाता हो । संभव है कि भजन १८ और २० राजाओं के... 


पनः सिहासनासीन होने के लिये प्रयोग किया जाता था, १८ वें भजन का. 

. कदाबित राजा स्वयं उच्चार करता था और २० वां भजन पुरोहित द्वारा. 
. बोला जाता था, और €३ वें भजन के द्वारा अनुष्ठान अपनी चरमसीमा पर 

.. पहुंचता था । मूलभूत रूप से ही इस्राएलियों के नूतन वर्ष का समारोह अन्य 

.. जातियों के समारोह से भिन्न होता होगा क्‍योंकि याहवे अन्य देवी देवताओं से 
.. भिन्न था। इस्राइल के राजा का भाग अनुष्ठान में मानव रूप तक ही सीमित 
.. होगा, परंतु प्रथाओं में कुछ न कुछ साम्य अवश्य रहा होगा। यदि इस्राएली 


.... लोग भी ऐसा नूतन वर्ष समारोह मनाते थे तो ररा भजन जैसे भजन के संशोधन... 
.... का कुछ रोचक इतिहास अवश्य होना चाहिए । पहले पहल उसका उपयोग किसी... 


५७ 

















लपह्द यु हे पुराना नियम की भूमिका 


_ राजा विशेष के सिहासनासीन होने के समारोह में किया गया होगा। परंतु 
 इस्राएल जाति के भक्त लोग, जो २ शमृूएल ७:१२-१६ में प्रस्तुत ईश्वरीय 
प्रतिज्ञा पर विश्वास करते थे और एक आदर्श राजा या मसीह की आशा करते 
_ श्रे, इस भजन का उपयोग भविष्य की आशा के संबंध में करते होंगें। अतएवं 
. जब निर्वासन काल में इस्राएलियों का राजतंत्र समाप्त हो गया तो भी इस भजन 
का मसीह संबंधी अर्थ चलता रहा । इस प्रकार आलोचना एवं ऐतिहासिक 
.. दृष्टि से जो राजा संबंधी भजन' है, वह यहूदियों और मसीहियों के भाव- 
. जगत में उतनी ही सच्चाई के साथ मसीह संबंधी भजन बन गया है । 


८. धर्म शिक्षा 

भजनों में इस्राएल जाति के भक्तों के भावों और मनोदशाओं की अभि- _ 
व्यक्ति है। कविता में तर्कबद्ध विचारों की अपेक्षा भावसागर की अभिव्यक्ति 
होती है। ये भजन कविता हैं। इसलिये उनमें धर्मसत्यों का क्रमबद्ध कथन 
नहीं, वरन मर्मस्पशिनी अभिव्यक्तियाँ हैं। उदाहरणार्थ कई स्थलों में ऐसी 
पंक्तियाँ हैं जिनसे यह व्यंजित होता है कि बलि चढ़ाना आवश्यक नहीं है. (४० 





शि 007 400 9), र्स्तु कई पंक्तियाँ ऐसी भी ञ जिनमें ह " : ि ५ 


यह व्यंजित है कि मंदिर और बलि चढ़ाना दोनों आवश्यक हैं (६६:१३-१४५; 


.... ११६:१४, १७) । इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए भजन संहिता की शिक्षा. 
... का निम्नलिखित रूप में संक्षिप्त विश्लेषण किया गया है हु 


. (१) परमेश्वर के प्रति भक्तिभावता--हमें प्रत्येक स्थिति. में परमेश्वर 


.. के पास जाने की चेष्टा करना चाहिये। परमेश्वर पर सदा भरोसा करना चाहिये 
[रे ७:५३ १६ २७:१), क्‍योंकि वह अपने प्रेम, करुणा, सच्चाई और 


धाभिकता में पूर्ण है. (१०३:८, १३; १६:७ क्र,, ६३:१-२) । पश्चाताप 


..... सहित उसके पास जाना चाहिये (५१:१) । उसकी पवित्नता की इच्छा हममें 
.. होना चाहिये (८5५४:२;१६:१३)। जब शंकाएँ और दुःश्चिंताएं हमें घेरती हैं 


. जब जोखिम और विपत्ति हम पर पड़ती है, तब भी हमें उसके पास ही जाता क्‍ 


_. चाहिये (२२: १; ३९: १२, १३) । उद्धार और विजयोल्लास के समय उसे 
|... नहीं भूलना चाहिये (४०:१-३ ) । उसकी व्यवस्था एवं नियमों के माध्यम 
सह से हमें उसके पास आना चाहिये और उनसे भी प्रेम करना चाहिये (१६:१०; न्‍ 

5 0१११:७६;: १:२) जा मम 8 ० 
|... (२) हृदय प्रधान धर्म--परमेश्वर की उपासना संपूर्ण हृदय से करना... 





सा, हिए (५१:१०) । परमेश्वर की आज्ञानुसार और इस्राएल की प्रथानुसार हा 


2 बलि चढ़ाना चाहिए, परंतु बलि चढ़ाना हृदय से होना चाहिये, प्रथा मात्र ः 











भजन संहिता जी 


नहीं (५१:१६; ४०:८०) । भजन-संहिता के धर्म में यह प्रस्तुत है कि हृदय 
की भावना और बाह्य विधि विधान में समन्वय होना चाहिए (५०:१३-१४; 
६६:१३-१५) । परमेश्वर के प्रति हमारे कतंव्य के भाव पक्ष और विधि पक्ष 
दोनों ही में हृदय प्रधान धर्म अनिवार्य है । 


०७ 


सृष्टि में परमेश्चर की महानता की प्रशंसा की गई है। सृष्टि की सब बस्तुएं 
उसकी सामर्थ एवं महिमा का वर्णन करती है (१९:१; १०४:२,२४ ) । पृथ्वां 
उसके चरणों की चौकी है (६६:५; १३२:७), मेघ उसके मंडप के परदे हैं 
(१८:१०, ११), गन सागरों पर उसका शब्द है, बिजली उसके बाण हैं 
(७७:१७, १८) । जो कुछ सृष्टि में घटित है वह उसके विधान अनुसार है 

 (१०४:१६ क्र.) । यद्यपि उसकी सामर्थ और प्रभुता इनके माध्यम से दिखाई 
. देती है, तथापि वह इनसे महान है और स्वर्ग में इनसे परे है (६२:८;६६९:२; 
. ११३:४,५) । 


(४) परमेश्वर की भलाई--परमेश्वर धामिकता, न्याय और सत्य की 


(३) परमेश्वर की महानता के लिये उसकी स्तुति--भजनों में बार-बार 


.. दृष्टि से केवल अच्छा ही नहीं है (५९: १४), वरन वह अपने लोगों इस्राएल 





जाति के साथ भला भी है। उसने इस्राएल को चुना, और उन पर अपनी 
अपार करुणा अनेक रूपों में प्रकट की (७८; १०५; १०६) । उसने अपने 
लोगों को आशिष दी कि उन्हें अपने मार्गों की शिक्षा दे (१०६:८) । उनके 
. भले के लिये उसने दंड भी दिया (१०६:४३, ४४ इत्यादि) । अपने राज्य के. 
विस्तार के लिये उसने इस्राएल को चुना (६१:१,२,७) । इस प्रकार इस्राएल 

जाति उसके निज लोग रहे (५८०:१) । इस्राएल के शत्रु उसके शत्रु हैं और 
उनकी सफलता उसकी विजय है । द हे 
- इस्राएल जाति की यह चेतना कि वे उसके निज लोग हैं एक तीकब्र देश- 
भक्ति की भावना में व्यक्त होती है । इस देशभक्ति में अन्य जातियों से एक 
श्रेष्ठा की भावना और एक पृथकता की भावना भी आ गई है (७०:१० 


) | इस देशभक्ति की भावना को उस युग के ऐतिहासिक समय एवं धर्म- 
वेज्ञानिक सत्य के संदर्भ में समझना चाहिए। भजन उस युग में लिखे गए 


जिसमें धारमिक विश्वास और राष्ट्र या जाति के ऐश्वर्य को परस्पर आधारित... 


.. माता जाता था । फलस्वरूप विश्वास के प्रति समर्पण को देशभक्ति या जाति- 
भक्ति में व्यक्त किया जाता था। इसके अतिरिक्त खिस्तीय धर्म विज्ञान की _ 


... दृष्टि से हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर ने वास्तव में इस्राएल को अपनी जा 
.... निज प्रजा के रूप में इसलिए चुना कि उसमें से जगत का उद्धारकर्ता उत्पन्न ५ मत 











पृश्द ..... पुराना नियम की भूमिका 


_ हो। अतएब जब भजन लेखक इस्राएल के प्रति परमेश्वर की भलाई का वर्णन 
.. करते हैं, तो वे मानों उन सब के लिए लिख रहे हैं जो खिस्तीय प्रकाशन पर 
विश्वास करते द हे हट 

भजन लेखकों के आत्म-धाभिकता के कथनों को भी इसी संदर्भ में देखना 

ए (३५:१३, १४; १३६:२१-२४; ११३) । इन कथर्नों में लेखक को 

.. रुचि इस बात में नहीं है कि वह अपने को दूसरों से श्रेष्ठ बताए परंतु इसमें है 

कि वह अपने को परमेश्वर के विरुद्ध नहीं, वरन्‌ परमेश्वर की ओर प्रदर्शित: 
करे । इन कथनों को गर्व नहीं, समर्पण के रूप में देखना चाहिये, क्या 

इस्राएल की योग्यता न होते हुए भी परमेश्वर की करुणा और भलाई उस पर 

थी और यदि उनमें अहंकार आ जाए तो वह उनके विनाश का कारण 

होता था । 2 ३ | 
शापात्मक भजनों में (५८; ६५; ६९; १०६) शरक्तुओं के प्रति जो बदले 
की भावना मिश्रित आक्रोश है, उसके संबंध में भी हमें उपरोक्त दृष्टिकोण को 






































होने या उससे प्रेम करने में उसके शत्रओं से ढ्वेष करता निहित है (१३६:२१) 
इसमें किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता, किसी प्रकार का मध्यम मार्ग 
.. नहीं है। यदि वाचा के आज्ञापालन के द्वारा इख्राएल परमेश्वर की ओर है, तो 

.. परमेश्वर के शत्रु इस्राएल के शत्रु हैं और इख्राएल के शत्रु परमेश्वर के शब्त्‌ हैं 
.. उन शत्रुओं के प्रति परमेश्वर का न्याय परमेश्वर के न्याय एवं सामर्थ की अभि- 
.. व्यक्ति है, जिससे इस संसार में नैतिक व्यवस्था बनी रहे । इसके अतिरिक्त, 


हो पाया था (दे. ११५. १७) और नई वाचा की भी अभी तक स्थापना नहीं 
... हुई थी जिसके आधार पर अपने बैरियों से प्रेम करना संभव होगा (मत्ती ५: 
... ४४) । इसलिये भजन लेखक के मन में यह विचार था कि वर्तमान जीवन में . 

.. ही परमेश्वर के न्याय की अभिव्यक्ति होना आवश्यक है । रे 

... (५) मसीह- भजनों में मसीह के विषय कथन हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर 

. अपने अभिप्राय की पूर्ति और अपने राज्य की स्थापना करेगा । मसीह संबंधी 







है परंतु यह भी बताया उ 
इस तथ्य में बाधा नहीं आर्त 














. अंतिम एवं पूर्ण न्‍्यायनिष्ठता सहित भावी जीवन का प्रकटीकरण अभी तक नहीं... 


... भजन अनेक कोटि के हैं। कुछ भजन ऐसे हैं जिनमें उसे व्यक्तिगत छुड़ाने हारे के... 
... हे में प्रस्तुत किया गया है (२,७२,११० ) । यह द्रष्टव्य है कि बाइबली साहित्य... 
_....... के विद्वान इन भजनों को किसी राजा विशेष से संबंधित और विशेषकर उसकी 

......  राज्याभिषेक जयंती से संबंधित मानते हैं । ऊपर इसका उल्लेख किया जा चुका 
चुका है कि इनके ऐतिहासिक उद्भव के कारण | 
ये भजन मसीह संबंध आशा के माध्यम बन 














भजन संहिता 3... 2 


गए। इन भजनों का मसीह संबंधी अर्थ परमेश्वर के प्रकाशन से उत्तरोत्तर सम- 
स्वित है। कुछ भजन ऐसे हैं जिनमें आनेवाले युग की तेजोमय आशिषों का 
वर्णन है। यह युग प्रभु के दिन से प्रारंभ होगा और उससें धर्ममय न्याय और 
महिमा होगी (६६: १३; ६5: ६) । यद्यपि इन नजमनों में एक व्यक्तिसंपन्न मसीह 
का उल्लेख नहीं है, तथापि वे इस अर्थ में मसीह संबंधी हैं कि उनमें मसीह के. 
राज्य का उल्लेख हुआ है । २२ वां भजन भी इस अर्थ में मसीह संबंधी भजन 
3 कि उसमें परमेश्वर के विश्वस्त दास की गह॑नतम आंतरिक दुःख की अभिद- 
यक्ति है । यह दुःख, असीम दुःख यीशु खिस्त, 'मसीह' ने समस्त मानव जाति 
का प्रतिनिधि होकर मानव जाति के लिये वास्तविक रूप में सहा। यद्यपि कि 
इसका मसीह संबंधी अर्थ भजन के लिखे जाने के समय ज्ञात नहीं था परंतु यीशू 
मसीह में उस अर्थ की पूर्ति से इस भजन का मसीह संबंधी लक्षण दिखाई 
देता है । 

.... (६) निर्दोष के दुःख उठाने की समस्या-भजन लेखक “निर्दोष के दुःख उठाने 
की समस्या से उलभते हुए दिखाई पड़ते हैं | बार बार वे यह पुकार उठते हैं कि 
दुष्ट लोग पराक्रमी और ऐसे फैलते हुए देखे जाते हैं जैसे कोई हरा पेड़ अपनी 

निज भूमि में फैलता है, और धामिक एवं भले लोग दुःख उठाते हैं (३७, ७३) । 
इस समस्या का जो सामान्‍य हल प्रस्तुत किया गया है कि दुष्ट की समृद्धि थोड़े 

दिन की है, उससे पूर्ण संतोष नहीं होता, जैसे अय्युब को नहीं हुआ । साथ ही 
अनेक भजनों में दु:ख की समस्या का विवेचन न करते हुए लेखकों ने परमेश्वर 
के शासन पर अपने विजयी विश्वास की घोषणा कर मन में संतोष श्राप्त कर 
लिया है (६६. १; ६७: १) । फिर भी हम यह कह सकते हैं कि ७२ वें भजन 
में नये नियम के सत्य का आभास है। इस भजन में जब इस समस्या के कारण 
भजन लेखक की बुद्धि चकराने लगती है तो वह परमेश्वर के पवित्वस्थान जे 
उसकी संगति में, उसकी उपस्थिति में उसका उत्तर पाता हैं और सारे भविष्य... 
को उसके हाथ छोड़ देता है (७३: १६-१७, ९३-२* )। परमेश्वर स्वयंही 
मानवीय इच्छाओं की इतनी प्रचुर पूर्ति है कि अन्य समस्याएं नगण्य हो जाती है ०: 
और उन्हें भूला जा सकता है। ४ न 

























 अट्ठाईसबां प्रध्याय 
नोतिवचन 
१. शीर्षक 
ब्राती में इस पुस्तक का ताम सिशले शलोमो (सुलेमान के नीतिवचन ) 
| सक्षिप्त रूप मिशले है । मिशले या मिशलीम शब्द मशाल का बहुवचन है, 


जिसका अर्थ प्रतिवेदन है, जिसका अर्थ यह है कि वहु कथन के अतिरिक्त और 
कुछ को भी प्रस्तुत करता है। यह शब्द तुलना के लिये, उपमा, दृष्टांत अथवा. 


गलप के अर्थ में भी [काम में लाया जा सकता है परंतु सामान्यतया इससे... 


मानवीय जीवन और नीति पर सुृक्तियाँ (संक्षिप्त पैने कथन) ही परिलक्षित 
होते हैं । द 


तुलना, उपमा, रूपक या सूक्तियाँ है। बुल्गाता में इसका पर्याय प्रोबरबिया है 
(27०ए०८००४७ ) जिससे अंग्रेजी वाम प्रोवर्व बना है। भारतीय भाषाओं में मूल 


... इब्रानी शब्द का अनुवाद किया गया है। इस प्रकार हिन्दी में इस पस्तक का 
... शीर्षक 'नीतिवचन है । ५२ 






कलीसिया के पितगण इस पस्तक को 'सलेमान के नीतिवचन या प्रज्ञा गंथ, 


... के नाम से जानते थे। यह नाम तोबित-मकाबी समूह की एक पुस्तक को भी _ 





... दिया गया है। इस प्रकार इन दोनों पुस्तकों के नाम के संबंध में कई बार गड़- 
.. बड़भाला हो जाता है। ० आह 
.._२. विषय सामग्री का सारांश 


... नीतिवचन की पुस्तक में कविताओं और कहावतों का संकलन है । कवि- 
_ ताओं में मनुष्य के लिये परमेश्वर की योजना में बुद्धि के महत्व पर बल दिया. 


..... गया है, और कहावतों में बुद्धि और नैतिक चालचलन के विधिन्न पक्षों पर... 


. अभिव्यक्तिकी गई है। * 
.. ३. रूपरेखा 








नौतिवचन--बुद्धिमान की बुद्धिपूर्ण बातें और सम्मति 
(१) वृद्धि की खोज के लिये प्रबोधन (१-६) 





सेपत्वागिता में इसका शीषंक परुयूमय (?0फंक्यं) है। इसका अर्थ. 











रह 





नीतिवचन | - २०१ 


लेखक अपने शिष्य से कह रहा है । उसे वह अपना पृत्र' कहता है । लेखक 
अपने पुत्र को परीक्षाओं के और उन लोगों के संबंध में जो बुद्धि और शिक्षा 
को तुच्छ जानते हैं, चेतावनी देता है (१); बुद्धि सदजीवन और परमेश्वर के 
भय का मार्ग है (२-७); लेखक मू्खंता को नहीं वरत्‌ बुद्धि को अपने मार्ग 
दर्शक और मित्र के रूप में अपनाने का आग्रह करता है (5-६) । 
(२) सुलैमान के नीतिवचन (१०:१--२२:१६ ) 


इस' भाग में ३७४५ स्वतंत्र कहावतें या लोकोक्तियाँ संकलित हैं । किसी 
विशेषक्नम में संकलन नहीं है । ये साधारणतया विभावी समांतरता में प्रस्तुत 


हैं। ये मानवी आचरण पर द्विपदों के रूप में लौकिक और धामिक लोको- 
क्तियां हैं । 


(३) बुद्धिमान के वचन (२२:१७-२४:२२) 


ये द्विपदों से कुछ लम्बे रूप में हैं । पहले भाग के समान ये भी 'मेरे पृत्न को 
संबोधित हैं। इनकी विजय सामग्री पड़ोसी के प्रति कर्तव्य और मद्य-त्याग है । 


(४) बुद्धिमान के अन्य वचत (२४:२३-३४) 


ये वचन पिछले अंश के समान हैं और उसके परिशिष्ट जैसे हैं। उनकी 
विषय सामग्री पड़ोसियों के प्रति कत्तव्य और आलस्य-त्याग है । 


(५) हिजकिय्याह संकलन (२५-२९) 


ये सुलैमान के नीतिबचन हैं जिनकी यहुदा के राजा हिजकिय्याह के जनों 
ने नकल की थी । ये दूसरे भाग के तीतिवचन के समान हैं परंतु द्विपदों का. 


82 58: 


ना कठोर पालन नहीं हआ इनमें विभावी समांतरता के साथ पर्याय 


और समन्वित समांतरता का प्रयोग विशेष रूप से हुआ है | दूसरे अंश के समान 
. ही इसमें मावव आचरण संबंधी लौकिक और धामिक लोकोक्तियाँ हैं। इनमें 
से कई तो दूसरे अंश की लोकोक्तियों की पुनरावृत्ति मात्न हैं। दूसरे भाग को 
अपेक्षा इस भाग में राजा अधिक उदास प्रतीत होता है । 


(६) याके के पृत्र आगर के प्रभावशाली वचन (३०:१-१०) 
इस छोटे अंश में ईश्वरीय बुद्धि और मनुष्य की दीनता पर सूक्तिर्याँ हैं । 
(७) संख्यागत नीतिवचन (३०:११-३३ ) 





































श्ग२रः . पुराना नियम की भूमिका 
(८) राजा लमृएल की माता के प्रभावशाली वचन (३१:१-९) 
राजमाता अपने पतन्नकों उत्तम राजा के सदगण बताती है 
. (६) भली पत्नी की प्रशंसा (३१:१०-३१) द 
.. इनमें आदर्श पत्नी के गणों का बर्णमालात्मक क्रम में वर्णन है--परिश्रम 
मितव्ययता, दरदशिता, सहायता, उदारता, बृद्धिमानी और सुन्दर चालचलन । 


टिप्पणी : सेपत्वाशिता में इन भागों का क्रम भिन्न है। यदि हम विभिन्न 
भागों को ऊपर दिये हुए अंकों से इंगित करें तो सेपत्वागिता का क्रम निम्न 


लिखित होगा : (१), (२), (३), (६), (४), (७), (5) (६), (५)। 


४. रचना, रचयिता, रखना तिथि 
(१) रचना एवं साहित्यिक विकास, तिथि-ऊपर रूपरेखा से यह स्पष्ट 
और यह कहा भी जा चुका है कि तीतिवचनन की पुस्तक एक संकलन है । पुराने 


नियम की कुछ अन्य पुस्तकों के समाव इस पुस्तक का वर्तमान रूप भी धीरे- 


धीरे बढ़ते हुए बना है। यह सामानन्‍्यतया स्वीकार किया जाता है कि इस पुस्तक 


में प्राचीनतम संकलल सुलेमान के नीतिवचन हैं (१०: १-२२:१६ ) । अर्थात्‌ द ड़ हि हा 
रूपरेखा का भाग २, जिसके साथ प्रज्ञाग्रन्थ के महान संरक्षक सुलैमान का ताम _ 


जुड़ा हुआ है। यह संकलन लगभग ई. पू. ८०० में गरीगा । बाद में कदा- 

चित तीसरा और चौथा भाग परिशिष्ट के रूप में जोड़ा गया। 

हा दा के राजा हिजकिय्याह (ई. पृ. ७१५-६८७ ) के सेवकों ने सुलमान के 
 तीतिबचनों का एक और संकलन किया। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रथम संक- 


....._लन से स्वतंत्र यह संकलन किया गया, क्योंकि कई वचन दोनों में पाए जाते हैं । 
मा इससे अनुमान किया जाता है कि इन दोनों में समान वचनों के लिये कोई 
... सौंखिक परंपरा रही होगी । 
....... सलमान के बचनों के ये दोनों संकलन (भाग २ और ५) परवर्ती काल 
..... में कदाचित निर्वासन काल में एक किए गए । उस युग में अतीत के लेखों को... 
...... खोजा गया और उनका संपादन कर उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिये स्थायी 
रूप दिया । पुस्तक का अंतिम भाग (भाग ७ और ६) निर्वासन काल के पश्चात्‌... 
-..... जोड़े गए और अनुमान है कि ई. पृ. २५० में इस पुस्तक का वर्तमान रूप हो 
...... गया। इस समय सप्तति अनुवाद का काये किया गया । इस बात से कि उन्होंने... 
.... इअपुस्तक के विभिन्न भागों को कुछ भिन्न क्रम में रखा यह इंगित होता है कि... 
..... पुस्तक के निश्चित क्रम की व्यापक स्थापना अभी तक नहीं हो पाई थी और... 
.. कि इस काल के आस पास ही विभिन्न अंशों को एक पुस्तक में संकलित किया... 








गया था | 








6 “' 
हि 
न । 








नीतिववचन............|||॥|+ २९३ 


(२) लेखक-इस पुस्तक में अनेक लेख कों की रचनाएं हैं | इस तथ्य की 
पुष्टि पुस्तक के संकलन रूप से होती है। हमारी रुचि इस विशेष तथ्य में है कि 
सुलैमान के साथ रचनाकार के रूप का कहाँ तक संबंध है। यह बिलकुल 
निश्चित है कि बुद्धि और लोकोक्तियों कथन के संबंध में सुलैमान की अपूर्व 
ख्याति थी (१श. ४: २६-३४) । पुस्तक के दो भागों के साथ निश्चित रूप 
से उनका ताम जुड़ा हुआ है । अन्य भागों को सुलेमान के नाम के साथ जोड़ना 
आवश्यक नहीं है । यदि यह कहा जाए कि शीर्षक में सुलभान का नाम ह ता 
हम यह कह सकते हैं कि पुस्तक का शीर्षक पूरो पुस्तक के लिए दिया गया है 
और यह आवश्यक नहीं कि उसके सब भागों पर शीक्षक लागू किया जाए । 
इस बात की पृष्टि इससे होती है कि शीर्षक (१:१) के बाद ही बुद्धि के 
महत्व का विश्लेषण किया जाता हे 


कर. ् 


और पांचवें भागों में हैं ? यह बताया जाता हैं कि इनसे से कई लोकोक्तियाँ 
. उसके कथन योग्य नहीं हैं। उदा रणार्थ राजाओं के कुछ उल्लेख (१६: १० 
: १४: २०:२, 5५, २८; २५: २, ६) राजा के दृष्टि कोण से नहीं वरन प्रजा 
के दष्टिकोंण से लिखे गए हैं। साथ ही उस व्यक्ति के मुंह से, जिसकी कई 
रानियाँ और रखेलियां थी, एक पत्नी की प्रंशसा संबंधी वचन कुछ उचित अतीत 
नहीं होते (११: ४; दे. १रा. ११: हे ) । ऐसे ऐसे तथ्यों के कारण हमें निश्चित 
रूप से सुलैमान को लेखक मानने में कुछ सतकंता से काम लेना पड़ता है | इूस्रा- - 
एल में सूक्तियों के महान प्रवंतक और संरक्षक के रुप से सुलसान वास्तव में 
प्रमुख केन्द्र बन गया जिसके आसपास सूक्ति साहित्य की विशाल राशि बन गई । 
कहना असंभव है कि सलैमान स्वयं ने इन सूक्तियों में से कितनी गढ़ी या 

8 और इस कोटि के साहित्य की सरिता में कितनी अन्य बू दियां मिल गई) 


क्या सुल॑मान सभी वचनों का रचयिता था, जो उसके नाम से द्सरे 


हमार लि | तना ज त्तवा प्यापष्तृ कि ख्खाहउल जाति मर सलमा ते को लीको- गे 


क्ति प्रज्ञासाहित्य का पिता माला जाता है । 
५. नीतिबचन की पुस्तक में सा हित्यिक सर्मातरता 


बचार किया जाता है कि उनके तथा इब्रानियों के साहित्य के बीच आदान- ह 


प्रदान हुआ होगा। बावुल की पुस्तक बुद्धि की सम्मति' (00प्राषइ़्टड ० शरा5- ता 


... 609) में पाठक को संबोधित करते हुए 'मेरे पृत्र' शब्दों का प्रयोग किया गया ! 


. है, जैसे नीतिवचन के पहले और तीसरे भाग में किया गया हैं, और उनमें. 
.. विचारों में भी समांतरता हैं । उदाहरण के , लिये नीतिवचन १३:३ के साथ... 





... “सम्मृति' की निम्तलिखित पंक्तियों की तुलना कीजिए 
























.. पुराना नियम की भूमिका 


तुम्हारे मुंह में लगाम हो, तुम्हारे कथन संयमित हों । 


४ 


मनुष्य की संपत्ति के समान, तुम्हारे ओंठ मुल्यवान हों 


..... ऐसा माना जाता है कि अरामी भाषा में जो 'भहिकार के वचन' हैं, उनका 
... उद्गम मेसोपोतेमिया से अश्शर के राजा सन्हेरीव और एसारहद्दीन (ई. पृ. 

..._ ७वीं सदी) के समय में अहिकार एक ज्ञानी पुरुष था। उसकी निम्नांकित 
. सूक्ति से नीतिवचन २३:१२-२४ की तुलना कीजिए : द 


पृत्न को यदि अनुशासन एवं शिक्षा दी जाए और उसके पाबों में यदि जंजीरे 
हों तो वह फले-फूलेगा । अपने पुत्र को छड़ी से न बचा, अन्यथा तू उसे दुष्टता 
से न बचा सकेगा। है मेरे पृत्र यदि मैं तेरी ताड़ना करूँ तो तू नहीं मरेगा 

.. परंतु मैं यदि तुझे तेरी इच्छा पर छोड़ दूँ, तो तू न जीएगा ।* 


यह माना जाता है कि इब्रानी प्रज्ञा साहित्य पर मिस्री प्रज्ञा साहित्य 
का प्रभाव बाबुली प्रभाव से अधिक है। इस संदर्भ में सब से महत्वपूर्ण मिस्री 
प्रज्ञाग्ंध “आमेन-एम-ओपेत की सीख' है । नीतिवचन २२:१७--२४:२२ 





_ (बुद्धिमान के वचन) और इसमें कम से कम सोलह समांतर कथन हैं। टीका- 


. कारों का विचार है कि नीति. २२९:१७--२४:२२ के वचन इस सीख पर 

_ आधारित हैं । उदाहरण के लिये नी, २३:८ की निम्नलिखित पंक्तियों से तुलना 
कीजिए द न 

तूने अपने मु ह में बहुत बड़ा कौर निगल लिया है त्‌ उल्टी करेगा 

.... तू अपनी भली वस्तु से भी रिक्त हो जाएगा । 

.. संपत्ति के विषय में आमेनएस-ओपेत का कथन नी तिवचन २३:४५ के समान है : 


.. उन्होंने हंस के पंखों के समान पंख लगा लिये हैं, 


कक 


... और आकाश की ओर उड़ गए हैं । 


_ नीतिवचन की पुस्तक में इस प्रकार विचार साम्य से यह प्रकट होता है. 


...... कि इब्नानी संस्कृति आसपास की संस्कृतियों से पृथक नहीं थी, और कि विभिन्न 






.. संस्क्ृतियों में बहुत घात-प्रतिघात और विचारों का आदान-प्रदान हुआ है। . 
_ इब्राती श्रज्ञा साहित्य की अद्वितीयता बुद्धिपूर्ण और साहित्यिक अभिव्यक्ति की. 


... कला में नहीं परंतु परमेश्वर विषयक विशेष ज्ञान से संबंध और उस पर अवलं- ख 






प्रेस, १६५०, पृ० ४२६ 


१. अश्रिचर्ड, जेम्स बी. सी., एन्शेन्ट नियर ईस्टर्न टेक्स्ट्स, प्रिसटन यूनिवर्सिटी. हे हे रा 











नीतिवचन . - + 7 7 रेनथ : 


बन की भावना में है जिसकी प्रतिज्ञा उसने इस्राएल जाति से की | इस्राएल 
जाति में परमेश्वर का भय बुद्धि का आरंभ है और उसका अंत भी है जितने 
अधिक और जिस रूप में पाया जाता है, उतना अन्य जाति में नहीं । 
६. धर्म शिक्षा द ं किए “कक 
... प्रज्ञा साहित्य के अंश के रूप में नीति वचन की पुस्तक की विशेषता यह है 
कि उसमें जीवन और उसकी समस्याओं के प्रति वैचारिक दृष्टिकोण है । इस 
पुस्तक के पृष्ठों में आदर्श मनुष्य वह है जो बुद्धिमान है । नीति वचन का _ 
बुद्धिमान मनुष्य चितनात्मक समस्याओं में नहीं उलझता परंतु अच्छा जीवन 
व्यतीत करने के लिए व्यावहारिक सम्मति का विचार करता है। अतः बड के. 
संबंध में पुराने नियम की प्रचलित विचार धारा-कि धाभिक को पुरस्कार और 
दुष्ट को इसी जीवन में दंड मिलता है--साधारणतया बिना तकणा के मान्य 
की गई है | अय्यूब की पुस्तक में इस समस्या पर बड़ी व्यथा के साथ विचार 
किया गया है, और यद्यपि नीतिवचन की इस पुस्तक में आगामी जीवन के 
निश्चय का अधिक संकेत नहीं है, जहाँ इस जीवन की असमानताओं का 
उपचार हो सकेगा फिर भी उसमें धर्मीजन के दुःख सहने की समस्या पर कोई 
. गम्भीर और संवेदनापूर्ण विचार नहीं किया गया है। नीतिवचन में प्रधानतया 
यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि बुद्धि आचरण का एक व्यावहारिक साधन 
है। परंतु जो कुछ भी प्रस्तुत किया गया उस सब के मूल में एक आधारभूत 
विचार या मान्यता है, और वह है इब्रानी विश्वास | इस पुस्तक के आरंभ में ही 
यह व्यक्त किया गया है। परमेश्वर का भय मानता बुद्धि का आरंभ है. 
(१ :७) । दूसरे शब्दों में यह कहे कि प्रकाशित सत्य (परमेश्वर का भय) 
समस्त ताकिक सत्य का सच्चा आधार है।. 2 
... इस पुस्तक की शिक्षा को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है: 





(१) बुद्धि जीवन का मुख्य ध्येय है । सब मनुष्यों को, विशेषकर जवानों... 


को प्रबोधन दिया जाता है कि सब भली वस्तुओं के ख्रोत के रूप में वे बुद्धि की ._ 
“खोज करें (२: १, २; ४: ७::८ : ११) + जुद़ि परमेश्वर की ओर से है, 


और आरंभ से उसका परमेश्वर से विशेष संबंध रहा है, यहाँ तक कि सृष्टि _ कह 
. क्रेकायं में बुद्धि परमेश्वर केसाथ थी (5: २२, ३०) | अतः बुद्ध की खोज...» 
करना मानों परमेश्वर की खोज करना है, जो जीवन का कर्ता है ( 826: 3३ ) ही ३ 


._ इन सच्चाइयों को उनकी विरोधी बातों के समकक्ष रखकर प्रस्तुत किया गया ० 


55० है। बुद्धि का मूर्खता से विरोध बताया गया. है (६:८१ १३) 
...__ (२) खरा जीवन सब से सुखद और सब से अधिक पुरस्कृत जीवन है।. 








.._ मानवी आचरण पर जो विचार इस पुस्तक में व्यक्त किए गए हैं और जो. 

















२०६... पुराने नियम का मूल-पाठ 


५ 


५ 


इस पुस्तक का अधिकांश है, उनमें यही मूल विचार पाया जाता है। उदाहरण 


/प 


- के लिए देखिए १० : 


१:5८); नम्रता (११ १५: ३३); अनेक प्रकार से आत्म-निग्रह 


दुष्टों के रखे हुए धन से लाभ नहीं होता 
परंतु धर्म के कारण मृत्यु से बचाव होता है' 


विचारणीय है कि ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि अच्छा जीवन 
बिताने से जो आशिष और पुरस्कार प्राप्त होते हैं उन्हीं के कारण हमें अच्छा 
जीवन बिताना चाहिए । अच्छा जीवन इसलिए आशिषमय होता है क्योंकि व 
परमेश्वर की ओर से उत्पन्न होता है ओर सृष्टि की व्यवस्था में ही मानो यह 
लिखा हुआ है (१० : १६, २७) । अच्छा जीवन विताने के लिए इस पुस्तक में 
व्यावह्मारिक कारण प्रस्तुत किए गए हैं, परंतु वह यह नहीं कहती है कि चू कि 
अच्छाई का हमें प्रतिदान मिलता है इसलिए ही अच्छा जीवन विताना चाहिए । 
परमेश्वर का भय ही अच्छे जीवन का आधार है और इससे इस्राएली 
लोग ऐसे निष्कर्षों से बच जाते हैं जो जगद्वेघी निकालते हैं । 


(३) अच्छा जीवन सद्गुणों में व्यक्त होता है। इन सद्गुणों में निम्न- 


2] 


लिखित का विशेष उल्लेख किया जा सकता है: आज्ञापालन (१० : १; 


(१४: १७; १६:: ३२ ८.१३; -२५:२१८)३- संत्यता, (१० : १०; 


२:२२): दया. (११: १७;.-१६: २२); :उदारता (११८ २५८२१: 


२६); सपरिश्रम कार्य (१५:१६; २२:१३); प्रसन्नता (१५:१३; 


पृ७ : २२); न्याय (२१: १५); विश्वास योग्यता (२५: १३) । 


गूणों को साधारणतया मुखेता या बुराई के क्षेत्र में उनके विरोधी दुर्गुणों 
के समकक्ष प्रस्तुत किया गया है। 





ह। 
|] 
॥ 
























उनतीसवां अध्याय 
सभोपदेशक 


१, शीर्षक द द द 

इब्नानी में इसका शीर्षक कोहलत है. (कोहलथ या कोहलथ भी लिखा 
जाता है) । इसका साधारणतया अर्थ है सभा का नता (काहाल ), श्रर्थात्‌ उप- 
देशक । सेपत्वागिता में इक्कलेसिअस्तेस है, जिसका अथ है इक्क लीसिया अर्थात्‌ 
सभा का सेता | वल्गाता में सेपत्वागिता का अनुसरण किया गया हू परतु लतीनी 
रूप में इक्कलेसिअस्तेस है । अंग्रेजी में यही लतीनी शीर्षक हैं । भारतीय भाषाओं 


में नेता के स्थान पर उपदेशक किया गया हैं । हनदी में सभोपदेशक हैं । 


कोहलत शब्द एक समस्या उत्पन्न करता है क्‍योंकि वह स्त्रीलिंग कृंदनन्‍्त 
_ है। यदि यह स्त्रीलिंग है तो फिर सुलमान जैसे पुरुष की ओर कंसे संकेत कर 
सकता है (१:१) ? इसका सामान्य स्पष्टीकरण यह कि इससे उपदेशक का 
संकेत होता है जो न स्त्रीलिंग और न पह्लिग । इटली में नगरपाल(१/७ए०) 
का पद पोदेस्ता (70८४०) है । यह शब्द स्त्रीलिंग है जिसका अर्थ अभुता 


होता है । कोहलत शब्द कुछ इसी प्रकार का हू | एक स्पष्टीकरण यह भी दिया. 


जाता है कि अरबी भाषा के समात, इस शब्द मं सत्रीलिंग का प्रयोग सि 
प्रकट करता है। इस दृष्टि से कोहलत का अथ सर्वश्वष्ठ उपदेशक होगा । . 


विषय सामग्री का सारा! 


सभोपदेशक का लेखक जीवन के अथ और अभिप्राय के संबंध में अनेक प्रकार . 


के ताकिक अन्वेषण करता है, और बार बार इसी निष्कष॑ पर पहुचता हू कि 
सब कुछ व्यर्थ है--व्यथ्थ ही व्यर्थ हैं। पर मेश्वर ही सब बातों का अंतिम कारण 


कायाहकिकक 0 


.. ज्ञानता है. और वह सब कुछ नहीं बताता । इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह 
. अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट रह, परमेश्वर के भय के साथ अपने कर्तव्य का 
पालन करे, और शेष परमेश्वर पर छोड़ दे, जो अंत में सबका न्याय करेगा। 


३. रूपरेखा 
सभोपदेशक--क्यों और कैसे पर चिन्तत 
(१) मानव जीवन व्यर्थताओं से भरा है (१--६) 


























पूराना नियम का भूमिका 


अपनी इच्छाओं के पूति हेतु मनुष्य का परिश्रम व्यर्थ है (१- 


. २:२३) 


प्रकृति का चक्र निरंतर और उद्देश्यविहीन चलता है और 
मनष्य का परिश्रम इस चक्र के भीतर है (१:२--११) 


शान के लिये अतुत्य का परत व्यय है (% २०) 
बुद्धि के लिये मनुष्य का श्रम व्यर्थ है ( २:१२-१७ ) | 


अपने परिश्रम के लिये भविष्य में लाभ की आशा करना 
व्यर्थ है (२:१८--२३ ) द 


उपसंहार : खाना-पीना और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखना 
अच्छा है (२:२४-२६), क्योंकि परिश्रम के फल परमेश्वर देता है । 


(ख) 


(ग) 


जीवन का उद्देश्य जानते की चेष्टा व्यर्थ है (३:१-११) : 


ब बातों का समय है, परंतु उनका अभिप्राय परमेश्वर के 


हाथ में है। ... द 
उपसंहार : परमेश्वर के दानों का भोग करो, जीवन भर 
भलाई करो और शेष परमेश्वर पर छोड़ दो (३:१२-१५) 
यह सोचना व्यर्थ है. कि इस दुष्ट संसार में, न्याय मिलता 
(३:१६--५:१७ ): न्याय के स्थानों में अन्याय है; दुष्टता 


को दंड नहीं मिलता (३:१६-४:३१) ; अपव्यय भी लाभ- 


कारी सिद्ध होता है (४:४-६); कंजूस धन जमा करता है 


(४:७-१२) ; और बूढ़े राजा की मू्खंता बताती है कि सब 


.._ कुछ ठीक नहीं है (४:१३-१६) । फिर भी व्यक्ति को पवित्र 


.. चालचलन का होना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर सब पर है. 


(५:१-६) । धन और संपत्ति का मोल उनकी बढ़ती में 


नहीं (५:१०-१२) । जिसका धन है उसे उसकी कमाई का 
फल नहीं मिलता क्योंकि दुर्धाघना या मृत्य का वह शिकार 


गेता है (५:१३-१७) 


. उपसंहार : परिश्रम करो और बुद्धिमानी से रहो, अपने 

_कत्तंव्य का पालन करो और अपने भाग को लेकर आनंद से _ 

- रहो (५:१८-२० ) मा | 

) सामान्यतया मनुष्य का जीवन ही व्यथथ है (६) गज 

....../: मृत्यु में सबंकाअंतहोता है, इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं हो पातीं, . 
आप जा इस जगत में कुछ भी नया नहीं बा ॒॒.॒ 














सभोपदेशक........ २०६ 


(२) बुद्धि की सम्मत्ति (७-१२ 


(क) 


(ख) 


(ग) 
। ([ यू 


(च) 
(७) 


(ज) 


गंभीर और नम्र हो, जीवन की शोकांत घटनाओं के प्रति 

जागरूक रहो. अच्छे नाम की चेष्टा करो और जीवन मेंजोी 

कुछ मिलता है उंसमें संतुष्ट रहो (७:१-१० | 

समभाव से सुख और दुःख के दिवों को स्वीकार करो, और 

दोनों से शिक्षा लो (७:११-१४ ) 

सब वातों में संयमी रहो (७:१५-१८) 

मानवी बद्धि के महत्व और सीमाओं का ध्यान रखो (७:१६ 
६) 

जिसकी आज्ञा का पालन करना है उसकी आज्ञाओं का सबुद्धि 

पालन करो (५८:१-४५) 

यह स्मरण करते हुए कि परमेश्वर के अभिप्राय अगम्य हैं 

इस संसार की भली वस्तुओं का आनंद से उपयोग करो (८: 

६-१७) । 

स्मरण रखो कि मृत्यु सब पर आएगी, और कि इस जीवत .. 

का कोई स्थायी महत्व नहीं है ( ) 


(फ) परिश्रम और निर्दोष आनंद के साथ इस व्यय जीवन को 


व्यत्तीत करता (६:७-१० ) । 


. (ठ) स्मरण रखना कि बहुत बाते सुयोग पर अवलंबित हैं और कि 


(३) उपसंहार 


.. उपदेशक का कार्य यह है कि इस व्यर्थता के जीवन में बुद्धि से जीने का हा हा 
्ग॑ बताए, बहुत पुस्तकों की रचना की अपेक्षा विश्वस्नतीय एवं मूल सत्यों को रा 





संसार बुद्धि का सम्मान नहीं करता (६:११-१०:१ )। 


७). 


बुद्धि, औचित्य, दूरदर्शिता, मीठी और संयमित वाणी के... 
गुणों को अपना लो (१०: २-२०) मा 


सफलता में शंका होने पर भी अपने साधारण कर्तव्यों का . 
. निर्वाह किए जाओ (११:१-८) 


) 


अपनी जवानी में आनंद कर, यह स्मरण रखते हुए कि परमे- 
शबर तेरा न्याय करेगा । अपनी जवानी में अपने सृजतहार 


को स्मरण रख इससे पहले कि शरीर को शक्ति का ह्वास ० थ कह 
होने लगे (११:६-१२:७) । | 














२१ के राना नियम की भूमिका 





: प्रकट करे, अन्त की बात यह है, 'परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं 
का पालन कर ; क्‍योंकि मनुष्य का संपूर्ण कतेव्य यही है। क्योंकि परमेश्वर 
सब कामों और सब गृप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा 


.._ (१२:८-१४) 


. ४. रचना, रचयिता, रचनातिथि 
.. (१) लेखक--इस पुस्तक के प्रारम्भिक शब्दों (१:१) में यह निहित है 
.. कि इसका रचयिता सुलमान है । परन्तु इस कथन को अक्षरश: सत्य मानने के 
विपक्ष में निम्नलिखित ठोस तर्क दिए जाते हैं: सभोदेशक की भाषा शैली 
परवर्ती काल की इब्रानी है, राजाओं के काल की इब्नानी नहीं । लेखक यह नहीं 
कहता कि मैं यरूशलेम का राजा हुँ, परंतु यह कहता है कि 'मैं उपदेशक यरूश- 
 लेम का राजा था' (१:१२) | वह अपने पहले के कई राजाओं की बात करता 
है (१:१६) । इस पुस्तक में जो सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का आभास 
है, वह सुलेमान के युग की नहीं। सुलेम्ान स्वयं अपने राज्य काल की नैतिक 





: बुराइयों की इस प्रकार चर्चा नहीं करता कि उसके राज्य पर ही छींटाकशी हो... 
(४:१; ५:८; 5::६; १०:६,७,१६) । इसलिये सामान्यतया यह माना जाता है कि. 


.. लेखक ने साहित्यिक उद्देश्य की दृष्टि से सुलैभान का नाम रख लिया, जैसे अफ- 
 लावुन ने अपने संवादों में सुकरात का नाम रखा। ऐसा करने से धमंशास्त्र की 


.... प्रेरणा संबंधी समस्या पर कोई आँच नहीं आती, क्योंकि शास्त्र के सत्य को इस 
.... बात से समझा जा सकता है कि परमेश्वर की वाचा का उसके लोगों के साथ _ 
........ सम्बन्ध की अभिव्यक्ति करने में लेखक का मंतव्य क्या है।..... 









इस पुस्तक में यूनानी संस्क्षत का वातावरण प्रतिबिबित है। केवल उसका 


...... दृष्टिकोण बौद्धिक है। इसलिये यह माना जाता है कि इसका लेखक यूनानी काल... 
.... में रहा होगा। इस वातावरण की भलक इन कथनों में मिलती है : वर्तमान... 


रा ... जीवन का आनंद लाभ करता (२:२४; ३:२२; ५:१८; ६:७ ); मानवी दु्बंलताओं 
... पर, जीवन की व्यर्थता पर, भावी जीवन के निराशावाद पर चिन्तन . 








... (४:८; ८:६; १:२०-१७; ३:१८क्र.) ; और प्रकृति के चक्रका वर्णन (१:५,६)। | 
.... परंतु इस भलक से यह मान्यता प्रमाणित नहीं होती कि इस पुस्तक की विषय... 


रा, सामग्री यूनानी मूल खोतों पर आधारित है। पथ जा 
....__ (२) रचना--सभोपदेशक की पुस्तक में ऐसे विचारों की अभिव्यक्ति की... 










..... गई है जो ताकिक दृष्टि से परस्पर विरोधी हैं । व्यय ही व्यर्थ, सबब्यध..... 


है! शब्दां में जो निराशावाद है वह १२:१३ में दी गई सम्मति से भिन्न हैकि...... 





परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर ।” ७:८ में इससे भी पा 











सभोपदेशक.............. २११ 


पृथक परामर्श दिया गया है, किसी काम के आरम्भ से उसका अन्त उत्तम है 
और धीरजवन्त पुरुष गर्वी से उत्तम है ।' सर्बनामों के प्रयोग में भी भिन्नता है । 
१:९१ और १२:६-११ में तृतीय पुरुषवाचक सर्वनाम प्रयोग किया गया है, जब _ 
कि अन्यत्न प्रथम पुरुष वाचक सर्वताम का प्रयोग बहुत हुआ है (१:१ २क्र.; ७ 
_ २३क्र.) । क्‍या इस विचार वैभिन्‍्तय को हम यह मानें कि एक ही लेखक के 
भावों की विभिन्नता है अथवा अनेक लेखकों की रचनाओं की भिन्नता है ? 
दोनों ही धारणाओं को माना गया है। मेकनील ()४८०ए८॥।८) की सुप्रसिद्ध 
मान्यता है कि इस पुस्तक में चार लेखकों की रचनाएँ हैं: (क) मूल लेखक की 
जो निराशावादी था (उदा.६:१०-१२) ; (ख) एक बुद्धिमान मनुष्य की 
जिसने अच्छी सम्मति के सुन्दर कथन किए और बुद्धि की महत्ता को बनाए रखा, 
जो कदाचित मूल लेखक ने तुच्छु जाना (उदा.७:५-१३) ; (ग) एक थर्मात्मा 
यहूदी की, जिसने इसमें शास्त्रसम्मत बातों को सुरक्षित रखा, विशेषकर मनुष्य 
के इस कतंव्य पर बल दिया कि वह परमेश्वर का भय माने, और इस बात पर 
कि परमेश्वर का न्याय निश्चित है (उदा.११:६; १२:१३-१४) । 


द न तकों के उपरांत भी इस पुस्तक की भावात्मक एकता को मान्यता दी 
. जाती है। यह संभव माना जाता है कि एक विचारबान मनुष्य इस प्रकार 
निराशा और आशा, व्यर्थता और सामान्य बुद्धि, इच्छा और करंव्य की विरोधी 
. भावनाओं की अनुभूति कर सकता है । यह सुझाव दिया गया है कि पुस्तक को 
_ कऋरमहीनता का कारण यह है कि लेखक ने अलग-अलग समय पर अपने विचारों 
को लिखा, जैसे कोई अपनी दैनंदिनी लिखता हो । उन अंशों को, जिनमें उप- 
देशक के लिये तृतीय पुरुष वाचक सर्वनाम का प्रयोग किया गया है, कदाचित 
किसी संपादक या शिष्य ने लिखा। फिर भी पुस्तक में पर्याप्त अखंडता 
.. विद्यमान है । हर 


(३) तिथि--ऊपर यह कहा गया है कि सभोपदेशक यूनानी काल की... 


.. रचना है। यदि इस मान्यता को स्वीकार किया जाए तो 'सीरख' (८८८ 
.. $क४४८0७) से उसके संबंध से यूनानी काल के अंतिम भाग में इस पुस्तक की 
तिथि को रखना उचित होगा । सीरख' की रचना तिथि लगभग ई. पृ. १८० 


है । सीरख के लेखक को सभोपदेशक के विचारों की जानकारी थी । इसलिये रे 


. सभोपदेशक की रचता-तिथि ई. पू. १८०० के पहले मानी जाती है। इसके पु 
. साथ ही यह पुस्तक नीति वचन और अय्यूब के बाद लिखी गई, क्योंकि इन. 
. पुस्तकों में पृथ्वी पर ही दंड का विचार स्वीकृत है, जब कि सभोपदेशक में 


..... उसका त्याग किया गया है। इन तथ्यों के आधार पर सभोपदेशक की रचना... 
«तिथि ई. पू. २१०-२०० के मध्य मानी जाती है ० 













. २१६५... पुराना नियम की भूमिका 


५. साहित्यिक समांतरता 
सभोपदेशक और यूनानी लेखों के बीच कुछ साहित्यिक संबंध स्थापित 


.. करने का प्रयत्न किया गया है, परंतु यूनानी काल के सामान्य बौद्धिक बाता- 






























 बरण के माध्यम से जो कुछ संबंध लगाया जा सकता है उससे अधिक हम कुछ 
. भी निश्चित रूप से नहीं जान सकते | लेखक ने अपनी इब्रानी संस्क्ृति की 
. सीमा के अंतर्गत ही अपने विचारों की अभिव्यक्ति की है। परन्तु इसके साथ 
यह ध्यात रखता चाहिये कि इस इब्रानी संस्कृति का वातावरण ऐसा था 
जिसमें हेलनी विचारों के साथ खाल्दी, ईरानी और मभिम्नी विचारों का 
सम्मिश्रण था । 


मिस्र के प्रज्ञा-साहित्य में कुछ साहित्यिक समांतरता की संभावना प्रतीत 
: होती है। बजीर प्ताह-होतेप की सीख नामक रचना में शरीर पर वद्धावस्था 
के प्रभावों का वर्णन है (दे. सभ. १२ : ३-७) । वीणा बजाने वाले का गीत... 
में, जो श्राद्ध-भोज के समय गाया जाता था, मृत्यु के विचारों के साथ-साथ 
जीवन में आनंद करने के भी विचार पाए जाते हैं । उनके शब्दों को देखिए : 
जब तक जीवित है, अपनी कामनाओं का अनुसरण कर | 
अपने मस्तक पर मुर लगा, भीनी मलमल के वस्त्र धारण कर, 
देवताओं के अद्भुत सुगंधित द्रव्यों से अभ्यंजित हो । 
अपनी सुन्दर वस्तुओं में वृद्धि कर; 
..  तैरा हृदय कभी न डबे । द 
- अपनी कामनाओं का अनुसरण कर, अपनी भलाई के पीछे भाग, 
... अपने ही मन के कहे अनुसार 
... पृथ्वी पर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर ४ 
. उस समय तक जब तक कि शोक का दिवस तुझे पर न आ जाए। 
(दे सभ, € ७, ८५; १० ) | 5 कर 
गिलगामेश (#(-३) नामक बाबुली महाकाव्य में भी इसी प्रकार के 
विचार पाए जाते हैं ) 


गिलगामेश, तेरा पेट भरा रहे द 
पं 5. रात को और दिन में भी तू आनंद कर । 
... तैरे लिये प्रतिदिन आनंद का उत्सव हो 
.... रात दिन नृत्य कर और क्रीड़ा होने दे 

तेरे वस्त्र चमचमाते हुए हों, 





_सभोपदेश ः . २१३ 


जो सुकुमारी तेरा हाथ पकड़े हैं उसका ध्यान रख, 
तेरी प्रिया तेरे अंक में आनंद करे : 
क्योंकि मानव जाति का यही काम है 
इन समान अंशों से यह प्रकट होता है कि सभोपदेशक का लेखक कदाचित 

मिस्री और वाबुली साहित्य से परिचित था । परंतु उसकी रचना उन साहित्यों 
पर आधारित नहीं है । उसने अपने युग के निवासी के समान लिखा और 
अपनी रचना में जीवन का सत्य सम्मिलित करने के द्वारा, इब्रानी लोगों को 
प्रकाशित परमेश्वर के ज्ञान के साथ जीवन की दु:खांत घटनाओं और निराशा- 
वाद की भावनाओं को मिश्रित करने के द्वारा उसने एक विशेष देन दी। 


६. धर्म संबंधी विचार और शिक्षा 


भोपदेशक निराशाबादी था | वह संसार की सब बातों में, विशेषकर 
मनुष्य के प्रयत्नों में व्यर्थता देखता है | परंतु उसके निराशाबाद से एक सुन्दर 
रिणाम यह निकला कि परमेश्वर पर पूर्णतः: अवलंबित रहने की भावना 
उसके हृदय में जम गई । यदि वह कोरा निराशावादी होता, तो अनेक प्रकार 
की व्यथताओं के वर्णन से पाठकों को कदाचित रसात्मकता मिल जाती, परंतु 
उससे कोई संदेश नहीं मिल पाता । उपदेशक परमेश्वर पर विश्वास करता था 
इसीलिए जीवन के चिरंतन अर्थ पर आस्था रख सका। वहु विश्वास करता है. 
किपरमेश्वर ते सब वस्तुओं की सुष्ठि की (७: १३:१२: १), और यद्यपि 
मे परमेश्वर के गुप्त भेदों को समझ नहीं सकते, तथापि वह संसार का 
संचालन करता है। वह विश्वास करता है कि परमेश्वर भलों को पुरस्कार 





और बुरों को दण्ड देगा (३:१७; ८:१२,१३), यद्यपि कि वह जीवन के तथ्यों हि हा 


को देख कर इस विश्वास का समंजन नहीं कर सकत! है । वह मानवी अनुभवों 


. के अर्थहीन पक्षों से प्रभावित है: जैसे लाभरहित और निरथ्थक परिश्रम 
(२:२२), योग्यता का विचार किए बिता धन का वितरण (४:८5; 5:१४) 


१९:११), समाज में न्याय का अन्याय (१०:४५; ६:१५; ८5:४) । इस प्रकार के 


... अनभवों से बुद्धि चकराती है और परमेश्वर पर विश्वास अनेक हुदयों में डोल 
. जाता है, क्योंकि भले परमेश्वर के साथ संसार में इतनी बराई को कैसे संगत... 

. किया जा सकता है ? जहाँ तक इस प्रश्न के उत्तर की बात है, लेखक के पास... 
. यदि कोई उत्तर है तो वह इस पुराने युग के विचार में नहीं कि वर्तमान 


. .. जीवन में ही प्रतिकारात्मक न्याय मिलता है, क्योंकि दैनंदिन अनुभव से इस हा. 
... विचार की पुष्टि नहीं होती । उसका उत्तर इस विचार में भी नहीं मिलता 
। पी कि भावी जीवन में प्रतिकारात्मक न्याय मिलेगा,--क्योंकि भावी जीवन | 


















. शपृ८...... प्राना नियम की भूमिका 
संबंधी पूर्ण प्रकाशन अभी तक नहीं मिल पाया था । इसका उत्तर इंस विचार 
में है कि परमेश्वर के भेद अगम्य हैं। उसे परमेश्वर के धर्ममय न्याय-निर्णयों 

_ में निश्चय है (३:१७ क्र. ८:१२ क्र.; १६:६ क्र.), परंतु परमेश्वर की 
योजना इतनी अगम्य है कि मनुष्य उसे समझने की आशा नहीं कर सकता 
(७:१३, २४; ६:१) । सच बात यह है कि परमेश्वर के भेद के समक्ष मनुष्य 
अपनी ससीमता को स्वीकार नहीं करता, इसीलिए उसे विफलता मिलती है 
और वह अपने प्रयत्नों में व्यर्थता का अनुभव करता है (७:२६) । 
दैनंदिन आचरण के लिए लेखक परामर्श देता है। वह सिखाता| है कि 
« मनष्य को चाहिए कि वह अपने देनिक परिश्रम में और अपने श्रम फले के 
“४ संयमित उपभोग में आनंद प्राप्त करे (२:२४) । यहाँ 'खाओ, पीओ' की जो 
_ सम्मति दी गई है वह आनंदवाद (एज्रंप्पा/ंकणांंआओ) की शिक्षा से भिन्न है, 
क्योंकि यहाँ पर खाने-पीने के आनंद अपने में जीवन उद्देश्य न होकर परमेश्वर 
.. प्रदत्त माने गए हैं। मनष्य को भोग-विलास में लिप्त होने के बदले गंभीर 
: बत्ति का होने के लिए उपदेश दिया गया है (७:३-७) 4' मनुष्य को अपनी 


भावनाओं पर संयम रखना चाहिये ( 3:९६ ) | उसे अपने कार्यों में बुद्धिमान है 3 3 


. होना चाहिए (११:१-६) ।/केवल अपने लिये जीने से दूसरों के साथ मिल _ द 


. कर रहना अच्छा है (४:६-१२) । जो हमारे अधिकारी हैं, यदि उनका शासन द 
... दमतकारी हो, तब भी .उनके प्रति आज्ञाकारी होता चाहिए (८5:२-८ 
.. १०:२०) । मनुष्य को सच्चे मत से परमेश्वर की आराधना करनी? चार: 











“| (5:१२, १३) और उन बातों की व्यर्थ चिता नहीं करनी चाहिये जो मनष्य 
.. की समझ से बाहर हैं, और सदा याद रखना चाहिये कि अंत में परमेश्वर सब 





.. बातों का न्याय करेगा (१२:१४) +जब तक परमेश्वर की आशिषें मनृष्य को... 


मिलती हैं, वह उनका संयम के साथ उपभोग करे और अपनी सीमा से बा 


.... की वस्तुओं की चेष्टा न करे (5:१६, १७; ११:६) । इसके विरोध में काम 
... करने का अर्थ है व्यर्थता के पीछे भागना, क्योंकि परमेश्वर के भय से अलग 







...._ सब कुछ व्यर्थ--व्यर्थ ही व्यर्थ है (१२:८, १३) 

















तीसवाँ अध्याय 
श्रेष्ठगीत 


१, शीर्षक और प्रामाणिक धर्मशास्त्र में स्थान 
इक्षानी में इस प्रस्तक का शीर्षक शीर हशीरीम (श्रेष्ठ गीत) है, जो 

हिले पद में विस्तृत रूप में यों है, श्रेष्ठ गीत जो सुलेमान का है । सैपत्वा- 
शिता में इसका शीर्षक असमा असमातोन (>झ78 री578000 ) है और 
बल्गाता में कन्तिकम कंतिकोरमु ( (४870 0फ) (27प007पा० ) हैं । ये दोनों 
इब्बानी शीर्षक के शुद्ध अनुवाद हैं । अँग्रेजी में साधारणतया सुलैमान के गीत 
शीर्षक है, परन्तु श्रेष्ठ गीत का भी उपयोग किया गया है। कभी-कभी पूरा 
. शीर्षक 'श्रेष्ठगीत, जो सुलमान का प्रयोग में आया है। हिन्दी में 'अ्रेष्ठ- 
गीत 

._ इब्रानी में गीतों का गीत' शब्द उत्तमवाचक शब्द के अथ में महाविरा रूप 
है । इसी प्रकार का प्रयोग पवित्नों का पवित्र ' है। जैसे पवित्ों के पवित्र का 
अर्थ 'महा पवित्र” किया जाता है उसी प्रकार गीतों का गीत का अनुवाद 
श्रेष्ठगीत किया जाता है । 
इब्नानी बाइबल में श्रेष्ठगीत पर्व-कुंडलों में से एक है और कतूबीम में 
.. सम्मिलित है | [ पर्वकुंडल होने के कारण फसह |पर इसका पाठ किया 
जाता था। बी 

२ विषय सामग्रों का सारांश ः 
... श्रेष्ठ गीत में प्रेम-गीतों की माला है जो एक दुल्हिन और उसका प्रियतम 
गाते [दुल्हन _एक शलेम्मित कुमारी है| 'और सब कुमारियों में सुन्दर है।. 
उसका प्रियतम सुलेमान हैं। श्रेष्ठगीत में अन्य पाक दुल्हिन के भाई और 
यरूशलेम की पुत्रियां हैं 


३, रूपरेखा लत आओ 53 
सलैमान का गीत--दुल्हिन और उसके प्रियतम का गीत 





(१) दुल्हिन की अपने प्रियतम के लिये लालसा : उनकी भेंट और परस्पर । 


प्रशंसा (१:१-२:७) । 









































. पुराना तियम की भूमिका 
(२) उनकी अणय-याचना और प्रेमोहीपत (२:८-३:५) : बसंत ऋतु में 
. दुल्हिन को मैदान में आने का आमंत्रण; सायंकाल को लौटना; 
४ + _प्रियतम के बिना दुल्हिन की बेचेनी । 

(३) उनकी सगाई (३:६-५:१) : सुलेमान का पालकी में आता 
....... का दुल्हिन के प्रति आकर्षण ः 
. (४) दुल्हिन के प्रेम और स्थिरता की परीक्षा (५:२-६:६) : दुल्हिन का 

द प्रियतम खो जाता है। दल्हिन उसे पुनः पाती है 
. (५) प्रगाढ़ प्रेम के आनंद (६:१०-८:४) : दुल्हिन और दूलह एक दूसरे. 
की प्रसंशा करते हैं; दुल्हिन अपनी भक्ति व्यक्त करती है । 

(६) प्रेम की पूर्णता : दूलह के भवन में दुल्हित का स्वागत (5:५-१४ ) 


|] 


25 जड़ 
त्ज्पु 





४. पुस्तक की व्याख्या या भाष्य 

पुस्तक में ऐसी कोई बात नहीं जिससे इसकी ईश्वरीय प्रेम संबंधी रूपक 
कथा के समान व्याख्या की जाए, तो भी परंपरागत रूप से इसकी ईश्वरीय 
प्रेम के रूपक काव्य की दृष्टि से व्याख्या की जाती है। यहूदियों में परमेश्वर 
के प्रेम के मान से इसकी रूपकात्मक व्याख्या की जाती है। [परमेश्वर प्रेमी हैं 


(ओर इस्राएल उसकी वधृु है।। होशे नवी की किताब में यह रूपक पाया जाता 








जाती है। खिस्त प्रेमी है| और उसकी किलीसिया दुल्हिन) नये नियम में 
कली सिया दुंहि यह साधारण रूपक है (इफ, ५:२५-३३; प्र. २१:२५ 
२२:१७; मर. २:१६) । व्यक्तिगत भावना की दृष्टि से यह पुस्तक परमेश्वर 
या खिस्‍्त के साथ आत्मा के रहस्यात्मक संबंध का रूपक माता जाता है। यह 
. व्याख्या उपरोक्त व्याख्याओं के साथ संगत है । हे द 

.. धर्मशास्त्र के कुछ सूक्ष्म आलोचकों को यह रूपकात्मक व्याख्या स्वीकाय 
नहीं है | प्राचीन युग से यह व्याख्या स्वीकार्य नहीं है क्योंकि इस पुस्तक में 
ऐसी कोई बात नहीं है जिससे रूपकात्मक व्याख्या का संकेत मिलता हो । परंतु. 
यदि रूपकात्मक व्याख्या अस्वीकार की जाय तो यह पुस्तक मानवी प्रेम-कथा 


समस्या उत्पन्न हो जाती है कि धम्मशास्स्र में इसको क्‍यों स्थान दिया 
गया है ? द 


हू 








है (हो. २:१६; ३:१) । खिस्तियों में खिस्तीय मान से इसकी व्याख्या की... 


की लौकिक कविताओं का संकलन मात्र रह जाती है। साथ ही एक और 


अनेक लौकिक व्याख्याएँ यदा कदा प्रतिपादित की गई हैं ।ई. सन्‌ चौथी... 
शताब्दी में मोपसुएस्तिआ के थियोदोर ने आध्यात्मिक अर्थ अस्वीकार 
किया, ओर यह मान्यता व्यक्त की कि सुलेमान ने फिरोन की पुत्री के साथ... 











बा 


अपने विवाह के अवसर पर इसकी रचना की । आधुनिक युग में इस पुस्तक के 


जे 


/+% 


संबंध में नाठकीय मान्यता का प्रतिपादत किया गया है और यह अय्यूब की 
पुस्तक की नाटकीयता से साम्य के आधार पर किया गया है । इस मान्यता के 
अनुसार श्रेष्ठ गीत एक रोमानी नाटक का लेख है, परंतु नाटक के प्रमुख पाता 
की संख्या के संबंध में मत वेभिज््य है। डिलिट्ज (ल0०७5्टो)) की मान्यता 
न्‍ कि इसमें दो प्रधान पात्र हैं, अर्थात सुलैमान और एक ग्राम बालिका जिसका 
नाम शललेमित है ! प्रणय-माचना जड़े आनंद से विवाह की बेला तक चलती 
है, परंतु उसी समय वियोग हो जाता है (रूपरेखा में (४) भाग) । इसके 
पश्चात उनका मिलन ओर तब स्थायी सूख। दूसरी मान्यता एवाल्ड 
(7७४०४) की है । वह इसमें तीन प्रमुख पात्र मानता है, सुलेमान, शुल्लेमिन 
और प्रेमी गड़रिया । सुलैमान शल्लेसिन को भगा ले जाता है और उसे राज- 
भवन के वैभव से लुब्ध कर अपनी बनाने की चेष्टा करता है। परंतु शुल्लेमिन 
अपने प्रेमी गड़रिये को ही प्यार करती है । यद्यपि उसका प्रेमी उससे दूर है 
तो भी वह उसका सपना देखती है (चौथा भाग झूपरेखा में) | सुलेमान 
उसका प्रेम नहीं प्राप्त कर सका । नाटक का अंत शुल्लेमिन और उसके प्रीतम 
से मिलन में होता है। इन नाटकीय व्याख्याओं में सबसे बड़ी कठिनाई यह है 
कि पस्तक में बोलने वाले पात्रों के नाम नहीं हैं, जैसे कि अय्यूबं की पुस्तक में 
हैं, और कहीं भी कोई ऐसी टिप्पणी नहीं है जिससे यह इंगित हो कि. यह 
पृस्तक नाटक है । द 

पिछली शताब्दी में जब अरामी विवाह प्रथाओं का सूक्ष्म भ्रध्ययन किया 
गया तो इस पृस्तक के प्रति बहुत रुचि व्यक्त हुईं। अरामी ग्राम के वर और . 
बधू को एक सप्ताह भर राजकीय सम्मान प्रदान किया गया। उन्होंने एक के 
बाद एक अपने दरबार किए जिनमें उनका यशोगान हुआ । राजकीय बस्त्रों में. 
मानों प्रजा के सन्‍्मुख उनके दरवार हुए । इन प्रथाओं के अनुरूप जो निश्चित 
रूप से प्राचीन है, यह मान्यता व्यक्त की गई कि श्रेष्ठ गीत मूल रूप में 


हर 


पूलिस्ती ग्राम के विवाह-सप्ताह में प्रयुक्त होने वाले विवाह-गीतों का-संकलन 


नि 





०७. 


(७११० 


है (बुडड़े) (80त0८) । दुलह को उत्सव के समय 'सुलेमान' की महान 
.. उपाधि दी जाती है और दल्हित को शब्लेमिन (अर्थात कुमारियों में स्व- 


सुन्दर) की । अन्य विद्वानों का कहना है कि पुस्तक प्रेम-गीतों का संकलन- 


.. मात्र है और उसमें किसी प्रकार का उद्देश्य निहित नहीं है 


बे 


७ इस पुस्तक के संबंध में एक और मान्यता यह है कि उसमें सात कविताएं. 
हैं जो परस्पर समांतर हैं। प्रत्येक कविता में दुल्हिन और दूलह की एक दूसरे 


सडक 





प्रति लालसा, प्रशंसा और तब मिलन में आनंद की अभिव्यक्ति है। इस 











आर क्‍ ... पुराना नियम की भूमिका 


_ सान्‍्यता को हम रूपकात्मक अथवा लौकिक दोनों ही प्रकार की व्याख्या में 
: स्थान दे सकते हैं, क्योंकि यह व्याख्या से नहीं, पुस्तक के रूप से संबंधित है 


जो लौकिक मान्यता इस पुस्तक को ग्राम-विवाह के उत्सव सप्ताह से 


.. संबंधित करती है वह इस माने में बड़ी आकर्षक है कि उसमें यथार्थ जीवन 


. की स्थिति से उसकी भाव सामग्री का समन्वय होता है। परंत यदि इस 
व्याख्या को स्वीकार किया जाए तो यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस पस्तक 
को प्रामाणिक धर्मशास्त्र में कैसे स्थान दिया गया ? अतएवं यह मानना 
आवश्यक है कि कोई व्यक्ति था जिसके हृदय में रूपक और रहस्य की भावना 
_ विद्यमान थी। वह ऐसा ही होगा जैसे सूफी कवि जो मानवी प्रेम को ईश्वरीय 
प्रेम का प्रतीक मानते हैं ५ उस व्यक्ति ने किसी प्रारंभिक समय में ग्राम-विवाहों 
के साधारण लौकिक गीतों को लेकर धाभमिक अभिप्राय के निमित्त उनका 
उपयोग किया। उसके पश्चात इन गीतों में एक स्थायी धामिक अर्थ आ गया 
और इस प्रकार वे धामिक रचना बन गए । फलस्वरूप जब प्रामाणिक धर्म- 
_ शास्त्र की रचना हुई तो इस पुस्तक को भी स्थान मिल गया। इस व्याख्या 


की संभावना होशे नबी की कथा से पुष्ट होती है, जिसमें होशे के जीवन की... 
दुःखांत घटना और परमेश्वर की ओर से इस्राएल जाति को संदेश में निकट... 


साम्य प्रस्तुत किया गया है । 


 आइब्राती प्राचीन धर्मों के अध्ययन के आधार पर एक और व्याख्या हमारे... 


हा .. समक्ष आती है। अइब्रानी धर्मो में नैतिक भावनाओं पर इब्नानी धर्म की अपेक्षा 

.._ कम जोर दिया जाता था। उनमें धामिक अनुष्ठानों के अंतर्गत 'लौकिक' प्रेम... 
..._ गीतों को सरलता से स्थान मिल सकता था । अतः यह माना जाता है कि 
.. श्रेष्ठ गीत प्राचीच कालिक अयहदी उपासना विधि का अंग है। ओसिरिस 
... देवता या उसका समक्षक देवता या तास्मुज, अदोनी या बाल देवता दूलह होगा 


. और इश्तर या अस्तते देवी उसकी दुल्हिन। यदि श्रेष्ठ गीत का उद्गम 


रा ... पलिस्तीन में हुआ, तो यह उत्पादन के देवता और देवी संबंधी उपासना- | 
... पद्धति होगी। नूतन वर्ष के त्यौहार "(5]00०) संबंधी बाबली प्रथाओं के 





..._ अध्ययन से यह पता चलता है कि इन उत्सवों में एक प्रथा यह थीं कि देश 


5४७४ 


ः न ः ध्ामिक विवाह भी हो । यह मान्यता पूर्णतया तक॑ सम्मत है कि ऐसे पमंगोत 
... . . जैसे श्रेष्ठगीत में हैं, धारमिक विवाह से संबद्ध हों। अतएवं यह नितांत संभव | 
... है कि जो गीत आधुनिक विद्वानों को लौकिक प्रतीत होते हैं, बे प्रारंभ में धरम... 





पा 2 से संबंधित रहे हों | इस व्याख्या के साथ यह्‌ कठिनाई अवश्य सामने आती ' क्‍ गत. न ' 














अ्रष्ठीत...... । “११६ 


है कि इब्रानी प्रामाणिक धर्मशास्त्र में अइब्नानी उपासनाविधि को केसे स्थान 
मिल सका । द द 
किसी भी संतोषप्रद व्याख्या से दो बातों का स्पष्टीकरण होना चाहिय्रे-इस 


[क] 


पुस्तक का धामिक संबंध और उसकी अधामिक भाव सामग्न 


अपना नुतन-बर्ष उत्सव होता था जो उनके पड़ोसियों की प्रथाओं के समान 


माना जाता था । हम कल्पना करें कि बात कुछ ऐसी ही है, कि इब्राती राजतंत्र 


काल में बाबुली अकितु के समान ही उपासना विधियाँ थीं, परंतु वे उनसे इस 


सीमा तक भिन्न थीं जिस सीमा तक इब्नानी विश्वास और धर्म अइब्रानी विश्वासों 


और धर्मों से भिन्न था । जब सुलैमान राजा ने अपनी राजसत्ता किसी पूर्वी 
सम्राट के समान प्रतिष्ठित की तो लोक प्रचलित माँग या प्रत्याशा की पूर्ति स्वरूप 
उसने अन्य जातियों की प्रथा के समात धार्मिक विवाह की विधि को उत्सव में 

स्थान दिया हो । इस्राएल जाति में इस प्रकार की धामिक विवाह-विधि को भी 
परंपरागत इब्रानी वाचा के मूलभूत नैतिक मानों की सीमाओं में अवश्य रखा 
गया होगा। यह ठीक उसी प्रकार हुआ होगा जैसे इस्राएल में राजतंत्र को वाचा 
के नैतिक मानों की सीमाओं में रखा गया। इस अनुष्ठान ह उत्सव में जिन 


.... कविताओं का प्रयोग किया गया उनमें आरंभ से ही लौकिक प्रेम-भावना और 


धर्म-भावना दोनों तत्व विद्यमान थे । अपने लोगों के लिये परमेश्वर की कृपा 


प्राप्त करने के संदर्भ में इंस अनुष्ठात को माता गया और अनुष्ठान से संबंधित 


कविताओं को धार्मिक भावना के संदर्भ में सुरक्षित रखा गया । नबियों के नैतिक... 


अभाव के कारण इन कविताओं में परमेश्वर और इस्राएल के बीच वात हैं 


संबंध पर जोर दिया गया, ठीक उसी प्रकार जैसे होशे ने अपने वेवाहिक अनुभवों 
को वाचा से संबंधित किया । प्रवर्ती काल में जब इस्राएलियों के धारमिक 


। इस मान्यता मे 
इसका संभाव्य समाधान हो सकता हैं कि निर्वासन-पूर्व. काल में इब्रानियों का 


ज-का अल 


साहित्य को संकलित और स्थायी रूप दिया जाने लगा, तो ये कविताएं भी अपने 


: ब्रचलित धार्मिक संदर्भ सहित संकलित की गईं । इस प्रकार प्रामाणिक धर्मशास्त्र 
में न केवल प्रेमगीत के रूप में, वरन रूपकात्मक गीतों के रूप में इन गीतों को _- 


स्थान दिया गया । 


इस समस्या का पूर्णतया संतोषप्रद हल अभी तक नहीं मिल पाया है । मा 


..._.४, रचना तिथि और रचयिता _ 


०] 





_ भी यह स्वीकार किया जाता दे 
११ में 


.. माध्यम मात्र है। ३े:७- 


... परंपरागत रूप से सुलैमान को श्रेष्ठगीत का रचयिता माना जाता है। फिर 
कि १:१ में सुलेमान का नाम एक साहित्यिक. या 














२९०... पुराना नियम की भूमिका 


से हुआ है। इससे ऐसा लगता है कि और कोई इन गीतों को लिख रहा है 
. यह भी संभव है कि यह पुस्तक अनेक लेखकों की रचनाओं का संग्रह हो । कुछ 
विद्वानों की यही मान्यता है 


_ क्षाषा शैली के आधार पर पस्तक की तिथि का निर्धारण किया गया 
अरामी और अन्य विदेशी शब्दों की उपस्थिति के कारण अनेक विद्धानों की यह 
धारणा है कि यह पुस्तक निर्वासन काल के बहुत समय पश्चात्‌ यूनानी काल में 
रची गई । ४:१३ में बाग के लिये फारसी शब्द 'फिरदौस' का रूप परदीस 
(?७/08७) है, और ३:६ में पालकी के लिये यूनानी शब्द फोरिआऑन (शाठरां- 
00 ) का रूप अप्पीरिऑॉन (89|/#एंणा) है। भाषा शैली के आधार पर पुस्तक 
का रचना काल कुछ लोग ई. पृ. ३००-२५० मानते हैं। 

इसके विपरीत कुछ विद्धान यह मानते हैं कि इसकी कविताएँ साहित्यिक 
कृतियाँ न होकर लोक गीत हैं, इसलिये यद्य पि इसमें एकादि फारसी और यूनानी 
शब्द आ गए हैं, तथापि ये कविताएं बहुत प्राचीन हैं ! इस मान्यता में भाषा के 


अरामी रंग का स्पष्टीकरण यह किया जाता है कि वह परवर्ती काल कानहीं... 
परंतु यह प्रकट करता है कि थे कविताएँ इब्रानी भाषा की बोली, कदाचित 
उत्तरी बोली में लिखी गईं । उदाहरणार्थ, शुल्लेमिन शब्द (६:१३) शनेमितर 


शब्द का बोली रूप है (२?.४:१२) । यरूशलेसम के समकक्ष उत्तरी राजधानी 


-तिर्सा के उल्लेख (६:७४) तथा गिलाद और हेशबोन (४:१;७:४) के उल्लेख 
से प्रारंभिक राजाओं के काल का संकेत मिलता है, उस काल का जबकि 


.  शोमरोन उत्तरी राज्य की राजधानी नहीं बना था (ई.पू. 5७७१) और 
इब्नानियों ने गिलाद ओर हेशबोन नहीं खोए थे (ई.प. ७३४) । अतः मूल 
..... कविताओं में परवर्तीकालीन संपादकीय टिप्पणियों की छुट मानते हुए यह 
.. स्वीकार किया जा सकता है कि इन कविताओं की राज्यकाल के प्रारंभिक यूग 


का 


५ (2३ लक 3०५५ »५:३+७ 


..... में रचना हुई (ई.पू. ६००-८५०] । फिर भी पुस्तक के वर्तमान रूप के कारण 
.... उसकी तिथि ई.पू- ३००-२५० मानी जाती है। 


.. ६. धर्म शिक्षा 


... यदिप्रारंभिक युग से श्रेष्ठगीत का धर्म से संबंध रहा है, तो पुस्तक के 
.... धर्मशास्व्रगत स्थान तथा उसके धाभिक महत्व से रूपकात्मक व्याख्या का घनिष्ठ 
.. संबंध माता जा सकता है। अतः इस पुस्तक की धर्मशिक्षा की जड़ें उसकी वि- 
.... अजय सामग्री में इतनी नहीं जितनी कि उसके धर्म से संबद्ध होने के संदर्भ में... 
. :  हैं। इस पुस्तक का उपयोग किसी प्रमुख बाइबली सिद्धांत के तत्वों को प्रस्तुत 
करने में नहीं * हिये । इसका उपयोग बाइबल में अन्यत्न प्रस्तुत सत्यों 




















रा श्रेष्ठगौत क्‍ ः पु । 


के उदाहरण देने या उतको रुचिकर बनाने के लिये किया जाता चाहिये। इस 
पस्तक का सृल्य सत्य के बौद्धिक ग्रहण में नहीं, वरत भावना के झेल में है 


खिस्तीय दृष्टिकोण से, जिसमें यहदी दृष्टिकोण की पूर्ति होती है, इस 
पुस्तक में इस भाव की अभिव्यक्ति है कि (स्वयं को खिस्त में प्रकट करने 


बाला) परमेश्वर अपने लोगों से प्रेम करता है । व चित्र लथे नियम के अनु 
क्त्णू है ( हल कक, 0१ ड़! छह 850 4 यूं दी, & रु श्कुर ५ ५१ ० दाण 7 २2५०९ प्र.२१ । ) 


अकककक हे 


हि छः 


$, 
७, 


प्िएवासी का प्रेम इस पुस्तक में प्रयुक्त सुन्दर शब्दावली के माध्यम से गहरा ह 
सकता है। वह खिस्त है जो मेरा ब्राणप्रिय' है (१:७), शारोन देश का युलाव 
हैं, तराई का सोसन फूल है (२:१), दस हजार में उत्तम है (५:१०) 
खिस्ते की आशिषों का वर्णन इन शब्दों में किया जा सकता हैं, वह मुझे भोज 
के घर में ले आया, और उसका जो झंडा मेरे ऊपर फहराता है वह प्रेम है 
_(२:४) । खिस्त को जानने के अनुभव का वणन इस शब्दों में किया जा 
सकता है गाने का समय आ पहुँचा है | जो चिरंतन शांति खिसत देता है 
बह इन शब्दों में व्यक्त की जा सकती है, 'ेरा भी मरा पैर मैं उसकी 
.. हूँ, वह अपनी भेड़ बकरियाँ सोसन फलों के बीच चराता है (२:१६) 
.. खिस्त अपनी दुल्हिन, कलीसिया में जो सिद्धता चाहता था उसका वर्णन 
इन शब्दों में किया जा सकता है, मेरी प्रिय, तू सर्वांग सुन्दरी है, तुभमें 
गेई दोष नहीं । श्रेष्ठगीत से ऐसे पदों और पंक्तियों को खिस्तीय भक्ति 
साहित्य एवं गीतों में स्थान मिल गया है और इस प्रकार भक्त आत्मार्ओं का 
जीवन उच्च बन पाया है द 


स्वभावतया ही. रूपकात्मक व्याख्या वैज्ञानिक खोज के युग के लिये अपरि- 
चित होती है। इसलिये वर्तमान युग में इस पुस्तक का भावग्रहण कुछ कठिन 


किक 


है । जो कुछ भी धर्मंगत मुल्य इस पुस्तक का हैं वह उनके लिये है जो विज्ञान के 


कक 


४ 





झ् वस्तुवादी नियमोी से अपनी दष्टिट हटाकर धमभाव का आत्मानभूतियों की ओर लो हे 


लगा सकते हैं । हमें स्मरण रखना चाहिये कि विश्वासियों की कई पीढ़ियों की । 

_ आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूति बाइबल द्वारा की गई है और आज तक हो. 

. रही है और कि परमेश्वर ते उन विश्वासियों को ग्रहण किया है। इनमें से कई 
_ विश्वासी वर्तेमान वैज्ञानिक वस्तुवादिता के युग के पहले रहे । हमें यह भी स्मरण ! 


.. करने में हमें प्रतीकों की भाषा को अपनाए बिना काम नहीं चलेगा । पदिहम 


... इन बातों को स्मरण रखें तो इस पुस्तक की व्याख्या और इससे शिक्षाग्रहण ः 


.. करने में हमें अवश्य सहायता प्राप्त होगी । 











इकतीसवां अध्याय 
नवृव॒त की पुस्तक 


धर्मशास्त्र में नवृवत की पुस्तकों के अंतर्गत चार बड़ी पृस्तकें हैं--यशायाह 
_यिर्मयाह, यहेजकेल और दानिय्येल और बारह छोटी पस्तकें हैं --होशे, योएल 
आमोस, ओबद्याह, योना, मीका, नहूम, हवक्कक, सपन्‍याह, हारगे, जकर्याह 
और मलाकी । छोटी पुस्तकों के नबियों को बारह छोटे नबी और बड़ी पुस्तकों 
के तबियों को बड़े नबी कहते हैं । नब॒वत की पुस्तकों में विलाप गीत की 
पुस्तक को भी सम्मिलित किया जाता है। यह वास्तव में काव्य पुस्तक है परंतु 
यिर्मयाह के साथ परंपरा से इसका संबंध होने के कारण इसे नबूबत की पुस्तक 
में रखा जाता है। “अधिक पुस्तकों वाले धर्मशास्त्र' में बार्क भी सम्मिलित 








है जिसे विलाप गीत के पश्चात स्थान दिया गया है | साथ ही दातिय्येल में... 
. कुछ अतिरिक्त सामग्री भी है जिन्हें तीन पवित्न युवकों का गीत', 'सुसन्ना का... 


इतिहास, तथा बेल और अजगर' कहते हैं। बारूक की पुस्तक के अंतिम ._ 
अध्याय को यिर्मयाह का पत्न भी कहते 
सप्तति अनुवाद, वुल्गाता और अंग्रेजी एवं भारतीय भाषाओं की बाइबलों 


.. के अंतर्गत पुस्तकों के क्रम में जो बड़े और छोटे नबी हैं उन्हें इत्नानी बाइबल 
... के अंतर्गत पूर्ववर्ती और परवर्तो नबियों के साथ नहीं मिलाना चाहिये और 
..... दोनों विभाजनों को एक नहीं समभना चाहिये। जिन पुस्तकों को हमने . 

.. ऐतिहासिक पुस्तक कहा है, अर्थात यहोशू, न्यायियों, शमूएल की दोनों पुस्तकें, 
.._. राजाओं की दोनों पुस्तकें, वे पुस्तकें पूर्ववर्ती नबियों के अंतर्गत सम्मिलित हैं, 








..... और परवर्ती नबियों के अंतर्गत दानिय्येल और विलाप गीत को छोड़ कर बड़े... 
8 . और छोटे नत्रियों की समस्त पुस्तकें सम्मिलित हैं। इच्नानी बाइबल में दानि- 
का ० य्येल और विलापगीत कतूवीम या लेखों में सम्मिलित की गई है। इब्रानी 
... वर्गीकरण में विभिन्न लेखकों के नबुव॒तात्मक दृष्टिकोण का ध्यान रखा गया... 
कक है, जबकि सप्तति और अंग्रेजी वर्गीकरण में उनके आकार पर ध्यान रखा 
... यिर्मयाह नबी की पुस्तक में हमें उस प्रक्रिया के दर्शन होते हैं जिसके द्वारा... 





नबृवतात्मक पुस्तकों की रचना हुई और वे वर्तमान रूप में आई | यिर्मयाह 











नबूवत की पुस्तकें मा 
को उन परिस्थितियों के संबंध में, जिनका सामना उसे करना पड़ा, परमेश्वर 
से प्रेरणा मिली (उदा० १४:१; १६:१) । उसे जो संदेश मिला वह प्रभु 
की ओर” से था या भारी बचन' था (यथि. २३:३३; दे, यश, २३:१) | 
बचन के संबंध में यह माना जाता था कि वह नबी की अपनी अंतदृष्टि या. 
विचार-शक्ति से बाहर के स्रोत से आता है, और उसमें आवश्यकता तथा 
व्वरिलता की इतनी तीन भावना होती थी कि वास्तव से वह भारी वचन 
(बोध) होता था । बोझ के लिये भी अनुवाद में 'बचन' शब्द का उपयोग 
किया गया है, क्योंकि यह संदेश ईश्वरीय प्रेरणा से अधिकृत होता था । 


नबूवत की पुस्तकों में मूल इकाई यही 'वबचन' है। प्रधानतया वह बोला 
.. जाता था। आवश्यकता पड़ने पर वह बाद में लिखा जा सकता था, या कभी 
न भी लिखा जाए। यिर्मयाह ने अपने वचन कदाचित इसलिए लेखबद्ध किये 
. कि यदि उसकी पीढ़ी उसके बचनों को न माने तो शायद आने वाली पीढ़ी 
... माने यदि मनुष्य परमेश्वर की चेतावनी पर ध्यान न दे तो यह बड़ी गंभीर 
. बात थी । इसलिये यिर्मयाह ने बारूक को अपने बचन लिखाएं (३६:१८) 
बिना किसी दयामया के राजा ने उन लेखों को नष्ट किया, तो यिमंयाह ने _ 
. फिर से बारूक को वे वचन लिखाए और उनमें कुछ वचन और जोड़े (३६: 
३२) | ये वचन इतने स्पष्ट थे कि यिर्मयाह को उन्हें स्मरण करके फिर 
लिखाने में कोई कठिनाई नहीं हुई ।.. 


यिमंयाह के वचनों को स्थाई रूप देने तथा अपने स्वामी के विषय कुछ 
 विवरणों को आलेखित करने का कार्य बारूक ने किया। वचनों का संकलन 
और संपादन या तो यिर्मयाह के होते हुये ही, या उसकी मृत्यु के पश्चात या . 


. दोनों समयों में हुआ होगा । यद्यपि कि अन्य वबियों के शिष्योंका उल्लेख... 
हीं है, तो भी ऐसी ही स्थिति उनके वचनों के संबंध में भी रही होग्नी (उदा, 


श. 5:१६) । ले आह 
इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नबूवत की पुस्तकों में सुलरूप 


से ईश्वरीय बचनों का संकलन है, परंतु इसके साथ ही उनके शिष्यों अथवा... 
.. प्रशंसकों द्वारा नबियों से संबंधी कथाएँ हैं, और अंत में इस प्रकार का संपादन... 
.. भी है जिससे वे उन्हें वर्तमान रूप मिल सका है। नबी के लिये तो ईश्वरीय 
. वबचनों को ईश्वरीय सामर्थ का अधिकार प्राप्त था, परंतु उनके शिष्यों को तबी 


..... के कथनों और कामों में भी परमेश्वर का हाथ (सामथे) दिखाई देता होगा।. 
० * दस प्रकार उनके लिये संपूर्ण विवरण निश्चित रूप से परमेश्वर का वचन | रा 

















2 प्राता नियम की भूमिका 


निर्वासन के पश्चात इस्राएल की नबूबत परंपरा एक भिन्न अभिव्यक्ति 
_ की ओर मुड़ गई। उसे प्रकाशनात्मक परंपरा कहते हैं। पुराने नियम में दानि- 
्येल की पुस्तक इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, परंतु जकेयाह और यशायाह के 
के कुछ अंशों में हमें इस मोड़ या संक्रमण के दर्शन होते हैं। प्रकाशन साहित्य 
में लेखक अपने को ऐसा मानता है जो परमेश्वर का प्राचीन भक्त है और 
घटना-चक्र से मानों अपने को अलग रखते हुये वर्तमान दुष्ट संसार को देखत 

है कि वह संसार परमेश्वर के न्याय के चरम सीमा की ओर तीज गति से बढ़ 
रहा है । इसलिये समय के चिन्हों का उद्धाटन किया जाता है, और बूझने 
वालों के लिए दर्शनों या सपनों में परमेश्वर के अभिप्राय के रहस्य को प्रकाशित 

किया जाता है। कभी कभी इनका स्पष्टीकरण स्वर्गद्तों द्वारा किया जाता है 
. और कभी गुप्त अर्थ के प्रतीकों द्वारा । इस प्रकार प्रकाशनात्मक संदेश से 
वर्तमान दुःख और सताव सहने के लिये विश्वासियों को इस दृढ़ निश्चय द्वारा 
सामर्थ मिलती है कि प्रभु शीघ्र ही अपना उद्धार प्रकट करेगा और अपना 
अनंत राज्य स्थापित करेगा । 


+शप 
हक 


























.._ परमेश्वर की अनुग्रहपूर्णं कृपा की घोषणा की गई 








बसीसर्वा अध्याय 


यशायाह 


१. शीर्षक 


इस पुस्तक का नाम आमोस के पृत्र यशायाहं के नाम पर है । उसी के वचन 
और कार्यों का इसमें आलेख हुआ है । इस पुस्तक का इब्रानी रूप यशायाहू है । 
सेपत्वागिता में एसईआस और बुल्गाता में एसईयास है । अंग्रेजी वृल्गाता का 
अनुसरण करती है, अंतर केवल यह है कि अंग्रेजी में अंत कुछ इब्रानी जैसा 
किया गया है। इब्रानी के नाम का अथ बाहवे का उद्धार, अथवा 'याहवे ही 
उद्धार है! । व्यक्तिवाचक संज्ञा के अंत में 'याहु. के आधार पर यह काना की 
जाती है कि परमेश्वर का मूल नाम जो'मूसा पर प्रकाशित किया गया यही 
होगा | वह किसी भयनीय रहस्य की ऐसी ध्वनि होगी जो कदाचित मानव की 
समझ से परे हो । इसीलिये उसका स्पष्टीकरण मैं जो हुँ सो हूँ' दिया गया है 


(नि. : पढे) ] हिन्दी में इन्नानी रूप का अनुसरण किया गया है । 


२, विषय सामग्री का सारांश 


७ 


रा क्री पुस्तक में नबुृबत के वचनों का संकलन है जिसमें बीच- 
बीच में ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश हैं। सामान्यतया ये दिव्य-क्‍्चन 
_ उस युग की तीन परिस्थितियों के लोगों को संबोधित किए गए हैं | पहले 
बे, ई० पू० आठवीं सदी में आमोस के पूत्र यशायाह के समकालीन लोगों को द 
: संबोधित किए गए । दूसरे वे, जो ई० पू० ६ वीं सदी में बाबुल में निर्वासित 
लोगों से कहे गए। तीसरे वे, जो निर्वासन के पश्चात पलिश्तीन में रहने 


ना 


वालों के लिये कहे गए । कई बचनों में इस्राएल और यहुदा पर उनके धामिक _ 


यशायाह 


'िस्वासबात के कारण परकेग्वर के दंड की अभिव्यक्ति हुई है। अन्य बचना... 


जे विभिन्न जातियों की धृष्टता और पापाचार के विरुद्ध परमेश्वर के दंड की 


.. अभिव्यक्ति है। और अन्य बचनों में अपने लोगों के उद्धार के लिये तथा संसार. 
. के धर्म-केन्द्र एवं सार्वलौकिक आशिष के ल्लोत के रूप में सैहन की महिमा कै लिये.“ 











. रर६ | पुराना नियम की भूमिका 
३, रूपरेखा का, 
.. यशायाह-सिय्योन का उद्धार 


(१) यशायाह प्रथम-चेतावनी की पुस्तक (१-३७; ई० पूृ० ८वीं सदी 
की परिस्थिति के लोगों को संबोधित ) 
 (क) यशायांह की बुलाहट और प्रारंभिक वचन (१-१२) 
(7) दिव्य बचन : नबी यहूदा की कृतघ्नता की भत्सेवा करता है और 
हु बतलाता है कि यहोवा केवल सदुजीवन से ही प्रसन्न होता है (१:१-२३) 
दंड देने के पश्चात यहोवा सिय्योन को पुनः बसाएगा (१:२४-३१) और उसे 
. परमेश्वर के बचन का केन्द्र बनाएगा (२:१-५) । उस दिन यहोवा ही ऊंचे पर 
विराजमान होगा (२:६-४:१ ), क्योंकि वह घमंडियों को नीचा करेगा । न्‍्याय- 
. निर्णय के पश्चात सिश्योन के लिये महिमामय भविष्य होगा (४: २-६) । 
दाख-उद्यान के दुष्टांत में नवी लोगों के पाप की निंदा करता है (४: १-७) । 
बह उन पर सात बार हाय मारता है और दंड की भविष्यवाणी करता है 
(५४८०-३०) । 





0 5 


(४) नबी की बुलाहट : उच्च स्वर से पुकारने वाले सारापों के बीच... 


यहोवा महाराजाधिराज के दर्शन का वर्णन नबी करता है। तब अपनी बुला 
और समादेशों का वर्णन करता है (६) 


(४) दिव्य वचन और कार्य : आरामी एप्रैमी युद्ध के समय आहाज की. 
. नीति के विरुद्ध यशायाह अपने पुत्र शाययूब सहित आता है (एक शेषाँश लौटेगा ) . 
. और इसम्मानुएल के आने की नबूबत करता है (७) । नबी अपने दूसरे पत्र का... 
. नाम महेर्शालाल्हशबज रखता है (अर्थात लुट शीघ्र आती, छिन जाना शीघ्र 
होता है) जो शोमरोन एवं दमिश्क के शीघ्र विनाश का चिन्ह है (८:१-१५) 





बह अपने शिष्यों को कहता है कि वे इस विश्वास में उसकी शिक्षा को बंद कर... 


.. उस पर छाप लगा दें कि यहोवा उसकी नबूवतों को सच्ची ठहराएगा [ 
हक पा 070 कक क्‍ 


.. शांति के राजकुमार के आने की नबूबत (६:१-७) । एप्रैमियों की बुराई 


... करते रहने के प्रति नवी भर्त्सना करता है-यहोवा का कोध शांत नहीं हुआ और 


.... उसका हाथ अब तक बढ़ा है' (६ : ८-१० :४) । अश्शर पर हाय मारता है, . 


होता है (१०: ४-३४) 





8 


.. जो यहोवा के क्रोध का लठ है, जिससे अश्शरियों के आक्रमण की ओर संकेत हि 





लगे धन्यवाद के गीत गाए जाएँगे (१२) 








हित हे राजा होओा (९३ 








ज्यञायाह 5  -- .- : रशर७ 
(क) विशेषकर विदेशी जातियों के विरुद्ध दिव्य वचन (१३-४२ ) : बाबुल 
के विरुद्ध भारी नवूबत (१३:१-१४: २३ ); अश्श्र के विरुद्ध (१४ २४० - 
२७) ; पलिश्तीन के विरुद्ध (१४ : रे ); मोआब के विरुद्ध (१५-१६); 
दमिश्क तथा अन्य के विरुद्ध (१७); कूश की नदियों के पार के देश के विरुद्ध 
(१८); और मिस्र के विरुद्ध, जहाँ यहावा का भक्ति की जाएगी, उस समय 
व्खाएल, मिख्ल और अश्णुर तीनों मिल कर पृथ्वी के लिये आशिष का कारण द 
(१६) | आनेवाली बंधुवाई के चिह्न स्वरूप यशायाह अधनरा और नंगे 
पाँव घमता फिरता है (२०) । समुद्र के पास के निज्जन प्रदेश के विषय भारी 
वचन (२१:१-१०) ; दमा (सेप. एदोम ) के विषय (२१: ११-१२); अरब 
के विषय (२१: १३-१७); देशन को तराई के के विषय (२२); शेवना नाम 
अंडारी के विषय (२२ : १५-२५); और सोर के विषय भारी वचन (२३) 
... [गं) प्रकाशनात्मक दशन (२४-२७) : सिय्योतर में यहावा के सिहासन 
पर विराजमान होने की प्रतीक्षा में पृथ्वी पर और जातियीं पर ईश्वरीय दंड आने 
. पर है (२४); यहोवा सिय्योत पर सब देशों के लोगों के लिए जेवनार करेगा 
और मृत्यु को सदा के लिए नाश करेगा (२५); उसके लागउस ते भरोसा 
कऋषेंगे, उसके सच्चे न्‍्याय के लिए उसकी सराहना करेंगे और मुद उठ खड़ होगे 
और जयजयकार करेंगे (२६); तीन अजगरों को यहावा नष्ट करगा, तब झुल्दः 
दाख की बारी का यश गाया जायगा, और यह प्रदर्शित होगा कि परमेश्वर जो 
दंड देता है वह जाति के भले के लिए ही होता है (२७) 


थ्‌) कूटनीति संबंधी दिव्यवच्चच (२८-३१ ): एप्रम और यरूशलेम पर 
विनाश आतनेवाला है। यरूशलेम ने मृत्यु के साथ वाचा बाँधी है, परन्तु यहावा 
ने सिय्योन में नेव का पत्थर रखा है (२८) | अरीएल ( यरूशलेम) पर संकट 


आएगा, परन्तु उसके शत्रुओं के सन्‍्मुख उसका सच्चा 5 राएगा | फिर भी उसमें | 
ने वाले अंध्रे हैं, कपटी हैं, अविश्वासी हैं (२६) | मिख की शरण मे जाने पर द 


कक 


हाथ (३० : १-५) और दक्षिण देश के पशुओं के विषय भारी वचन (३० 
६-७) । यहूदा की वीरता कटनीति की संधियों में नहीं परंतु शांत रहने और 
. अ्रोसा रखने' में है (३० : ८-१७) । मिस्र की सहायता व्यर्थ और निकम्मी 

है, क्योंकि 'मिख्री लोग ईश्वर नहीं, मनुष्य हैं, और उनके घाड़ आत्मा नहीं, 
मांस ही हैं --सेनाओं का यहोवा यहूशलेम की रक्षा करेगा (३१ | 


(च) मसीह के युग संबंधी दिव्यवचन (३२-३५) : एक राजा धर्म से 


राज्य करेगा और आत्मा ऊपर से उंडेला जाएगा (३२); नाश करनेवाला 
. और अधर्मी नष्ट किए जाएँगे, यहोवा शोभा सहित राजा होगा, वह स्यायीऔर 5... 





























ररुघ... पुराना नियम की भूमिका 


.. (छ) एक प्रकाशनात्मक दिव्यवचन (३४-३५) : यहोवा जातियों का _ 
न्याय करेगा, आकाश कागज के सदृश लपेटा जाएगा, और एदोम को दण्ड दिया 

एगा (३४) । इस्राएल में जंगल और नि्जल देश प्रफुल्लित होंगे, और 
. यहोवा के उद्धार किए हुए लौटकर जयजयकार करते हुए सिय्योन में आएंगे 
(8५). 3 
(ज) सन्हेरीब और हिजकिय्याह (६६-३६) (२ रा० १८-२० में सामग्री 
है) : रबशाके हिजकिय्याह राजा की खिलली उड़ाता है कि वह अश्शूर के सम्राट 
का विरोध करता है; रवशाके हिजकिय्याह को पत्र भेजता है कि वह अश्शूर 
के अधीन हो जाए; हिजकिय्याह उस पत्र को यहोवा के समक्ष रखता है; 
 यशायाहू यहोवा की ओर से स्वतन्त्रता का संदेश देता है; अश्श्रियों पर विपत्ति 
और उत्तका भागना (३६-३७ ) । हिजकिय्याह का रोगी होता; चंगे होने पर 
उसका गीत (३८) । हिजकिय्याह बाबुल के राजा मरोदक-बलदान के दूतों को 
अपने अनमोल पदार्थों का भंडार दिखाता है; यशायाह हिजकिय्याह राजा की 
भत्संता करता है (३६) द 








(२) द्वितीय यश्ञायाहू, शांति की पुस्तक (४०-५५); छंठबीं सदी ई० पू०, जो न है 


बाबल में निर्वासितों को संबोधित है । द 
(क) शुभ समाचार (४०) : यरूशलेम की कठिन सेवा और दंड पूरा 


.._ हुआ । शुभसंदेश देनेवाली वाणी एक नए निर्गम और परमेश्वर की महिमा की _ 
... घोषणा करती है। वह सामथ्य सहित चरवाहे के समान अपने झू ड के पालन के 







.. लिए आता है | परमेश्वर अनुपमेय है, वह इस्राएल का पवित्र है। वह शक्ति 


को बहुत सामर्थ देता है।.. 
... (ख) अनुपमेय उद्धारकर्ता (४१-५४) ा 
(7) समस्त विरोधियों को परमेश्वर उसके वश में कर देता है (४१ :१.. 













..... -४२: १२) : किसने विश्व-विजयी को उठाया है और उसके आने का समाचार 


रा पहले से ही दिया है ? प्रभु ने ही यह किया है। यदि ऐसा हो तो सब जातियाँ रा. 


... यहोवा के लिए एक नया गीत गाएँ (दास काव्य, ४२ : १-४, ६, ७ : यहोवा 


..॑. अपने दास को अपना आत्मा देगा कि वह अन्य जातियों के लिए न्याय प्रकट 


.. करेगा; यह दास परमेश्वर का चुना हुआ है। वह नम्रता और सहानुभूति से, 


... सच्चाई और निष्ठा से पृथ्वी पर न्याय की स्थापना करेगा। वह अपनी प्रजाके.. 


आम .. लिए व्यवस्थान और अन्य जातियों के लिए नकाश होगा । 








) 


अपने लोगों का उद्धार करने के लिए यहोंवा की तीज भावना (४२ । 


। के कारण परमेश्वर के उत्साह में बाधा [| 











2० जयकार करें (४२ ४ 








यशायाहू ._.. .- . : ए२६ 


उत्पन्न होती है (४२ : १३-२५), परंतु निर्वासन से पुनः लौठाने की उसकी 
पुकार निश्चित है। जो अद्भुत कार्य वह करने पर है, इस्राएल उसके योग्य 
नहीं है, परंतु वह अपने नाम के निमित्त ही वह कार्य करेगा । इसलिये याकूब 
न डरे, परंतु भरोसा रखे--आकाश और समस्त सृष्टि परमेश्वर का यशोगान 

रे (४३ : १-४४ : २३) । द 


डर 


जे र 


दि 


(॥) यहोवा ने अपना कार्य करता आरंभ कर दिया है (४४ : २-४६ 
१३)--उसने कऋुसम्र्‌ राजा को इसलिए उठाया है कि वह दण्ड और मुक्ति का 
माध्यम बने (४४: २४-४५ : ८५) । इस्राएल इस पर शंका न करे कि ए 
अन्यजाति के व्यक्ति को माध्यम बनाया गया है, क्योंकि परमेश्वर मूर्तियों के 
7 नहीं समझतीं कि क्या हो रहा है। परमेश्वर जो कछ 
करता है उसे जानता है; सारी पृथ्वी के देशों के लोग उसकी ओर फिरें और 
उद्धार पाए (४५: ६-२५) । बाबुल की मूरतों और यहोवा की भिन्नता ! बाबुल 
नाश होने पर है । इसलिये याकूब अविश्वासी न हो। यहोवा ने अपनी प्रजा 
.. को शांति दी है और अपने दीन लोगों पर दया की है (४६ : १-४६ : १३) 


५ 


(दास काव्य ४६:१-६) : दास को यहोवा ने बुलाया। परंतु दास यह 
अनुभव करता है कि उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया; फिर भी परमेश्वर ने उसे 
एक और अधिक महान कार्य सौंपा, अर्थात्‌ कि वह अन्य जातियों के लिए एक 
ज्योति ठहरे कि परमेश्बर का उद्धार पृथ्वी की एक ओर से दसरी ओर तक _ 


. ने सिय्योत का परित्याग नहीं किया, क्योंकि सिय्योन का चित्र उसके हाथ पर 

: खुदा हुआ है । सिय्योत निराश क्योंकि अब उसकी संतान इकठठे होकर 
. लौट रहे हैं- उसे दण्ड दिया गया परन्तु उसे त्यागा नहीं गया (४६ :४- 
कह 07 ३) आह 3 


(दास काव्य, ५० : ४-६ : दास अपमानित होता और दुःख सहता हैं, 
फिर भी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में वह दृढ़ और विश्वस्त रहता... 
..  है।) निर्वासितों से आग्रह किया जाता है कि वे अपने मूलपुरुष अन्नहाम और 
. अपनी माता सारा पर ध्यान करे, जिनसे परमेश्वर ने एक बड़ी जाति बनाई। 

वे स्मरण करें कि परमेश्वर ने उन्हें मिख्ननिवासियों से छुड़ाया और समझुद्र 





.. में उनके लिए मार्ग निकाला। आज भी वही उनका पुनरुद्धार कर रहा है 
.. (४० : १०-५१ : २३) । इसलिये सिय्योत अपने शोभायमान बस्त्र पहिन ले . 
.. और परसेश्वर के उद्धार का स्वागत करे, और यरूशलेम के सारे खंडहर जय- 


-“१२) 

























. 5 “हैं: (६)-। 


३० .. पुराना नियम की भूमिका 


.. (दास काव्य, ५२: १३-५३ : १२) : कौत परमेश्वर के उद्धार की रीति 
पर विश्वास कर सकता है ! उसने अपने धर्मी दास को अपमानित होने दिया 

.. अपराधियों के पापों के लिए उसका प्राण दोषबलि बताया गया-हमारे ही अप- 
. राधों के कारण वह घायल किया गया ! | 
.. सिय्योत जयजयकर करे, क्योंकि वह पुनः निर्माता, अपने निर्माता परमेश्वर 
की सुहागिन होगी (५४) । 
.. (ग) उद्धार का सेंतमेंत वरदान (५५) : अनन्त वाचा के रूप में परमेश्वर 
के सेंतमेंत उद्धार का वरदान लोग ग्रहण करें | उन्हें इस बात का निश्चय रहे कि 
पनर्स्थापना सम्बन्धी परमेश्वर का वचन अवश्य पूर्ण होगा । 

(३) तृतीय यज्ञायाहु, सिय्योन-महिमा की पुस्तक (५६-६६); जो 
अधिकांशत: निर्वासन के पश्चात्‌ पुनर्स्थापित समाज को सम्बोधित है). 

(क) उद्धार के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ और बाधाएं (५६-५६) इस्राएल .. 
को जो अधिकार दिए गये हैं उनमें परदेशी और खोजे भी सम्मिलित किए जाएंगे 


( फ़ * ५ स्कि>य )] ; ञः स़््याथ . और झ्‌ठ | देतवताआ का उपासना की निन्दा ( न: ध्ाण के 


५७: २१) | हृदय से नैतिक आचरण करता ही सच्चा उपवास और विश्वामदिन 
पालन है (५८); लोगों के पापों के कारण परमेश्वर के उद्धार में बाधायें आती _ 


.... (ख) सिय्योन की भावी महिमा का चित्रण (६०-६३:६) : महिमान्वित 
 सिय्योन, जो परमेश्वर के चिरंतन प्रकाश से, उद्धार की नाह से और 


.. जयजयकार के ह्ारों से तेजोमय होगा, वह संसार का धर्म-केन्द्र होगा (६०); 








. उन सब को जो शोक करते हैं, शांति प्राप्त होंगी, और धामिकता एवं धन्यवाद 


. की फल-ऋतु होगी (६१) । जब तक यरूशलेम सारी पृथ्वी पर उसकी धामि- 


:5कंता के प्रकाश के सदश ने हो जाए. और उसका उद्धार जलते हए पलीते के 


.... . समान दिखाई न दे तब तक प्रार्थना चलती रहे (६२) । एदोम देश और अन्य 
_.. जातियों को दंड देकर परमेश्वर निकल चुका है (६३ : १-६) 














(ग) परमेश्वर से सहायता की दृह्ई (६३: ४ : १२) : इस्राएली 
... लोग परमेश्वर की दया का स्मरण करते हैं और पिता और उद्धारकर्ता मान- 
है रा रा कर उससे विनती करते हैं (६३ : ७-१६) । वे उसे पिता कहकर पुकारते हैं. 


आओ 










सय्योन का उद्धार (६५-६६) परमेश्वर 
पून 





। 
। 


हि 
' ! 
॥ 
| 











शायाह हर द . . - २३१ 


१६) । बह शांति के मसीहसम्मत युग की स्थापना कर नये आकाश और नयी 
थ्वी को उत्पन्न करेगा (६५: १७-२५) । परमेश्वर भवन नहीं, बरत दीन 
और खेदित मन चाहता है (६६: १-४) | वह यहूशलम को शांति प्रदान 
करेगा. दुष्ठों को दंड देगा, और सिय्योन सार ससार का धर्म-केन्द्र बन जाएगा. 
(६६: ४ रे४ढ) । 

४----रचना, रचयिता, रचना तिथि 

ग्रशायाह की पुस्तक की विषय सामग्री के अध्ययत से यह सस्ट ज्ञात होगा _ 

कि पस्तक की रचना बड़ी जटिल हैं । इसका सामग्री का क्रम तैथिक नहीं है 
गिर्मंयाह और यहेजकेल को पुस्तका मे उनकी बलाहठ पुस्तक के पहले अध्याय 
में वणित है। यशायाह की पुस्तक में भी यह अपक्षा की जा सकती है कि 
बलाहट पहले अध्याय में होगी । परंतु बह छठवे अध्याय मे है । विदेशी जातियों 
के विरुद्ध नववतों से ऐसा लगता है कि पुस्तक के कुछ भागा में विषयानुसार 
क्रम संगठन किया गया हैं | परतु पुस्तक को सर्वाधिक विचित्र विशेषता यह न 
कि उसमें प्रस्तुत नवूवतों के लिए विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों की श्रावक- 


ल्पना की गई है। जो रूपरेखा ऊपर दी गई है उसमें इनका संकेत किया जा 


चका है | उनके आधार पर पुस्तक के तीन बड़े उपविभाग किये गये हैं ->प्रथम 
यशायाह, द्वितीय यशायाह और तृतीय यशायाह | ब्रवस भाग आमोस के पुत्र 
यशायाह के यंग को संबोधित किया गया हैं, जा उज्जियाह या अजरायाह (७८ 
७८० ई० पू०), योताम (ई० पू० ७४२-७ ५), आहाज (ई० पू० ७३५४८ 
७१५), और हिजकिय्याह का समकालान था । 


, 


ड्ितीय भाग में कुछ एसी परिस्थिति का अनुमान है, जिसमें उत लोगों 


: को संबोधित किया ण्या है जो विभिन्न जातियों में बिखरे हुए लोगों में स्वतंत्र. 
किए जाने वाले हैं (४३: १-७) । इस स्वातंत्य का माध्यम कुस्त्र 


है 


२८; ४५: १).। बाबुले के देवता, बेल और नेवी को शुकावा | है (४६:१) ४ 


का 


५5५ 


£ १४ क 


और निर्वासितों को बाबुल में से निकल जाने और करसदियों के वीच से भाग जाने. 
को कहा जाता हैं. (४८:२०) । इतिहास से पता चलता हू कि कूख (ई. पू.. 


४३६-५३०) ने बाबुल पर ई० पू० ५३६ में विजय श्रात की। अंत: जिन ४. 


निर्वासितों को इस भाग में संबोधन किया गया हैं, वे उसके समकालीन होंगे 


_ इसका अर्थ यह हुआ कि यशायाह के पत्र आमोस के लगभस दो सौ वर्ष ः 
पश्चात रहे होंगे 5 


द्वितीय यशायाह की एक प्रमुख ः 
इनमें जो विषय सामग्री है वह एकसी है 








विशेषता यह है. कि उसमें “दास काव्य 


हक] 














त्‌ यहीवा का चत्ता हुआ - का 















२३२ | $ पक पुराना नियम की भूमिका 


.. दास तुच्छ जाना जाता है और दुःख उठाता है। पुस्तक के इस भाग के शेष 
 अंशों के साथ दास काव्य” कुछ संगत प्रतीत नहीं होता । सामान्यतया यह 
माना जाता है कि ये कविताएँ 'दास-काव्य' के अंतर्गत आती हैं (४२: १-४, 
. ६,७;४६ : १-६; ४५० : ४-६; और ५२: १३-५३ : १२) । कुछ छोगों का 
. विचार है कि इस प्रकार की साहित्यिक सामग्री इससे कहीं अधिक होनी चाहिये । 
. पुस्तक का तीसरा भाग, तृतीय यशायाह, और भी अधिक जटिल है 
५६: १-८ से यह अनुमान किया जाता है कि भवन निर्मित हो गया और 
कि उपासना में बलि-विधियों की स्थापना हो चुकी है । विश्वामवार को मनाने 
की प्रधानता और परदेशियों के प्रवेश के विचारों से निर्वासनोत्तर परिस्थिति 
. का संकेत मिलता है। इसके विपरीत ५६ : ६-५७ : १३ अंश का यदि पृथक 
रूप से विचार किया जाए तो वह निर्वासनोत्तर स्थिति के अनुकूल नहीं, वरन 
निर्वासनपूर्व स्थिति के अनुरूप जान पड़ता है और राजा की ओर संकेत करता 
हैं (५७: ६) । इस अंश से पलिश्तीन के पहाड़ी प्रदेश का नहीं, वरन वबाबुल 
के मैदानों की व्यंजना होती है (५७ :५) । फिर ५८ वें अध्याय से उपवास 





और विश्वामवार पालन का संकेत मिलता है, जैसा जकर्याह नबी के काल में... 


प्रचलित रहा होगा (दे० जक० ७: १-७; ८५:१६) । जकर्याह की नबूबत का. 


काल ई० पृ० ५२० है, जो निर्वासन से लौटने के उपरांत है। ६०, ६१. 


.. और ६२ अध्यायों की सामग्री द्वितीय यशायाह के अनुरूप है। उनसे य 


..... संकेत मिलता है कि निर्वासित लोग अभी तक पलिश्तीन नहीं लौटे, परंतु . 
.... लौठनेकी तैयारी में हैं। दूसरे शब्दों में यों कहें कि इन अध्यायों में 
... मसीहसम्भत यूग के अंतर्गत सिय्योत के तेजोमय होने का रूपकात्मक उल्लेख 

... किया गया है। इसके विपरीत ६६: १-२ से यह व्यंजित होता है कि लौटे 









.. हुए निर्वासितों ने भवन बनाना आरम्भ कर दिया है, जो ई० पू० एस में 
५2 ५ । । हुआ | तृतीय यशायाह के अमेक अंशों में इस प्रकार के बेषम्य से यह अनमान ४ हा 
.. किया जाता है कि. पुस्तक का यह भाग एक संकलन है जिसमें निर्वासनोत्तर 


के, 


रा ा _नबूबतों के साथ निर्वासन-पूर्व तथा निर्वासनकालीन नबूवतें सम्मिलित 







हि 


..... कुछ विद्वानों का यह विचार है कि आमोस के पुत्र यशायाह को इस 
.. पुस्तक का लेखक मानना आवश्यक है, क्योंकि नये नियम में यश. २ और 


...... अध्याय से उद्धरण दिए गए हैं और यह संकेत किया गया है कि यशायाह 
... नतबी ने यह लिखा ( दे० मत्त ०  दें। ४: १४; रो०-१०:-१६, २० ) रे | के द 


... इस संदभे में हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि “यशायाह तबी' और 'यशाया 











यावहारिक दृष्टि से पर्याय माने जाते हैं, हे 
ब्थिता सम्बन्धी प्रशनों का विवेचन करते हैं, ०. . 



























| फेक 


पा किक मा त् 


यशायाह... ३०३ पक 


उस अर्थ में नया नियम के लेखकों के मन में रचयिता संबंधी प्रश्न उपस्थित 


नहीं थे। उस युग में इतना तिश्चय पर्याप्त था कि अमुक धर्मवचन प्रभु को 
ओर से है। हमारे यग में भी वेब्सटर के अंग्रेजी शब्द कोष से किसी शब्द के 
विषय प्रमाण देते हुए यही कह देते हैं 'वेब्सटर कहता है, यद्यपि हम जानते 


हैं कि बतंमान वेब्सटर शब्द कोष में बहुत सी सामग्री ऐसी है जो लगभग एकसो 
वर्ष पूर्व मूल लेखक नोहा वेब्सटर की कल्पना में भी न थी । क्‍ 

हम यह कह सकते हैं कि आमोस का पृत्र यशायाह उत घटनाओं के संबंध में 
नवूबत कर सकता था जो उसके युग के दो सौ वर्ष पश्चात्‌ होने वाली हों। 
यदि इस संभावना को मान भी लें, तब भी यह सत्र है कि इस्राएल के नबी उस 
समय भी जब वे भविष्य की बात करते थे, तब भी वे अपनी समकालीन परि- 
स्थितियों को ही संबोधित करते थे । द्वितीय यशायाह में नबी अपने समकालीन 
निर्वासितों को संबोधित करता है, जो बावल में थे (४५:१ ४2) 
४४ : २८) । अतः यह सामान्यतया स्वीकार किया जाता है कि कई नवूवतें, जो 
स्वयं यशायाह ने वहीं लिखीं, उसकी नबवतों के साथ संबद्ध हो गई हैं। हमें यह 
जात होता है कि यशायाह के कुछ चेले थे (८5:१६) । संभव है कि यह पुस्तक 


नै है 


. यशायाह-समृह की साहित्यिक निधि हैं, जो यशायाह को अपने समूह का संस्थापक 
मानता था। परंतु साथ ही बह समूह यशायाह परंपरा के अंतर्गत अन्य नबृवतों 
को भी मान्यता देता था । पु 


आमोस के पत्र यशायाह् की नवूबत के प्रारम्भ की लिथि ६: १ में उसको 
बलाहट के वर्णन में प्रस्तत तैथिक टिप्पणी के आधार पर निर्धारित की जाती _ 
! | उसमें लिखा है जिस वर्ष उज्जिय्याह राजा मरा । यह घटना ई., पू. ७४२ 


दा 
टः 


व 


श 


पर 8 00 पर पल 7० जि 


३६ और ६७ अध्याय) । यह घटना ई. यू, ७०१ में हुई । अतः प्रथम यशा- 


_ याह (१-३६ ) के अधिकांश भाग की तिथि ई० पू० ७ स्से ७०१ के बीच या. 


उसके तुरंत उपरांत ही मानी जा सकती है हे 
वित्तीय यशायाह (४०-४५) कुख्र द्वितीय, कुल महान के उल्लेख के आधार 


पर निर्धारित की जाती है । इस राजा ने अनेक लडाइयों में विजय प्राप्त कर हा मल 


फारसी साम्राज्य की स्थापना की | इन विजयों की पराकाष्ठा बाबल की विजय 


.. में हुई, जो ई. पू. ५१६ में की गई। नबूवतों में यह बताया गया है कि कुख्ू बाबुल 
की शक्ति को नष्ट करने में यहोवा के अभिप्राय को पूर्ण करने वाला है। अतः  . 
पुस्तक के इसे भाग की तिथि ई. पृ. ५३६ के कुछ पहले, अथति लगभग इई. पू..... 

















एड पुराता नियम की भूमिका 


. कारण कुछ कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैँ। साधारणतया उस को तिथि 
. निर्वासनोत्तर काल में या उसके बाद मानी जाती है। निर्वासन से लौटना 
. ई पृ, ५३६ में हुआ। अतः इसकी तिथि ई. पू: ४३६-१०० के बीच भें मानी 
. जाती है। इस संदर्भ में हमें यह स्मरण रखना है कि इस भाग में निर्वासन-पूवे 
और निर्वासनकालीन सामग्री भी सम्मिलित है । 


४. यद्यायाह की पुस्तक की ऐतिहासिक ५ ध्ठ्भ््भि 

६० पूृ० ४४५-अश्श्री सम्राट तिग्लत्पिलेसैर तृतीय (ई० पू० ७४५-७२७ ) 
ने असक्षमता दर की और अश्शरी ज्ञाम्राज्य में स्वर्णयुग आया। इ० ह०९ 3६८ 
में उसने इस्राएल के राजा मनहेम से प्रचुर उपद्वार प्राप्त किया (२ रा. १५: 
१६) 

ई० पू० ७४२--नयहुदा के राजा उज्जिय्याह ( अजयाँह ) की मृत्यु हुई । उस 
वर्ष में यशायाह को बुलाहट मिली । अश्शूर के विरुद्ध युद्ध में मिस्र देश ने छीटे- 
छोटे देशों को दाँव पर लगाया । अश्शूरी जूए के नीचे बाबुल में क्रांति की. 
भावना थी । ल्ज् 


7 ई० पृ० ७३४--आराम-ऐप्रेम युद्ध: अराम के राजा रसीन और इस्राएल 
के राजा पेकह ने यहदा के 'राजा आहाज के वि  मंतव्य से चढ़ाई को कि 
बलबील के पत्च | को यहदा का राजा बनाए । इस विपत्ति में आहाज ने अश्शर 


त 


.. से सहायता माँगी । यशायाह ने इस समय आहाज के सामने इस्सानुएल संबंधी 


-. सबूबत अस्तुत की. (७: १०२५) । इस समय यरूशलेम पर घैरा डाला गया 
»(ए रा, १६-: २४) हे कर द 

....  ई० पृ० ७४२२-२१--शोमरोन के आसपास तीन वर्ष तक वर्ा। उसके 

.. पश्चात शल्मनेसेर पंचम (ई० पू० ७२७--७२२) और सारगोन हिताय ई०पूएण 


... ७२२-७०५) के काल में शोमरोन अश्शूरियों के अध्रीन हो गया । 


डक 


५ प्‌० ७०१--भेश्शू 5 के राजा भम्हेरीब ( ७ पू७ ७०४-४८ ) 
_ - यहुदा पर चढ़ाई की । यरूशलेम घर लिया गया परंतु यशायाह की नबूबत 
.. अनुसार (३७:३६) अश्शूरी सेना के रहस्यमय विनाश के कारण यस्शजम 

- मुक्त हुआ। 


ई०पु० ६१२-नवोापालस्सर (ई० पु० ६२५-६०४५ ) ने नीनवे पर विजय 


... प्राप्त की और नव-बाबली साम्राज्य की स्थापना की । परंतु अश्शूरी राजा ई० 








नबूकद्रेस्सर) (ई० पू० ६०५-५६२) 








यशायाह... 8 के अर 
 अक परूशलेम को जीत लिया और बहुत लोगों की बंधुवाई में ले गया | इस श्रकार 
यहदियों की बाबुल में बंधुबाई आरभ हुई । 
मा . ई० पू० श्८७--नबुकदनेस्सर ने यहशजस का विनाश किया । 
बा  - ५ ५४--कख ने. (ई० पृ० ५३६-५३०) वाबुल को जीता और 


फारसी राज्य की स्थापता की । 

। ई७ पूछ ४३२४ “यह दियों का बधुता से लादना । 

ई० पू० ४२०-४१६-सरूशलम बन का पुनानमाए 
क्‍ ६. इम्मानुएल नबृूवबत की समस्या 

। 'सूनों, एक कुम ने गर्भवती होगी और पुत्र जनगा आर उसका साम इस्सा- 
नएल रखेगी (यश ७: १४) । मत्ती रुचि त सुसमाचार में इस पद का ख्र्स्ति 
है! के वेबारी से जन्म छेते के संबंध में उद्धरण किया गया हैं (मत्त १: २३) । 


न्‍्म' की बात यशायाह के मन में थी, और त्या दे आने 


परंत क्या 'केवारी से 
वाले मसीह के संबंध में लबूबत कर रहा था तत्कालीन ऐतिहासिक सदभ से 


होती ! ऐतिहासिक स्थिति की व्याख्या 





इस प्रकार की कल्पना सभदे प्रतीन नहीं 





जल ० स्वयं भी एक समस्या हैं । की 
आह का अर मम की माता के लिए जिस इब्रानी शब्द का असता किया गया हैं वह 


है (तर्क) है । इस शब्द से तरुणाई प्राप्त युवती का बांध होता 
# । उससे यह पता नहीं पैलता कि उम यबती को समागम का अनुभव हू. 
अथवा नहीं । जो इबाती शब्द कुवारँ दें लिए प्रयक्‍त होता हे. वह बंटुलाह 


(लग) है । सप्तात नवाद में अल्माह का अनुवाद (यश 3 पृडी। ॥ 
पारथितॉस (वीक्षवीस्था०ं)- किया गया हैं । ओोइबेल हे की यूनानी 
'श्षाषा में यह शब्द युवती के लिए काम में आया + अर उसमें “ समागम-का ० 
अ्नरनभव के होने ने होने का कोई सकत तह है परल सेपत्वागित यह | 
शब्द बरावर कुवारा के अर्थ में है” और उसी अर्थ में उसे: यहाँ समर हे 
चाहिए | अर्थात्‌ मूल इब्ानी में यशायाह ने थीं जिस अर्थ में लिया हो, सप्तति 

५ + ब४]- के यंवती शब्द को कुँवारी के. अर्थ 5 


हु अनुवादकी से यश याह रा $:: 
मे स्वीकार किया है । फिर भी, यह स्पष्ठ नहीं हैं कि क्‍या सप्तति अनुवादकों 

- ने यह विचार किया कि कँवारी होने की : अवस्था में ही बालक की जर्स 

_ दिया गया है । यहाँ पर यूनानी श पारियनॉस का अर्थ है एक नवयुवती जो मा रा 
... अभी कुँवारी है, जिसक विवाह होने वाला । और जो साधारण रीति से 
द रा गर्भवती होगी । जिन शब्दों का प्रयोग किया है, उनमें इससे अधिक अर्थ की ...... 


आवश्यकता नहीं हैं। / . 








| 2०५ 





कद 































२३ दा : पुराता नियम की भूमिका 


. इम्मानुएल नवूवत का ऐतिहासिक प्रसंग आहाज राजा की वह नीति है जो 

. उसने अरामी--एप्रेमी युद्ध के समय अपनाई थी। अराम के राजा रसीन और 

. इस्राएल के राजा पेकह ने आक्रमणकारी अश्शूरियों के विरुद्ध संधि की और 
इस नीति में वे आहाज को भी वलपर्वक साथ लेना चाहते थे । अतः उन्होंने 
आहाज को राज्यासन से उतारने तथा उसके स्थान पर “तबील के पृत्र' को बैठाने 

की योजना को (७: ६) । इस आपत्तिकाल में आहाज ने अरश्र से सहायता 

की याचना की। यशायाह ने परामर्श दिया कि यशायाह से सहायता माँगने के बदले 
आहाज शांत रह कर परमेश्वर पर भरोसा रखे (७ : ४, ६)। आहाज से कहा 

गया कि वह यशायाह के वचन की पृष्टि स्वरूप परमेश्वर से एक चिह्न माँग ले । 

परंतु उसने चिन्ह माँगना अस्वीकार किया। फिर भी उसे एक चिन्ह्र दिया गया। 

एक कुंवारी (अथवा वह कुमारी ) गर्भवती होगी और पत्र जनेगी (अथवा, 
गर्भवती है), और उसका ताम इम्मानुएल होगा (परमेश्वर हमारे संग) । वह 
कुमारी में यह निहित हो सकता है कि यशायाह किसी ऐसी कुमारी की ओर 
संकेत कर रहा हो, जिसे आहाज और वह दोनों जानते थे, अथवा वह किसी 
ऐसी कुमारी की ओर संकेत करे, जो तबी के बचन में तो गुप्त हो, परंतु नबी 
.. के सन में निश्चित ज्ञात हो । वह बालक मवखन और मधु खाएगा। इसमें 
कदाचित खानाबदोश जाति के आहार की ओर संकेत है । इससे पहले कि वह 
.. लड़का बरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना जाने, अह्शर की सेनाएँ इस्रा- 
.. एल और यहूदा दोनों पर अभूतपूर्व आक्रमण कर देंगी । इस प्रकार इम्मानुएल 
. नबूबत के प्रसंग से यह प्रतीत होता है कि वह इतने समय में पूर्ण हो जाएगी. 
... जिलने में बालक दूध छोड़ देता था, अर्थात अधिक से अधिक दो वर्ष में । यशा- _ 
...  याह आहाज को जो चिन्ह देता है वह 'इम्मानएल' का बिन्‍्ह है। इससे यह संकेत 
होता है कि अराम के राजा की धमकी से यहदा का राजा आहाज न छरे 


.. क्योंकि वे अश्शर द्वारा शीघ्र ही नष्ठ किए जाने पर हैं। साथ ही यह संकेत 
.. होता है कि आहाज अश्शुर से भी सहायता न माँगे, क्योंकि उसके लिये अश्शर 
....  अराम और इस्राएल से भी बड़ा शत्र है। हमारी धारणा है कि आहाज और 
.... उसके साथियों ने यशायाह को यह ताना दिया होगा कि जो कुछ हम करने हैं, .. - 
_ उसमें परमेश्वर हमारे साथ हैं। यद्यपि तुम अपने को नबी कहते हो, तथापि. 
पा ' घरभेश्वर न तुम्हारे साथ है न तुम्हार अनुगामिय के साथ - क्वोकि ८: ८ - ह 
ह ० में इम्मानुएल (परमेश्वर हमारे साथ) शब्द का प्रयोग यहदा के संबंध में 
५7 किया गया हैं; (जिस रूप में: यहूदा का रांजा उसका शासन करता था। 


रमेश्वर तुम्हें एक चिन्ह देता है कि परमेश्वर... 
है १०) 4 परमेश्वर उस बालक पा 





यशायाह || २३७ 


230 58 महुल ८९2 ७-६ अंक क 


_क्षेद्वारा नवीन रूप से कार्य आरम्भ करेगा, क्योंकि उसकी माता इस्ाएइल की 
सच्ची प्राचीन परंपराओं में (खानावदोश जीवन-प्रणाली में) उसका पालन 
पोषण करेगी । इस प्रकार यहाँ मनुष्य की तिकटवर्तों राजनीतिक योजना 

.. 5 के,जो केवल म नवी साधनों पर निर्भर रहती है, और एक पनिरभित राष्ट्र 

|... बनाने की परमेश्वर की योजना के बीच जिसमें एक नई मानवता का प्रारस्भ 

होगा, विषमता प्रस्तुत की गई है । कदाचित यणशायाह के मन में पुननिर्भित 
शघ्ट की कल्पना उस विश्वासयोग्य शैषाश (काआ80| ) से संबंद्ध हैं जी 

_ बर्तमान राष्ट्र के नष्ट होते पर बचाया जाएगा। साता-उच् पद्धति परमेश्वर को 


पद्धति है जो बह अपने अभिप्रायों को पूरा करन में काम में लता ह 


डद्यजोल्ससइटपकप व 5पता इसे: 2 कट फसिकका 


2] डर 
ध्ाा 


ला अल 


का रह मल ली अनेक 


गरशायाह का विचार केवल तात्कालिक ऐतिहासिक परिस्थितियों को ही 
लाग नहीं ह उनसे आगे पहुँचता है यशायाह ६ : ६ में अद्भत बालक 
वस्तुत: मसीह, के विषय नबूबंत हैं। वह पराक्रस! परमेश्वर होगा, उसका नाम 
वही होगा जो परमेश्वर का नाम है। यशायाह ने जब माता-उु्त के उस चिन्ह 
र गहनता से विचार किया जा आहाज का दिया गया था, तो परमेश्वर का 
सहायता से उसने यह देखा कि मसीह सम्मत यूग को लाने के लिये भी परमेश्वर 
की यही पद्धति होगी । अतः यद्यपि माता-बालक अथवा इम्मानुएल का चिन्ह 
का तात्कालिक राजनीतिक परिस्थिति से संबंध था तथापि वह समस्त मानव 
जाति के लिये परमेश्वर के विशाल अभिप्राय का भी चिन्ह था। वह इस बात 
_ की आशा या नवबूवत था कि इसी पद्धति से परमेश्वर भविष्य में ओर म 
कार्य करेगा का, 
3 एक प्रश्न और उपस्थित होता है। क्या ७: १४ में खिस्त के कुंवारी से ्त 
.. अस्म लेने की नबूबत है ? इसका उत्तर देते समय हमें नबूवत के स्वरूप को 
ध्यान में रखना होगा । नबी अपने दिकू और काल से सीमित है अवश्य, परतु 2 
.. बह उसकी और से बोलता है जिसका अभिप्राय समस्त विश्व और सब | 
. कालों से संबंधित है। तो जो कुछ नबी कहता है उसका केवल तात्कालिक ह 
.._ परिस्थितियों में ही महत्व नहीं है, परंतु इस बात में भी है कि वह अभिप्राय ॥ 
:. की दिशा को इंगित करता है और जिस दिशा की ओर वह संकेत करता हैं द 
. बह अभिप्राय की पूर्ति में ही पूर्णतया स्पष्ट होती हैं। यशायाह ते परमखत 
. की योजना के दर्शन की रूपरेखा मात्र ही प्रस्तुत की | यशायाह ने जा संदेश: 
. आहाज को दिया उसमें माता-बालक का चिन्ह सर्वाधिक महत्व की बात नहीं 
थी, क्योंकि उसमें बेंटुलाह शब्द के बजाय अलमाह उब्द का प्रयोग किया... 
.. गया है। महत्व की बात यह थी कि परमेश्वर की माता-बरालक योजना और 
. मानव की योजना में अंतर है। परमेश्कर की योजना की अन्य सूक्ष्म बाते से मी 





| 
रे 


॥ 
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| एहेद......>€$ पुराना नियम की भूमिका 


बताई जाने को हैं। विश्वासी लोगों ने ज्यों-ज्यों इन नवूबतों पर मनन-चितन 
.. किया, त्यों-त्यों उन्हें अधिकाधिक यह प्रतीत होने लगा कि उस अद्भुत बालक, 

परमेश्वर के मसीह का जन्म अद्भत होना चाहिये । फलत: उस समय तक जब 
इब्र।नी धर्मशास्त्रे का यूनानी भाषा में अनुवाद हुआ, बालक की माता कुँवारी' 
. मानी जाने लगी और 'पारथिनोस' अर्थात कूँवारी' शब्द का प्रयोग किया गया । 
यह आशा परमेश्वर की ओर से थी, क्योंक्रि जब यीशु मसीह देहधारी हुआ, तो 
वास्तव में उसने कूबारी माता से जन्म लिया । साता-बालक के चिन्ह में परमे- 
गए़्बर का अभिप्राय उस समय स्पष्ट हुआ जब कुँवारी-बालक की घटना हुई। 
दोनों ही 'इम्मानएल थे। इस प्रकार यशायाह को नबूबत यीशु खिस्त के 
_ कुँवारी से जन्म लेने का पूर्वाभास था । 


७. धर्म-भावनाएँ ओर धर्म शिक्षाएँ 


3४ 


अनसार प्रस्तत किया जा रहा है 


प्रथम यशायाह हे बी 

यशायाह की नबूवत की विषय सामग्री के अंतर्गत उस दर्शन का खिलना _ 
है जो नबी की बुलाहट के समय सबल रूप में उसे प्राप्त हुआ (अ. ६.)। 
. मन्दिर में उसने प्रभु को ऊचे सिहासन पर वेभव में विराजमान देखा । साराप 

.. (“जलते हुए!) उसकी सेवा में थे। वें उसकी आज्ञा के पालन के लिये तत्पर 
 थे। बे बड़ी नम्नतापूर्वक पुकार रहे थे सेनाओं का यहोवा पवित्न, पविद्न, पवित्र 


.. है: सारी पृथ्वी उसके तेज से भरपूर भूडोल और धुएँ से प्रभु का ऐश्वर्य 
..... और अधिक प्रभावशाली हुआ । यशायाह पुकार उठा, हाय ! हाय ! मैं नाश _ 
..... हुआ,'”'““क्योंकि मैंने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आँखों से 
_... देखा है! | इसके पश्चात्‌ बेदी पर से अंगारे के द्वारा उसके होठों को शुद्ध किया 
_.. गया, तंब बुलाहट हुई “मैं किसको भेजू, और हमारी ओर से कौन जाएगा ? 


और उसका उत्तर दिया गया । "मैं यहाँ हैँ, मझे भेज' । तब यशायाह को संदेश 


दिया गया और बताया गया कि लोग उसकी न सुनेंगे । उसने प्रश्न किया कि 








.. कब तक यह संदेश दिया जाए ? तब उसे बताया गया, कि यह तब तक दिया 
. जाए जब तक नगर न उजड़ें, और उनमें कोई रह न जाय, जब तक लोग बवंद्ुबे 





......._ न हो जाएँ और केवल थोड़े से ही बच रहें-वह शेपांश अथवा पवित्र वंश' _ 
22 ः | रे जिससे परमेश्वर का अभिप्राय आगे बढ़ेगा हा 


.. इस बुलाहट के अनुरूप हम यशायाह की पुस्तक में यह पाते हैं कि उसमें 2 











बल दिया गया है । यहोवा इस्राएल का... 








यशाया 


>सधयकाचसलपरतव सका दि पटएपट तह च नए पति 77 खिस्त पल 


5. 


दे 


तम्हारे पाप चाहें लाल रग के हाँ 
| (१: 


पवित्र है. (१: ४ ; ५: २४) | उसके भय और प्रताप के कारण जातियी का 
न्याय होता है (२: १०) । केवल वही सब मनुष्यों और देवताओं से ऊंचे पर 
विराजमान होगा (२:११) । सेनाओं का बहोवा न्याय करने के कारण सहाल 
20.7... ठहरता, और पत्रित्र परमेश्वर धर्मी होने के कारण पवित्र ठहर 
2 .... ऐसा परमेश्वर मनुष्य से भी ध्र्माचरण और न्याय की माँग करता है ः 
द आमोस और होशे के समात यशायाह ने अपने युग के दूराचरण की निदा के 

उसने कहा, भलाई करना सीखों, यत्न से न्याय करा, उपद्र्त 
का न्याय चकाओ, विधवा का मुकदमा लड़ो (१:१७) 
परमेश्वर की और फिरने का आह्वान किया-आओं 
भी वे हिम के 
)। यशायाह की बुलाहट में एक और शिक्षा निहित 
गे होता है, कि परमेश्वर का अभिप्राय लोगों के 'शप्राश द्वारा 


सल पर्चा लाप आओ 7 
। बाद-विवाद कर : 
नाई उजले हो जाएँगे 


फू 
$. (१ से 






हर 









है (५:१६) 


! सुधारों, अनाथ 


है जिसका विकास 
पुरा किया 




















_ की गई कि परमेश्वर पर उसका पूर्ण भरोसा नहीं था (७:६) पा 
प्रवित्र पर भरोसे को सामथ और मिस पर भरोसे की निर्बलता के बीच. 
(३०: १५) । सन्हेरीब के आक्रमण के समय यशायाह 


.. का परमेश्वर पर भरोसा प्रमाणित किया गया पा 
हर रा प्रार्थना के उत्तर में यशायाह ने सिय्योत की रक्षा के लिये कहा था, मैं अपने... 


जाएगा | अधिकांश लोग उनके पापों के दंड के कारण नष्ट हो जाएग, परल्दु 
विश्वासी 'अंश' नई इख्राएल का मूल बनेगा (१० : २०७२३) नई इस्राएल 


४ परमेश्वर का अभिप्नाय मसीह के व्यक्तित्व के द्वारा पर्ण होगा । यह मसीह 


. द्वाऊद के वंश का होगा। उसे इतनी मात्रा भ बभु का आत्मा मिलेगा कि वह 
परमेश्वर की योजना पूर्ण करेगा और विश्वव्यापी धर्म तथा शाँति के युग की 


स्थापना करेगा (६& 


“७; ११: १-६ १-४), और उसकी पवित्र 


इच्छा के वचन का केन्द्र होगा ! कर 
यशायाह में इतिहास की दार्शनिक भावना की अभिव्यक्ति हैं । परमेश्व र' 


. विश्निन्न राष्ट्रों को दंड देते के लिये अश्शूर को माध्यमंहूप प्रयोग करता हू, 


ग्रद्मपि कि स्वयं अश्शुरी जाति परमेश्वर को नहीं मानती और यह मानती द 


कि 


+ कि उसका आधिपत्य उसकी अपनी शक्ति के कारण हूं अश्शरियों का जब 


मध्यम के रूप में कार्य पूरा हो जायगा, तब वे स्वयं अपने घमंड के लिये .. 


द दंडित्‌ सृ ( १५० : ४०१४ १५, १६ ) 
अधिकार और शक्ति परमेश्वर को ओर स धरा 


इससे यह शिक्षा मिलती है कि 
के रूप में रहना चाहिये । 

.. ग्रशायाह की पुस्तक में इस बात पर बल दिया गया है कि मनुष्य को 
परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिये । आहाज का इस बात के लिये भर्त्सना 


षम्य दिखाया गया 
जब हिजकिय्याह की विनम्र 

























इस्राएल के... 








|. २४० ... प्राना नियम की भूमिका 


 तिमित्त और अपने दास दाऊद के निमित्त, इस नगर की रक्षा कर उसे 
बचाऊँगा' (३७ : २२, रेरे-३६) । 


. द्वितीय यशायाह 
_.. यशायाह की पुस्तक के इस भाग में पुराने नियम में मानों सुसमाचार' 
है, क्योंकि इसमें उसकी प्रजा के उद्धार का सुसमाचार है द द 
इसमें इस विचार को प्रधानता दी गई है कि सृष्टिकतो तथा शासनकता 
के रूप में परमेश्वर की महानता अतुलनीय है । जिसे संसार महान मानता हू, 
संब कुछ परमेश्वर के सामने नगण्य हूं, क्योंकि परमेश्वर ने उन सब को 
.. रचना की है (४०: १२-१७, २६) । उसके सामने मनुष्य के हाथों की बना 
हुई मुरतें कुछ नहीं हैं। वे बोल नहीं सकतीं, कुछ कर नहीं सकतीं । वे व्यर्थ 
हैं. (४० : पृ८ के. ४: ७-१६) । परमेश्वर .को तुलता उनके साथ नहीं को जा 
सकती क्‍योंकि केवल वही परमेश्वर है--'मैं सबसे पहिला हूँ, और मैं ही अंत 


तंक रहगा; और मुझे छोड़ कोइ परमेश्वर हा न 20050 औ 
इंस्राएल के उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ सक्रिय है। वह 


इस्राएल का छड़ानेवाला है (४१:१४) । वह उनके पापों को क्षमा करता... 


5. हैंऔर उनके साथ सदा की नई वाचा बाँधता है, अर्थोत दाऊद पर अटल 
करुणा की वाचा (४०: १, २; ४५ ३ )। बह इसत्राएल से कहता 


.. के मत डरो, क्‍योंकि मैं तेरी सहायता करूँगा (४१:१३; ४०:२६) । वह 


स्‌ तथ्य की और उनका ध्यान आकर्षित करता है कि कुस्रू को उठाने के 


द्वारा वह उनके उद्धार के लिये संक्रिय है (४१: २५; ४४: २०८ )। 
577 इच्राएंल के लिये परमेश्वर के प्रेम का वर्णव इन उुन्दर शब्दों में किया गया 
.. है। वह चरवाहे की नाई अपने झूड को चराएगा, वह भेड़ों के बच्चों को 


_ अंकवार में लिये 'परेगा और दूध पिलानेवालियों को धीरे-धीरे ले चलेगा' 


खिस्तीय सुस-..वार की प्रत्याशा की दृष्टि से दास-कविताएं अत्यंत 
महत्व वूतत (४२.: १-७ 8 : १-६५ ५०७: ४-है; ४६२ : १३-५३ :.. 
सा 5 १२ ) | इनमें परमेश्वर के दास का चित्रण है । वह नबी, आदशश इस्राएल 
_ या मसीह, परमेश्वर का चुना हुआ दूत या प्रतिनिधि माना गया हैं । इस 


रा दास को एक सा्वेलौकिक काये सौंपा गया है कि वह अन्यजातियों के लिये 
.. प्रकाश हो | नैराश्य, विफलता, दुःख और उसकी मृत्यु उसके लोगों के पापी 


... ः के लिये प्रायश्चित 














द्वारा यीशु खिस्त की उद्धारात्मक सेवा का जैसा सुन्दर और महत्वपूर्ण चित्रण क्‍ 
#हाँ हुआ है वैसा अन्यत् हा माप, रा 


गगा। पुराने नियम में स्थानापन्न दुःख एवं मृत्यु के | 























यशायाह 5 २४१ 


ततीय यशायाहं 

यशायाह की पुस्तक के इस भाग से शिक्षा मिलती है कि विश्वास- 
बार मताता, उपवास रखना और सामूहिक आराधना जे सी धामिक विधियों 
को हृदय की भावना से मनाना चाहिये (४८:१३; श८ : देल५ै3 ईिड:फ रे ) 


यद्यपि परमेश्वर ने इलाएल का विशेष रूप से चना तथापि उसका अभिप्नराय 


यह है कि समस्त जातियाँ उसे जान और उसी की आराधना करे- मेरा भवत 
व देशों के लोगों के लिये आरर्थना का घर कहलाएगा 0 28 अं 

परमेश्वर की महान भलाई इस वात मे प्रकट होती हैं कि परमेश्वर ते 
इस्राएल पर करुणा की है पर विशेषकर इस बात में कि उनका उद्धा रकर्ता 
होने के नाते वह उनके अपराधों के कारण घायल किया गया और अधर्म के 
कामों के हेत कुचला गया और परमेश्वर की आत्मा ने उनको विश्वाम दिया 
(६३: ७-१४) इसी लिये परमेश्वर उनका पिता और डाने वाला है (६३ 
१६-१७; ६४: ८७) ! 

परमेश्वर का अभिष्राय सिय्योन के तेजोमय होने में पूर्ण होगा | इस अभि- 
प्राय का बड़ा स्पष्ठ एवं सुन्दर चित्रण किया गया है। सब जातियाँ उसके प्रकाश 
में चलेंगी । उसकी शहर पनाह का नास उद्धार और फाटकों का तासम यश होगा 


(६० : १८) 'फ्र दिन को सूर्य तेरा उजियाला न होगा, न चाँदनी के लिये 
अंद्रमा, परंतु यहोवा तेरे लिये सदा का उजियाला और तैरा परमेश्वर तेरी शोभा 


ठहरेगा' (६० : १६) 











: तेंतीसवबाँ अध्याय 
छ यिमंयाह 
१. शीषक द 
.. इस पस्तक का नाम उस नबी की नबूबतों एवं कार्यों के आधार पर रखा 
गया है जो इसमें आलेखित हैं । इब्नानी नाम यिमेयाह हैं, जिसका अर्थ है 
याहवे फेंकता या ढीला करता है (कदाचित गर्भ से)। सप्तति अनुवाद 


में इअरमीआस नाम है और वल्गाता में भी यही है, जिससे अँग्रेजी नाम 
येरेमायाह (]०८एां॥॥) निकला है। द 


इब्नानी बाइबल में यिमंयाह की पुस्तक उत्तर नबियों में दूसरी पुस्तक है । 


सप्तति अनुवाद में उसका स्थान बारह छोटे नवियों के पश्चात रखा गया है।.... 
अन्य नबियों के मान से जो क्रम इब्रानी बाइबल में है उसे ही वल्गाता में... 
स्वीकार किया गया है। अँग्रेजी तथा भारतीय भाषाओं में भी यही क्रम 


. अपनाया गया है । 


.._ २. विषय सामग्री का सारांश 


हे यिर्मयाह की पृस्तक में यरिमंयाह की नबूवतों और कार्य-कलाप का संकलन 
है, जो योशिय्याह, यहोयाकीम और सिदकिय्याह राजाओं के शासनकाल में 


.... तथा यरूशलेम के घेरे जाने तथा पतन को अवधि में और उसके पश्चात 
... किए गए थे | यिर्मयाह के आत्म-संघर्षों का उन अंशों में वर्णन है जो उसके _ 
... अअंगीकारों' के प्रसंग कहलाते हैं । ये अंग एक विशिष्ट प्रकार का धामिक 


हे : साहित्य माने जाते हैं | पुस्तक की सामग्री किसी निश्चित क्रम के अनुसार 


संगठित नहीं है । 


.. ३० ख्परेखा 





यिर्मयाह--व्यथा का नबी 
(१) यिर्मयाह की बुलाहट (१) मा । 
हे यहोवा का वंचन यिर्मयाह को दिया जाता है कि जातियों का नबी होने 


लिए यहोवा ने थिमंयाह को उसके जन्म के पूर्व ही चुना और बुलाया हा. । हे 
























..._-“-अहोंवा उसकी आज्ञा का पालन चाहता 


यिमयाह. .  र४३ 


यिरयाह हिचकता है परन्तु परमेश्वर आग्रह करता है और उसे सामथे देने 
की प्रतिज्ञा करता है। बादाम की टहनी (पहरुए ) के दर्शन में उसे यह 


निश्चय होता है कि परमेश्वर सजग है। उबलते हुए कढ़ाव के दशन में यिमयाह 
को सिखाया जाता है कि उत्तर दिशा से न्‍्यायदण्ड अब आने वाला है । 


(२) प्रारंभिक बचन (अधिकांश योशिय्याह के काल में ) (२-६) 


(क) लोगों का विश्वासबात (२: १-४ : ४) : इख्राएल जाति जंगल 
में यहोवा के प्रति ऐसी भक्त थी जैस वधू | परतु जब वह उपजाऊ देश में आ 
गई तो उसने जीवन जल के स्रोत यहोवा को त्याग दिया और बालीम के साथ 
 व्यभिचार करने लगी (२)। अतः इस्राएल पश्चात्ताप करे, और यहूदा भी 
पश्चाताप करे, जिसने और भी भयंकर विश्बासघात किया है-- है भव्कने वाले 
लड़कों ! लौट आओ ““'“अपनी पड़ती भूमि को जोतो””““यहोवा के 
लिए अपना खतना करो; हाँ अपने मन का खतना करो' (३: १--४ : ४) । 


(ख) आसच्न न्यायदंड या विपत्ति (४: ४-६: ३० ): उत्तर दिशा से 
.. एक श्र परमेश्वर के न्याय के साधन स्वरूप आने पर है कि वह तुम्हारे देश 
. को उजाड़ दे और तुम्हारे नगरों को ध्वस्त एवं सुनसाव कर दे (४: ५-३१) । 

क्‍या तुम एक भी ऐसा व्यक्ति बता सकते हो, जो न्याय से काम करे और 
सच्चाई का खोजी हो ? इस्राएल जाति अनजाने देवताओं के पीछे चली है । 
अतः अनजानी जाति के द्वारा उसका विनाश होगा (५: १०६ ८) । उस 
.. समय जब शांति नहीं है, तो ऐसा कहने मात्र से कि 'शाँति है, शांति ग्रजा के 
घाव चंगे नहीं हो सकते । प्राचीनकाल के अच्छे मार्ग में चलो, तब तुम अपने... 
. मन में चैन पाओगे । परंतु खेद की बात है कि उत्तर दिशा से शत्रु चल निकला मे 

है, और अब उनके कामों से कुछ न बन पड़ेगा (६: ६-३० कम 

. काल में) (७-२५) 


(क) भवन सम्बन्धी प्रवचन (७: १-८: ३) : “यही यहोवा का मंदिर. 


३, 


(३) ग्रिर्मेयाह के वचन और कारये (अधिकांश यहोयाकीम राजा के शॉसत 7 ० 


' है ऐसा तुम क्यों कहते रहते हो ? क्या ऐसा कहने से तुम बचोंगे? आवश्यक ० 


.. यह है कि तुम अपनी चाल सुधारों, क्योंकि यह भवन डाकुओं की खोह बन गय.. है 


. है। यहोवा ने जैसे अपने स्थान शीलो को नष्ट किया वैसे ही इसे भी करेगा... 


(७: १-२०) । जब यहोवा ने तुम्हारे पूर्वजों को मिख्र की दासता से छूड़ाया.. रा 











था उस समय मैं ने ऐसी बलियों की आज्ञा ने दी थी जैसी तुम आज चढ़ाते हो... 











(७: २१-२८) ॥ जिंस वशई 








२४३४० ... पुराना नियम की भमिका 


में तुम बच्चों की बलि करते हो वहीं पर परमश्वर के न्‍्याय-दंड पर तुम घात 

_ किए जाओगे (७ : २६-5८ : ३) ! द 
(ख) विविध नबूबतें (5: ४-१० : रे* ) : इस्राएल जाति का विश्वास- 
.. घात बहुत अग्राकृतिक है । प्रवासी पंछी भी जानते हैं कि उनका निवासस्थान 
. कहाँ है, परंतु मेरी प्रजा यहोवा का नियम नहीं जानती (८ : ४-७) । आने- 
. बाले विनाश की कल्पना से मन तड़प उठता है * क्या गिलाद देश में कछ 
बलसान की औषधि नहीं ( ८: ८-६ : १) ? सब लोग धोखा देने वाले हो 
गए हैं-कोई भी अपने भाई और पड़ोसी पर भरोसा नहीं कर सकता | इसलिए 
सत्य की भयानक फसल के कारण हम विलाप करें (६ : २-२२) । लोग अपनी 
उपलब्धियों पर घमंड न करें, परन्तु जो घमंड करे वह इस पर वसडे करे कि 
परमेश्वर यहोवा पथ्वी पर करुणा, न्‍्याय और धर्म के काम करता है (६ : २३- 
२६) । यहोवा के समान अन्य कोई महान नहीं है, केवल उसी का भय मानना 
उचित हैं । उसी ने आकाश और पृथ्वी को रचना की है । वह म्रतों के समान _ 
सामर्थहीन नहीं है। * है यहोवा मैं जान गया हूँ कि मनुष्य का माग उसके वश 
में नहीं है, मनुष्य चलता तो है, परंतु उसके डग उसके अधीन नहीं हैं । इसीलिए 
_ है यहोवां मेरी ताड़ना कर, पर न्याय से: क्रोध में आकर नहीं, कहीं ऐसा न _ 
हो कि मैं नाश हो जाऊं (१०) | द 


(ग) वाचा ( ११: १-१७) : परमेश्वर की आज्ञा से यिरमयाह वाचा 
के वचन' की यहदा के समस्त देश में घोषणा करता है। फिर भी लोग नहीं 


.... मानते । यिमयाह से कहा जाता है कि वह उनके लिये अब बिनती नक 
.. बयोंकि पश्चात्ताप का समय बीत गया । 


(घ) यिर्मयाह के विरुद्ध पड़यंत्र (११: १८-१२ : १७) ५ * अनातोंत 


... के लोग, अर्थात यिर्मयाह के नगर के लोग उसका प्राण लेने का षड़यंत्र करते 


रे हैं। यिमंयाह अनजान था, बध होनेवाले भेड़ के बच्चे के समान (११ : १८० 


हा 2 ५ पर ) । वह पुकार उठता है कि परमेश्वर क्‍यों दुष्टों की चाल को सफल होने देता 
. है? परंतु यहोवा उसे डाँटता है ओर उससे कहता है कि आगे और भी बड़ी 


. कठिनाइयाँ सामने आनेवाली हैं (१२: १-६)* : यहोवा अपनी प्रजा को नष्ट _ 


हि न करने पर है, और वह उनके पड़ोसियों को भी नष्ट करेगा (१२: ७-१७ और. 


(च) चिक्त और दृष्ठांत (१३) : यिमयाह बिगड़ी हुई पेटी के चिन्ह का _ 


...._._ प्रयोग कर यह प्रकट करता है कि यहोवा ने अपनी बहुमूल्य जाति को त्याग 





5०० *--झूपरेखा में शयाह के 'अंगीकारों' के प्रारंभ एवं अंत का इस चिन्ह... 
से तिदिष्ट किया गया है का. 























यिर्याह.... 5 + शेड 


दिया है (१३: १-११); जो लोग आनंद और निर्श्चितता के साथ यह कहते 
के कि दाखमध के सब कुप्पे दाखमधु से भर दिए जाएँगे तो उनसे यह कहा जाई 
कि 'यहोवा यरूशलेम के सब निवासियों को अपनी कोपरूपी मदिरा पिलाकर 


अचेत कर देगा' (१३:१२-१४) । हम राजा (यहोयाकीम ) और राजमाता 
_(नहुंश्ता) के लिये बिलाप कर जा बन्दी बनाए जाएंगे (१३ : १८-१६ ) 


"दा ने भलाई करने की शक्ति खो दी है-- जैसे हब्शी अपना चमड़ा, वे चीता 
अपने धब्बे नहीं बदल सकता वंस ही यहदा अपनी चाल नहीं बदल सकता 
(१३ : २०-२७) । क्‍ 

(छ) अनावृष्टि (१४: १-१४: ) : भयंकर सूखा हो गया हैं, यहाँ 
तक कि वन पश भी मर रहे हैं ! हे यहोवा, हमारे अधम के काम हमारे विरुद्ध 
साक्षी दे रहे हैं" तू अपने नाम के निमित्त कुछ कर" “क्योंकि तू ही. 
इस्राएल का आधार है! (१४: १-६ )। शोक इस बात का हैं कि यहदा का 
अधर्म इतना विकट है--चाहे नबी उन्हें झूठ कहें--कि उस पर देंड अवः्य 
आएगा; परन्तु हे यहोवा, अपने नाम के निर्मित्त हमें न ठकरा; जो बाचा तूने 
हमारे साथ बाँधी है, उसे स्मरण कर और उसे न तोड़ (१४: १०-२२) । 
यदि मूसा और शमृएल भी इनके लिये निवेदन करते, तब भी यहुदा को आसन्त 


विनाश और बंधवाई से यहोवा नहीं बचाएगा (१५: १०६ ) 


(ज) यिमंयाह का अंतहेन्द्र (१५: १००१ ३८९) ): * ग्रिमेयाह पुकार 


उठता है, है मेरी माता, मुझ पर हाय, कि तूने एसे मनुष्य का जस्स दिया जो 
संसार भर से झगड़ा और वबाद-विवाद करने वाला ठहरा हूं” मेरी पीड़ा 


क्यों लगातार बनी रहती है ? मेरी चोट को क्‍यों कोई औषधि नहीं. है” ?- 
वा उत्तर देता है, 'यदि तू फिरे, तो मैं फिर से तुर्श अपन सामत्त खड़ा 


करूगा “मैं तझ बचाऊगा ओऔर'''“'छड़ा लगा ( १५ : १०-२१ ) है 
 बहोवा यिर्मयाह को विवाह करने तथा सामूहिक दुःख-सुख मे सम्मिलित होने 


कक 


. के लिये मना करता है, क्योंकि दंड आसन है (१६: १-१३ ) । परल्तु बंधुवाई 
.. -के पंत्चात्‌ यहोवा वापिस लौदा जाएसा और जातियों का भी हृदय परिवर्तत 
“  होंगा (१६: १४-२१) 


(क्र) अमिट अपराध (१७) : यहुदा का पाप लोहे की टॉँकी और हीरे. 


.. की नोक से लिखा हुआ है, अतः वह मिटाया नहीं जा सकता (१७ :१-४)।॥ 
. ख्रापित है वह मनुष्य जो मनुष्य पर भरोसा रखता है'““ धन्य है वह मनुष्य बा, 
..._ जो यहोवा पर भरोसा रखता है--वह उस वृक्ष के समान होगा .व्रो नदी के. 0० 
तीर पर लगा हो (१७: ५-८) ।* मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने 


. ... वाला होता है ““यहोवा मन को खोजता और हृदय को जाँचता है ।/// 









































.. रहई. ह . पुराना नियम की भूमिका 
है यहोवा मुझे चंगा कर, तब मैं चंगा हो जाऊंगा, मुझे बचा, तब मैं बच 
जाऊंगा (१७ : ६-१८) ।* 

. पिमंयाह को आदेश दिया जाता है कि वह बिन्यामीनी या सदर फाठक में . 
खडा हो और जो विश्वामवार को बोभ उठाते हैं उन्हे विश्ञामवार मानने का 
संदेश दिया जाए (१७ : १६-२७ ) ह 


(2) कुम्हार का बतेन (१८५) यिर्मयाह को कहा जाता है कि कुम्हार के 
घर जा और तब यहोवा का यह वचन सता, 'जेसे मिठ्टी कुम्हार के हाथ में 
रहती है, वैसे ही हे इस्राएल के घराने, तुम भी मेरे हाथ में हो, यदि पाप के 
कारण मिट्टी विकृृत हो जाए तो मैं उसे फिर ठीक कर सकता हूँ। इस्राएल 
का पाप प्रकृति-विरुद्ध है (१८: १-१७) 


यिर्मयाह ने परोहितों, ज्ञानियों और वबियों के विरुद्ध वचन कहे हैं । अत 
वे उसके विरुद्ध षड़यंत्र करते हैं (१८ : १८-२३) : 


(5) तोपेत सम्बन्धी उपदेश (१६ : १-२० : ६) : थिमंयाह 37: 0 





. की सुराही मोल लेता है। कुछ प्राचीनों को लेकर तोपेत जाता है, जहाँ हिस्तो- हे 


०७ 


मियों की तराई में बच्चों की बलि चढ़ाई जाती थी। वह यहोवा की ओर 
तोपेत पर दंड का वचन बोलता है और सब के देखते हुए सुराही तोड़ देता 
.. है। फिर यिर्मयाह यहोवा के भवन के आँगन में खड़ा होकर दंड के वचन _ 
.. उच्चारता है। फलस्वरूप इम्मेर के पुत्र पशहूर ने, जो भवन का प्रथात रख- 
.. वाला था, यिर्मयाह को मारा और काठ में डाल दिया । दूसरे दिन यिरमयाह 


.... काठ में से निकलवाया गया। तब उसने पशहूर पर दंड का वचन कहा । 









हा -. (ड) यिर्मयाह का प्रतिवाद (२० ; ७-१८) : * है यहोवा, तूने मुझे 
... धोखा दिया, और मैंने धोखा खाया'''“'दिन भर मेरी हँसी होती है।” 
यदि मैं कहूँ, मैं उसकी चर्चा तन करूँगा" “तो मेरे हृदय की ऐसी दशा होती. 


. है मानो मेरी हड्डियों में धधकती हुई आग हो, और मैं अपने को रोकते-रोकते 
थक गया पर मुझ से रहा नहीं जाता''“''हे हृदय और मन के ज्ञाता, जो 


। बदला तू उनसे लेगा, उसे मैं देख, क्योंकि मैंने अपना मकदहमा तेरे ऊपर छोड़ 
हा _ दिया है स्रापित हो वह दिन जिसमें मैं उत्पन्न हुआ ।/““““” मैं क्यों ही 
.... - उत्पात और शोक भोगने के लिए जन्मा' “कि अपने दिन नामधराई में 











7 57 5 व्यतीत कल हा, 








के सम्बन्ध में नबूवतें (२१-२२) : जब सिद- 


'किय्याह राजा ने यिर्मयाह के पास सपन्याह को भेजा कि वह बाबुल के राजा... 















.. दहोताने 





यिमयाह... दा है मम हा 


तबूकदनेस्सर के आक्रमण के संबंध में यहोवा की इच्छा बताए, तो यहोवा. 
का यह बचन दिया गया, दिखो, मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का 
मार्ग भी बताता हैं” “क्योंकि मैंने इस नगर की ओर अपना चुद् बुराई ही ४: « 
के लिए किया है, वह बाबुल के राजा के वश में किया जाएगा (२१) । सब 
लोग कहेंगे कि यरूशलेम के विनाश का कारण यह है कि उन्होंने यहोवा की. 
बाचा को तोड़ कर दूसरे देवताओं को दंडवत किया । योशिग्याह का पुत्र 
शललम (यहोआहाज) फिर लोटकर न आने पाएगा (२२: १०-१२) । यहो- 
याकीम को, जो अपनी उपरौठी कोठरियों को अन्याय से बनवाता है, गदहे के 
समान मिट्टी दी जाएगी, वह घसीटकर यरूशलेम के फाटकों के बाहर फेंक 
दिया जाएगा । राजा कोन्‍्याह (यहीयाकीन ) उसकी जननी समेत नबूकदनेस्सर 


और कसदियों के हाथ में कर दिया जाएगा, जहाँ से वे लौटने व पाएँगे (२२ 


२४-३०) । 


(त) चरवाहों और नबियों के संबंध में नबूबतें (२३) : उन चरवाहों 


. पर हाय जो मेरी चराई की भेड बकरियों को तितर-बितर करते और नाश 
. करते हैं ! परंतु मैं यहोवा दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊगा, और 
. वह यहूदा में व्याय ओर धर्म से प्रभुता करेगा । उसके दिनों में यहूदी लोग बचे 

रहेंगे (२३ : १-८) । यरूशलेम के नबी भक्तिहीन हो गए हैं और बुराई करने 


वालों को प्रोत्साहित करते हैं--'थे वबी बिना मेरे भेजे दौड़ जाते और बिता मेरे 


.. कुछ कहे नबूबत करने लगते हैं! । वे ऐसा न कहें कि यहोवा का भारी बचना 
.. क्योंकि वे नवी परमेश्वर के लिए भार बत गये हैं (२३: ६-४०) । द 


_(थ) अच्छे और निकम्मे अंजीर तथा परमेश्वर की योजना (२४-२५): ट 


.. ग्रकोन्याह (यहोयाकीन) और उसके साथियों की बंधुवाई के पश्चात्‌ यिर्मयाह ते पा 
. मम्दिर के साम्हने रखे हुए अच्छे और निकम्मे अंजीरों के टोकरों का दान 7 5 
देखा । अच्छे अंजीर बंधुओं का प्रतीक हैं। उनके द्वारा यहोवा अपना अभिष्नाय 0] 


ये पूरा करेगा | सिदकिय्याह राजा के साथ यरूशलेम में जो: रह गए वे. निकम्मे ! । हा 
... अंजीर का प्रतीक हैं (२४) । निर्वासित लोग बाबुल के राजा की सेवा छ० 8 
... वर्ष करेंगे। उसके पश्चात बाबुल और अन्य राष्ट्रों को दंड दिया जाडगा पे 


।... (सप्तति अनुवाद में ४६-४१ अध्याय २४: १३ के बाद पाए जाते हैं।). 


... िर्मयाह ने यहोवा की कोप-मदिरा का कटोरा सब राष्ट्रों को, जिनके पास... 





म्मोन, सोर, सीदोन, ददात, तेसा, बूर्ज 





उसे भैजा, पिला दिया--यरूशलेम, मिल्र, ऊस, पलिश्ती, एन, मो 
जी, अरब, जिस्री, एलाम, मादे, 








रथध८द...>€$ पुराना नियम की भूमिका 


उत्तर दिशा के राजा और अन्त में शेषक या बाबुल को पिला दिया (२५ 
१५-३८) । 
(४) यिर्मयाह के संघर्षों का बारूक द्वारा विवरण (२६-२६) 


... (क) भवन संबंधी प्रवचन (२६ ): यिर्मयाह भवन के जॉगन में खड़ा 

होकर उसके विनाश की नबूवत करता हे-ण यदि तुम मेरी सुनकर मेरी 
व्यवस्था के अनुसार न चलो तो मैं इस भवत को शीलो के समान 

उजाड़ दूँगा! । इस पर पुरोहित, नवी और लोगों ने यिरमंयाह को पकड़ा कि 
उसे प्राणदंड दिया जाए। यहदा के हाकिमों ने नये फाटक में बैठकर उसका 
न्‍्याय किया । पूर्व घटनाओं का उल्लेख किया जाता कि मीकायाह ने सिय्योत 
के विनाश की नबूबत की थी परंतु उसे प्राण-दंड नहीं दिया गया । यहोयाकीम 
ने ऊरिय्याह को मिस्र से बुलवाकर मार डाला | इत्त प्रसंगों के आधार पर वे 
यिमयाह को प्राणदंड देना चाहते हैं । परतु अहीकाम ने यिरमेयाह को सहायता 
.. की और यिर्मयाह वध होने से बच गया । 


(ख) जूआ (२७-२८) : गिमयाह को कहा जाता है कि वह बंधत और 

जआ बनवाकर अपनी गदन पर रखे । तब आसपास के राजाओं के पास दूतों 
हारा यह वचन पहुँचाया गया कि वे इसी प्रकार बाबुल का जूझ अपनी गदन 
. पर ले लें। इसके पश्चात गिवोन के नबी हनन्याह ने सब लोगों के सामने कहा 
कि सेनाओं का यहोवा यों कहता है कि बाबुल के राजा के जृए को तोड़ 
-. दिया है। परंतु यहावा यिर्मयाह को यह वचन देता है, यहोवा यों कहता है, तू 
ने (हनन्याह) काठ का जूआ तो तोड़ दिया, परन्तु ऐसा करके तूने उसको 
 सन्‍्ती लोहे का जआ बना लिया है''“''मैं सब जातियों की गर्देन पर लोह का 


.... जुआ रखता हूँ। 


(ग) निर्वासितों को पत्र (२६) यिर्मयाह बाबुल में तिर्वासितों का पत्र गा 


.. . लिखता है। सेनाओं का यहोवा यों कहता है : घर बनाकर उस देश मे व 


. जाओ“ जिस नगर में मैंने तुमको बँधुआ कराके भेज दिया है, उसके कुशल 


.... का यत्न किया करो, और उसके हित के लिए यहोवा से प्रार्थना किया करो 
... ७० वर्ष के बाद यहोवा उन्हें लौटा ले आएगा । यिमंयाह नेहलामा शमायाह द 





.... को भी दंड की सूचना देता है। शमायाह निर्वासितों का नेता था और उसने... 
दाग रा ः यरूशलेम में सपन्याह के ४ पास यह लिख भेजा था कि गिमंयाह को पकड़ । * पा क्‍ 
. लिया जाए हा ' हम हा  । 






(५) आशा की नबुवतें 



















कसर साआ८+२3त> समय कर वन 








यिर्मेया हा बज पक 2) 55 "रह । 


) नवीन वाचा या व्यवस्थान (३०-३१) : यहोवा के दिन के संकट 


के पश्चात, यहोवा के दास इखाएस का उद्धार होगा; सिय्योन के घाव चग 
किए जायेंगे और याकूब की बैसव लौटाया जाएगा (३०) | यहीवा कहता है, 


हैं तमसे सदा प्रेम रखता आया हैँ । सब राष्ट्रों में निर्वासित इस्राएली लौट 
आएँगे इस्राएल और यहूदी की प्‌ नर्वास होगा, और यहावा का न्याय स्थापित 
गा (३० : १०३०) ! में इसाय गेर यहदा के बरानों से नई वादा. 
बाँधु गा में अपनी व्यवस्था उनके मंते से समवाऊँगा और उसे उनके 
हृदय पर लिख्‌गा' | जो नगर यहवि के लिए पवित्र है, वह सदा बना रहा 
(३१: ३१-४०) । द 
(ख) विश्वास के कारण खत मोल लेता (३२) : अनानोत में खेत मोल 
लेने का सअवसर यिमयाह का मिलता है | यहोवा थिमयाह के विश्वास के चिन्ह 
स्वरूप उसे खेत मोल लेने का कहता है । यद्यपि वाबुली लोग खत को नष्ट 
करने पर हैं, फिर भी गरिमेया विश्वास प्रकट करता है. कि बहती अन्त में 
अवश्य उद्धार करेगा । जब बिर्मयाह प्रार्थना करता हैं ता सह [वा उसके 


विश्वास को दुंढ़ करता है । 


(ग) धर्म की (३३) : जब ब्रिमयाह पहरे के आँगन में बंद था 


तब भविष्य में धर्म की डाल के संरक्षण में पुनः बसाए जाने के संबंध में यहातरा 


हा 


ने उसे बड़ी गढ़ बात बत ने दिन और रात के विषय में जो वाचा 


बाँधी है जब तुम उसे तोड़ सको”” तब ही जो वाचा मैंने अपने दास दाऊद 


के संग बाँधी हैं दूट स्का 


(६) यरूशलेम के विनाश से एव की घटनाओं के सम्बन्ध में बारूक ढारा 


5 बर्णन (३४: १८). 


(क) भग्त प्रण (३४): जब सिद्किस्याहू 7 है| ने यरूणलेम में सब- 


- इब्रानी दासों के स्वाध्ान होने का प्रचार किया जिससे बरतें समय लोगों में. 
साहस की वद्धि हो, ती लोगो ने दासदासियों को स्वतन्ले करने का श्रः किया 
. परंतु जब कुछ समय के लिए घेरा ढीला हो गया तो वे अपने श्र से विमुखहा 
» गए; तो यहोवा का. वचन थर्मयाह ने कह सुनाया कि सुना मैं तुम्हारे इस क्‍ 
. प्रकार से स्वतन्त्र होने का प्रचार करता हूँ कि तुम तलवार, मरी और मँहगी 


ड़ प 
हि 


(ख) रेकाबी परिवार (३४ यिर्मयाह ने रेंकाबियों को दाखम। 


. क्‍ पिलाने का प्रयास किया । परन्तु उन्होने अपने पवज का अ ज्ञानुसार गखमध ः ह मा 
पीना मना किया |. यहावा के प्रति यहूदा की 


निष्ठा कितनी भिन्न थी ! 
























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२५०... पुराना नियम की भूमिका 


.. (ग) यिमंयाह के वचन की पुस्तक आग में भोॉंकी गई (३६) : 

.. सोच कर कि यि्मंयाह की नबूवतों पर ध्यान दिया जाएगा, यिमंयाह ने उन्हें 
 बारूक को लिखाया । उपवास के समय मन्दिर की कोठरी में लोगों को बारूक _ 
ने वे वचन पढ़ सुनाए और तब हाकिमों को पढ़ सुनाएं । यहूदी नाम हाकिस 
ने उन्हें राजा यहोयाकीम को पढ़कर सुनाया जब यहूदी तीन चार पृष्ठ पढ़ चुका 
तब राजा ने उस लेख को चाक से काटा और जलती अंगीठी में फंक दिया 


(घ) यिर्मयाह बंदीगह के तलघर में डाला जाता है (३७-३८) : सिद- 
किय्याह राजा के राज्य में जब फिरोन की सेना आक्रमण के लिये मित्र से 
निकली तब कसदी जो यरूशलेम को घेरे हुए थे यरूशलेम से भाग गय्रे। इस 
पर यिर्मयाह ने मिस्र के साथ संधि के विरुद्ध नबृवत की । फलस्वरूप उस पर 
अभियोग लगाया गया कि बह कसदियों से मिल गया है और उसे पीटा गया 

और बंदीगुह में डाल दिया गया । फिर सिदकिय्याह राजा ने उसे बुलवाया 
और पूछा 'क्या यहोवा की ओर से कोई वचन पहुँचा है ?' यिर्मयाह ने उत्तर 
दिया 'हाँ, पहुँचा है! और उसने यरूशलेम के दंड संबंधी वही वचन कहे जो 
.. पहले कहे थे। तब राजा ने उसे तलघर से निकलवा कर कुछ अच्छे स्थान में 
- रखा । परन्तु लोगों के हाकिमों ने आपत्ति उठाई कि यगिमेयाह कसदियों के 
अधीन होने को कहता ही जाता है इसलिये उसे मरवा डाला जाए। राजा 
ने यिर्मयाह को उन्हें सौंप दिया और हाकिमों ने उसे दलदली गड्ढे में डाल 
दिया । यदि राजा की अनुमति प्राप्त कर एबेदमेलेक कशी यिर्मयाह को गड ढे 
.. से न तिकालता तो यिर्मयाह मर जाता । राजा ने फिर छिप कर यिर्मयाह से 
त्रणा की द ० है; 


ः (७) यरूशलेम के बिताश के पश्चात्‌ घटनाओं का बारूक द्वारा वर्णन... 
. (३६-४४ ) : कसदियों का यरूशलेम को जीत लेना । यर्देत के मेंदान में. 


.... (यरीही के अराबा में) सिदकिय्याह पकड़ा जाता है। नबुकदनेस्सर ने आज्ञा 
.. दी कि यमग्राह पर कृपादष्टि रखी जाए और उससे अच्छा व्यवहार किया 





जाए । बिमंयाह एबेदमेलेक को आश्वासन देता है कि उसका कुशल होगा 
(३6) । भूल से यिर्मयाह बंन्दी बनाया जाता है और जंजीरों से बाँधा जाता 


। 5 | द है । उसे स्वयं निर्णय के लिये कहा जाता है कि वह चाहे बाबुल चले जहाँ उस 
पर कृपा दृष्टि रहेगीया यहुदा में ही रहे । गिर्मयाह गदल्याह के साथ रहने... 
.... का निर्णय करता है, जो मिस्पा में अधिकारी नियुक्त किया गया था (४०) । 




















जोय 











हुदी और कसदी योद्धा मिस्पा 


थे उन्हें भी मार डाला और गदल्याह गा 














यिर्मयाह.. ः ०. ० री 


के और बहुत लोगों को बंधुआ करके अम्मोनियों के पास ले जाने लगा | याह 
नान ने उन्हें छड़ाया (४१) ! योहानान ओर बचे हुए लाग यिरमयाह से पुछते 
हैं कि वे किस मार्ग से चलें और क्या करे / क्‍या वें मिस्र को भाग जाएँ ? 
स्‌ दिन के बाद यिर्मयाह ने उन्हें यहोवा का वचन सुनाया कि जे इसी देश मे 


रहें और बाबल के राजा के अधीन हों (४२) । उन्होंने यिसयाह के बचत का 


औँ 


५४५, 


उलंधस किया ओर ते गिमंयाह और काखक का भा मिस्र ले गा (४३) | यहावा * 
की बात से मानने तथा उससे विश्वासबात करन, विशेष कर आका? की रानी 
की भक्ति के लिये ग्रिमयाह लोगों को भत्सता करता है। बह नवतब॒त करता है 
कि मिस्र का राजा फिसैन होप्रा भी बाबुल के अधीन हो जाएगा (४४ )। 
थिर्मयाह बारूक से कहता है, क्या तू अपने लिये बड़ाई खोज रहा है ” उसे 
मत खोज'--क्योंकि उसके लिये इतना पर्याप्त है कि जह कहीं बह जाएगा, 
बहाँ यहोवा उसका प्राण बचाकर उसे जीबित रखेंगा (४५) । 


(८) अन्य जातियों के विषय वचन (४६-५१) 


कर्कंमीश के युद्ध के संदभ में पु, ६०५) मिस्र के विषय यिरेयाह 
वा का बचन कहता है, जब फिरौन तिको को बावुल के राजा नवू कंदन- 


स्सर ने जीत लिया था (४४) | पलिश्तियों के विषय वचन (४७ : १-७ | 


मोआब के विषय : १-४७) ; अंम्मोनियों के विषय (४६ : १-६) ; 
एदोम (४६ : ७-२०) ; दमिश्क (४६ : २३-२७); केदार और हासोर के 
ज्यों के विषय (४६: २८-३३): एलाम (४६ : ३४-३६), जौर बाबुल 


के विघय बचने कहे गए (४० : १-५१ : ६४) 
(६) ऐतिहासिक परिशिष्ट (५२) ३३३ 
समिदकिश्याह के राज्य, यखूशलेम के घेरे जाने और बिनाश का वर्णन 

(प० : १-२७) जिसमें ० राजा ( र४। पृर-+२४ ; |० ) के बर्णन की पन- 

रावत्ति है | नवकदनेस्सर तीन बार लोगों को बँधुआ बनाकर ले गया । उनकी _ 

गिनती दी गई है (५२ : शछ+३० )। बाबुल का राज एवॉलमरदाक यहाया- 
कीन राजा पर कृपा दृष्टि करता है (५२ : ३१०३४) । 


_ ४, रचना, रचयिता, रचनार्ति 


प्रदि हम यिर्मयाह नबी की जीवती का तैथिक क्रमानुसार अध्ययन करने 
का प्रयास करें, तो हमें पुस्तक के विभिन्न भागों पर इधर-उधर उठछलना 
होगा । ३७-४४ अध्यायों में तिथिवद्ध क्रम हैं। पर ते २१-३३, ३०-३१- 


हा 


और ४६-५१ अध्यायों में विषयगत है । कहीं-कहीं तो किसो प्रकार का क्रम 
दष्टिगोचर नहीं होता । कभी तो प्रथम पुरेषवाचक सबताम का प्रयाग हाता | । 

















२श२५.........../|/_॥३० पुराना नियम की भूमिका 
है और कभी तृतीय प्ररुषवाचक सर्वताम का। इन सब तथ्यों के आधार पर 


हमें यह प्रतीत होता है कि इस पुस्तक के परोक्ष में कोई साहित्यिक इतिहास 
विद्यमान है 


पुस्तक से ही इस बात की कुछ सूचना मिलती है कि वह केसे लिखी गई । 
३६ वें अध्याय में यह बताया जाता है कि ग्रिमयाह ने यहोवा के वचन अपने 
शिष्य और लेखक बारूक को लिखवाए जिसने उन्हें कुंडल पत्र में लिख दिया। 
यह अवश्य पापीरछ (789970७8) के रहे होंगे। जब उसकी विषय सामग्री 
यहोयाकीम को पढ़कर सुनाई गई, तो उसने उस कुंडल पत्न को काठ डाला 
और आग में जला डाला । उसने आदेश दिया कि यिर्मयाह और बारूक को 
लिया जाए । परंतु वे भाग गए । यह ई. पृ. ६०५ के दिसंबर मास में 
हुआ, जिस वर्ष कर्कमीश का युद्ध हुआ | यह वर्ष थ्िमयाह के जीवन और 
नवूबत के अनुभव में विशेष वर्ष था क्योंकि उसी वर्ष में उत्तर दिशा से आने 
वाले शत्लु के संबंध में उसकी नवूब॒त पूरी हुई। जब यिर्मयाह छिपा हुआ था 
तो उसके बारूक को फिर से अपने वचन लिखवाए और उनमें कुछ और जोड़ 
दिए (३६ क्र)) । इस दूसरी बार लिखवाने का कुंडल पत्र, जिसे 
सुविधा के लिये कभी-कभी बारूक का कुंडल पत्र कहते हैं, कदाचित 
. यिर्मयाह की पुस्तक का प्रथम संस्करण था विचार किया जाता है कि 
उस में वर्तमान प्रथम छ: अध्याय थे जिनमें ग्रिमयाह की बुलाहद और 
. प्रारंभिक संदेश प्रस्तुत हैं। 


_... ६ से२३अध्यायों में सामग्री जो है वहूं ई० पू० ६०४ की घटनाओं से संगत 
- जान पड़ती है, परंतु ई० पू० ५८७ में यहूशलेम के पतन के बाद की घटनाओं 
से नहीं । अतः यह अनुमान किया जाता है कि इन घटनाओं को किसी अन्य 
व्यक्ति ने यरूशलेम के पतन के पश्चात्‌ संकलित किया होगा । कदाचित बारूक 

ने यह संकलन किया | ऊपर 'बारूक के कुंडल पत्र' का उल्लेख किया गया 


ः बढ और यह संकलन गिर्मयाह की पृस्तक का हितीय. संस्करण माना जा 











( 


.. सकता है। इसमें थिर्मयाह के 'अंगीकार बचन', दंड या चेतावनी की नबूबतें 
... अपने लिए या लोगों के लिये बिलाप, और दुष्टांत सम्मिलित हैं। 





४ आर रह औ ३ ६-४५ अध्यायों में थिमेयाह की जीवनी संबंधी बहुत सी. 
. सामग्री है | ये निश्चित रूप से बारूक द्वारा लिखे गये हैं । ये बारूक के संस्मरण 


.... कहलाते हैं । बारूक ने मिस्र में अपने संस्मरण समाप्त किए होंगे 





.. यिर्मयाह की पुस्तक में कई ऐसे अंश हैं जो विचार एवं शैली में व्यवस्था... 








विवरण के समान हैं (तु० यि० ११: १-८ और व्य० २७ : १-४, 5, १० 








हक मलिक आप 


को 
) 
अंक 

| 

280. 2 
। 
हु! 














बिमेयोहि २० 3 ४०० 57 रहइ 


२६, यि० २९: ८-६ और व्य० २६: २४-२०) । इसका एक स्पष्टी- 
करण यह दिया जाता है कि व्यवस्थाविवरणवादी' सम्पादक ने निर्वासनोत्तर 


है कि यिर्मयाह का दृष्टिकोण बहुत अंशों में व्यवस्थाविवरणबादी दुष्टिकोण 
था । इस मान्यता को कि यिर्मयाह ही ने व्यवस्थाविवरण की पुस्तक लिखी 
कोई विशेष अनुमोदन प्राप्त नहीं होता है 

यह बड़ी रोचक वात है कि यिर्मयाह का सेपत्वागिता मूल पाठ मसोरेती पाठ 


से कौई 3 भाग छोटा है और उसमें कई स्थलों पर भिन्नता पाई जाती है । एक 


महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि अन्य जातियों के सम्बन्ध में बचत (४६-५१) के 
अंग सेपत्वागिता में २५: १३ के पश्चात पाया जाता हैं, जहाँ 'सप्तस्त 
जातियों' का उल्लेख हुआ है। इस प्रकार यिर्मयाह की पुस्तक दो रूपों में 
उपलब्ध है । यह कहना कठिन है कि कौनसा रूप मूल पाठ के अधिक निकट 


है और कि क्‍या कभी उसका एक ही मूल पाठ रहा है 


विशेष समस्‍यायें 


(१) इस्राएल में बलि-विधि के सम्बन्ध में यिमंयाह की मान्यता । 


.. पिर्मयाह ७ : २२, २३ के शब्दों से यह परिलक्षित होता है, कि इख्राएल के 
इतिहास की जो मान्यता यिर्मयाह के विचारों में उसमें बलि के विषय 


परमेश्वर ने मूसा को कोई आज्ञाएं नहीं दीं। 'यरिमंयाह के बचन' समकालीन 


साहित्यिक मूलखोत हैं, अत: ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से पी-प्रलेख जैसे . 
गौण खोत की अपेक्षा बिर्मयाह के वचन के मूलखोत को प्राथमिकता दी जाती 
पी-अलेख में निर्गमन तथा लेव्यव्यवस्था में प्रस्तुत बलि-विधियों को सम्मि- 


लित किया गया है. (ति० २५-३१, ३५-४०; ले० १०१०) यदि कोई 


सच्चाई से यह स्वीकार करे कि निज्जन प्रदेश में मूसा द्वारा प्रतिफदित धर्म में 
बलि-विधान को स्थान नहीं था, तो मुसा को वलि-विधियों का समस्त वर्णन 


निर्वासनोत्तर पुरोहितों की कोरी कल्पना मात्र रह जाता है। क्‍योंकि वह... 
यिर्मयाह जैसे निर्वासन-पूर्व नबियों को प्राय: अज्ञात था। इस मान्यता की. 


पुष्टि आमोस ५: २ होती है, जिसमें यह निहित है कि आमोस की 5 


ष्टिमें मूसा के धर्म में बलि-विधान नहीं था। निर्वासनपूर्व नवबियों में 


ऐसे अंश ही ग्रेफ-वेल हॉसन प्राक्कल्पता के उस पक्ष का आधार हैं, जिसमें 


व्यवस्था' को 'नवियों' के पहले नहीं वरत पश्चात माना जाता है, और 


.. जिसमें नवियों को मूल रूप से बलि-उपासना के विपक्षी माना जाता है । " 
.. इसके विपरीत, हमें यह विचार करना चाहिये कि नबियों के तीढ 























१2% आम पुराना नियम की भूमिका क्‍ 


: संबेदनापूर्ण संदेशों में कुछ तो आलंकारिक अभिव्यक्ति होनी चाहिये । यदि 


.. यिर्मयाह की यह निश्चित मान्यता थी कि यूसा के प्रारंभिक धर्म में बलि- 


. विधान नहीं था, केवल नीति-विधान ही था, तो यह कहना कठिन है कि क्‍यों 
बह 'भवन' के लिये जो स्वभावतया ही बलि-विधान का स्थान था, मेरे नाम 
.. से कहाएगा' शब्दों का प्रयोग करता है (७: १०, १२) | बलि-विधान के. 
. विरोध में यशायाह के वचन भी काफी प्रभावशाली हैं | उनका भी शाब्दिक 
ष्टि से यही अर्थ लगाया जा सकता है कि बलिकर्म परमेश्वर की व्यवस्था 
के विरुद्ध है (यश : १: १०-१७) । परंतु यह महत्वपूर्ण बात हैं कि यशायाह 
को मंदिर में बलाहट मिली और उसने वेदी के धधकते अंगारों के संदर्भ में 
ही अपने होठों के शुद्ध किये जाने का अनुभव प्राप्त किया । दूसरे शब्दों में 
यों कहें कि उसे बलि-विधान के उपासना के संदर्भ में ही अपनी बुलाहट और 

शुद्ध होने का अनुभव प्राप्त हुआ । 
अतः यिर्मयाह ने बलिदानों के संबंध में जो भत्संना की है, उसे हमें इस 


रूप में समझता चाहिये कि उसने अपने युग की अशुद्ध बलि-उपासना की... 


भत्संता की है, जिसमें सच्चे विश्वास का अन्य असत्य बातों के साथ समझौता 
किया जाता था और नीति को नैतिकता से विलग रखा जाता था। उस 


..... भर्स्ता को हमें इस रूप में नहीं समभना चाहिये कि यिर्मयाह सिद्धांततयां बलि- 
.... उपासना के विरुद्ध था।. द 575 


.. (२) राजा योशिय्याह के सुधारों से यिर्मयाह का संबंध- यि. ११ : 


$, 


... १-८ में नबी यहूदा के नगरों तथा यरूशलेम के मार्गों में इस चाचा 
... बचनों' की घोषणा करता है। क्या इन शब्दों में वहई. पू. ६२२ में 
.._ योशिय्याह के धर्मसुधार संबंधी 'इस बाचा की पुस्तक के बचनों की ओर संकेत 
..... करता है (२ रा. २३ :२) ? यदि ये दोनों एक ही हैं तो यरिमेयाह उस सुधार 
... के पक्ष में था और वह उस सुधार का एक मिशनरी था तथा उसने य 
... में उसकी मान्यताओं का प्रचार किया । कुछ विद्वानों का विचार है कि ऐसी 
..... बात संभव नहीं है। उनका कहना है कि व्यवस्था विवरण की पुस्तक में, जो... 
... योश्य्याह के धर्म सुधार का आधार थी, बहुत-सी पुरोहितीय एवं विधिगत का ज 
... सामग्री है (दे. व्य.. १२-१८), जो यिर्मयाह की भावना से संगत नहीं है। 
..... इस परिस्थिति में इस वाचा के वचन' जिनका प्रचार यिर्मयाह ने किया. 
... कुछ अन्य वचन होने चाहियें। यह कदाचित सीने की वाचा की कोई भिन्न. 
.. परंपरा होगी जिसमें नैतिक भावना पर बड़ा बल दिया गया हो और जिसके... । 





ँः 3. भावना यिर्मयाह के मंन में जागृत | ५ 5; 
यह है कि यिर्मयाह की पुस्तक के. 























यिमंयाह: 0 द पु द का द | २५५४ 


इस अंश में किसी निर्वासनकालीन सम्पादक के काये की भलक है जिसका 


विचार यह था कि यिर्मयाह इस व्यवस्थाविवरणात्मक सिद्धांत का पोषक 
था कि इस्राएल जाति पर जो विपक्ति आई उसका कारण यह था कि उन्होंने 


 बाचा की आज्ञा का उलंघन किया था। इस मान्यता को कम महत्व दिया 


जाना चाहिये 


.. यदि हम इस मान्यता को स्वीकार करें कि यिर्मयाह योशिय्याह के धर्म 
सुधार के पक्ष में था, और उस सिद्धांतों के प्रचारक के नाते उसने सुधार में . 


सहायता की, तो हमें आगे बढ़कर इस निष्कर्ष को भी अपनाना चाहिये कि. 


बाद में यिमंयाह उस सुधार के बाह्य-जीवनगत परिणामों से दु:ःखित हुआ और 
उसने हृदय पर एक नई वाया लिखे जाने को आवश्यकता का संदेश 
दिया (थि. ३१: ३३ ) 


६, पिर्मयाह की जीवनी का रेखाचित्न 


कक 


यिर्मयाह को ई. पू. ६९७-६२६ में परमेश्वर की ओर से नबूबत कार्य की 


. बुलाहद मिली (१: २) | उस समय ग्रिमयाह जवान था (१: ६) | वह 
. पूरोहित परिवार का था, जो अनातोत का निवासी था । यह स्थान यरूशलेम 
के उत्तर पूर्व में कोई चार मील पर था। संभव है कि यिर्मयाहु शीलों के 

प्रोहित लेवी की वंश-परंपरा का हो, और दाऊद के पुरोहित अब्यातार की 


वंश-परंपरा का हो, जिसे सुलैमान ते राजसेवा से अलग किया था (१ रा... 
२:२६-२७) । संभव है कि यिर्मयाह की बुलाहट सिथी (8एपरंक्षत) 


आक्रमण की घटना से संबंधित हो, जिसमें नबियों को ईश्वरीय न्याय का चिन्ह 


दिखाई देता था ( थि. १:१५; सप. १:१४-१६) । न्याय-निर्णय के अनेक वचन _ 


सुनाने के पश्चात गिसंयाह वाचा' का संदेश देने के लिये एक प्रमण करते 
वाला मिशनरी हो गया (११ : १-१७ ) । यह वाचा साधारणतया वह व्यवस्था 
की पुस्तक मानी जाती है जिसके आधार पर ई, पृ. ६२२ में योशिय्याह राजा 
धर्म-सुधार किया था । ऐसा लगता है कि इसके पश्चात थिमंयाह के जीवव.| 
काल में नैराश्य और अकेलेपत का एक समय आया। योशिग्याह की दुःखद 
मृत्यु से नेराश्य गहरा हो गया। बाबुली राजा नबृकदनेस्सर की ककेमीश के... 
फिरौन-निकों पर विजय ( ई. पृ. ६०५ ) से यिमंयाह के उस बचन की पृष्ठि 
हुई कि परमेश्वर की ओर के माध्यम स्वरूप 'उत्तर दिशा से एक श्र... 


[एगा (१:१४;४ : ६;६ :१) । इस समय से लेकर यिर्मयाह आगे को 


.. की अपने इस विश्वास में डॉवाडोल न हुआ कि बाबुली लोग परमेश्वर की " 
_ ओर से दंड का माध्यम थे। अब से उसकी नवृूवत्त का एक नया युग आरंभ... 














२५६ पुराना नियम को भूमिका 


























हुआ । घटनाओं की बदलती हुई परिस्थितियों में उसकी लगातार यह मान्यता 
.. रही कि यहदा को बाबुली साम्राज्य की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिये 
. क्योंकि यह परमेश्वर की और से है । जब लोग उसकी अनसुनी करने लगे तो 
+.... उसने अपने बचनों को लिखना आरंभ किया । अपने चेले बारूक को वह 
.. लिखाता था (३६ : ४५) | जब यहोयाकीन राजा ने ग्रिमंयाह के बचनों को 
१ द “आग में फोंक दिया तो उसने उनको फिर लिखाया और उनमें कुछ और वचन 
... जोड़ दिए । बाबुल का पक्ष करनेवाले वचनों के कारण यिर्मयाह को सिद- 
....  किय्याह के राज्य में बंदीगृह में कष्ट उठाना पड़ा (३८: ६ )। यदि कूशी 
.. खोजा एबेदमेलेक उसकी चिता न करता तो कदाचित्‌ यिमयाह वहां मर 
“5 जाता-। 


. . ई० पू० ५६६ में बंधुओं का पहिला दल बाबुल को ले जाया गया (५ 
.._ २८) । यि्मयाह ने उनको यह सम्मति दी कि वे लोग वहीं बस जाएँ औ 
.. निर्वासित राजा यहोयाकीन के साथ लौटने की आशा ने करें (२६: 
.. ४-७) | निर्वासितों को यिर्मयाह ने परमेश्वर की योजना के विकास का 
.._ माध्यम माना (अच्छे अंजीर २४ : ५), और यह नबूवत की कि सत्तर वर्ष के 
पश्चात बंधवाई से लौटना होगा (२५ : १९-१२) । उसने यह भी आशा 
: व्यक्त की कि उत्तरी राज्य के बंधुवों का भी पुनर्वास होगा (३१: ३-६) ।.. 


. ई० पू० भ८प॑-८७ में यरूशलेम का पतन हुआ और दूसरा समूह बंधुवाई 
में ले जाया गया । ग्रर्मयाह को कहा गया कि या तो वह प्रतिष्ठा सहित 
_बाबुल में चले या जो पलिश्तीन में बच रहे हैं उनके साथ रहे और यों दुःख 
भोगे । यिर्मयाह ने पलिश्तीन में रहने का निर्णय किया । बाबुल के प्रति उसकी 





करने के लिए भर्त्संना करता है और यह नबूबत करता है कि परमेश्वर 
7 बाबुल की शक्ति का मिस्र तक भी विस्तार हो जाएगा ( 












पिर्मयाह ०. हा गप9 + 


पा ६२९२ योशिय्याह का धर्मसुधार (व्यवस्था विवरणात्मक धमसुवार ) 
|... ६१२ नीनवे का पतन और नतव-बाबुली साम्राज्य का उदय । अश्श्री राजा 
द ६०६ तक लड़ते रहे 

मगिहों में फिरौन-निको योशिय्याह राजा को मार डालता हूं। 
होआहाज राजा बनता है परंतु तीन महीने पश्चात्‌ फिरोन उसे बॉधकर 
मिस्र ले जाता है। फिरौन यहदा की गद्दी पर यहोयाकीम को बैठाता है 


४ 





५ कर्कमीश का युद्ध । नबूकदनेस्सर फिरोन-निको को हराता है और 
अपनी शक्ति का सिस्र की सीमा तक विस्तार करता है । यहोयाकीम तीन वर्ष 
तक नबूकदनेस्सर को भेंट भेजता और उसके पश्चात बंद कर देता 


५९६ नवूकदनेस्सर यरूशलम का पराजित कर ३०२३ यहुदियों को 
बंधवाई में ले जाता है (यि० ५२ : २८) । 

५६८ यहोयाकीन को तीन महीने के राज्य के परचात्‌ नबूकदनेस्स र बाँधकर 
ले जाता है (२ रा० २४: १२; २६इति ३६: १ )। इस घटना से बंधवाई 
की गणना की जाती है। सिदकिय्याह राजा बनाया जाता है । 

५८६ फिरौन प्सामतिक हितीय के साथ सिदकिय्याह नबुकदनेस्सर के. 
विरुद्ध पड़यन्त्र करता है 

५८८ जनवरी में नबूकदनेस्सर यरूशलेम को घेर लेता 


५८७ में १८ महीने के घेरे के पश्चात्‌ जुलाई में यरूशलिम का पतन होता. 
होता है (यि०- ५९ ::२६) । शहर वष्ट किया जाता है और सिदकिय्याह का 





.. हैं और थिर्भयाह को भी साथ ले जाते हैं । ५ ५ 
८३ नबूकदनेस्सर का सेनानायक नवूजरदान ७४५ यहूदियों को बंधुआ 
बनाकर ले जाता है (यि० ५२ : ३०) 5 हे 
2 + +ओोशिय्याह राजां के पुत्र | ६४०८० ९) (१ इति० ३ :१४) पा 
जे 2 वोहिीनोन (5 एलीयाकीम, जिसका नाम यहोयाकरीम रखा गया 
का (६०६-५६८) जिसका पुत्र यहोयाकीन (कोन्याह); उसने तीन मास राज्य 
किया (५६८); फिर बंधुआ बताकर बाबुल को ले जाया गया । (३) शल्लूम _ 
जिसका दूसरा नाम यहोआहाज रखा गया तीन मास राज्य किया (६०६); 
मिस्र को बंधआ बनाकर ले जाया गया । (४) मत्तनिय्या जिसका दूसरा नाम 
सिदकिय्याह हुआ (५६८-४५८७ ) । दा मम 








धात किया जाता है। मिस्‍्पा में गदल्याह अधिपति नियुक्त किया जाता है॥ 5 
सात मांस पश्चात वह मारा जाता हैँं। बच हुए यहदी मिस्र को भाग जाते... 














लक कक 


८. धर्म शिक्षा का क्‍ 
हट यिर्मयाह की शिक्षा का उसके व्यक्तिगत अनुभव से तिकट संबंध 

: है। यिर्मयाह बढ़े संक्रांति काल में हुआ । वह शान्तिप्रिय और एकाकी जीवन- 
प्रिय व्यक्ति था | परमेश्वर की बुलाहट स्वीकार करने में उसे संकोच हुआ 
परन्तु उस बुलाहट को मानने के लिए वह बाध्य हुआ (१: ४-१० ) । अतः वह 
ऐसे लोगों का आदर्श है जिनकी दुर्बंलताओं में परमेश्वर की सामथ्थ पूर्ण होती 
है (२ कुृ०१२ : ६)। अपने प्राय: सभी समकालीन लोगों का विरोध उसे झेलना 
पड़ा । विरोधियों में राजा और हाकिम, (४:६; अ ३६), पुरोहित (२:८5, १८: 
. १८) और नबी (२३ : १३-२१; २८) भी थे | साधारण जनता में भी वह 
लोकप्रिय नहीं था, क्योंकि वह सब के विनाश की तबूवत करता था (१५:१०) । 
अनातोत में उसके अपने लोगों ने उसे मार डालने का षडयन्त्र किया (११:१८- 
२३; २०: १०) । नबी के पद के लिए जो सुबृढ़ बुलाहट उसे मिली उससे 
यह अनिवार्य हो गया कि वह असामाजिक प्राणी हो जाए (१५: १७) | उसके 
कारण वह साधारण गृहस्थ जीवन के सुखों से वंचित भी रहा (१६: १) ॥ 





. बह परार्थ प्रार्थना के ढ्वारा सहानुभूति की भावना व्यक्त करने से भी वंचित... 
रहा (७:१६; ११: १४) | उसके कोमल हृदय के कारण दूसरों के सुख- 


ख में भागी होने में उसे आनन्द प्राप्त होता । अपने व्यथापूर्ण एकाकीपन में. 
_ वह उस भार के प्रति जो परमेश्वर की ओर से उस पर रखा गया है कराह 
“उठता है (€ :१: १४५ आप 22 ) | यद्यपि. नबूवत के बचनों की घोषणा 


.. करना उसके प्राण के लिये आनन्द और प्रसन्तता की बात थी (१५: १६) 
. तथापि उसे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर दबानेवाला और भयंकर है 


मानों जैसे बड़ा दुष्ट है। (8%: प4।. २० + ७०११३: इंत कारणों से विर्मयाह 


......_ का जीवन “आजीवन रक्त साक्षी या शहीद' का जीवन कहा गया हैं, और यह. 
.. मान्यता प्रस्तुत की गई है कि यशायाह ५३ में दुःखी दास का जो वर्णन 











ये उसकी ऐतिहासिक पूर्व-घटना ग्रिमयाह का जीवन है । जहाँ तंक यिर्मयाह के 


..._ युग का संबंध है उसकी नबूबत की सेवा व्यर्थ प्रतीत होती है, परन्तु आने वाली... 
... पीढ़ियों ने उसे परमेश्वर की योजना में एक महान व्यक्ति माना, क्योंकि... 

...... उसने अपना प्राण मृत्यु के लिए उ डेल दिया और अपराधियों के संग गिना 
...... गया! (यश ५३ : १२) क्‍ दा 


होशे नबी के समान यिमेयाहु भी परमेश्वर और इस्राएल के संबन्ध को ०2 


हा रे विवाह के प्रतीक की दृष्टि से विचार करता है । लोगों का पाप प्रेम के वाचा । । 2 
. बंधन का उलंघन है। 





(२ १ ५-२०-२४, ३२-३६, ३ १९ ) 


इस्राएल जाति व्यभिचारिणी हो गई (३: २) । कभी-कभी दोनों का संबंध. 














यिर्मयाह... हर अल इज 


पिता पुत्र के संबन्ध जैसा नबी ने देखा है (३:१९; ३१: ६, २० ) | पुन- 
स्थापित संबंध्र में इस्राएत जाति परमेश्वर को 'मेरे निता' कहकर संबोधित 
करेगी (३:१६) । चाहे विवाह का प्रतीत हो या पिता-पुत्र का, यह निश्चित 
है कि और इस्राएल के बीच बाचा में जो कर्तव्य निहित है वह इब्रानी शब्द _ 
सेद (|८5८०) द्वारा व्यक्त है जिसका अर्थ है “'करुणा' या प्रेम में निष्ठा । 
जो हेसेद से भरा हुआ है वह 'हसीद' है। यह शब्द उन लोगों का द्योतक है जा 
धर्मात्मा या संत हैं ( भ. ४ : ३; ३० : ४) | यिमयाह ३ : १२ में परमेश्वर 
को हसीद कहा गया है, क्योंकि बहु अपनी ओर से उस वाचा के प्रति जो उसने 
इस्राएल से की है अपार करुणामय है और निष्ठाबान हैं । 


ग्रिमंयाह को यह बुलाहट दी गई कि अपनी ही पीढ़ी के लोगों पर न्याय 


हक 


निर्णय के दंड की घोषणा करें | पहले-पहल तो उसने अपने लोगों को प्रचार 


किया कि वे अपनी चाल सुधारें-वे स्याय और धर्म के कार्य करें (७: ५-७ ) 


और उसने यह आशा भी व्यक्त की कि परमेश्वर का दंड उन पर से हट 


जाएगा। परंतु परिस्थिति उत्तरोत्तर अत्यंत निराशाजनक प्रतीत हुई 


इस्त्राएल के पाप की जड़ें उनके अंतस तक पहुँच चुकी थीं। अतः सच्चे 


पश्चात्ताप की संभावना न रही (१७:११; १३ : २३-२७) । इसलिये 


0, 


यिर्मबाह से कहा गया कि वह अपने लोगों के लिये और प्रार्थना न करे [ 


११) । परमेश्वर का न्याय-दंड अनिवार्य है। इस प्रकार जहाँ तक यिरयाह 
की अपनी पीढ़ी के लोगों का संबन्ध है यिर्मयाह का निराशावाद उत्तरोत्तर 


 पक्‍का होता गया। उसे ज्ञान हुआ कि इखस्राएल जाति को आशा भविष्य में 


जब एक बार दंड के कारण जाति का विनाश हो चुकेगा । उस विनाश 


. की राख से परमेश्वर एक नई जाति को उत्पन्न करेगा । तब यह पता चलेगा. 
. किपरमेश्वर की शाश्वत कारुण्य-योजना से उसके अपने कठोर न्याय-दंड के बंधन 
ढीले हो गए (२३ : ३, ४) । यहूवा के अथोग्य राजाओं आर नेताओं के बदले, 


जिनके कारण देश का विनाश हुआ, 'दाऊद के कुल में से एकरश्वर्मी अंकुर 
उगाऊँगा और वह राजा बनकर वृद्धि. से राज्य करेगा और न्याय और धर्म 


से प्रभता करेगा--वह मसीह होगा, उसका नाम यहोवा, हमारी धामिकता 


न 


पर अपनी व्यवस्था लिखेगा जिससे वे धार्मिकता में चलेंगे (३१: ३१-३४) ।. 
. जिस प्रकार इस्राएल के पाप की जड़ें उनके हृदय तक गहरी थीं, जिसके... 
... कारण पण्चात्ताप असंभव था, उसी प्रकार प्रत्येक के हृदय में नईवाचा से... 
.. प्रत्येक व्यक्ति को परमेश्वर का ज्ञान मिलेगा और परमेश्वर और मनुष्य के बीच. हल 
... पाप की दीवार ध्वस्त हो जाएगी (३३ क्‍ 


. ३४) 






गरीगा (२३ : ६) | तब एक नई वाचा होगी जिसमें परमेश्वर उनके हृदयों . पा 


यह नई वाचा अनंत वाचा 2285 








. ३६०. पुराना तियम की भूमिका 

























. होगी (३२: ४०) । अतः यद्यपि अपनी पीढ़ी के लिये यिर्मयाह के पास 
विशद्ध दंड का संवाद था. तथापि परमेश्वर पर उसके विश्वास के द्वारा वह 
.. अत्यंत विचित्र रूप में उन बातों का भविष्य कथन कर सका जो आज हम 
. जानते हैं कि खिस्‍्त में प्री हो गई हैं । क्‍ 
यिर्मयाह को व्यक्तिगत धर्म का नबी कहा जाता है । उसने धर्म को बाह्य 
. चिल्हों से परे देखा । उसने वाचा के संदूक और मंदिर जैसे बाहरी चिक्‍्हों 
से आगे बढ़कर हृदय को देखा जो परमेश्वर के साथ सच्चे संबंध का स्थान 
है। सच्चा खतना हृदय का है (४:४)। शाश्वत वाचा, जिसमें भविष्य 
की आशा विद्यमान है, हृदय की वाचा है (३२:३६) ॥। परमेश्वर हृदय 
को देखता है--वह हृदय और मन का परीक्षण करता है (११ :२०) | 
वह बाहरी विधियों को इतना नहीं देखता । परमेश्वर के साथ ठीक संबंध का 
अर्थ है 'हृदय परिवर्तन । सबसे अधिक हृदय ही धोखा देने वाला है (१७ : ६) 


के हाथ में है, जो 'विशुद्ध हुदय और विशुद्ध मार्ग” का दाता है (३२ : ३६) । 
परमेश्वर के साथ घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध धर्म है--इस मान्यता के ._ 
अनुरूप प्रत्येक व्यक्ति अपने पापों के लिये स्वयं उत्तरदायी है (३१: ३०) । 
साथ ही यदि सच्चा धर्म हृदय में स्थित है, तो उसकी व्याप्ति और उसकी 
प्रियता समस्त मानव जाति तक होनी चाहिये--इसलिये समस्त जातियों का 
...... उन लोगों की सहभागिता में स्वागत होगा जो हृदय से परमेश्वर की भक्ति _ 

... - और सेवा करते हैं (३:१७; ४ १६४ १६; ३३: ६) । 








इसी लिये मनुष्य का मार्ग उसके वश में नहीं है (१० : २३) , परन्तु परमेश्वर 




















चोतीसवाँ अध्याय 
बिलाप गीत 


१, ज्ञीषक तथा प्रामाणिक धर्मेशास्त्र में स्थान 


इब्बानी में विलापगीत की पुस्तक का ताम उसके प्रथम शब्द एका 
(८८४१) के नाम पर रखा गया है। एका का अथ कसा है । हिन्दी में पहले 
पद में ही यह शब्द आया है, 'जो नगरी लोगों से भरपूर थी वह अब कसी 
केली बैठी हुई है। यहूदी रब्बी लोग इस पस्तक को किनोट (५१४०४) 
या शोकगीत कहते थे । इस शब्द का एकवचन रूप किनाह जिससे पस्तक 
के विशिष्ट पद्यात्मक रूप का बोध होता है। किनाह लय में ह्विपद की दूसरी 
पंक्ति पहली से छोटी होती है और साधारणतया पहली पंक्ति में तीन तथा 


: दूसरी में दो बलाघात होते हैं। शोक गीति का यूनाती अनुवाद थ्ानय 

. (एफ्राध्माणं) है। सेपत्वाणिता में यही नाम है। बुल्गाता में लमेन्तातियोनेस है 

_ जिससे अँग्रेजी का शीर्षक लेमेस्टेशन्स आया है। हिन्दी में इसी का अनुवाद 
विलापगीत किया गया है । 


 इब्बानी धर्मशास्त्र में विलापगीत की पुस्तक कतूवीम या लेखों में सम्मिलित _ 


है। यह पाँच पर्व कुंडलों में से जिन्हें मेगिलोत कहते हैं, एक छोटी पुस्तक है । 


ये कुंडल पर्वों के समय प्रयुक्त होते थे । विलापगीत का उपयोग यरूशलेम के. 


. विनाश के स्मृति-दिवस पर किया जाता था। यह विनाश नबूकदनेस्सर ने. है 
 आब मास की € वीं तिथि को किया था (जुलाई-अगस्त )। कुछ वर्षों पूंव तक 


जब तक कि यरूशलेम में राजनीतिक परिवर्तन नहीं हुए थ अर्थात लगभग 


१६५० तक वे लोग इसका प्रयोग करते रहे जो प्रत्येक शुक्रवार (सबत्‌ को 
पिछली शाम) विलाप-दीवार (छ्यंण्ट एक!) के पास एकत्ित हुआ मा, 
! सप्तति अनुवाद में पुस्तक का प्रावक्थन निम्नलिखित टिप्पणी के साथ ४ 
है : 'जब इस्राएलियों को बंधुवाई में ले जाया गया और यरूशलेम का वरिताश ० 

... किया जा चुका, तो ऐसा हुआ कि यिर्मयाह बैठकर रोने लगा, और इस प्रकार... 
८7 यहणलेम पर: विलाप करने लगा । “विमेयाहू के साथ दंत इक के कारण. ४... 
... अपत्वागिता में इस पुस्तक को यिर्मयाहु नबी कौ पुस्तक के उपरात्त स्थान 








२६९... पुराना नियम की भूमिका 


. दिया गया है, यद्यपि काव्यात्मक पुस्तक होने के नाते इसका काव्य ग्रंथों में 
- सम्मिलित किया जाना अधिक उचित होता । बुल्गाता में भी वही प्रारंभिक 
.. टिप्पणी है जो सप्तति अन॒वाद में है। अंग्रेजी अनुवादों में पुस्तक का क्रम व 
.. है जो सप्तति अनुवाद और वुल्गाता में है, परन्तु प्रारंभिक टिप्पणी को सम्मिलित. 
. करने में वैभिन्नय है । हिन्दी अनुवाद में इसका स्थान अँग्रेजी अनुवादों जैसा है 
परन्तु प्रारम्भिक टिप्पणी नहीं है । 


२. विषय सामग्री का सारांदा 


विलापगीत की पुस्तक में पाँच शोक-गीतों की माला है। इनका संबस्ध 
यरूशलेम के पतन (ई० पृ० ५८७) से है। इन गीतों के प्रमुख भाव ये हैं : 
दुःखांत घटना, इस्राएल जाति का पाप जिसके कारण यह दु:खांत घटना हुई 
परमेश्वर के नन्‍्याय-दंड की कठोरता, और दया एवं पृनर्स्थापना के लिए 
याचना । अन्तिम विलाप को छोड़ अन्य चार वर्णमालात्मक हैं । अंतिम विलाप 
में भी (अध्याय ५) २२ पदों का इब्नाती वर्णमाला के २२ अक्षरों से 
साम्य है । 2 डक 


३. रूपरेखा 
बिलाप गीत-- ध्वस्त सिथ्योन का शोक 


(१) प्रथम विलाप--ध्वस्त सिय्योन की व्यथा (अध्याय १) 


गा रे ह ः ( ) सिथ्योत का वणत [ १ ५ | १ ) ५ वह सगरा कसी अकेली बठो ७ 


हैं “बह रात को फट-फेंट कर रोती हैं?” 'उसके शत्र. उन्नति कर 
... रहे हैं, क्योंकि यहोवा ने उसके बहत से अपराधों के कारण उसे दुःख 
.. दिया है'**"“जितने उसका आदर करते थे, वे उसका निरादर करते हैं, 


रा 5 .... क्योंकि उन्होंने उसकी नंगाई देखी है । #! 7 
.... (ख) सिय्योत का कथन (१: १२-१६) : 'हे सब बदोहियों, क्या तुम्हें इस 


... बात की कुछ भी चिन्ता नहीं है ? दृष्टि करके देखो, क्या मेरे दुःख से द 
.. बढ़कर कोई और पीड़ा है जो यहोवा ने अपने क्रोध के दिन मुझ पर 
._. डाल दी है''““यहोवा ने मानो कोल्हू में पेरा है'“'““मेरी आँखों से 


7 की, आँसू की धारा बहती रहती है, क्योंकि मेरा शांति-दाता मुझ से दूर हो हा. 


.. गया मेरे लड़के वाले अकेले हो गए, क्योंकि शत्रु प्रबल हुआ है । 


हम (ग) सिश्योन नगरी अपने पाप का अंगीकार करती है (१: १७-२२) ४ 5. 
... अपनी निस्सहाय अवस्था में वह कहती है, “यहोवा सच्चाई पर हैं क्योंकि... 














मैं ने उसकी आज्ञा का उलंघन किया” ““'है यहोवा, दृष्टिकर, क्योंकि... 




















| ) फिर भी परमेश्वर की भलाई पर ह 











विलापगीत... 20 08 


डी 
स्का 


पक. 


मैं संकट में हैं" मेरा हृदय उलट गया “मैं कराहती हमर 


०७ 


सब शत्षओं ने मेरी विपक्ति का समाचार सुना है; वे इससे हषित है 
गए कि त ही ने यह किया है'”“जिस दिन की चर्चा का भ्रचार तू ने 
किया है, उसको तू दिखा, तब वे भी मेरे समान हो जाएंगे । ४ 


(२) ट्वितीय विल्ञाप--सिय्योन को यहावा को आर से (अध्याय २ 


(क) यहोवा के क्रोध की तीन्रता (२: १०१ ): यहोवा ने निष्ठुरतास 
नष्ट किया है” उसने शत्र बतकर धनुष चढ़ाया" उसन आग का 
अपनी जलजलाहट भड़का दी हैं।“'”'उसन अपना मंडप गिरा 

दिया और मिलाप स्थान को नाश किया है ""'मेरों आंख जासू वहात- 
बहाते रह गई हैं” मेरे लोगा के विनाश के कारण मेरा कलजा फट 


गया है! । 


(ख) क्या शान्ति दी जा सकती हैं ? (२: १३-१७) : मैं तुझसे क्या कहे 
“हे सिय्योन की कुमारी कन्या मैं तुझे कसे शांति योंकि तेरा 
दृ:ख समुद्र सा अपार है”“**'सब बटोही यह कहकर ताला बजाते और 
सिर हिलाते हैं क्‍या यह वही नगरी है जिसे परमेश्वर सुच्दरा और सारो 


थ्वी के हर्ष का कारण कहले थे ? “यहोवा ने जो कुछ ठावा व 
किया भी है”जो बचन वह प्राचीनकाल से कहता आया हैं. बही 
सने निठरता से पूरा किया हैं । 


22 & 


कर 


हे (ग ) जल् काेवर ले' द्र्था करा भीख रे संभव ट्ठ ( ए्‌ * ५ ८--२९ ० ) ् सिथ्योन कही | है 
| कुमारी, बहीवा की दि दे हे यहांत्रा दष्टि कर और ध्यान से दखे कि फः 


-तुने यह सब दुःख किसका दिया है ? क्‍या स्लियाँ अपने गोंद के बच्चा का 


खा डालें; है प्रभु, कया याजक और भविष्यवक्ता तेरे पवित्र स्थान में 5 ॥$ हे ।' 


- आत्किए जाएँ? -. हे रा 
(३) तृतीय बिलाप--इस स्थिति का अनुभव कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध 
है (अध्याय ३) कक बे कक 2! 


(क) यह कट अनुभव है (३: १-१८) : “उसके रोष की छड़ी से इु/।ख भागते ः 


वाला पुरुष मैं ही हूं” उसका हाथ दिन भर मेरे ही विरुद्ध उठता है 
मेरे लिए घात में बैठे हुये रीछ ओर घात लगाय हुए सिंह के समान 


&५.__ ४ 


..हैं।।:/“'उसतें मे रे दॉता को कंकरी से तोड़ डाला" “उसने मुझ् कुशल । 
से रहित किया है।”““मेरी आशा जा यहावा पर थी वह टूट गयी है. 


"४५, 













5 जदड .. पराना नियम की भूमिका 


उसमें आशा रख गा”““चाहे वह दुःख भी दे, तो भी अपनी करुणा की 
_ बहुतायत के कारण वह मनुष्यों को अपने मन से न देखता है और न 
द दुःख देता है । द द 
.. (ग) हमारा काम यह है कि हम अपने चाल-चलतन को ध्यान से परखें, और 
... यहोवा पर आशा रखें (३४ ४०-६६) :'हम अपने चाल चलन को ध्यान 
से परखें और यहोवा की ओर फिरें'''''हमने अपराध और बलवा किया 
है“*““'तुने अपने को मेघ से घेर लिया है कि तुक तक प्रार्थवा न पहुँच 
सके मेरी आँख से लगातार आँसू बहते हैं, जब तक यहोवा स्वर्ग से 
मेरी ओर न देखे “ है यहोवा, तूने मेरा मुकहमा लड़कर मेरा प्राण 
बचा लिया है" तू मेरा न्याय चुका 


(४) चतुर्थ विलाप : उस भयंकर घटना पर पुनः दृष्टिपात ( अध्याय 
है. द 


(क) जो है और जो था उसके बीच विषमता (४: १-१२) : 'सोता कैसे 
..  खोटा हो गया" सिय्योन के उत्तम पुत्र जो कुन्दन के तुल्य थे, वे. 
कुम्हार के बनाए मिट्टी के घड़ों के समान कैसे तुच्छ गिने गए हैं।'' 
जो स्वादिष्ट भोजन खाते थे, वे अब सड़कों में व्याकुल फिरते हैं" 

: दयालु स्त्रियों ने अपने ही हाथों से अपने बच्चों को पकाया है" । 


... (छ) सिय्योन के अगुवों के कारण वह विपत्ति आई थी (४: १३-१६) 
.. “यह उनके भविष्यवक्ताओं के पापों और उनके याजकों के अधर्म के 
. कारण हुआ है”"“लोह के छींटों से वे यहाँ तक अशुद्ध हैं कि कोई उनके 
...  बस्त्रों को नहीं छता । लोग उनको पुकार कर कहते हैं “भर अशुद्ध लोगों, 
-  हुट जाओ ! हमको मत छओ । गेवा ने अपने कोप से उन्हें 
. तितर-बितर किया! । 


.. (ग) पतन की घड़ी (४: १७-२०) : हमारी आँखें व्यर्थ ही सहायता की. 








बाट जोहते-जोहते रह गई हैं'*''हम ऐसी जाति की ओर ताकते रहे जो 
बचा नहीं सकी हमारा अंत लिकट आया ''*“'' हमार खदेड़ने वाले 
आकाश के उकाबों से भी अधिक चलते थे''*'“'यहोवा का अभिषिक्‍त, 
जो हमारा प्राण था, उनके खोदे हुए गड़ढों में पकड़ा गया' । द 


..  (ब) एदोम को उपालंभ (४: २१-२२) : 'हे एदोम की पुत्री, तू हषित और ० 





| “*““परन्तु यह कटोरा तुझ तक भीपहुँचेगा/““ तेरे रा 


अंधर्म का दंड वह तुमे 








. के साथ तब्मय 














विलाप गीत... २१६५ 
(५) पंचम बिलाप : दया और पु्त॑वास के लिये प्रार्थना (अध्याय ५) 


(क) परमेश्वर हमारी अधीनता का स्थिति की ओर दृष्टि करे (५: १-१८) 
प्ले यहोवा, स्मरण कर कि हम पर क्या क्या बीता है” ''' हमारी ताम 


% 
७७ 


धराई को देख" ''खदडल बाल ह_रसाणरो गदन पर टूल पड़ है" छहूमार 


पक 


ऊपर दास अधिकार रखते हैं हमार लड़के वाः लकड़ी का बाभझ 


. उठाते हुए लडखड़ाते हैं''"सिय्योनपत उदास पड़ा है, उसमें सियार 


(ख ) परमेश्वर हमें पनः लौटा लाए (५: १६-२२| : 'ह यहावा, तू ता 


कण, 


सदा तक विराजमान रहेगा; तेरा राज्य पीढी-पीढी बना रहना “तूने 
क्यों हमको सदा के लिये भुला दिया है ? "हू यहावा, हमक अपनी 
ओर फेर तब हम फिर सृधर जाएगे 


उ. संरचना ओर रचनाकार 


आधनिक आलोचना पद्धतियों के प्रारंभ होते से पहल इस पुस्तक के 


 ज्खक के संबंध में कोई शंका नहीं की जाती थी ! स्रेपत्वागिता में कथन हैं 
कि यिर्मयाह इस प्स्तक का लेखक हैं ओर यह साधारण मान्य किया 
जाता था। परन्तु आलाचनः की नवीन पद्धतियों के पश्चात इस परंपरागत 
मत के प्रति आपत्तियाँ उठाई जाने लगी हैं। कारण यह है कि इस पुस्तक 


क्या 


५, ७०, ,.. दशा, कु. मी 


के कुछ अंश ऐसे हैं जिनमें थिरमयाह कै विचारों से विरोध पाया जाता है 
बि, ५ : ७ में यह कहा गया £ कि हमारे पुरखाओं ने पाप किया और उनके 


-अधर्म के कामों का भार हमको उठाना पड़ा हैँ । इस विचार में यिमयाह 
“3१ : २६-३७ से .विरोध है । विलाप- गीत में राजा, पुरोहित और भविष्य 
वबक्ता संबंधी कई केथन (बि,१: 8२: शे-हि : थे ४ ४ २०; £ 





; १४) इनमें इन नेताओं के प्रति आदर -व्यक्त किया गया हैं। इत अर मा 
बलापगीत में उपासना-विधि के प्रति इतना सहानुभूतिपूर् दृष्टिकोण है. ४. 7०.० 
जितना विर्मयाह से अपेक्षित नहीं है (विं.-१ : ४, ६, पे: रे: के रेल) व 


मिस्र पर भरोसा करने का विचार विलापगीत ४: १७ में हैं । यह यिर्म . 


ध् 


5 प-१० से भिन्न है, जहाँ इस प्रकार के भर सेकी निंदा की गई है । 


का 


न भिन्नताओं को बहत अधिक महत्व प्रदात करता सरल कार्य है | ट्क 


ऋ, 


_ कारण यह है कि यिमेयाह का व्यक्तित्व विरोधाभास से पूर्ण है । पहले तो वह ; 
लोगों के विरुद्ध परमेश्वर की ओर. से आनेवाले व्याय-दंड के साथ तत्मय हैँ मा 
: (पि: वे: १३ ह#ं;): और उसके पश्चात जब लोगों पर दे जाता हू लोगों 
हो जाता है (यथि. ८: १६) 


5५ 






बात राजा, पुरोहित जा 








६६ .... पराना नियम की भमिका _ 


. मन्दिर और नव्रियों के संबंध में उसके व्यक्तित्व में दिखाई देती है | इनके प्रति 
बह परमेश्वर की ओर दंड की घोषणा भी करता है, और साथ ही दु:ख में 
समवेदना भी प्रकट करता है । 


२ रे और ४ थे अध्यायों में इब्नानी वर्णमाला का जो क्रम है वह १ ले 


.. अध्याय के क्रम से भिन्‍न है । इससे यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस पुस्तक 


की रचना में एक से अधिक रचयिता का हाथ तो नहीं है ? दूसरे और 
चौथे अध्यायों में यरूशलेम के विनाश का चित्नोपम वर्णन है। इससे प्रतीत 
होता है कि लेखक किसी आँखों देखी घटना का वर्णन कर रहा है । पहले 
. अध्याय से ऐसा लगता है कि घटना के पश्चात वर्णन किया जा रहा है। तीसरे 
अध्याय में यिमंयाह की वेदना विद्यमान है। इस अध्याय का पहला अंश 
थिर्म १५ : १०-१४ में यिर्मयाह के परिवाद के समान है। पाँचवें अध्याय 
से प्रतीत होता है कि प्रसंग उस समय का है जब बंधुवाई का कुछ समय व्यतीत 
हो चुका था। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि ये विभिन्‍न विलाप विभिन्‍न 
कालों में लिखे गये और कि कदाचित पाँचवें अध्याय का लेखक शेष पुस्तक के _ 

रचयिता से भिन्‍न व्यक्ति है रे 


परंपरागत मत को अमान्य करने के लिये हमारे पास पर्याप्त युक्तियाँ नहीं 
हैं।साथ ही यह आग्रह करना भी उचित नहीं है कि यिर्मयाह ने ही पूरी 


.. पुस्तक लिखी | कम से कम इतना निश्चित है कि इस पुस्तक की भावधारा 


.. य्रिर्मयाह नबी से अपेक्षित भावधारा के अनुरूप है। 


... छू. धर्मा शिक्षा 


इस पुस्तक में उस विपत्ति का भावपूर्ण वर्णन है जिससे बड़ी विपत्ति 


..._ इस्राएल जाति को उनके समस्त इतिहास में कभी नहीं सहनी पड़ी | जब कष्ट 
.... और व्यथा के दिन हमारे जीवन में आते हैं तो इस पस्तक के समभने के 


.. प्रयास से हम परमेश्वर की चिरंतन भलाई के मार्ग पर आ जाते हैं । 


. पुस्तक में हम अपने भावजगत में दुःख और शोक की गहराइयों में प्रवेश करते 
... है 'हे सब बटोहियो, क्या तुम्हें इस बात की भी चिता नहीं ? दृष्टि करके 


. देखो, क्या मेरे दुःख से बढ़कर कोई और पीड़ा है' (१: १२) ? यह कोई 


.... आश्चय की बात नहीं है कि ये गब्द महानतम दुःख की घटना, खिस्‍्त के क्र्सित... 
.. होने की घटना से संयक्त किए गए हैं, क्योंकि जेसे परमेश्वर ने सिय्योन को हू मा 


.. नहीं बचाया, वैसे ही उसने अपने पुत्र को भी नहीं बचाया । 














हि 
० 
कह 
की 
। 
हि 
॥ 
है! 


जल पन्‍८ 2:८2... 8 


| 
| 





। 
! 
॥ 
रे. 
| 
का 
॥४क्‍ हे 
पी] 
कि 
3 
॥ ५ 














वपिगीती 8 हे, + २६७ 


भावना के द्वारा सच्चे मानव बने रहें । साथ ही उन सब लोगी के प्रति जो दुःख 


सहते हैं, चाहे कारण कोई भी हो, हम सहानुभूति की भावता के द्वारा सदा 
सच्चे मानव बने रहें | इस पुस्तक में दुःख के तथ्य को उसकी समस्त भवकरता 
तथा व्यथा के साथ स्वीकार किया गया है। ढुंःख से पयायन न | करना है, 
इस तथ्य का सामना करना है और उससे महात एक और तथ्य को हदेयास् 
करना है--यही इस पुस्तक का समस्या सम्बस्धी भावात्मक हज ह 


यह अत्यस्त महत्त्वपूर्ण बात हैं कि विलापगीत में परमेश्वर के सर्वाधिकार 
पर कहीं शंका नहीं की गई 


न्चकूड है 7५ 
३ ॥ + 


उस यग में लोगों के लिए यह अत्यन्त सरल 
होता कि वे यह कहते कि यहदा के पतन और यख्णलेम के विनाश का कारण 

ह है कि कुछ तत्वों की शक्तियाँ इस्राएल के पर्सउ्य न दें अधिकार के बाहर 
की बात थी । परंत ऐसी बात की कहाँ भकलक भा नहां इसके विपरीत उस 
भयंकर विपत्ति के द्वारा परमेश्वर के सर्वाधिकार तथा उमकी धामिकता के 
समर्थन किया गया है : है यहोवा तूं ता सदा तक विराजमान रहेगा; तेरा 


_ शाज्य पीढी-पीढ़ी बना रहेगा (४:१६ ) 


हम यह भी सीखते हैं कि यदि हम पाप करते जाएँ तो पवित्न और घामिक 
परमेश्वर की ओर से हमें दंड की अपेक्षा करनी चाहिए। यहोवा सच्चाई पर 


है, क्योंकि मैं ने उसकी आज्ञा का उल्लत्रत किया है! (१:१८) । यहोवा ने _ 
जो कुछ ठाना वही किया भी हैं, जो वचन वह कहता आया है वही उसने पूरा 


_ जी किया है' (२:१७) हम यह शिक्षा बआास्त करते हैं कि परमेश्वर जिनको 


देने पर बाध्य होता है उन पर दया भी करता हैं: वह मनुष्या का अपने 


मन से न तो दबाता है और ख. देता है! (३-:-३३) +. हम बह सीखते 


कि सिय्योन के समान यदि हमारा जीवन और यह संसार खंडहरों का ढेर भी 


हो “तब भी परमेश्वर की सच्चाई और स्वरूप एक ट्या : तींब और आशा का _ 


० 


आधार है-- हम मिट नहीं गए; यहांवा की महाकरुणा का फल है, क्योंकि. 
उसकी दया अमर है” “जो यहीवा को बाट जहिते और उसके पास जाते -. 


उनके लिये यहोवा भला है| (३: २२, २५) | आशा का यह निश्चित. 


आधार हमारे समक्ष रखा गया है और हमें बह बताया जाता है किहमे उस 
विनाश से, जो अपने पार्षों के कारण हम पर आया € ऊपर उठे: हम अपने .  .- 
 चाल-चलन को ध्यानसे परखें और यहावा की ओर फिरें (३:४०) । 
._ तमसोमा ज्योतिर्गमय (अंधकार से प्रकाश की ओर ले चल) की ओर हमारे 
विचारों को उन्मुख करने के लिये इस पुस्तक का दे; ह ६-३६ अंश विशेष 5 
.. अहत्व का है । जम जा 























पंतीसवां अध्याय 
पहेजकेल नामक पुस्तक 


१. शीर्षक और प्रामाणिक धर्मज्ञास्त्र में स्थान 


.. इस पुस्तक का नाम उस नबी के नाम पर है जिसकी रचनायें इसमें हैं । 
पुस्तक के नाम का इब्रानी यहेजकेल है जिसका अर्थ परमेश्वर सबल बनाता 
है है। सेपत्वागिता में इसके नाम का रूप इअजकीएल है और बह्गाता में 


एजेकिएल है । अंग्रेजी में वुल्गाता का अनुसरण किया गया है । हिन्दी में इब्रानी' 


३ 


रूप का अनुसरण हू । 


इब्राती बाइबल में यहेजकेल की पुस्तक परवर्ती नबियों के अंतर्गत 
है। सेपत्वागिता में तीन नवियों की एक इकाई है, अर्थात यशायाह, यिर्मयाह 
और यहेजकेल । यह इकाई बारह नवियों की पुस्तक (होशे--मलाकी समूह) 
के पश्चात है । बल्गाता में क्रम इसके विपरीत है । अंग्रेजी तथा भारतीय 


. भाषाओं में बुल्गाता के क्रम का अनुसरण किया गया है 


२. विषय सामग्री का सारांश 


इस पुस्तक में यहेजकेल नबी के दर्शनों तथा वचनों का संकलन है। ये 


प्रभु परमेश्वर के सिहासन-रथ के महान दर्शन से प्रारम्भ होते हैं और नये 


कर मंदिर, नई पुत: तिमित जाति और नंग्रे देश की संश्लिष्ट दर्शन से समाप्त 
.. होते हैं। ये सब नवीनताएँ परमेश्वर को पवित्नता के साथ पूर्णतया समपितः 

. हैं। इस प्स्तक में मूल भाग में ही ऐसे वचन हैं जिनमें प्रतीकात्मक रूप से 
..  यरूशलेम के पाप की निनन्‍्दा की गई है, परन्‍त भविष्य में पनरस्थापन का 


30७५, 


.. ३. रूपरेखा 


यहेजकेल --पव्रित्नता में पनस्थापना का नबी 


....... (१) यहेजकेल की बुलाहद और उसे समादेश (१-३) 
...... (क) दिव्य सिंहासन-रथ का दर्शन (१ 





ने चार जीवधारियों (जिन्हें आगे चलकर करूब कहां गया है) को अग्नि 
घ्रटा से नि के सिर पर बफं जैसा श्वेत आकाश मंडल 





कबार नदी के तीर पर यहेजकेल 








:ईकलकल्पेपक से 


_>:: असवकनकसलफमम- किसका +५ न पिन सन पल न- दस 


#न्‍र> आदत उप कब पल 4५ पावन क सपा ५7८ फट 5 पद 5० 7770-००. ८ प्यार 











अहैजकैल .. 7: 2... “इंच.” 


है । उसके ऊपर नीलम के सिंहासव पर यहोवा आसीन है जिसके चारों 
ओर इंद्रधनुषी प्रकाश है । प्रत्येक जीवधारी के चार पंख और चार मुख 
(मनुष्य, सिंह, बैल और उकाव के मुख जेंस ) । प्रत्येक के पास फीरोजा 


जैसा एक एक पहिया था । पहियों के घेरों में चारों ओर आंखे ही आँख 


थीं । पहिये की बनावट ऐसी थी मानों एक पहिये के भीतर दूसरा पहिं 
था जो अपनी चारों अलंगों की ओर चल सकता था । इस जकार किसी 
भी दिशा में वे पहिये मृड़ और चल सकते थे । यहेजकेल मुह के वल 

गिर पड़ा । 


(ख) नवी-कार्य.. क्षमादेश (२-३) : यहीवा ने यट्रेजकिैल से कहा, मनुष्य 
के संतान, अपने पांचों के बल खड़ा हो, और मैं तुझ से बात कहूंगा | तब 
बह उसे पाँच समादेश देता हैं : () बिद्रोही इस्राएन जाति को परमेश्वर 
का वचन सताया जाए--वचन की पुस्तक को यहेजकेल खाता हैँ (२:१ 
-३:३); (४) चाहे लोग सुने, व न सुनें, यहेजकेल निडर गरीकर परमेश्वर 
का वचन इस्राएलियों को सुनाए ( ); (४) उसे निर्वासितों को 
बचन पहुँचाना है--आत्मा यहेजकेल को उठाता हैं और तेलाबीव नगर 
में रहने वालों के पास पहुँचाता है (१: १०-१५); (7५) वह इखाएल 
के लिये पहरुआ और उनके प्राण के लिये उत्त दायी बनाया जाता हूँ 
(३ :१६-२१); और (४) जब जब ग्रहोवा उससे बातें करेगा तब 

. बह बोलेगा अन्यथा मौन रहेगा (३ : २५) 


(२) यरूशलेम के विरुद्ध प्रथम बचनावलि ( ११) हे 
(क) यरूशलेम पर आने वाला घेरा (४-१) : एक ईट को य्रूशलेम के . 


.._ प्रतीक स्वरूप यहेजकेल लेता हैँ और उसके आस पास घेरा डालता है 
_ इस्राएल का संकेत करने के लिये वह अपने बायें पांजर पर लेठता हैं और 


तैयार कर नपा तुला भोजन करता हैं। वह अपन सिर और दाढ़ी के 


. प्रकार यरूशलेम के विनाश का सांकेतिक चित्र उपस्थित करता है 









.. (ग) मंदिर में गुप्त पाप (5-११ ) ; आत्मा 








यहुदा की संकेत करने के लिये दाहिने पाजर के बल लटता और दोनों | हे 
के अधर्म का भार सहता है । अशुद्ध परिस्थितियों के बीच वह भोजन... 


बाल मूड़ता है, और आग, तलवार और आंधी में नष्ठ करता है । इस 


.. (ख) इख्राएल के पहाड़ों के विरुद्ध वचन (६-७ ) : सारे पूजा स्थान नष्ट डा | 
किये जायेंगे और वगर उजाड़े जाएंगे । एक शेषाँश बचाया जाएगा (६)। ला, 


रे यहेजकेल को यरशलेम ले जाता. | 

















२७० 





पुराना नियम की भूमिका 


.. है और वहाँ नबी मन्दिर में मूतिपूजा देखता है-'डाह की मूर्ति, जन्तुओं 
.._ की पूजा, तम्मभूज और सूर्य की पूजा (5) । सन का वस्त्र पहने हुये एक 


पुरुष सच्चे लोगों के माथों पर चिन्ह बनाता है। उसके साथ शस्त्रधारी छः 


. पुरुष उनको घात करते हैं जिनके माथों पर चिह्न नहीं (६) । करूबों 
के नीचे से अंगारे निकालकर नगर पर छितराए जाते हैं और यहोवा 


. अपने सिंहासन-रथ में जाने को प्रस्तुत हैं (१०) | दंड का वचन कहा 
जाता है, विशेष कर याज़न्याह और पलत्याह के प्रति; पलत्याह मर 


जाता है (११: १-१३) । निर्वासितों को आशा का वचन (११: १४ 


-२१) । यहोवा का तेज नगर के बीच से उठकर उस पर्वत पर ठहर 


गया जो नगर की पूर्व ओर है | आत्मा यहेजकेल को कसदियों के देश में 
ध्रुओं के पास फिर पहुँचा देता है (११ ५) । 


(३) यरूशलेम के विरुद्ध द्वितीय वचनावलि (१२-१६) 


(क) आने वाले संकट का अभिनय (१२) : परमेश्वर के आदेश अनुसार 
 यहेजकेल अपना सामान निकालता है और सांझ को अपने हाथ से भीत 
को फोड़ कर लोगों के देखते हुए सामान सहित चला जाता है। ऐसा ही 


हाल यरूशलेम के प्रधानों और इस्राएल के सारे घराने का होगा (१२ 
१-१६) । यहेजकेल काँपते हुए रोटों खाता है और थरथराते हुए पानी 


पीता है -- ऐसे ही इस देश के निवासी होंगे (१२: १७-२०) । वचन 


.. पर शंका करनेवालों को कहा जाए कि अंत निकट है (१२: २१-२८) । 


.._ (ख) कठोर विपत्तियाँ (१३-१५) : 'हाय, उन मूढ़ भविष्य वक्‍ताओं पर 


 याया! ! (१३८ १-१६) । हाय, उन स्त्रियों पर जो अपनी कलाइयों के 


. हे .. लिये कपड़े बनाकर उन पर जादू के मनके सीती हैं. (१३:१७- २३) 
... जिल्हों ने मृर्तियां अपने मनों में स्थापित की हैं उनको दंड दिया जाएगा 


हक पड (१४ : १-११) । चाहे नूह, दानिय्पेल और अय्युब भी उस नगर में 
... तोभी दंड से मुक्ति नहीं होगी। तलवार, अकाल, दुष्ट जंतु और मरी, 
... यह चार प्रकार का दंड अवश्य आएगा (१४: १२-२३) । यरूशलेम 








5 नर मम ओ मल 


>->पतनलन न वतन नल कब रस नरक 4<०+ 44९53... <६ २-० ८८2५... 5: 





..._ जंगल की अंगूर-लता के समान है वह केवल आग में भोंके जाने केयोग्य........ 


। (ग ) यरूशलंग की अथोग्यता 
:. और हित्ती माता से हुई। जन्म 


(१५) 

















(१६) यरूशलेम की उत्पत्ति एमोरी पिता. 
'के दिन ही घृणित होने के कारण खुले ०2000 
मैदान में वह फेंक दी गई यहोवा ने उसे उठाया, बढ़ाया, ऊँचा मा 


हम कक आल जी जहर म चहल. २स कफ पक सरककांपकलमनक पक कल नल नस पट 








यहेजकेल ... हक 3 १ द . २७१ 


किया और वाचा बाँधकर उसका प्रेम प्राप्त किया (१६: १-१४) । परदु 
पति पराणय होने के बदले वह अपनी सुन्दरता पर भरासा करके व्यभिचार 
करने लगी । इसलिये उसे दंड दिया जाएगा (१६: १८४६ 05 तय, 
हिनें शोमरोत और सदोम से कुछ तू अच्छी नहीं है (१६ : ४४-** ) 


अतएव जब प रमेम्बर यरूशलस से अ पनी शाश्वत वाचा वाधगा त यह 


सकी योग्यता के कारण नहीं; वरन्‌ परमेश्वर को करुणा के का रण होगा 
(१६ : ५३-६३ ) 


(घ) उकाबों का रूपक (१७) : एक बड़े उकाब न (तबूकदनेस्सर ) लबा- 
तोन जाकर एक देवदार की (यहोयाकीन ) फुंनगी। साच ली, और उस 
लेनदेन करने वालों के देश (बाबुल) में ले गया; उसने उस देश हि कुछ 
बीज (सिदकिय्याह) लेकर बाया और वह उगकर छोटी फैलने वाली 
अंगर की लता हो गई जिसकी डालियाँ उसकी ओर झकी । तब वह अशू र 
लता अपनी डालियां दूसरे बड़े उकाव ( फिरौन होप्रा) की ओर झकतने 
लगी जिसने उसे बहुत नदियों वाले देश ( मिस्र ) में लगाया--पर्तु वह 
- कया फूले फलेगी ? परमेश्वर देवदार का ऊँची फूनगी में से कुछ लेकर 
.. लगाएगा और वह डालियां फोड़कर बलवत और उत्तम देबदार (मसीह ) 
बन जाएगा, और उसके नीचे सब पक्षी बसेरा करा | 


जप हा ) व्यक्षिगत दायित्व (१८) : लॉग कहते हैं, जंगली अंगूर ता पुरुखा लाग 
जी जम खाते, परंतु दाँत खट्ट होते है संतान के । परन्तु प्रभु कहता सभी 
2770 0००“ घ्राण मेरे: हैं । जो, काड धर्मी है और न्याय और ध्ष्म के कैम करे वह. >> 
.._ निश्चय जीवित रहेगा। धर्मी मनुष्य का दुष्ट उ्ध निश्चय मरेंगा और मा 
_. उसका खून उसी के सिर पड़ेगा। दुष्ट पिता का धर्मी पुत्र निश्चय जीवित . 
रहेगा और जो दुष्ट मनुष्य धर्म के काम करेंगा वह भी जीवित रहेगा। 
इस प्रकार परमेश्वर न्‍्यायी और सच्चा हैं 


(छ) यहूुदा के राजाओं के प्रति रूपकात्मक विलाप (१६) दा कीमाता 5 ८. 
.._ कैसी सिंहनी थी और कैसे अपने बच्चों को पातत पोसती थी। लोग... 
.. उसके एक बच्चे (यहोआहाज ) को नक्केल डाल कर मिस्र में ले गए ।  । 
.. दूसरे बच्चे (याहोयाकीन) को कठवरे ने बंद हे बाबुल ले गए | यहूदा... 

की माता दाखलता के समान थी (अधीनस्थ राज्य ) जिसमें एक दृढ़ दही (५ रा ला, 
... (सिदकिय्याह) थी, परंतु वह लता को उखाड़ कर भंभि पर गिराई गई ४ 

.... और अब वह जंगल में लगाई गई है जिससे कोई मोदी टहनी उसमें रा. 











0 आज पूराना नियम की भूमिका 
. (४) यरूशलेम के विरुद्ध दि प्-बचनावलि' (२०-२४ ) 


_(क) इस्राएल का विश्वासघात और यहोवा का तेज (२० : १-४४) : जब 
... इस्राएल जाति को मिख्र से मुक्त किया और परमेश्वर ने उसको चुना,  * 

. उस समय यह भी प्रतिज्ञा की कि मैं तुके उस देश में पहुँचाऊँगा जो 

सब देशों का शिरोमणि तो भी उस जाति ने मिश्र में और निर्जन 

प्रदेश में भी बार बार परमेश्वर के प्रति बलवा किया। केवल अपने 

ही नाम के कारण परमेश्वर ने उनको बचाया । उसी प्रकार अपने नाम के 


(ख) परमेश्वर की ओर से आग और तलवार (२० : ४४-२२ : ३१) : 

. दक्षिण के वन सब भस्म हो जाएंगे (२० : ४५-४६) । यरूशलेम बे 
विरुद्ध यहोवा की तलवार स्थान में से खिचेगी - वह सान चढ़ाई हुई 
तलवार होगी । बाबुल का राजा तिम हाने या दोनों मार्गों के निकलने के 
स्थान पर यह बूफने के लिये खड़ा है कि वह अपनी तलवार लेकर यरूश- 
लेम की ओर बढ़े या अम्मोनियों के रब्बा नगर की ओर । उसकी तलवार 
यरूशलेम की ओर बढ़ी, परंतु अम्मोनियों को भी उस तलवार का शिकार 


होना पड़ेगा (२१) 


यरूशलेम ह॒त्यारा नगर है । अतः यहोवा उसको बटोरकर अपने रोष 

की आग में फकेगा और उसे भद॒ठी में पिघलाएगा (२२ : १-२१) । 

- ह्वकिमों, पुरोहितों और लोगों ने यहोवा की आज्ञाओं का उलंघन किया 
-. है। किसी ने परमेश्वर के सामने पश्चाताप भी नहीं किया । अतः यरूशलेम 
.. अवश्य नष्ट किया जाएगा (२९ : २३-३१) 


.. (ग) यहोवा की विश्वासघातिनी पत्नियां (२३) : आहोला (अर्थात्‌ जिसके 
.. पास तंबू हैं) और ओहोलीबा (अर्थात्‌ जिसमें तंबू है) यहोवा की पत्नियां: 
.हैं। ओहोला तो शोमरोन है, और ओहोलीबवा यरूशलेम है | बड़ी बहिन 
... शोमरोन को उसके व्यभिचार के लिये अपने मित्र अश्शर के माध्यम से 
ही बंड दिया गया । छोटी अर्थात यरूशलेम और भी अधिक व्यभिचारिणी 
है और उसे उसके मित्र कसदियों के माध्यम से ही दंड दिया जाएगा। 


5 (घ) हण्डे का दृष्ठांत (२४) : जिस दिन बाबुल के राजा ने यरूशलेम पर... 
..... घेरा डाला उस दिन यहेजकेल ने मोर्चा लगे हुए पीतल के हंडे का दृष्टाँत.... 
.... कहा । यरूशलेम के नागरिक उस में डाले हुये मांस के समान हैं (२१:११ 

कहा जाता हैँ कि वह अपनी पत्नी की मृत्युपरए 

की जाने वाली यरूशलेम नगरी पर भी विलाप या । 








:७:इकनललसन बेसिक 3 सन कप पलपल पल लटटटउलसत 


पहेजकेल. ..... 25500 पद 
न करे (२४ : १५-२७) क्‍ ० 
(५) विदेशी राष्ट्रों के विरुद्ध दिव्य-वचन (२५-३२) 


उपवापपल मसल सललिफासपा 


अम्मोन मोआब, एदोम और पलिण्ती राष्ट्रों के विरुद्ध वचन सोर एक 
।ज के समान नष्ट होगा | सोर के नाश पर बिलाप गीत (२६-२८ ) । 
मिस्र के विरुद्ध बचने जिसके अन्त में यह कहा गया ह कि महाप्रतापी 
फिरौन अधोलोक को जायगा (२६-३२) । 
(६) आशा के दिव्यवचन (३३-२६) 


(क) पहरुआ (३३ : १-२०) : पहरुए के रूप में नबी के उत्तरदायित्व का 
बर्णन, साथ ही यह वर्णन कि परमेश्वर न्याय करने तथा क्षमा करने को 
.. तैयार हैं 
(ख) यहेजकेल का मु ह खुलता है --अच्छा मेषपाल (३३ : २१-३५ : १५% ) 
जब यहेजकेल यरूशलेम के विनाश के विनाश का समाचार सुनता है तब 
उसका ग॑गापन हट जाता है (३३ : २१-२२) । वह उन लोगों की, जो 
बंधुवाई में नहीं ले जाए गए, उनके पापों के कारण निदा करता है, और 
जो बंधवाई में हैं उनके घिनौने कामों की भी निंदा करता हू (३३: २३ 
.. -३२) । जो रखवाले अपना ही पेट भरते हैं उन पर न्यायदंड की घोषणा 
. करता है (३४ १-१०) | परमेश्वर स्वय ही अच्छा रखवाला है (रे४ : 
_.. ११-१६) जो भेड़ भेड़ के बीच न्याय करता है (२४: १७-२२), और. 
_. भेड़ों पर एक ऐसा चरवाहा ठहराऊगा जो उनकी चरवाही करेगा, वहू...... की 
._ तेरा दास दाऊद होगा, वही उनको चराएगा और वही उनका चरवाहा 
.. होगा, और भेड़ों के साथ शांति की वाचा बाँघूगा (३४: २३-३१) । 
. प्ईर पर्वत (अर्थात्‌ एदोम राष्ट्र) उजाड़े किया जाएगा जिससे वह 
परमेश्वर को जान लेगा (३५) द जा, 
रा (ग) पव॑तों के लिए आशा (३६) : इख्लाएल के पहाड़अन्य राष्ट्र ने लूट लिये ० 
5.2 ०.५... : ये, परन्तु अब वे फूल-फ्ल] कि संब लोग जान लें कि यहोवा ही परमेश्वर... 
5. . ७ ौइौइौइऔ- है (३६: १-१५)॥ वह अपने पवित्र नाम के कारण कार्य करेगा और... 
... इस्राएल का उद्धार करेगा । वह अपने लोगों को एक नया मन देगा और. . 
.. उनके भीतर नई आत्मा उत्पन्न करेगा और उजाड़ देश को एदेन की बारी... 
. के समान संपन्न बनाएगा (३६: १६-३८) । मा 
(घ) सूखी हड्डियों से भरी तराई का दर्शन (३७) विनष्ठ इस्राएंछ की . 
उपमा सूखी हड्डियों से दी जाती है जो तराई में भरी हैं। यदहदेजकैल को. ..' 
उन हडिडियों से नबृवत करने की आज्ञा दी जाती है और उसकी नबुब॒त ला 


ड् शा म प 











रब ०52 : पुराना नियम की भुमिका 


. पर उनमें गति हुई, सांस आई और एक बड़ी सेना हो गई (३७ : १- 
. १४) । जैसे दो लकड़ियां (यहुदा और यूसुफ) एक में जोड़ी जाती हैं, उसी 
.. प्रकार परमेश्वर यहुदा और इस्राएल को जोड़ेगा और उनका दाऊद वंशी 
_ एक चरवाहा और राजा होगा और परमेश्वर उनके साथ शांति की 
_ शाश्वत बाचा बांधेगा (३७ : १५-२८) 
(चर) अंतिम विजय (३८-३६) : उत्तर दिशा से गोग अपनी सेनाओं तथा 
... संगी राष्ट्रों के साथ पुनर्वंसित इस्राएल के प्रति आक्रमण करेगा परन्तु 
परमेश्वर उसे ओलों, आग और गंधक से नष्ट करेगा (३५), और उसके 
.._ अस्त-शस्त्र जलाऊ लकड़ी के समान तथा उसकी सेना पक्षियों और वन 
पशुओं का आहार होगी (३६) । परमेश्वर का पवित्र नाम सबके सामने 
महान होगा । द 
(७) नई इस्राएल का दर्शन (४०-४८ ) 


(क) नया मन्दिर (४०-४१) : दर्शन की अवस्था में यहेजकेल इस्राएल के. 
देश में लाया जाता है । वहाँ एक पुरुष उसके सामने मन्दिर संबंधी 
परमेश्वर की योजना का मापन बांस के द्वारा करता है । मम 

_(ख) नई उपासना विधि (४२-४६) : याजकों के लिये कोठरियों का मापन 

... (४२) | पूर्वी फाटक से सिहासन-रथ पर परमेश्वर का तेज आता है 

... (४३ : १-४) । परमेश्वर की वाणी पवित्र स्थान से आती है और यह 
.... कहती है कि वह वहाँ अनंतकाल तक निवास करेगा (४३ : ६-१२) 

... होमबलि की वेदी बलि से पवित्र की जाती है (४३:१३-२७) । वह 

..... पृब॑मुखी द्वार जिससे परमेश्वर का तेज प्रविष्ट हुआ था अब सदा के 

.. लिए बंद हो गया है, और केवल प्रधान ही वहाँ भोजन करने बैठ सकेगा । 

.... सादोक की संतान ही सेवा-भक्ति के लिए आएंगे । लेवीय लोग अब... 

... अधीनस्थ टहलए हो गए हैं (४४) । अपेण और बलि के लिए तियम-.. 
_ उपनियम निर्धारित किए गये (४५-४६) द द 


(ग) नया पवित्न-देश (४७-४८) : भवन की डेबढ़ी के नीचे से एक सोता 
... निकलकर पूर्व ओर बह रहा है । वह किद्रोन घाटी में से बहता हुआ मृत्यु... 
..._ सागर तक जाता है। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ता है त्यों-त्यों गहरा होता... 
.... जाता है और उसके दोनों तटों पर जीवन और हरे भरे वृल्ष होंगे । मा 

.... मरुभूमि उपजाऊ खेतों में बदल जाएगी । उस नदी के किनारे फलदाई वृक्ष... 
.. होंगें, जिनके फल खाने के, और पत्ते औषधि के काम आएँगे । मृत्यु सागर... 

में भी बहुत मछलियां हो जाएँगी (४७ : १-१२), क्योंकि नदी का जल... 





अत मक-नासपनन सकव्कलडननकम न चलन मिट तट + वन शत दा हि कल ज बजाज नया 











_.. स्वयं है | 
दर्शनों और दिव्य वचनों की तिथियाँ ठीक ठीक दी गई हैं। सबसे पहली 
. तिथि जिसका उल्लेख हुआ है वह १: २ में इस ब्रकार हैं यहोयाकीम राजा... 
.. की बंधुवाई के पाँचवे वर्ष के चौथे महीने के पाँचवें दिन को यहोवा का बचन मा 
 »«>«>“>यहेजकेल के पास पहुँचा । यह बर्ष ई. पू. ४६३ है। अत प्रारंभिक 
दर्शन की लिथि ई. पू. १ जुलाई ५६३ मानी जा सकती है। विद्वानों के... ० 
मतानुसार इस युग के तिथि निर्धारण में एक वर्षे का हेर-फेर हो सकता है।... 

. अंतिम तिथि जिसका उल्लेख हुआ है वह याहोयाकीन का सत्ताईसर्वा वर्ष हैं... 7" 
५ (रह: १७) | यह वर्ष ई. पू. श७१ है। इंसअकार महज मे | 
.. काल ई. पू. ५ध्इ से ५७१ ४ । यदि संशोधनकर्त्ता ने इस पुस्तक का पल 
.. संपादन किया तो वह ई. 7. १७१ के कुछ समय बाद ही होगा। हा 


“इधर कुछ वर्षों से इस पुस्तक के सबंध में अनेक आलोचनात्मक मान्यताएँ 
.. प्रस्तुत की गई हैं। पुस्तक की साहित्यिक अखंडता के संबंध में शंकाकी क्‍ 
। ' गई है। यह मत व्यक्त किया गया है कि पुस्तक के काव्यात्मक अंशों का. ः ०02 | 








यहेजकेल डर 5 . / २७४ 


पवित्र स्थान से निकला है। यह देश गोवों में विभाजित होगा । 4 झूशलेम 
के आस पास लेबियों का भाग होगा । इस नगर के बारह फाटक होंगे 
पैर इस नगर का नाम “यहोवा शम्मा' अर्थात यहोवा व | है होगा 
(४७ : १३-४८ : ३५) 
४. संरचना, रचयिता, तिथि 


जकेल की प्रस्तक की विशिष्ट शैली से ही उसकी अखंडता प्रमाणित 


होती है। इसकी शैली में कल्पना की उड़ान, वस्तु की संश्लिष्टता, प्रतीकात्मक 


कार्य और रूपक का प्रचुर उपयोग हुआ हैँ। दर्शनों के वणन मंअपूबव 


 चित्षमयता है और उपासना विधियों की ओर विशेष झकाव है। इसकी 


संरचना के संबंध में परपरागत मान्यता श्र है कि यहेजकेल ने इसको रचना 
की । पुस्तक के साधारण पठन से इस मान्यता पर ग॒ता करने का कोई कारण 
नहीं जान पड़ता। परंतु १:२में जो जीवनी से बंधी टिप्पणी है और दिव्य 
बचनों के वर्तमान क्रम के आधार पर यह अलबत्ता माना जा सकता है कि 
स पस्तक का कोई संपादक अथवा संशाधनकत्ता रहा होगा : १०-२५ 
में सोर नगर के व्यापार का जो गद्यात्मक वर्णन हैँ उससे प्रसम की काव्य 
घारा में व्यतिक्रम जान पड़ता है और यह अनुमान किया जा सकता हैं. 
कि इस क्रम में किसी संपादक का हाथ है। श्रथम उद्यवाचर एक-वचन 
सर्वनाम के प्रयोग से यह स्पष्ट होता हैँ कि इस अश का लख॒क यहेजकेल 














ः 50 पराना नियम की भूमिका 


. जैसे २५-३२ और ३५ अध्यायों में पाये जाते हैं और १-२४ अध्यायों में 
जो गद्यांत्मक अंश हैं, उनका रचयिता एक ही व्यक्ति नहीं हो सकता । अथवा 


. यह मत व्यक्त किया गया है कि दो संस्करणों का, एक प्रथम पुरुषवाचक 


... सर्वनाम बाला (१:४) और दूसरा तृतीय पुरुषवाचक सर्वनाम वाला 


पा (२४: २४), इस पुस्तक में एकीकरण किया गया हैं | अथवा यह मत व्यक्त 
किया गया है कि कई संपादकों ने यहेजकेल के उन दिव्यवचनों का संकलन 


किया है जो मौखिक रूप से प्रचलित थे । द द 
यरूशलेम के मन्दिर में मूर्तिपृजा के लम्बे वर्णन हैं (5) । ये दर्शन की 


. कल्पना नहीं वरन्‌ आंखों देखे प्रतीत होते हैं। ११९: १३ में यह बतलाया 


गया है कि यहेजकेल की नबूवत के फलस्वरूप पलत्याहु मर गया । यदि 
यहेजकेल यरूशलेम में उपस्थित हो तो यह घटना उचित समभी जा सकती 


है | बाबुल में रह कर नबूवत की जाए और उससे घटना यरूशलेम में घटे यह 
कुछ उतना बुद्धि संगत नहीं जान पड़ता । इसी प्रकार कुछ अन्य घटनायें हैं जो 


तबी के यरूशलेम में उपस्थित रहने से संगत जान पड़ती हैं ओर बाबुल में 


_ रहने से असंगत (१२: २-३; ५: २; २० : ३१) । ऐसे तथ्यों के आधार 
-.... पर यह माच्यता व्यक्त की जाती है (जो ८: ३ में व्यक्त विचार के प्रतिकूल 
. जान पड़ती है) कि यहेजकेल की नबूबत का कुछ भाग पलिश्तीन में हुआ 


 होगा। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि उसका सम्पूर्ण नबूवत कार्य पलिश्तीन में 


.. हुआ और किसी सम्पादक ने ही इस प्रकार प्रस्तुत किया मानों वह बाबुल में _ 
किया गया है। कक हू 
.. . १: १ में 'तीसवें वर्ष का उल्लेख है । इस उल्लेख से यहेजकेल के जीवन 
रे क का ३० वां वर्ष समझा जाता है | इस संबंध में एक मान्यता यह है कि तीसवें 

..... वर्ष से मनश्शे के राज्य (ई० पू० ६८५७-६४२) के तीसवें वर्ष का संकेत होता. 
......  है। कारण यह है कि यहेजकेल की पुस्तक में जिन पापों की निन्‍दा की गई है... 
...  2वे योशिय्याह के धर्मसुधार के पूर्व मनश्शे के राज्य में किए गए घिनोने 
... कामों के अनुरूप हैं । इस मान्यता के आधार पर यहेजकेल निर्वासन-पूर्व 
... कालीन नबी हो जाता है। द 327 जि ही 


यहेजकेल की पुस्तक के कुछ अंश प्रकाशात्मक ग्रंथों के सदुश हैं (३८-३६ ) 


..... इस आधार पर यह मान्यता व्यक्त की जाती है लेखक मकाबी काल में था... 
.... (अर्थात्‌ ई० पू० २०० के पश्चात्‌) । प्रकाशनात्मक साहित्य के कला-शिल्प की. 
.... एक विशेषता यह है कि लेखक किसी प्राचीनकालीने पात्न के सत्य या कल्पना 
पूर्ण दर्शनों में अपने विचारों का आरोपण करता है । इस विशेषता के आधार... 
यहेजकेल का इस पुस्तक के लेखक के... 






पर यह मान्यता व्यक्त की जाती है 




















द का अवलोकन कीजिए, दे अध्याय तैंतीस,/ 








यहेजकेल द .. २७७ 


और यदि वह कोई वास्तविक व्यक्ति था, तो वह 


हा 


मानस में ही अस्तित्व 
अपने समकालीन लोगों में प्रायः: अज्ञात था । 


7१ 


३0, 


इस प्रकार यहेजकेल की पुस्तक के संबंध में अतक मात्यताय हू और उनमें 
मतैक्य नहीं है । इस संक्षिप्त विवेचन से यह स्पष्ट हता है कि परंपरागत 
मास्यता और प्रस्तक विषय सामग्री से व्यंजित तथ्य--कि य जकेल वाबूल में 
बंधआई के समय नबी था और प्रायः समग्र सामग्रा का रचथिता था - के 
संबंध में शंका करने के लिए कोई ठोस कारण नहां हैं । कर 
भू. यहेजकेल की जीवनी की रूपरखा 
यहेजकेल पुरोहित था। वह कदाचित सादोक के बंश का था। वह बूजी _ 
का पुत्र था (१:२) । यदि १: १ में उल्लिखित तीसवें वर्ष से उसकी आयु 
का संकेत होता है तो ई० पु० ६२३ में उसका जल्म हुआ होगा । उसका 
बूबत कार्य ई० पू० ५६३ से ५७१ तक था। वेहें ई० पू० ५६६ या शछेप 
में बंधआ बनाकर यरूणलेम से वाबुल को ले जाया गया। वह हंस दियों के 
देश में कबार नदी के तीर पर तेल-अबीब नगर में बंधुओं के बीच रहता था। 
कदाचित फरात नदी से निकाली गई प्राचीन नहर थी और कीलाक्षर 
लेखों में नारू कंवारी (९७०८ ९४०७४) कहलाती थी । बंधआई में पांच व 
रहने के पश्चात उसे परमेश्वर के सिहासन-रथ के ते जोमय एवं भव्य दशन के 
माध्यम से नब॒व॒त-कार्य के लिए बुलाहट मिली (ई० पू० ५६३) । 
विवाहित था और उसका घर भी था (८: १) | बंधओं के पुरनिये उसके. 
पास परामर्श के लिये आते थे (१४: १; :२०:.१) वह अपने लोगोंकी 


. पहुरए' और मंडलीपाल (फिव्शण ) के रूप .में सेवा करता था। अपनी 


नबूबतों का संदेश देने के हेतु व कई बार प्रतीक-कार्यों का उपयाग करता 
था । कई बार बड़े-बड़े और उत्सुक जन समूह उसका सुनते को आते थे (३३ 


३०-३२) । जब उसका पत्नी मर गई, तो उसे शोक करने के लिए मना किया. । 
_ गया । यह इस बात की प्रतीक था कि यखरूणलेम के भावी विनाश केलिए 
शौक न किया जाए, क्योंकि वह परसेश्वर की ओर से सनिश्चित किया गया 


है" है / 


था (२४ : १५-१७) । जब तक यरूणलेम के विनाश की सूचना न आई तब... 


तक वह गूगा रहा (२४: २७; रेरे: रेत २) । यरूशलेम के विनाश के ा 
. पश्चात यहेजकेल के दिव्य बचनों में परिवतत आया । वे दंड-बलन ने होकर . 








.. आशा-बचन बन गए । अपने दर्शन में उसने पुतर्वेसित भवन लोग और देश... 


हे रा को देखा जो पवित्रता में परमेश्वर को अपित किए गए. 
( जकेल के काल के लिथि क्रम के लता 















 यिर्मयाह के काल के तिथिक्रम._ 











. शछ८..... पुराना नियम की भूमिका 


.. ६. धर्मशिक्षा 
... यहेजकेल के दिव्यवचनों और विचार धारा की प्रमुख धारणा यह है * 
_ परमेश्वर की पवित्रता लोकातीत है । १-३ अध्यायों में नबी की बुलाहट 


. समय परमेश्वर के सिंहासन-रथ का भव्य दर्शत नबी को होता है। दर्शन 
में परमेश्वर की लोकातीत पवित्नता प्रकट होती है। ४०-४८ आअध्यायों में. 


_छुड़ाए हुए और पुनवंसित देश का दर्शन है, जो परमेश्वर की पवित्नता को 
अपित है। परमेश्वर की पवित्रता पहले दर्शन से इस अंतिम दर्शन तक प्रकट 
होती रहती है। परमेश्वर की इस लोकातीत पवित्नता के अनुरूप यहेजकेल 
. अपने आप को 'मनष्य की संतान! कहता है (२:१; ३:३१) । इस पद से 
.. मनुष्य का सीमित प्राणी होना, दुर्बलता और अशुद्धता का बोध होता 
यहेजकेल इतना अभिभत हो जाता है कि उसे खड़े होने और सुनने के लिये 
परमेश्वर की ओर से एक विशेष आदेश की आवश्यकता होती है । 

परमेश्वर के समस्त कार्य, चाहे वे कठोर न्यायदंड के हों अथवा उद्धार 
की करुणा के हों, परन्तु उनका उद्गम परमेश्वर के कल्याणकारी उद्देश्य और 
पवित्र स्वभाव से होता है (११: १६-२१) । यरूशलेम का विनाश इसलिए 


हुआ कि परमेश्वर के पवित्न नाम की प्रतिष्ठा. बनी रहे, जिस को इस्रालियों 
ने वाचा के उलंघन से भ्रष्ट किया था । (३६: २०) । पाप की भयावकता 


. इस बात में है कि वह परमेश्वर की पवित्नता के प्रति उत्पात है। इस्राएल 


... के उद्धार और पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा का आधार भी यही है कि परमेश्वर के _ 
..... नाम का गौरव सब जातियों में सुरक्षित होगा (३६ २४) । इस 
... प्रकार इस्राएल का उद्धार और पुनर्स्थापना किनन्‍्हीं मानवीय योग्यताओं पर 
.... नहीं, परन्तु परमेश्वर के मुक्त अनुग्रह पर आधारित है, जिसका पवित्र नाम _ 
.. सारी जातियों में प्रतिष्ठित होगा । ला ओम 
हा जकेल की पुस्तक में आशा का महान संदेश है । जब यहूदा राज्य का 
.... पतन हुआ और यरूशलेम नष्ट किया गया, तो यह स्वाभाविक वात थी कि 
.._..._ जनता के हृदय में नैराश्य और अनास्था की भावना आ जाए और वे सोचने... 
...... लगें कि यहोवा पराजित हो गया और अपने लोगों को बचाने में असमर्थ जज 
....._ इस नैराश्य में यहेजकेल आशा का संदेश लेकर आता है। यहोवा पराजित... 
... नहीं होता है। इसके विपरीत सच बांत यह है कि उसने नबियों को दिया | 
....._ हुआ अपना वचन पूरा किया है और सिद्ध किया हैकि उसका वचन सत्य... हा 
.....  है। इसलिये उद्धार संबंधी उसकी प्रतिज्ञा भी सत्य होगी। शर्त यह हैकि 














.. लोग पश्चाताप करें । उसने अपना पवित्र अभिप्राय वाचा में प्रकाशित किया पा । सा 








६०) । इस कार्य की पूर्ति में रा । 





यहेजकेल - . . ...  - रछछ 


उसकी सामर्थ सीमित नहीं है अपने लोगों की सूखी हड्डियों को भी 
संप्राण कर सकता है (३७ : ३ेक्र.) । इस प्रकार परमेश्वर के पवित्र स्वभाव 
का जो प्रकाशन इस्राएल के साथ बाँधी गई वाचा में है, वही पवित्र स्वभाव 


यहेजकेल द्वारा प्रस्तुत आशा के संदेश का आधार है। 


जकेल ने परमेश्वर की लोकातीत पवित्रता का दशन किया । उसी. 
प्रकार उसने यह भी देखा कि आशा का सुसंदेश भी काल और इतिहास के 
प्रवाह से परे है । पवित्र जाति की पुनरस्थापना से दूसरा जातियों में ईर्ष्या और 
शत्नता के भाव उत्पन्न होंगे। परिणाम स्वरूप दुष्टता को शक्तियों और 
परमेश्वर के लोगों के बीच एक अन्तिम संबंध होगा जिसमें परमेश्वर विजयी _ 
होगा (दे. अध्याय ३८-३६, गांग और उसकी सेनाओं का वणन) | इस 
अंतिम यद्ध के पश्चात परमेश्वर सदा अपने लोगों के साथ रहगा, वह उनसे 
अपना मुँह फिर कभी न फेर लेगा (३६: २६ )। वह अन्तिम संघर्ष या 
युगाँत सम्बन्धी युद्ध का विचार परवर्ती काल मे उत्पन्न होने वाले प्रकाशनात्मक 
साहित्य की एक विशिष्टता बन गई । 


... यहेजकेल ने शिक्षा दी कि परमेश्वर व्यक्तियों और जातियों, व्यष्टि और 
. समष्टि दोनों के लिये चिताशील रहता है। उसका न्याय दोनों पर समान 
- “ हूप से लाग होता हैं (पृ८: ४) । जब लोग _चिढ़चिढ़ाने लगे: कि मैं अपने 
. पूर्वजों के पापों के कारण दुःख उठा रहे हैं (१८: २), तय यहेजकेल ने 
. परमेश्वर के न्याय और क्षमा दोनों के क्रियान् बन की व्याख्या की | यदि किसी 
व्यक्ति पर दंड आता है, तो इसका अथ यह के कि वह स्वयं पाप में है और 


 क्रेवल उसके परखा के कारण नहीं है । यदि उसे क्षमा प्राप्ति चाहिये तो वह स्वयं... 


परमेश्वर के सामने पश्चाताप कर लौट आए। इस श्रकार यद्यपि यहेजकेल यह 


मानता था कि पाप के प्रतिफल का दायित्व समाज और जाति पर भी है, ह आप रा 


_ तथापि परमेश्वर के सामने मूलतः व्यक्ति पर दायित्व है (१८: २० | 


यहेजकेल के वचन से यह शिक्षा भी मिलती है कि मनुष्य. का संपूण / । । | हे ४ द : 
. जीवन परमेश्वर की पवित्र इच्छा के अधीन होता चाहिये पुर्स्थापित देश. 
. और जाति और उसके जीवन के केन्द्र में आराधना के स्थान के दर्शन की मूल रा 
बात यही है (४०-४८) । लोगों के साथ व्यवहार में पर्स 5 स्ाध्य/ 


.. यह है कि परमेश्वर के राज्य की स्थापना हा; और उसके पवित्र नाम की... 





पवित्वता की स्थापना का साधन हैं उसके समपित लोग । यदि हम नये नियम  । 


2 की भाषा का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि उसके राज्य और पवित्र नाम रे 
(४३:७) । यहेजकेल नेएक | 


......  महान्‌ कार्य यह किया कि उसने लो'ः गो को इस विचार में अग्रहर | किया कि ०. 





.. की स्थापना का साधन मंडली या कंलीसिया है 






























पुराना नियम की भूमिका 


"रदक 0 2 


वे अपने को राजनीतिक इकाई न मानकर परमेश्वर की कलीसिया के रूप में 
मानें | इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने पवित्न स्थान में स्थान देने से हमें 
एक शाश्वत स्रोत मिलता है जिससे परमेश्वर के लोगों के लिये और समस्त 
संसार के लिये जीवन का जल बहता है। जीवन का सोता परमेश्वर के भवन 
से निकलता है और एक बड़ी नदी बन जाता है, जिससे सब जातियों को 
जीवन मिलता है और मृत्यु सागर भी संजीव हो जाता है (४७ : १-१२) । 
इस प्रकार यहेजकेल में नये नियम के सुसमाचार का पूर्वाभास है। यह 
_सुसमाचार वहाँ प्रारम्भ होता है जहाँ परमेश्वर स्वयं को प्रकाशित करता 


है और समस्त विश्व को आशिष देने की ओर प्रवाहित होता है। 



































सामग्री में तीन इकाइयां 
) तीन पवित्र युवका का गीत [ निय्येल की प्रस्तक में २३ के पश्चात क्‍ 

_ रखा गया है ) और बेल एवं अजगर (जी अंत में पृथक इकाई है) | बुल्गाता 
के क्लेमेंती संस्करण में तीन पवित्र युवकों का गत रे के बाद रखा 

गया और अन्य दो इकाइयों को पुस्तक के अंत में। प्रोतेस्तत लाग तीनों: 


... है। उदाहरणार्थ इब्रानी में जो ४: १ है वह अं 





छत्तीसवां अश्रध्याय 
दानिय्येल की पुस्तक 


१. शीर्षक और प्रामाणिक धर्भशास्त्र में स्थान 

.. इस पुस्तक का नाम उसमें वणित घटनाओं आर दशनों के प्रमख पाते 
के सलाम पर रखा गया है। इब्रानी में इसका नाम 'दानिय्येल हैं। इस शब्द 
का अर्थ परमेश्वर मेरा न्‍्यायी है । सेपत्वागिता दानिएल है। दुल्गाता और 
अंग्रेजी में भी दनिएल है । हिन्दी में इब्रानी रूप स्वीकृत हुआ है। विभिन्न 
बाइवलों में इसका स्थान भिन्न है। इब्रानी बाइवल में इसे लेखा (कतृबीम ) 
करे अन्तर्गत स्थान दिया गया है, नबियों में नहीं। उसमे एस्तर के पश्चात 
से स्थान दिया गया है। सेपत्वागिता, बुल्गाता ओर अंग्रेजी तथा भारतीय 
भाषाओं की बाइबलों में इसे नबियों की पुस्तकों के अन्तगत स्थान दिया 


- गया है 


सकी वस्तु-सामश्री भी विभिन्‍न बाइबलों में भिन्न है। इन्नाती बाइबल 


में सामगी का रूप न्यूनतम हैं। काल्विनी परंपरा की अंग्रेजी बाइबलों में भी 


न्‍्यनतंम रूप विद्यमान है। सेपत्वागिता में इसका विस्तृत रूप हैँ अतिरिक्त 
हैं: सूसन्‍ता की कथा. (जो प्रारंभ में पृथक इकाई 


७७ 


वकाइयों को अपकिफा अर्थात ज्ञानवर्धक ग्रंथों के अन्तगत स्थान देते हू। 
इब्रानी बाइबल में यद्यपि इस पुस्तक की लिपि एक हैं तथापि ये 


भाषाओं में लिखी गई है ३८३: ४ और ८: य>१२: पर इबाती में. 


हैं. और २: ४-७: २८ अरामी भाषा में । सेपंत्वागिता में जो अतिरिक्त 2 
सामग्री है वह यूनानी में मे है । यह सामग्री इब्रानी अनुवाद है अथवा नहीं । 


यह एक समस्या है आय जब ला 
. इब्बानी बाइबल में जो पदों की संख्या हैं वह अग्न री बाइबल से भिन्न... रा 


गग्रेजी में ४ ; ४ है । 





















रणए......£>&  प्ूराना नियम की भमिका 
२. विषय सामग्री का सारांश 


. दानिय्येल की इब्नानी पुस्तक में दानिय्येल और उसके तीन मित्रों की 

_ कथा है। ये चारों बाबुल में बंधुए थे और अपने विश्वास में पक्के रहे । 

.._ प्रत्येक परीक्षा और सताव में, यहाँ तक कि राजा द्वारा सताव में भी परमेश्वर 
उनका रक्षक रहा। इसके अतिरिक्त परमेश्वर ने अनेक दर्शनों द्वारा 
अपने उन्मीलित होते हुए अभिप्राय के रहस्य को दानिय्येल पर प्रकट किया | 


सेपत्वागिता में जो अतिरिक्त सामग्री है. उसमें हमें यह बताया जाता है 


कि निर्दोषों को बचाना तथा झठी उपासना की प्रतिष्ठा कम करना दानिय्येल 
के जीवन की विशेषता था । 


. ३. खपरेखा द क्‍ 
दानिय्येल--विश्वास के प्रति दृढ़ निष्ठा 


(१) दातिय्येल और उसके साथियों की कथाएँ (१-६) 


(क) राजदरबार में दानिय्येल और उसके साथी (१) | बंधुओं में से. 
दानिय्येल और उसके साथी तीन वर्ष के प्रशिक्षण के लिये चने जाते हैं । 
वे राजा का भोजन खाने से इन्कार करते हैं कि अपने धर्म के साथ. 
समभोता न करना पड़े । फिर भी वे जब राजा के समक्ष प्रस्तुत किए 
जाते हैं, तो बुद्धि और प्रवीणता में वे अन्य लोगों से श्रेष्ठ पाए जाते हैं। 

(ख) नबूकदनेस्सर का विस्मृत स्वप्त (२) : राजा नबूकदनेस्सर स्वप्न देखता. 

और भूल जाता है। वह व्याकुल होता है। तब उसने टोन्हे आदि को 

... बुलवाया कि उसे स्वप्त बताएँ । परंतु वे बता न सके । दानिय्येल को 

.. इसकी सूचना मिलती है। वह अपने मित्रों की प्रार्थना मान लेता 

... परमेश्वर की सहायता से वह राजा को स्वप्न और अर्थ दोनों बताता 


बा ; एक पत्थर किसी के हाथ के बिन खोदे पहाड़ में से उखड़ा, और उसने 


.. सोने, चांदी, पीतल, लोहे और लोहा मिली मिट्टी की लंबी चौड़ी मृति को 

: च्र-चूर कर दिया। इसका अर्थ यह है कि चार राज्यों के पश्चात स्वर्ग 

का परमेश्वर एक ऐसा राज्य उदय करेंगा जो अनंतकाल तक न टटेगा. 
. और न वह किसी दूसरी जाति के हाथ में दिया जाएगा | 


पूरा नम मंदान में नबूकदनेस्सर राजा ने सोने... 


वंडवत करने से इन्कार किया। वे आग के भटटदे 
 जले। इसके विपरीत एक चौथा पुरुष आग के भट 
राजा का मन परिवतंन हो 











० में डाल गए परतु पे. पा 
में उनके साथ है । 007. 
है और वह उन तीनों को मुक्त करता है। अप 

















दानिय्येल...... 2 हक हरेक 
( ३: २३ के पश्चात्‌ सेपत्वाणिता में 'तीत पवित्र युवकों का गीत है 
जिसमें अजर्याह [अबेदनगो| की प्रार्थना और आग में भटट मे तीनों द्वारा 
गाया गया एक भजन भी है ।) 


कह (घ) नवूकदनेस्सर का पागल हो जाना (४) : राजा ने स्वप्स में एक बड़ा 
5 :.... वृक्ष देखा जो ठू ठ तक काटा गया और उस सर सात काल बीते। इसका 
अर्थ यह था कि तबूकदनेस्सर राजा दीन किया जाएगा जब तक व यह 

न जान ले कि मनष्यों के राज्य में परम प्रधान ही प्रभूता करता है । छत्ता 

ही हुआ । राजा मनुष्या के वीच से निकाला गया और बलों के ससान. 
घास खाने लगा जब तक कि उसने न जान लिया कि प्रभुता परमश्वर क्री 

ही है। 





(च) बेलशस्सर की जेवनार (५) : वैलशस्सर राजा ने बड़ी जेवनार में यरूश- 

नेम के मन्दिर से निकाले हुए पावों में दाख मधु पिया । उसी समय एके 

थ दीवार पर यह लिख रहा था-- मे, मत, तकल, ऊपसोन' (अर्थात 

गिने गए, गिने गए, तौला गया, और विभाजित हुआ । ) दानिय्येल ने 

इसका अर्थ बताया कि बाबुल राज्य पर परमेश्वर का स्याव-द आएगा ! 
उसी रात्रि बाबूल मादी राजा दारा के अधीन हो गया 


_(छ) सिहों की मांद में दानिय्येल (६) दानिय्येल के शत्रुओं ने हे राजाज्ञा 

-.. तिकलवाई कि यदि कोई राजा को छोड़ किसी और मनुष्य अथवा देवता 

“की विनती करे, तो वह सिंही को मादि में डाते दिया जाए। दानिय्येल अपने 

. विश्वास में सच्चा रहा | अतः सिहों की मांद में डाला गया परमेश्वर ने _ 
 सिंहों का मंह बंद कर दानिय्येल को रक्षा की । राजा ने अनजाने ही 





हा .. आनंदित हुआ और उसक बल्नओं को माँद में डलवा दिया 
४ ' । '; ; ह है अर (२ ) दानिय्येल के दशन ( ७-१२ ) । 


हक ) चार जंतुओं का दशन (७) :समुद्र मे से चार बड़ जंत निकले---एक 








अपनी राजाज्ञा दो था अतएव दानिय्येल के बच जाने पर बह बन्नत हे । रा रा मा 


है जिसके पंख उकाव के समान थे, एक रीछ जिसके दांतों के बीच तीन ४ पा का, 
_ पसुली थीं, एक चीता जिसके चार पंख थे, और एक “'भयकर जतु जिसके 


. लोहे के दाँत और दस सींग थे । उत्त दस सींग के बीच एक छोटा सा सींग... 
निकला जिसमें मनुष्य की सी आंखें, और बड़ा बोल बोलनेवाला मुह भी 
अति प्राचीन' के द्वारा वह जंतु बात किया गया। इस अति प्राचीन... 





मनष्य के संतान' जैसे किसी पुरुष के ः 





अटल एवं अविनाशी राज्य सॉप ५ । 





























का 





: पुराना नियम की भूमिका 


_ दिया। दानिय्येल को अर्थ बताया गया : वे पशु चार अनुक्रमिक राज्य हैं१* 
वे सींग राजा हैं? और छोटा सींग वह राजा हैई जो परम प्रधान के 


विरुद्ध बोलता है, पवित्न लोगों को रोंदताहै और समय और व्यवस्था को 


बदल डालता है। परन्तु परमेश्वर अपने पवित्न लोगों को अनंत राज्य प्रदान 


(ख) 


करेगा। 


मेढ़े और बकरे का दर्शन (८) : दानिय्येल ने ऊले नदी के किनारे दो 
सींगों वाला एक मेढ़ा देखा (मादी और फारसी ) । पश्चिम से एक बकरा 
(यूनान) निकला | उसकी आँखों के बीच एक देखने योग्य सींग था 
(उसका प्रथम राजा)”। उसने मेढ़े को मार दिया। वह देखने योग्य 
गैंग टूट गया और उसके स्थान पर चार देखने योग्य सींग (चार राज्य) 
विकसित हुए । इनमें से एक से एक छोटा सींग. निकला, जो शिरोमणि 
देश तक बहुत बढ़ गया । वह स्वर्ग की सेना तक बढ़ गया । उसने होम- 
बलि भी ली और सच्चाई को सिट्टी में सिला दिया । मैंने यह सुना कि. 


यह कब तक होता रहेगा ? और यह उत्तर मिलता है कि २३०० सांझ 


(ग) 


और सवेरे” के बाद पवित्र स्थान शुद्ध किया जाएगा। जिन्नाएल दूत 
दानिय्येल को इस दर्शन की बात समभाता है कि ये सब राज्यों और राजाओं 
की ओर संकेत करते हैं । क्‍ 


सत्तर सप्ताहों की नवृवत (६) : दानिय्येल अपने लोगों के लिए पापांगी- 


... कार करते हुए प्राथना करता है। जिक्नाएल दूत उड़कर आता है और 
... दानिय्येल को उन सत्तर सप्ताहों का अथे बताता है जिनकी नबूवत यिर्मयाह 


हा . ते की थी (यि० २५: ११) | ये ७० सप्ताह इसलिए निर्धारित किए... 
... गए थे कि लोगों के पाप का प्रायश्चित हो | यरूणलेम का पुनरनिमाण करने 


.. की आज्ञा से लेकर अभिषिक्‍त प्रधान के समय तक ७ सप्ताह । ६२ 
सप्ताह बीतने पर अभिषिक्‍त पुरुष काटा जाएगा** और “एक “विदेशी 


... प्रधान! नगर और पवित्र स्थान को नष्ट करेगा*६ और एक सप्ताह के 


.._ लिए बहुतों के साम्य वृढ़ वाचा बाँधेगा** । इस सप्ताह में मेल बलि और 
. अन्नवलि बंद होगी और उजाड़ने वाली घणित वस्तएं' दिखाई देंगी ६ 


(घ) अंतिम दिनों का दर्शन (१०-१२) : हिहेकेल (दजला ) नदी के ती 


दानिय्येल ने सन का वस्त्र पहिने हुए एक पुरुष को देखा । उसने बताया 
कि मीकाएल की सहायता से उसने फारस और यूनानी के प्रधानों ( 








का सामना किया । तब दानिग्येल को भविष्य की बातें बताई गई : फारस 
का चौथा राजा ११ युनान के सामर्थी राजा द्वारा पराजित होगा टैश | 
उस पराक्रमी राजा का राज्य टटेगा और उखड़ कर चार अन्य लोगों के 
प्त होगा* 5 । इन चारों में उत्तर का राजा*७ और ' क्षिण क 
राजा १5 आपस में सन्धि करेंगे और लड़ेंगे । दक्षिण के राजा की राज- 
कुमारी का उत्तर के राजा के साथ दुःखात विवाह होगा (११: ६)। 
थोड़े समय तक हार खाने के बाद** अंत में उत्तर का राजा विजयी 
होगा, गढ़वाला नगर ले लगा उत्तर के राजा के एक उत्तराधिकारी 
बलपूर्वक ग्रहणकर्ता को देश में भेजेगा । परन्तु वह थोड़े दिन बाद ही नष्ट 
किया जाएगा** (११: २०) । उसका दूसरा उत्तराधिकारी तुच्छ मनुष्य द 
गेगा, जो वाचा के प्रधान! से भी छल करेगा (११ : २९-२३) । 
बह अपनी कल्पना और पराक्रम दक्षिण के राजा को लेने के लिए भी करेगा, 
परन्तु वहाँ कित्तियों के जहाज उसका विरोध करके उसे रोकेंगे* १॥ उसकी 
सेना उस घणित वस्तु को खड़ा करेंगे जो उजाड़ करा दता हू , और यद्यपि 
त से बद्धिमानों को कुछ सहायता +* प्राप्त होगी, फिर भी वह सेना 
उनको मार डालेगी । वह राजा अपने की साई देवताओं से ऊंचा और बड़ा 
ठहराएगा और दढ़ गढ़ों के देवता का ही सम्मान करेगा* 5 | द 


मी जिम मनन कि नीली मल जम 22 कक कक है 








उत्तर का राजा बबंडर के समान दक्षिण के राजा पर आक्रमण करेगा 
भैर अपने राज्य का बहुत विस्तार करगा, जब तके कि पूर्व और उत्तर से एक _ 
..... नये शत्रु का सामना उसे न करना पड़े २७ | तब समुद्र और शिरोमणि पर्वत के 
...._ बीच उसका अन्त होगा (११:४५) ! क्‍ ; 
क्‍ अंतिम विकट संकंट के समय मीकाएल नाम बड़ा श्रधात लोगों के पक्ष में 
खडा होगा । जितनों के ताम परमेश्वर की पुस्तक में लिखें हुए है। वे बचे 77702 
. निकलेंगे। बहुत से मृतक जाग उठेंगे, और सिखाने वाले तार के समान चमकेंगे 


|] व रा 
: दानिय्येल ने तब पुरुषों में से एक के द्वारा किए गए इस प्रश्न को सुना, 
इन आश्चर्य कर्मों का अंत कब तक होगा ?' यह उत्तर दिया जाता है कियादे 
. तीन काल तक यह दशा रहेगी, (१९:७) । साथ ही, 'जब से नित्य होमबलि 
. उठाई जाएगी, और वह घितौनी वस्तु जो उजाड करा देती है; स्थापित की . 
जाएगी, तब से १२९० दिन बीतेंगे; क्या ही धन्य है वह, गे धीरज धरकर 
१३३५ दिन के अंत तक भी पहुंचे । डे 


.  (सेपल्वागिता में, दानिम्येल की पुस्तक के साथ दो अतिरिक्त अंश हैं, एक... 





:इल्सपक्सजयर 





--03 सम शर८तसचका३० ८-८ तन पलक नल नल लक 


ननआपपर पक दि वि: 





























शब्द. ... पुराना नियम की भूमिका 


प्रारंभ में--सुसच्चा की कथा, और दूसरा अंत में-बेल और अजगर । बुल्गाता में 
दोनों ही अंत में हैं ।) द हक द 
..._ सुसन्ना योआकीम नामक प्रतिष्ठित बंधुओं की सुन्दर ईश-भकत पत्नी थी। 
जब उसने दो लोलुप न्यायाधीशों के प्रलोभनों को अस्वीकार किया, तो उस 
प्र झठा अभियोंग लगाकर उसे मृत्यु दंड दिया गया । दानिय्येल ने साक्षी का. 
. पनविचार करवाया और सुसन्ना को निर्दोष सिद्ध कराया । उस पर अभियोग 
लगाने वालों को दंड दिया गया । 
... बेल और अजगर : कुस्र राजा और दानिय्येल ने मिलकर यह निर्णय किया 
कि बेल देवता की मूर्ति की परीक्षा की जाय कि वह जीवित ईश्वर हैं अथवा 
नहीं । बेल मूरत के सामने फर्श पर राख फैलाने के द्वारा दानिय्येल ने यह 
प्रमाण उपस्थित किया कि बेल को जो बलि चढ़ाई जाती है वह उसके पुरोहितों 
द्वारा ली जाती है और भोग की जाती है, बेल द्वारा नहीं, क्योंकि राख पर 
पुरोहितों के पग चिन्ह दिखे । 


इसी प्रकार दानिय्येल ने डामर, चर्बी और बालों का एक मिश्रण देकर 





जगर को मारा जिसकी बाबली लोग उपासना करते थे । बाबुली लोग बहुत... 


ऋरेधित हुए और दानिय्येल को सिहों की मांद में डाल दिया । परन्तु सिहों ने 


: उसे कुछ हानि न पहुँचाई और हबक्कूक ने दातिय्येल को अद्भुत रीति से का 


.. खिलाया-पिलाया ।) 
..._ ४. उपरोक्त रूपरेखा में प्रस्तुत दर्शनों पर टिप्पणियां द ँ 
... १. चार राज्य (७: १७) :सिंह बाबुल है। रीछ मादी है,चीता 
5 5“ फारस हैं, और भयंकर जंतु यूनान-है 4... /.४.. द 
.. २. दस सींग (७:७) : यूनानी राज्य में अन्तीओकुस एपीफनेस के 
.... पूर्व दस राजा। दस संख्या प्राप्त करने के लिये विभिन्न 
..... भावनाएं हैं 

सिकन्दर महान (नीचे हेलिओदोरुस का विकल्प मानते हुए ) 


.._ सात सेल्युकीवंशी जिनमें अन्तिम था सेल्यूकुस चतुर्थ, जो अपने मन्त्री.._ । 


रा  हेलिओदोरुस द्वारा मारा गया ।..._ क्‍ 
ला, हेलिओदोरुस (ऊपर सिकन्दर महान का बिकत्प मानते हुए ) 
....  सेल्युकुस चतुर्थ के दो पुत्र जिन्हें अलग किया गया । 


३. छोटा सींग जो बड़े बोर बो अन्तीओकुस 
: चतुर्थ एपीफनेस (१७५-१६३ ई. पू.) जो अपने को एपीफनेस 












० 


दानिब्येशल .... ५. शूद७ 


(फज़ाशाक्ा०5) या प्रकट ईश्वर कहता था। उसने यहूदियों को. 
सताया और व्यवस्था को नष्ट करने का प्रयास किया । 


४. पवित्र लोग (७:२५) : इब्नानी में हसीदीम (7#998ंठात ) शब्द 


आया है । इसका अर्थ है वे लोग जो यहदी विश्वास की शुद्धता के 


3ककक, 


लिये उत्साही थे। दानिय्येल की पुस्तक कदाचित्‌ उनमें से एक 


ने लिखी | काल के अंत में परमेश्वर मनुष्य के पूत्र के द्वारा 
उन्हें अनंत राज्य प्रदान करेगा (७: १३) द 
देखने योग्य सींग, पहला राजा (८५: ५, २१) : सिकन्दर महान 
(६. पू. ३१६-३२३ ) जिसने फारसी राज्य का ई. पृ. ३३१ में 
अंत किया । क्‍ 
चार सींग, चार राज्य (८: ८, २१) : चार राज्य जिसमें 
सिकन्दर का साम्राज्य विभाजित हुआ (१) मकदूनिया जिसका 
राजा केसंदर था, (२) ताके ओर क्षुद्र आसिया जिसका राजा 
लुसिमाकुस था, (३) अराम और मेसोपोतैमिया जिस पर 
सेल्यूकूस राज्य करता था, और (४ ) मित्र जिसका राजा 
प्तोलिमी था । यह ई. पू. ३०१ में इप्सस की लड़ाई के बाद हुआ । 
छोटा सींग (८: ६-११, २३-२५) : अन्तीओकुस चतुर्थ एपाफनेस 
(ई. पृ. १७४-१६३) जिसने पलिश्तीन में ( शिरोमणि देश) 
हेलेनीकरण की कठोर नीति को अपनाया, जिसमें उसने मन्दिर 


में बलि-विधि ( अनवरत अग्नि बलि ) और यहूदी वब्यनस्था। को है ह 7 अल 


नष्ट करने का प्रयत्न किया । 


२३०० साय॑ प्रात: (८:१४ ): इसमें उस घढना का उल्लेख है मा । 
.. जिसमें अन्तीओकुस एपीफनेस ने मन्दिर से बलि विधि को बंद . 
. किया । मन्दिर में सायं काल और प्रातःकाल बलिचढाई जाती | 
. थी और २३०० अंक में दोनों सम्मिलित हैं।अतः कुल सम 
. ४० ११४० दिन अथात रे३ वर्स का होता है (ई. पू. १६८-पै३४) । .. 

जज 


सात सप्ताह (६ :२५) : इसका अर्थ है वर्षों के सात सप्ताह 


: इस प्रकार सात सप्ताह का अर्थ है ४६ वें । हू लगभग ५ 
: बाबुल में निर्वासन के समय के बराबर है (ई,पू.श्क७ से, जब. «४ ४ 


का _ यरूशलेम का विनाश हुआ , ४३७ तक जय जरूब्बाबेल लौटा) 


.. १०. अभिषिक्त के काटे जाने तक ६२ वर्षे (६: २६) काल हा 
५ काहआ।यह ई.पू. ५३८ से जब कुस्ू. 






६२२९७ अ र्थात्‌ ४३४ वर्षों का 











के श्ष्ष 





पुराना नियम को भूमिका 


ने यरूशलेम के पुनः निर्माण की आज्ञा प्रसारित की (६: २५), 


 ई, पृ. १७१ में मेनेलौस की उत्तेजता से सहायक ओनियास 
. तृतीय के मारे जाने तक माना जाता है। इतिहास में यह काल 
. लगभग ४३४ वर्षों का है। संभव है लेखक के मन में कोई अन्य 


गणना हो । महापुरोहित होने के नाते ओनियास एक “अभिविक्‍त 


व्यक्ति था । 


११. पवित्न स्थान को नष्ट करने वाला विदेशी प्रधान! (£ : २६) : 


है 


के 


अन्तीओकुस एपीफनेस ने ई. पु. १६७ में यूनानी देवना ओलिम्पी 
ज्यूस की वेदी मन्दिर की वेदी पर प्रतिष्ठित की और इस प्रकार 
मन्दिर को अपविन्न किया । द 

एक सप्ताह के लिये सुदृढ़ वाचा (६: २७) : यह समय सात 
वर्ष का है । यह विचार किया जाता है कि इस समय अन्तीओकुस 
एपीफनेस के सताव का समय था । इसकी गणना उसके राजा 

होने अर्थात ई. पृ. १७५ से मन्दिर के अपवित्न किए जाने (ई. 
पू, १६७) तक की जाती है तीओकुस ने पलिश्तीन निवासी 

हेलेनीकरणवादी यहूदियों से दृढ़ बाचा' बाँधी जिससे वह अपनी 
नीति चला सके और इस काल के लगभग मध्य में उसने बलि- 
विधि बंद की । द 


इस एक सप्ताह से यिरमयाह की नबूवत के सत्तर वर्ष पूरे 


हो जाते हैं: सात (६: २५) +-बासठ (६ : २६)-+-एक ( 


पर छ 


२७)-८८७० | 


उजाड़ करने वाली घृणित वस्तु (६:२७; ११: ३१) 


. अन्तीओकुस एपीफनेस ने न केवल मन्दिर की वेदी पर ओलिम्पी 


.. ज्यूस देवता की वेदी की स्थापना की, वरन्‌ उसने परम पवित्र. 
.. स्थान में भी ज्यूस की मूर्ति की स्थापना की । यह मूर्ति घृणित _ 


..... वस्तु है| 'उजाड़ करने वाली घृणित वस्तु” पद 'स्वर्ग के प्रभु 

5 का व्यग्यात्मक अनुकरण है। 7 लत प 

. १४. फारस के चार राजा (११: २) : फारस के केवल चार राजाओं 

रा, .. के उल्लेख से एक समस्या उत्पन्न होती है, क्योंकि इतिहास में १२ हा रा 

.... राजाओं का वण्णन है। कुखू (ई. पू. ५३९१-५३०) सेआरंभ 
.._. कर दारा तृतीय कोदोमानुस (ई. पृ. ३३६-३३१) तक, जिसे. 

_ सिकेन्दर महान ने पराजित किया था, बारह राजा इतिहास में... 
































दल जन हि 2 अप जज मय र्पह 


हुए। लेखक कदाचित चार अत्यंत प्रमुख राजाओं तके ही अपने 
को सीमित करता है। चार' संख्या से सार्वलौकिकता का बोध 
होता है अथवा यूनान से संघर्ष के लिये चार राजा पर्याप्त थ । 
लेखक का मुख्य उद्देश्य युतान से संघर्ष प्रदर्शित करना है। चार. 
राजा कदाचित प्रथम चार राजा हों : कुल्लू (ई. पृ. ४३६-*६० 
कम्बूसिस (ई. पू. ५३०-५२२), दारा प्रथम ($. पू. ५२२०-०४ 
४८६), और क्षयर्ष प्रथम (ई. पू. ४८५६-४६५) जिसने ई, पृ 
४८० में यूतान के विरुद्ध सैनिक अभियान किया । 


१५, एक पराक्रमी राजा (११ : ३); सिकन्दर महान (ई. पू. ३३६- 
३२३) जिसने दारा तृतीय कोई. पृ. रे३३  इस्सुस के युद्ध में 
पूर्णतः पराजित किया । 

१६. चार राजा जो उसके वंश के न थे (११: ४ ) :ये सिकन्दर 

न के उत्तराधिकारी राजा हुए। ये सेना नायक थे जो आपस 
में राज्य के लिये लड़ रहे थे। कुछ समय पश्चात्‌ समस्त साम्राज्य 
चार राज्यों में बँट गया । देखिए टिप्पणी ६ (८:८,२१) | 


१७, उत्तर का राजा (११:६) : अराम का सेल्यूकी शासक । इनमें से 
पहला सेल्यूकुस प्रथम निकातोर था (ई. पृ. ३१९-०२८० ), जिसने 
सेल्यूकी वंश की स्थापना की ।_ 


१८, दक्षिण का. राजा (११: * आदि) : मिस्र का शासक प्तोलिमी |. 
. ११ : ५ में प्तोलेमी प्रथम सोतेर (ई. पू. ३२३-२८३ ) तैओर -' 


संकेत है, जिसका सेनाध्यक्ष सेल्यूकुस अपने स्वामी से अधिक. 2 रे 


शक्तिशाली हो गया और अराम में सेल्युकी वंश स्थापित किया ।. 


१६, एक दुखांत विवाह (११: ६) : अराम और मिस्र के बीच संधष.. 
. को समाप्त करने के लिये प्तोलेमी द्वितीय फिलादेलफुस (ई. हू... «० 
३-२४६) ने अराम के अन्तीओकुस द्वितीय (ई.पू. २६१० ः 

_रं४७) के साथ ई, पू. २४६ में. अपना पुत्री बिरतीके का विवाह... 
... कर दिया। इस विवाह के निममित्त अन्तीओकस ने अपनी पहली... 
..... पत्नी लाओदिके का त्याग किया । लाओदिके ने बदला लिया। 
... उसने अपने पति को विष दिया और बिरनीके तथा उसके पुत्र को  आ 


. मार डाला । 


२०. एक पराजय (११४ ११) £ मिश्र के राजा प्तोलेमी चतुर्थ ने... क्‍ > 
दृदौय को रक्षिया केबुद में... 





अराम के राजा अन्तीओकुंस 












रषेण 


हि 


१ ९६ 


5५ शेड. 





. पुराना नियम की भूमिका _ 


२१७ में हरा दिया । परन्तु केवल थोड़े ही काल की पराजय थी। 


उत्तर का राजा गढ़वाल नगर ले लेता है (११:१५): 
अन्तीओकुस तुतीय, महान, ने ई. पू. १६९६ मे सुदृढ़ गढ़वाल नगर 
अज्जा (गाजा) में प्तोलेमी चतुथ को पृणत पराजित किया 


या यह संदर्भ ई. पू. १९८ में सीदोन के घेरे जाने का भी ही 
सकता है। 


इस युद्ध के बाद संधि हुई, जिसमें अन्तीओकुस तृतीय ने. 
अपनी पुत्री क्‍्लिओपेत्ना का प्तोलेमी चतुर्थ ( ११: १७ ) से विवाह 


कर दिया (११:१७) । वह सेनापति जिसने उ सके अहंकार 
को मिटाया (११ : १८) लुकियुस कार्नेलियुस स्किपियों था जिसने 

पृ. १९० में मेगनेसिया में अन्तीओकुस तृतीय को मटियामेट 
कर दिया । 


तब उसके स्थान में कोई ऐसा उठेगा जो शिरोमणि राज्य में 


अंधेर करने वाले को घुमायेगा ( ११ ) : सेल्युकुस चतुर्थ ने _ 
(ई. पू. १८०७-१७५) अपने प्रधान मन्‍्त्री हेलिओदोरस को _ 
लगभग ई. पू. १८७ में भेजा कि मन्दिर की धन संपत्ति छीन लाए 


(श्मक १-४०) । 


एक तुच्छ मनुष्य वाचा के प्रधान को भी दबा लेगा (११ : २१० 
) : तुच्छ मनुष्य' पद में व्यंग्यात्मक रूप से श्रकंठ परमश्वर 


द | की और संकेत है । अन्तीओकस चतुर्थ एपीफनेस ने यह पदवी 
.. धारण कर ली थी (ई० पू० १७४-१६३) | वाचा का प्रधान 


.._ कदाचित महायाजक ओनियास तुतीय था,जो ई० पू० वछशमें हे 


.. अपने पद से पृथक किया गया। 





कित्तियों के जहाज (११: ३०) : ये रोमी लोगों के जहाज हैं जी | का 
.. ई. पू. १६८ में मिस्र में आए और अन्‍्तीओकुस तृतीय को मित्र... 
.._ को दबाने से रोका । रोमी राजदूत पोपिलियुस लाइनस ने अन्ती 
.. ओकुस के आसपास रेत में एक गोलाकार खींच दिया और उससे । 


- कहा कि इस गोलाकार से बाहर निकलने के पहले वह मिस्र छोड़ 75 


रा कर जाने का निर्णय कर ले। अन्तीओकुस चला गया। उसने . 
.._ अपना क्रोध पलिश्तीन के यहुदियों को सताने में निकाला | उजाड़ 
करने व : वस्तु” के लिए देखिए टिप्पणी १३ (११: रा. 

















दानिय्येल...... द २६१ 


२५. थोड़ा बहुत सम्भलेंगे (११: ३४) : इसका अर्थ मकाबी विद्रोह 

है जो ई० पू० १६७ में मोदिन में आरम्भ हुआ । हसीदीम लोग 

शुद्ध यहुदी विश्वास के भक्त थे और बुद्धिमान (११: ३३). 

हलाते हैं | ये लोग शीघ्र ही राजनीतिक महत्वाकांक्षी मकाबियों 

से लिढ़ गये । इसलिए मकाबियों की सहायता थोड़ी सी सहायता 
मानी गई है, जिससे वे लोग थोड़ा बहुत संभल सके । 

२६. गढ़ों के देवता (११ : ३०) : इससे या तो यूपितर कपितोलीनुस 
देवता या ओलिम्पी ज्यूस देवता का संकेत होता है, जिसे अन्तओ' 
कुस एपीफनेस ते उन अरामी देवताओं से ऊपर प्रतिष्ठित किया 
था, जिन्हें उसके पूर्वज मानते थे । परन्तु यह निश्चित नहीं है । 


ह 


डर 


हि 


२७. उत्तर और पूर्व दिशा से समाचार (११: ४४) : ये आरमेनिया 
और पारधथी देशों में विप्लव के समाचार थे (१ मक० ई : ३७)। 
अन्तीओकुस एपीफनेस फारस तक बढ़ गया, परन्तु यहूदा मकाबी 
की सफलता के समाचार सुतकर वह लोठा और यहूदा के समूल 
विनाश की ओर ध्यान दिगा। उसकी आक्रमण-योजना (११ : 
४४) उसकी मृत्यु के कारण फिर कार्यान्वित न की जा सकी |. 


५, दानिय्येल की पुस्तक की संरचना क्‍ द 
पुस्तक के समीक्षात्मक अध्ययन से इस परंपरागत मान्यता की पुष्टि 


हुई है कि यह पुस्तक एक पूर्ण साहित्यिक कृति है और एक ही लेखक द्वारा. 
लिखी गई है | समीक्षा का यह परिणाम हमें उस समय वास्तव में आश्चयेजनक 
प्रतीत होता है जब हम यह देखते हैं कि पुस्तक दो भाषाओं में लिखी गई है। 


(१: १-२ :४; ८-१२ इब्रानी में हैं और २ : ४-७ : २८ अरामी भाषा 


में हैं । अरामी का प्रयोग किन्हीं स्वाभाविक अंशों तक सीमित नहीं है जिससे... 
यह माना जा सके कि किसी अन्य लेखक ने इन्हें लिखा या संपादक ने जोड़ 
दिया । ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने विषय को इतना महत्वपूर्ण... 

. मानता था कि उसने उसकी गंभीरता को धारमिक भावना की भाषा में आरंभ... 

_.. करना उचित समझा जाता । इब्रानी के प्रयोग के बाद वह अरामी में लिखने... 


. लगा जिससे लोकप्रिय भाषा में कथा का अधिकांश भाग जनता समझ सके । _ 


० न्त मे बह फिर इब्राती भाषा का ब्रय गे करता क्योंकि ईश्वरीय अभिप्राय के । । ह । ह रा, 
7.5 रहस्यों को बह इन दर्शनों में व्यक्त करता है।। ० 
.._ इस पुस्तक में दानिय्पेल और उसके साथियों की कथाएँ हैं | इससे प्रतेत-.... 














... परन्तु अनेक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह व्यंजित होता है कि मकाबी काल में 






->प किक क्‍ पुराना नियम की भूमिका 


होता है कि दानिय्येल के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति ने इन कथाओं को 
लिखा, यद्यपि कि इनके लिखने में प्रथम पुरुष. वाचक सबवनाम का उपयोग 
हुआ है । पुस्तक में यह कहीं संकेत वहीं हैं कि लेखक कौन था और कब रहा। 







(ई. पृ. १६७ और उसके पश्चात्‌) जनता के सामने आई। ये तथ्य निम्तांकित 
हैं: (१) यह अंशतः अरामी भाषा में लिखी गयी है | यह भाषा निर्वासनोत्तर 

. काल में यहदियों द्वारा बोलचाल की भाषा बन गई थी । विशेषकर यूनानी 

काल में तो साधारण रूप से यहूदियों में इसका चलन था (२) इब्ानी धम- 

_ शास्त्र में इस पुस्तक को लेखों (कतूबीम) में स्थान दिया गया है, अर्थात्‌ 
उस समूह में जो अन्त में अधिकृत धर्मशास्त्र के रूप में विचाराधीन हुआ । 

. इस तथ्य के आधार पर यह निश्चित रूप से तो नहीं कहा जा सकता कि 
पुस्तक बाद में लिखी गई होगी, परंतु फिर भी यह अनुमान तो अवश्य 
किया जा सकता है। (३) इसमें फारसी भाषा के शब्दों का यत्त-तत्र 

प्रयोग है । उद हरणार्थ १: ३ में पारतेमीम अर्थात राजपुत्र । यूनानी शब्दों 

का भी प्रयोग किया गया है जैसे ३ : ५ में वाद्ययन्त्रों का जहाँ वीणा (का0- 
0775) , सारंगी ( [822४0 ) और शहनाई (४एणाओ०णं8) निश्चित रूप 
से युनानी शब्दों के रूपान्तर हैं। (४) यह पुस्तक प्रकाशनात्मक साहित्य के . 
अन्तर्गत भी आती है। इस प्रकार का साहित्य यहूदियों में ई० पू० २०० के 

. फचात्‌ लोकप्रिय हुआ । हम व 





















.. ७. प्रकाशनात्मक साहित्य... 
. एक प्रतिरूपी (पज्ञुंट्) प्रकाशित वाक्य में ऐसे साहित्यिक शिल्प का. 


मा, : प्रयोग होता है जिसमें प्राचीन काल के किसी संत के दर्शनों के माध्यम से... 
...... परमेश्वर की योजना का वर्णन किया जाता है। इसकी प्रधान धारणा यह है. 









. कि सब बातें परमेश्वर के हाथ में हैं और वह अपने शुभ अधिप्राय को. 
कार्यान्वित करता है, चाहे हम अपनी कठिनाइयों और संकटों में उसे आज 
और अभी समभ न पाएं। हमारे प्रोत्साहन के निमित्त परमेश्वर ने अपने 


..... अभिप्राय के रहस्य उन लोगों पर प्रकट किए हैं जो उसके अनन्य भक्त होकर... 

... उसकी निकट संगति में रहते हैं। वह बहुधा स्वप्नों और दर्शनों के रहस्यों में 

....... में अपने अभिप्राय को प्रकाशित करता है। वे उस समय तो समझ में नहीं आते... 
रा बा परंतु जैसे जसे आत्मा हमें समक देता है, हम उन को इतिहास की घंदनाओं ५ 










. उनन्‍्मीलित होता हुआ देखते हैं (दे. यू. १६ : १२, १३) । इस प्रकार आज है ह 
_ की घटनाओं को हम ऐसा देखते हैं मानो परमेश्वर के मन में येघटनाएं 
पहले द्यमान थीं। सच बात तो यह है कि हमारे युग की घटनाओं... 















... अंत के बहुत निकट रहता है । उसे लगता है 
रा ५ से अपनी चरम सीमा की और बढ़ रहा है 





दानिय्येल ... .- .-+ - रश३ 


और इतिहास को ठीक रूप से समझना ही इस सत्य का प्रमाण है कि परमेश्वर 
ने अतीत में अपने संतों पर कुछ बातों को प्रकाशित किया था । संत का दर्शन 
इतिहास की प्रक्तिया के आरंभ में होता है और अंत में उसकी पूर्ति हमें दिखाई 
देती है | दोनों का कार्य एक ही है क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के एक अभिपम्राय 
की अभिव्यक्ति हैं । यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के अभिप्राय के संबंध में लिखना 

तो वह या तो प्रारंभ में उसके दर्शन के अनुरूप गीगा, अथवा अंत में ः 

इतिहास की पूति की जानकारी के रूप में होगा। इतिहास की पति की 
जानकारी के रूप में लिखना अधिक श्रेयस्कर होगा, क्योंकि इतिहास की बरतुवादी 
जानकारों का उपयोग इस तथ्य के प्रकट करने में किया जा सकेगा कि 
परमेश्वर की योजना वराबर कार्यान्वित हो रही है। इस दृष्टि बिन्दु से हम 
प्राचीन संतों के दशनों का और भी सच्चे रूप में वर्णन कर सकते हैं, क्योंकि 
हमने उनमें अभिप्राय की पूर्ति के दर्शन भी किए हैं । हमारे संदेश का मुख्य 
विचार इस तथ्य को प्रस्तुत करना होगा कि परमेश्वर अपने वचन का पक्का 
. है जो उसने प्राचीनकाल में अपने संतीं से कहा था। अतएवं अंधकार और 
 दुष्टता की शक्तियों के प्रभाव के कारण आज की परिस्थिति चाहे जितनी 

नैराश्यपूर्ण हो, तो भी हमें धैर्यंवात और निष्ठावान बने रहना चाहिये । यदि 
प्राचीन संतों के समान हम अंत तक विश्वासयोग्य रहें तो हम परमेश्वर के 
सनातन राज्य में संभागी किए जाएंगे । 


_ प्रकाशनात्मक कृति का लेखक बहधा अज्ञात होता है। लेखक अपने 


विचारों को नहीं, वरन्‌ प्राचीनकाल के किसी संत के दर्शनों का वर्णन करता है । 
 इसीलिये वह यह मानता है कि उसका अपना नाम बाधा उत्पन्न करेगा । वह संत 


+५७. 


विशेष के दृष्टिकोण से लिखता है और उस संत के बिचारों की व्याख्या करता है।..... 


... प्रकाशनात्मक साहित्य की विशिष्ट शब्दावली में प्रतीकात्मक भाषा का... 
: प्रयोग किया जाता है| दृष्टता की शक्तियों को साधारणतया पशुओं के प्रतीकों 


में व्यक्त किया जाता है। वे मानों दृष्टता का वर्तमान यंग बन जाते हैं 


बे प्रभु परमेश्वर को नहीं मानते । आगामी युग का प्रतीक मानव होता है।..... 


.. उनमें परमेश्वर अपनी अनंत भलाई और महिमा प्रकट करेगा और कोई. 


उसका विरोध न करेगा । प्रतीकात्मक अंक और रहस्यात्मक पदविन्यास का 


भी प्रयोग होता है आम, हम, 
प्रकाशित वाक्य का लेखक यह अनुभव करता है कि वह युग के अंत में या. 












कि इतिहास बड़ी तीत्र गति < हे 2 
है (यदि दुष्टता बढ़ रही है, तो यह. . 
बीच अंतिम संघर्ष बिल्कुल 








.. श#४८ ..... _ पुराना नियम की भूमिका 


. निकंट है और उसके पश्चात्‌ परमेश्वर की विजय तथा अनंत आनंद 
.. निश्चित हैं। द 


... प्रकाशनात्मक कृति की तिथि निश्चित समीक्षात्मक पद्धति के आधार पर 
. निर्धारित की जाती है। रहस्य में आवरित ऐतिहासिक संकेतों के पंचांग का 
परिचित ऐतिहासिक घटनाओं के पंचांग के साथ साम्य लगाया जाता है। जहाँ 
.._ रहस्यमय संकेत अधिक संश्लिष्ट हो जाते हैं, जैसे बहुधा वर्णन के अन्त में 
: होता है, तो यह माना जाता है कि लेखक अपने ही युग के निकटतम अतीत की 
. घटनाओं का वर्णन कर रहा है । जब इस संश्लिष्ट वर्णन के पश्चात ऐसे 
सामान्य कथन किए जाते हैं, जिनमें दुष्टता की शक्तियों की पराजय, परमेश्वर 
के सनातन राज्य की आशा व्यक्त होती है, तो यह समझा जाता है कि लेखक 
अतीत की परिचित घटनाओं के प्रवाह के संबंध में भविष्यवाणी कर रहा 
है । घटनाओं के तिथिपत्र में इसी विशेष बिन्दु से पुस्तक की रचना-तिथि 
निर्धारित की जाती है । 


तिथि-निर्धारण की इस समीक्षात्मक पद्धति का अनुसरण कर दानिय्येल ._ 
की पुस्तक के संबंध में हम इस अनुमान पर पहुंचते हैं कि वह ई. पू. १६७ में 


ह लिखी गई अर्थात अन्तीओकुस एपीफनेस के कठोर सताव की तीति अपनाने गा 


के पश्चात और उसकी मृत्यु के पूर्व यह पुस्तक लिखी ग 


. ८. दानिय्येल की पुस्तक के विभिन्न अर्थ या व्याख्या 


.. ... दानिय्येल की पुस्तक की दो प्रकार से व्याख्या की जाती है । उनको हम... 
....._ सृष्टि संबंधी और इतिहास संबंधी व्याख्याएं कह सकते हैं । सृष्टि संबंधी अर्थ 
... यह हैकि ऐसी व्याख्याओं में समग्र काल के सीमा-क्षेत्र का विचार किया 
... जाता है, अर्थात्‌ ई. पृ. छठवीं सदी में दानिय्येल के युग से लेकर ई. स. २०वीं 
. शताब्दी तकः और उसके आगे इस संसार के अन्त तक । इस व्याख्या के 
अनुसार जिन पशुओं और सींगों का वर्णन दानिय्येल की पस्तक में है उनसे 


रा हा - आज तक की तथा आगामी किसी भी शत्तांब्दी की सरकारों और नेताओं । : 
.. का संकेत होता है । इस प्रकार की व्याख्या में अन्तिम दिनों के दर्शनों में 


जा (१०-१२) जो रहस्यात्मक अंक दिये गए हैं वे किसी भी कुशल व्याख्याकार 


दिया जाता है कि मर. १३ 





..._ के लिये खिस्त के द्वितीय आगमन की तिथि के गणना के निमित्त चुनौती और... द 
.. बौद्धिक व्यायाम बन जाते हैं।साथ ही इसमें इसबात को दृष्टि ओडदकर 
३२ में प्रभु ने इसके संबंध में यह कहा, उस 






दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पृत्र 








परंतु केवल पिता” | दानिय्येल की पुस्तक और बाइबल के अन्य समान अशों 























का जम पर 


के प्रति इस प्रकार के उपागम के आधार पर बाइबल के सत्य के संबंध में 
अनेक दखद भ्रम फेलाए जाते हैं । 


ऐतिहासिक व्याख्या में यह अनुमान किया जाता है कि दानिय्येल की 


पुस्तक लेखक के अपने युग की परिस्थितियों और धामिक आवश्यकताओं ऊँ मे 


संदर्भ में लिखी गई | यह माता जाता है कि यह पुस्तक उन लोगों के लिये. 
भी सार्थक है जिन्होंने पहले उसे पढ़ा या सुना | जो रहस्थात्मक ऐतिहासिक 
संकेत हैं वे परिचित घटनाओं और व्यक्तियों की और सर्कत करत हू । इस 


दष्टिकोण से यदि लेखक को भविष्य को घटनाओं की कुछ जानकारी होती 


थी तो वह उसी रूप में जेसी हमें अपने युग में होती ह---भथांत्‌ कि भविष्य 
उस परमेश्वर के हाथ में हैं जिसने हमारे विश्वास के माध्यम से हम पर अपना 
शभ और विजयी अभिप्राय प्रकाशित किया है। अतीत के संबंध मे जैसे 

अपने यग में, वेसे ही लेखक भी अतीत को घटनाओं में परसश्व की सामथ 


. का दर्शन करता है, परंतु भविष्य के संबंध में वह केवल सामान्य कथन हो. 
करता है। बाइबल की अच्य पुस्तकों के समान, दानिय्येल को पुस्तक का 
स्थायी महत्व उस सत्य में है जो अनंत अनादि परमेश्वर के तथा उसके साथ 

: हमारे संबंध के विषय में इस पुस्तक में प्रस्तुत हैं । 


वर्तमान लेखक ने अपनी इस पुस्तक में ऐतिहासिक व्याख्या को पद्धति का 
अनुसरण किया हैं। इस व्याख्या की तक सम्मतता और यहूदी धार्मिक इति 


द की सजीव परिस्थितियों से इसके गहरे संबंध के कारण यह बाइबल के सब (रु 8707 
गंभीर अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी । हर 

६. दानिय्येल की ऐतिहासिकता 
हे. प्‌ (८० में सोरख की पस्तक लिखी गई | उस परस्तक में इस्राएल ; पा हा ४" क्‍ 
के महापरुषों पर एक अंश है (४४: १-५० : २४) । यह अपेक्षा को जो मम 


कती है कि दानिय्येल का नाम उस अंश में होगा | परतु उसम वह नहीं है 


_ अत: यहेंजकेल १४ : १४ में नृह और अय्यूब के नामों के साथ दानिय्येल का 
- जो नाम है, वह कदाचित कोई अन्य द निश्येल है। दानिय्येल की पुस्तक का मा 
. नायक या प्रधान पात्र य जकेल का समकालीन और उससे छोटा गगा।. पा! 
: दोनों य दी बंधए थे | इसके अतिरिक्त पुस्तक में जो स्पष्ट ऐतिहासिक उल्लेख मी 
हैं उनको अन्य सुपरिचित खोत की सामग्री के साथ संगत करना बहुत कठित. पा 
7 है। उदाहरणार्थ, ५:3१: में बह कहा हवा कि दारा मांदी ते बाबुल को... 
[0555 पराजित किया । परतू अत हुए ज्रोतों से यह ज्ञात होता है. कि फारसी शंजा ४ 7 5 
..... कस ने बाबुल को पराजित किया (यह य 









व्‌ में निहित है) । दानिय्पेल.. 





२९६... पुराता नियम की भूमिका 


की प्रतक से यह भान होता है कि बाबुली, मादी, फारसी और यूनानी राज्य 


.. अनुक्रमिक रूप से हुए (अध्याय ७) । इतिहास में मादी और फारसी एक ही 
.. साम्राज्य में सम्बद्ध थे । १: १ में कहा गया है कि दानिय्येल यहूदा के राजा 
... यहोयाकीम के राज्य के तीसरे वर्ष में बंधुआ बनाया गया (ई० पू० ६०५) 


परंतु नबूकदनेस्सर के अपने अभिलेखों से पता चलता है कि वह इस समय तक 
यरूशलेम ही न पहुँचा था। ५ : १३, १८ में नबूकदनेस्सर को वेलशस्सर का 
पिता कहा गया है। इतिहास के स्रोतों से इसकी पुष्टि नहीं होती । ५: ३१ में 


.... बाबुल का पतन इस प्रकार हुआ जिससे एक ऐसे युद्ध का संकेत मिलता है जिसमें 


 बेलशस्सर मारा गया | परंतु उस युग के वाबुली इतिहास से पता चलता है कि 
बाबुल ने ऋत की अधीनता बिना किसी संघर्ष के स्वीकार कर ली, और कि बाबुली 
राजा नबोनिदुस उस समय उपस्थित नहीं था । 


इन समस्याओं तथा अन्य ऐसी कठिनाइयों के कारण कुछ विद्वानों की 
यह मान्यता है कि प्रमुख पात्र दानिय्येल प्रकाशनात्मक साहित्यकार की कल्पना 


से प्रसृत व्यक्ति है। यह भी जान पड़ता है कि लेखक को यूनानी काल के... 


इतिहास की तो अच्छी जानकारी थी परंतु बाबुली और फारसी काल के 
इतिहास की नहीं । दानिय्येल के संबंध में यह दृष्टिकोण उचित नहीं जान 
पड़ता । यह मान लिया जाए कि लेखक मकाबी काल में था, परंतु यदि उस 


.. युग में सामान्यतया यह न माना जाता कि द्वानिय्येल एक वास्तविक व्यक्ति _ 

.. था जो बंधुवाई में अपने विश्वास के प्रति सच्चा रहा तो इस पुस्तक के लिखने 

..... . में लेखक का उद्देश्य सिद्ध न हो पाता । यह संभव है कि दानिय्येल और उसके रा 
..... साथियों की कथा के संचरण में कल्पना का पूृट अवश्य दिया गया होगा परंतु 


निश्चित है कि उस कथा के मूल में ऐतिहासिकता अवश्य रही होगी 


... उसके संदेश की स्वीकृति की यह आवश्यक शर्तें है, क्योंकि यहदी धर्म अन्य... 
...  ध्र्मों से इस बात में सवंथा भिन्न है कि वह ऐतिहासिक घटताओं के संदर्भ में... 


.. ही परमेश्वर का प्रकाशन है। विशुद्ध काल्पतिक कथा अन्य लोगों के लिए... 
भले ही रुचिकर हो, परंतु यहूदी लोग तो वास्तविक व्यक्तियों के, जिनको. 
..... परमेश्वर ने अपना वचन दिया, मान से ही अपने विश्वास को मान्यता देते थे |... 


...... हइउस सम्बन्ध में एक और बात पर विचार करना चाहिये, कि लेखक का उद्देश्य... हि 
..... इतिहांस लेखन नहीं है, परंतु इतिहास की पूर्ति में परमेश्वर की सामर्थ का 
...... प्रदर्शन है। उसके लिये राजाओं की ठीक संख्या (जैसे फारस के चार राजा 5 पर 





० युनान के दस) की जाँच करता इतने महत्त्व की बात नहीं थी जितने म जा 
कीबा ' कि आत्मा की प्रकाशनात्मक भाषा के अंश स्वरूप अंकों का 
में वह बताता है कि फारसी राज्य मादी राज्य या । 




















दानिय्येल........रः २६९७ 


के बाद हआ, परंतु ८ : २० में वह दोनों को समकालीन राज्य कहता है। अतीत 

तिहास के प्रति उसकी दृष्टि ऐसी हैं माता काई कलाकार पर्वबतों की राशि 
को देख रहा हो । स्थान जुरा सा बदला कि परियेक्ष्य बदल गया । परंतु वह और 
उसके पाठक दोनों ही यह मानते ॥ कि उसकी दृष्टि वास्तविक पर्वतों को जोर 
है। अतः भले ही शुद्ध इतिहास के साथ संगति सम्बन्धी कुछ समस्याएं हमार 


सामने आती हैं, हम निश्चित रूप से यह दख्त हू कि दानिय्येल और उसके 
साथी वास्तविक व्यक्ति थे जो बंधवाई के समय कठार परादा। में अपने विश्वास 


प्रति दढ़ और निष्ठाबान रहे । हैं निय्येल के संबन्ध में यह भी मानते 


हैं कि यद्यपि दानिय्येल के दशतां के व्यौरे हमारे समक्ष एक ऐसे लेखक के 
दारा प्रस्तत किये गए हैं जिसने उनका पति की अवस्था में देखा, तथापि दानिय्येल 


ऐसा व्यक्ति अवश्य था जिससे परमेश्वर ने दर्शनों के माध्यम स बाते की 


१०. धर्म शिक्षा द 
दानिय्येल की पुस्तक की महान शिक्षा यह है कि हमारे विश्वास से 


. समभौता करने की चाहे जितनी परोक्षाएं हम पर जा; और चाटटे हम कितना 


भी सताए जाएं, तोभी हमें अपने विश्वास में निष्ठावान होना चाहिए। पुस्तक 
के आरम्भ में ही हमें यह बताया जाता है। कि दातनिस्येल और उसके साथी 


अपने विश्वास के नियमों का पालत करने मे पकक श्े, इसलिये उन्होंने राजा: 
के उत्तम भोजन का त्याग किया । उत्हीते केवल विरोध के लिए इन्कार नहीं 


किया था, परल्तु उस्होंने राजा की सेवा के लिए अपने को सयत सहित तेयार 


ककया | जब परीक्षेण हुआ तो यह स्पष्ट हो. गया कि अपने विश्वास के प्रति. 
उनकी भिए्ठा स्यायोचित ही थी । इसी प्रकार हमे भी परत के नियमों ४. 
- मे बिना समभोते के प्रम केरसा चाहिये । हमारे लिए परमेश्वर को तियाप- 7 

_ शास्त्र खिस्त में प्रकाशित हुआ 


दशा के मंदान मे सोने को मति के सामन शदरक धषणक और अवेदनगों । रे । का, 


ने दडबत ने किया। इसके फलस्वरूप तीनों पर सता और सकट आया 
दानिय्येल ने अपने सच्चे बिश्वास के बदल राजा की उपासना करना अस्वी- 


कार किया । उसे-पंर भी संकट और - संताव आया। हे संकटकाल में. 
परमेश्वर ने अपने सेवकों को निर्दोष ठहराया परमेश्वर ने उन्हें जीवित 

.. बचाया उनकी भक्ति और निष्ठा ऐसी थी कि वे शहीद होने को तैयार थ हे 
.. हमारे विश्वास के प्रति हमारी निष्ठा भी इसी साँचे में ढली होनी चाहिए. हर 


इस पस्तक से यह शिक्षा मिलती है कि इतिहास की बारा परमेश्वर के थे 


्ज 









.. त्न है। चाहे कुछ समय के लिए ऐसा दृष्टिंगो चर हो किसत्य और धार्मिकता 































रहद पा ० आर हाय पुराना नियम की भूमिका 


के विरुद्ध-मंडली के विरुद्ध--बुराई की बढ़ती हुई शक्तियाँ प्रबल हों, परन्तु अन्त 
: में परमेश्वर निश्चित अपने राज्य की स्थापना करेगा | जब हमें यह ज्ञात है 
_ कि विजय सुनिश्चित है, तब हम धैर्य और आशा के साथ सब कुछ सह सकते 
_हैं। सच यह है कि परमेश्वर की योजना में बहुधा ऊषाकाल के पहले गहन 
अंधकार होता है हक के 


इस पुस्तक में यह आशा व्यक्त है कि मनुष्य के संतान' के द्वारा परमेश्वर 
का शाश्वत राज्य स्थापित किया जाएगा, और बह आकाश के बादलों समेत 
आयेगा (७: १३) । लेखक ने इस पद “मनृष्य के संतान” का उपयोग कदाचित 
सामूहिक भाव में किया हो और उसका अर्थ पत्रित् लोग हो (दे० ७ : २७) 
परन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि बाइवल में व्यक्ति और समाज दोनों 
भाव बहुधा एक में मिले रहते हैं। जो कुछ भी हो, यह निश्चित है कि जो 
भाव उस पद में अनभत हुए उनकी पति हमारे प्रभ यीश खिस्त में हुई। वह 
दीन-हीन छूप में देहधारण कर मानव पुत्र बनकर आया और परमेश्वर की 
योजना की पूर्णता पर महिमान्वित रूप में मानव-पुत्र होकर आएगा । 


दानिय्येल की पुस्तक में मृतकों के पनरुत्थान के विषय में स्पष्ट कथन है 





. (१२: २) । यह शिक्षा पुराने नियम के अधिकांश में नहीं मिलती। इसमें 


.. स्वर्गंदूतों के नाम का भी उल्लेख हुआ है । जिब्नाएल और मीकाएल ताम आए 
.. हैं (८: १६; १२ : १) और यह संकेत मिलता है कि स्वर्गदूतों का संबंध 
जातियों और राष्ट्रों से है (१० : १३-२०) । स्वर्गदूतों के अस्तित्व अथवा - 
.._अनास्तित्व के संबंध में हम वस्तुबादी ताकिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते 
... समस्त अतिप्राकृतिक तत्वों के सम्बन्ध में साधारणतया यह बात सच है। परंतु 


प 


बल में स्वगंदूतों का अस्तित्व मान लिया गया है । दानिय्येल की 


.. पस्तक में स्वर्गदतों के नामों और उनके कामों के बीच संबंध है | जिब्राएल 







.... क॒ता की ओर लाएंगे (१२ 


.. परमेश्वर की ओर से वचन-वाहक है । मीकाएल विश्वासियों का पक्ष लेने के 

लिए खड़ा रहता है।.. 
....... विश्वास के प्रति तिष्ठावान रहने की शिक्षा के साथ-साथ यह सुझाव भी 
.. हमें मिलता है कि दूसरों को इस विश्वास तक लाने में भी हमारा दायित्व 
है । पुनर॒त्थान में आदर का स्थान उनको दिया जायेगा जो बहुतों को धामि- 


कत्ल, 
का 














सेंतीसवां अध्याय 
होशि 


१. पुस्तक का शीर्षक और प्रामाणिक धर्मशास्त्र में स्थान 

इस पुस्तक का नाम होगे नबी के नाम पर रखा गया है। इस नबी के वचन 
इसमें हैं। इस नाम का इब्रानी रूप होशिआ ( 00८७) है, जिसका अर्थ 'बचाना' 
है । सप्तति अनवाद में जोसी ((95८८) है। बुल्गाता में भी ओसी है। अंग्रेजी 
रूप में होजिया (08८४) है जिसमें इब्रानी और वुल्गाता दाता के तरव मिले हुए 


हैं । हिन्दी में इब्नानी नाम को अनुरूपता और पृस्तक का नाम होश हैं 





डे 





.. बारह की पुस्तक मेंस य पहली पस्तक है| अर्थात छोठे तबियों में यहें 
पहली पुस्तक है । यद्यपि बारह को पुस्तका का मैं प्राचीन बाइबलों में भिन्न- 
भिन्न है, परंतु सब बाइबल होगे की पस्तक का इस समूह के अंतर्गत पहिला 
- स्थान है । 
२. विषय-समग्नी का सारांश 
0 अदा ता आती विषय है : परमेश्वर की अपनी प्रजा, इलाएल जाति परमेश्वर 
: के प्रेम को ठकराती जाती है, उसको घायल करती है, फिर भी परसटवर लगातार 
. ब्रेंम करता जाता है । इसी विषय का कनद्र में रखकर होशे नबूब॒त करता है द 


के प्रति लगातार प्रेम से इस विषय का घर्निष्ट सबंध भी हे 
३. रूपरेखः 
. होशे-परमेश्वर के प्रेम का नवा 
६] ) गेकागाहस्थ्य अनभव (१-६३ ) । 


हु 


(क) घर और जाति में विश्वासधात (१:१-६ ) : परमेश्वर के निर्देशाससार होशे 








0० होता है: मिंज ले. ( कि थोड़े ही काल में येह के घराने को यिज्ञल की 
रह हत्या का दंण् मिलने वाला है); 
. लोअम्मी (मिरी प्रजा नहीं, अर्थात्‌ 


















 झौर वे नबवतें इस पस्तक में संकलित हेँ | हेंशि की अपनी विश्वासबातिती ५ 2५8 


. दिवलम की बेटी गोमेर को अपनी पत्नी बनाता है, यंद्रपि बह उसके साथ । 
_ बेश्या जैसा व्यवहार करनेवाली थी। उनके तीन बच्च हुए और होशे ने 2 
उनके ऐसे नाम रक्खे जिनसे परमेश्वर द्वारा इस्राएल के परित्याग का संकेत 08,020) 


लोरूहामा (जिस पर दया नहीं हुई): 70. 
दा निरस्त की गई 








लक 2 5० होंशे :* 

 (ख) परमेश्वर का स्थायी प्रेम (१:१०-२ : १) : फिर भी यह परमेश्वर का 
अभिप्राय है कि इस्राएल का उद्धार करे । अतः यिज्लेल का अर्थ होगा 
'उद्धार' और लोग कहेंगे अम्मी (मेरी प्रजा) और 'रुहामा (जिस पर 
दया हुई हैं) द द द 


(ग) विश्वासथात की समस्या (२: २-२३) : होशे इस्राएल की संतान से 
पुकारकर कहता है कि वे अपनी माता से, जो विश्वासघातिनी पत्नी रही 
है, परमेश्वर के लिये विवाद करें (२:२-१०) । वह नहीं जानती थी 

. कि बाल देवता नहीं, वरन यहोवा ही उसे अन्न, नया दाखमधु, तेल, चाँदी 

. और सोना देता था। उसका दंड उसके अपराध के मान से ही होगा (२ 
११-१५) । फिर भी यहोवा उसे मोहित कर जंगल में ले जाएगा, जहाँ 
उसने पहले उससे प्रेम किया, जहाँ वह बाल देवता के आकषणों से दूर 
रहेगी, और जहाँ मैं सदा के लिये उसे अपनी पत्नी करने की प्रतिज्ञा करूँगा 
(२: १६-२३ 

(घ) विश्वासघातिनी पत्नी का उद्धार (३: १-५) : परमेश्वर, होशे को 
निर्देश देता है कि जाकर अपनी पत्नी से प्रीति कर, जो व्यभिचारिणी होने 
पर भी पति की प्यारी है, ठीक उसी प्रकार जैसे इस्राएलियों ने पराए 
देवताओं की भक्ति की, तो भी परमेश्वर उनसे प्रीति रखता है। तब होशे 
ने चाँदी के पन्द्रह टुकड़े और डेढ़ होमेर जब देकर उसे मोल लिया (कुल 

.. मृल्य लगभग ३० शेकेल है; दे. नि. २१ : ३२; २रा. ७: १८) । तब 

.. उसके लिये परीक्षण काल निर्धारित किया कि उसके पश्चात उसका पूर्ण 

उद्धार हो जाए। इसी प्रकार परमेश्वर भी इस्राएल के साथ व्यवहार 

.. करेगा । 9 द द 
. (२) अपने विश्वस्त परमेश्वर के प्रति इस्राएत का विश्वासघात 

(४-१३) जप हा 
. (क) धार्मिक जीवन में विश्वासधात (४: १-७ : ७) : अपनी प्रजा के साथ 
.... परमेश्वर काज्ञान है, परंतु शाप देने, झूठ बोलने, वध करने, चराने और 

...... न्यभिचार करने को छोड़ और कुछ नहीं होता (४: १-३) । “जैसे लोग, 

.... वैसे प्रोहित", दोनों भ्रष्ट हैं इसलिये दोनों को दंड मिलेगा (४: ४-१०) 


. यज्ञ करते और धूप जलाते हैं (४ : 
इस्राएल मूरतों का संगी हा 













.. यहोवा का मुकदमा है, क्योंकि इस देश में न तो सच्चाई है, न करुणा न. 


इस्राएल झूठे देवताओं से परामश लेते हैं । ड़ो की चौटियों पर: 0557 
१९-१४) । हठीली कलोर केसमान : 
"गो भी यहंदा दोषी न बने (४:१३ ४. 














(ख) राजनीतिक जीवन मे विश्वासघात (७ : ८५-१० : 


अपने विनाश के लिए राजा ठहराए और मूर्तियाँ बनाई । शोमरोव का 


-- /  इंख्राएल, परमेश्वर के देश मैं न 
. में अशद्ध वस्तुण खायग । 


.. मोहित हों गए थे, उसी के समान थिनौने 
- के जब वे अपने निर्वाचित राजा 


ा  (बेतावन ) 


... उसकी सु दर गन पर जुआ रखा है (१०. 
(ग) परमेश्वर का प्रेम (११ 








३०१ 


होशे द 


-१६) । मिस्पा और ताबोर प्रलोभन के स्थान बत गए; एप्रैम अशुद्धता 


बा हुआ और बमंड में चर है। अतः उनके काम उन्हें पर मेश्वर की 


ओर फिरने नहीं देते | व्यभिचार के लड़के पैदा किए गए हैं (५: १-७) का 


प्रभ परमेश्वर, एप्रैम के लिये सिह, और यहुदा के घरान के लिये जवान 


सिंह बनेगा जो उन्हें फाड़ डा लेगा | अपने घाव और रोग को चगाइ के ञ 
लिये एप्रैम अश्शुर के पास गया (५: ८-१४) । वे यहीवा का आर फिर, 
वही उत्को जिलाएगा (५ : १५०६ ) । परंतु सच्चे पश्चात्ताप की 
आवश्यकता है, क्योंकि “मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम से हो प्रसन्न हति _ | 


और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूँ कि लोग परमेश्वर का ज्ञान 
(६ : ४-६) । 'इसके वि परीत उन्होंने वाचा को तोड़ दिया । उतके 


हर 


राजा और हाकिमों को भी वे बुराई करने और झठ बोलने में लुब्ध करते 


(६ : ७-७ : ७)। 

१५) : एप्रैम ऐसी 
चपाती है जो उलटी न गई ही, एक प्लोली पण्डकी के समान हो गया ह 
वे मिखियों की दोहाई देते और अश्शूर पर परोसा रखते हैं; भर 4 
परमेश्वर की ओर नहीं फिरते जो उन्हें चंगा करने को तैयार है (७:८५ 


-१६) 


यद्ध की संकट-ध्वनि | प्रभु का क्रीध उत्त पर भड़का है, क्योंकि उन्होंने 


बछडा टकड़े-टकड़े हो जाएग ॥ वे वायु बति हैं और बवबंडर लवेंगे””' 


इसराएल निंगला गया 


इस्राएल ने पोर के बाल के पास जाकर अपने 
तई को लज्जा का कारण होने के लिए 


. जाएगा, और लोग उस समय पहाड़ी से हट 
प्रैम गिबा के दिनों से पाप करता आया हैँ । 



































ग एप्नेम ने पाप करने को बहुत सी वेदियाँ बनाई । 
.. औ» वे परमेश्वर की व्यवस्था पराई समभते हैं (८) । 
पायेंगे परत मिस्र और अश्शूर ॥7] 


अर्पण कर दिया और जिंस पर... 
हो गए' (६) | समय आ रहा 
ओं की असमर्थता देखेंगे और बेतेल. श 
के बछड़े के लिए डरते रहेंगे, क्योंकि वह अगर देश पहुँचाया. 

पहाड़ों से कहने लगेंगे कि हमें ढाँप लो । ला 
अब बछिया की गर्दन जैसे... 


जब इलाएल बालक था, तब रा रा. ः 








| ३०२ द कप 5 + पुराना नियम की भूमिका 


. मैंने उससे प्रेम किया और मिम्र से अपने पुत्र को बुलाया'“मैं ने एप्रेम को _ 
पाँव-पाँव चलना सिखाया, और उतको गोद में लिए फिरता था!। परंतु 
.. इस्राएल विश्वासबात करने में ही लगा है ।““'हे एप्रंम, में तुझे क्योंकर 
छोड़ दूं ? **“मैं मनष्य नहीं परमेश्वर हूँ, मैं तेरे बीच रहनेवाला पवित्व 
हैं, और मैं क्रोध करके नाश करने न आऊंगा । इसके विपरीत मैं बंधुवाई 
से छड़ाकर लौठाले आने आऊ गा। 
. (घ) एप्रैम की दुष्टता और दण्ड (१९: १२-१३ : १६) : एप्रैम लगातार 
झठ और उत्पात को बढ़ाता रहता है | याकूब अब तक परमेश्वर की ओर 
चंचल और अडंगा मारने वाला है। एप्रेंम के हाथ में छल का तराज 
अंधेर करना ही उसको आता है। उसे धन का घमंड है। वह वबियों की _ 
अवहेलना करता है। मृतियाँ बनाता है (लोग बचड़ों को चमते हैं) । 
इसलिए वे भोर के मेघ, तड़के सूख जाने वाली ओस, खलिहान पर से 
आंध्री के मारे उड़ने वाली भूसी, या चिमनी से निकलते हुए धुएँ के समान 
... होंगे (११ :१२-१३: ३)। इस प्रकार वे उस परमेश्वर का परित्याग 
.. करते हैं जो कहता है, “मित्र देश से ही मैं यहोवा तेरा परमेश्वर हूँ; तू 
.. मुझे छोड़ किसी को परमेश्वर करके न जानना, क्योंकि मेरे सिवा कोई तेरा 
.... उद्घधारकर्ता नहीं ।”“'उनकी दृष्टंता के कारण यहोवा उनके लिए सिंह सा 
..... बन गया है, वह चीते की नाई मार्ग में घात लगाए रहेगा'"''उनके राजा 
... उनको बचा न सकेंगे (१३ : ४-१६) हे 


...._ (३) पण्चात्ताप के लिए पुकार और छुटकारे की प्रतिज्ञा (१४) । 


. इस्राएल अपने परमेश्वर यहोवा के पास यह कहते हुए लौट आएं, 'सब 


.. अधमं दूर कर; अनुग्रह से हमको ग्रहण कर"“अश्शूर हमारा उद्धार व करेगा, 
.... हम उसके घोड़ों पर सवार न होंगे, और न हम अपनी बनाई हुईं वस्तुओं से 


... कहेंगे “तुम हमारे ईश्वर 


० है $ 


(१४ ६ १-४) 2 
परमेश्वर उन्हें उत्तर देगा “मैं उनके भटक जाने की आदत को दर करूँगा 


... मैं सेंतमेत उनसे प्रेम करूँगा'“'मैं इस्राएल के लिए ओस के समान हुँगा"वे हर 
..... लौटेंगे और मेरी छाया में बठेंगे और उद्यात के समान फले-फूलेंगे (१४: 
7 चननथ औ 3 हे 


..... ४. रचना, रचयिता, तिथि 





जो बुद्धिमान है वह इन बातों को समझेगा (१४: ६) । हद हू 








ऊपर रूपरेखा में हम देख चुके हैं कि होशे की पुस्तक के तीन भाग हैं । हे न, 








अध्याय १-३ पहला भाग है। वह आत्मकथात्मक है और नबी के तीसरे बच्चे ना रा 














होगें 5 है गा घह 


के जन्म के पश्चात्‌ लिखा गया होगा, और कदाचित दसरे भाग (४-१३) 
की विभिन्न नबूवतों के बाद लिखा गया होगा। तीसरा भाग १४ बा अध्याय 
है | इसमें पिछले भागों के विपरीत आशा का संदेश है। कुछ विद्वानों का. 


विचार है कि तीसरे भाग में जो आशा का अंश है वह परवर्ती सम्पादक का... 


. कार्य है। परन्तु पुस्तक के स्वरूप से इस मान्यता की पुष्टि नहीं होती । कारण के 
यह कि होशे के गाहस्थ जीवन की दखांत घटना से जो साम्य है, उसमें पुनरु- 

द्वार की आशा निहित है आशा नबी के गाहस्थ्य जीवन और इस्राएल 
के साथ परमेश्वर यहोवा के व्यवहार, दोनों में ही निहित है। इसके अतिरिक्त 
पुस्तक की लयात्मक शैली सारी पुस्तक में एक सी है । 


यह मान्यता भी प्रस्तुत की गई है कि इस पुस्तक का एक यहुदापरक 
संशोधन हुआ, जिसमें इस्राएल को दिए गए मूल संदेश के अन्तर्गत यहूदा संबंधी 
उल्लेख जोड़ दिए गए। इनमें यहुदा के पक्ष में भी उल्लेख हुए हैं, जैसे १: ७ 
और ११ : १२ में । परन्तु यहुदा के विपक्ष में भी उल्लेख हुए हैं, जैसे ४: १५ 
. और 5 : १४ में । इस्राएल को दोषी ठहराने के संदेश के समान यहूदा को 
.. दोषी ठहराना भी होशे का संदेश हो सकता है। नबी के मन में दोनों राज्य 
एक ही जाति थे । क्‍ु द 


द संक्षेप में होशे की पूरी पुस्तक मुलत: एक ही व्यक्ति की, अर्थात होशें नबी _ 
.._ की रचना है। इस पुस्तक के मसोरेती पाठ में जो अनेक समस्याएं विद्वानों के सामने 
.._ उपस्थित होती हैं (जिनका स्पष्टीकरण सप्तति अनुवाद से हो जाता हैं) 


. कदाचित इस कारण हैं कि नबी चालू बोली की शब्दावली में अपनी बाते 


. लिख रहा है। 


तिथि का निर्धारण सरल काम है । होशे ने अपना नबूबत-कार्ये उस 


समय आरम्भ किया जब यारोबाम द्वितीय (ई०पू० छ८६-७४६) जीवित गा 
(१: १ उत्तराद्ध) । ५४ १६ से यह संकेत मिलता है कि अश्शर शक्ति- न क्‍ 

गाली हो गया था और उसकी शक्ति से अन्य जातियों को भय होने लगा था। हा है 
परिस्थिति यारोबाम की मृत्यु के पश्चात्‌ विद्यमान थी । ई०्पू०्छरे४न... 


रे ७४३४ का अरामी-एप्रमी यद्ध ५ भ--१०, १३ की पष्ठभमि प्रतीत होता है हा का 


. इस प्रकार अंतर्साक्ष्य के आधार पर यह कहा जा सकता हूँ किहोशे का का, 
नबूबत काल लगभग ई० पू० ७४६ से ७३४ तक था। यदि १: १ में हिज- 


... किय्याह राजा का उल्लेख ठीक हैं, तो होशें का नबृबत-कार्य ई० पू० ७१४ तक । ५ 
.... चलता रहा। परन्तु इस उल्लेख की शुद्धता में शंका हैं, क्योंकि पुस्तक की. 
.... विषय सामग्री की घठतायें ई० पृु० ७४६ से मा 


तक सीमित हैं 










































दे हक पुराना नियम की भूमिका... 


... ५. पुस्तक की व्याख्या की समस्या _ 
..... १: २ में यहोवा ने कहा, “जाकर एक वेश्या को अपनी पत्नी बना ले, और 
... उसके कुकर्म के लड़के-बालों को अपने लड़के बाले करले ।' यह कैसे संभव है कि 
. यहोवा परमेश्वर जिसने अपने आप को इस्राएलियों पर धामिक प्रकट किया 
_ था (ति० २० : १४), इस प्रकार की आज्ञा होशे को दे ? होशे यह केसे 
. विश्वास कर सकता था कि इस परिस्थिति में विवाह की प्रेरणा परमेश्वर की 
आज्ञा थी? क्या होशे का विवाह वास्तविक घटना थी अथवा वह इख्रालिय 
. को शिक्षा देने के लिए कल्पनात्मक एवं प्रतीकात्मक कथा थी ? इन प्रश्नों के 
_ विभिन्न उत्तर दिए गये द 


प्रतीकात्मक व्याख्या के अनूसार यह कथा एक रूपक कथा है जिसमें 
नहीं था, और यदि विवाहित था तो उसकी पत्नी उसके प्रति पूर्णतः विश्व- 
स्त थी । द 


शब्दश: व्याख्या के अनुसार, होशे ने एक वेश्या के साथ विवाह किया। 
.... . उसकी आशा थी कि वह बदल जाएगी। उसकी पहली संतान औरस थी ( 
...._ ३) । परंतु दूसरी दो जारज थीं, क्योंकि उनके संबंध में पिता का उल्लेख नहीं 
.. है। संभव है कि होशे से विवाह के पहले गोमेर मंदिर की देवदासी थी। उन 
... दिनों में कनानी धर्म में देवदासी प्रथा प्रचलित थी। इस व्याख्या के संबंध में 
...... यह कठिनाई है कि होशे को क्यों आज्ञा दी गई, “जा, एक स्त्री से प्रीति कर 
आप क्‍ 


....  सर्वसामात्य व्याख्या, जो परवर्ती दृष्टिकोण है, यह है कि १ वेश्या... 
... को पत्नी बनाने! का गोमेर संबंधी जो वर्णन है वह उस समय का है जब 
... . विवाह के कुछ समय पश्चात्‌ होशे को ऐसी जानकारी होती है। विवा 
... के समय या उससे पूर्व उसे यह जानकारी नहीं थी। उसके दु:खद अनुभव के 
...... पश्चात्‌ उसने लिखा | जो कुछ उसे बाद में पता लगा उसे उसने प्रारंभिक 
स्थिति पर आरोपित किया। फल से बीज का स्वभाव प्रकट हो गया और 

.. ... - इसलिये बीज का वर्णन फल के रूप में किया जा सकता था। नबी होने के 
कारण होशे ने अपने गाहस्थ्यं जीवन के अनुभव और इस्राएल के संबंध में परमे- 
घर के अनभव में साम्य देखा । दोनों में ही विवाह की वाचा उस समय तक 


करण 





...._ सुखसय थी जब तक पाप के कारण दुःख न आया। जब गोमेर का विश्वासघात ._ 










सिद्ध हो गया, तो होशे क्‍या करता 





इसी प्रकार परमेश्वर भी इ्राएल के... । 
जब होशे ने इन दोनों दुःखान्त 








.. होशे पी द जो ३०५ - 
 कथावस्तु को देखा - अपनी और परमेश्वर संबंधी-तो एक ओर तो गोमेर से 


लगातार प्रेम करने के लिये उसका हृदय द्रवित हुआ कि यदि वह सच्चा पर- 
चाताप करे, तो उसका पुनरुद्धार और उसकी पुनर्स्थापना करे (३: १-३) 


और दूसरी ओर भटकी और विश्वासधातिनी इस्राएन जाति को, कि यदि... * 
वह सच्चा पश्चाताप करे, तो परमेश्वर के स्थायी प्रेम का उपदेश और 


आश्वासन दे । 


६ होशे की जीवनी संबंधी टिप्पणियाँ 


होशे इल्राएल के उत्तरी राज्य का तागरिक था । सामरिया के अच्यायों के 
संबंध में बोलते हुए वह हमारे राजा' शब्दों का प्रयोग करता है (७: ५४) । 
वह शहर का नहीं गाँव का रहने वाला था, क्‍योंकि वह जंगली जानवरों के _ 
फन्‍्दों का (५: १; ६: ८५), कंषक जीवन का (४४१६; 5: ७), ओर 
खेतों के फल, फूल एवं कांठों का वर्णन करता है (६ ४ १०; १० :१; 
१३ : १५) 


..  पुरोहिती कार्य के संबंध में उल्लेखों से कुछ विद्वानों का मंतब्य है कि 
 होशे पुरोहित जैसा बोलता है और इसलिये बह पुरोहित परिवार का था 


7 (४: ६-१४; ५:१; ६-४ ८-६; ८८ ६) ॥ परंतु. यह पवकी रीति से 


हैं कहा जा सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो बारीकी से देख सकता है 
इस प्रकार से लिख सकता है जैसे होशे ने लिखा । द 


यदि हम होशे के गाहस्थ्ये जीवन के परवर्ती दृष्टिकोण वाली व्याख्या ४ 


.. को मान लें, तो हम कह सकते हैं कि दिबलेम की पुत्री गोमेर के साथ होगे ० 
का विवाह उसके नबी होने की बुलाहट से संबद्ध है। उसके तीन बच्चे हुए. ./ 

_ जिनको उसने नबूवत के वचनों का प्रतीक बनाया । जब गोमेर नेघोखादिया... 
.. और उसे छोड़ दिया तो होशे के जीवन में दुःख आया। इस्राएल के साथ ला 
.. परमेश्वर के व्यवहार के नमूने से प्रेरित होकर होशे ने मूल्य देकर गोमेर..| 
... कोयातो उसके यार सेया मालिक से, जहाँ वह दासी थी, मोल लिया. । 
..._ (३: २) और उसकी पुनर्स्थापना के पहले एक परीक्षण काल निर्धारित किया।__ का 


७ धर्म शिक्षा 


होशे को परमेश्वर के प्रेम का नबी कहा जाता है। यह ठीक है क्योकि 


... होशे यह प्रस्तुत करता है कि यद्यपि इस्राएल जाति व्यभिचारिणी पत्नीके | 


समान अपने स्वामी परमेश्वर के अयोग्य आचरण करती रही, तथापि परमेश्वर. 





० - उससे लगातार प्रेम करता रहा | परमेश्वर पहले से ही इस्राएल से प्रेम करता 527 0 











पुराना नियम की भूमिका 





“कै 2 





था (११ :१; १३ : ४) । उसने जंगल में सगाई के सारे आनंद सहित 
उससे विवाह की वाचा बाँधी (२:१५), परंतु इस्राएल ने वाचा का भंग किया 


पे (६ :७) और अपने को अयोग्य सिद्ध किया (२: २-७; ४: ११-१७) । 


परमेश्वर यहोवा और इस्राएल के बीच संबंध में वाचा को होशे केन्द्रीय 


हम स्थान देता है। इस संबंध का मूल गुण करुणा ( निहट्त॑ ) अथवा वाचा-प्रम 


: है। यह वह गुण है मानो कोई व्यक्ति परिवार के सदस्य ज॑ंसा रहता है, उसका 
. स्वार्थ परिवार के अन्य सदस्यों के अधीन है, परिवार के आदर्श और नीति में 
वह परिवार के सम्मान को बनाए रखता है, परिवार में प्रत्येक के अधिकार 
का, विशेषकर दुर्बलों के अधिकार की रक्षा के दायित्व को स्वीकार करता 
और परिवार के मुखिया की आज्ञा का वह आनन्दपूर्वक पालन करता है 
परमेश्वर के वाचागत प्रेम का यह आग्रह है कि सत्य और धामिकता के 
 आदर्शों का पालन किया जाए (६: ६), और उसमें यह निहित है कि इन 

 आदर्शों के उल्लंघन के लिए कठोर दंड भी दिया जाए (४: ३, ६-१० ) 
परमेश्वर किसी और के प्रति भक्ति को स्थान न देगा--अन्य देवताओं की भक्ति 


..... का अर्थ है व्यभिचार और विश्वांसघात (४:११-६) । फिर भी उसके क्‍ 


_ वाचागत प्रेम के कारण वह अपने भटके हुए लोगों की चिता करता है ( 
... ८) और उनको बचाने और चंगा करने का प्रयत्न करता है (७ : १, १३; 
“वाह रह). क्‍ा ता 


होशे यह सिखाता है कि पाप की जड़ मन में है। इस्राएली लोगों के अंदर 


० रे : विश्वासवात की भावना (४: १२; ५: ४) से प्रभु की ओर फिरने का 
.. कार्य अधिकाधिक कठिन होता है । प्रभु की ओर फिरते के बदले वे अधिकाधिक 


०४४ मूर्ति-पूजा एवं कामुकता (४: १२) और बाह्य रीति-विधियों को मानने 


का ज ः ' की ओर बढ़ते जाते हैं । ये वातें परमेश्वर को प्रिय नहीं है (८5: ११-१३) ।. 

















फिलनकन-+-+क->ात मर ++++सअ++ >>» स>2नकॉन रहता चरम तमनप 3 2स८८ न >बन सनी मनन पलक न नाल ननक लत ५ जप 5 पक 


॥ 
5 
| 

हर 
हा 

$ ६५४7 
। ह ह 
।' 





अडतीसबॉज ध्याथ 
योएल 


१. शीर्षक 


इस पुस्तक का नाम उसके लेखक, योएल नबी के नाम पर रखा गया है। 


इस नाम का अर्थ यहोवा ही परमेश्वर है ।” पुराने नियम में अन्य कई व्यक्तियों 


का नाम योएल है। इस शब्द का इब्रानी रूप योएल है। सेपत्वागिंता और 
वुल्गाता में इगोएल हैं| भारतीय भाषाओं में इब्नानी रूप अपनाया गया है और 


. योएल नाम आया है। 


२, विषय सामग्री का सारांश ० 
. योएल की पुस्तक में एक साथ ही दो विपत्तियों, टिड्डी और अकाल, 


के समय पर की गई नवृवतें प्रस्तुत हैं। इनसे आरम्भ होकर नबी का विचार 
. अन्तिम समयों के वर्णन तक उठ जाता है और प्रभ के दिन का वर्णन किया 


जाता है जिसमें आत्मा का उंडेला जाना और जातियों का अंतिम न्याय होगा । 


३. रूपरेखा 


योएल--आत्मा के उ डेले जाने का नबी 


. (१) टिड्डी और अकाल से सीख (१: १--२ * २७) 


.. (क) वास्तव में विपत्ति आ गई है--अतः सब शोक करें, (१:९-२० ): पुरनिये 
... स्मरण करें कि इस समय की टिड्डी की विपत्ति के समान पहले कभी. 
... विपत्ति नहीं आई। इसमें टिड्डी की प्रत्येक अवस्था विगाश की नई लहर... 
.. के समान है। दाख मधु पीने वाले शोक करें क्‍यों दाखलताएं सूख गई हैं।. 
.._ मन्दिर में याजक शोक करें क्‍योंकि भवन में अब अन्तबलि और अधे नहीं. . 
.... आते । किसान और फल-उद्यान के स्वामी शोक करें, क्योंकि खेत और |... 
.. .. उद्यान सूख गए हैं (१:१-१२) । लोग यहोवा के भवन में एकत्र हों और. 
...... शोक करें तथा यहोवा की दोहाई दें । हे यहोवा 








ऑंवेयदोहाई देता है, 














. 3 इढछ .... पुराना नियम की भूमिका 


क्योंकि जंगल की चराइयाँ आग का कौर हो गई ***““वनपशु भी तेरे लिए 
.. हॉपते हैं, क्योंकि जल के सोते सूख गए! (१:१३-२० ) । 
. (ख) सब कंपित हों (२:१-११) : नरसिंगा फूको', भय की सूचना दो, 
.. क्योंकि आक्रमणकारी (टिड्डियाँ) भयंकर हैं । उनके आगे की भूमि तो 
एदेन की बारी के समान होगी, परंतु उनके पीछे की भूमि उजाड़ मरु 
स्थल बन जाएगी वे सवारी के घोड़ों के समान दौड़ते हैं। उनके 
कदने का शब्द ऐसा होता है जैसा पहाड़ों की चोटियों पर रथों के चलने 
का--वे शरवीरों की नाई दौड़ते, और योद्धाओं की भाँति शहरपनाह 
पर चढ़ते हैं।*'"''*' वे घरों में ऐसे घुसते हैं जैसे चोर खिड़कियों में घुसते 
हैं। उनके आगे पृथ्वी कांप उठती है और आकाश थरथराता हैं' 
यहोवा का दिन बड़ा और अति भयानक है ।' 


(ग) सब पश्चाताप करें (२:१२-१४) : यहोवा की यह वाणी है अभी भी 
अपने पूरे मन से फिरकर मेरे पास आओ । अपने वस्त्र नहीं, अपने मन 

ही को फाड़कर अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरो | यहोवा अनुग्नह- 
कारी, दयालु, विलंब से क्रोध करने वाला और करुणा निधान है! । 


(घ) उपवास और प्रार्थना के लिए महासभा की जाए (२:१४-१७): 
“सिय्योन में नरसिंगा फू को, उपवास का दिन ठहराओ ॥.... याजक रो 
. रोकर कहें, “हे यहोवा अपनी प्रजा पर तरस खा, और अपने निज भाग 


.. की नामधराई न होने दे” जाति जाति के लोग क्‍यों कहने पाएं कि उनका. 


परमेश्वर कहाँ रहा ? 


 (च) परमेश्वर अपने लोगों की प्रार्थना पर ध्यान देता है (२:१८-२७): 
. यहोवा को अपने देश के विषय में जलन हुई और उसने अपनी प्रजा पर 
.. तरस खाया ।”“उसने कहा, है देश तू मत डर; तू मगन हो और आनंद 
.._ कर”“जिन वर्षों की उपज टिड्डियों ने खाली थी, मैं उसकी हानि तुम... 
. को भर दूगा हज आह 


(२) अंतिम दिन (२:२८-३:३१ ) 


ः . (क) आत्मा की प्रतिज्ञा (२:२८-३२) : “उन बातों के बाद में प्राणियों पर 
..... अपना आत्मा उडेलूगा; तुम्हारे बेटे-बेटियाँ भविष्यवाणी करेंगी“ “मैं 
मा - आकाश में और पृथ्वी पर चमत्कार, अर्थात लोह और आग और पु ; 





..... खँंभे दिखाऊगा “जो कोई उस समय यहोवा से प्रार्थना करेगा, वहू 





न 


टब्समसकमनल3३+ काल लन% ५८ इलय नम 59१९ ९० पक २००८ मक ० कलर जम न असर पर 








योएल हे " हा 


(ख) सारी जातियों का अंतिम न्याय (३:१-१६) : यहोवा सब जातियों को 
एकत्वित कर यहोशापात की तराई में ले जाएगा, और अपने निज भाग 
इस्राएल के विषय में मुकदमा लड़ेगा | सोर सीदोन और पलिश्तीन का 
दिया हुआ बदला उनके ही सिर डाल दिया जाएगा । द 

. जाति जाति के लोग युद्ध की तैयारी करें। अपने अपने हल की फाल 

को पीटकर तलवार, और अपनी अपनी हंसिया को पीटकर बर्छी बनाओ; जो 


रे 


बलहीन है वह भी कहे, मैं वीर हूँ सब जाति के लोग आएं, यहोवा 


भी अपने शूरवीरों को वहाँ लाएगा--सब यहोशापात की तराई में --भीड़ 


की भीड़ के लिए निबटारे की तराई में--एकत्न हों । तब यहोवा सिय्योन्र से 
गरजेगा और अंतिम न्याय सुनायेगा । 

(३) निष्पत्ति या पू्णता (३:१७-२१) : 'यरूशलेम पवित्न ठहरेगा'"' 
पहाड़ों से नया दाखमधु टपकने लगेगा, और टीलों से दूध बहने लगेगा" 
यहोवा के भवन में से एक सोता फूट निकलेगा जिससे शित्तीम नाम नाला 
सींचा जाएगा ।....इस प्रकार यहूदा और यरूशलेम का खुन, जो अब तक मैंने 
पवित्र नहीं ठहराया था, अब उसे पवित्र ठहराऊ गा । 

४. संरचना, रचयिता और तिथि हा] 
इब्रानी मुलपाठ और समस्त प्राचीन अनुवादों में यह पूर्ण पुस्तक एक 


इकाई के रूप में उपलब्ध है। इसकी विषय सामग्री और शैली एक ही व्यक्ति 
की है और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि भी एक रस है । अतः कुछ ही |. 
. विद्वानों को छोड प्राय: समस्त विद्वान इसे अखंड रचना मानते हैं और योएल हा । 


नबी को इसका लेखक मानते हैं । 


.... इस पस्तक की तिथि संबंधी कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता । अतएव 

.. आलोचनात्मक विश्लेषण द्वारा तिथि का निर्धारण किया जाता हैं। इसमे ने 

.. तो अश्शर का और न बाबल का उल्लेख है। अतः इसकी तिथि बाबुल राज्य 
के पतन के पश्चात्‌ (ई. पृ. ५३९) मानी जाती है | यूनानियों का उल्लेख 


हुआ है परंतु विश्व-साम्राज्य के रूप में नहीं (३:६)। अत: इसकी तिथि 


.. सिकंदर महान के पूर्व होनी चाहिए (ई. पू. ३३६-३२३) । सीदोत का च्याय._ 
.. अभी तक नहीं हुआ था (३:४) । इसलिए इसकी तिथि अतरक्षत्र तृतीय द्वारा... 
कु सीदोन के विनाश ( रद पृ 307 4 ) ले होनी चाहिये । यहुदा और यरू- हे । । ः 
.. शलेम बंधुआई में गये (३:१), परंतु कुछलौट आए और मंदिर का पुर्रतिमाण 
४०: किया गया हैं. (१११३-१४; ८२:१७) + किसी “राजा का उल्लेख नहीं हैं।। सा, 
......  याजक और पुरनिये लोगों के अगुवे हैं (१:२, १४; २:१७) । इस्ाएल शब्ह ० 
गा ः का प्रयोग यहूदा के लिए भी किया गया है 











दोनों एक ही माने गए हैं. 











३१० 0 कक, पुराना नियम की थक, 


(३:१-२) । यरूशलेम की शहरपनाह कदाचित बन चुकी हो (२:६), जो 
. कार्य ई.पू. ४४४ में नहेम्याह ,द्वारा पूरा किया गया था । विचार और शैली की 
. दृष्टि से भी निर्वासनोत्तर तिथि का संकेत होता है। ओबच्याह और मलाकी की 

पुस्तकों से उद्धरण इसमें आए हैं। इन तथ्यों के आधार पर इस पुस्तक की 
रचना तिथि लगभग ई. पृ. ४०० जान पड़ती 

नबी के संबंध में बहुत कम जानकारी मिलती है | केवल इतना ही पता 

. चलता है कि वह पतृएल का पुत्र था (१:१)। यह अज्ञात व्यक्ति है। नबी की 
. रचना से यह ज्ञात होता है कि उसका पूर्ववर्ती नबियों की रचनाओं से गहन 
परिचय था और कि वह स्वयं एक उच्चकोटि का कवि और लेखक था । 

. भू, दिडडियों का अर्थ लगाने की समस्या 


पुस्तक के पहले भाग में टिट्डियों का वर्णन है । क्या उनका यथाथ रूप से या 
प्रतीक रूप से अर्थ लगाया जाय ? शाब्दिक या अभिधार्थ ही स्वीकार किया जाता 
है। किसी भी क्ृषिप्रधात जाति के लिये टिड्डीदल एक भयंकर विपत्ति 
.. होती है, जैसे अन्य आपत्तियाँ भी होती हैं । अतः टिड्डीदल का आक्रमण स्वभा- 
बतया लेखक के मन में परमेश्वर की ओर से न्याय के साथ संबद्ध हो जाता है 





और वह अंतिम दिनों के विषय में बोल उठता है | योद्धाओं और घोड़ों के समान द 


.... टिड्डीदल का वर्णन बड़ा ही चित्रोपणम और ठीक है। लेखक ने अवश्य टिडडीदल 
.. देखा होगा । 
. «कुछ प्राचीन टीकाकारों ने टिड्डियों का प्रतीकार्थ लगाया है। टिड्डीदल 


.. मनुष्यों की सेना है। वास्तव में, छठवीं शताब्दी के एक यूनानी पाठ में २:२५ 
...  मेंटिड्डियों के सम्बन्ध में जो अनेक शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको आक्रमणकारी 
......  भिख्ियों, बाबुलियों, अश्शूरियों और यूनानियों के साथ संलग्न किया गया है । 
.. हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि यदि टिड्डियों की उपमा मनुष्यों से दी गई है, 
७ ौ[ह&-लो भी वे मनुष्य नहीं हो सकतीं। .. 


एक और मान्यता है । वह भी प्रतीकार्थ है । वह यह है कि पुस्तक के दूसरे ः 


2 क्‍ भाग के महान प्रकाशनात्मक उपसंहार में जो आक्रमणकारी सेनाओं का वर्णन सा 
४०० हैं, उनका संकेत टिडडियों से होता है । इसके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है. . गा 
.. कि योएल ने टिड्डियों का जो वर्णन किया है उसमें हमारी आँखों के सामने... 


...._ भोजन सामग्री के नष्ट होने का वर्णन है (१:१६) । इससे यह व्यंजित होता है... 


पा कि वे वास्तविक टिड्डियां थीं। 





रब य  ट होता है कि योएल ने जिस टिड्डीदल का वर्णन किया है... हा रा . 








रे पटटपमपपफिपननिसाासम सर सघन परम कमा वहन तक दैताच ०.० कशमारचा++ धमाल नमन दा०खहाजीह न सपा ५३०७३५०-+-+५०-००५५ 








या अप 5४ कप १ 


वह यथार्थ टिडडीदल था परन्तु उससे उसके मन में यहोवा के दिन का चित्र 


: प्रेरित हुआ और उसने उसका शब्दचित्न प्रस्तुत किया । 
६. ध्मशिक्षा 


योएल की पुस्तक से हम यह सीखते हैं कि परमेश्वर को मानवीय नियत्ति 
का नियंता स्वीकार करना चाहिये और इस रूप में ही उसके प्रति अपने सारे. 


जीवन में व्यवहार करना चाहिये । टिडडियों और अकाल जैसी विपत्तियों से हमें 


यह स्मरण कराया जाता है कि प्रभु का आना निकट है। वह न्याय अथवा आशिष 
लिये आने वाला है। विपत्तियां हमारे लिये अपने आप को जांचने और पछ३- 
चाताप करने का अवसर होती हैं । यदि उनके कारण हम परमेश्वर की ओर 
फिरें (२:१४) तो हमें यह अनुभव होगा कि परमेश्वर अनुग्रहकारी और दयालु 
है (२:१३) । परमेश्वर की ओर फिरने का इससे अच्छा उपाय नहीं है कि हम 
महासभा में उपवास करें और भवन में प्रार्थना करें (२:१५) । हमारे पापों के 
लिये उपवास और पश्चाताप दिखावे का नहीं बरन हृदय से होना चाहिये 
(२:१३) । 
परमेश्वर के चरम उद्देश्य में एक तथ्य यह है कि वह अपने लोगों पर अपना 
आत्मा उ डेलेगा (२:२८-२६) । यह परमेश्वर का सर्वेश्रेष्ठ दान है। यह भोजन _ 
और सुरक्षा से अच्छा है (२:२६), क्‍योंकि इसमें परमेश्वर अपने आप को अपने 
लोगों को देता आत्मा का दान सब प्राणियों के लिये है, वे चाहे युवा हों 


या वृद्ध चाहे स्वामी हों या दास। यह दान अंतिम दिनों की भयंकर बातों के 


सामने परमेश्वर के लोगों के लिये तैयारी में सहायक होगा (२:३०-३१) 


.. ब्रेरितों के काम २:१७-२१ में पतरस ने यह कहा कि योएल नबी की भविष्य- । 


वाणी पेन्तेकुस्त के दिन पुरी हुई । 


अपने विरोधियों की समस्त सेना को एक अंतिम युद्ध में पराजित कर पर". 
हर मेश्वर सब जातियों का न्याय करेगा। पृथ्वी की सारी जातियों गतिणय । 
की तराई में एकत्र होंगे (३:१४) जिसमें उनकी अंतिम तियति का निर्धारण 
.. होगा। परमेश्वर ने सिय्योत में अपने लोगों से जो वाचा बांधी थी उसे वह .. रे 3 
... अनन्त काल तक सच्ची ठहराएगा (३:१७) । वह अपने उद्धार पाए हुए लोगों. 
की बहुतायत से आशिष देगा (३:१८) और जो उसके शुभ अभिप्राय का विरोध. 
. करते हैं उनको वह दण्ड देगा (३६:१६-२१) हा, 
पा कभी-कभी योएल के संबंध में यह विचार किया जाता हैं कि उसकी राष्ट्री रा. । 
हा. 2 थे यता संकुचित है क्योंकि वह॒ परमेश्वर के अंतिम राज्य में अय हृदियों के एकत्र. 


रा. किये जाने का चित्र प्रस्तुत नहीं करता । हमें * हे यह स्मरण रखना चाहिये कि विभि: ५7: 
























रे डबरा का, | .. पुराना नियम की भूमिका. 


_नत नबी परमेश्वर की योजना के और सत्य के विभिन्न पक्षों पर बल देते हैं। 


..._ योएल नबी के लिये विचारणीय विषय यह नहीं था कि लोगों का सांस्कृतिक तथा 
.._ राष्ट्रीय समूहों से कैसा व्यवहार है, परंतु यह था कि परमेश्वर के ऐतिहासिक 
.. प्रकाशन के साथ लोगों का क्या और कीसा संबंध है । ईश्वरीय प्रकाशन का एक 


उचित परिणाम यह था कि इस्राएल के साथ परमेश्वर की वाचा सच्ची ठहराई 


. जाय, चाहे वह आत्मा के उडले जाने के द्वारा हो, चाहे जातियों के न्याय 


.. द्वारा हो । परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता, इसलिये आत्मा का उडेला 
.._ जाना सब प्राणियों के लिये है (२:२८) , और वे सब जो परमेश्वर से प्रार्थना 
करते हैं छुटकारा पाते हैं (२:३०) । जिस प्रकार यीशु खिस्त ते अपना सेवा कार्य 

.. इस्राएल की खोई हुई भेड़ों तक' सीमित रखा (मत्त.१५:२४) , उसी प्रकार 


योएल नबी ने भी अपना संदेश सीमित संदक्ष में ही दिया, परंतु जिस सत्य का _ 


उसने प्रचार किया उससे एक भिन्‍न संदर्भ में सावलौकिक क्रियान्वन का मार्ग 
खुल गया । आत्मा के उ डले जाने के संबंध में योएल की नबृवत पेन्तेकुस्त की 


सार्वलौकिकता में सच्चे और उचित रूप में पूर्ण हुई । न्याय के संबंध में वबी की _ 


शिक्षा भी मूलतः वही है जो नये नियम में पाई जाती है । 


























॥|। 
हो 
है| 








. कर्मेल की चोटी झलस जाएगी । यहोवा यों क 





उनचालोसवां अध्याय _ 
आमोस 


१. शीर्षक आप 

. इस पुस्तक का ताम आमोस नबी के नाम पर है जिसके दिव्य वचन और 
दर्शन इंस पुस्तक की विषय सामग्री में हैं। आमोस शब्द का अर्थ बाहुक' या 
'वहित' है अर्थात परमेश्वर का वाहक या परमेश्वर द्वारा बहन किया हुआ । 
इब्रानी बाइबल के अतिरिक समस्त प्राचीन बाइबलों में इसकी व्तेनी प्राय: एक 
सी है । इब्नानी में शब्द के उच्चारण में कुछ भिन्‍तता है। 
२. विषय सामग्री का सारांश 

चरवाहा नबी आमोस के दिव्यवचंन और दर्शन इस पृस्तक में हैं । इसका 


प्रमख विषय यह है कि परमेवर के प्रति इस्राएंल के विश्वासधात के कारण 
 इस्राएल पर दंड आसन्न है। विश्वासघात का रूप सामाजिक अच्याय और प्र- 

छएटाचार है, जो यारोबाम द्वितीय के राज्य में व्यापारिक समृद्धि के कारण बहुत 

बढ़ गया था । 


३. रूपरेखा... 
आमोस- परमेश्वर की ओर से नैतिक आचरण की मांग का नबी 


. (१) च्यायदंड पानेवालों की तालिका (१-२) | 
यहोवा सिय्योन से गरजेगा"“'चरवाहों की चराइयां विलाप करेंगी, और || 
, दमिएक के तीन क्या, वरन.... 


>>] 


चार अपराधों के कारण मैं उसका दंड न छोड़ गा क्योंकि उन्होंने गिलाद को 


पा लोहे के दांवनेवाले यंत्रों से रोंद डाला है । इसलिये मैं इस्राएल के राजभवन में... द पा रा 
“० ऑग लगाऊँगो (व न  । 
0 ०. इसी प्रकार के शब्दों, में: आसीस पलिश्तिं (१:६-८०), सोर (१:६-१०) ५ हे 2 यः 

7 ५ एदोम (१:११-१२), अम्मोन (१:१३०१४), मोआब (२:३३), अहुंदां ४... 
(२:४-५), और इस्राएल (२:६-१६) पर दंड की घोषणा करता है । मर 

















इवूड.... गे पुराना नियम की भूमिका 


है यहूदा का अपराध यह है कि उन्होंने यहोवा की व्याख्या को तुच्छ जाना । 
. इस्राएल का अपराध यह है कि उन्होंने निर्दोष को रुपये के लिये और दरिद् 
को एक जोड़ी जूतियों के लिये बेच डाला है--अत्याचार, अन्याय, दुराचार -- 
. “जिससे भेरे पवित्र नाम को अपवित्न ठहराएं' (२:६-८०) । यहोवा ने इस्राएल के 
. लिये इतना किया उसके बाद भी वे यह सब करते हैं (२:६-१२) । इसलिये 
. दंड अनिवार्य है (२:१३-१६) द 
(२) विनाश और विनय के दिव्य वचन (३-६) 
(कर) घबराहठ उत्पत्त करने वाले दिव्य बचन की प्रत्याशा क्‍यों न की 
जाय (३:१-०): परमेश्वर के सामने इस्राएल को विशिष्ट स्थान है 
अतएव दूसरों की अपेक्षा उसे अधिक कठोर दंड दिया जायगा ( ३:१- 
२)- पृथ्वी के सारे कुलों में से मैंने केवल तुम्हीं पर मन लगाया है 
इस कारण मैं तुम्हारे सारे अधम के कामों का दंड दूँगा ।' 
इस्राएल यह अपेक्षा करे कि यहोवा अपने नबियों के द्वारा अपने 
क्रोध की गरजना करेगा (३:३-८०)-सिंह गरजा; कौन न डरेगा ! 
परमेश्वर यहोवा बोला; कौन भविष्यवाणी न करेगा ? ' 
 (ख) सामरिया में धनवानों के गढ़ों पर दंड (३-६-१५): पड़ोसी जातियों 
... के लोग सामरिया पर एकत्रित होकर देखें कि उसमें क्या हीं अंधेर 
हो रहा है ! -अत्याचार, उपद्रव, हिसा और डकेती उनके भवनों 
में एकत्रित हैं। इसलिये यहोवा यों कहता है, 'जिस भांति चरवाहा 
सिंह के मूह से टांग वा कान का एक टकड़ा छड़ाता है, वैसे ही इस्रा- 
.. एली लोग, जो सामरिया में बिछोने के एक कोने या रेशमी गही 
... पर बैठा करते है वे भी छुड़ाए जाएँगे! (३:६-१२) । हि 
...... [दंड के दिन, बेतेल की वेदी के सींग कुछ न कर सकेंगे, क्योंकि _ 
... वे हूटठकर भूमि पर गिर पड़ेंगे (३:१३-१५)। 


(ग) विलासी स्त्रियों पर दंड (४:१-५) । 'हे बाशान की गायो, यह वचन 2 
_- सुनो, तुम जो सामरिया पर्वत पर हो, जो कंगालों पर अंधेर 





रा . करतीं और दरिदों को कुचल डालती हो, और अपने-अपने पति से क्‍ 


कहती हों कि ला, दे हम पीएं ।!४४ ०४ तुम कटियाओं से खींच ली 
... जाओगी - (४:१-३ ) ५ ै 


(घ) चितौनियों पर कुछ ध्यान नहीं दिया गया (४:६-१३) | अकाल, अ- 
नावृष्टि, वर्षा की अनिश्चितता, पौधों में कीड़े, टिड्डियां, मरी, युद्ध... 





.. और विनाश सब तु 

















कहता है तुम मेरी ओर न फिरे'। इसलिये हे इस्राएल, परमेश्वर के. 


सामने आने के लिये तयार रह''" देख, पहाड़ों का बनाने वाला” क्‍ 


पृथ्वी के ऊँचे स्थानों पर चलनेवाला, उसी का नाम सेनाओं का... 


परमेश्वर यहोवा है । 


विनाश का दंड आ ही रहा है-अब भी पश्चात्ताप करो (५:१-१७) 


इस्राएल की कुमारी के लिये विलाप के लिये तैयार हो जाओ। उस- 
का विनाश निकट है (५:१-३) । फिर भी 'यहोवा की खोज में रहो, 


तब जीवित रहोगे' “जो कचपचिया और मृगशिराकों बनाने... 


वाला है' “उसका नाम यहोवा है। वह तुरंत ही बलवंत का विनाश 


कर देता-अर्थात तुम्हारा विनाश-क्योंकि तुम कंगालों को लताड़ा 


करते और भेंट कहकर उनसे अन्न हर लेते हो ““* तुम धर्मी को 

सताते और घूस लेते: “बुराई को नहीं, भलाई को ढूंढ़ों, ताकि तुम 

जीवित रहो "बुराई से बैर और भलाई से प्रीति रखो, और फाट- 

क में न्‍्याय को स्थिर करो, क्‍या जाने सेनाओं का परमेश्वर यहोवा 
अनुग्रह करे! (५:४-१५) 


ब विलाप का समय आ गया है और 'सब सड़कों में लोग हाय-हाय 
करेगे ! (५:१६-१७ ) | 


(छ) यहोवा के दिन का अर्थ है विनाश (५:१८५-२७) : तुम्हारे लिये यहोवा . 


के दिन की प्रतीक्षा करना मुखता है, क्योंकि वह तो उजियाले का... 
नहीं, अंधियारे का दिन होगा ।' परमेश्वर तुमसे तनिक भी प्रसन्न... 
. नहीं। वह कहता है, "मैं तुम्हारे पर्वों से बैर रखता और तुम्हारी 
..महासभाओं से प्रसन्‍्त नहीं''परंतु न्याय को नदी की नाई कौर धर्म 
.... को महानद की नाईं बहने दो ।“तुम अपने राजा सक्‍कुथ को और 
... अपने तारा-देवता कैवान को, जिनकी मूर्तियाँ तुमने बनाई हैं उनको... 
.. लिए फिरते रहे; इस कारण मैं तुमकों दमिश्क के उस पार बंधचुआई “| 
. में कर दूँगा । न 
अधर्ममय विलास में रहने वालों का विनाश (६) : 'हाय उन पर सा 
जो सिय्योन में स्॒च से रहते और उन पर जो सामरिया के पर्वेत पर. 
निश्चित रहते हैं, जो अधर्ममय विलासी जीवन में सब जातियों से... 
बढ़चढ कर हैं, जो हाथीदांत के पलंगों पर लेटते'“'जो सारंगी के पा 


५ लए दर जि पक कल द डिश 235 “कल हि . हि 





7०75 ॥ आर, एसे, वी. अनुवाद 











3 श्व्रः ३ .. पुराना नियम की भूमिका 


... साथ गीत गाते'- जो कठोरों में दाखमधु पीते'*'परंतु युसुफ पर आने 
.. वाली विपत्ति का हाल सुनकर शोकित नहीं होते--इस कारण वे 
अब बंधुआई में पहले जाएंगे और घेरे जाने के संकट से आक्रांत 
होंगे (६:१-६१) । न्याय का अन्याय जो तुम करते हो वह बसा ही. 
.. अस्वाभाविक है जेसे घोड़ों का चट्टानों पर दौड़ना, और परमेश्वर 
... की ओर से आनेवाले दंड के सामने तुम्हारी गवंपूर्ण बिजय व्यर्थ है 
. . (६:१२-१४) । 
(३) पांच दर्शन (७: १-६ : ७) 

(क) टिडि्डियों का दर्शन (७:१-३) : जब टिड्डियाँ घास खा चुकीं तब 
... आमोस ने कहा, है परमेश्वर यहोवा, क्षमा कर! नहीं तो याकूब कैसे 
स्थिर रह सकेगा ? वह कितना निर्बल है ?”' यहोवा ने विपत्ति 

हटा ली । हा! क्‍ 
(ख) भस्म करने वाली आग (७:४-६) : जब आग सब कुछ भस्म कर 
रही थी तो आमोस ने फिर पहले के समान प्रार्थना की और यह 

विपत्ति भी हुठ गई। 


(ग) साहुल का दर्शन (७:७-६ ) : यहोवा ने कहा, देख, मैं अपनी प्रजा 
इस््राएल के बीच में साहुल लगाऊगा । मैं अब उनको न छोड़ गा । 
इसहाक के ऊँचे स्थान उजाड़ हो जाएँगे । 


बितेल में आमोस (७:१०-१७) : बेतेल के याजक अमस्थाह ने आमोस 


. -.. से कहा, हे दर्शी, यहाँ से निकलकर यहूदा देश में भाग जा और “वहीं भविष्य- 
._.. वाणी किया कर ।आमोस ने उत्तर दिया, मैं न तो भविष्यवक्ता था, न॑ 


.. भविष्यवक्ता का बेटा, मैं तो चरवाहा था'* और यहोवा ने मुझे बुलाकर कहा 
.. जा भेरी प्रजा इस्राएल से भविष्यवाणी कर ।' उसने अजर्याह के विरुद्ध भी 


रा । भविष्यवाणी की ।] 








| (घ) धृुपकाल के फलों से भरी हुई टोकरी का दर्शन (८५:१-३ ) : यहोवा 





ने कहा, मेरी प्रजा इस्राएल का अंत आ गया है; मैं अब उसको... 


और न छोड़ गा”''राजमंदिर के गीत हाहाकार में बदल जाएँगे । 


...... (अधर्मी इस्राएल जाति का विनाश (८:४-१४) : उन लोगों के लिए... ह 
- ..... यहोवा का दिन भयानक दिन होगा जो “दरिद्रों को निगलते, और नम्न लोगों 


हे .._ को नाश करते हैं'““जो एपा को छोटा और शेकेल को भारी कर देते हैं. और रा. ५ 
.... छल से दण्डी मारते हैं।”““लोग यहोवा के वचन की खोज में समुद्र से समुद्र ८ 








तक और उत्तर से पूरब तक मारेमारे फिरेंगे, परंतु उसको न पाएंगे ।) 














कि आज अल अभी न न अल म पका अंशिलक 


जया मर किसमससपक सा पससा ५ पपनेमाम पल 


“न कसा 22० सम उमरदेत जनता 2 सत4न2 5५ + समता थ जल चला सनक पडरलक>++--+ - < १. < शाप + नस छस+5 २3७ +5ता2हसक5ह़५न७-ल रु. बे 32: शीट है कर ट हे जज से उप प २८५५२ 





आमोस _ 62 जप न 


(च) वेदी के ध्वंस का दर्शन (६:१-८) : आमौस ने यहोवा को वेदी के. ला 


ऊपर खड़ा देखा और उसने आमोस से कहा, 'खंभे की कंगनियों पर 


मार जिसने डेवढ़ियाँ हिलें, और उनके सब लोगों के सिरों पर गिरा-... 
कर टुकड़े-टुकड़े करें" उनमें से एक भी न भाग निकलेगा"“'चाहे वे... 


_ खोदकर अधोलोक में उतर जाएँ, चाहे वे आकाश पर चढ़ जाएँ ।'.. 


सेनाओं के परमेश्वर यहोवा के स्पर्श करने से पृथ्वी पिघलती है-- 


उसी का नाम परमेश्वर है (६:१-६) ; वही सारी जातियों-कशी, _ 
पलिशती, आरामी या इस्राएल-को दी गई आशिषों के लिये 


उनसे लेखा चाहता है, और अपराधी जातियों को दण्ड देगा 


द (६:७-८) | 
(४) उपसंहार 
परमेश्वर के लोगों का अंतिम उद्धार (६:६-१५) : 'इस्राएल का घराना 


सब जातियों में ऐसा चाला जाएगा ज॑ंसा अन्त चलनी में चाला जाता है।""'"* स 


समय मैं दाऊद की गिरी हुई भोंपड़ी को खड़ी करूँगा" और जंसा वह प्राचीन- 


काल में थी, उसको वैसा ही बना दूंगा" देखो, ऐसे दिन आते हैं, जब हल जोतने..... 


वाला लवनेवाले को मिला लेगा'''मैं अपनी प्रजा इस्राएल के बंधुओं को फेर 
लाऊँगा"“'मैं उन्हें उन्हीं की भरमि में बोऊँगा और वे फिर कभी उखाड़े न 


. जाएँगे। 
४. संरचना, रचयिता, रचना-तिथि 


...._ इस पुस्तक की संरचना में कहीं-कहीं असंगतियाँ हैं जिससे यह संकेत होता... 
.. है कि इसके संचरण के संबंध में कुछ साहित्यिक इतिहास अवश्य है। हमें यह... 
. ज्ञात होता है कि ७:१०-१७ में जों जीवनी-संबंधी अंश है और 5ः४-१४ में . 
जो इस्राएल के विनाश संबंधी अंश है, वे दर्शनों की सूची में क्रम भंग जैसे हैं। 
साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि ८ः:४-१४ में अध्याय १-६ की कुछ 
शब्दावली की पुनरावृत्ति हुई है (दे. ६:८ और ८५:७; 5५:१० और ५१६० 

. १७) । इसके आधार पर यह विचार किया जाता है कि अध्याय ८५ में आमोस 

.. के वचतों की जो मौखिक परंपरा है वह अध्याय १-६ के वचनों की मौखिक 

.. परंपरा से भिन्‍न मानी जानी चाहिए । संभव है कि ६:९-४ के लिए एक 
. तीसरी ही मौखिक परंपरा हो। इस अंश में सीधा दिव्य वचन नहीं है वरन 
वह किसी दर्शन से सम्बद्धहै।.. आम पक 
.... इसके अतिरिक्त आमोस की पुस्तक का आरंभ भी विचित्र ढंग से होता... 
... है: 'आमोस के वचन,.......जो उसने देखा' | अपेक्षा तोयह की जाती है कि. 











| इक... ौदूराला नियम की भूमिका 


या तो यह कहा जाए कि वचन जो उसने सुना, अथवा यह कहा जाए कि 


“दर्शन जो उसने देखा' । इस विचित्र आरम्भ का एक स्पष्टीकरण तो यह दिया 


है जाता है कि दो विभिन्‍न परम्पराओं के शीर्षकों को इसमें मिला दिया है--एक 
. जो वचनों की परम्परा थी और दूसरी जो दर्शनों की परम्परा थी। इसके _ 


.._ आधार पर यह कहना संभव है कि आमोस के संदेश, जो उसके श्रोताओं की 


स्मति में थे, दो या तीन विभिन्‍त इकाइयों में लिखे गए । कुछ काल पश्चात ये 


.. विभिन्‍न इकाइयाँ एक पुस्तक के आकार में मिला दी गई । 


.. ६:११ से इस पुस्तक के साहित्यिक इतिहास में एक और चरंण का संकेत 
होता है । उस पद में दाऊद की गिरी हुई झोंपड़ी को फिर खड़ा करने की 


: प्रतिज्ञा है। इससे प्रतीत होता है कि यरूशलेम का ध्वंस और बंधुवाई की 


घटनाएँ बीत च॒की हैं। यदि यह ठीक है तो यह अंश यरूशलेम के ध्वंस (ई 


... पु. ४८६) के समय लिखा गया होगा । ऐसा प्रतीत होता है. कि जब भक्तों ने 
.... देखा कि आमोस का आराधनाओं में पाठ होता है, तो उन्होंने इस पद को 


..._ जोड़ दिया होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे हम 'प्रशंसा गान! (5078 ४४) 


.. को भजन-पाठ के अंत में जोड़ देते हैं। जिस व्यक्ति ने उसे जोड़ा उसे हम. 
_... संपादक या संशोधक कह सकते हैं, परंतु हमें यह मानना पड़ेगा कि वह भक्तों 
. में प्रचलित प्रथा को व्यक्त कर रहा था। जिस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने 


.... उस चरवाहे नवी के माध्यम से कार्य किया था जिसके वचनों पर विश्वासी 
..... लोग आस्था रखते थे, उसी प्रकार परमेश्वर का आत्मा इन भक्तों के माध्यम 
... - से भी कार्य कर रहा था । 


तिथि का विचार कीजिए । आमोस '्कम्प के दो वर्ष पहले नबवत करने 


.... लगा था (१:१; दे. ६:१; जक. १४:५ ै। दुर्भाग्य से हमारे पास इस भूकम्प 
_... के संबंध में कोई ठीक जानकारी नहीं है । फिर भी जिस. काले में आमोस ने 
... नबूवत की उसके संबंध में शंका नहीं है। उसने यारोबाम द्वितीय के राजकाल 


.... (६. पू., ७घ६-७४६) में नबूवत की, जिसका यहूदा का राजा उज्जियाह 


ः ः . समकालीन था (१:१) । यारोबाम के प्रारम्भिक वर्ष अराम के राजा के साथ 
. युद्ध में बीते । आमोस के वचन सुरक्षा की स्थिति में समृद्धि के समय कहे गए। 


..... अतः यह माना जाता है कि आमोस की नबूवत का समय यारोबाम के राज- 


" ! रा । काल के मध्य का समय अर्थात लगभग ई. पृ. ७६० होगा । 
....._ ४५. आसमोस की जीवनो संबंधी टिप्पणियाँ... 


.. आमोस तकोई नगर का चरवाहा था। यह नगर यहूदा के पठार के... ः 
गरेथा। - मर लगा हुआ था । यरूशलेम से छः मील हा ...... 








आमोस... जो 5 कर ३१६ फ 


दक्षिण में अथवा बेतलेहेम से दो मील दक्षिण में (१:१; ७:१४) था। आमोस 
के संबंध में चरवाहे के लिये एक विशेष शब्द नोकेद (]४०तुए्ट्त) का प्रयोग 
किया गया है। उसका ग्रर्थ वह चरवाहा है जो छोटे-छोटे पैरों क्री विशेष जाति... 
की भेड़ों को चराता था । ये भेड़ें ऊन के लिये बहुत अच्छी मानी जाती थीं 

आमोस को 'गूलर के वृक्षों को छांटनेहारा' भी कहा गया है (७:१४) | ये 










_ वृक्ष नीची भ्रूमि प्रदेश में होते थे । फल को चीरा दिया जाता था कि उनके 


कीड़े निकल जाएँ। मैंदानों में जब वहु जाता होगा तो उसने कई बार कारबाँ 
. और सेनाओं को आते-जाते देखा होगा और विस्तृत संसार की गतिविधियों के ._ 
संबंध में उसे जानकारी मिलती होगी । पठार पर अपने घर लौटने पर वह इन 

सब बातों पर विचार करता होगा । द 


. आमोस किसी भी नबी-समृह का सदस्य नहीं था (७:१४) ॥ परन्तु उसने 
नबूबत के लिये चरवाहे का काम केवल इसलिये छोड़ा कि परमेश्वर की ओर 
से उसे अदम्य बुलाहुट मिली (७:१५; ३:८) । अमस्याह ने यह सूचना दो 


. कि दिश उसके सब बचनों को सह नहीं सकता' (७:१०) । इससे यह प्रतीत 





होता है कि आमोस समस्त इस्राएल देश में सब स्थानों में जाता था। विशेष: 
. रूप से वह सामरिया, गिलगाल और बेतेल को जाता था (४:१, ४) | बेतेल में 

अमस्याह याजक ने उसे बाहर निकलवाने का प्रयत्न किया । वह सफल हुआ. 
अथवा नहीं, इसके सम्बन्ध में हमें जानकारी नहीं मिलती । रथ 


६. धर्म शिक्षा 
आमोस प्रधानतया सामाजिक न्याय और धर्माचरण का नबी था। उसके 


























. संदेश का सारांश ५:२४ में है। उसने बताया कि यहोवा इस्राएल की उपासना कल 
: पे घृणा करता है--'मैं तुम्हारे पर्वों से बैर रखता और उन्हें तिकम्मा जानता 
हैँ' (५:२१) । तब वह बताता है कि परमेश्वर क्या चाहता है : न्याय को... ला 
नदी की नाई और धर्म को महानद की नाई बहने दो' (४:२४) । व्यापार ० हज 
. की बढ़ती के द्वारा पैसा और संपत्ति में वृद्धि होती है। उससे उत्पन्न अनाचार | 
.._ के लिए आमोस इखस्राएली लोगों की निन्‍दा करता है। कंगालों के प्रति अन्याय, । | 
ध दूसरों की अभावग्रस्त स्थिति से अनुचित लाभ उठाता और अधिक लाभ ओर 2० 
.. विलास के हेतु सामान्य मानवीय सिद्धान्तों को तिलांजलि देना (२:४०-८ 2 
.._ इनके लिये वह लोगों की निन्‍दा करता है। यारोबाम द्वितीय के समृद्धिशाली |. 
.. युग में व्यापारी वर्ग में इन बुराइयों के प्रति आमोस जैसे व्यक्ति का ध्यात 

.... विशेषरूप से आकंषित हुआ जो च रवाहों और ऋषकों की परम्पराओं बता. जम 







































ए करता था। उस सीधेसाधे 





रे ३२०... पुराना नियम की भूमिका 





















.._ समाज में चरित्र की दृढ़ता, भातृत्व की भावना, और निष्ठा की अनन्यता को 
..... . श्रेष्ठ माना जाता था । परन्तु केवल चरवाहा होने से ही आमोस इस बात के 
.... लिए प्रेरित नहीं हुआ कि इस्राएल में सामाजिक बुराइयों के प्रति आवाज 
....  उठाए। उसने यह अनुभव किया कि अन्याय, भातृत्व भावना का अभाव और 
.. . .  अनैतिक आचरण वाचा के नियमों के प्रति विश्वासघात है, और परमेश्वर के 
.... सामने घृणित काम है । सीधे-सादे पशुचारण समाज में वाचा का प्रकाशन हुआ 
.... था । परन्तु उसका प्रकाशन परमेश्वर की ओर से हुआ था। इसलिए वह 
... यारोबाम द्वितीय के जटिल विस्तृत समाज के लिये भी उतना ही सत्य है जितना 
..._ सादे चारण समाज के लिये | धनी और विलासी व्यापारी वर्ग का उदय मूलतः 
_अ्रजातांबिक गोत्न-भावना पर कठोर आघात था। साथ ही वह इस बात में 
धर्म त्याग भी था कि वाचा में छोटे भाई को परमेश्वर ने जो महत्व और मूल्य 
प्रदान किया था वह इस व्यापारी व्यवस्था ने हटा दिया था । परमेश्वर के 
लिए यह स्थिति इतनी घृणित बन गई थी कि यदि तुरन्त ही पश्चात्ताप का 
 आश्चय न ग्रहण किया गया, तो इस स्थिति के सुघार का एकमांत्र उपाय त्वरित 
- दंड या आसन्न विनाश था। इस प्रकार आमोस 'दंड' का नबी था, इसलिए नहीं 
कि स्वभाव से वह निराशावादी था, परंतु इसलिए कि अपने समकालीन अन्य 
_ लोगों की अपेक्षा सत्य के प्रति उसकी अधिक पैनी दृष्टि थी। उसके सम- 
कालीन लोग आथिक और भौतिक मूल्यों के भंवर में अधिकाधिक फँसते जा 
. रहे थे और धर्म को भी अपनी स्वार्थ सिद्धि का साधन बना रहे थे। आमीस 
की दृष्टि इन मूल्यों से परे वाचा के मूल्य पर थी। 


... आससन्न विनाश के मूल संदेश के प्रवाह में आमोस ने अन्य बड़े महत्व के 
सिद्धांतों की भी अभिव्यक्ति की। उनमें से एक यह था कि विशेष अधिकार 
के साथ विशेष कतंव्य भी जुड़े हुए हैं । परमेश्वर ने इस्राएल को चना । इसका 
यह अथ नहीं, जसा साधारणतया लोग मानते थे, कि प्रभु के दिन में उन्हें 
पक्षपातपूर्ण विशेष पद प्रदान किया जाएगा। इसके विपरीत उसका यह अर्थ _ 
है कि उनसे उच्चकोटि के धरोहर-भाव और कर्म की अपेक्षा की जाएगी और 
उनका और अधिक कठोर न्याय होगा (३:२; ५:१८-२०) । जिसको अधिक 

या गया है उससे अधिक का लेखा लिया जाएयगा। | || 


आमोस ने एक और बड़ी शिक्षा यह दी कि इस्राएल का निर्वाचन इस ३ 


इस 





का प्रतीक हूँ कि परमेश्वर समस्त जातियों से इसी रीति का व्यवहार. 
का उसने अन्य जातियों--पतलिश्ती और अरामी आदि (६:७) 
| को बुलाया कि वे विभिन्न रीति से परमेश्वर के शभ अकिप्राय को तो रा... 

















आंमोग 70 5 पल इर१ 7 


इस्राएल पर न्याय-दंड का आना अनिवार्य है--इस संदेश का प्रचार करते 
हुए आमोस परमेश्वर की अतुलनीय महान सामथ्यं का भी वर्णन करता है। 
परमेश्वर महान सृष्टिकर्ता है । उसने पहाड़ों और नक्षत्रों को बताया (४:१३, 
५:८) । वह समस्त प्राकृतिक शक्तियों पर प्रभुता करता है. (६:५-६) द 
मानव राष्ट्रों की गतिविधियों पर भी शासन करता है और अपनी इच्छानुसार 
राष्ठों और जातियों को सामने लाता है (६:७) और अपने सनातन धममय 
स्वरूप तथा अभिष्राय के अनुरूप उनको आशिष अथवा दंड देता है। परमेश्वर 
ही प्रकृति एवं इतिहास में सच्चा परमेश्वर है, इसीलिए उसका विरोध करने 
से विनाश अनिवार्य है। यदि इस स्थिति में कोई बचाव है तो वह उसकी 
करुणा की क्रियाशीलता में ही है । 























. चालीसवां अध्याय 

ओबच्याह 

१, शीर्षक द 
इस पुस्तक का नाम नबी ओबचद्याह के नाम पर है। इब्रानी में ओबद्याह 


. नाम है जिसका अर्थ याह (यहोवा) का दास सेपत्वागिता में अबद्यस है 
और वुलगाता में लगभग अबदियास है। 


२. विषय सामग्री का सारांश द 
क्‍ यह पुस्तक पुराना नियम की पुस्तकों में सबसे छोटी है। इसमें एदोम 
.. की हिंसा, भ्रातृत्वहीनता पर ईश्वरीय न्याय दंड की नबृबत है। साथ ही 
.._ यहोवा की पूर्ण सामर्थ्य के दिन में सिय्योन के उद्धार का वचन है । 


३, रूपरेखा 
ओबद्याह--भ्रातृत्वहीनता की भत्संना करने वाला नबी । 
.. (१) एदोम पर दंड (१: १-१४) क्‍ 
........ (क) एदोम नीचा किया जायगा (१: १-४) यहोवा की ओर से 
.... यह समाचार है, “है पहाड़ों की दरारों में बसने वाले” 
.. तेरे अभिमान ने तुझे धोखा दिया है'““'चाहे तू उकाब की नाई 
.. ऊंचा उड़ता हो, वरन्‌ तारागण के बीच अपना घोंसला बनाए हो, 
05577: “तो भी मैं तुझे वहाँसे तीचे गिराऊंगा। ८. रद 
.. (ख) एदोम का पूर्ण विनाश होगा (१: ५-८) : जितनी हानि चोर 
...... नहीं करते और दाखलता उड़ाजनेवाले नहीं करते उससे अधिक 
..... . हानि एदोम की होगी। एदोम में से बुद्धिमान और तेमान के 
.. ...  / श्रवीर नष्ट किए जाएँगे । रा 
...... (ग) एदोम के विरुद्ध यह अधभियोग है कि उसमें भ्रातृत्वहीनता है... 
377. (१:१०-१४) ८ उस :उपद्व के कारंण जो तूने अपने भाई 
याकूब पर किया सेढंपेगा . * 'जिस दिन परदेशी लोग 











2 2 करे शटरेल्नतारसमरक23नानन्मुलक-5>ा५४०+८२ जप ३8 सील ३+८ सम + भोले पथ कप कम, टन प + जप 222 8 80628 2 8 मय 2 22% कहर चल 








ओबद्याह _ हक क्‍ बा बल ३ 


उसकी धन संपत्ति छीन कर ले गए, और बिराने लोगों ने उसके... 5 


7टकों में घुसकर यरूशलेम पर चिट्ठी डाली, उस दिन तभी 


होने के दिन तू उनके ऊपर आनंद करता' । 
(२) यहोवा का दिन (१: १५-२१) मा 
(क) सार्वलौकिक न्याय (१: १५-१६) : 'सारी जातियों पर यहोवा 


के दिन का आना निकट है। जैसा तूने किया है, वैसा ही तुझ से 
भी किया जाएगा । 


(ख) याकूब और सिय्योन की पुनर्स्थापना (१: १७-२१) : 'सिय्योन _ 
पर्वत पर बचे हुए लोग रहेंगे, और वह पवित्न स्थान ठहरेगा; और 
याकूब का घराना अपने निज भागों का अधिकारी होगा' * * 
और राज्य यहोवा का हो जाएगा' । 
४, संरचना, रचथयिता, तिथि 


इस पुस्तक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एकरस है और विचारों की _ 


. शूंखला बँधी हुई है। इससे पुस्तक की अखंडता प्रमाणित होती है। 
. परंतु यह भी प्रतीत होता है कि १-६ पदों में एदोम संबंधी कोई. पुराना 

दिव्य वचन इसमें सम्मिलित है। इन पदों का यिमंयाहु ४ & : छउ-र२२ 
.. के साथ बहुत अधिक साम्य है। इन दोनों के बीच क्या संबंध है, यह... 
..._ एक समस्या है | यह विचार किया जाता है कि ओबद्याह और यिर्मयाहु दोनों 
.. ने एदोम के विरुद्ध की गई किसी नबवत का स्वतन्त्र रूप से उपयोग किया। . 

..... अस्तर केवल इतना है कि यिर्मयाह ने उस नबूबत का प्रयोग यरूशलेम के... 
.. विनाश के पूर्व किया (यि. ४६ : १२), और ओबद्याह ने उसके पश्चात्‌... 
.._ (पद ५) । ओबद्याह और योएल के बीच भी साम्य है जैसे ओबद्याह १:१७ | 
और योएल २ : ३२ में । ओबद्याह योएल से पहले की रचना है । | 
.. वह पुराना और रूपांतरित दिव्य वचन जो इसमें सम्मिलित है निर्वालस 
..पू्व का है, अन्यथा यिमंयाहु उसका उपयोग न कर पाता । परंतु ओब्््याह 
.. और उसकी पृस्तक की तिथि निर्वासनोत्तर है | ऐतिहासिक प्रसंग से ही इसकी... 
.. लगभग तिथि निर्धारित की जा सकती है। बाइबल में उल्लिखित स्थान... 
मम ॥ एजेन-गेबेर में जो खुदाई हुई है, उससे यह पता चलता है कि लगभग ई० पु० न द हे 
....... ६०० तक उस नगर का हाकिम एक एदोमी व्यक्ति था । परंतु ई० पूृ० पाँचचीं . 
...॑. सदी में वह अरबी लोगों के अधिकार में था । ई० पू० छठ्वीं सदी के अन्त में. 
5 बा अथवा ई० पू० पाँचवीं सदी के आरंभ में एदोमी का 






निष्कासन हुआ 








३९४ .... पुराना नियम की भूमिका 


विचार किया जाता है कि इस घटना का ओबचद्याह के ७ वें पद में संकेत 
हुआ है और यह घटना अतीत में हुई। जब अरबों द्वारा एदोमियों को अपने 
ही क्षेत्र से निकाल दिया गया तो एदोमी दक्षिणी यहूदियों में आ गए । जहाँ 
वे बसे, उस क्षेत्र को उन्होंने इद्मिया नाम दिया । ई० पू० दूसरी सदी में वे 
. यहदियों में मिल गए । ८5-१० पदों में भावी न्याय संबंधी जो नबूवत ओबद्याह 
ने की वह इस मिल जाने के पहले और अरबों द्वारा विस्थापित किए जाने के 
बाद की होगी। साथ ही, यदि योएल ने ओबद्याह से सामग्री ली तो ओबद्याह 
की तिथि योएल से पहले होनी चाहिए । इन तथ्यों के आधार पर ओबच्याह 
की तिथि ई० पू० ४५० मानी जाती है । का 

५, धर्म शिक्षा 

ओबचद्याह की पुस्तक में दो प्रमुख शिक्षाएँ मिलती हैं : म्रातृत्वहीनता के 

पाप की भयंकरता, और परमेश्वर के धर्ममय न्याय की तथा अच्त में परमेश्वर 
के राज्य की अनिवारयंता । द 
है दोम भ्रातृत्वहीनता का भारी उदाहरण है । एदोम और इस्राएल दोनों 

का ही गोते-भावना के प्राचीन आद्शों में पोषण हुआ। अतः एदोम से यह 
. अपेक्षा की जाती है कि इस्राएल की ओर भ्रातृभावना रखे, विशेषकर उस 
.. समय जब इस्राएल विपत्तिग्रस्त था और उसके शत्रु उसे नष्ठ कर रहे थे। 
.. इसके विपरीत एदोम अपने भाई के विनाश से आनंदित हुआ, उसकी धन 
. संपत्ति को ले लिया, और दूसरों का मानों साथ देकर भाई की दु्दशा को 


..... और कठिन बना दिया । मूल सदाचार की भावनाओं को इस प्रकार ठोकर _ 
.... मारते के प्रति परमेश्वर उदासीन नहीं रह सकता। अतः: जितना जघन्य 
... अपराध, उसके मान से ही यहोवा की ओर से दंड । 


यहोवा का दिन निकट है। तब सारी जातियों का न्याय होगा, और 


.... सबको उनके कर्म के अनुसार प्रतिफल दिया जाएगा (पद १५) । उस न्याय में 
.. यहोवा सिय्योन में, जो अब मुक्त और पवित्न किया जा चुका है (पद १७), 
......_ अपने साकार ऐतिहासिक प्रकाशन को प्रमाणित करेगा, तथा एदोम जैसे शत्रुओं 
... का विनाश करेगा । अन्त में राज्य यहोवा ही का हो जाएगा' (पद २१) | 























32225 4७ "2 मद ६805 0, :+ 





इकतालोसवां अ्रध्याय 
योता 
१. शीर्षक 
न्यू छोटे नबरियों की पस्तकों के समान इस पस्तक का नाम नहीं रखा 


गया है। अन्य पुस्तकें लेखकों के नाम पर हैं। योना की पुस्तक लेखक के 
नहीं, वरन कथा के नायक के आधार पर है। इब्नानी में 'योना' शीर्षक है 


जिसका अथ्थ कपोत  है। सप्तति अनवाद और वह्गाता दोनों में इओनस है । 


हिन्दी में इब्रानी के आधार पर योना है । 


२. विषय सामग्री का सारांश 27 
इस पस्तक में यह बताया जाता है कि नीनवे के अविश्वासी लोगों के 


प्रति परमेश्वर की कृपा भावना योना नबी के लिये असह्य है । उसे आज्ञा दी .. 


गई कि वह उनके पास जाकर उनको पश्चाताप का संदेश दे । इस कार्य में. 


उसने आज्ञालंघन, अरुचि, निरानंद और मुह फूलाना प्रदर्शित किया। ये सब 
. बातें परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध हैं, क्योंकि परमेश्वर सब पापियों का... -- 
.._. उद्धार चाहता है, फिर चाहे वे उसकी निर्वाचित जाति में से हों अथवा 
.. विधर्मियों से । 
.. ३. रूपरेखा 


योना--विधर्मियों से प्रेम रखने के लिये चुनौती 
(१) योना अपनी बुलाहद से भाग जाता है (१) जा 
यहोवा योना को आज्ञा देता है कि वह नीनवे को जाए और वहाँके 


लोगों की बुराई के विरुद्ध प्रचार करे। विधियों के उद्धार में योना की रुचि. 
. नहीं। इसलिये वह यापो नगर जाकर तर्शीश के जहाज पर चढ़ जाता है।.| 
. (यह नगर नीनवे की विपरीत दिशा में बहुत )। परमेश्वर ने एक । 
..... प्रचंड आंधी चलाई । जहाज के लोग नष्ट होने पर थे । मल्लाह लाग अपने ० 
:... देवताओं की दोहाई देते हैं। परंतु योना सोता है। वे चिट्टियां डालते हैं तो... 4 
पता चलता है कि योता के परमेश्वर के क्रोध के कारण यह आँधी आई, तो वे _ 








गा इ्एइ: ...... प्राना नियम की भूमिका 


. श्रद्धा और डर से भर गए और योना से सम्मति चाही । उसकी सम्मति पर 
.. वेयोना को समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्र को लहर शांत हाँ ग ई। एक 
.._ मगरमच्छ योवा को निगल लेता है, जिसे परमेश्वर ने ठहराया था। 


(२) मगरमच्छ के पेट में योता का भजन (२) 


.... “मैंने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उसने मेरी सुन ली । 

 अधोलोक के उदर में से मैं चिल्ला उठा, और तूने मेरी सुत ली'”“''“'तेरी 
भड़काई हुई सब तरंग और लहरें मेरे ऊपर से बह गई'”"'“सेरे सिर में 
सिवार लिपटा हुआ था, मैं पहाड़ों की जड़ तक पहुँच गया था “मेरी 
प्राथंना तेरे बरन तेरे मंदिर में पहुँच गई'''““परंतु मैं ऊंचे शब्द से धन्यवाद 
करके तुझे बलिदान चढ़ाऊंगा; जो मन्नत मैंने मानी, उसको पूरी करूंगा । 
उद्धार यहोवा ही से तो होता है! । मगरमच्छ ने योना को स्थल पर उगल 
 दिया। 


(३) अनिच्छा से काम करने वाले नबी का सफल कार्य (३) 
. मगरमच्छ के उदर में विनम्र किए जाने के अनुशासन के पश्चात्‌ योना 


पा ॥ हे द यहोवा का वचन मानता है, और नीनवे को लोगों को दंड का संवाद सुनालता 
.... है। उसकी आशा के विपरीत नीनवे के सब लोगों ने, राजा से लेकर छोटे से 


छोटे मनुष्य ते पश्चात्ताप किया और परमेश्वर ने उत पर दया की और अपनी _ 


:-““ 5 इच्छा बंदल दी । 


(४) परमेश्वर योतरा के मन-परिवतंन का प्रयास करता है (४) 
योना को यह बात बुरी लगी कि नीनवे का नाश नहीं होगा। उसने 


हे ... परमेश्वर से परिवाद किया कि वह अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्वर है, 
..... विलंब से कोप करने वाला करुणानिधान है। योना परमेश्वर से प्रार्थना करता... 
... है कि नीनवे का विनाश नहीं हुआ तो वह उसका प्राण ले ले । अतः वह एक... 
.... छप्पर के नीचे मुह फुलाकर बैठा हुआ यह देखने लगा कि नगर का विनाश 
.. होता है या नहीं पा द ३ 


यहोवा रेंड़ का एक पेड़ उगाकर बढ़ाता है | योनां उसकी छाया के कारण 


... बहुत आनंदित हुआ । रात्रि को परमेश्वर ने एक कीड़ा भेजा जिसने रेंड का _ 
... पेड़ काटा जिससे वह सूख गया। जब सूर्य उदय हुआ, तब परमेद्वर ने लू. 





का . चलाई । योता कोधित हुआ और परमेश्वर से मृत्यु मांगी । परमेश्वर ने योता « जप 2 

















हे 
| 

शक 
का 


अिल्जानक फल किफल आल सन सकन तक 5 नल ;ननरलल इलकहनस+- ९८“ पृकन+ 4" 





बीस हजार से अधिक मनुष्य हैं, जो अपने दाहिने बायें हाथों का भेद नहीं ॒ 


हिचानते, और बहुत घरेल पश॒ भी उसमें रहते हैं, तो क्‍या मैं उन पर तरस 


न खाऊ' ?' परमेश्वर ने नीनवे के लोगों में अपने सृष्टिमूलक प्रेम को व्यक्त... 
_ किया और क्या वह उनके उद्धार की चिता कर उन पर दया न करेगा ? कम 
से कम पशुओं पर तो दया करने दो । का 


४. संरचना, रचयिता, तिथि 


(१) इसमें शंका नहीं है कि योना नाम पुस्तक में एक पूर्ण कथा प्रस्तुत 
। अत: वह एक अखंड और एक ही लेखक की रचना है। फिर भी यह | 
न्याय संगत जान पड़ता है कि यह प्रश्न उपस्थित किया जाए कि २ : २-६ में 
जो भजन है, वह मूल कथा का भाग है अथवा नहीं ? यदि इस अंश को. 
निकाल भी दिया जाए तो कथा की धारा में कोई बाधा नहीं होती। कथा 
का रूप इस प्रकार होगा : योना उस मगरमच्छ के पेट में तीन दित और 
तीन रात पडा रहा। तब यहोवा ने मगरमच्छ को आज्ञा दी, और उसने. 
योता को स्थल पर उगल दिया (१:१७; २: १०) । इसके अतिरिक्त, यदि 
हम भजन का उसके संदर्भ से पृथक करके अध्ययन करें, तो ऐसा अनुमान 


किया जा सकता है कि वह मंदिर में धन्यवाद का भजन है, और भजन उस द 


अवसर का है जब मृत्यु (अधोलोक के उदर, २:२), या विशेषकर डूबने से 


. बचाया गया है। तरंगों और लहरों का उल्लेख (२: ३) रूपकात्मक भी हो 


सकता है जैसे भजन ४२ : ७ में है। इस भजन में मगरमच्छ का संकेत कहीं 


...._ नहीं है। यह बिलकुल संभव जान पड़ता है कि लेखक ने गद्य में अपनी कथा जा 

..._ लिखी, परंतु जब लोग रुचि लेने लगे, तो उसने अपने श्रोताओं की रुचि को... 

.. तीब्र करने के लिए एक परिचित भजन का उपयोग किया जो बड़ी विनम्रता 
और परमेश्वर से सहायता के भावों से ओतप्रीत था । द रा ह 

... (२) रचयिता--रचयिता अज्ञात है। पुस्तक में योतरा नबी के दिव्य । 

वचन नहीं है परंतु योना की कथा है। केवल ३ : ४ में हीयोना के संदेश के... 


शब्द प्रस्तुत हैं : अब से चालीस दिन बीतने पर नीनबे उलट दिया जाएगा 


(३) तिथि-अमित्तै का पुत्र योना (ररा. १४ ; २५) यारोबाम ह्ितीय | 
राज्य (ई. पू. ७८६-७४६) में नबी था। परंतु वहां इस बात का कोई संकेत... 
.. नहीं है कि उसके विषय में पुस्तक कब लिखी गई । तिथिका निर्धारण पुस्तक... 
... को शब्दावली और भाषा शैली से तथा उस ऐतिहासिक प्रसंग परविचार 
.. करने से हो सकता है जो इसके संदेश से संगत जान पड़े । इसकी भाषा पर 
..... अरामी भाषा का प्रभाव जान पड़ता है जिससे यह 









संकेत होता है कि यह निर्वा- ० 








हे शरद. आर पुराना नियम की भूमिका 


_सनोत्तर है। स्वयं का परमेश्वर शब्द भी निर्वासनोत्तर है। पुस्तक का 


.._ संदेश उस समय के उपयुक्‍त जान पड़ता है जब यह जोखिम उपस्थित थी कि 


... यहूदी यह समझें कि परमेश्वर की चिता केवल उन्हीं तक सीमित है और कि 
अन्य जाति के लोग उसकी करुणा की परिधि से बाहर हैं। एज्ा के सुधारों के 
. पश्चात का काल इस परिस्थिति के अनुरूप जान पड़ता है। इसकी तिथि 
सीरख (ई, पू. १८० ) से बहुत पहले होना चाहिये, क्योंकि उसमें योना की 
पुस्तक धर्मशास्त्र के अंतर्गत स्वीकार की गई है (सी. ४६ : १०) । इन तथ्यों 
के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि योत्रा की पुस्तक ई. पू. ४०० 
से २०० के बीच लिखी गई और साधारणतया लगभग ई. पू. ३०० में लिखी ग 


५. व्याख्या या निर्वेचन ( [760[97208 00] ) 
योता की पुस्तक की व्याख्या दो विशेष रूप में की जाती है : ऐतिहासिक 
और द्वेष्टांतिक । ऐतिहासिक व्याख्या में यह माना जाता है कि इस कथा का 
. प्रधान पात्र, अमित्तै का पृत्न, योता एक ऐतिहासिक व्यक्ति है (२ रा० १४: 
. २५), इसलिए इस सारी कथा को एक सत्य आलेखन मानना चाहिए। यह 
. भी मान लिया जाता है कि यीशु खिसत ने इस नबी को अपनी मृत्यु एवं 
. पुनरुत्थान का पूर्व-प्रतीक माता (मत्त ० १२: ३६-४१), इसलिए हमें योता _ 
के मगरमच्छ के उदर में तीन दिन रहने को, तथा कथा के अन्य चमत्कारिक 


.. अंशों को शब्दशः सत्य स्वीकार करना चाहिए । 


द्रष्टांतिक व्याख्या में यह माना जाता है कि लेखक एक दष्टांत या रूपक 


...... इस अभिप्राय से बता रहा है कि अपने श्रोताओं को वह एक धर्म-सत्य के .. 
...... संबंध में निश्चय कराये। अमित्ते के पुत्र योना जैसे ऐतिहासिक व्यक्ति का उपयोग 
..... वह अपने दृष्टांत के प्रारम्भ . करने के हेतु करता है, जैसे शेक्सपियर अपने... 
........ नाटक के लिए मेकबैथ के ताम का उपयोग करता है, अथवा जयशंकर प्रसाद 
... अपने नाठक के लिए स्कंदगुप्त के नाम का उपयोग करता है। यीश्‌ खिस्त ने 
.. जैसे अच्छे सामरी'” के दृष्टांत का प्रयोग यह सिखाने के लिए किया कि अपने 





: पड़ोसी से प्रेम करने का क्या अर्थ है, उसी प्रकार लेखक ने योना के दृष्टांत 


..... का उपयोग यह सिखाने के लिए किया कि लोग विधर्भियों के प्रति अपनी 
..... भावना में सुधार करें। मम लक री आई 
.. व्याख्या की समस्या पर विचार करने के लिये, हमें यह स्मरण रखना... .- 





रा ... चाहिए कि बाइबल के किसी भी अंश की प्रेरणा से उसके लेखक के मंतव्य का । पा 


लेखक घटनाओं और उतके अभिप्राय का ५ हा 2 का 
कार्य के मान से हम परमेश्वर के 














वचन को समभते हैं। जब लेखक प्रार्थना, स्तुति अथवा धन्यवाद में अपने 
मनोभावों को व्यक्त करता जैसे भजनों में, तो हम लेखक के अभिप्राय के मान से. 


परमेश्वर के वचन को समभते हैं, और हम लेखक को अपनी कला में काब्यालं- 


कारों की स्वतंत्रता देते हैं। जहाँ कोई धामिक ग्रंथ लेखक दष्टांत देता है, तो 


हम दृष्टांत के उद्देश्य के मान से परमेश्वर के वचन को समभते हैं, और यह अपेक्षा... 
नहीं करते कि दृष्टांत इतिहास की घटना के अनुरूप हो । इसलिए योना की पुस्तक. 
के संबंध में मुख्य प्रश्न यह है कि इसके लिखने में लेखक का अभिप्राय क्या है? 


अन्य अधिकांश लेखकों के समान इस लेखक ने भी अपना अभिप्राय स्पष्ट नहीं 
किया, और यह इसलिये कि किसी भी प्रबुद्ध श्रोतासमूह के लिए अशिप्राय का 
स्पष्टीकरण आवश्यक नहीं है। जिन लोगों ने इस कथा को पहले पहल सुना, 
उनके लिये लेखक का अभिप्राय समभने में कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि लेखक _ 
और श्रोता दोनों ही विचारों और जीवनचर्या के समनिष्ठ प्रसंग से परिचित 
थे। आगे आनेवाली पीढ़ियों का वातावरण बदल गया, और इसलिए लेखक के 
 अभिष्राय को समभने के लिये उन्हें मूल प्रसंग की पृतकेल्पना करनी पड़ी । 


अतएव पस्तक की प्रेरणा की समस्या से पृथक हमें इस प्रश्न पर विचार करता क्‍ 
.. चाहिये कि मूल प्रसंग में लेखक का अभिप्राय क्या था 


मारा विचार यह है कि लेखक का अभिप्राय इतिहास की घटना का 
वर्णन नहीं, वरन दृष्टाँत कथन था। जो इतिहास-अध्ययन की पद्धतियों से 


परिचित हैं, कम से कम उनके लिये इस कथा को इतिहास मानला बड़ा कठिन... 
है। यह माना कि परमेश्वर ने कई बार इस प्रकार से कार्य किया है, जिसमें. 
कृति के नियमों से स्वतंत्रता दिखाई देती है और जिन्हें हम चमत्कार कहते ... 


हैं, परंतु योना की पुस्तक में जो चमत्कार हैं, वे बाइवल में अद्वितीय हैं। 


चमत्कारिक कार्यों में प्रचंह आधी का ठीक समय, इतने बड़े मगरमच्छ को... 
तैयार करना कि मनुष्य निगल लिया जाए, मगरमच्छ को ठीक स्थान पर... 
आना, उसकी पाचन शक्तियों का स्थगित होना, तीन दिन तक श्वास घोंद देने ह 
वाले स्थान में सचेत रहना, ठीक स्थान पर ठीक समय पर योना का उगला . 
जाना, उसका कुछ न बिगड़ना, नीनवे का पूर्ण पश्चाताप (जो पुरातत्व की 
खोज से मेल नहीं खाता), रेंड् के वृक्ष का रात भर में बढ़ जाना और फिर 

निर्धारित कीट द्वारा रात भर में सूख जाना | यह मानते हैं कि परमेश्वर यहू 
सब कुछ अक्षरशः कर सकता है, क्योंकि उसकी सामर्थ किसी प्रकार भी - हा 


..._ सीमित नहीं है। परंतु चमत्कारों की यह माला प्रकृति में परमेश्वर के कार्यों... . ] 


से अथवा इस्राएल के प्रति उसके प्रकाशन संबंधी कार्यों से तनी भिन्न है कि 
को ह्‌ मे इस तथ्य में शंका कर सकते हैं कि इस कथा का यह अभिप्राय था कि वह 























मा .. पुराना नियम की भूमिका क्‍ 


अक्ष रशः सच मानी जाए । बाइबल की यह विशेषता है कि चमत्कारों के प्रयोग 

में परमेश्वर एक संयत मितव्ययता काम में लाता है। यह यीश के सेवा कार्य 

... से स्पष्ट हो जाता है। यदि योना की कथा को अक्षरश: सत्य माना जाए, तो 
.. हमारे समक्ष चमत्कारों या आश्चर्य कर्मों का अपव्यय समझा जाएगा । 


योना के मछली के पेट में तीन दिन रहने का चिन्ह यीशु खिस्त ने कबर 
. में अपने रहने के लिये दिया था। परंतु इससे भी हम इस बात को स्वीकार 
करने के लिये बाध्य तहीं होते कि मछली के पेट में रहने का कथन अक्षरश: 
सत्य है। यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थात अपने में ही वास्तविक घटनाएं हैं । 
वे इस बात पर निर्भर नहीं हैं कि उनका भविष्य कथन करने में यीश्‌ ने सत्य 
घटता या दृष्टान्त का प्रयोग किया । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि 
जब यीशू ने योना का उल्लेख किया तो उसकी मृत्यु और पुनरुत्थात की 
. घटनाओं की ऐतिहासिकता विचाराधीन नहीं थी। प्रभु के विचार में योना 
की कथा मानव-पुत्न के संबंध में परमेश्वर की योजना को व्यक्तत करने के लिये 
एक चिन्ह या उदाहरण मात्र थी (मत्त. १२: ३९६) । साथ ही प्रभू के विचार 


.. में वह कथा परमेश्वर की ओर से जीवित वचन की उपेक्षा की गंभीरता के 
..... विषय उसकी पीढ़ी को चेतावनी भी थी (मत्त. १२: ४१-४२; लू. ११ 
... २९-३२) 
का संभव है कि योना के संबंध में कोई परंपरा रही हो जिससे इस पुस्तक 
-.. की द्रैष्टांतिक कथा के लिये एक मोटा आधार मिला हो । यह पूर्णतः संभव 
... है कि योना नीनवे को प्रचार हेतु गया, जैसे आमोस ने पड़ोसी जातियों के 
.. विरुद्ध दिव्य वचन कहे, और इससे पूर्व एलीशा का दमिश्क की गतिविधि में 
.... हाथ रहा । यह भी संभव है कि कोई बड़ी मरणांतक दुर्घटना से बच जाने पर . 
.... योता नीनवे को गया । फिर भी पुस्तक में जिस रूप में कथा दी गयी 
.... तो जितती इतिहास नहीं उतनी दृष्टांत लगती है, विशेषकर इसलिये कि वह 
..... एक विशिष्ट सत्य को प्रमाणित करने की ओर उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है-- 
.... वह सत्य है अन्य जातियों की ओर परमेश्वर की करुण।। वास्तव में यह... 
पर पुस्तक शुभ संदेश प्रचार की याचिका (.9]८& ) 





यह कथा रूपकात्मक (2॥८४०7८७।) है और द्रैष्टांतिक भी। अर्थात द 


। ४ स्‍् इसकी शिक्षा केवल एक ही मुख्य विचार में नहीं, परंतु प्रतीकों द्वारा अनेक... 
5 विचारों में प्रतिपादित है। योना परमेश्वर के उन लोगों का प्रतीक है. जो 





४ « उसके युग में संकुचित भावना रखते थे साथ ही उनके हृदय में वह आशा भी ० ५ बा रा 


पूर्णतः प्रकट हुई। योना के समान इसराएल को... | 
की बलाहठट दी गई। इससे पूर्व कि हा .... 














योता ./  -. ० | 


इलाएल पृण आज्ञापालन सीखे, उसे अन्य जातियों ने निगल लिया और इस 


प्रकार वह विनम्र किया गया (दे० यि० ५१: ३४ ) | संकट की अवस्था में . 
वह परमेश्वर की ओर फिरा । कालान्‍्तर में वह निर्वासन के पश्चात्‌ अपने... 

. देश को लौठा और अपने देश में पुनः संजीव किया गया । यद्यपि कुछ अंश में | 
इस्राएल ने आज्ञापालन सीख लिया, फिर भी उसे परमेश्वर के असीम प्रेम एवं... 


करुणा के संबंध में और भी सीखना था, और वह यह कि उस प्रेम की परिधि 
में अन्य जातियां भी हैं। इसी ढांचे में आदर्श इस्राएल, यीश खीस्त का 
पूर्वाभास योना में है। यीशु खिस्त समस्त जातियों की सच्ची ज्योति है और 
वह निष्पाप होते हुए भी, तीन दिन तक कबर में पूर्ण दीन हुआ । इसी दीनता 
के द्वारा उसने उद्धार-कार्य पूरा किया जिसके पश्चात नये प्रतिज्ञा-देश, अनुग्रह 
के युग अर्थात पुनरुत्थान की स्थापना हुई । 


६. धर्म शिक्षा 


पुस्तक की व्याख्या का विवेचन करते इस पृस्तक की धर्मशिक्षा प्रस्तुत . 
की जा चुकी है | यहाँ पर उसका सारांश देना पर्याप्त होगा । 


(१) इस पुस्तक की प्रमुख शिक्षा यह है कि हमें परमेश्वर के प्रेम को 
. केबल विश्वासी लोगों तक ही सीमित नहीं करना चाहिए । लेखक के युग में 
यहुदी लोग विश्वासियों का समाज थे, आज हमारे युग में खिस्तीय कलीसिया 
विश्वासियों का समाज है। परमेश्वर के प्रेम की परिधि इनसे आगे है । 


. प्रमेश्वर सब मनुष्यों का उद्धार चाहता है, और यह उसकी इच्छा है कि हम... 
_ भी इस चाह में सम्भागी रहें । उसकी यह इच्छा नहीं है कि जैसे योता अपनी... 
ईश्वरीय बुलाहट के क्रियान्वन में संकुचित था, वेसे ही हम भी अपनी बुलाहहड...|| 

.. के क्रियान्वन में संकुचित रहें । इस कथा से इस संकुचित भावना की क्षुद्रता . 








और व्यथ्थता प्रतिपादित होती है 


(२) सारी जातियों तक उद्धार का संदेश पहुँचाने के कार्य को संपन्न... 
करने के लिये परमेश्वर के पास एक पद्धति है। वह यह है कि वह दीन बनाने... 


के द्वारा अपने लोगों को आज्ञाकारी बनाए। इसी पद्धति से वह अपने दासों 


को इस योग्य बनाता है कि वे संसार तक जीवित वचन के वाहक हों | यहुदी 
लोग इसी प्रकार उनकी बंधुआई में दीन किए गए । योता के निगले जाने से 
.. इस तथ्य की ओर संकेत है | यही बात मानव-पुत्र के संबंध में सत्य है, जिसने... 
... .  निष्कलंक होते हुए भी अपने को दीन किया और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा . . . 

। ः कि क्रस की मृत्यु भी सह ली, और कबर में निगले जाने तक की दीनता 


7रा उसने समस्त संसार के उद्धार का कार्य पूरा किया । 

































यह नाम कदाचित्‌ 
। इब्रानी में मीकायाह का 
दे० मीक० ७: १८; नि० 
सदा ही छोटे नबियों के अन्तर्गत मानी जाती रही 
और अंग्रेजी बाइबलों में छोटे नबियों में इसे छठवाँ स्थान 
परन्तु सेपत्वागिता में इसे तीसरा स्थान है। सेपत्वागिता में 
कायास है ओर बल्गाता में मीकेअस है। 








म् पस्तक में इस्राएल और यह॒दा के विशेषकर यरूशलेम के. 
धो के विषय विविध नबूबतें हैं। साथ ही सत्य धर्मगत नैतिक आचरण 


रने को अग्रसर है (१: १-६) : है जाति-जाति के 
है पृथ्वी, “देख यहोवा अपने पवित्र स्थान से बाहर न 
हाड़ उसके नीचे गल जायेंगे, जैसे मोम आग की आँच का 


महू सब योकूब के अपराध के कारण'०याकब ० 


टुकड़े-टकडे की जाएंगी'"'इस रा ० 
मैं लुटा हुआ सा और नंगा फिरा . 












। करूंगा”''क्योंकि उसका घाव असाध्य है; और विपत्ति यरूशलेम के ही 

फाटक तक पहुंच गई हैं (१: ५-६) हम 

(ख) नीची भूमि अदेश में भय की सूचना (१:१०-१६) : 'गत नगर में... 
इसकी चर्चा मत करो, और मत रोओ; '“बेतआप्रा में धूलि में लोटपोट... 


करो; है शापीर की रहने वाली, नंगी होकर निरलेज्ज चली जा '”'लाकीश 
की रहने वाली अपने रथों में वेग से चलने वाले घोड़े जोत ; “तू गत . 
के मोरेशेत को दान देकर दूर कर देगा'“'वे बंधुओ होकर तेरे पास से 
. चले गये हैं । 
(ग) दुराचार, जिससे प्रभु क्रोधित होता है (२: १-११) : "हाय उन पर, 
.. जो बराइयों की कल्पना करते हैं--वे घरों का लालच करते और उन्हें 
छीन लेते हैं'“वे किसी पुरुष और उसके दायभाग पर अंधेर करते हैं... 
का मेरी प्रजा शत्रु बनकर मेरे विरुद्ध उठी है; तुम शांत राहियों के तन पर 
आम से चादर छीन लेते हो “मेरी प्रजा की स्त्रियों को"''तुम निकाल देते. 
के जा हो और उनके नन्‍हें बच्चों से तुम मेरी दी हुई उत्तम वस्तुएं सवंदा के 
लिये छीन लेते हो' 


(घ) फिर भी यहोवा उन्हें प्रतिज्ञा देता है (२: १२-१३) : मैं इस्राएल के 

बचे हुओं को इकट्ठा करूंगा; बोख्रा की भेड़ बकरियों की नाई एक संग 

..._ रखंगा" “उनका राजा उनके आगे आगे चलेगा, यहोवा उनका सरदार । 

... और अगुवा है है; 

द (२) प्रधानों को संबोधन (३) है । 

_(क) स्याय का अन्याय होता है (३: १-४) : है याकूब के प्रधानो सुनो" «| 

क्या न्याय का भेद जानना तुम्हारा काम नहीं ? तुम तो भलाई से... 

_ बैर, और बराई से प्रीति रखते हो, मानो तुम लोगों पर से उनकी खाल |. 
घेड़ लेते हो । 07 707, क्‍ 

_(ख) नबी झूठे हो गए हैं (३: ५-5) : यहोवा का यह वचन है किजो 

_ भ्विष्यवक्ता मेरी प्रजा को भटका देते हैं, और जब उन्हें खाने को . 

.. मिलता है तब “शांति-शांति” पुकारते हैं'“'दर्शी लज्जित होंगे और भावी... 
.. कहलाने वालों के मुह काले होंगे “परंतु मैं तो यहोवा के आत्मा से... 

. शवित, न्याय और पराक्रम पाकर परिपूर्ण हूँ कि मैं याकूब को उसका .. रा, 
....... . अपराध और इस्राएल को उसका पाप जता सक्‌ बा 
... (ग) बुराई के संबंध में एक निश्चितता की भावना है (३:६-१२): 

..... यरूशलेम के 'प्रधान घस ले लेकर विचार करते हैं, और याजक दाम से _ 








रा हर 


पुराना नियम की भूमिका 


लेकर व्यवस्था देते हैं, भविष्यवक्ता रुपये के लिये भावी कहते हैं, तो भी 


..... वे यह कहकर यहोवा पर भरोसा रखते हैं, “यहोवा हमारे बीच में है 
.. इसलिये कोई विपत्ति हम पर न आएगी ।” इसलिये तुम्हारे कारण 
 सिथ्योन जोतकर खेत बनाया जाएगा | 


25. (को) 


(४) यहोवा का वादविवाद (६) 0 दा हा 
मैंने ॥ई की है (६: २-५) । यहोवा का अपनी प्रजा 2 दा 
मैं नेतेरा क्या किया? औरक्या....... 


(३) भविष्य के लिये परमेश्वर की योजना (४-५) 


शांति का राज्य (४१-८० ) : अंत के दिनों में ऐसा होगा""'बहुत 
जातियों के लोग आएंगे और कहेंगे, आओ हम यहोवा के पर्वत पर 
चढ़कर, याकूब के परमेश्वर के भवन में जाएं; तब वह हमको अपने 

गे सिखाएगा, और हम उसके पथों पर चलेंगे'"क्योंकि यहोवा की 
व्यवस्था सिय्योत से निकलेगी"'''वे अपनी तलवारें पीटकर हल के फाल 
और अपने भालों से हंसिया बनाएंगे“ और लोग आगे को युद्धविद्या न 


सीखेंगे''''मैं प्रजा के लंगड़ों को मैं बचा रखू गा""“और यहोवा उन पर 


सिय्योन पवत के ऊपर से सदा राज्य करता रहेगा 


_.. (ख) शांति के राज्य के पहले पीड़ा आना अनिवाय है (४४६-१३) : है. 
..... सिय्योन की बेटी, जच्चा स्त्री की नाई पीड़ा उठा”“तू बाबुल तक 


जाएगी"''वहीं तू छुड़ाई जाएगी"''बहुत सी जातियां तेरे विरुद्ध इकट्‌ठी 
होंगी” वे यहोवा की कल्पनाएं नहीं जानते, व उसकी यूक्ति समभते हैं. 


दाऊद वंशी शासक (५ : १-६) : है बेतलेहेम-ए प्राता, यद्धपि तू ऐसा 

. छोटा है कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता, तोभी तु में से मेरे 
.. लिए एक पुरुष निकलेगा जो इस्राएलियों में प्रभूता करने वाला होगा 
“और वह यहोवा की शक्ति से अपने झूड की चरवाही करेगा 

. अश्श्री हमारे देश पर चढ़ाई करें""'तब हम उनके विरुद्ध सात चरवाहे 

. बरन आठ प्रधान मनुष्य खड़े करेंगे" वही पुरुष हमको उनसे बचाएगा ।? 


) जो कुछ प्रलोभन का कारण है, वह सब नष्ट होगा (५:१०-१५) : 

... यहोवा की वाणी है, उस समय मैं तेरे बीच में नाश करूंगा; और तेरे रथों 

.... का विनाश कडछूगा। मैं तेरे देश के नगरों को भी नाश कहूंगा'*'तैरे तंत्र- 

..._ मंत्र नाश करूंगा “तेरी खुदी हुई मुरतें और तेरी लाठें तेरे बीच में से नाश ० 
... कहूंगा। “तेरी अशेरा नाम मूरतों को तेरी भूमि में से उखाड़ डालूँगा ।/|.. 























 मीका हू हे पा मम ५ 


. करके मैंने तुझे उकता दिया है ? मेरे विरुद्ध साक्षी दे । मैं तो तुझे मिस्र. 
देश से निकाल ले आया, और दासत्व के घर में से तुझे छूडा लाया; और... 


. तैरी अगुवाई करने को मूसा, हारूत और मरियम को भेज दिया 
(ख) मैं जो तुक से चाहता हूं वह स्पष्ट और न्याय संगत (६: ६-८) 


में क्‍या लेकर यहोवा के सन्‍्मुख आऊं ? “है मनष्य वह तुमे बता चुका... 


कि अच्छा कया है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, 


कि तू न्याय से काम करे, और क्रपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर 
के साथ सम्रता से चले” ? द 


(ग) फिर भी तुमने बुराई की इच्छा की (६: ६-१६) : 'क्या अब तक दुष्ट 
के घर में दृष्टता से पाया हुआ धन और छोटा एपा घणित नहीं है ? 
क्या मैं कपट का तराजू और घटबढ़ के बटखरों की थैली लेकर पवित्न 


ठहर सकता हूँ ? “वे ओम्री की विधियों पर और अहाब के घराने के 
सब कामों पर चलते हैं । 


(५) नबी की मनोव्यथा और आश्वासन (७) 


(क) उसकी मनोव्यथा (७: १-६) : हाय मुझे पर । क्योंकि मैं उस जन के द 
.. समान हो गया है जो धृूपकाल के फल तोड़ने पर हो जाए'"भक्त लोग 
पृथ्वी पर से नाश हो गए हैं"”'मित्र पर विश्वास न करो “ क्‍योंकि पत्न 


पिता का अपमान करता, और बेटी माता के विरुद्ध उठती है'''मनुष्य के... 


शत्रु उसके घर के लोग होते हैं । 


._ (ख) उसकी सांत्वना (७: ७-२०) : मैं यहोवा की ओर ताकता रहूँगा।, मैं... 

... अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर की बाद जोहता रहेगा वा मेरे लिये 
. ज्योति का काम देगा तू लाठी लिए हुए अपनी प्रजा की चरवाही हर 
.._ कर, अर्थात्‌ अपने निज भाग की भेड़-बकरियों की “वे पूर्वकाल की नाई... 
.. बाशान और गिलाद में चरा करें ।”“तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहाँ है... 


जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुए के अपराध 


को ढांप दे ?”''तू उनके सब पापों को गहरे समुद्र में डाल देगा | तू दा ०. 
... याकूब के विषय में सच्चाई और इब्राहीम के विषय में अपनी करुणा पूरी । 


करेगा ०३ 
४. संरचना, रचयिता, तिथि 


(१) तिथि--१ : १ का प्रारंभिक कथन एक सम्पादकीय टिप्पणीसा 
..... लगता है। उससे पता चलता है कि मीका का नबूवत कार्य योताम (ई०पू० 
...... ७४२-७३५), आहाज (६. पृ. ७३५-७१५) और हिजकिय्याह (ई. पू. ७५१५-६५७) 














ह ३३६ गा मर द पुराना नियम की भूमिका 


.. राजाओं के राज्यकाल में हुआ । यिर्मयाह नबी की पुस्तक में भी यह उल्लेख 
.. है कि मीका ने हिजकिय्याह राजा के दिनों में भविष्यवाणी की और कहा कि 
सिय्योन खेत के सदश जोता जाएगा (यि० २६ : १८-१६; मी० ३: १२)। 
... मीका के दिव्य बचनों की पृष्ठभूमि अश्शूरी आक्रमण था (५: ५; १: 
. ८-१६) | हिजकिय्याह के राज्य में दो अश्श्री आक्रमण हुए । पहला शलम- 


.._ नेस्सर चतुर्थ के शासन में हुआ । सारगोन ने उसे चालू रखा । परिणामस्वरूप 


ई० पृ० ७२१ में सामरिया का पतन हुआ । दूसरा ई० पू० ७०१ में सन्हेरीब 


. के शासन में हुआ | उस समय यरूशलेम पराजित हो जाता। परन्तु यशायाह 


की घोषणानुसार परमेश्वर की सामर्थ से वह विपत्ति टल गई (२ रा० १६ : 
२०, २१, ३५) । हिंजकिय्याहु का सीधा सम्बंध दूसरे आक्रमण से ही है । 
अतः कुछ विद्वानों का विचार है कि जब यिमंयाहु के समकालीन लोगों ने 
. भीका की वाणो का उल्लेख किया तो उन्तका संकेत इस दसरे आक्रमण की 
. ओर होगा । इस संभावना को अधिक महत्त्व दिया जाता है कि यि्याह में 
.. जो कथन है बह मीका की पुस्तक में सम्पादकीय टिप्पणी की अपेक्षा अधिक 


........ ठीक जाना पड़ता है। यदि हम इस मान्यता को स्वीकार करें तो मीका के 
..... नवृवत काये का समय ई० पू० ७१५ से ७०० तक होगा । 





अधिक मान्य मत यह है कि मीका को प्रथम अश्श्री आक्रमण से संबंदध 


.... किया जाता है और उसके नबूवत-कार्य का समय सामरिया के पतन के पूर्व... 
.. रखाजाता है। मीका १: ६ के साधारण अनुवाद में यह निहित है, मैं सामरिया 
..... को मैदान के खेत का ढेर कर दू गा ।' इस संदर्भ में मीका का समय ई० पू० 

.... ७२४ से ७१५ माना जाता है और पुस्तक की विषय-सामग्नी से इसकी पुष्टि की 
।...... जाती है। यदि मीका ने योताम और आहाज के राजकाल में भी नबूबत की 
..... (१: १) तो उसके दिव्यवचनों का या तो अभिलेख त हुआ या फिर अभिलेख 
... सुरक्षित न रहा मे 


(२) संरचना और रचयिता--पुस्तक की संरचना के संबंध में बहुत मत- 


....... भेद है, विशेषकर इस संबंध में कि कितना अंश मीका का है और कितना 

.....  परवर्ती कलाकारों का। बाबुल में बंधुवाई (४: १०) की भविष्यवाणी 

......... थि्मयाह के काल से अधिक संगत होगी, उससे एक सदी पहले के काल से नहीं 
... जिस समय अश्श्र के आक्रमण का भय था । १: २-४ के प्रारंभिक पंद भवि 


ला : प्य-आशा संबंधी है अतः कुछ विद्वानों के विचार में वे निर्वासनोत्तर हैं। मसी- 


...... हसम्मत युग की भविष्यवाणियों के संबंध में भी यही सच प्रतीत होता है 


(४: १-६; ७: ७-२० ) । कुछ 











विद्वानों की मान्यता है कियिमंयाहके 
वैहण१&) मीका के संदेख की... 




















तरस सीमा है। अतः १-३ अध्याय ही केवल मीका के माने जाते हैं। 
उस्तक की संरचना की समस्या का इस बात से घतिष्ट संबंध है कि 


_ निव्सिन पूर्व नबियों द्वारा आशा के संदेश संबंधी प्रचार की मावना के विषय ला 
में हमारी क्या धारणा है । टेम यह मानें कि उन्होंने केवल दंड का ही प्रचार _ 


किया, तो समस्त आशा-गर्भित अंश निर्वासनोत्तर संपादकों के माने जाएंगे |. 
हमारा विचार है कि होशे के संदेश से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है 
कि यद्यपि निर्वासन - पूर्व लबियों के प्रचार में प्रधान भाव दंड का था, तथापि 
उनमें आशा की भावना भी विद्यमान थी । राजतंत्रकाल में राजत्व के स्वरूप 


. के विषय उत्तरोत्तर बढ़ते हुए ज्ञान से यह व्यंजित होता है कि निर्वासनपूर्व काल 


में मसीह विषयक आशा की संकल्पना का ठोस आधार बन चुका था। अत: 
हमें इस परंपरागत मान्यता को अश्वीकार करने के लिये पर्याप्त प्रमाण नहीं 
मिलते कि मीका की पुस्तक में मूलत: मीका का संदेश ही प्रस्तुत है । केवल 
इतना ही माना जा सकता है कि वावुल संबंधी उल्लेख परवर्ती काल के संशोधन 


में सम्मिलित किए गए | 


मीका ४ : १-४ के यशायाह २ : २-४ के साथ संबंध की समस्या अभी 


तक हल नहीं हो पाई है। यह संभव नहीं कि एक ने दूसरे से उद्धरण किया 


हो। हमारे समक्ष दो विकल्प हैं: या तो हम यह मानें कि दोनों पुस्तकों में 

परवर्ती काल में यह अंश जोड़ दिया गया, अथवा यह कि मीका और यशायाह 

दोनों ने किसी प्रचलित दिव्यवचन का प्रयोग किया 0 

५ जीवनी संबंधी टिप्पणी आल । 
मीका की जीवनी संबंधी हमें केवल इतनी ही जानकारी मिलती है कि 

भीका मरेशाह नामक स्थान का है। उसकी दूसरी वर्तनी मोरेशेत या मोराशत है द 

(मी. १:१, १४, १५; यि. २६:१०) । माना जाता है कि बतंमान ग्राम मरि- 


स्सा वही स्थान है । वह उस भौगोलिक भाग में है जिसे शेपेलाह या निचली... 


भूमि कहते हैं, जो यहूदा के पठार और पलिश्ती के मैदान के मध्य में है। व 
अधर्षकालीन समय में यह अराजक भूमि कहलाती थी और दोनों ओस्से 


# ३ 


इस पर आक्रमण हो सकता था । यहां सेनाओं ; की गतिविधि और आक्रमण _ 


की जोखिम से मीका का तिजी परिचय संभव था। 
६ धर्म शिक्षा ४ द 


. मीका की पुस्तक की प्रमुख शिक्षाएं निम्नानुसार हैं; 


६१) परमेश्वर सामान्य मनुष्य के अधिकारों की रक्षा करता है। मीका ._ पं , 
गरीबों या सामान्य मनुष्य का नवी कहलाता है वह स्वयं मारेशह वागात 


..._ के मोरेशेत नामक निचली पूमि के गांव से वा । वहाँ का जीवन सादा किसानी, 














५ आ यह 5 हा हम | पुराना नियम की भूमिका 


भेडबकरी चराने, और द्राक्षपालन (गात का अर्थ है दाख रस निकालने का 
स्थान) का जीवन था । यरूशलेम की संपन्नता तथा व्यापार वृद्धि का जीवन 


... तबी को गांव के जीवन से बहुत भिन्न लगता होगा । मीका को धनवानों की 
... बुराइयाँ बहुत स्पष्ट दिखाई देती थीं (उदा. २: १ ३: १०३; १० 
... -११)। प्रधानों और नेताओं के स्थानों में भ्रष्टाचार ने अड्डा जमा रखा 


था (३: १०-११) । यह सारा पाप और अपराध उसके लिये दो राजनगरों 


है में अर्थात यरूशलेम और सामरिया में, केन्द्रीभमत था । मीका ने छोटे किसानों 


के खेत छीनकर बड़ी-बड़ी भूसंपत्ति बनाने की प्रवृत्ति की निंदा की (२: १- 
२) | उसने व्यापारी वर्ग की धन लिप्सा की (२:०८), व्यापार के भ्रष्ट 
_ व्यवहारों की (६: १--१२) निन्‍दा की । उसने न्‍्यायाधीशों के घूस लेकर 
ऐसे घणित कार्यों को दृष्टि-ओट करने के लिये उनकी निन्‍दा की (३:११) । 


(२) परमेश्वर हमसे सीधे और न्यायसंगत काम चाहता है, और ऐसे काम 


.... जो हमारे भी भले के लिए हैं। मीका इस बात के लिए सुप्रसिद्ध है कि उसने 
का नैतिक व्यवस्था का एक महानतम सारांश प्रस्तुत किया है। परमेश्वर केवल 
.... होमबलि से, अथवा हमारे अपराध के प्रायश्चित्त में केवल हमारे पहिलौठों से 
... वा हमारे पाप के बदले अपने पत्न-पत्रियों की बलि से प्रसन्न नहीं होता | है 





| : मनुष्य, वह तुझे बता चुका हैं कि अच्छा क्या है ; और यहोवा तुझ से इसे छोड़... । 


... और क्या चाहता है कि तू च्याय से काम करे, और कपा से प्रीति रखे, और अपने 
:... परमेश्वर के साथ नम्नता से चले! ? (६:४८) | परमेश्वर के प्रति हमारी कर्तव्य 


भावना बही है जो यीशु के वचन में है, “मेरा जूआ अपने ऊपर लो “क्योंकि 


.._._._ भेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है” (मत्त ११: २६-३०) 


३) अपने लोगों के लिए परमेश्वर की जो योजना है उसमें छोटी 


..... नगरी बेतलेहेम से मसीह का निकलना भी सम्मिलित है। भविष्य में शांति 
... के राज्य का जो चित्र मीका ने प्रस्तुत किया है, वह उसके ज्येष्ठ समकालीन 

...... नबी यशायाह द्वारा भ्रस्तुत चित्र के समान है। इस तथ्य के निर्णय करने के 

...._ लिए हमारे पास कोई साधन नहीं है कि शांति का मसीहसम्मत राज्य संबंधी 
...... दिव्यवचन (मी० ४: १-४; यश० २: २-४) मीका की मौलिक भावना 
....._ थी अथवा यशायाह की अथवा दोनों ने उसे किसी प्रचलित परंपरा से प्राप्त 


ा । किया था । मीका की एक विशिष्टता यह है कि उसने यह प्रस्तुत किया है हा 
रा ; .. कि मसीह दाऊद के चगर बेतलेहेम से निकलेगा (५ : २)। इस प्रकार हम । 
वह मसीह को दाऊद के वंश को बताता है। परमेश्वर ने इस भविष्यवाणी 





.. को न केवल इस रूप में पूर्ण किया कि यीशु दाऊद के वंश मेंथा और दाऊद 

















ततालीसवाँ भ्रध्याय 
नहम 
१. शीर्षक ््ि 
इस पुस्तक का नाम नहूम नबो के ताम पर रखा गया है। इब्नानी में इल 


शब्द का अथ आश्वासन या शांति देनेवाला है। सेपल्वागिता में नम है 
और बुल्गाता में नहम है । 


२. विषय-सामग्री का सारांश 


अश्शरी साम्राज्य की राजधानी नीनवे के आसचन्न पतन के समय धश्णरः 
पर ईश्वरीय न्याय-दंड संबंधी गौरवगीति इस पुस्तक में हूँ । 


३. रूपरेखा 
नहमं--मीनवे के विनाश का नबी 


. (१) परमेश्वर का सच्चा न्याय (१ ) (एक सूत्रात्मक ( एकरीहिटक के 
कविता) लि द 
 (क) परमेश्वर के न्याय कर्म, उसके स्वभाव और चरित्र के अनुकत हैं 


्ः 





कर अंधकार में भगा देगा । 


.*. चले; “मैं तेरे देवालयों में से ढली और गढ़ी हुई सृरतों को वाद 
.. डालूँगा | मैं तेरे लिये कबर खोदू गा, क्योंकि तू नीच है 









१ पच्चीसवें अध्याय में पाद टिप्पणी १ देखिए 








यहोवा जल उठने वाला और बदला लेने वाला ईश्वर है'““यहोबा ल्ितंब्द॒ 
से क्रोध करने वाला और बड़ा शक्तिमान है; वह दोषी को किसी प्रवाश 
निर्दोष न ठहराएगा । उसकी सामर्थ आंध्री, अनावुष्टि, भूकंप औरू 
ज्वालामुखी में दिखाई देती है। उसके क्रोध का सामना कौन कर पका... 
है ? “यहोवा भला है, संकट के दिन में वह दृढ़ गढ़ ठहरता है और... 
अपने शरणागतों की सुधि रखता है। परंतु वह” अपने शबुओं को ख्देक॒._... 


_ (ख) नीनवे के विरुद्ध उसका न्याय वचन (१: १४) : आगे को तेरा वंश का... । 











३४०... पुराना नियम की भूमिका. 


. (ग) उसकी दमित प्रजा का उद्धार (१:१४) : दिखों, पहाड़ों पर शुभ 
.. समाचार का सुनाने वाला और शांति का प्रचार करने वाला आ रहा 
है“ हे यहदा, अपने पर्व मात, क्योंकि वह ओछा पूरी रीति से नाश 

हुआ है । 


(२) नीनवे का आसन्न पतन (२-३) (लम्बी कविता) 


हु (क) निर्णायक युद्ध (२: १-३ : ३) : गढ़ को दुढ़ कर; मार्ग देखता हुआ 


. चौकस रह; अपनी कमर कस; अपना बल बढ़ा दे"“रथ पलीतों के 
समान दिखाई देते हैं'''भाले हिलाये जाते हैं“'रथों का वेग बिजली का 
 है'“नहरों के द्वार खुल जाते हैं चांदी को लूटो, सोने को बूटों 
वह खाली, छछी और सूनी हो गई है''कोड़ों की फटकार और पहियों 
की घड़घड़ाहट हो रही है; घोड़े कदते फाँदती और रथ उछलते चलते 
हैं ! लोथों का बड़ा ढेर, मुर्दों की कुछ गिनती नहीं । 


.. (ख) नींनवे का अपराध जिसके लिये उसे दंड दिया जा रहा है (३:४-७) : यह 


... सब उस अति सुन्दर वेश्या के छिनाले की बहुतायत के कारण हुआ, जो 
छिनाले के द्वारा जाति-जाति के लोगों को, और टोने के द्वारा कुल-कुल 
के लोगों को बेच डालती है । 


[हत्यारी नगरी, छल और लूट के धन से भरी हुई है---(३ : १) | 


....._ (ग) उसका विनाश और तुच्छ किया जाना (३: ८5-१३) : कया तू अमोन 


नगरी से बढ़कर है, जो नहरों के बीच बसी थी ?*“"'तू भी मतवाली 
होगी, तू घबरा जाएगी; तू भी शत्रु के डर के मारे शरण का स्थान 
ढूंढ़ेगी' 


.._(घ) उसका विनाश निश्चित है (३: १४-१६) : 'तलवार से तू नाश की. 
जाएगी । वह टिड्डी की नाई तुझे निगल जाएगी ।*“'तेरा घाव न भर 


सकेगा, तेरा रोग असाध्य है! । 


मम ४. रचना, रचयिता, रचना-तिथि... हे द 
... पुस्तक के पहले अध्याय में ईश्वरीय न्याय के सामान्य सिद्धान्त हैं। शेष 
... अध्यायों में नीनवे के दंड का वर्णन है । पहले अध्याय की सूत्रात्मक रचना 
..... भी उसे शेष अध्यायों से विशिष्टता प्रदान करती है । सूक्षात्मक रचना सिद्ध... 
-... नहीं है। आधे से कुछ अधिक वर्णमाला ही ठीक रूप से प्रस्तुत है। सूत्रात्मक 
.... . रचना केवल बब्रानी में ही दिखाई देती है। अ 








ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर की धामिकः 





अनुवादों में नहीं आसकती ।..||/.ैैः 





|; व “8 2म ०० +५०० रू ८33प०-पपलप>-००५--०१३००-००८०६:० २०० > 





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5 


से उतना ही अंश लिया गया जितना उसके विशेष विषय, नीनवे पर परमेश्वर 


का न्याय दंड के लिये, आवश्यक था | अथवा परवर्ती काल के किसी सम्पादक 


ने यह कार्य किया होगा । 


कुछ विद्वानों का विचार है कि अध्याय २ और ३ की 'लम्बी कविता' के ऐप 


आरंभ में १: ११ और १: १४ होना चाहिए, तब फिर वह २: १ से आगे ० 
चलती है। अतएव वततमान क्रम का यह स्पष्टीकरण दिया जाता है कि किसी 
संपादक ने लम्बी कविता के अंतर्गत सूत्रात्मक भजन जोड़ दिया । ह 


लम्बी कविता का आरंभ हम चाहे जहाँ मानें, यह निश्चित है कि युद्ध 3 


का जैसा चित्रोपम वर्णन इसमें है, उतना पुराने नियम में कहीं नहीं मिलता । 
कलात्मक मान से यह उतना ही उच्च कोटि का है जितना दबोरा का गीत 
(न्य० ५) और शाऊल तथा योनातान के संबंध में दाऊद का विलाप (२श० 
१: १६-२७) । द 

लंबी कविता' का रचयिता नहूम था। वर्णमालात्मक भजन से कहाँ तक 
. उसका नाम संबद्ध किया जाए यह अभी तक प्रश्न ही बता हैं। इसका हल 


नीनवे का पतन ई० पू० ६१२ में हुआ । इस घटना के संदर्भ में ही इस 
पुस्तक की रचना तिथि निर्धारित की जाती है। बाबुली और मादी दोनों 
सेनाओं ने मिलकर उसे पराजित किया था । कुछ विद्वानों का विचार है कि 
यह कविता इस घटना के बाद लिखी गई। परंतु साधारणतया यही मावा जाता 
है कि यह आने वाली घटना के विषय में भविष्यवाणी थी और विजयी सेताओं 


के नीनवे पहुँचने के थोड़े समय पूर्व लिखी गई । इसलिए नहुम की पुस्तक की रे हा 
रचना तिथि ई० पू० ६१२ ही मानी जाती है और वीनवे के पतन के ऊुछ की 


समय पूर्व ही इसकी रचना हुई। 


प्‌, नबी के विषय में जानकारी 


... स्थान के विषय में भी कोई जानकारी नहीं प्राप्त होती । परंपरा यह है कि वह ०5 


- ज्तीनवे के निकट था परंतु येरोम मानता है कि यह स्थान उत्तरी गलील मेंथा। 78 


. अन्य विद्वान मानते हैं कि यह स्थान यहुदा में था 


>“ इधर्म शिक्षा, 5 न 


..._.. नहूम की पुस्तक से यह शिक्षा मिलती है कि दुष्टों पर यहोवा का न्यायदंड रा 
रा. । अनिवार्य और भयंकर है, परंतु उसका उद्ृश्य भलाई है । अपनी धामिकता 5 

















. इ४र.... पुराना नियम की भूमिका 


की स्थापना में वह जल उठने वाला और बदला लेने वाला है (१:२) 
. वह प्रकृति की भयंकर शक्तियों के समान भयंकर है, और वे शक्तियाँ भी उसके 
अधिकार में हैं (१: ४-६) । तो भी उसका चरित्र विश्वसनीय है-- वह उनके 


.. लिये भला है, जो उसकी शरण में आ जाते हैं (१:७) । 
...  नीनवें एक महत्वपूर्ण इकाई के सदृश है जिसके संबंध में यहोवा के भयानक 


न्‍्याय-निर्णय प्रस्तुत होते हैं। उसके पापों के कारण उसे दंड दिया जाता है--- 
उसकी हत्या और लूट के लिये (३:१), उसके छिनाले के लिये (३:४), 
जातियों के प्रति उसकी क्ररता के लिये (२: ११, दे० ३ : १० में भी ऐसा ही 


.. दंड) उसे दंड मिलता है । प्राचीन काल में अश्शुरी लोग अपनी अतुलनीय करता 


के लिए कुख्यात थे । 
नहम अपने विश्वास के कोमल, उद्धारक पक्षों की अभिव्यक्ति नहीं करता । 


_ नीनवे के पतन के संदर्भ में वह न्याय के कठोर पक्ष को ही प्रस्तुत करता है । 
इस विषय में उसकी उस अज्ञात नबी से विषमता का विचार किया जाता है 


.. जो अपने लोगों को शांति देने वाला' था। उसने बाबुली अधिकार से मृक्ति 

... की घोषणा की । नहम के नाम का अर्थ भी शांति देने वाला' है और उसने 
...  अश्श्री शक्ति से मुक्त होने की घोषणा की । दोनों के शांति कार्य' में भिन्नता 
...  है। इस भिन्नता में मूल एकता उनके इस विश्वास की है कि परमेश्वर न्यायी 
.... . : हैऔर भला भी है । 











चवालोीसवाँ अध्याय 
हुबक्कुक 


ह 


१. शीर्षक 


इस पुस्तक का नाम हबक्‍कूक नवी के ताम पर है । इब्रानी में हबककक 
शब्द का मूलाथ है 'आलिगन' । अश्शरी में यह एक पौधे का नाम हैं। 
सेपत्वागिता में 'अंबकुम' नाम है और वुल्गाता में हबकुक । 


२. विषय सामग्रो का सारांश 
पुस्तक में परमेश्वर और नबी के बीच इस विषय पर वार्तालाप है कि 


विश्वसनीयता है | दुष्ट जाति के प्रति विपत्ति है और परमेश्वर के प्रति विश्वास 
का स्तोक्न है 


२. रूपरेखा 
हबककूक---शंका करने वाला नबी 
(१) नबी के प्रश्न (१) . 
(क) यहोवा क्‍यों न्याय का खून होने देता है ? (१: १-४) : 'हे यहोवा, मैं 





कब तक दोहाई देता रहूँगा, और तू व सुनेगा ?”” दुष्ट लोग धर्मी को... 


. घेर लेते हैं, और न्याय का खन हो रहा है' 


(ख) उत्तर: परमेश्वर चुप नहीं बैठा है, अभी भी काम कर रहा है (१: 
... ४-११) : “अन्य जातियों की ओर चित्त लगा कर देखो"''क्योंकि मैं 


तुम्हारे ही दिनों में ऐसा काम करने पर हुँ कि जब वह तुमको बताया 


जाए तो तुम उसकी प्रतीति न करोगे । देखो, मैं कसदियों को उभारते ः ५ 
पर हूँ, वे कूर और उभारने वाली जाति हैं"'उनके घोड़े चीतों से भी ० 
अधिक तेज चलने वाले हैं, और सांफ को आहेर करने वाले हुंडारों से 


5 अधिक क्र हैं । ला 
.. (ग) यहोवा ऐसे बुरे साधन का क्‍यों उपयोग करता है? (१: १२-१७) | 
..// है भेरे प्रभु यहोवा, पवित्र परमेश्वर, क्या तू अनादि काल से नहीं है 














88 ओम .. पुराना नियम की भूमिका 


 ““'“तेरी आँखें ऐसी शुद्ध हैंकि तू बुराई को देख ही नहीं सकता 
.... “तो जब दुष्ट निर्दोष को निगल जाता है, तब तू क्‍यों चुप रहता हैं : 
.. क्‍या यह दुष्ट शक्ति जाल को खाली करने और जाति-जाति के लोगों 
. को निर्दयता से घात करने से हाथ न रोकेगी' ? 
द (२) नबी की गृम्मट पर उत्तर (२) क्‍ 
. (क) धर्मी जन अपने विश्वास के द्वारा जीवित रहेगा (२:१-४) : "मैं 
... अपने पहरे पर खड़ा रहुँगा'" “यहोवा ने मुझ से कहा, “दर्शन की बातें 
लिख दे साफ साफ लिख जिसका मन सीधा नहीं है, (वह 
असफल होगा, परंतु धर्मी अपने विश्वास के द्वारा जीवित रहेगा । 
(ख) दुष्ट का विनाश होगा (२: ५-६०) : “अहंकारी पुरुष घर में नहीं 
. रहता" *-'क्या सब (जातियाँ) उसका दृष्टांत चलाकर, और उस पर 
. ताना मारकर न कहेंगे, हाय उस पर, जो पराया धन छीन छीन कर धन- 
बान हो जाता है--जो तभ से कर्ज लेते हैं, कया वे लोग अचानक न उठेंगे 
हक क्या तू उनसे लुटा न जाएगा 
पी हाय उस पर, जो अपने घर के लिये अन्याय के लाभ का लोभी है' 
... क्‍योंकि घर की भीति का पत्थर दोहाई देता है और उसके छत की कड़ी उनके 
.... ट्वर में स्वर मिला कर उत्तर देती है । 
.......... हाय उस पर, जो हत्या करके नगर बनाता है''''** देखो, वया सेनाओं 
... के यहोवा की ओर से यह नहीं होता”''कि राज्य-राज्य के लोगों का परि 
...॑.॑ व्यर्थ ही ठहरता है? क्योंकि पृथ्वी यहोवा की महिमा के ज्ञान से ऐसी भरी ._ 
._ जाएगी जेसे समुद्र जल से भर जाता है।। 5 
....../.. . “हाय उस पर, जो अपने पड़ौसी को मदिरा पिलाता"'' “तू भी पी और _ 
....... अपने को खतनाहीन प्रकट कर, । जो कटोरा यहोवा के दाहिने हाथ में रहता 
... .... हैं, सो घूम कर तेरी ओर भी आएगा। “हाय उस पर, जो काठ से कहता है, 
...... जाग, वा अबोल पत्थर से, उठ ! क्‍या वह सिखाएगा ? परंतु यहोवा: 
.. अपने पवित्न मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे! |... 
77 (३) हबक्कक की प्रार्थना (३) 7 याद 
मा, है यहोवा में तेरी कीति सुन कर डर गया" “इसी युग मे तू उसको. | ] 
... प्रकट कर । क्रोध करते हुए भी दया करता स्मरण कर । ईश्वर तैमान से 














जा के उद्धार के लिये निकला 





मा . आया पवित्न ईश्वर परान पव॑त से आः रहा है !'उसका तेज आकाश पर छाया ' ही " ः 
रे ताप रहा है; उसने देखा और जाति . 5. 


हबक्कक हे ० हा .... ३४१ 


हा अपने अभिषिक्त के संग होकर उद्धार के लिए निकला" ** सब सुनते 
ही मेरा कलेजा काँप उठा। मैं शांति से उस दिन की बाट जोहता रहेगा जब दल 
बाँध कर प्रजा चढ़ाई करे' द द 


'चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाख-लताओं के फल लगें 
वह मेरे पाँव हरिणों के समान बना देता है, बह मुझ को मेरे ऊंचे स्थानों 
पर चलाता है । क्‍ 


. ४. रचता, रचथधिता, रचना-तिथि 


ऐसा प्रतीत होता है कि अंतिम अध्याय में हृबक्क्‌क की प्रार्थना पुस्तक का मूल 
भाग नहीं था । दीघंकाल से इस संबंध में शंका की जाती रही है, क्योंकि यह 
प्रार्थना संगीत के चिन्हों के साथ एक भजन है (शिग्योनीत की रीति पर ३: १; 
और ३:३, ६, १३ में सेला भी है) जिससे यह स्पष्ट होता है कि भजन संहिता 
में इसका स्थान उपयुक्त है। इधर कुछ वर्षों में मृत्यु सागर कुंडल पत्नों (70८80 
.. 568 $009 ) से इस शंका का समर्थन हुआ है। इन कुंडल पत्नों में से एक है 
. हबकक्‍कूक टीका । यह 'हबक्कक के उस मूल पाठ पर है जिसमें अन्तिम अध्याय 
नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं कि हवक्कूक इस पुस्तक का लेखक नहीं, परन्तु 
 क्रेवल यह अर्थ है कि हवक्कक की प्रार्थना एक पृथक साहित्यिक इकाई के रूप 
में थी और कि नबी की रचना की क॒छु प्रतिलिपियों में विद्यमान है, कुछ में नहीं । 


समालोचक अध्याय १ और २ में तीन प्रकार की साहित्यिक सामग्री 

देखते हैं (१) यहोवा के विरुद्ध एक परिवाद कि वह बुराई को चलने देता है... 
(१ : २-४, १२ पूर्वाद्ध, २:४)। (२) लूटने वाली जाति के दो चित्र - 
एक क्र और उतावली जाति (१: ५-११, १६ उत्तराद्े) और एक जो _ 
जातियों को अपने महाजाल में फँसा लेती है (१: १४ : १७) । (३) जो 
अहंकारी और लालची है, उसके ऊपर पाँच बार हाय (२: ५-२०) । इन तीन _ 
इकाइयों या विभिन्न प्रकार की साहित्यिक सामग्री के आधार पर यह मत प्रति- 
 पादित किया जाता है कि पुस्तक का एक लंबा साहित्यिक इति' जिसका _ 
आरम्भ हवक्कक के दिव्य वचन से होता है कि कसदी परमेश्वर की ओर से 
. न्यायदंड के साधन हैं ( १, १९ उ०, १४-१७) और जिसकी तिथि _ 
ई० प्‌ू० ६०० है। इसके बहुत समय पश्चात (ई० पू० ५००-२००) किसी 
. संपादक ने परिवाद का तथा उसके उत्तर का भजन भी दिव्यवचन में सम्मिलित _ 
किया (१: २-४,१२ पृ., १३; २: १-४) । तब उसी संपादक या अन्य _ 





. किसी सम्पादक ने पाँच हाय' अंशों को भी मिला दिया (२: ५-२० ) । अंत _ 
में क्व्ठ प्रतियों में अध्याथ 3३ जोडा गया ॥ का बा 8, 











.. इं४६..>€“#ौप्राता नियम की भूमिका 


यह मत सामान्यतया स्वीकार नहीं किया जाता है | सामान्यतया यह साना 

_ जाता है कि विभिन्न इकाइयों से विभिन्न रचयिताओं का संकेत नहीं होता । 

. इन सब में एक ही विचारधारा की एकता है और इसलिए यह माना जाता 

.. है कि सबका लेखक एक ही था । साथ ही यह संभव है कि रचयिता ने धामिक 
-. शब्दावली की प्रचलित परंपराओं का प्रयोग किया । 


माता कि १ और २ अध्याय एक साहित्यिक इकाई हैं और हबक्कक की 


: क्रृति हैं, फिर भी हमें निम्नलिखित प्रश्नों के संबंध में व्याख्या के वेभिज््य का 


सामना करना पड़ता है : (१) वे दुष्ट कौन हैं (१: ४) जिनके विषय नबी 
परिवांद करता है ? (२) दुष्टों को दंड देने के लिए किस जाति को कोड़े 
: स्वरूप उपयोग किया है (१: ५-१०) ? (३) वह कौन सी जाति है जिसके 
प्रति पाँच हाय मारे गये हैं ? इन प्रश्नों के उत्तर निम्न रूप में दिये जाते हैं । 


ा .. करते थे। अर्थात दुष्ट जो देश के भीतर ही शत्त हैं। 





... हैं, अर्थात अश्शुरी लोग । इस मान्यता को इस अनुमान से बल मिलता है कि 


... १: ५-११ का स्थान बदल दिया गया है और कि उसका स्थान २: ४ के. 
। .. पश्चात होना चाहिए। इस प्रकार के क्रम से १: १४-१७ का जो स्पष्ट चित्रण... 
है वह अश्श्री की और संकेत करेगा । दुष्ट अश्शूरियों का आगे बढ़ते आना ही... 


:ः ः ै नबी के लिए एक समस्या है। उसी के लिए वह गुम्मट पर उत्तर पाता है 
...... (२: १-४) कि कसदी लोग अश्शूरियों को दंड देने के लिये उठाए जा रहे हैं 
... (१: ५-११) | इस प्रकार की व्याख्या से हवककक की एक ही समस्या रह जाती 


रे ५; ः है (परमेश्वर दुष्ट अश्शूरियों को क्‍यों नहीं रोकता ?) । दो समस्‍यायें नहीं रह. 
.... जातीं (अर्थात: परमेश्वर दुष्टों को क्‍यों नहीं रोकता ? और दुष्ट कसदियों को 


.... क्यों अपना साधन बनाता है ?) ।.. 


आर (२) परमेश्वर ने जिस जाति को कोड़े स्वरूप प्रयोग किया बह सामान्‍्य- 
....... _- तया कसदी लोग, अर्थात बाबुली जाति मानी जाती है (१: ५-११) । यह... 
:.. पद १: ६ से बिलकुल स्पष्ट प्रतीत होता है जहाँ कसदियों का नाम आया है।...... 
2. । रा ः 4 यह हष्टव्य है कि हबककक की टीका ( मृत्यु सागर कुंडल पत्रों में ) हे रा ; ५ 
:.. .. व्याख्या है कि ये कसदी लोग कित्तीम या युनानी लोग थे, और कि 'कसदी | 
काव्य की लय सुधर जाती है इसलिये यह 5 
पर्मेहशिया में लिखा हुआ 








.._ शब्द को अलग कर देने से इब्ार्न 
विचार किया जाता है कि 'क 














... (१) दुष्ट लोगों (१: ४) से साधारणतया यहुदा के लोगों की ओर 
- संकेत है, जो नेतिक नियमों को भ्रष्ट करते और अपने भाइयों पर अत्याचार 


इस सम्बन्ध में एक मान्यता और है कि दृष्ट लोग वे हैं जो बाहरी शत्रु. 





हबवकूक द जज पा कब हि 


ग्रैगा जो बाद में मूलपाठ में आ गया । यह मान्यता कि कसदी के बदले 
कित्तीम या यूनानी की ओर संकेत है इस तथ्य से पृष्टि होती है कि यदि इब्नानी 
मूल पाठ का तनिक सुधार किया जाए तो २ . ५ में 'दाखलता' शंब्द यूनानी 
हो जाता है । ए० व्ही० में 'बह एक अहंका री पुरुष है जो घर में नहीं रहता" 
(२: ५) से सिकंदर महान का अच्छा चित्रमय वर्णन होता है। 


यदि यह मान्यता स्वीकार की जाए तो १: ४ के दृष्ट लोगों से निर्वास- 
नोत्तर यहूदियों का संकेत होता है जो यहदी व्यवस्था का पालन नहीं करते, 
ओर सिकन्दर की सेना वह कोड़ा है जो उनको दंड देने के लिए है। इससे 
नबी के लिए एक नई समस्या खड़ी हो जाती है | इस मान्यता के आधार पर 
हबक्कूक की तिथि अरबला में सिकन्दर की विजय (ई० पूृ० ३३१) के कुछ 
: पहले, अर्थात ई० पृ० ३३२ में मानी जाएगी द 


है (३) पाँच विपत्तियों (२: ५-२०) से कसदियों की ओर संकेत होता 
 है। यद्यपि परमेश्वर इन लोगों का दुष्टों के लिए कोड़े स्वरूप प्रयोग करता 

है, तथापि नबी के लिए उनकी करता के कारण वे स्वयं एक समस्या बन 
5 >जाति- हैं... द का ज! 
इस अनुमात के आधार पर कि १: ५-११ का अंश २: ४ के बाद 
आना चाहिए (जैसा ऊपर निर्देश किया गया है), पाँच विपत्तियाँ अश्श्रियों 
के विरुद्ध हैं। इस प्रसंग में ये विपत्तियाँ १: १४-१७ की ही परवरावत्ति: 
. करेंगी, जहाँ अश्शरियों की निंदा की गई हा 


..._ सारांश में हम कहें, तीन प्रकार की व्याख्याएँ की गई हैं : (१) आंतरिक 
. दृष्टता--कसदी कोड़ा--कसदियों के विरुद्ध विपत्तियाँ। यही सामान्यतया: 
स्वीकृत व्याख्या है और इस पुस्तक में ऊपर रूपरेखा बनाने में इसी मान्यता 
.. का अनुसरण किया गया है। इसके आधार पर हबकक्‍कक की तिथि ई० पू०.. 


हे . ६२१-६०० होगी । आगामी परिच्छेद में तिथि के संबंध में विवेचन किया 


जाएगा ।(२) बाह्य दुष्टता, अर्थात अश्शुरी लोग--कसदी कोड़ा--अश्शूरियों 
.. के विरुद्ध विपत्ति । इसके आधार पर हबक्कक की तिथि नीनवे के पतन के. 
. (ई० पृ० ६१२) के कुछ ही पूर्व होगी। पाँच विपत्तियाँ इसके बाद ही आ 
. सकती हैं । (३) निर्वासनोत्तर काल में आंतरिक दुष्टता--सिकंदर ओर 
.. उसकी मकिदूनी सेना (यूनानी) कोड़ा--मकिदूनियों के विरुद्ध विपत्तियाँ 
.. इसके आधार पर हबक्‍्कूक की तिथि लगभग ई० पू० ३२३२ होगी।. 


..._हबक्कक की तिथि सामान्यतया स्वीकृत व्याख्या के अ अनुसार (ऊपर तीन 
ः रा में से पहली) बाबुली राज्य के उदय के संबंध के : निर्धारित को 









पा रे४८ हु : 5... पुराना नियम की भूमिका 


. अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त की, ई० पु० ६१२ में मादियों की सहायता से नीनबे द 
_ को पराजित किया, और ई० पू० ६०४ में ककंमीश के युद्ध में मिश्रियों को _ 


. पूरी तरह हरा दिया, जो साम्राज्य स्थापित करने में उनके प्रतिद्नन्द्दी थे 
... क॒कंमीश के युद्ध के पूर्व वे दृष्टता को दंड देने के लिये परमेश्वर के कोड़े 


. स्वरूप दिखाई दिये। कर्कमीश के पश्चात्‌ जब उनका पलिश्तीन के साथ सीधा 
संबंध हुआ, तो उनकी करता सामने आई। अतएवं हृवक्‍क्‌क की विपत्ति 
. संबंधी नवबूवतें ककेमीश के पश्चात्‌ अर्थात्‌ ई० पृ० ६०० के पश्चात्‌ मानी 

जा सकती हैं । उसके नबूबत कार्य की तिथि व्यवस्था के प्रति ढीलेपन के 
संदर्भ में (१: ४) निर्धारित की जा सकती है। यह प्रसंग योशिय्याह के 
सुधार के पश्चात नैतिक गिरावट (ई० पृ० ६२२) का हो सकता है। इस 
प्रकार हबक्कक की तिथि लगभग ई० पृ० ६२१ से ६०० तक 


. १, जीवनी संबंधी टिप्पणी 
हबक्कक की जीवनी के संबंध में बहुत ही कम जानकारी मिलती है। 


.... हबक्कूक की प्रार्थना के प्रारंभ में संगीत के संकेतों (३: १) से यह निर्देश... 





प्त हो सकता है कि हबक्कूक संगीतज्ञ था । बेल और अजगर' के अनुसार 
वह लेवी वंश का था, जिसमें से पु्रोहित और लेबीय नियुक्त होते थे | संभव 


... है कि वह मंदिर के लेवीय गायक मंडल में से हो । बेल और अजगर' में 
हा द बताया गया है कि जब दानिश्येल सिहों की माँद में था, तो हृबकक्‍कूक 


- चमत्कारिक रूप से दानिय्येल को भोजन देने के लिए बाबल पहुँचाया गया 


..... इससे यह व्यंजित होता है कि नबी के रूप में हबक्कूक को बहुत सम्मान की 
..... दृष्टि से देखा जाता था जिससे वह इस किवदंती का आधार बन सका । 


रा ६ ६. धर्म दिक्षा... 


हबक्कक को दार्शनिक नबी कहा जाता है. क्योंकि वह ईशशास्त्र 


... (ह6०0८ए) की समस्या से उलभता है, अर्थात इस समस्या से कि यदि 


रा परमेश्वर भला और स्व शक्तिमान है तो धर्मियों को क्‍यों दु:ख उठाने और 
... . दुष्टों को क्‍यों समद्धिशाली होने देता है। इस समस्या के कुछ पक्ष भजन. 


.. (उदा० ३७, ४६, ७३), यिमंयाह (१२: १; १५: १७-१८) और विशेषकर 


|... अय्युव की पुस्तक में पाए जाते हैं । हवक्कूक की समस्या दुहरी है। पहलेतो... 
5... : उसका प्रश्त है कि परमेश्वर क्‍यों. दुष्टों को 




















को पनपने और धर्मियों को सताने .. क्‍ . । 
उसे यह मिलता है कि परमेश्वर 


इसलिये धैयें रखा जाए । परंतु इस उत्तर से एक नई समस्या खड़ी हो जाती. 
है। परमेश्वर, जो भला और पवित्र है कसदी लोगों जैसे द्ृष्ठ साधन का. 
उपयोग कैसे कर सकता है ?--वे तो उन लोगों से अधिक दुष्ट हैं जिन दुष्टों: 


को दण्ड देने का साधन उन्हें बनाया जा रहा है (१: १३-१७) । इस दूसरी... 


समस्या का उत्तर नबी को गुस्मट पर एक दर्शन में दिया जाता है : धर्मोी 
अपने विश्वास (अथवा विश्वास योग्यता) के द्वारा जीवित रहेगा (२:४) 
ओर दुष्ट साधन का भी न्याय होगा और उसे भी दण्ड दिया जाएगा 


५ 


पुस्तक के इस तकेक्रम को प्रस्तुत करते हुए हम निम्नानुसार पुस्तक की 
धर्मशिक्षा का सारांश दे सकते हैं। 


(१) परमेश्वर को यह स्वीकार है कि हम अपने विश्वास के संबंध में 
च्ची शकाए उसके समक्ष प्रस्तुत करे । हृबक्‍्कक ने यही किया। बाइबल में जिस 
विश्वास का प्रकाशन है वह ठोस सत्य पर आधारित है। उसके प्रति हमारी 
सच्ची शंकाएं हमारे विश्वास को अधिक गहराई से समझने में, परमेश्वर के 
अभिप्राय के अधिक स्पष्ट दर्शन में, और यदि इसमें नहीं, तो एक अनंत रहस्य 
में परमेश्वर के साथ अधिक घतनिष्ट संगति रखने में सहायक होती हैं 
.... (२) हबक्कूक को जो पहला उत्तर दिया गया, उससे हम यह सीखते 
कि यद्यपि दृष्टता का हाथ बलवंत होता दिखाई देता है, तथापि परमेश्वर न 
तो चेष्टा हीन है और न उदासीन रहता है (१: ६) । परमेश्वर की ही 
प्रभता है, और वह अपने शत्रुभों की गतिविधियों को होने देता है या नहीं... 
गेने देता है । हमारा यह काम है कि वह जिस रूप में अपनी योजना कार्यान्वित 
करता है, हम धैर्य धारण करें । दा हा 


(३) परमेश्वर मनुष्य के क्रोध का भी इस प्रकार प्रयोग करता हैकि 


. उसकी स्तुति हो । यशाया शिक्षा दी कि यद्यपि अश्शूरियों का यह 
: इरादा नहीं था कि वे परमेश्वर के न्याय का साधन हों, तथापि वे साधन हुए । 
 (यश० १० : ५, १५) । इसी प्रकार हबक्‍कूक भी कसदियों को परमेश्वर के 


न्याय का साधन मानता है, यद्यपि कि ये लोग विधर्मी थे (२:६) । 


(४) हबक्कूक अपनी इस शिक्षा के लिये बहुत प्रसिद्ध है कि 'धर्मी अपने रा 


. विश्वास के द्वारा जीवित रहेगा' (२: ४) । इस पद में इब्नानी शब्द एमुनाह 


हे ( शाापा॥॥। ) का प्रयोग हुआ है | इसका और आमेन गब्द का मूल एक ही | ९ 5 « | 
. है । इस शब्द का सामान्यतया विश्वास योग्यता अर्थ होता है। इस दृष्टि से 
इस पद का अर्थ यह होगा कि यदि धर्मी परमेश्वर के प्रति सच्चा और निष्ठा- 





हे 5 बात रहे तो बह जी वित रहेगा | विश्वास योग्यता 


(परमेश्वर के सत्य को दृढ़ता ः गा 








बेशक पुराना नियस की भूमिका 


से मानते जाना) और विश्वास (परमेश्वर के सत्य को मानना या ग्रहण करना) 
दोनों ही भाव इसमें हैं। सुसमाचार के सत्य के प्रतिपादन में पौलुस हबक्कुक के 
इस शब्द के दूसरे अर्थ (सत्य को मानना या ग्रहण करना) में प्रयोग करता है 
"खिल पछी के | 5 का न आर जा 
..._ (५) हबक्कूक परमेश्वर के कुछ उदात्त या अतिभव्य गृणों को व्यक्त 
.. करता है। क्या तू अनादिकाल से परमेश्वर नहीं है ? (१: १२ )। तेरी आँखें 
. ऐसी शुद्ध हैं कि तू बुराई को देख ही नहीं सकता' (१ : १३ ) । यहोवा अपने 
पवित्न मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके साम्हने शांत रहे, (२: २०) । 
... (६) हंबक्कूक की प्रार्थना में बाइबल के एक महान सत्य की अभिव्यक्ति 
. की गई है। वह यह है कि परमेश्वर स्वयं अपनी समस्त आशिषों से महांन है। 
अतः जब अन्य आशिषें ले ली जाती हैं--चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, 
और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए! 
(३:१७), तब भी विश्वासी के लिए आनंदित रहने का कारण बना रहता 
है--मैं यहोवा के कारण आनंदित और मगन रहूँगा, अपने उद्धा रकर्ता परमेश्वर 


........ के द्वारा अति प्रसन्‍त रहूंगा' (३: १८) । इसके अतिरिक्त परमेश्वर की 


। ० । . उछलते फिरते हैं ([ ३:१ 8) कक 





..._ उपस्थिति वह बल और तरुणाई की शक्ति प्रदान करती है जिसकी तुलना... 


. चपल हरिणों की स्वच्छंदता से की जाती है जो पहाड़ों के ऊँची चोटियों पर... 








० कहते हैं कि यहोवा न तो भला करे: रा 


_पेंतालीसबाँ अध्याय... 
.. सपफ्नाह... 


१, शीर्षक 


इस पुस्तक का नाम सपन्याह नबी के नाम पर है । इब्रानौ में त्सपन्‍्याह'.. 


है । इसका अर्थ है 'परमेश्वर ढांप लेता है' भर्थात रक्षा करता है। सप्तत्ति 
अनुवाद में सफनीअस है। बुल्गाता में यही है । प्रारंभिक अक्षर में जो वैभिश्न्य 
.. है उसका का रण यह है कि इब्नानी अक्षर को दूसरी भाषा में लिखना कठिन है। 
२. विषय सामग्री का सारांश 


पुस्तक में यहोवा के दिन का एक सजीव चित्र है जिसमें उसे उन सब 
. लोगों पर भयंकर जागतिक न्याय का दिन प्रस्तुत किया गया है जो परमेश्वर 
के धामिक कार्यों का विरोध करते हैं। साथ ही उसमें यह चित्न भी प्रस्तुत 
है कि इस्राएल से की गई प्रतिज्ञा की पूति स्वरूप एक नवीन युग आएगा 
३. रूप रेखा 22 

सपन्याह--जागतिक न्याय का नवी.. 


क्‍ (१) यहोवा का दिन (१-२) 


 (क) वह जागतिक न्याय का दिन होगा (१: २-६) ८ यहोवा, कहता है, 
. मैं धरती के ऊपर से सब का अन्त कर दूगा'' “मनुष्य और पशु"ए" 
... आकाश के पक्षियों और समुद्र की मछलियों का, और दुष्टों का भी अंत 
.. कर दूगा”'” इस स्थात में बाल के बचे हुओं को और याजकों समेत... 


. देवताओं के पुजारियों के नाम को नष्ट कर दू गा 


. (ख) वह दिन यरूशलेम में अपराधियों की खोज का दिन होगा (१: ७-१३) :.. | हे 
.. यहोवा के यज्ञ के दिन, 'मैं हाकिमों और राजकुमारों को और जितने 


.._ परदेश के वस्त्र पहिना करते हैं, उनको भी दण्ड दू'गा"””*““जो डेवड़ी को 
.. लाॉघते'”“'“'उस स्रमय मैं दीपक लिये हुए यहूशलेम में ढूंढ़-ढांढ़ करूंगा, 


... और जो लोग दाखमधु के तलछट तथा मैल के समात बैठे हुए सन में 











पी पर 5. : पुराना नियम की भूमिका 


. से मानते जाना) और विश्वास (परमेश्वर के सत्य को मानना या ग्रहण करना ) 
.... दोनों ही भाव इसमें हैं। सुसमाचार के सत्य के प्रतिपादन में पौलुस हबक्कुक के 
.. इस शब्द के दूसरे अर्थ (सत्य को मानना या ग्रहण करना) में प्रयोग करता है 


रा (रो .१: १७) | 


... (५) हबक्कक परमेश्वर के कुछ उदात्त या अतिभंब्य गुणों को व्यक्त 
करता है। क्या तू अनादिकाल से परमेश्वर नहीं है ” (१:१२) | तेरी आँखें 

. ऐसी शुद्ध हैं कि तृ बुराई को देख ही नहीं सकता' (१: १३) । 'यहोवा अपने 
_पवित्न मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके साम्हने शांत रहे, (२ | 


... (६) हबककूक की प्राथना में बाइबल के एक महान सत्य की अभिव्यक्ति 

की गई है । वह यह है कि परमेश्वर स्वयं अपनी समस्त आशिषों से महान है। 

. अतः जब अन्य आशिषें ले ली जाती हैं--चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, 

. और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए! .. 
... (३:१७ ), तब भी विश्वासी के लिए आनंदित रहने का कारण बना रहता 


... है--मैं यहोवा के कारण आनंदित और मगन रहूँगा, अपने उद्धा रकर्ता परमेश्वर... 


..... के द्वारा अति प्रसन्न रहूंगा (३: १८५) । इसके अतिरिक्त परमेश्वर की 
.... उपस्थिति वह बल और तरुणाई की शक्ति प्रदान करती है जिसकी तुलना 
_..... चपल हरिणों की स्वच्छंदता से की जाती है जो पहाड़ों के ऊँची चोटियों पर 
....  उछलते फिरते हैं (३: १६) । 











पेंतालीसबाँ अध्याय 
सपन्याह 
१. शीर्षक क्‍ 


इस पुस्तक का नाम सपन्‍याह नबी के नाम पर है। इब्नानों में त्सपन्याह' 
है । इसका अर्थ है परमेश्वर ढांप लेता है' अर्थात रक्षा करता है। सप्तत्ति 
अनुवाद में सफनीअस है । वुल्गाता में यही है । प्रारंभिक अक्षर में जो वेभिन्न्य _ 
है उसका कारण यह है कि इब्रानी अक्षर को दूसरी भाषा में लिखता कठिन है। 


२. विषय सामग्री का सारांश 


पुस्तक में यहोवा के दिन का एक सजीव चित्र है जिसमें उसे उन सब 
लोगों पर भयंकर जागतिक न्याय का दिन प्रस्तुत किया गया है जो परमेश्वर 
के धामिक कार्यों का विरोध करते हैं। साथ ही उसमें यह चित्र भी प्रस्तुत 
है कि इस्राएल से की गई प्रतिज्ञा की पूर्ति स्वरूप एक नवीन युग आएगा। 
३. रूप रेखा 
. सपस्याह--जागतिक न्याय का नवी 


(१) यहोवा का दिन (१-२) 


_ (क) वह जागतिक न्याय का दिन होगा (१: २-६) £ यहोवा कहता है, 
मैं धरती के ऊपर से सब का अन्त कर दूगा'। “मनुष्य और पशु" 


आकाश के पक्षियों और समुद्र की मछलियों का, और दुष्ठों का भीअंत 
कर दू गा” इस स्थान में बाल के बचे हुओं को और याजकों समेत 


देवताओं के पुजारियों के नाम को नष्ट कर दू गा । 


हि (दे) वह दिन यरूशलेम में अपराधियों की खोज का दिन होगा (१: ७-१३ ) : । 


.._ यहोवा के यज्ञ के दिन, 'ैं हाकिमों और राजकुमारों को और जितने... 
. परदेश के वस्त्र पहिना करते हैं, उनको भी दण्ड दू गा जोडेवड़ी को 

.  लॉघते"/'““उस समय मैं दीपक लिये हुए यरूशलेम में ढूँढ़-ढांढ़ करूंगा, . । 
..... . और जो लोग दाखमधु के तलछट तथा मल के समात बेठे हुए मन में रा रा 
.... कहते हैं कि यहोवा न तो भला करेगा न बुरा, उनको मैं दण्ड दू गा। पा 














का इश्ए ः रे पुराना नियम की भूमिका 


...  (ग) यहोवा का भयानक दिन निकट है (१: १४-१८) : यहोवा का 
भयानक दिन निकट है, वह बहुत वेग से समीप चला आता है । ... वह 
रोष का दिन होगा वह संकट और सकेती का दिव"”"वह बादल और 

5 काली घटा का दिन होगा । .. 30 5 क 
._(घ) जब समय है तो महोवा की ओर लौट आओ (२:१:-६): हे निर्लेज्ज 
जाति के लोग, इकट्ठ हो"“इससे पहले कि यहोवा का भड़कता हुआ क्रोध 
तुम पर आ पड़े"“'है पृथ्वी के नम्न लोगो, यहोवा को दंढ़ते रहो, धम 

को ढंढ़ो, नम्नता को ढंढ़ो संभव है तुम यहोवा के दिन में शरण पाओ' 


 (च) वह जातियों के विनाश का दिन है (२: ४-१५) : अज्जा, अश्कलोन, 
. अशदोद और एक्रोन पर विनाश पड़ेगा-'समुद्गरतीर पर रहने वालों पर 

. हाय; “वही समुद्रतीर यहुदा के घराने के बचे हुओं को मिलेगा। 
... “”“मीआब सदोम के समान और अम्मोनी अमोरा के समान हो जाएंगे। 
.... इसी प्रकार कृश और अश्श्र का विनाश होगा । ; 
(२) इस्राएल के साथ यहोवा का व्यवहार (३) 





.._ (क) इख्राएल जाति विश्वासघात में बढ़ती गई (३: १-७) : 'उसने मेरी... 


रखा उसके भविष्यवक्ता व्यर्थ बकने बाले और विश्वासघाती है शा कं 


... उसके याजकों ने पवित्र स्थान को अशुद्ध किया है” “यहोवा जो इसके 


.. बीच में है, वह धर्मी कुटिलता न करेगा; वह अपना न्याय प्रति - 
.. भोर प्रगटठ करता है और चकंता नहीं मैंने कहा, अब तू मेरा भय 


है ४ 


.... मानेगी”'' “परन्तु वे सब प्रकार के बुरे बुरे काम यत्न से करने लगे 
.... (ख) यहोवा के नये युग की स्थापना होगी (३: ८-२०) : मैं देश देश के 
... लोगों से एक नई और शुद्ध भाषा बुलवाऊगा, कि वे सब के सब यहोवा 
से प्रार्थना करें और एक मन से कंत्रे से कंधा मिलाए हुए उसकी सेवा 
०, करें तू मेरे पवित्र पंत पर फिर कभी अभिमान न करेगी, क्‍योंकि 
.... में तेरे बीच में दीन और कंगाल लोगों का एक दल बचा रख गा 
.... इखस्राएल के बचे हुए लोग न तो कुटिलता करेंगे और न भ्रठ बोलेंगे 
(३:८५: १३)। है सिय्योन, मत डर"“':-तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे 
.... बीच में है, वह उद्धार करने में पराक्रमी है'"*"''बह अपने प्रेम में तुमको 
....... संजीव करेगा””””“मैं लंगड़ों को चंगा करूंगा, और वरबस निकाले हुओं 
... की इकट्ठा करूंगा'“'“'मैं तुम्हें घर लौटा लाऊंगा (३: १४-२०) 


.. : इतना अंश आर. एस. व्ही. से 











सपन्याह - .... -. नि, 


४, रचना, रचयिता, तिथि द द 
पुस्तक की साहित्यिक अखंडता और उसके लेखक सपन्याह को सामान्य- 


तया स्वीकार किया जाता है, क्योंकि इसकी विषय सामग्री केन्द्रीय विषय से... 


अर्थात्‌ यहोवा का दिन' से भली भांति संगुफित है। फिर भी यह कहा जाता 


कि वे अंश, जिनमें अंतिम दिनों का दर्शन है, और जिनमें इस्राएल की भावी... 


आशा पर बल दिया गया है, निर्वासनोत्तर है। इस प्रकार १, २, ३, ६, जिनमें 
जागतिक विनाश का चित्रण है, १: ४-४ में प्रस्तुत सीमित विनाश का निर्वा 
सनोत्तर विस्तुत रूप है। सिय्योत की आशा की परिषूरति संबंधी अंश भी 
(३: १४-२० ) किसी निर्वासनोत्तर संपादक का कार्य माना जाता है। यह 
ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे प्रकरणों में निर्वासनोत्तर संपादन की मान्यता की 
समस्या इस प्रश्न पर निर्भर है कि क्‍या अंतिम दिनों और “भविष्य आशा' 
संबंधी विचारों को निर्वासनोत्तर काल से ही संबंधित माना जाना चाहिये ? 
इस संबंध में मीका नबी पर लिखी गई भूमिका के चौथे विचारबिद के अंतर्गत 
हमने अपने विचार व्यक्त किए हैं कि निर्वासन पूर्वेकालीत नवियों में भी ऐसे 
. विचार पाए जाते हैं। अतः: इस परंपरागत मान्यता को अस्वीकार करने का 

कोई कारण नहीं कि यह पुस्तक एक अखंड पुस्तक हैं और कि उसका लेखक 
सपन्‍्याह है। इस संदक् में इब्नाती दर्शन के इतिहास में सपन्‍्याह का स्थान बहुत 
द त्वपर्ण है कि अंतिम दिनों' के संबंध में उसने ईश्वरीय न्याय की जागतिकता 

पर बल दिया है, और इस प्रकार एक प्रकाशितवाक्यात्मक दृष्टिकोण का प्रारंभ 
क्रिया । 


... सपन्‍्याह की तिथि साधारणतया इस कथन से निर्धारित की जाती है कि 
उसने यहदा के राजा योशिग्याह के दिनों में नबृवत की (१: १) । योशिय्याह 


ने ई. पु. ६४० से ६०६ तक राज किया । यह प्रश्न उपस्थित किया जाता है. 
_ कि इस तीस वर्ष से ऊपर के समय में सपन्याह ने योशिय्याह के धर्म सुधार ः हम 
.. (ई. पृ, ६२२) के पूर्व प्रचार किया अथवा पश्चात्‌ और कि लगभग ई. पू. . / 
६२७ में जो सीथी आक्रमण हुआ, क्या वह नबी द्वारा प्रचारित जागतिक न्याय 


. का तात्कालीन प्रसंग था ? यद्यपि ऐसे प्रश्नों के उत्त र संभाव्यता की ही परिधि 
अभी तक हैं और कदाचित रहेंगे, इतना सामान्यतया स्वीकार किया जाता 


.. है कि सपन्याह ने धर्मसुधार के पहले नबूबत की और कि सीथी आक्रमण उसके . 
.. संदेश का तात्कालीन प्रसंग था । अत: सपन्‍याह की तिथि लगभग ई. पू, ६२७ 
.._._ निर्धारित की जाती है। यह लगभग वह समय था जब यिमेयाह ने अपना  ... 


बूबत कार्य आरंभ किया । लि कम 











इछ४ पुराना नियम की भूमिका 


जीवन संबंधी टिप्पणी 
.. यह बड़े महत्व की बात है कि जिस संपादक ने इस पुस्तक का शीर्षक 


हे । लिखा [ ) उसने सपन्‍्याह के पूर्वजों की चार पीढ़ियों को देकर उसे 
.... हिजकिय्याह से संबंधित किया है। किसी भी छोटे नबी के संबंध में ऐसा नहीं 


हुआ है। यह एक उचित तकंणा जान पड़ती है कि यहां जिस हिजकिय्याह का... 


.. उल्लेख है वह यहुदा का राजा हिजकिय्याह है (ई. पू. ७१५-६८७) । अत 


.. सपन्याह राजपरिवार का था और योशिय्याह राजा का दूर का चचेरा भाई 
. था। वह निसंदेह यरूशलेम का निवासी था। “कक 


धर्म शिक्षा 
इस्राएल की महान नबृवत परंपरा में सपत्याह का स्थान है। यद्यपि वह 


.. अपने संदेश में यहोवा के दिल के प्रकाशनात्मक पक्ष पर विशेष बल देता है 





. तथापि उसका संदेश इस बात में ई. पृ. आठवीं सदी के नबियों के समान है... 


० कि उसने उस दिन को नैतिक लेखाजोखा का दिन भी माता । 






सपन्‍्याह की प्रमुख शिक्षाएं निम्नानुसार हैं 


.... (१) यहोवा का निकट आता हुआ दिन अनिवार्य है और वह जागतिक न्याय... 


... का दिन होगा । पुस्तक की अखंडता मानते हुए यही सपन्याह का प्रमुख... 

... विषय है। अंतिम समय में यहोवा का दिन आएगा (१:६;३:६,११, 
....  २०)। इतिहास की समस्त प्रसामान्य प्रक्रिया के पश्चात्‌ यह दिन 

...... यहोवा का ही कार्य होगा (१: २,३,१४,१५,१७) । सारा जगत उसकी 


...... कार्य-परिधि होगा (१:३) । सपन्याह के दिनों में पलिश्तीन पर जो 
.. आक्रमण हुए उसमें यहोवा के दिन का पूर्वाभास है। इस आक्रमण में वह 


........ .- पलिश्ती नगरों (२:४-७) का विनाश और पड़ोसी जातियों (२ 
.... ८-१५) की पराजय का वर्णन करता है। इस प्रकार सपन्‍्याह द्वारा 


.... यहोवा के दिन का चित्रण प्रकाशनात्मक और ऐतिहासिक दोनों प्रकार 
. का है | 2 


रा है (२) यहोवा अपने अभिप्राय की पूति अपने लोगों के एक अनुशासित तथा शुद्ध... 
... किए हुए शेषांश द्वारा करेगा (३:१३) | इस्राएल में बहुतों के ऊपर 






.. परमेश्वर का कठोर स्याय दण्ड आएगा, परंतू जो दुष्टता के हटाए जाने. 


रा ..... के और अभिमान के दूर किए जाने के द्वारा शुद्ध किए जाकर बचे हुए... । 
2 हैं/(३:- १५१), जो प्रमेशवर पर भरोता करते हैं. (३:१५), वे परमे- : ४ 
१७, और पुनवंसित किए जाएंगे... ०० 





.. श्वर के प्रेम में संजीव किए जाएंगे ३ 

















नस 
3 ज्जजनी, 


सपन्‍्याह हि ... अप 


विशेष अधिकारों में अधिक दायित्व और अधिक न्याय निहित है। निर्वा- 


चित जाति होने के नाते यहोवा के दिन में इस्राएल कठिन दंड की 


प्रत्याशा करे (३: १,२) । 
यहोवा पवित्र और धर्मी है, अतः वह अपने लोगों से पवित्र और धामिक 
जीवन की अपेक्षा करता है (२: ३;३ : ५) । वह आज्ञापालन, धामिकता 
और विनम्रता की अपेक्षा करता है (२: ३) | उनके बीच में रहते हुए 
वह उनको धामिक आचरण का आदर्श है (३: ५) ! 

सपनन्‍्याह में यहोवा का दिन विषय (१: १४-१६) १३ वीं 


ग़ताब्दी के एक प्रसिद्ध लतीनी गीत का आधार बन गया। इसका 


लेखक केलानों का थोमा माना जाता है। उसका शीर्षक है क्रोध का दिन 
([)6 [78८)। उसकी प्रारम्भिक पंक्तियों का अनुवाद कुछ इस प्रकार है : 


क्रोध का दिन, भयानक दिन 

जब संसार मिट जायगा, वह दिन, 

जब सब आकाश लपेटे जाएं, 

सूखे खरें सदृश वे चिमड़ जाएं, 

बताया दिन, संत ओ दर्शी ने, 

दाऊद की वीणा, सिविल की कृति ने | 

















. छिपालीसवां अध्याय 


हाग्ग 
१. शीषक द 
इस पुस्तक का नाम हाग्गे नबी के नाम पर रखा गया है । इसमें हाग्गे नबी 
. के वचन संकलित हैं। इब्नानी नाम हाग्गें का अर्थ है व से संबंधित | 
... (अरबी और उर्दु में 'हज्ज' शब्द से तुलना कीजिए । इस्लाम में हज्ज पव की 


.... यात्रा है)। सेपत्वागिता में इसका शीर्षक अग्गायिओस (&88क०७) है और 
.... वुल्गाता में अग्गेइयस । हिन्दी में इब्रानी नाम हाग्गैं! लिया गया है । आ 


रे 








, विषयन्सामग्री का सारांश 


गा  -्य 2 पश्चात्‌ जो यहूदी लोग मंदिर के पुननिर्माण के लिये आए थे उनके उत्साह वर्धन _ 
.... के लियेये वचन कहे गए हैं। सब वचनों के संबंध में निश्चित तिथियां... 
:./ दीं गई हैं। ० ः मा 
मा ; डरे रूपरेखा 
... हाग्गं--पननिर्माण का नबी 


हा की पुस्तक में हाग्ग नबी की दिव्य वचननमाला हे। बंधघुवाई के. 7 दल 5 कप 


(१) परमेश्वर के भवन को बनाने के लिये उदबोधन (१:१-१५) बा 


रा . . [क) परमेश्वर कहता है कि यह भवन बनाने का समय है (१:१-११) | तिथि 
। ई. पू. १-६-५२० । “क्या तुम्हारे लिये अपने छतवाले घरों में 
रहने का समय है, जब कि यह भवन उजाड़ पड़ा है--तुमने बोया बहुत _ 

परंतु थोड़ा काटा....क्यों ? ....क्योंकि मेरा भवन उजाड़ पड़ा है । 


हा  (ख) लोग मान जाते हैं और हाग्गै उन्हें प्रोत्साहित करता है (१:१२-१५) 


जरुब्बाबेल लोगों का अधिपति था। उसने और लोगों ने जब आज्ञा का 


पालन किया तो हाग्गे ने परमेश्वर की वाणी सुनाई, "मैं तुम्हारे संग 









हा 


.. तुम में से कौन है, जिसने इस भवन की पहली महिमा देखी है ? .... 
यह सच नहीं कि यह तुम्हारी दृष्टि में पहिले की अपेक्षा कुछ भी अच्छा 





(२) भवन की भावी महिमा (२:१-६) । तिथि ई. पू. २९-७-श५२०।.... रा 

















. हाग्ग द के अल 58 बा लि 


नहीं है ? ....तौभी हे जरुब्बाबेल, हियाव बांध....हे यहोश, हियाव बांध _ 
'है सब लोगो, हियाव बांधकर काम करो, क्योंकि मैं तुम्हारे संग हूं, 

सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है ।....इस भवन की पिछली महिमा 

इसकी पहिली महिमा से बड़ी होगी 


(३) शुद्धता और आशिष का संबंध (२:१०-१९) । तिथि ई. पृ. र४- 


९-४ २० | 


(क) याजकीय विधि से तुलना (२:१०-१४) : याजकों का निर्णय यह है कि 


पवित्न वस्तु पास रखने से कोई पवित्र नहीं हो जाता, परंतु अशुद्ध वस्तु 

रखने से अशुद्ध अवश्य हो जाता है। (इसी प्रकार पवित्र भवन बनाने 
से ही कोई पवित्र नहीं हो जाता । परमेश्वर की आशिष प्राप्त करने के 
लिये इससे अधिक की आवश्यकता है ।) 

(ख) आशिष प्राप्ति का रहस्य है परमेश्वर की ओर फिरना (२:१५-१६) : 
भवन की नींव पड़ी । उस समय से तुम मेरी ओर फिरे । इसलिये अनाज 
और फल की उपज अच्छी हुई । (अर्थात्‌ केवल भवन बनाना ही नहीं, 
वरन तुम्हारा परमेश्वर की ओर फिरना और पवित्न जीवन बिताना ही 
तुम्हारी आशिष का कारण है )। आज के दिन से मैं तुम्हें आशिष 
देता रहँँगा ।' द अब हु 
(४) जरूब्बावेल को प्रोत्साहन (२:२०-२३)। तिथि ई.पू. २४-६-४५-२० 
मैं आकाश और पृथ्वी दोनों को कंपित करूंगा, और मैं राज्य-राज्य 

की गही को उलट दूँगा.... मेरे दास जरुब्बाबेल, मैं तुके लेकर अगूंठी के 
.. समान रखूँगा; क्‍योंकि मैंने तुझी को चुन लिया है, सेनाओं के यहोवा 
की यही वाणी 9 का 


४, रचना, रचथिता, रचना तिथि मा 
.._ इस पुस्तक में हाग्ग के वचनों के साथ हाग्गे के विषय भी लिखा है ।यहू . 
संभाव्य है कि किसी संपादक के पास नबी के वचन होंगे, और उनको उसने... 
.क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्यात्मक टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत कर दिया (उदा, १: 
... १,१२:१५; २:१,१०,२०) । हाग्गे की नबूवत केबाद ही यह पुस्तक लिखी... | 
हे . गई होगी । है न मा मा 
का कुछ विद्वानों का विचार है कि पस्तक की मूल ऋमिकता में २:१०-१४ के | द पा 
हर क कारण कुछ अक्रम आ गया है। २:१०-१४ में जो पवित्नता और बशुद्धता के... 
....._ संबंध में याजकीय नियम आ गए हैं उनके कारण इस अंश के पूर्व और इस अंश... 
.... के बाद में आनेगले वर्णनों के बीच क्रम-भंग होता है । साथ ही २:१५ में नबी... 











"० केप्रघ  . .. ४: पुराने नियम की भूमिका 


.. ने जो प्रशंसा की है, वह १:१२-१४ के प्रोत्साहन के साथ संगत जान पड़ती 


... इसलिये अनूमानिक मूलक्रम को बनाने के लिये २:१०-१४ को १:१२-१४५ के 
डा बाद रखा जाता है । इस स्थिति में १:१५ की तिथि--यह दारा राजा के 
हा . दूसरे वर्ष के छठवें महीने के चोबीसवे दिन हुआ --एक पृथक वचन का शीषेक 
.... बन जाता है (२:१४५-१६ का) । 


उपरोक्त क्रम से जिसमें २:१९०-१४ को आगे के पदों से पृथक किया जाता 


.. हैं, इस अंश की व्याख्या का प्रश्न उत्पन्न हो जाता है । यदि इस अंश को 


पृथक न किया जाए, तो २:१४ में “यह प्रजा और 'यह जाति' से यहूदी जाति. 


..... का बोध होता है, जो भवन बनाने के लिये उभारे गए हैं। परंतु यदि २:१०- 


१४ को वर्तमान स्थान से अलग किया जाए और उस पर स्वतंत्र रूप से विचार 


... किया जाए, तो यह माना जाता है कि उससे सामरियों की ओर संकेत होता है । 


.. इस दृष्टि से उसका अर्थ यह होगा कि भवन के बनने के कार्य में सामरियों की 


४. पा | सहायता स्वीकार नहीं करता चाहिये क्योंकि पवित्र यहुदी समाज अयहुदी 






... इस व्याख्या से हाग्गे यहुदी पार्थक्य' का प्रतिनिधि नबी बन जाता है । 


.. समाज को अपनी पविद्वता नहीं दे सकता, और इसके उल्हे यह संभव है कि... द 
. अयहूदियों की अशुद्धता से यहूदियों के कार्य की शद्धता भ्रष्ट हो सकती है। 


यह माना कि बंघुवाई से लौटने वाले यहूदियों तथा अन्य, जिनमें सामरी 


॥ .. भी सम्मिलित थे, के बीच भेदभाव की पुष्ठि नहेम्याह और एज्या के विचारों 6 /! | 
.... . से होती है; परन्तु जिस व्यक्ति ने वर्तमान क्रमकी योजना की है उसके मन _ 


:. में २: १०-१४ की उपरोक्त व्याख्या है ऐसा बोध हमें नहीं होता । हमारे 
..... वबिचार में बतमान क्रम ही मान्य है जिसमें एक उचित व्याख्या प्राप्त पर 


ः - होती है। 


तिथि-इस पुस्तक का संकलन हाग्गे की नंबूबत के बाद ही हुआ होगा 


रा ... हाग्गै के बचतों के लिये असाराधण रूप से निश्चित तिथियां दी गई हैं । इससे 
.. प्रतीत होता है कि ऐतिहासिक भावना बढ़ती जा रही थी, क्योंकि परमेश्वर 
..... की वाणी के क्षण ही मानवीय इतिहास के मूल समय हैं । हाग्गे के समस्त 
.....  आलेखित वचन द्वारा प्रथम हुसतपसिस (ई. पृ. ५२२-४८६) के दूसरे वर्ष में 


ा ः | हा उसे परमेश्वर से मिले | अर्थात वे ई पृ, ५२० में, और वंसत ऋतु के विषव | कै ' 


..._ (ए4णंग्रण्ट] से आरंभ कर छठवें महीने एलूल (अगस्त सितम्बर) में (१:१) 






। ... तिशरी महीने (सितंबर-अक्टूबर) में (२:१) ; और किसलेव महीने (नवंबर- 
दिसंबर) में (२:१०,२०) में थे वचन मिले। महीनों के दिन भी बताए गए ० 





केसलेव के महीने में दो वचन प्राप्त 

















"० आम कक 2 का कि ० 


५. जीवनो संबंधी टिप्पणियां और पृष्ठभूमि 


हाग्गे नबी के व्यक्तिगत जीवन संबंधी कोई जानकारी नहीं मिलती । परंतु 
यदि वह स्वयं को उन लोगों में मानता है जिन्होंने पहिला भवन देखा था 


 (२:३) तो वह सचमुच बूढ़ा व्यक्ति रहा होगा । २: १०-१४ में याजकीय 
_निर्णयों के प्रयोग से यह संकेत होता है कि वह याजक था । परंतु इस त्कंणा 
में बड़ी कठिनाइयां हो सकती हैं । 


हाग्गे और जकर्याह की भी नबवतों के लिये जिन प्रमख घटनाओं से 


ऐतिहासिक वातावरण बनता हे बे निम्नानुरूप 


ई. पृ. ५३७-कुस्र की आज्ञानुसार शेशबस्सर नामक प्रधान के साथ निर्वा- 
सितों का लौटना (५३९-५३०ई. पू.), (एज. १:११) 
ई. पू, ५३७-जरुव्बावेल भवन बनाने का काम आरंभ करता है ; नींव 
भरी जाती है (एज. ३:८, १०) द 
ई. पृ. ५२२-दारा प्रथम हुसतपसिस, कम्बुसिस के बाद राजा होता हैं, 
 (ई, पृ. १३०-५२२) और पहले दो वर्ष विस्तृत विद्रोह दमन में लगाता 
है । राज्य की जड़ जमा लेने पर वह यहूदियों के प्रति वही उदार नीति अप- 
नाता है जो कुल्लू ने अपनाई थी । द 3007 
पृ. ५२०-हाग्गे और जकयोह नवबियों द्वारा प्रोत्साहन पाने पर भवन 
निर्माण का काम आगे बढ़ाया जाता है । 


_ई. पू., ५१६- भवन बनाने का काम समाप्त होता है (एज. ६:१४-१५) द 


६, धार्मिक शिक्षा 


ह हाग्गै का संदेश एक ही आवश्यक कार्य या कतंव्य से संबंधित है, जो... 
उसके काल के लोगों के सामने था। वह कार्य था-परमेश्वर का भवन बनाना।... 
. यह कार्य सर्वाधिक महत्व का था। वह अत्यंत आवश्यक था ।क्योंकि वह... 
. कार्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञा का कायय था। वह भवन इस्राएल पर. 
.. परमेश्वर के प्रकाशन का परमेश्वर द्वारा निर्धारित दृश्य केन्द्रथा ।अतएव 
.. भवन बनाने का अर्थ यह था कि लोग परमेश्वर के प्रकाशन को गंभीरता से. 
.. ग्रहण करते और मानते हैं । नया नियम में जैसे खिस्त में परमेश्वर का प्रका-... 
.. शन प्रकट हुआ है, कुछ उसी प्रकार की भावना पुराने नियम में परमेश्वर के _ रा, 
.... भवन के संबंध में मानी जा सकती है। भवन में मानो परमेश्वर स्थात और 
... समय विज्ेष में लोगों को मिल सकता है। इस प्रकार हाग्ग नबी का बहू... 
..._ संदेश, कि परमेश्वर का भवन बनाना उस समय की प्रमुख आवश्यकता थी, ः ... 














शेईण ... प्राता नियम की भमिका 


. इस चिरंतन सत्य को प्रस्तुत करता है कि हमारे जीवन में परमेश्वर प्रभु 


.._ को उचित स्थान दिया जाना चाहिये, और कि उसका उचित स्थान वही 


7 सकता है । 


४ | जो बाइबल में उसके स्वयं के प्रकाशन के आधार पर ही निर्धारित किया जा 


.... इस कार्य को करने के लिये हाग्गे ने लोगों को प्रोत्साहित किया । इसके 
_ लिये उसने लोगों को अनेक प्रकार से उदबोधन दिया। उसने उन्हें इस बात 
के लिये लज्जित किया कि वे तो स्वयं अच्छे अच्छे घरों में रहते हैं, परन्तु - 
. परमेश्वर का भवन उजाड़ पड़ा है। उसने उनसे कहा कि उन्होंने परमेश्वर की 
. उपेक्षा की इसीलिये भूमि की उपज पर आशिष की कमी है (१:५,६,९-११) । 

.. जब लोग भवन बनाने लगे, तो उसने यह कहकर उन्हें प्रोत्साहित किया कि. 
परमेश्वर उनके साथ है (१:१३,२:५) । जब कुछ लोग निराश होने लगे कि 
. पहिले भवन की तुलना में यह भवन कुछ नहीं है, तो हाग्गे ने परमेश्वर की 


... भावी महिमा की आशा दिलाई (२:९६) । उसने जरूब्बाबेल को यह कहकर... 


५ ज् उत्साह दिलाया कि परमेश्वर की योजना में जरुब्बाबेल का विशेष स्थान 








हक 
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कल कह 5 कद आपका # आन पा 2४36 75 ४२९३४ ४4078 





सेंतलोसवां अध्याय 
जकर्याह 


१. शीषक 


इस पसतक का नास जकर्या नबी के नाम पर है । हारी के समान जकर्या 
भी लौटने वाले बंधुओं को अपना मन्दिर बताने के लिए प्रोत्साहित किया । 
ब्रानी में इसका नाम जकर्याह है जिसका अथ हे 'याह स्मरण करता है । 
सप्तति अनुवाद और बुल्गाता में जकरीअस है। हिन्दी में इन्नानी रूप अपनाया 
गया है । 


२, विषय सामग्री का सारांश 


जकर्याह की पुस्तक में मंदिर के पुननर्निर्माण के समय जकर्या नबी के 
दिव्य वचन और दर्शन हैं । पुस्तक के उत्तराद्ध में वे नबूवतें और प्रकाशित- 


वाक्यात्मक दिव्यवचन हैं जिनमें जकर्याह के समय से पथक परिस्थितियों का 
प्रतिविब है । 


है, ६. रूपरेखा 


जकर्याह-भावी महिमा के दर्शनों का नबी 
(१) जकर्याह के दिव्यवचन और ([ ) 


(क) पश्चाताप के लिए याचना (१:१-६ ) ; यहोवा तुम लोगों के पुरखाओं से 
.... बहुत ही क्ोधित हुआ था.... सेनाओं का यहोवा यह कहता है, तुम मेरी _ 


ओर फिरो.... तब मैं तुम्हारी ओर फिहूंगा। ....अपने बुरे मार्मों से ० 
फिरो। सा मा कप 


.. (ख) यहोवा की योजना के दर्शन (१:७-६:८ ) । जम 
....  (() चार सबारों का दर्शन (१:७-१७) : घाटी के वृक्षों के बीच चार... 
.. सवार खड़े हैं। आगेवाला लाल घोड़े पर, उसके पीछ लाल और सुरंग... 

....॑. और ख्वेत घोड़ों पर । वे परमेश्वर की ओर से गश्त लगाने वाले हैं और 57. 

... फिर समाचार देते हैं, 'हमने पृथ्वी पर सैर किया है, और क्या देखा कि 
.. सारी पृथ्वी में शान्ति और चैन है! । (अर्थात अभी समय नहीं आया, 








5 इंद्र 


... जो यरूशलेस और यहुदा के नगरों पर क्रोधित है, तू कब तक उन्त पर 
.. दया न करेगा ? इसका उत्तर यह मिला, 'मुझे यरशलेम और सिय्योन 


. प्राना नियम की भूमिका _ 


पर आने वाला है) । यहोवा के दूत ने पुछा, है सेनाओं के यहोवा, तू 


के लिये बड़ी जलन हुई है । 


. (7) चार सींग और चार लोहार (१:१८-२१) : चार सींग दिखाई 
दिये, जो वे सशक्त जातियाँ हैं जो यहुदा वे विरुद्ध हैं। तब उन सींगों 


को नष्ट करने के लिये चार लोहार आते हैं। वे यहोवा की ओर से दंड 


... के साधन हैं। या द 
_ (॥) हाथ में नापने की डोरी लिए हुये एक दृत (२) : यरूशलेम को 


 नापने के लिए एक परुष हाथ में तापने की डोरी लिए हुए है । एक दूत 


.. ने दूसरे दूत के द्वारा उस पुरुष के पास संदेश भेजा कि यरूशलेम 
.... शहरपनाह के बाहर-बाहर ही बसेगी। यहोवा की यह वाणी है, 'में आप 
.. उसके चारों ओर आग की सी शहरपनाह ठहरूंगा, और उसके बीच में 

. . लेजोमय होकर दिखाई दूगा' (२:१-५) 







हे बाबुल जाति के साथ रहने वाली, सिय्योन को बचकर निकल भाग-है 
.. सिय्योन, ऊँचे स्वर से गा और आनंद कर, क्योंकि देख मैं आकर तेरे बीच 


निवास करूंगा, यहोवा की यही वाणी है (२:६-१३ ) 


छा हा ( २ ) यहोश महायाजक जिस पर स्वर्ग की सभा में अभियोग लगाया 


गया है, मुक्त किया जाता है (३) यहोवा अभियोगी (शैतान) को यहोशू 


शी के संबंध में डॉटता है। क्या यहोश आग से निकाली हुई लकुटी के समान ; 


... हहीं है! ? अर्थात क्या बंधुआई की आग में से निकला हुआ पुरोहित नहीं 


..... है? यहोशू के मैले वस्त्र उतारे जाते हैं, सुन्दर वस्त्र पहिनाए जाते हैं, 
.. .... उसके सिर पर याजक के योग्य शुद्ध पगड़ी रखी जाती है, और उसे भवन 
.. में आने जाने का अधिकार एवं कतंव्य सौंपे जाते हैं। एक पत्थर पर 

... जिस पर सात आंखें बनी हैं, उसे खुदी हुई प्रतिज्ञा दी जाती है, 'मैं अपने 


,.॑.. दास शाख (डाली) को प्रकट करूंगा । 


..._ (५) दीवट और जलपाई के दो वृक्ष (४) : सात शाखोंवाला एक दीवट 
..... है। उसका कठोरा उसकी चोटी पर है जिसमें जलूपाई का तेल है। उस 
.. कटोरे में जलपाई के दो वृक्षों की शाखाओं से तेल आता है। वक्ष कटोरे 





नमप्सससण मम प 59 2... 77 


अनरसरकप>> पतन २७- 2: पक रस कम 2 धन थम कम 3 हल 8 280 ०: मेड हक ८ मम  टय .8 सप  कर म8/ 7% पी अप ४ हक आओ आ> 2 हर 2 20722 5:78 725: कपल जप मिमी कम ण अ आ 


. ... की दोनों ओर हैं। (४:१-४) । जरूव्बाबेल के संबंध में यहोवा का यह. रा 















[ दिया जाता है : न तो बल से 
द्वारा होगा, भुझ सेनाओं के यहोवा का 








शक्ति से, परंतु मेरे आत्मा के / ७-7 | हा 
बचेन: हैं । यह आखासन 5 5 











_(थं) उड़ता हुआ पत्र (५:१-४) : एक विशाल पत्र उड़ता 





जंकर्याह - ः -१ 7 


दिया जाता है कि जरुब्वाबेल यहोवा के भवन का निर्माण पूर्ण करेंगा- 


'किसने छोटी बातों का दिन तुच्छ जाना है ? यहोवा अपनी आँखों से 
सारी पृथ्वी पर दृष्टि करके साहुल को जरुब्बाबेल के हाथ में देखेगा, 


और आनंदित होगा (४:५-१० ) | सात बत्तियां यहोवा की आँखें हैं जो... 
सारी पृथ्वी पर दृष्टि करती हैं और जलपाई के दो व॒क्षों की दो डालियां 


हें वे 'तेल से भरे हुए (अभिषिक्‍त) वे दो पुरुष हैं जो सारी पृथ्वी के. 
परमेश्वर के पास हाजिर रहते हैं! (४:११-१४) । द 


आ देख 
पड़ता है, जो चोरों और शपथ खानेवालों को खोजता रहता है। उस 
पत्र में शाप है, जो सारे देश पर आनेबाला है । 


(घा) एपा-माप के बीच बंठी हुई स्त्री (४:५-११) : एक स्त्री, दुष्टता 

एक एपा (दाना मापने का पात्र ) में दबी हुई है। वह शिनार देश को ले 
जाई गई जहाँ उसकी पूजा की जायगी | गए 

(श्र) चार रथ (६:१-८) : पीतल के दो पहाड़ों के बीच से चार रथ 
निकले । उनमें लाल, काले, श्वेत और चितकबरे बादामी घोड़े हैं। वे 
पृथ्वी का गएत लगाने जाते हैं | उत्तर की ओर (काले घोड़ों का रथ), 
पश्चिम की ओर (श्वेत), दक्षिण की ओर (चितकबरा) । यह शब्द 


आता है कि “वे जो उत्तर देश की ओर जाते हैं, उन्होंने वहाँ मेरे प्राण 
को ठंडा किया कु 


/शई ५्छाु 


शाख (डाली) को प्रतीकात्मक रूप से मुकुट पहिनाना (६ : ६-१५) 


. यहोवा जकर्याह्‌ को आज्ञा देता है कि कुछ लोगों से जो बाबुल से आकर 


उत्तरे हैं सोना चांदी ले और भकट बनाकर उन्हें यहोश महायाजक 


.. (जरूब्बाबेल) के सिर पर रख | और उससे यह कह, 'ेनाओं का 


. यहावा यों कहता है, उस पुरुष को देख जिसका नाम शाख (डाली) 
. है....बही यहोवा के मंदिर को बनाएगा....अपने सिहासन पर विराज- ले 
मान होकर प्रभुता करेगा। उसके सिंहासन के पास एक याजक भी .. 

_ रहेगा और दोनों के बीच मेल की सम्मति होगी । और वे मुकुट ,... - 
. मन्दिर में स्मरण के लिये बने रहें। 


_ बैतेल से एक प्रतिनिधि मंडल (७ : १-८. : २३) " जा 
.... (+) करतंव्य संबंधी प्रश्न (७: १-३) : बेतेलवासियों का एक 
.... प्रतिनिधिमंडल इसलिये भाया कि यहोवा से विनती करें और याजकों 

..._ से पूछें कि क्या हम पांचवें महीने जैसा निर्वासनकाल में उपवास करते... 




















(कक) 


पुराता नियम की भूमिका 


. रहे हैं, इस समय भी वसा हो करे (मंदिर के विनाश की स्मृति में 
. उपवास किया जाता था) और सातवें महीने का भी उपवास रखें 
. (गदल्याह के मारे जाने की स्मृति में उपवास किया जाता था ) ? 


.. (7) जकर्याह का उत्तर (७: ४-१४) : जकर्याह ने एक प्रश्न के 
. द्वारा उत्तर दिया, जब वे इन सत्तर वर्षों के बीच पांचवें और सातवें. 
.. महीनों में उपवास और विलाप करते थे तो क्या सचमुच मेरे (यहोवा) 
के लिये करते थे! ? तब वह पूर्ववर्ती नबियों के वचनों का स्मरण उन्हें 
कराता है, खराई से न्याय चुकाना....कृपा और दया से काम करता.... 





न अपने अपने मन में एक दूसरें की हानि की कल्पना करना । 


... (४४) यहोवा की ओर से वचनावलि (८) : 'सेनाओं का यहोवा यों. 


ता है: सिय्योन के लिये मुझे बड़ी जलन हुई...मैं सिय्योत में लौट 


... आया हूँ... नगर के चौक खेलने वाले लड़के लड़कियों से भरे रहेंगे 
.... मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा, यह सच्चाई और धर्म के साथ होगा ।..... 
.... तुम मत डरो, न तुम्हारे हाथ ढीले पड़ने पाएं....अब शांति के समय 
.. की उपज फला करेगी, और पृथ्वी अपनी उपज उपजाया करेगी, क्योंकि 


... मैं इस प्रजा के बचे हुओं को इन सब का अधिकारी बना दूंगा । 


.... उपवास के दिन....यहुदा के घराने के लिये हर्ष और आनंद और उत्सव... 
.... ./.  क्रेपवों के दित हो जांएमे; इसलिये तुम सच्चाई और मेल मिलाप से... 
..... प्रीति रखो ।....उन दिनों में भांति भांति की भाषा बोलने वाली सब. 
...  जांतियों में से दस मनुष्य एक यहूदी पुरुष के वस्त्र की छोर को यह _ 


..... कहकर पकड़ लेंगे कि हम तुम्हारे संग चलेंगे, क्योंकि हमने सुना है कि 







_(ख) यहोवा अपने लोगों के लिये लड़ता है 


| . परमेश्वर तुम्हारे साथ है ।... 
(२) मसीह की विजय के दिव्यवचन (६-११) 


विजयी मसीह आता है (६ : १-१२) : इख्राएल के शत्रु लज्जित किए _ 
_..  जाएंगे। है सिय्योन की बेटी, बहुत ही मगन हो....क्योंकि तेरा राजा 
...... तेरे पास आएगा वह धर्मी और उद्धार पाया हुआ है, वह दीन है, और 
..... गदहे पर नहीं, वरन गदही के बच्चे पर चढ़ा हुआ आएगा | मैं एप्रैम के... 
.. ... रथ और यरूणशलेम के घोड़े नाश करूंगा....है आशा धरे हुए बंदियों, गढ़... 
.... की ओर फिरो ।...मैं तुमको बदले में दूना सुख दूगा ।. द 





| तलवार सा कक कर दूगा 












(६:१३-१७) : मैं सिय्योन के... 
विरुद्ध उभारुंगा, और उन्हें वीर. 
[का परमेश्वर यहोवा उनको 








(ग) 
.. कहने वाले कूठा दर्शन देखते हैं । 


(घ) 


(के 





अपनी प्रजारूपी भेड़बकरियाँ जानकर उनका उद्धार करेगा; और वे 
मुकुटमणि ठहरके, उसकी भूमि से बहुत ऊ थे पर चमकते रहेंगे । 


यहोवा वर्षा का देने वाला है (१०: १-२) : यहोवा से वर्षा मांगों... 
और वह उनको वर्षा देगा...गृहदेवता अनर्थ बात कहते और भावी 


विजय और घर लौटना (१० : ३-१२) : यहोवा अपने कुण्ड का हाल 
देखने को आएगा. ..उसी में से कोने का पत्थर, खूंटी, युद्ध का धनुष . . 
सब प्रधान प्रकट होंगे...वे लड़ेंगे क्योंकि यहोवा उनके संग रहेगा....मैं 
उन्हें मित्र देश से लौटा लाऊंगा (प्तोलेमी राज्य) और उन्हें अश्श्र से 
इकट्ठा करूंगा (सेल्यूकी राज्य ?) । 


पराजित अत्याचारी के लिये विलाप (११: १-३) : है सनौवरो, हाय 
हाय करो । क्योंकि देवदार गिर गया है....हेवाशान के बांज वृक्षों । 
हाय हाय करो, क्योंकि अगम्य वन काटा गया है । 


यहोवा के अच्छे मेषपाल का तुच्छ गिना जाना (११: ४-१७) : यहोवा 
नबी से कहता है, बात होने वाली भेड़ बकरियों का चरवाहा हो जा। 
....उनके अपने चरवाहे उन पर कुछ दया नहीं करते' । इसलिये नबी ते 
दो लाठियां लीं; एक का नाम अनुग्नह रखा, और दूसरी का नाम एकता 
और भेड़ बकरियों को चराने लगा । उसने उनके तीनों चरवाहों को 
नाश किया । तब नवी ने कहा, परंतु में उनके कारण अधीर था, और 
वे मझभ से घणा करती थीं । तब मैंने उनसे कहा, मैं तुमको न चराऊगा 


. मैंने वह लाठी तोड़ डाली, जिसका नाम अनुग्नह थां कि जो बाचा 


.. नबी सृढ़ चरवाहे के हथियार लेता है “हाय उस निकम्मे चरवाहे परजो का 
भेड़ बकरियों को छोड़ जाता है ला 


मैंने अन्य जातियों के साथ बांधी थी उसे तोड़ (व्यापारियों ने) मरी 
. मजदूरी में चांदी के तीस ठुकड़े तौल दिए तब मैंने (यहोवा की आज्ञान 


_नुसार) उन तीस दुकड़ों को लेकर यहोवा के घर में फेंक दिए 


: तब उसने अपनी दूसरी लाठी, जिसका नाम एकता था तोड़डाली कि... 
. मैं उस भाई चारे के नाते को तोड़ डालूँ जो यहुदा और इस्राएन के बीच... 


हट # 


(३) अंतिम दिनों संबंधी दिव्यवचन (१२-१४) 


.. (क) विजय, विलाप, शुद्ध करना (१२: १-१३ £) 














"हल द द कक पराना नियम की भूमिका 


विजय : यहोवा यों कहता है,''''*** देखो में यरूणलेम की चारों ओर की क्‍ 


सब जातियों के लिये लड़खड़ा देने के मद का कटोरा ठहरा दूँगा" मैं उसे 


.. मंब जातियों के लिये इतना भारी पत्थर बनाऊँंगा, कि जो उसको उठाएंगे, वे 
बहुत ही घायल होंगे''*''"“मैं यहुदा के अधिपतियों को ऐसा कर दूंगा, जैसी 
लकड़ी के ढेर में आग भरी अंगीठी"' “यहोवा पहले यहदा के तंबओं का 
उद्धार करेगा"और उस समय उनमें से जो ठोकर खाने वाला हो वह दाऊद के 


.. समान होगा, और दाऊद का घराना परमेश्वर के समान होगा, अर्थात यहोवा 


... के उस दूत के समान जो उनके आगे आगे चलता था (१२: १-६) | 


अनुग्रह और बिलाप : 'मैं दाऊद के घराने और यरूशलेम के निवासियों 


क्‍ हे .. पर अपनी अनुग्रह करने वाली और प्रार्थना सिखाने वाली आत्मा उ 'ड्रेलुगा 
.. तब वे मुझे ताकेंगे, जिसे उन्होंने बेधा है, और उसके लिये ऐसा रोयेंगे जेसे 
.. एकलौते पुत्र के लिये रोते-पीटते हैं''"''"'उस समय यरूशलेम में इतना रोना- 


.. पीठना होगा जैसा मगिद्योन की तराई में ह॒दद्विम्मोन में हुआ था (१२: १० 


... शुद्धता : “उसी समये"पाप और मलिनता धोने के निमित्त एक बहता हुआ 





.... सोता होगा'"'उस समय हरएक भविष्यवक्ता भविष्यवाणी करते हुए अपने-अपने 


. दर्शन से लज्जित होंगे, और धोखा देने के लिये कंबल का वस्त्र न पहिनेंगे! .. हक 


पर | 


तू उस चरवाहे को काट, तब भेड़ बकरियां तितर बितर हो जाएंगी 


.._ बची हुई एक तिहाई उसमें बनी रहेगी"““उस तिहाई को मैं आग में डालकर 


पी ऐसा निर्मल करूँगा, जैसा रूपा निर्मेल किया जाता है' (१३ : ७-६) । 


. (ख) प्रकाशनात्मक युद्ध और निष्पत्ति या पूर्णता (१४ ) : मैं सब 


जे जातियों को यरूशलेम से लड़ने के लिये इकट्ठा कहूंगा * * * नगर के आधे 
_.... लोग बंधुआई में जाएंगे * * * तब यहोवा निकलकर सब जातियों से लड़ेगा * " 
.... तब जलपाई का'पव॑त पूरब से लेकर पश्चिम तक बीचोंबीच से फट जायगा ** * 


। हा तुम ऐसे भागोगे जैसे उस भुईडोल 
.. उज्जिय्याह के दिनों में हुआ था । 





बिक 


डर से भागे थे जो यहुदा के राजा 


_... उस समय ** * लगातार एक ही दिन होगा * * * सांझ के समय उजियाला 
होगा * * * यरूशले लि मे से बहता हुआ जल फूट निकलेगा ' ' * तब यहोवा सारी 
पृथ्वी का राजा होगा * * * तब जितने लोग 










यरूशलेम पर चढ़नेवाली जातियों रा 
नाओं के यहोवा को दंडबत करने. 





























जकर्याह . हा | कं | . ३६७ रे 


और फोंपड़ियों का पर्व॑ मनाने जाया करेंगे * * * उस समय घोड़ों की घंटियों 
पर भी लिखा रहेगा, “यहोवा के लिये पवित्र 


४ रचना, रचयिता, तिथि 


मत्ती २७ : € में जकर्याह ११ : १२-१३ पदों के लिये कहा गया है कि 


बहू बचन यिर्मयाह भविष्यवक्ता के द्वारा कहा गया। विचित्र बात हे। 
एक संभव स्पष्टीकरण यह है कि पहले सुसमाचार लेखक ने याद रखनम 
_ भूल की । दूसरा स्पष्टीकरण यह है कि जकर्याह की पुस्तक के उत्तराद्ध में जो 


दिव्यवचन हैं उनके और इन पदों के रचयिता के संबंध में मतभेद हैं। इस 
समस्या को सुलभाने के प्रयास से प्रारंभ कर, विद्वानों में साधारणतया यह 
माना जाता है कि पुस्तक के उत्तराद्ध (अध्याय ६-१४) में ऐसी राजनीतिक 


77 


परिस्थितियों का प्रतिबिव है, जो जकर्याह नवी के युग की परिस्थितियों से 


भिन्न हैं, क्योंकि जकर्याह नवी ने हाग्ग के समान, विशेषकर मंदिर के पुर्नानिमाण 


के विषय ही संबोधन किए हैं। १०: १०-११ में मित्र और अश्शूर के 
विद्यमान रहने का संकेत है। इससे निर्वासन पूर्व तिथि की व्यंजना होती है। 
परंतु & : १३ में यूनान का उल्लेख है। जिससे ई. पू. ३३१-१६४ का समय 


व्यंजित होता है। इनकी एक संगति इस प्रकार बैठाई जाती है कि मित्र और 


अश्शरी को प्तोलेमी के मिस्र और सेल्यूकी के अराम का संक्षिप्त पर्याय माना _ 


. जाए। अतः जकर्याह ६-१४ को सामान्यतया युतानी काल का माता जाता 
है, और १-८ को फारसीकाल में (ई. पू. ५१७-३३१) मंदिर के पुनरतिमाण 


काल का माना जाता है 
जकर्याह १-८ की तिथि दारा राजा के दूसरे वर्ष (१: १) से चौथे वर्ष 


(७: १) के बीच रखी जाती है, अर्थात ई. पृ. ५९० से ५१८ के बीच । नबी. 
के दिव्य वचन और दर्शन इस समय या इसके बाद ही लिखे गए होंगे । कर 


जकर्याह ६-१४ की तिथि का निर्धारण अधिक कठित है | यूनानी काल... 

में (ई. पृ. ३११-१६४) सीरख की पुस्तक की तिथिई. पू. १८० है। इस... 
समय तक बारह की पुस्तक, जिसमें जकर्याह की पुस्तक सम्मिलित है, प्रामा- 

.._ णिक धर्मशास्त्र स्वीकृत हो चुकी थी। अतः ई. पृ. १८०० के पूव यह पुस्तक (24. 

. लिखी जा चकी थी। तिथि के संबंध में अधिक विशिष्ट सुझाव निम्नांकित..... 

.. है; (१) ई. पू. ३३३ में इस्सुस नामक स्थान में सिकंदर महान की विजय के _ आल 

... तुरंत बाद ; (२) सिकंदर के उत्तराधिकारियों के आपसी युद्ध के समय (ई. 

«पृ. ३२३-२७८); (३) प्तोलेमी शासकों का काल (ई: पू. ेवपेपहैद)। 

(४) अंतिओकुस तृतीय (ई. पृ: २१८-२१७) द्वारा प लिएतीन पर आक्रमण के रे रा 














० इंद्प क्‍ ४ का ह पुराना नियम की भूमिका 


... समय; (५) सीरख की तिथि की उपेक्षा करते हुए कुछ विद्वान इसकी तिथि 
...  मकाबी युद्ध (ई. पृ. १६७) के समय रखते क्‍ 
यह मानते हुए कि सीरख की तिथि इसकी तिथि के निर्धारण में महत्व- 
..॑. पूर्ण है और बारह की पुस्तक के प्रामाणिक धर्मशास्त्र स्वरूप स्वीकृत होने 
.. में कुछ समय लगा होगा, हम जकर्याह की पुस्तक के ६-१४ अध्यायों की तिथि 
.. मोटे रूप से ई. पु, ३००-२५० के बीच निर्धारित कर सकते हैं । विभिन्न दिव्य 
. बचन इंस अवधि में भिन्न भिन्न समय आए होंगे । 


५. जकर्याह की पुस्तक में समस्याएँ 


हे (१) क्या जरुब्बाबेल मसीह है ?!--जकर्याह नबी के दर्शन, भवन के 

..._ पुन्तिमाण के ऐतिहासिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरण के संदर्भ में समझे जा 
..- सकते हैं | यहूदी विश्वास तथा जीवन-पथ की पुनर्स्थापना का प्रमुख भाग यही 
.... कार्य था । इसमें मसीह सम्मत यग के उदय के रूप में यहोवा के वचन की 
... परिपूर्ति की आशा सम्मिलित है। कई दर्शनों से यह प्रकट होता है कि यहोवा 







नेता मात्र मानता था, अथवा वह उसे वास्तव में चिर-प्रतीक्षित मसीह मानता 


.. अपनी उत्कृष्ट योजना कार्यान्वित कर रहा है, चाहे फिर निराशा के गतें में 
पड़े हुए लोगों को यह दृष्टिगोचर न हो ! इस योजना में जरुब्बाबेल का महत्व-... 
...पर्ण स्थान था । कया जकर्याह जरुब्बाबेल को यहोवा द्वारा नियुक्त एक लोक- ४. 


. था ? यहोशू महायाजक को बताया जाता है कि मेरा दास शाख' (डाली) 


... आने वाला है (३:८) । उस दास और जरूब्बाबेल को दो अभिषिक्त जन 
..... (४:१४) माना जा सकता है । वे दोनों प्रभु के अनुग्र यम हैं जिनसे 
.... यहुदी समाज (दीवट) को यहोवा जीवन पहुँचाता है १२-१३ में शाख 
..... (डाली) अर्थात, मसीह को ऐसा प्रस्तुत किया गया है कि वह यहोवा 
-... मन्दिर को बनाएगा, और महिमा पाएगा, और अपने सिहासन पर विराजमान 
.... होकर प्रभुता करेगा। उसके सिहासन के पास एक याजक रहेगा । पाठ में कुछ 
..॑._ गड़बड़ी है, क्योंकि नबी को आदेश दिया जाता है कि वह यहोशू महायाजक के _ 
... सिर पर मुकुट रखे [ ) ।साथ ही 'शाख को याजक से पृथक माना 
..... गया है (६:१३) । इसलिए कुछ विद्वाव यह विचार करते हैं कि यहोसादाक 


का पुत्र यहोशू' (६:११) मुलरूपेण 'जरुब्बाबेल' था। यदि यह संशोधन 


.._ स्वीकार किया जाये तो जकर्याह नबी को यह आदेश मिला कि राजा-मसीह _ 
.... . के रूप में जरुब्बाबेल को मुकुट पहिनाया जाए, और यहोशू उसका सहायक 
. महायाजक माना जाए। यह स्थिति जरुब्बाबेल को यहोवा का दास' (दे 





रैक ) और यहोवा की “अंगूठी (हाग्ग २ :२३) मानने से सुसंगत जान | 

















जकर्याह ५ कर है ३६९. 


यह भी अनुमान किया जाता है कि जब २: १-४ में जकर्याह यरूशलेम 
के शहरपनाह के बाहर बसाए जाने के दर्शन की व्याख्या करता है, तो वह 





जरुव्बाबेल के यरूशलेम की शहरपनाह के बनाने के कार्य को ठीक कर रहा... 


था। शहरपताह बनाने का कार्य साधारणतया राजा के कार्य से संबद्ध था। _ 
यथाथ मे, दारा प्रथम ने जरुब्बाबेल की नियुक्ति अधिपति के पद पर की. 
थी । परल्तु संभव है कि मसीह सम्मत राज्य की स्थापना की आशा इस समय 
.. बहुत तीब्र हो गई हो (दे. नहे. ६:७) । जरूब्बाबेल ने राजा के अधिकारों 
_ को ले लिया था, कदाचित इसीलिए फारसी शासकों ने उसे अलग कर दिया 

. और परिणामस्वरूप इतिहास में वह विलीत हो गया। इस मान्यता के 
अनुसार, जकर्याह ने भल से मसीह के रूप में जरुब्बाबेल पर अपनी आशाएँ 
लगा रखी थीं | इसीलिए जकर्याह को अपूर्ण आशाओं का नबी भी कहा 
जाता है । 

इसके विपरीत जरुब्बाबेल के संबंध में यह विचार किया हो कि वह उसके 
युग में मसीह सम्मत कार्य को पूर्ण करने वाला है, और इसलिए उसे मसीह के. 
पदों से विभ्षित करना चाहिए | इसमें शंका नहीं कि नबी की मसीह सम्मत 
आशाएं जरुब्बाबेल के कार्य तक सीमित नहीं थीं, क्‍योंकि वह आध्यात्मिक 
राज्य की भी प्रतीक्षा कर रहा था (४:६; २: १-५) | अन्य नबियों के 
समान, उसका संपूर्ण दृष्टिकोण उसके काल की ऐतिहासिक घटनाओं से परे 
था, यह मानते हुए भी कि ये घटनाएं अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं । यद्यपि ऐतिहासिक 
.. घटनाओं की किसी रूप में पुनरंचना के कारण जकर्याह जरूब्बाबेल के नेतृत्व 
.. की कुछ बातों से निराश हुआ, परंतु अपने संदेश के विस्तृत संदर्भ और दुष्ठि- 

कोण में वह निराश नहीं हआ। वह संदेश और दृष्टिकोण परमेश्वर की ओर 

से वचन के रूप में आगामी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहा 


(२) अयहृदियों के प्रति जकर्याह की भावना--एजा और नहेम्याह की _ 


| पुस्तकों से यह विदित होता है कि यरूशलेम को लौठे हुए बंधुओं ने पुननिर्माण गा 


. के कार्य में अपने पड़ौसियों से सहायता लेना स्वीकार न किया (एज, : १-६, 


. १०; नहे. ४: २) | पड़ौसियों से बिलकुल पृथक जाति रहने की भावना उन्होंने हे का 
 अपनाई (नहे. १३: २३-३०; एज. १०) । इन पड़ौसियों में शोमरोनी लोग 


थे (एज. ४:१०; नहे. ४:२) 


बेतेल से आने वाले प्रतिनिधि मंडल को उपवास के सम्बन्ध में जकर्याह 


| . नेजो उत्तर दिया (७: १-१४) उसे कुछ विद्वान उत्तर के निवासियों को-- हे | । 
..... मोठे रूप में शोमरोनियों को--भिड़की जैसा मानते हैं, मानो नबी कह रहा. || 
..॑. है कि तुम्हारे उपवासों का कोई महत्त्व नहीं हैं क्योंकि तुम्हारा धर्म व्यवस्था- _ रा. 











हक . पुराना नियम की भूमिका. 


. नुकूल नहीं है; तुम्हें वैसा अच्छा जीवन बिताना चाहिए जैसा तुम्हें प्व॑वर्ती 
नवियों ने बताया था । इस प्रकार हाग्गे (दे. हा. २: १०-१४) के समान 


..._ जकर्याह भी यहुदी पृथकतावाद का 'एक प्रमुख प्रवतेक माना जाता है। 


हे इसके विपरीत, यह स्पष्ट नहीं है कि जकर्याह का उत्तर बेतेल के लोगों _ 


। क्‍ क्‍ को भिड़की है। उस उत्तर को हम इस रूप में भी समझ सकते हैं कि वह 


सच्चे विश्वास के मूल तत्वों को मानने के लिये प्रबोधन था। यह भी स्पष्ट 
. नहीं कि बेतेल के लोगों को उसी श्रेणी में रखा जाय जिसमें शोमरोन के लोगों 


के को, क्योंकि बेतेल के लोग आध्यात्मिक निर्देशों के लिये यरूशलेम आते थे । 


.. इसी प्रकार, हाग्गे की पुस्तक के उस अंश की जिस पर उपरोक्त मान्यता 
आधारित है, दूसरी व्याख्या भी की जा सकती है (देखिये हाग्गे के अन्तर्गत 


/ ० 


पा विचारबिन्दू ४) । हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जकर्याह्‌ और हाग्ग दोनों 


. ही महान नबूवतात्मक परंपरा के अंतर्गत हैं। सभी नबी किसी मात्रा में पृुथकता- _ 
_ वादी हैं। उतनी पृथकता सच्चे विश्वास की अद्वितीयता के रक्षण के लिये 


.... आवश्यक थी । जकर्याह और हाग्गे दोनों उस मात्रा से अधिक पृथकतावादी 





.. नहीं माने जा सकते । 


..._ ६. जकर्याह नबी के संबंध में जानकारी 


जकर्याह के व्यक्तित्व के संबंध में केवल. इतनी जानकारी मिलती है कि 


४ रा वह इद्दों का पोता (१:१) अथवा उसका पुत्र था (एजू.५:१) । यदि इहो कोई का 


....__याजक था जो जरूब्बाबेल के साथ बाबुल से यरूशलेम लौटा (नहे.१२:४), तो 
...._ जब जकर्याह नबूवत करने लगा तो वह आयु में छोटा रहा होगा । इसके विप- 
....  रीत॑, यदि इढद्दो किसी याजकीय परिवार या गोत्र का नाम था (नहे.१२:१६ ) 
.... तो जकर्याह बंधुआई से लौटने वालों में उस गोत्न का प्रतिनिधि होगा। उसका 
..... नबूवत कार्य उसी समय आरंभ हुआ जब हाग्ग का हुआ, और उसकी अवधि दो 
.... बंषे रही (ई. पू. ५२०-५१८) | प्रतीकात्मक क्रियाओं के प्रयोग से (६:६-१५) 
....... यशायाह, यिर्मयाहु और यहेजकेल से पू्ववर्ती नबियों का स्मरण हो जाता 
... है; परंतु संदेश के लिये ऐसे दर्शनों के प्रयोग में, जिसमें दूत द्वारा व्याख्या की ._ 
... जाती है (१:६;४:१) आगामी युग के प्रकाशनात्मक साहित्य की शैली का पूर्व 
....... परिचय मिलता है जे ; द 





७. धर्म शिक्षा 











.... जकर्याह की पुस्तक के प्रथम भांग ्ओ 
प्रमुख शिक्षाएं निम्नलिखित हैं ; 























जुकयाहिं, 7. 7 7 इ७१ 


(१) यहोवा का अपने लोगों के मध्य रहना सर्वोत्तम महत्व की बात है। 
हाग्गे के समान, जकर्याह ने भी अपनी जाति के लोगों को मंदिर बनाने के लिये 


प्रोत्साहन किया (४:६;३:१३,१५;८:३) । माना कि यह कार्य भौतिक और 
पाथिव व्यवस्था के अंतर्गत था। पत्थर काठने वालों और राजों का कार्य था, फिर. 


भी वह प्रकाशित धर्म के सनातन सत्यों से भी संबंधित था | कारण यह था कि. 


_ जिस परमेश्वर ने अपने को काल और स्थान विशेष में प्रकाशित किया था 


वह शाश्वत और सत्य परमेश्वर है। उसकी प्रकाशित इच्छा के अनुरूप हमारे 
मध्य उसके लिये निवास स्थान बनाना, हमारे उच्चतम विश्वास एवं कत्तंव्य की 
अभिव्यक्ति है । 


(२) अपने शुभ अभिप्राय में परमेश्वर सतके और यत्नशील है। जकर्याह 


ने अपना संदेश उन लोगों को दिया जो जीवन की कठिन परिस्थितियों के कारण 


हताश थे (८5:१०) ; और परमेश्वर की सामर्थ के प्रति शंका करने की स्थिति 
में थे। अपने दशशनों के द्वारा उसने ऐसा उत्तर दिया जो उनके लिये अत्यंत 
आवश्यक था । फारसी भेदियों तथा सैनिक अध्यक्षों के समान, जो साम्राज्य 
शासन में राजा के कार्यकर्ता थे और जो सदा सजग रहते थे, परमेश्वर के 
दूत भी गश्त लगाते हुए पृथ्वी का निरीक्षण करते हैं (१:८-१७; ४:१०; ६:४- 
८) और उसके कार्यकर्ता उसकी इच्छा को कार्यान्वित करते हैं (१:१८-१७; 
६:१-८) । परमेश्वर अपनी योजना को व्यावहारिक रूप देता चलता है 
(२:१-५,६-१३) और अपने लोगों की चिता करता है (२:६;८:१-८) 


(३) परमेश्वर यह चाहता है कि हृदय से नेतिक आचरण करें। उसे वे 
उपवास प्रिय हैं जो उसके लिये रखे जाते हैं (७:५) और जिनके साथ सदाचरण 
भी है (७:६) । जकर्याह ई. पू. आठवीं सदी के तबियों के बचनों को इन शब्दों 


में प्रतिध्वनित करता है, 'खराई से न्याय चुकाना, और एक दूसरे के साथ कृपा. 
और दया से काम करता, न तो विधवा पर अंधेर करता, नअताथों पर, न... 
_ प्रदेशी पर; और न दीन जन पर, और न अपने अपने मन में एक दूसरेकी 
हानि की कल्पना करना' (७:६-१० ; दे.5:१६) । मसीहसम्मत राज्य आने की. रे 

. एक शर्तं यह है कि पाप से शुद्ध हों (३:९६) । पाप को दूर करने के लिये... 
.. उसकी पूरी खोज की जायगी (५:१-४) और वह दूर किया जायगा (५:४- 





... (४) परसेश्वर के लिये सब कुछ सम्भव है । वह अयोग्य लोगों का भी... 
.... उपयोग करता और उन्हें समर्थ करता है यहोशू याजक के पद के अयोग्गय था। 
..._ परंतु उसकी अयोग्यता दूर की जाती है,और वह परमेश्वर की बुलाहट के अनुसार 








हम . पुराना नियम की भूमिका. का 


.._ शुद्ध किया जाता है (३:१-५)। मनुष्य जिसको तुच्छ जानता है परमेश्वर उसे 
.. मुल्यवान बनाकर उससे अपने अभिप्राय की पूर्ति कराता है (४:१०) । 


(५) जकर्याह ने मसीह सम्मत युग की आशा का समर्थत किया । उसने 


..॑. अपने लोगों को उभारा कि वे उसे समय की प्रभु द्वारा दी गई प्रतिज्ञा पर 


आस्था रखें जब इस्राएल दंड के माध्यम से शुद्ध होकर और पाप से मुक्त हो 
र--इस््राएल ही नहीं, वरत्‌ समस्त मानवजाति शुद्ध होकर (८५:२०-२३) 


..._ सिस्‍्योन में प्रकाशनानुसार परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुरूप जीवन व्यतीत 


करेगी, और परमेश्वर की समस्त भलाई का आनंद प्राप्त करेगी (८:११- 


- १३, १९) । 


.._ जकर्याह की पुस्तक के उत्तरार््ध अर्थात ६-१४ अध्यायों में जकर्याह मसीह 
.. संबंधी आशा को प्रधानता देता है। इस शिक्षा में वह अपने पूर्ववर्तीं नबियों 
.. की शिक्षा का अनुसरण करता है और कुछ नवीन तथ्यों को भी प्रस्तुत करता 


.... है। मसीहसम्मत युग शान्ति का युग होगा (६: १०)। सिय्योन में सब 
... जातियाँ यहोबा को मानेंगी (१४:१६)। यरूशलेम, अर्थात (बाइबलगत 
... प्रकाशन का स्थान) सारे संसार के लिए आशिष का स्रोत होगा (१४:४८) 

... मसीहसम्मृत युग की विशेषता होगी कि सब पवित्नता में पूर्ण समपित होंगे। 
... चघोड़ों की घंटियों पर भी यह लिखा होगा यहोवा के लिए पविद्ञी (१४:- 
... २०) । इस सनातन राज्य की स्थापना के पूर्व कठिन संघर्ष और हृदय-परीक्षण 
.... होगा। इस्राएल के शत्रु जो दृष्टता के प्रतीक हैं--बड़ी सफलता प्राप्त करेंगे 
.. (१४: १-२) । परंतु परमेश्वर सिय्योन के लिए युद्ध करेगा (१४ :३; ६: १ 
... “१७; १४:४) और एक शेषांश को बचाएगा (१३: ८-६) । वही 
... परमेश्वर के शाश्वत राज्य की नवीन व्यवस्था का मुल अंश होगा (१४:६) 

....._ शत्रुओं के दमन को युद्ध की निरदंय शब्दावली में आलंकारिक भाषा में व्यक्त 

..... किया गया है (६:१५; १०:५; १२:४) | यह कठोर वर्णन परमेश्वर के. 
.... न्याय-दंड की कठोरता के अनुरूप है । द 


55 55 भेसीहँ सम्मत युग के पूर्व एक और बात होगी । वह यह है कि अच्छा हर 
.... मेषपाल तुच्छ गिना जाएगा और दुःख उठाएगा (१३: ७) और वाचा तोड़ी 


जाएगी (११: १०) । तुच्छ गिने गए रखवाले की मजदूरी तीस शेकेल दी 


.... जाती है (११:१२) । यह इब्ानी दास का भी मूल था (नि. २१. ३२) 
-.... यह पैसा परमेश्वर के भवन में फेंक दिया जाता है। इसका प्रतीकार्थ यह है कि... 
. परमेश्वर को आज्ञाओं के प्रति समस्त उत्तरदायित्व को तुच्छ जाना गया... | 

(१: 7 बिन्दु जी ११:६में प्रस्तुत है. ४ 










: १३) । कदाचित भविष्य के मर्ब 





नि न मम स््म 














जकर्याह हि . ३७३ 


'तब उससे पूछा जाएगा, तेरी छाती में ये घाव कैसे हुए, तब वह॒कहेगा, ये 
वे ही हैं जो मेरे प्रेमियों के घर में मुझे लगे हैं --यह चिन्ह भी कदाचित 
मसीह के स्थानापन्न दःखभोग की ओर ही इंगित करता है। नये नियम के 
लेखकों ने निश्चित रूप से यह देखा कि यीश खिस्‍्त के तच्छ गिने जाने और 
मृत्यु में ये बातें प्री हुई (मत्त,. २६:१४; २७: ६, १०; मर, 
१४: २७) । 



















. अड़तालीसवां अध्याय 


सलाकी 


शीषक 


.. बब्नानी में इस पुस्तक का शीर्षक मलाकी है । इस शब्द का अथ है मेरा 
. संदेश बाहक या दूत' । सेपत्वागिता में शीर्षक मलकीआस है। प्रारंभिक पद मे 
. इसका पर्याय 'उसका संदेशवाहक दिया गया है। वल्गाता में सेपत्वागिता का 


सा अनुसरण किया गया है । यह निश्चित नहीं है कि यह शब्द मलाकी व्यक्ति का... 
.... नाम माना जाए अथवा “नबी का पर्याय माना जाए, क्योंकि नबी का भी अर्थ 
.. संदेशवाहक होता है। इस संबंध में यहूदी परंपरा स्पष्ट नहीं है, क्योंकि तार- 
.. गुम में प्रथम पद में एजा और बाबुली तालमुद में मोर्दक को इसका रचयिता 
..... माना गंया है। 


3.५ बूवि इस पुस्तक के रचयिता का कोई नाम नहीं है, तो इसे जकयाह के 
...  उत्तरार्ड (६-१४) के साथ अनाम नबूवतों की एक और इकाई मात्रा जा सक- 
.. ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम यह स्मस्य एड कि मूल इब्रानी पाठ 
... में व्ंमान अध्याय-विभाजन नहीं थे तो यह दष्टिगोचर होगा कि बारह को 
_.. पुस्तक' के अंत में अताम दिव्यवचनों का एक सकजन होगा जिनको तीन समहों 
.... में रखा जा सकता है -जक. ६-११; १२-१४ और मलाकी । ये तीनों ही यही- 
... वा का भारी वचन या ऐसे गी शब्दों से प्रारंभ होते हैं । द 


० 7 “सुविधा के लिये मलाकी को व्यक्ति के नाम स्वरूप उपयोग में लाया गया 
ा _है। रचयिता का ताम अवश्य होगा । वह हमें ज्ञात नहीं। अत उसे मलाकी ही 
.... क्यों न कहाजाय £ 
बा ._ ..₹ विषय सामग्री का सारांश मा है 
मलाकी की पस्तक में नबवतात्मक कथोपकथन है, जिसमें इस्राएल को द 


ना की उपेक्षा करने के पाप के लिये 27 | 
रह भविष्यवाणी है कि यहोवा के भया- _ का 





कक नकली आह 2 कक अजब 5-2 अब अा&7० हे अदा कर 











 मलाकी.. ३७५ 


३. रूपरेखा 


मलाकी---वाचागत निष्ठा का नबी 


(१) 


'असत्याइककनर्ी 3िब्जपकसकामी. 


ने बिराने देवता की कच्या से विवाह करके यहोवा के पवित्न स्थान _ 2 
को अपविद्न किया है'''इसलिये तुम अपनी आत्मा के विषय में चौकस _ 


परमेश्वर ने इस्राएल से प्रेम किया है (१:१:५) 'यहोवा यह कहता 


है, मैंने तुमसे प्रेम किया है, परंतु तुम पूछते हो, तूने किस बात में 
हमसे प्रेम किया है? परमेश्वर के प्रेम का प्रमाण यह है कि यद्यपि 
एसाव (एदोम ) ज्येष्ठ भाई था, तथापि वह उजाड़ा गया; परंतु 


याकूब (यहूदा) छोटा होते हुए बचाया गया। 


इस्राएल ने परमेश्वर के प्रेम को तुच्छ जाना है (१:६-४:३) 


परमेश्वर के नाम का अपमान किया गया है (१:६-२:६ ) “यदि मैं 
पिता हूँ तो मेरा आदर मानना कहां है ? यदि मैं स्वामी हूँ तो मेरा 
भय मानना कहां ? याजक परमेश्वर के नाम का अपमान इस रीति 
से करते हैं कि वे उसकी वेदी पर अशुद्ध भोजन और कलंकित पशु 
चढ़ाते हैं--अन्य जातियाँ भी सर्वत्र शुद्ध भेंट चढ़ाती हैं (१:६-१४) । 
यदि तुम न सुनो और मन लगा कर मेरे नाम का आदर न करो 
तो मैं तुमको शाप दूँगा””'कि लेवी के साथ मेरी बंधी हुई वाचा 
बनी रहे । वह मेरे नाम से अत्यंत भय खाता था। उसको मेरी सच्ची 
व्यवस्था कंठ थी'''वह शांति और सीधाई से मेरे साथ साथ चलता _ 
था, और बहुतों को अधर्म से लौटा ले आया था । क्योंकि याजक को _ 


: चाहिये कि वह अपने ओठों से ज्ञान की रक्षा करे, और लोग उसके मुह _ 
से व्यवस्था पूछें, क्योंकि वह सेनाओं के यहोवा का दूत है. (२:१-६) 


विवाह अपवित्न किया गया है (२:१०-१६ ): हम क्यों एक दूसरे का _ । 


विश्वासघात करके अपने पृव॑जों की वाचा को तोड़ देते हैं ? यहुदा 


.. रहो, और तुममें से कोई अपनी जवानी की स्त्री से विश्वासघात न... 
.. करे | क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यह कहता है कि मैं स्त्री- 
.. त्याग से घृणा करता हूँ। 


ः (ग) परमेश्वर के न्याय के विषय में तुमने शंका की है (२:१७-३:५): हे मा 
... "तुम कहते हो कि न्यायी परमेश्वर कहां है ? “परमेश्वर वाचा के... 
.. दूत को स्यायार्थ भेजेगा और वह उन दुष्टों को ऐसा पाएगा जंसा हा रा 


... आग रूपे को शुद्ध करती 















































का 2 पुराना नियम की भूमिका 


(घ) तुमने दशमांश और भेटों में परमेश्वर को धोखा दिया है (३:६-१२) : 
.... “क्या मनष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है ? देखो, तुम मुझे धो- 
खा देते हो" ''सारे दशमांश को भंडार में ले आओ, और सेनाओं 


... वर्षा करता हूँ कि नहीं । 
.. (च) तुम अपने विश्वास के प्रति विश्वासघात की भावता रखते हो (३ 
.. १३-४:३): तुमने कहा है कि परमेश्वर की सेवा करनी व्यर्थ है । 


हुआ ? “जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान 
करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके सामने एक पुस्तक लिखी 
जाती थी। सेनाओं का यहोवा यह कहता है कि जो दिन मैंने ठहरा- 
या है, उस दिन बे लोग मेरे निज भाग ठहरेंगे (३:१३-१८)”"'सब 
अभिमानी और सब दुराचारी लोग अनाज की खूंटी बन जाएंगे; 
और उस आने वाले दिन में भस्म हो जायेंगे'''परल्तु तुम्हारे लिये, 
जो मेरे नाम का भय मानते हों, धर्म का सूर्य उदय होगा और उ- 
सकी किरणों के द्वारा चंगे हो जाओगे ; और तुम निकलकर पाले 
का हुए बछड़ों की नाई कूदोंगे और फांदोगे । 
(३) विश्वस्त रहो और प्रतीक्षा करते रहो (४:४-६) 
....__'भेरे दास घुसा की व्यवस्था स्मरण रखो'''देखो, यहोवा के उस बड़े और 
.... भयानक दिन के आने से पहले, मैं तुम्हारे पास एलिय्याह नबी को भेजूंगा । और 
.. वह माता-पिता के मन को उनके पुत्रों की ओर, और पुत्रों के मन को उनके 
(7 5 माता-पिता की ओर फेरेगा। 7 ० 
..... ४. रचना, रचयिता, तिथि. 


.... व्योंकि सारी पुस्तक में एकसी शब्दावली, दृष्टिकोण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 
..... है। फिर भी, कुछ विद्वानों का विचार है कि ४:४-६ पद इस पुस्तक का उपसं- 
... हार इतना नहीं, जितना वे पूरी बारह की पुस्तक' का उपसंहार हैं । कुछ विद्वान 
..... यहभी विचार करते हैं कि २१११-१२ पद स्थ्री-त्याग के सीधे निन्‍्दात्मक 
...... कथनों का विस्तारमात्र है। हू 





रे . का यहोवा यह कहता है कि ऐसा करके मुझे परखों कि मैं आकाश 
. के भरोखे तुम्हारे लिये खोल कर तुम्हारे ऊपर अपरंपार आशिष की 


. हमने उसके बताए हुए कामों को पूरा किया"'''इससे क्‍या लाभ 


... रचना--पुस्तक की साहित्यिक अखंडता सामान्यतया स्वीकार की जाती है 


.._ इस पुस्तक की एक विशेषता यह है कि इसमें कथोपकथन में अत्यंत कला- 
 स्मकता है। संभव है कि निर्वासनोत्तर काल में एक प्रकार का बुद्धायाद आया. 
गे, जिसमें आचरण के लिये कोरे नबूबतात्मक आदेश के बजाय तरकंणा की माय 


-*+-ष्ककृ्क-फससिसस्ट भव कप मय... स्जप 











मलाकी.......||य| ३७७ 


को गई हो और उस माँग की पूर्ति स्वरूप इस साहित्यिक रूप का प्रारंभ... 


हुआ हो हे 
रचयिता--शीर्षक के संबंध में हम यह कह च॒के हैं कि इसके अतिरिक्त कि... 


कदाचित्‌ लेखक का नाम मलाकी हो, इस पुस्तक का लेखक अज्ञात है । यह भी... 


अनिश्चित है कि लेखक का ताम मलाकी था ! 


तिथि--इस पुस्तक की विषय सामग्री में प्रतिबिबित ऐतिहासिक परिस्थिति 


से ही इसकी तिथि का निर्धारण होता है । यहदा किसी हाकिम के अधिकार में है... 


(१:८5) । लोगों का धाभिक जीवन बहत ही असंतोषजनक है । याजकों के 
जीवन की दुष्टि से (१:६-२:८) और लोगों के जीवन की दृष्टि से भी । लोग 
दशमांश और भेंटों के प्रति उदासीन हैं (३:८) । अन्य जातियां भी शुद्ध भेंट 
देते हैं परंतु ये नहीं (१:११) । स्त्री-त्याग एक खुला कार्य है (२:११-१४) । 
विदेशियों के साथ विवाह जाल बन गया है। (२:११९-१६) । याजक लोग 
हारूत के वंश न कहलाकर 'लेबी की वाचा' से बंधे हुए कहलाते हैं, जिससे यह 
संकेत मिलता है कि रचयिता याजकीय संहिता (?४४७|० (०02) में प्रस्तुत 


.... मूसा की व्यवस्था से उतना नहीं जितना व्यवस्था विवरण में प्रस्तुत सूसा की ._ 


व्यवस्था से परिचित था। यह विचार किया जाता है कि ये सब परिस्थितियां. 
ऐसी थीं, जैसी नहेम्याह के युग में थीं जिसने यहुदा के नैतिक एवं धार्मिक जीवत _ 
में इस प्रकार की त्रुटियों को सुधारने का प्रयत्न किया (नहे.१३:१०-२९) और 
जो फारसी राजा के शासन में यहूदा में हाकिम था। 


. नहेम्याह दो बार यहूदा का हाकिम नियुक्त हुआ । एक बार ई. पू. डड४फ 


में । दूसरी बार ई. पू, ४३३ में । कुछ विद्वान इन दोनों तिथियों के बीच 


मलाकी की पुस्तक की तिथि मानते हैं । नहेम्याह का इस पुस्तक में कहीं भी 


.. उल्लेख नहीं है । अतः यह अधिक उचित जान पड़ता है कि उसकी तिथि नहे-...... 
 म्याह के पहिली बार हाकिम नियुक्त किये जाने के पूर्व मानी जाये । इसमान..... 


से उसकी तिथि लगभग ई. पृ. ४५० मानी जा सकती है । 


 प, धर्मशिक्षा 


5 मलाकी की पुस्तक की केन्द्रीय शिक्षा यह है कि वाचा के प्रति निष्ठावान 
... होना महत्वपूर्ण बात है । यहोवा ने इस्राएल को चुना और उसके साथ वाचा.... 
.. बांधी है (२:१०) | यह इस्राएल के प्रति यहोवा के प्रेम का चिन्ह है (१:२)॥। 
.. लेवी के वंश के साथ बांधी हुई बाचा में भी वही वाचा विशेषरूप से व्यक्त 


; रे होती है (२:४,५)। इस्राएल जाति का सबसे बड़ा दायित्व यह है कि वह ..' . 
7... उस बाचा के प्रति निष्ठावान रहे, जिससे वह परमेश्वर के साथ बंधी हुई है । जब रा. 











.. परमेश्वर का दूत मार्ग तैयार करता है 





. शैेछघ  .... पुराना नियम की भूमिका 


. उसका पाप यह है कि इस बंधन में जो उसका कतेव्य है, उसको उसने नहीं 


* . निभाया है या उसकी उपेक्षा की है । 


वाचा के प्रति निष्ठा पवित्रस्थान की सेवा और उपासना में व्यक्त होती 


| _ है। बाजक इस सेवा के लिये नियुक्त होते हैं। यदि वे वेदी पर निष्खोट बलि 
.. नहीं चढ़ाते हैं तो वे परमेश्वर का निरादर करते हैं (१:६-१४) । इससे हमें 
... शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर की उपासना में हमें अपना सर्वश्रेष्ठ लाना 


. चाहिए । जो धर्मसेवक मन्दिर में आराधना संचालन के लिये नियुक्त किए 
. जाते हैं, उनका विशेष दायित्व यह होता है कि वे वाचा के साथ सूसंगत रीति 
. से मन्दिर की आराधना का संचालन करें, क्‍योंकि वाचा में परमेश्वर ने अपने 
. पविद्न स्वभाव को प्रकाशित किया किया है । इस सम्बन्ध में दशर्मांश और भेटों 
को कतंव्य की उपेक्षा करने का अर्थ है परमेश्वर को धोखा देना और लूटना 


(हब) । 


वाचा के साथ नंतिक दायित्व भी हैं, क्योंकि परमेश्वर धामिक परमेश्वर 


...... है। सच्चाई, दूसरों के साथ सच्चा व्यवहार, दीन दरिद्र स्थिति वालों के साथ 
«.. दया का बर्ताव करता (३:५) वाचा के प्रति निष्ठावान होने के अंश हैं। सूसा 
...... की व्यवस्था में वाचागत कतंव्य प्रस्तुत हैं (४:४) । सत्य के इस प्रकाशन के 
... प्रति आज्ञापालन वाचा के प्रति निष्ठावान होने के तुल्य है । 


परमेश्वर की वाचा के प्रति निष्ठावान के सिक्के की दूसरी ओर मनुष्यों 


.. के बीच वाचाओं के प्रति निष्ठावात रहना है, विशेषकर पुरुष और स्त्री के 
...... बीच विवाह की वाचा में । मलाकी बड़े ही कठोर शब्दों में विवाह की वाचा 
... . को दृषित करने, विशेषकर स्त्री-त्याग करने की घोर निंदा करता है (२:१० 
.. -“१६) | विवाह के समय पुरुष और स्त्री के बीच वाचा का साक्षी परमेश्वर 
... . है (२:१४) | इस विषय पर मलाकी की शिक्षा यीशु खिस्‍त की शिक्षा के . 
लिये मांग प्रशस्त करती है (मर. १०:२-१२) । 


ह#, 


...... मलाकी की पुस्तक से हमें यह शिक्षा भी मिलती है कि अन्य धर्मों के 
..... अनुयायियों में उनके ईश्वरों के प्रति जो सच्ची भक्ति-भावना मिलती है उस 
... भावना का हम आदर करें। वे अपनी उपासना में सच्चे परमेश्वर को ढूंढ़ने 
.... और उसके प्रति अपने हृदय की भावना की धूप जलाने का प्रयास करते हैं । 
... वह अंतिम आशा के दर्शन में यह भी प्रस्तुत करता है कि किसी दिन अन्य... 

.... जातियों के उपास्य की पूर्णता एक ही सच्चे परमेश्वर में होगी जिसके लिये... 
प्‌ साथ ही नबी इस्रालियों को यह उद- 
बोधन देता है कि यदि अन्य धर्मी अपने उपास्य ईश्वर के प्रति सच्चे हुंदय से .. 


























अलाबी' «हक ता लय रा 


भक्ति करते हैं, तो चैँकि इस्राएली एक ही सच्चे परमेश्वर यहोवा की आरा- 


घना करते हैं, इसलिये उनकी वाचागत आराधना पूर्ण सच्चाई और धामिकता ... 


क्‍ के साथ होनी चाहिये (१:११) 


वाचा के प्रति आज्ञापालन भविष्य के परिपेक्ष्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है 
और आवश्यक भी । भविष्य में न्याय की क्रांति तथा उद्धार की आशा भी है । 
जो परमेश्वर की वर्तमान व्यवस्था और उसके आदेश (३:१३) के मूल्य पर 
शंका करते हैं, उनको वाचा के आने वाले दृत (३:१) और स्मृति की पुस्तक 
(३:१६) का स्मरण कराया जाता है। परन्तु परमेश्वर को मिलाप और 


उद्धार करने की अभिलाषा है। लोगों को शुद्ध करने (३:३) तथा व्यक्ति 


व्यक्ति के बीच ठीक सम्बन्ध स्थापित करने (४:६) के द्वारा उसका दूत मांग 
तैयार करेगा । उस दूत को एलिय्याह नबी कहा गया है (४:५) । यह नबी 
इस्राएल के उन महान नबियों में सर्व प्रथम है जिन्होंने विश्वास की रक्षा की। 
इस प्रकार बड़ी ही विचित्र रीति से इस्राएली लोग यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले _ 
.. के आने के लिए तैयार किए गए, जिसने आकर प्रभु यीशु खिस्त के लिग्रे मार्ग 

.. तैयार किया (मर, १:२) । 











परिशिष्ट ( ्ः हे 


कालानुक्रम सारणी 
पलिश्तीन सिस्र 


.ई. पृ, ५००० यरीहो, तिनीकाल ई. पू., २६०० 
प्राचीनतम दुर्गबद्ध -२७००; पहला और 
लगरें /: दूसरा वंश... 
न क प्राचीन राज्य २७००- 
२२००; तीसरे से 
छुठवें वंश । सूची स्तम्भ 
(पिरामिड) 


प्रथम मध्यंतरीय काल 
२२० ०-१६५६ सातवें 
से ग्यारहवें वंश 


- अब्रह्मम तथा कुलंपतियों मध्यराज्य ई. पू. १६८६ 
का युग 5० ४१७७६; आबारहवां 
पक हरा, 


द्वितीय मध्यंतरीय काल 
. _ १७७६-१५७० तेरहवें 
से सतरहवें वंश 


... इब्रानियों का मिस्र में हुकसोस का आक्रमण: 
.. प्रवास ल. ई. पू.१७०० ल., १७०० नवीन 
पडा: राज्य (साम्राज्य) ई. 


पप्पू १%७०-१०६० 


.. अठारहवें से बीसवें वंश 


मेसोपोत्ासिया 
सुमेरी काल ई. पू. 
३०००--२४०० 


सुमेरी अक्‍कादी काल 
२४००-२० २४५ जिस 
के बीच गुतियुम बबेर 
शासन हुआ २२५०- 
२१७०० 


प्राचीन बाबेली काल ई. 
पू. २०२५- ६००, 
छठवाँ राजा हमुराबी 
था (१७२८-१६८६) 


हित्ती लोगों का बाबुल 
पर आक्रमण ल. ई. 
पू, १६०० हु 
 कस्सी काल १५४००- - 
२३ ४ 


>> 5>+४०नओ«< पल. 3-० कक + नेक सन नल नल कहे +कल न ४०५० १०++० ००७०४ 











कालानुक्तम सारणी... कह ३८१. 


तुतमोसिस प्रथम १५२५ 
“१४६५ (हतशेपसुत 
१४८६-१४६६ ) 
 तुतमोसिस द्वितीय १४- 
९५-१४९६० 
(निर्मेमन-इस मान्यता तुतमोसिस तृतीय महान _ 
पर कि १३०० से पूर्९ष १४६९०-१४३६, आमे- 
हुआ) नोपिस द्वितीय १४३६- 
१४२६, आमेनोपिस 
तृतीय भव्य १४२३- 
१३७७, आमेनोपिस 
चतुर्थ (आकेन आतोन) 
१३७७-१३६० 
(तेल एल-अमेना काल 
१३७५-१३६०) 
इब्रानियों का दमन (नि. सेती प्रथम १३१९- 


१:८). १३०१; उननीसवाँ वंश 
_निर्भमन १३००-१२६०. रामसेस ट्वितीय १३०१ 
द -१२३४ द 


 यहोशू का यरोही लेता मरनेप्ताह १२३४-- हा 

१२५०; पलिशतीन पर १२२७; पलिश्तीन में 

आक्रमण... इस्राएल को हराता है 

. विजय तथा न्‍्यायी काल १२२६ (मरतेप्ताह का 
5 ्‌२४०-१०४२ -.  स्तम्न्त) 


समद्री जातियों का आक्रमण १२९००-१०८१५ 


. पलिएती (समुद्री जाति) रामसेस तृतीय ११६९५- नवूकवरेस्सर थम 57 
 पलिश्तीन में बसते हैं।। ११६४; समुद्री. ११४६-११२३ बाबुल. 

का जातियों को पलिश्तीन की सत्ता को पुनर्जीवित 
की ओर पीछे हटाता है. करता है। । 
मिस्री सत्ता का हास | 































है ३ ८२. 


.. इब़ानी राजतत्र 
.. दाऊद का वंश १००२- 


का . ६६२ (हेब्नोन में ७ वर्ष, 
. बाद में यरूणलेम में). 


सुलैमान ६६२०-२२ 
" (भवन निर्माण ६५६- 


६१५) 


...._ रहुबियाम ६२२-६१९५, 
...... यारोबाम का विद्रोह 


। यहुदा | राज्य 


.. आसा ६१३-८७३ 
_.... यहोशापात 5७३- 
४5 छोड 8, ह 


। > अहज्याहु ८५४२ 


पुराना नियम की भूमिका 


ए८छ, दाऊद १००२- -:- 


_ इस्राएल राज्य 


यारोबाम का वंश ६२२ 


-८७६ यारोबाम प्रथम 
६२२-६०१ नादाब 
६०१-६९९० 


बाशा का वंश ६००- 


८9६ बाशा ६९००- 
प्छछ || 

एला 5७७ "८७६ 
(जिम्नी ५७६) ओम्री 
का वंश ८७६-८४२ 
ओम़ी  ८५७६-८६६& 


 अहाब ५६६-८५० 


अहज्याह्‌ ८५५०-८४ ६ 
 योराम ८४8-८४२ 























मित्र 


दो श्र । ै 


..._पड़ौसी जातियाँ 


का शेशोंक 
(शीशक), बाईसबाँ 
वंश, पलिश्तीन पर 
आक्रमण करता है 
६९१०८(१ रा. १४:२५) 


अरशुर का शलमनेस्सर 


तृतीय (८५६-८२४) 


. कारकर पर अहाब 


और उसके साथी. 


. राजाओं को पराजित 
.._ करता है (शलमनेस्सर 
का स्तंभ लेख) 


८ंडप येह्‌ अरशूर के . 
राजा शलमनेस्सर तृतीय .....' 














अतल्याह रानी ८४२- 
८३७ 

योआश . ८३७-८०० 
अमस्याहूं ८००-७८३ 


अजर्याह (उजिय्याह) 


9८३-७४२ 
(योताम शासक ७५०- 
७४२) द 


योताम राजा ७४२- 


७३४५ 


आहाज ७३५-७१५ 





कालानुक्रम सारणी 


येहु 5४२-८१५ 


यहोआहाज ८१५-८० १ 


योआश ८5०१-छ८६ 
यारोबाम द्वितीय ७८६ 
न ४८ 


जकर्याहु ७४६०-७४ ५ 


पतन के राजा 
शललूम ७४४ 
मनहेम ७४५-७३८ 
परक्ाह ७३८--७ ३७ 


पेकह ७३७-७३२ 


होशे ७३२-७२४ 


ले लेता 


.../...... इस्राएल राज्य का अन्त 
. हिजकिय्याह ७१४-६८७..... 








७३८ मनहेम अश्श्र के 
राजा पुल (तिग्लत्पि- 
लेसेर तृतीय) को भेंट 
देता है (७४५-७२७) 


७३४ पेकह एवं अराम 


के रसीन द्वारा यहू- 
शलेम का घेरा... 
७३२ तिग्लत्पिलेसेर 
तृतीय पलिश्तीन पर 
आक्रमण करता है और 
होशे को राजा बनाता 


है। होशे अश्शुर के... 


राजा शलमनेस्सर _ 


पंचम को भेंट देता है... 


(७२७-७२२ ) 


७२१ अश्शूर का राजा सारगोन द्वितीय (७२२- 
७०५) तीन वर्ष के घेरे के पश्चात शोमरोन को 


७०१ अश्यूर का राजा... 
(७०भे 


सन्हेरीब 
६८५१) यहुदा 
आक्रमण करता है । 











_ इंदोडें 





. आमोन ६४२-६४० 
. योशिव्याह ६४०-६० ६ 
.. ६२२ योशिव्याह का 

. धर्म सुधार _ 














.. यहोआहाज ६०६ 


5. बहोगाबीत रेल 


.... बहोयाकीम ६०६९-६८ 


. पुराना नियम की भूमिका 


अश्श्र का राजा अशूर 
बनीपाल (६६६- 
६२६) मनश्शे को 
बन्दी बनाता है. 

. ६१२ नीनवे का पतन । 
बाबुलियों का अधिकार 
अश्श्री राजा ६०९ 
तक लड़ते रहे। 
अश्श्री साम्राज्य का 
अन्त । 


६०९ फिरौन-निकों सत्ताइसवाँ वंश 

. (साईन ) मगिद्दों में योशिय्याह को 

मार डालता है; यहोआहाज को. 

.. बन्दी बनाता है। यहोयाकीम को 
. राजा बनाता है। 

.._ ६०४५ बाबुल का राजा नबूकदनेस्सर 
.. द्वितीय (६०५-५६२) ककमीश में 
निको को हराता है और सर्वोपरि 
.. सत्ता बन जाता है। द 
..._ ५६६ नबूकदनेस्सर ३०३२ यहूदियों 
. को बंघुआई में ले जाता है (यिर्म. 
.. ४२:२८) द का द 
.._ भ६८ नब॒कदनेस्सर याहोयाकीन को... 


बंदी बताता है और सिदकिय्याह को 


. राजा बनाता है । 

_ बंघुवाई का प्रारंभ 
..._ ४८८ यरूशलेम घेरा जाता है; ८३२ 
.... यहुदी बंघुआई में ले जाए गए (थि, 
हे -._ ४८७ नबूकदनेस्सर द्वारा १८ महीनों के घेरे के बाद यरूशलेम नष्ट किया... 
जाता है यहदा राज्य का अन्त । इंब्रानी राजतन्त का अन्त । नंबूकदनेस्स र | हा 7 
 गदल्यांह को हाकिम बनाता है । ० मम 



























कालानुत्रम सारणी | देश 


बाबुल में बंधुआई (निर्वासन) 
४5७०५ ३ ७ 


पलिश्तीज 
फारसी काल 


५३७ शेशवस्सर के अधीन यहदी 


लौटते हैं । जरुव्बावेल भवन निर्माण 


करने का असफल प्रयास करता है 
५२०-५१६ भवन का पुनर्निर्माण 


४५५८ एजा यरूशलेस को आता है 
४४४--४३३ नहेम्याह हाकिम है 
४३३ नहेम्याहु का लौडना और यह 


शलेम को दसरी बार आना 


ले 


५८३ नबूकदनेस्सर ७४५ यहूदियों की 
बंधुआई में ले जाता है (यथि. 
४२:३० ) 

५६२ बाबुल का राजा एवील्मरोदक 
(५६२-५६०) बन्दी यहोयाकीन 
का सम्मान करता है। पा 
५४५३६ फारस का राजा कुल (५३६- 
५३०) याबुल पर विजय प्राप्त 
करता है। द 
बाबुली साम्राज्य का अन्त 


पड़ौसी जातियाँ या राष्ट्र 


३८ कुख्र यहूदी बंधुओं के लौटने 
की आज्ञा निकालता है 


कम्बुसिस ५३०-५२२ 


दारा प्रथम ५२२-५८५६; मिस्र पर 
विजय 
क्षयर्ष प्रथम (अहासुरस) ४5८६- 


अतक्षत्र प्रथम लॉगीमानुस ४६५-४२४ 


क्षयर्ष द्वितीय ४२४-४२३ 

दारा द्वितीय ४ए२३-४०४ ४. 
अतक्षेत्र द्वितीय म्नेमीन ४०८४-२२ प्र 
अनतर्केत्र ततीय ३५८-४४४६ -.- 


- | 


अरसेस आओ 
दारा तृतीय कोदोमानस (श३६- 
(:क ३) 


करता है 


 फ्रारसी राज्य का अंत 














का मा पुराना नियम की भूमिका... आम 

... यूनानी काल कप सा 

_ ३३१-३२३ सिकंदर . भहान के. सिकंदर महान के पश्चात प्तोलेमी 

घ्िकार में पलिइ्तीन . प्रथम (इेरे३े-रेफरे) और सिल्यु- |. 

.. क्रुस प्रथम निकातोर (रे१ ०१४ । आ, 

.. मिस प्तोलिमी राज्य और अराम _ 
में सेल्यूकी राज्य स्थापित करते हैं 





+ ३२५१-१६६- प्तोलेमी : के अधिकार 
... में पलिश्तीन 68 कप 

5 १६८-१६९७ सेल्यु यों के हाथ मे 
.... पलिश्तीन 828 0 
.. १६७ मकाबी विद्रोह 


६८ पनियन के युद्ध मे सेल्यूकियों ने 
प्तोलेमियों से पलिश्तीन ले लियी 


१६७ अन्तीओकुस चैंदुद एपिफनेस 
_(१७४-१६३) यहदियों को संत्ताता 
हैं और भवन. «की अपविद्त 
द करता है। द 3 
ही 2 मकाबी काल ५; 
.. : ...- मकाबी यहुदा १६६-१६० 
१६४ भवन शुद्ध किया जाता है |. 
योनातान १६०४... 
0 4) महायाजक बनता हैं हे 
22050 शिमोने १४२० ३४ अराम का दिमित्रियुस द्वितीय (१४४५ 
रा 207 5 |परे६) शिमोन को मान्य करता 


वि 2 मल मर | 
ल्‍ टी ज्यान कि िलयिण--। सककजप ऑड० ८“ >:डस्जडू ३ द 













रे & 
४.४: 5० हसमोनी काल 
5 योहन हुरकानुस प्रथम १३४--१०४ 
४75 यहुदा अर्स्तोबुलुस अधम. जे: ४ 
... “१०३ जा पक 
22002 “00, सिकंदर पलक: हि 9६ ] मम मा मम 
7० जसिकंदरा राती ७६०६७... आह का हा 


ः अरिस्तोबुलुस द्वितीय ६ ७-६ ऐै कैत 


६५ सूरिया रोमी प्रांत बन जाता हैं. 
. सेल्युकी बंश का अंत। ई रोमी 
5 यरूशलेम ले लेता है।. 
7 उसके पश्चात यहूदी शासक नाम 
_ केही राजा रहे। रा 

















कालानुक्रम सारणी... ३८७ 


... हैरकानुस हितीय ६३-४०... ६० प्रथम ल्िकतंत्र: पोम्पी, कैसर, 


द अन्तीगोनुस मत्तथियास ४०-३७ ४३ द्वितीय त्िकतंत्र : एन्तोनी, -. 
ते ४ “आक्तिवियुंस, लेपिदुस: 
हेरोदेस महान ३७-४ द ३१ औगुस्तुत (आक्तेवियुस) रोमी 
द 8 अका सम्राट बन जाता है (ई. पू. ३१- 
... यीशु खिस्त का ई. पू. ४ की बसंत के १४६. स.) 
हि पहले जन्म 


























5. बरिशिष्ड (ले) / हप: ॒ 
....... पुरातत्व और पुराना नियम. 
अधुनातन काल में पुरातत्व के अध्ययन से पुराने नियम पर बहुत कुछ हा 


. प्रकाश पड़ा है। प्राचीन संस्कृतियों के कुछ ध्वंसावशेष रह जाते हैं, जैसे प्राचीन 
.  खंडहर, आधार, शिलालेख, समाध्रियां, अलंकार, आभूषण, गृहवस्तुएं, मिट्टी 


.... केबतंनों के टुकड़े आदि पुरातत्व इन प्राचीन ध्वंसावशेषों के माध्यम से 
...._ प्राचीन संस्कृतियों का अध्ययन है। कभी कभी ये वस्तुएं सरलता से दिखाई 
..... पढ़ती हैं, जैसे धरती पर पड़े हुए माटी-बतेनों के टुकड़े । परंतु कई बार और 
.... विशेषकर यदि वस्तुएं कुछ मृल्यवान हुई तो वे भग्नावशेषों की परतों के बीच _ 
.. या मिट्टी में दबी हुई रहती हैं और उन्हें खोदना पड़ता है 0 
.... ग्राचीन मिस्र के ध्वस्त मंदिर, राज भवन और कबरों में कई चित्रात्मक. | 


.. ख़ुदे हुए लेख मिले हैं । दीर्घष काल तक यात्री लोग इनसे आकर्षित होते रहे और... 
... ... आएचये की भावना से अभिभत होते रहे । इनका. अर्थ किसी की समझ में नहीं... 


.... आताथा और वे जादुई चित्र या सजावट माने जाते रहे। परंतु १७६६ ई. में 
.... नेपोलियन मिस्र के विरुद्ध लड़ाई कर रहा था। उस समय सिकन्दरिया नगर के 

_.... तिकट रोसेट्ठा नामक. शिला (०5०४४ 5007८) पायी गई। उस पर तीन 
...  सिपियों में लेख हैं। ये प्राचीन मिस्नी स्मारकों की, प्रवाही मिख्री लिपि जिसे 
....... दिमोतिक (०7०४०) कहते हैं, और यूनानी लिपि हैं । यूवानी ज्ञात लिपि थी । 
.... एक फ्रांसीसी विद्वान जे. एफ. शेम्पोलियन ने इत ज्ञात लिपि के सूत्र से अन्य 


57. प्राप्त हुई। 


दो लिपियों को पहिचाना और इस आधार पर मिस्र के प्राचीन स्मारकोंकी ... 





.. कुंजी मिली । इस प्रकार प्राचीन मिस्र के इतिहास एवं साहित्य की जानकारी रह रा 


अज्ञात प्राचीन भाषाओं के कोष के लिये इसी प्रकार एक कुंजी १८०३५ ई 


... में प्राप्त हुई, जब एक अंग्रेज तरुण विद्धान एच. रॉलिन्सन वर्तमान इराक में 





.. बहिस्तान की ऊंची चट्टान पर अपनी जान की बाजी लगाकर चढ़ा और वहाँ 


. से एक तिभाषीय शिलालेख की अनुमुद्रा बना लाया | इसके आधार पर उसने... 
प्र] पढ़ा | इसके पश्चात्‌ १८५१ में परसोपुलिस नगर... 














सहायता से वह दोनों लेखों के कीलाक्षर... 
कुछ वर्ष पश्चात्‌ नीनवे में अशूरबनी- हे 2 





0 
पाल के महान ग्रथालय का अनुसंधान हुआ और कीलाक्षर लिपि की इस कुंजी 
से उस ग्रथालय को समभने में बहुत बड़ी सहायता प्राप्त हुई । उस ग्रंथालय की 
पुस्तक मिट॒टी की पटियां थे | 

लगभग इसी समय पलिश्तीन में अनुसंधान कार्य आरंभ हुआ | पहले तो. 
ऊपरी सतह पर जो कुछ था उससे ही यह कार्य आरंभ हुआ । १८३२-४२ में: 
एक अमरीकी विद्धान ई. रॉबिन्सन ने बाइबल उल्लिखित तगरों और गाँवों 


का वत॑मान स्थानों या खंडहरों के साथ एकीकरण का प्रयास किया । १८६४ 
में ब्रिटेन में पलिश्तीन अनुसंधान निधि. (?बोल्डाफट ल्ीफबणा वात). 


का निर्माण हुआ । दाऊद के नगर यबूस के स्थान को जानने के लिये सी. बारेन...._ 
ने यरूशलेम की पूर्वी पहाड़ी पर खुदाई की । पश्चिमी पलिश्तीन का सर्वेक्षण 


सी, आर कोनन्‍्डर और एच, एच, किचनर ने किया । परिणामस्वरूप पलिश्तीन 
.. का सुप्रसिद्ध विशाल नक्शा बताया जा सका। 
. बाइबलगत देशों में यत्र तत़् कई ऊंचे टीले हैं जो प्राचीम बसे हुए स्थान 
जेसे प्रतीत होते हैं । उसकी खदाइ करने से पुरातत्वज्ञों को कई महत्वपूर्ण 


. वस्तुएं मिली हैं, जैसे माटी बतेन, सिक्के, आभूषण के टुकड़े आदि । परन्तु इन _ 
टीलों पर मानव-निवास का साधारण प्रमाण उन टीलों की मिट्टी है 


.._ पाए गए वे लगभग एक ही काल के होंगे 


. की जिसमें मिट॒टी के पात्रों के छोटे छोटे टुकड़े भरे पड़े हैं। ये सदियों । 
से वहाँ फेंके जाते रहे, क्योंकि मिट॒टी के बर्तेतव टूटने पर या बेकाम 


हो जाने पर फेंके जाते हैं। भारत केगाँवों में भी हम यही बात देखते 


8 | कचरा फेंका जाता रहा है और छोटे छोट टीले गाँव के पास बनते आए 


३ 
७९. 
हल 
हे 


१८९० में पलिश्तीन में वैज्ञानिक अनुसंधान आरम्भ हुआ । डबल्यु. एम... 


.. फ्लिडस॑ पीत्ची ने तेल-एल-हेसी (एग्लोन ? ) में खुदाई करते हुए यह बताया कि. 
मिट॒दी के पात्रों के इन मूल्य रहित टुकड़ों का कालानुसार विभिन्नता की दृष्टि से... 
. अध्ययन किया जा सकता है। अर्थात, आबादी के एक काल के मटका टुकड़ों को 


.. दूसरे काल के टुकड़ों से अलग किया जा सकता है । एक ही प्रकार के टुकड़ों को... 


_ सावधानीपूर्वक एक बार ही अलग करने से पित्ती एक इतिहास काल सेंउससे पूर्व... 
के इतिहास काल तक खेदाई कर सका । कई टीलों पर इस प्रकार खदाई करने 


.. के पश्चात विभिन्न काल के मिट्टी के पात्रों के रूपों की तुलला कीजा सकी 


: और विशिन्न कालों को सहसंबंधित किया जा सका । इसके साथ ही यदि कोई 
... सिक्का या कोई लेख खुदाई में मिला (क्योंकि उन दिनों में लोग टिप्पणी 
... लिखने अथवा रसीदें लिखने के लिये मिट्टी के पात्रों के टुकड़े काम में लाते. 


) तो यह इस बात का प्रमाण था कि जिन ठुकड़ों में इस रूप के लेखादि _ के 






.. संबंध में धीरे धीरे एक “मिट॒दीपात्न तिथिपत्ना बनाया र 


7र संपूर्ण पलिश्तीन के .. | 
या । अन्य देशों के... 


5 पक 5.2 


. संबंध में भी ऐसा ही तिथिपत्ना बनाया गया | जब कभी भी कहीं नई खुदाई 
- हुई तो सरलता से इस मिट॒टी-पात्र तिथिपन्ना के द्वारा उसका समय निर्धारण 
.. किया जा सका । जितनी अधिक पुरातत्वज्ञ इस दिशा में खुदाई करते जाते हैं, 
द | उतना ही अधिक सिद्ध यह तिथिपता होता जाता है।. 2 
.._ किसी प्राचीन स्थल की खुदाई की प्रक्रिया निम्नानुरूप होती पहले 
. एक सीधी नाली खोदी जाती है, जब तक कि कोई तलला या मंजिल का फर्श 

ते मिल जाए । तब उस फर्श पर जो कुछ है उसे सावधानीपूर्वक उठाया जाता 
_ है। जो वस्तुएं मिलती हैं उनका या तो मूल स्थिति में चित्र बना लिया जाता 
... है और फोटो ले ली जाती है। स्वभावतया ये सब वस्तुएं उन लोगों की होंगी 


.. जो उस तहले पर रहते थे। इसके पश्चात दूसरे तल्‍ले की खोज की जाती है । 


. यह कदाचित छः आठ इंच नीचे ही हो । यह पिछली परत. की वस्तुओं के युग 
. से पहले के युग की मानी जाती हैं । इस प्रकार परत परत या मंजिल मंजिल 
- खुदाई की जाती है, और वह निवास के एक काल से दूसरे काल की खुदाई 
.. होती है। इस सारी प्रक्रिया में बड़े धैय और कौशल की आवश्यकता होती 
.. है| इसमें सर्वेक्षण, चित्र बनाने, फोटो लेने, ऐतिहासिक तथा भाषा शास्त्रीय _ 
.. ज्ञान की आवश्यकता होती है । श्रमिकों को लगाना, उनका निरीक्षण करना... 
.._ वस्तुएं रखने के स्थान और रहने के स्थान तो सामान्यतया करना ही पड़ता _ 
.. है| तेल-एत-मुत्तेसेल्लीन (मगिद्दो) में १४ वर्ष (१६२५-३९) में खदाई हुई 
... और लाखों रुपये लगे । आजकल किसी को वहाँ की सरकार खुदाई का कार्य _ 
... करने की अनुमति उस समय तक नहीं देती जब तक कि उसे यह निश्चय न. 
- हो जाए कि खुदाई करने के इच्छुक के पास पर्याप्त धनराशि और कौशल है। 
प्रथम विश्व-युद्ध (१६१४-१८) के पश्चात पलिश्तीन पर ब्रिटिश का. 
. अधिकार था । उन्होंने पुरावशेष (7000 ४८४) विभाग की स्थापना की और 
.. प्राचीन स्थलों की खुदाई को बड़ा प्रोत्साहन दिया। मगिददों के अतिरिक्त, 
.. जिसका उल्लेख ऊपर हुआ है, अश्कलोन, बेतसान, साऊल का गेबा, ओपेल 
... [दाऊद का तगर ), गिरासां, शीलोह, शेकेम, मिस्पा, दबीर, शरू हेन, बेत- 

शेमेश, यरीहों, बेत-एग्लान, बेत-सूर, सामरिया, ऐ, बेतेल, लाकीश और 


एस्योनग्रेबेर नामक स्थानों की खुदाई की गई। उत्तरी मेसोपोतेमिया में नजी 
पाठ खुदाई में प्राप्त हुए। रे 


द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात खुदाई का कार्य फिर चालू किया गया। इस हे 





कं 


१६२६ में उत्तरी सूरिया में एक महत्वपूर्ण खोज हुई, जब रास एस-शम्रा.. 
अंतरीप के निकट प्राचीन नगर उगरित का पता चला | वहाँ एक मंदिर का 
प्स्तकालय और उसमें सेकड़ों मृत्तिका-पटियाँ प्राप्त हुईं। इनके लेखों की 


लिपि कीलाक्षर लिपि थी, परंतु शीघ्र ही यह पता चला कि इस लिपि की. 


भाषा आज तक की पांडुलिपियों की सामान्य भाषा अक्कादी से भिन्न है। 
जमंनी और फ्रांसीसी विद्वानों को शीघ्र ही इस भाषा के स्वरूप को पहचानने 
में सफलता मिली और उन्हें पता चला कि यह वर्णमालात्मक कीलाक्षर लिपि 
है (अक्कादी भाषा पदात्मक है, वर्णमालात्मक नहीं), और कि इसकी भाषा 

उत्तरी कनानी या उगरित भाषा है, जो बाइबल की प्राचीन इब्रानी से इतनी 
अधिक मिलती है जितनी अन्य कोई प्राचीन भाषा नहीं। इसके फलस्वरूप 
कनानी देवी देवताओं कौ--एल, अशेरा, बाल, अनत, यम अथवा सागर 
राजकुमार --कथा कहानियों पर प्रकाश पड़ा है। भजनों में कछ ऐसी पंक्तियां 
हैं जिनका उगरित कविताओं के साथ साम्य बड़ा रोचक है। द 


. १६४७ में मृत्यु सागर कुंडल पत्र ([0८80 8८8 807०७) मिले। इनकी 
प्राप्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है । मृत्यु सागर के उत्तरी किनारे के निकट एक गुफा 
में पहले कुछ कुंडलपत्र मिले । कुमरान नामक स्थान में एसेन समाज के ध्वंसा- 
बशेषों के निकट ही ये पाए गए। चोर बाजारी के लिए कुछ लोगों ने इनके 
अलग अलग भाग किए । कोई २० वर्ष पृ अरब-इस्राएल युद्ध के कारण इनका 
भली भाँति विज्ञापन नहीं हो पाया । इस कारण अभी कुछ वर्ष ही हुए हैं कि 
इतका पूर्ण संग्रह किया गया और इतका अध्ययन किया गया । ये कुंडल पत्र... 
 एसेन धर्म संघ के विशाल पुस्तकालय के भाग हैं| यह संघ और पुस्तकालय 
_ कुमरान में थे । यशायाह की पुस्तक की एक प्रति उनमें प्राप्त हुई जिसकी 
तिथि लगभग ई. पू. €० है । इससे यशायाह की पुस्तक के मूल पाठ के संबंध 
में प्रमाण मिलता है | अन्य कुंडलों में अनुशसत नियमावलि, धन्यवांद-भजन _ 
और हबक्कक पर टीका है। इन कुंडल पत्नों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकों के ० 
सैकड़ों टुकड़ों का ढेर भी वहाँ मिला । इन टुकड़ों को श्ृंखलाबरद्ध करने का 
विशाल कार्य यरूशलेम में अभी तक चल रहा है। 28 हे 


क्‍ पुरातत्व ने निम्नलिखित रूपों में पुराने नियम के अध्ययन में योगदान 
दिया है: (१) शीलोम शिलालेखों, मोआबी शिला और सामरिया तथा _ 
लाकौश के ऑस्ट्रका (घड़ों के लिखे हुए टुकड़े) जैसे अनुसंधानों के द्वारा _ 
 निर्वासन-पूर्व काल की इब्रानी भाषा के संबंध में हमारा ज्ञान समृद्ध हुआ है। 
. (२) इस्राएल के इतिहास का उसकी पड़ोसी जातियों इतिहास के न 
में अध्ययन किया जा सकता है। उदाहरणा्थे निर्मेमन, यहाश 












हर 


.. की विजय, अश्श्री और बाबुली लोगों के बीच युद्ध और इतिहास में मित्र _ 
_ की भूमिका आदि का अध्ययन किया जा सकता है। अश्श्रियों के अभिलेखों _ 
_ के द्वारा विशेषरूप से इस्राएल के इतिहास को समभने में सहायता मिली द 
.. (३) इस्राएल जाति की पड़ौसी जातियों की संस्क्रति, प्रथाओं तथा धर्म पर _ 
. भी पुरातत्व से बहुत प्रकाश पड़ा है। नूजी पटियों से अब्नह्माम के युग पर 
. प्रकाश पड़ा है। उगरित मलपाठों के द्वारा हम कनानियों के धर्म को अधिक 
. समझ सकते हैं, जिसके साथ पुराने नियम में प्रस्तुत विश्वास को लगातार 
.. संघर्ष करना पड़ा था प्रातत्व के आधार पर सलैमान की महत्ता कम नहीं 


के हुई वरन्‌ उसमें चार चांद लग गए हैं। इस पृष्ठभमि के कारण इस्राएल के 


. अद्वितीय विश्वास पर और अधिक गहनता से विचार करने में अध्येता को 
.. सहायता मिलती है | द 


उत्पत्ति -- 
निर्गममन--- 

. लैव्यव्यवस्था-- 
गिनती - 

व्यवस्था विवरण--- 
यहोशू-- 

. न्यायियों-- 


 रछूत--- 


है2॥ मृूएल-- 


हर राजाओं-- 


. इतिहास-- 
एज-- 


रु 23 त्तट् स्याह-.«« 


एस्तेरल 
अय्युब-- 
भजनसंहिता-- 
नीति वचन-- 
. सभोपदेशक-- 
श्रेष्ठगीत-+- 
यशायाह-- 


</मिर्मयाह-- 


.. बविलापगीत-- 
-यहेजकेल-- .. 

5 दानिस्येल-- 

गा 


57 बोएलल्न द रा, 
. अवोप+ ४ 
.._ "ओबद्याह-- रा रे 
- “्योनानस 25 गे 


परिश्षिष्ट (ग). 
हिन्दी में संक्षिप्त रूप 
१- धर्मशास्त्र की पुस्तकों के नाम 


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नि० 
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 हाग्गे-- 
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है मे प्रेरितों के काम-- 


रोमियों-+ 


 कुरिथियों-- 
गलतियों +-- 


इफिसियॉ-- 


_ फिलिपियों-- 
.. कुलुस्सियों-- 
५ - थिस्सलनीकियों--- ...!: 
“सीमुथियुंस-- -. - 
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. ३६९४... हिन्दी में संक्षिप्त रूप 
द २--अपक्रिफा अर्थात ज्ञानवर्धक ग्रंथ द 
. ज्ञानवर्धक ग्रंथ---.. ज्ञा०...... मकाबी-- ... मक० 
.. एस्ट्र-- .... एस््क० ... भनश्शे की ब्रार्थवा-- मन० 
... तीन युवकों का गीत-- ती.यु. .... थिमंमाह का पत्च-- यि०प० 
. . तोबित-- ा तो० ४. 5: बुंदित--+ . ४. -  यंद० 
. सुलेमान का प्रज्ञाग्रंथ- प्रज्ञ... शेष एस्तेर--... शे्एर 
. बारूक-- बा० 7. सीरख-- | सी* 
बेल और अजगर->. बे»... सुसस्ता-- : सु० 
क ३-- हिन्दी अनुवाद क्‍ 
... हिन्दी प्रचलित अनुवाद--  हिन्प्र० 
.. हिन्दी संशोधित अनुवाद-- हि सं० 
क्‍ ४--अंग्रेजी संक्षिप्त रूपों के हिन्दी अनुवाद या रूप 
8, 4)2. -- ई० स०...... 7९. 8, ए.-- आर. एस, वी. 
हक हे, 5 ० एं० बी  .. हे, ७. -- वी. 
। ई०पू०.. इक (5) | 
ल०.... सेपत्वागिता,सप्तति अनुबा | 
तु० 2) ह जात | दे 
उदा०. एण॒इभ्व८ वुल्गाता.. बु. 
या 3 कक: 2 जा | 
है दा ५, 9, 3, --+ एन० इ० बी० द | 
_. पृ, ए.-+ .. जो०दे० -